"यह लो दूध ।" - वह बोला - "तुम्हारा दवा खाने का वक्त हो गया है । दवा खा लो और ऊपर से दूध पी लो ।”
शांता ने डॉक्टर घोष की दी दवा की एक खुराक एक कप में डालकर पी और ऊपर से दूध पी लिया ।
मार्फीन की आठ गोलियां शांता के पेट में पहुंच गई थीं
"मैं क्लीनिक जा रहा हूं।" - वह बोला- "तुम आराम करो।"
शांता ने सहमति सूचक ढंग से सिर हिलाया और बिस्तर पर लेट गई । उसने आंखें बंद कर ली ।
डॉक्टर कमरे से बाहर निकल गया, लेकिन वह इमारत से बाहर नहीं गया । वह दस मिनट सामने बरामदे में खड़ा इंतजार करता रहा और फिर दबे पांव वापस लौटा ।
शांता खरटि भर रही थी ।
उसने उसे नाम लेकर पुकारा, लेकिन उसके क भी नहीं रेंगी । संतुष्टिपूर्ण ढंग से सिर हिलाते हुए डॉक्टर ने गिलास उठाया और उसे अच्छी तरह धोकर किचन में रख दिया । फिर उसने डॉक्टर घोष की दवा की दो खुराकें बाथरूम में बहा कर, बाथरूम के सिंक को खूब अच्छी तरह धो दिया।
अब बाद में जब वह मरी पाई जाती तो यही समझा जाता कि शांता अपनी लापरवाही और भुलक्कड़पन की आदत की वजह से दवा ज्यादा पी गई थी और जान से हाथ धो बैठी | डॉक्टर घोष खुद शहादत देता कि शांता को विशेष रूप से यह चेतावनी दी गई थी कि दवा ज्यादा पी जाना खरनाक हो सकता था । किसी को कोई शक होने का सवाल ही नहीं पैदा होता था ।
उसके बाद वह कोई एक घंटा और घर में ठहरा । फिर जब शांता की सांस भारी होने लगी और नब्ज मंद पड़ती महसूस होने लगी तो वह मन-ही-मन मुस्कराता हुआ अपने क्लीनिक को रवाना हो गया ।
बाकी का सारा दिन डॉक्टर वर्मा अपने क्लीनिक में बैठा 'सुखद समाचार' के आगमन की प्रतीक्षा में बेचैन होता रहा । उसे आशा थी कि स्कूल से वापस आकर बच्चे या दोपहर को खाना पकाने आने वाली नौकरानी या कोई अड़ोसी-पड़ोसी शांता को मरा पाएगा और उसे तुरंत क्लीनिक में फोन करके खबर देगा ।
लेकिन फोन नहीं आया ।
साधारणतया दो बजे क्लीनिक बंद होता था और सवा दो तक वह घर के लिए रवाना हो जाता था । उस रोज वह चार बजे तक बैठा रहा । अंत में हारकर वह घर पहुंचा ।
अपना बड़ा लड़का उसे सामने कम्पाउंड में खेलता दिखाई दिया ।
डॉक्टर का माथा ठनका ।
"तुम्हारी मां कैसी है ?" - उसने लड़के से सवाल किया
"ठीक है।" - लड़का बोला- सोई पड़ी है ।"
डॉक्टर अपनी बीवी के पास पहुंचा ।
वह सोई ही पड़ी थी । उसकी सांस एकदम नियमित रूप से चल रही थी ।
डॉक्टर ने अपनी तकदीर को हजार-हजार गालियां दीं
रात तक शांता की सांस और नब्ज एकदम नॉर्मल हो गई।
अगली सुबह जाकर कहीं शांता की नींद टूटी ।
"हे भगवान !" - वह जम्हाई लेती हुई बोली- "बहुत सोई मैं ।”
“हां !" - डॉक्टर प्रत्यक्षत: मुस्कराता हुआ बोला. “अच्छा ही है । तुम्हें तो आराम की बड़ी जरूरत है । "
"मुझे ऊंघ-सी आ रही है।" - वह बोली- " बड़ी तेज दवा देते हैं डॉक्टर घोष | "
