बड़ा सुहावना मौसम था । अभी-अभी बारिश होकर हटी थी और वातावरण में बड़ी सुखद- सी ठंडक फैली हुई थी । चांदनी चौक में स्थित डॉक्टर वर्मा का क्लीनिक बंद हो चुका था । आखिरी रोगी को गए हुए पन्द्रह मिनट से ऊपर हो गए थे। डॉक्टर वर्मा अपने ऑफिस में बैठा था । उसके सामने उसकी खूबसूरत, सजी-धजी, रिसैप्शनिस्ट किरण बैठी थी । डॉक्टर वर्मा मन-ही-मन उसकी तुलना अपनी बीवी, अपने तीन बच्चों की मां, शांता से कर रहा था। किरण अगर हरी मिर्च जैसी तीखी थी, तो शांता आलुओं के बोरी जैसी फुसफुस । हे भगवान ! उसके जमाने में महिलाओं में ऐसी सज-धज, ऐसा रख-रखाव, ऐसा आकर्षण क्यों नहीं होता था । उसके जमाने में महिलाओं की यह कोशिश होती थी कि उनके जिस्म का कोई भी अंग किसी मर्द को दिखाई न दे जाए। कोई उभार, उभार न लगे तो आज की लड़कियां मर्यादा और शालीनता की हद में रहकर जितना जिस्म दिखाया जा सकता है, दिखाती हैं । मर्द की तारीफी निगाह अपने शारीरिक सौन्दर्य पर पड़ती जानकर सकुचाती-शर्माती नहीं हैं, बल्कि खुश होती हैं ।
यह किरण ही है । कैसा झीना ब्लाउज पहनती है । नीचे पहनी काले रंग की अंगिया साफ दिखाई दे रही थी और दिखाई दे रहा था कि उरोज अंगिया में समा नहीं रहे थे । किरण ने एकाध बार साड़ी के पल्ले से उन्हें ढकने की कोशिश की थी, लेकिन पल्ला वहां दस सैकेंड भी नहीं टिका था और किरण को इसकी कोई खास परवाह भी नहीं मालूम होती ।
डॉक्टर वर्मा ऐसी ललचाई आंखों से यह सब देख रहा था कि बस लार टपकने की ही कसर रह गई थी ।
तभी मेज के नीचे उसके घुटने किरण के घुटनों से टकराये, डॉक्टर वर्मा के सारे शरीर में सनसनी दौड़ गई।
किरण ने बनावटी मासूमियत से सिर उठाकर डॉक्टर की ओर देखा ।
डॉक्टर ने खंखार कर गला साफ किया और बोला "एक बात बताओ, किरण । " -
"पूछिए ।" - किरण इठलाकर बोली ।
"तुम्हारा कोई ब्वाय फ्रैंड है ?"
"नहीं।"
"तुम कभी किसी लड़के के साथ घूमी-फिरी नहीं ?"
“थोड़ा बहुत ।” - वह शर्माने का अभिनय करती हुई बोली - "कभी एकाध बार पिक्चर - विक्चर देखी होगी ।"
"बस ?"
"बस ।"
“ और कुछ नहीं ?"
"नहीं ।”
" जी तो चाहता ही होगा ? तुम नौजवान हो, आधुनिक हो, आजाद ख्याल हो । नहीं ? "
"कैसी बातें करते हैं आप ?" - किरण के गालों पर लाली दौड़ गई ।
उस रात डायनिंग टेबल पर जब डॉक्टर का अपनी पत्नी शांता से आमना-सामना हुआ तो उसका मन वितृष्णा से भर गया । कितनी बदसूरत, बदमजा औरत थी शांता । तीन बच्चे पैदा कर चुकने के बाद वह इतनी बेडौल हो चुकी थी कि छाती, कमर और नितम्ब तीनों का नाप एक हो गया था । चलती थी तो ड्रम लुढ़कता-सा मालूम होता था । बाल पकने लगे थे और आंखें इतनी कमजोर हो गई थीं कि वह माइनस टेन का चश्मा लगाती थी । चश्मे के बिना एक कदम भी चलने पर वह ठोकर खा जाती थी । किरण और उसका क्या मुकाबला था । किरण अगर छप्पन व्यंजनों से सजी थाली थी, तो शांता पिछले हफ्ते के खाने जैसी बासी, बदमजा ।
उस रोज डॉक्टर ठीक से खाना भी न खा सका । पत्नी की शिकायत-भरी निगाहों की परवाह किए बिना वह बीच में ही उठ गया ।
अगले दिन क्लीनिक बंद होने के समय से पहले डॉक्टर ने अपने मन की बात किरण को बता ही दी ।
"किरण, मैं तुमसे मुहब्बत करता हूं।"
किरण हैरानी से डॉक्टर का मुंह देखने लगी। उसके चेहरे पर हैरानी थी, पता नहीं असली थी या बनावटी, लेकिन थी।
"मैं आपका मतलब नहीं समझी ।" वह पलक झपकाती हुई बोली ।
“इतनी नादान मत बनो, किरण ।" - डॉक्टर कातर स्वर में बोला- "मैं तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ्तार हूं और तब से गिरफ्तार हूं जब से तुमने पहली बार मेरे क्लीनिक में कदम रखा था ।"
"लेकिन आप तो विवाहित हैं । बाल-बच्चेदार है ।"
“जानता हूं । लेकिन मैं अपने दिल के हाथों मजबूर हूं । मैं फिर भी तुमसे मुहब्बत करता हूं।"
"लेकिन..." - किरण अटकी ।
"किरण, क्या विवाहित आदमी के सीने में दिल नहीं होता ?"
