मैं उसे बांह पकड़कर एक ओर ले गया और धीरे से बोला - "मृतक की नाक और कनपटियों को देखा तुमने ?"
"देखा है। क्या खास बात है उनमें ?" - अमीठिया बोला ।
"नाक और कनपटियों पर चश्मे के फ्रेम का दबाव मालूम हो रहा है।"
"ठीक है, देखा मैंने।"
"लेकिन चश्मा तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा ।"
"है।" - अमीठिया ने गर्दन हिलायी ।
चश्मा वार्डरोब में लटके बैग में से बरामद हुआ । हम दोनों ने बड़े गौर से चश्मे का मुआयना किया ।
"बहुत मोटे लैंसों वाला चश्मा है यह।" - मैं बोला ।
“तो क्या हुआ ?" - अमीठिया बोला ।
"ऐसा चश्मा लगाने वालों का तो इसके बिना गुजारा नहीं होता होगा। इसके बिना तो वह एक कदम चलने से भी ठोकर खा जाती होगी ।"
"तो ?"
"जिस शख्स की आंखें इतनी कमजोर हों, उसका चश्मा तो उसके पलंग की अगल-बगल में ही कहीं मौजूद होना चाहिए। ताकि नींद से उठते ही वह हाथ बढ़ाकर चश्मा उठाए और आंखों पर लगा ले । पर चश्मा बरामद हुआ है पलंग से दूर वार्डरोब में लटके बैग में से। क्या यह बात तुम्हें जंचती है कि मरने वाली ने खुद चश्मा बैग में रखा हो और बैग को ले जाकर वार्डरोब में टांग आयी हो ?"
अमीठिया की गर्दन स्वयंमेव ही इंकार में हिलने लगी ।
"यूं तो वह पलंग पर वापस लौटते समय अंधों की तरह रास्ता टटोलती और ठोकरें खाती आती ।"
"ऐग्जैक्टली ।"
" यानी कि चश्मा बैग में किसी और ने रखा और बैग को वार्डरोब में किसी और ने पहुंचाया।"
"बिल्कुल ।”
"किसने ?"
"जाहिर है कि हत्यारे ने ।”
"तुम्हारा मतलब है कि चश्मा शांता और हत्यारे के बीच हुई हाथापाई के दौरान शांता की नाक से गिर गया होगा । फिर बाद में हत्यारे ने चश्मा उठाकर बैग में रखा होगा और बैग को वार्डरोब में टांग दिया होगा ।"
"काहे को ? हत्यारे को ऐसी जहमत उठाने की क्या जरूरत पड़ी थी । वह चश्मा लाश के पास ही गिरा पड़ा छोड़ जाता तो उसे क्या फर्क पड़ता था ?"
"लेकिन चश्मा उठाया तो गया था ?”
"यकीनन उठाया गया था और वहां से उठाया गया था, से जहां कि वास्तव में हत्या हुई थी । जब लाश को यहां बैडडरूम में शिफ्ट किया गया था और यह जाहिर करने की कोशिश की गई थी कि हत्या यहां हुई थी तो चश्मा कहीं और पड़ा पाया जाना मुनासिब न लगता। यानी कि हत्यारे को असली मौकाए-वारदात से चश्मा उठाना तो सूझा, लेकिन यह न सूझा कि इतनी कमजोर निगाह वाली शांता का चश्मा उससे दूर वार्डरोब में नहीं, उसके सिरहाने होना चाहिए था।"
"इससे क्या साबित होता है ?"
"इससे यह तो साबित होता ही कि हत्या कहीं और हुई थी । यह भी साबित होता है कि हत्यारा भी वो नहीं था जो कि समझा जा रहा है । कथित हत्यारे ने हत्या कहीं और की होती तो पलंग पर जहां कि लाश पड़ी पायी गयी है तो उसे चश्मे में कोई दिलचस्पी न होती । वह तो अपना काम करता और चलता बनता । चश्मे की यूं सम्मान जाहिर करती है कि हत्यारा घर का ही कोई आदमी है । उस आदमी ने हत्या यहां की होती तो चश्मा यहीं कहीं गिरता जिसे कि उसने एक स्वभाविक क्रिया के तौर पर उठाकर पलंग के आसपास कहीं रख दिया होता । लेकिन चश्मा क्योंकि कहीं और से, असली घटनास्थल से, उठाकर बैग में रखा गया था और बैग का रखने का उचित स्थान क्योंकि वार्डरोब था, इसलिए चश्मा भी बैग के साथ वार्डरोब में पहुंच गया। बैग का उचित स्थान वार्डरोब है । अब यह तो घर के ही आदमी को मालूम हो सकता है ।"
"घर का आदमी तो एक ही है ।" - अमीठिया बोला और उसकी नजर डॉक्टर की ओर घूम गई ।
"एक बात और भी है" - मैं धीरे से बोला - "जो यह सिद्ध करती है कि हत्या यहाँ बैडरूम में नहीं हुई है ।”
"वो क्या ?" - अमीठिया ने डॉक्टर पर से निगाह हटाकर मेरी तरफ देखा ।
मैंने फर्म पर पलंग के पास रखे जनाना चप्पलों के जोड़े की तरफ संकेत किया ।
"मामूली चप्पलें हैं, जो औरतें घर में पहनती हैं । " अमीठिया बोला ।
“चप्पलों में कुछ नहीं है । इनके फर्श पर पड़ी होने के तरीके पर गौर करो ।"
"क्या गौर करू ?"