"वह तुम्हारे भले के लिए ही है, शांता ।" - डॉक्टर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता हुआ बोला- "इससे तुम जल्दी ठीक हो जाओगी ।"
क्या हाजमा पाया है इस शांता की बच्ची ने। डॉक्टर दांत पीसता हुआ मन-ही-मन बोला- कमबख्त मोर्फीन की आठ गोलियां पचा गई ।
फिर डॉक्टर ने उसेक कत्ल की तीसरी योजना बनानी आरम्भ की ।
जब उसकी नई-नई शादी हुई थी तब वह डिप्टीगंज में रहता था और अपनी बीवी के साथ सैर करने अक्सर जीतगढ़ की पहाड़ी पर चला जाता था । उसे याद था कि पहाड़ी की ढलुवां सडकों के इर्द-गिर्द गहरी खाइयां थी । वहां एक एक्सीडेंट स्टेज किया जा सकता था ।
एक शाम को उससे अपनी कार पर उस इलाके की तमाम सड़कों का चक्कर लगाया । मीनार के पास की एक सड़क पर उसे एक ऐसा स्थान दिखाई दिया जहां से कार लुढ़क जाती तो बहुत गहरे खड्ड में जाकर गिरती । वहां सड़क के साथ रेलिंग नहीं थी और सर्दियों के उन दिनों में रास्ता भी सुनसान रहता था ।
कमला नगर में शांता की एक बहन रहती थी । जिससे कभी-कभार मिलने वह खुद कार चलाती हुई उसी रास्ते से जाया करती थी। बाद में यही समझा जाता कि वह ताजी-ताजी बीमारी से उठी थी, इसलिए लापरवाही कर बैठी । ठीक से कार चला न पाई और एक्सीडेंट कर बैठी ।
एक चांदनी रात को उसने बड़े अनुरागपूर्ण स्वर में शांता से कहा - "शांता, चलो आज कहीं घूमने चलें ।”
"कहां ?" - शांता खुशी से बोली ।
"वहीं, जहां हम तब जाया करते थे, जब हमारी नई-नई शादी हुई थी ?"
"ठीक है ?"
जाने से पहले डॉक्टर ने बच्चों को यह समझा दिया कि उसकी मां अपनी बहन के घर कमला नगर जा रही है। खुद उसे क्लीनिक में थोड़ा काम है। इसलिए वह जाती बार उसे क्लीनिक में छोड़ती जाएगी और वापसी में साथ लेती आएगी । इस प्रकार उसने पहले ही यह बुनियाद तैयार कर ली कि दुर्घटना के वक्त वह घटनास्थल पर नहीं था ।
वे दोनों कार पर सवार होकर जीतगढ़ की पहाड़ी पर पहुंचे। डॉक्टर ने पूर्व निर्धारित स्थान पर कार खड़ी कर दी । उसने कार का इंजन बंद कर दिया और उसे गियर में ही लगा रहने दिया ताकि कहीं वह भी उसके भीतर बैठे-बैठे लुढ़क कर खड्ड में न जा गिरे।
कार की हैंड ब्रेक खराब थी । और इस बात की शांता को भी खबर थी ।
"मैं जरा कार के पहिए के नीचे कोई पत्थर-वत्थर लगा दूं" - वह बोला- "कहीं कार लुढ़क कर खड्ड में ही न जा गिरे
“अच्छा ।”
"तुम कार में ही बैठो।"
"अच्छा ।"
उसने कार से बाहर निकल कर दो ईटें तलाश की और उनको कार के पिछले पहियों के आगे लगा दिया। फिर वह वापस कार में आ बैठा ।
"आओ थोड़ा पैदल घूम कर आएं।" - शांता बोली ।