"वह तो ठीक है । लेकिन यह रिश्ता कैसे सम्भव है ?"
“तुम चाहो तो सब कुछ सम्भव हो सकता है ।”
"मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या कहूं ।"
"अच्छा, अभी कुछ मत कहो । अभी घर जाओ । जो मैंने कहा है उस पर अच्छी तरह सोच-विचार कर लो। हम इस बारे में कल फिर बात करेंगे।"
किरण चली गई ।
अगले दिन वह आई ही नहीं ।
डॉक्टर का दिल डूबने लगा। लड़की खफा हो गई मालूम होती थी और अब शायद वह उसकी सूरत से भी बेजार थी। डॉक्टर एकदम निराश-सा हो गया ।
लेकिन उससे अगले दिन फिर किरण आई तो डॉक्टर की जान में जान आ गई । दिन भर दोनों रोगियों में व्यस्त रहे । फिर क्लीनिक खाली हो जाने के बाद और आज क्लीनिक का दरवाजा भीतर से बंद कर लेने का नया काम करने के बाद दोनों का आमना-सामना हुआ । डॉक्टर के हाथ अपने आप ही उसकी तरफ फैल गए। किरण यंत्र चालित सी उसकी बांहों में आ गई। डॉक्टर को ऐसा अहसास हुआ जैसे उसको अंगारा छू गया हो । उसने आंखें बंद कर लीं और अपने प्यासे होंठ उसके दहकते होंठों पर रख दिए । उसके हाथ किरण के जिस्म पर फिसलने लगे ।
किरण ने कोई एतराज नहीं किया ।
शायद उसका इकरार का यही तरीका था । डॉक्टर ने और आगे बढ़ने की कोशिश की तो किरण ने उसे जबरदस्ती परे धकेल दिया ।
"बस !" - वह बोली- "इससे आगे नहीं । "
हांफता हुआ डॉक्टर लालसा भरी आंखों से उसे देखता रहा । कुछ क्षण बाद वह अपनी उखड़ी हुई सांसों पर काबू कर पाया तो बोला- "किरण, मैं तुमसे मुहब्बत करता हूं। मैं तुम्हें पाना चाहता हूं।"
"मुझे पाने के लिए आपको मुझसे शादी करनी होगी ।" - किरण दृढ़ स्वर से बोली ।
"लेकिन यह असम्भव है।" - डॉक्टर असहाय भाव से बोला - "मैं तो पहले से ही शादीशुदा हूं । "
"फिर आप अपनी पत्नी से तलाक ले लीजिए ।"
" पर तलाक की कोई वजह ही नहीं है। यह हिन्दुस्तान है, योरोप नहीं । यहां बिना किसी ठोस वजह के तलाक नहीं हो सकता ।"
"मैं कुछ नहीं जानती। अगर आप मुझे हासिल करना चाहते हैं तो आपको मुझसे शादी करनी होगी । मैं आपकी रखैल नहीं बनना चाहती। मैं किसी नाजायज औलाद की मां नहीं बनना चाहती ।" - किरण ने दो टूक कह दिया ।
डॉक्टर गैस निकले गुब्बारे की तरह पिचक गया ।
लेकिन किरण के उस दो टूक जवाब से उसके इश्क का बुखार उतरा नहीं और भड़क उठा । किरण की उफनती जवानी की आंच में एक बार थोड़ा जल चुकने के बाद वह अपना सर्वस्व होम कर देने पर अमादा था । अधेड़ावस्था का इश्क खतरनाक होता है । किरण की आशिकी में सुलगते डॉक्टर ये अपने 15 साल के सुखी गृहस्थ जीवन में आग लगाने की ठान ली । इश्क का भूत दीवानगी की इस हद तक पहुंच गया कि डॉक्टर वर्मा ने एक निहायत जुनूनी कदम उठाने का फैसला कर लिया ।
