वहां से वे दोनों इंडिया गेट पहुंचे। कुछ देर वे वहां बैठे रहे और हल्की-फुल्की बातें करते रहे । उसके बाद वे वहां से भी रवाना हो गए। कुछ देर वह नगर की विभिन्न सड़कों पर कार चलाता रहा । फिर उसने घड़ी देखी । साढ़े दस बजे थे । गाड़ी रेलवे क्रासिंग पर ग्यारह-दस पर पहुंचती थी ।


"एक-एक कॉफी पीते हैं ।" - वह बोला ।


शांता ने खुशी से हां कर दी ।


वे कनाट प्लेस में 'स्टेंडर्ड' में जा बैठे। कॉफी आई तो डॉक्टर ने बड़ी चतुराई से शांता के कप में नींद की गोली डाल दी | शांता बिना किसी प्रकार की संदेह किए काफी पी गई ।


जब वे रेस्टोरेंट से बाहर निकले तो शांता कह रही थी कि उसे बड़ी जोर की नींद आ रही है। डॉक्टर ने उसे आश्वासन दिया कि वे सीधे घर चल रहे हैं ।


इस बार कार स्टार्ट होते ही शांता ने सीट की पीठ के साथ सिर टिका दिया और आंखें बंद कर ली । कार के रफ्तार पकड़ने तक वह खर्राटे भर रही थी । डॉक्टर खुश था । अब उसने कार को क्रासिंग पर ले जाकर खड़ा करना था और शांता को स्टेयरिंग के पीछे सरका देना था। उसके बाद वह वापस अपने ऑफिस पहुंच जाता, खिड़की के रास्ते से ऑफिस में दाखिल होता और पहले से ही तैयार की हुई इनकम टेक्स रिटर्न की निकालकर अपने साथ रख लेता । वह शांता का आधी रात तक इंतजार करता और फिर चौकीदार के सामने चिन्ता व्यक्त करते हुए पूछताछ करनी आरम्भ कर देता ।


डॉक्टर उजाड़ सड़क पर रेलवे क्रासिंग से अभी आधा मील दूर ही था कि कार फर-फर करने लगी और फिर रुक गई।


डॉक्टर का दिमाग भन्ना गया ।


इतना कुछ सोचा, एक मामूली बात नहीं सोची। पेट्रोल !


कार में पेट्रोल खत्म हो गया था ।


तकदीर की मार । वह स्कीम भी फेल हो गई ।


फिर उसके परेशान दिमाग में नई तरकीब पनपी ।


बिजली ! बिजली का झटका !


यही एक तरकीब बाकी रह गई थी जो उसने अपनी बीवी पर नहीं आजमाई थी ।


एक रोज उसने शांता को सलाह दी कि अगर वह सोने से पहले गर्म पानी से नहाया करे तो इससे उसके शरीर की वह टूटन और दर्द दूर हो जायेगी जिसकी वह अक्सर शिकायत किया करती है । एक तो वह उसका पति था, ऊपर से प्रसिद्ध डॉक्टर । भला वह उसकी बात क्यों न मानती ? विशेष रूप से तब जबकि संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं थी । पतिभक्त उस औरत को क्या मालूम था कि उसका पति परमेश्वर' उसकी हत्या के चार प्रयत्न पहले ही कर चुका है ।


उस रात सोने से पहले उसने अपनी पत्नी के लिए बाथरूम में गर्म पानी भरा और बाथरूम के पृष्ठ भाग में दीवार के साथ बने एक छोटे से प्लेटफार्म पर एक बिजली का हीटर भी रख दिया ताकि बाथरूम का वातावरण गर्म हो जाये और शांता को कतई ठंड न लगे । योजना यह थी कि शांता जिस वक्त पानी में नहा रही होगी उस वक्त डॉक्टर बाहर की दीवार पर तस्वीर टांगने के लिए एक कील ठोकने लगेगा । दीवार पर जोर-जोर से पड़ती हथौड़ी से दीवार में पैदा होने वाली धमक से उसी दीवार के दूसरी ओर बाथरूम में छोटे-से प्लेटफार्म पर रखा हीटर वहां से सरककर पानी में जा गिरेगा और शांता बिजली का झटका खाकर मर जायेगी । दरवाजा भीतर से बन्द होगा। कोई सपने में भी नहीं सोच सकेगा कि शांता की हत्या की गई थी ।