“चलेंगे, अभी जल्दी क्या है।" - डॉक्टर बोला और एक बदमजा जिम्मेदारी की तरह उसने शांता को अपनी बांहों में भर लिया । अनायास उसे किरन की याद हो आयी । उसे यूं लगा जैसे फूलों की डाली के स्थान पर कांटों की झांड़ी उसकी बांहों में आ गई हो । लेकिन वह अपने मन के भाव छुपाता शांता को प्यार करता रहा और उससे रस भरी बातें करता रहा । शांता उसकी छाती पर सिर टिकाए आंखें बंद किए बैठी रही ।
डॉक्टर ने चुपचाप कार को गियर में से निकाल दिया । डॉक्टर ने क्या किया था, इसकी खबर शांता को नहीं लगी।
थोड़ी देर बाद डॉक्टर शांता से अलग हो गया ।
"जरा देखूं, पहिए के नीचे लगी ईंटें सरक तो नहीं गई ।" - वह बोला और कार से बाहर निकल आया ।
शांता ने बड़े आसक्तिभरे भाव से उसकी ओर देखा और सहमतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया । वह आंखें बंद किए किन्हीं रंगीन सपनों में खोई हुई थी ।
यही तो डॉक्टर चाहता था ।
वह कार के पृष्ठ भाग में पहुंचा। उसने नीचे झुककर कार के बांए पहिए के नीचे लगी ईट बाहर खींच ली । फिर वह दायें पहिए की ओर बढ़ा । दूसरी ईट निकालते ही कार नीचे को लुढ़कने लगती और शांता के सम्भल पाने से पहले खड्ड में गिर पड़ी होती ।
उसने दूसरी ईट भी निकाल दी और कार को एक धक्का दिया ।
"क्या कर रहे हो ?" शांता ने आवाज लगाई ।
"कुछ नहीं" - डॉक्टर बोला- "जरा पहियों को देख रहा हूं।"
"मेरे पास आ जाओ । मुझे डर लग रहा है ।"
"अरे डरने की क्या बात है ।"
पहिए के नीचे से दोनों ईटे हट चुकी थीं, वह कार को एक धक्का भी दे चुका था, लेकिन कार अपने स्थान से हिली भी नहीं थी ।
क्या माजरा है ? डॉक्टर खीज उठा ।
उसने कार पर दोनों हाथ टिकाकर पूरी शक्ति से धक्का दिया ।
पर कार टस से मस न हुई, जबकि उसे तो बिना धक्के के ही लुढ़कने लगना था ।
"क्या कर रहे हो ?" - शांता ने फिर पूछा ।
डॉक्टर ने उत्तर नहीं दिया। कहीं कार के पहियों के आगे कोई और रुकावट तो नहीं है ? उसने नीचे झुककर देखा । नहीं, कोई रुकावट नहीं थी ।
तभी उसके कानों में समीप आती एक कार की आवाज पड़ी । हैरान-परेशान डॉक्टर ने घूमकर सड़क की ओर देखा |
उसे सामने से एक कार आती दिखाई दी। कुछ ही क्षणों में वह कार उनसे कोई बीस गज पर आकर रुक गई । डॉक्टर को रुकने वाली कार के भीतर एक युवा जोड़े की उपस्थिति का आभास हुआ । शायद वे एकांत में मौज करने आए थे।
हताश डॉक्टर कार में आ बैठा ।
“आप कार को गियर में लगाना भूल गए थे" - शांता ने उसे बताया- "इसलिए गियर मैंने लगा दिया था ।"
"अच्छा किया तुमने" - डॉक्टर खोखले स्वर में बोला "वरना कार खड्ड में लुढ़क गई होती ।"
उसने दूसरी कार में मौजूद युवा जोड़े की तरफ देखा । वे दोनों एक-दूसरे की बांहों में थे । प्रत्यक्षत: उनका जल्दी वहां से टलने का इरादा नहीं मालूम होता था ।
डॉक्टर ने एक आह भरी । कार स्टार्ट की और घर आ गया । यह योजना भी फेल हो गयी थी ।