उसने अपनी बीवी को कत्ल करने का फैसला कर लिया । अब वह कत्ल की योजनाएं बनाने लगा ।
पत्नी की हत्या का पहला प्रयत्न उसने कुकिंग गैस द्वारा किया ।
किसी रात अगर डॉक्टर वर्मा देर तक पढ़ता रहता था तो शांता उसके पास से उठकर बैठक में जा सोती थी । उनकी बैठक ड्राइंगरूम और डायनिंग रूम दोनों का काम देती थी । वह एक विशाल कमरा था । जिसके आधे भाग में एक दीवान और एक सोफे सैट लगा हुआ था और बाकी आधे में डायनिंग टेबल लगी हुई थी ।
उस कमरे और बगल में मौजूद किचन में दो गुणा दो फुट की एक खिड़की थी जिसमें से किचन से सीधे डायनिंग टेबल तक का सामन पहुंचाया जा सकता था ।
शांता आदतन एक भुलक्कड़ औरत थी । कितनी ही बार ऐसा होता था कि वह चूल्हे को तो बुझा देती थी, लेकिन सिलेंडर से गैस बंद करना भूल जाती थी। उसकी यह लापरवाही की आदत जगविदित थी और अड़ोस-पड़ोस की गृहणियां तक कई बार कह चुकी थीं कि शांता की यह आदत किसी दिन जरुर कोई गुल खिलायेगी । शांता हर बार पूरा ध्यान रखने की कसम खाती थी लेकिन फिर भूल जाती थी । डॉक्टर ने किरण की इसी भूल को उसकी मौत का सामान I बनाना चाहा ।
फिर एक रात डॉक्टर जान-बूझकर बत्ती जलाये काफी देर तक पढ़ता रहा । हमेशा की तरह शांता उठकर बैठक में चली गयी । बच्चे बगल के कमरे में पहले ही सोये पड़े थे । उस रोज ठंड ज्यादा थी, इसलिए घर की सारी खिड़कियां दरवाजे बंद थे और उन पर पर्दे पड़े हुए थे ।
डॉक्टर प्रतीक्षा करने लगा ।
अब उसे शांता को धीरे-धीरे खर्राटे भरने की आवाज आने लगी ।
शांता हमेशा ही मुर्दों से शर्त लगाकर सोती थी ।
थोड़ी देर बाद डॉक्टर दबे पांव उठा । वह बैठक में आया । शांता दीन-दुनिया से बेखकर दीवान पर पड़ी सो रही थी ।
वह किचन में पहुंचा । उसने गैस पूरी खोल दी । किचन और बैठक के बीच की खिड़की पहले ही खुली थी और किचन की खिड़की बंद थी । वह किचन से बाहर निकला । उसने दरवाजा मजबूती से बंद कर दिया। अब किचन में जमा होती गैस खिड़की से निकलकर केवल बैठक में ही जा सकती थी ।
वह वापस अपने बैडरूम में आ गया। उसने बीच का दरवाजा बंद कर लिया और दिल पर हाथ रखे प्रतीक्षा करने लगा ।
कोई आधे घंटे बाद उसे शांता के धीरे-धीरे खांसने की आवाज आई।
गैस अपना काम कर रही थी ।
डॉक्टर को उम्मीद थी कि अभी गैस की वजह से शांता पर बेहोशी ताजी हो जाएगी और फिर नींद में ही उसका काम तमाम हो जाएगा ।
"डैडी !"