शांता के दरवाजा बंद कर लेने के बाद डॉक्टर कान लगाये सुनने लगा । जब उसे अपनी पत्नी के भारी-भरकम शरीर के पानी में दाखिल हो जाने की आवाज आ गई तो वह कील पर हथौड़े से प्रहार करने लगा। पंद्रह-बीस प्रहार कर चुकने के बाद वह ठिठका और कान लगाकर सुनने जगा।


"शांता !" - उसने आवाज लगाई - "पानी ज्यादा गर्म तो नहीं ।”


जवाब की कोई उम्मीद नहीं थी, लेकिन भीतर से शांता की मीठी आवाज आई- "ठीक है जी ।"


अब क्या गड़बड़ हो गई ? - वह अपने-आपको कोसता हुआ सोचने लगा ।


फिर सन्नाटा-सा छा गया ।


डॉक्टर को उम्मीद बंधी ।


"हो गया काम ।"


“शांता ।" - उसने आवाज लगाई ।


"हां, जी ।"


हे भगवान ! यह मुसीबत खत्म भी होगी !


डॉक्टर अपने बाल नोचने लगा ।


रही थी । अब आवाज बाथरूम के दूसरे कोने से आती मालूम हो


थोड़ी देर बाद जब शांता बाहर निकली तो डॉक्टर सचमुच तस्वीरें टांग रहा था ।


"हीटर कैसा रहा ?" - डॉक्टर ने पूछा ।


"बढ़िया" - वह बोली- "लेकिन प्लेटफार्म पर रखा होने की वजह से मुझे बहुत गर्मी लगने लगी थी, इसलिए मैं उसे उठाकर फर्श पर रख दिया था । "


लानत ! लानत ! डॉक्टर कुढ़कर रह गया ।


अगले दिन उसे नया झटका लगा । किरण ने अपना इस्तीफा उसके सामने रख दिया ।


"मुझे आपकी अपनी बीवी से तलाक लेने की नीयत नहीं मालूम होती" - वह बोली- "आप, लगता है, मुझे बरगलाकर खराब करना चाहते हैं । "


डॉक्टर ने गिड़गिड़ाते हुए उससे कुछ और मौहलत मांगी और इस बार एक ऐसी तरकीब सोची जो उसकी निगाहें में किसी भी सूरत में फेल नहीं हो सकती थी । ।


उसने फैसला कर लिया कि अपनी बीवी का कत्ल करने की यह उसकी आखिरी कोशिश होगी । अगर वह कोशिश भी नाकामयाब रही तो वह किरण का ख्याल अपने मन से निकाल देगा - जो कि असम्भव था - और या खुद जान दे देगा ।


एक रोज उसने एक पब्लिक टेलीफोन से अपनी क्लीनिक के नम्बर पर टेलीफोन किया । दूसरी ओर से किरण की आवाज आने पर वह आवाज बदलकर बड़े क्रूर स्वर में बोला - "डॉक्टर वर्मा को बुलाओ।"


"डॉक्टर वर्मा इस वक्त क्लीनिक में नहीं हैं" - किरण की आवाज आई - "कोई मैसेज हो तो दे दीजिये । "


"हां, सुन लो मैसेज । उस हरामजादे को बता देना कि उसकी जिन्दगी के दिन पूरे हो गये हैं। "


जब वह क्लीनिक पहुंचा तो किरण ने भयभीत होकर उसे वह मैसेज दिया ।


डॉक्टर ने तुरंत पुलिस में रिपोर्ट कर दी। पुलिस का एक अधिकारी उससे पूछताछ करने क्लीनिक में आया, लेकिन वह कोरा ही वापस चला गया । डॉक्टर को नहीं मालूम था कि फोन करने वाला व्यक्ति कौन था और उसने ऐसा क्यों कहा था ?