तब तक उसकी मानसिक दशा विक्षिप्तों जैसी हो गई थी । उसका जी चाहने लगा था कि वह बिना किसी तकल्लुफ के कभी भी, कहीं भी शांता का गला घोंट दे। पर पकड़े जाने का डर भी था ।
तब तक किरण भी उतावली होने लगी थी । वह डॉक्टर पर दबाव डालने लगी कि वह जल्दी-से-जल्दी अपनी बीवी से तलाक हासिल करने के लिए अदालत में अर्जी दे । थोड़ी बहुत चूमा चाटी से वह एतराज नहीं करती थी लेकिन इससे आगे वह डॉक्टर को नहीं बढ़ने देती थी। डॉक्टर जबरदस्ती इस डर से नहीं करता था कि कहीं वह नौकरी छोड़कर हमेशा के लिए ही न चली जाए । लेकिन लगता उसे ऐसा था जैसे किरन के शरीर को हासिल करना उसकी जिन्दगी का आखिरी मकसद था । इसलिए अब वह भी उतावला हो उठा कि उसका अपनी बीवी से फौरन पीछा छूटे ।
अगली योजना जो डॉक्टर ने तैयार की, वह उसकी निगाह में फुलप्रूफ थी । उसे एक ऐसा रेलवे क्रासिंग मालूम था जिस पर फाटक नहीं लगा हुआ था । उसने शांता का वहां कार एक्सीडेंट करने का फैसला किया ।
एक रोज उसने डिनर के बाद अपनी पत्नी की गैरहाजिरी में बच्चों को वही पुरानी कहानी सुनाई कि वह क्लीनिक जा रहा है और शांता अपनी बहन के घर । वापसी में शांता उसे क्लीनिक से साथ लाने वाली है ।
संयोगवश वह रेलवे क्रासिंग भी शांता की बहन के घर के रास्ते में आता था । इसीलिए एक्सीडेंट के बाद किसी को हैरानी न होती कि शांता वहां क्या कर रही थी ।
शांता को उसने कहा कि वे सैर करने जा रहे हैं। दोनों कार में सवार हुए । वह कार को अपने क्लीनिक के समीप ले आया ।
"तुम कार में ही बैठो” - वह बोला - "मुझे क्लीनिक में थोड़ा काम है, मैं अभी आता हूं।" - और वह कार से निकलकर क्लीनिक की ओर बढ़ गया ।
जिस इमारत में उसका क्लीनिक था उसमें और भी ऑफिस थे और रात को रखवाली के लिए एक चौकीदार वहां रहता था । डॉक्टर ने जान-बूझकर चौकीदार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और बोला - "आज मैंने काफी रात तक काम करना है। मुझे इनकम टैक्स की रिटर्न तैयार करनी है। तुम किसी को मेरे क्लीनिक में न आने देना । कहीं ऐसा न हो कि बत्ती जलती देखकर मेरा कोई पेशेन्ट ही चला आए । और मुझे डिस्टर्ब करे ।"
"बहुत अच्छा, साहब | "
"साढ़े ग्यारह बजे के करीब मेरी पत्नी मुझे लेने आएगी, कहीं उसे भी भीतर आने से मत रोक देना ।"
"नहीं साहब" - चौकीदार दांत निकालता हुआ बोला - "मैं बीबी जी को खूब पहचानता हूं ।”
डॉक्टर अपने क्लीनिक में आ गया। उसने सारी बत्तियां जला दीं और दरवाजा भीतर से बंद कर लिया । फिर उसने क्लीनिक के पिछवाड़े की एक खिड़की खोली । उसका क्लीनिक ग्राउंड फ्लोर पर था और वह खिड़की पिछवाड़े की एक संकरी-सी गली में खुलती थी। डॉक्टर उस खिड़की में से चुपचाप बाहर कूद गया और अपनी पत्नी के पास पहुंच गया ।
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