"इनके पंजों का रुख पलंग की तरफ है । "
"तो क्या हुआ ?"
"जब कोई सोने के लिए पलंग पर पहुंचता है और चप्पलें उतारकर बिस्तर के हवाले होता है तो चप्पलों के पंजों का रुख पलंग से परे की तरफ होता है। लेकिन अगर कोई और आदमी पलंग पर मौजूद शख्स की चप्पलें उठा कर पलंग के पास रखने जाता है तो वह एक स्वभाविक क्रिया के तौर पर चप्पलें पलंग के पास इस प्रकार रखता है कि उनके पंजों का रुख पलंग की तरफ होता है । चप्पलें हाथ में उठती ही इसी प्रकार हैं। चाहो तो उठाकर देख लो ।”
अमीठिया ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की, लेकिन उसके चेहरे पर सहमति के भाव स्पष्ट थे ।
"यह बात साफ जाहिर करती है कि शांता खुद चप्पलें उतारकर पलंग पर नहीं लेटी थी । बल्कि चप्पलें बाद में वहां पहुंचायी गयी थीं । इंस्पेक्टर साहब, जैसे चप्पलें किसी को भी किसी अन्य आदमी द्वारा कत्ल के बाद में यहां पहुंचाया गया था।"
"लेकिन हत्यारे को हत्या कहीं और करके लाश यहां डालने की क्या जरूरत थी ?"
“उस हत्यारे को जरूरत नहीं थी जिसे कि हत्यारा समझा जाने की कोशिश की गयी दिखाई दे रही है । लेकिन उसे थी जो कि वास्तव में हत्यारा था । वक्ती जुनून के हवाले होकर जरुर हत्यारा ऐसी जगह हत्या आकर बैठा था, जहां से लाश बरामद होने पर वह यह दावा न कर पाता कि हत्या किसी और ने की थी ।"
अमीठिया फिर डॉक्टर की तरफ देखने लगा ।
“राजधानी में अभी हाल ही में ऐसा एक केस होकर हटा है । उसमें भी एक डॉक्टर एक गैर-औरत की मुहब्बत में गिरफ्तार था और इस वजह से अपनी अधेड़ बीवी से बेजार था । लगता है यहां इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है । "
"यहां कोई गैर औरत तो दिखाई नहीं दे रही ।"
"अभी तुमने देखने की कोशिश कहां की है । जब कोशिश करोगे तो दिखाई दे जाएगी ।"
कोशिश की गई और किरण के बारे में पता चल गया ।
पुलिस ने तत्काल किरण को मैटिरियल विटनेस के तौर पर हिरासत में ले लिया।
उससे सख्ती से पूछताछ की गयी तो उसने घबराकर बता दिया कि डॉक्टर वर्मा उससे मुहब्बत करने लगा था । लेकिन उसने डॉक्टर को कह दिया था कि उसे हासिल करने का एक ही तरीका है - शादी। शादी वह कर नहीं सकता था क्योंकि वह पहले से शादीशुदा था और तलाक सम्भव नहीं दिखाई दे रहा था । किरण से ही पुलिस को यह मालूम हुआ कि डॉक्टर किरण से और मौहलत भी मांगता जाता था और तलाक के लिए अर्जी भी नहीं देता था ।
इसका मतलब साफ था कि डॉक्टर पत्नी की हत्या करके उससे पीछा छुड़ाने का इरादा किए हुए था ।
नतीजतन, डॉक्टर वर्मा को अपनी पत्नी की हत्या के संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया ।
यूं तो डॉक्टर के खिलाफ निर्विवाद रूप से कुछ सिद्ध कर पाना आसान नहीं था । उसके खिलाफ कोई अकाट्य सबूत नहीं था । मकतूला के चश्मे और चप्पलों वाली बात केवल सरकमस्टांशल एविडेंस (परिस्थतिजनक साक्ष्य) का दर्जा रखती थी । डॉक्टर को सजा दिलाने के लिए लम्बी-गहरी तफ्तीश और ढेरों सरगर्मी की जरूरत थी ।
लेकिन पुलिस की मुश्किल खुद डॉक्टर ने आसान कर दी।
उसने खुद अपना अपराध स्वीकार कर लिया ।
उसने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया, बल्कि अपनी बीवी की हत्या के अपने पहले पांच असफल प्रयत्नों के बारे में भी पुलिस को बताया ।
डॉक्टर वर्मा आज भी तिहाड़ जेल में है जहां कि उसका सैल ही उसका क्लीनिक बना हुआ है और जहां वह कानून के दुश्मनों और कानून के रखवालों का समान रूप से इलाज करता है। उसकी विनम्रता व सेवाभाव को देखकर कोई भी यह विश्वास करने को तैयार नहीं होता कि वह शख्स अपनी ही पत्नी के कत्ल का अपराधी है ।
समाप्त
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