दो-तीन दिन बाद एक रात को उसने घर पर शांता को फोन किया और आवाज बदलकर वही संदेश उसे भी सुना दिया । शांता भी डर गई ।


पुलिस को फिर रिपोर्ट की गई। लेकिन इस बार भी नतीजा सिफर निकला । तफ्तीश आगे न बढ़ सकी । कोई सूत्र ही उपलब्ध नहीं था ।


फिर डॉक्टर ने अखबार में से शब्द काट-काटकर अपने-आपको भेजने के लिए एक धमकी भरा पत्र तैयार किया । वह पत्र उसने डाक से अपने-आपको भेज दिया और प्राप्त होने पर उसे पुलिस को सौंप दिया ।


अब कत्ल की काफी बुनियाद तैयार हो चुकी थी।


फिर वह एक दिन किसी काम से मेरठ गया । वहां से उसने चोरी-छिपे एक खतरनाक बम खरीदा । वापस आकर वह बम उसने अपनी अलमारी में छुपाकर रख दिया ।


एक रात शांता ने उससे कहा कि वह कल सुबह बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद अपनी बहन के यहां जाना चाहती है। डॉक्टर ने उसे कह दिया वह गाड़ी ले जाये । कल वह खुद टैक्सी से चला जायेगा ।


उसी रात । रात को दो बजे वह चुपचाप उठा । उसने गैराज में जाकर कार का हुड उठाया और बम को इस प्रकार इग्नीशन के साथ सम्बद्ध कर दिया कि इग्नीशन के ऑन होते ही बम फट पड़े ।


अब शांता का खात्मा निश्चित था। बाद में तफ्तीश होने पर यही समझा जाता कि हत्यारा मारना तो डॉक्टर को चाहता था, लेकिन दुर्भाग्यवश शिकार हो गई बेचारी शांता ।


अगले दिन बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद डॉक्टर अभी घर पर ही था कि शांता बहन के घर जाने को तैयार हो गई । वह गैरेज से कार निकालने चली गई ।


डॉक्टर कलेजा थामे खिड़की के पास पहुंचा। उसने शांता को गैरेज का दरवाजा खोलते और फिर कार में बैठते देखा ।


शांता ने इग्नीशन में चाबी लगाई ।


डॉक्टर ने आंखें बन्द कर लीं ।


अभी एक जोर का धमाका होगा और शांता समेत कार के परखच्चे उड़ जायेंगे । वह आंख बंद कर इन्तजार करने लगा ।


लेकिन धमाके के स्थान पर उसके कानों में इंजन के चालू होने की आवाज पड़ी ।


सत्यानाश !


उसने आंखें खोलीं और गैरेज की ओर देखा ।


शांता कार को गियर में डाल रही थी ।


बम फटा ही नहीं था ।


पता नहीं बम खराब था या बेचने वाले ने उसे जान-बूझकर ठगा था या उसे बम को ठीक से इग्नीशन से जोड़ना नहीं आया था ।


उस क्षण डॉक्टर हार के अहसास से पागल हो गया ।


"शांता !" - उसने आवाज लगायी।


शांता ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा । डॉक्टर ने उसे रुकने का संकेत किया ।


शांता ने इंजन बंद कर दिया । उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरे ।


डॉक्टर घर से बाहर निकला और गैरेज की ओर लपका


"क्या बात है ?" - वह समीप पहुंचा तो शांता ने पूछा ।


"बताता हूं।" - डॉक्टर बोला ।


वह कार का दरवाजा खोलकर उसकी बगल में बैठ गया । 


फिर एकाएक वह शेर की तरह शांता पर झपटा । उसने अपने दोनों हाथों से शांता की गरदन दबोच ली । शांता ने चीखने की कोशिश की, लेकिन आवाज गले में ही घुटकर रह गई । वह सिर पटकने लगी । और हाथ-पांव झटकने लगी । उसका चश्मा उसकी नाक से छिटककर डैश बोर्ड से टकराया और नीचे जा गिरा |