वह चौंका | आवाज विपरीत दिशा से आ रही थी । उसने घूमकर देखा । दाई ओर के दरवाजे की चौखट पर उसका दस वर्षीय बड़ा लड़का आंखें मलता हुआ खड़ा था ।
“डैडी !” - वह खोला - "मुझे गैस की गंध आ रही है
मजबूरन डॉक्टर को उठाना पड़ा । उसने बत्ती जलाई, आंखें मलकर नींद भगाने का बहाना किया। एक-दो बार हवा में नथुने फड़फड़ाये और फिर सशंक स्वर में बोला- "हे भगवान ! बेटा लगता है तुम्हारी मां आज फिर गैस बंद करना भूल गई है।"
वह बीच के दरवाजे की ओर लपका । उसके दरवाजा खोल पाने से पहले ही दरवाजा दूसरी ओर से खुला और खांसती लड़खड़ाती शांता भीतर दाखिल हुई । उसकी आंखें बंद थीं और वह अंदाज से या टटोल-टटोलकर चल रही थी । डॉक्टर ने उसे सहारा देकर बैडरूम के पलंग पर लिटाया और किचन की ओर लपका। उसने गैस बंद की और बैठक में आकर उसकी खिड़कियां खोल दीं ।
उसके बैडरूम में लौटने तक शांता सचेत हो चुकी थी ।
"हाय राम !" - वह बोली- "मैं भी कैसी लापरवाह हूं । आज फिर मुझसे गैस खुली रह गयी ।"
"तुम्हारी तबियत तो ठीक है न ?" - मन-ही-मन हालात को कोसते हुए डॉक्टर ने सवाल किया ।
"ठीक है ।" - शांता ने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया ।
उस रोज डॉक्टर मायूस तो हुआ, लेकिन हतोत्साहित नहीं हुआ । उसे एक बात का अफसोस था कि अब वह शांता की हत्या का दूसरा प्रयत्न तुरन्त नहीं कर सकता था । इससे लोगों को शक हो सकता था । अगले दिन शांता ने बड़े नाटकीय ढंग से अड़ोस-पड़ोस में यह बात चलाई थी कि किस प्रकार पिछली रात वह अपनी लापरवाही की वजह से मरते-मरते बची थी।
किरण की फिराक में तड़फता, अंगारों पर लौटता डॉक्टर वर्मा किसी और मुनासिब मौके का इंतजार करने लगा । किरण का अथाह सौंदर्य व छलकती जवानी उसे बेकाबू किए हुई थी । वह अपने सामने षटरस व्यंजनों से युक्त थाली को निहार कर लार टपका सकता था, पर उसका स्वाद चख नहीं सकता था । बीच में उसकी पत्नी दीवार बनी खड़ी थी ।
उस घटना के दो मास बाद दूसरा मौका डॉक्टर के हाथ लगा ।
शांता बीमार पड़ गई ।
डॉक्टर वर्मा सिद्धांत के तौर पर अपने परिवार के सदस्यों का इलाज स्वयं नहीं करता था । वैसे भी घर का जोगी जोगड़ा ही समझा जाता है। उसने अपने दोस्त डॉक्टर घोष को बुलाया । वह शांता को दवाई और आराम करने की हिदायत देकर चला गया। उसने डॉक्टर घोष को कहते सुना कि जो दवा शांता को दे रहा था, उसको बहुत सावधानी से खाना जरूरी था, क्योंकि उसकी खुराक बढ़ जाना जान के लिए खतरा बन सकता था ।
डॉक्टर वर्मा ने यह बात अच्छी तरह याद कर ली ।
अगली सुबह जब बच्चे स्कूल गए, तो उसने अपने बैडरूम की अलमारी से मोर्फीन की गोलियों की एक शीशी निकाली । डॉक्टर होने के नाते वह जानता था कि वह गोली एक खायी जानी चाहिए, दो तक खायी जा सकती थी । लेकिन पहले से बीमार आदमी द्वारा चार गोलियां खायी जाने का परिणाम बड़ा घातक सिद्ध हो सकता था। फिर भी अपनी भरपूर तसल्ली कर लेने के लिए उसने शीशी में, से आठ गोलियां निकाल लीं। उसने वे गोलियां आधा गिलास दूध में घोलीं और दूध लेकर अपनी बीवी के सिरहाने पहुंचा ।
"यह लो दूध ।" - वह बोला - "तुम्हारा दवा खाने का वक्त हो गया है । दवा खा लो और ऊपर से दूध पी लो ।”
शांता ने डॉक्टर घोष की दी दवा की एक खुराक एक कप में डालकर पी और ऊपर से दूध पी लिया ।
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