डॉक्टर के अधेड़ शरीर में पता नहीं कहां से इतना बल आ गया कि उसने एक शैतानी शिकंजे की तरह शांता की गरदन जब तक जकड़े रखी जब तक कि उसके प्राण नहीं निकल गये ।


शांता के मर जाने के बाद उसे महूसस हुआ कि उसने क्या कर डाला है । लेकिन वह घबराया नहीं । अभी भी यह जाहिर किया जा सकता था कि जो आदमी डॉक्टर को धमकियां दे रहा था, डॉक्टर तक पहुंच न होती पाकर उसने डॉक्टर की पत्नी की गला घोंटकर हत्या कर दी थी।


उसने अपनी उखड़ी सांसों को व्यवस्थित किया । शांता का चश्मा उठाया और उसे उसके बैग में डाल दिया ।


फिर वह कार से बाहर निकला। उसने गैराज का दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया। उसने कार का हुड उठाकर भीतर से बम और उससे सम्बद्ध तारें निकाल लीं और उन्हें गैराज में एक स्थान पर छुपा दिया ।


फिर उसने शांता का बैग अपने कंधे पर लटकाया और उसके भारी-भरकम शरीर को किसी प्रकार अपने कंधे पर लादा । राम-राम करता हुआ वह बैडरूम में पहुंचा । उसने लाश को पलंग पर डाल दिया और पलंग की चादर वगैरह को इस प्रकार अव्यवस्थित कर दिया जैसे हत्यारे की और शान्त की मुठभेड़ वहीं हुई हो ।


फिर उसने शांता की साड़ी उतारकर उसे वह गाउन पहना दिया जो वह हमेशा पहना करती थी ।


बैग उसने वार्डरोब की उस खूंटी पर टांग दिया जहां वह हमेशा टांगा करती थी ।


फिर उसे शांता के पैरों में पड़ी सैंडिलों का ख्याल आया


हे भगवान ! भारी गलती होते-होते बची थी ।


उसने सैंडिलें उतारी और उन्हें पिछले बरामदे में पड़े जूतों के रैक में रख दिया। वहां से उसने शांता की घर पर पहनने वाली चप्पलें उठाई और उन्हें लाकर पलंग के समीप रख दिया ।


जो स्टेज उसने सैट की थी, वह उससे सन्तुष्ट था । लगता था कि हत्यारा पलंग पर सोई पड़ी शांता पर झपट पड़ा था । अपना बदला उसने पति के स्थान पर पत्नी से चुकाया था ।


उसके बाद डॉक्टर ने बड़े इत्मीनान से गैराज से कार निकाली और अपने क्लीनिक पहुंच गया ।


सूचना दोपहर बाद पुलिस ने उसे क्लीनिक में फोन करके दी कि किसी ने उसकी पत्नी की हत्या कर दी थी ।


इस केस का कार्यभार इंस्पेक्टर अमीठिया के पास था । वह मुझसे परिचित या । घटनास्थल पर अमीठिया मुझे भी साथ ले गया । उसने मुझसे यह वादा ले लिया था कि मैं चुप रहूंगा और किसी चीज को हाथ नहीं लगाऊंगा ।


लेकिन वहां पहुंचकर मैं चुप नहीं रह सका । मैं काफी देर चुप रहा । लाश देखकर चुप रहा । शोकग्रस्त पति को देखकर चुप रहा । रोते हुए बच्चों को देखकर चुप रहा । अमीठिया और पुलिस फोटोग्राफर को काम करते देखकर चुप रहा । लेकिन अन्त में बोल ही पड़ा ।


"जरा सुनो।" - मैं अपने दोस्त के कान में बोला ।


अमीठिया ने प्रश्नसूचक नेत्रों से मेरी ओर देखा ।