फिर हीरालाल को बुलाया गया । वह एक गम्भीर स्वभाव का, अधपके वालों वाला अधेड़ावस्था का व्यक्ति था । मालूम हुआ कि वह संगीत का अध्यापक था ।


“मिसेज गुप्ता की आप अच्छी तरह से जानते हैं न ?" अमीठिया ने प्रश्न किया ।


"जानता हूं" - हीरा लाल बोला- "लेकिन अच्छी तरह नहीं । हमपेशा होने के नाते अक्सर मुलाकात हो जाना स्वाभाविक बात है लेकिन कोई बड़े गहरे सम्पर्क में आने वाली बात नहीं ।”


“हाल ही में आपकी मिसेज गुप्ता से कब मुलाकात हुई थी ?" 


हीरालाल कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला- "मेरे ख्याल से कोई... कोई बारह तेरह दिन पहले रुमानी आडीटोरियम में हुए एक प्रोग्राम मे हम दोनों की मुलाकात हुई थी ।"


“जरा याद करने की कोशिश कीजिए | क्या उस रोज मिसेज गुप्ता अपने जेवरात पहने हुए थीं ?"


"विशेष रूप से तो याद नहीं लेकिन पहने जरूर रही होंगी। क्योंकि जब भी कहीं उनका गायन होता है वे जेवरात जरूर पहनकर जाती हैं। उन्हें अपने जेवरात की नुमायश का बड़ा शौक है ।"


"आपकी जानकारी के लिये कल दिन में मिसेज गुप्ता के कमरे से उनके सारे जेवरात चोरी हो गए हैं । "


"सुनकर बहुत अफसोस हुआ मुझे । उन्हें तो अपने उन कीमती जेवरातों से बड़ा भारी लगाव था । लेकिन उस चोरी से मेरा क्या वास्ता ? क्या मुझे उस चोरी के सिलसिले में यहां तलब किया गया है ?"


“जी हां ! कोई भी केस हो, उसकी तफ्तीश के लिये हमें हर सम्भावना पर विचार करना पड़ता है। हर पहलू पर निगाह डालनी पड़ती है। हर सम्बन्धित व्यक्ति से जवाब तलब करनी पड़ती है। "


" यानी कि आप मुझ पर भी सन्देह कर रहे हैं ?"


"ऐसा ही समझ लीजिए | "


"लेकिन मैं तो आपका सन्देह अभी दूर कर सकता हूं।"


"कैसे ?”


"चोरी के समय मैं प्लाजा सिनेमा में फिल्म देख रहा था । शायद अभी मेरी जेब में टिकट भी हो।" - उसने अपनी बेटे टटोलनी शुरु कीं । एक जेब से एक आधी फटी हुई सिनेमा टिकट बरामद हुई । उसने टिकट अमीठिया के सामने रख दी |


मैने आगे झुक कर अमीठिया के कान में कुछ कहा । अमीठिया के माथे में बल पड़ गये। फिर उसने सहमतिसूचक ढंग सिर हिलाया मैं परे हट गया ।


अमीठिया ने टिकट उठाई । वह कुछ क्षण टिकट को उलटा-पलटता रहा । फिर उसने टिकट मेरी ओर बढ़ा दी। 


मैंने देखा वह प्लाजा सिनेमा की दोपहर के शो के टिकट थी । उस पर साफ साफ कल की तारीख पड़ी हुई थी ।


मैंने टिकट अमीठिया को वापिस लौटा दी ।


"प्लाजा पर कौन सी फिल्म देखी आपने ?" - अमीठिया ने सवाल किया ।


"शोले ।" - हीरालाल बोला ।


"वह तो कल ही रिलीज हुई है" - मैं बोला- "कल दोपहर तो उसका पहला ही शो था । "


" जी हां । "


"टिकट तो बहुत पहले मंगा ली होगी आपने ? सुना है बहुत मशहूर है यह फिल्म । हरियाणा और पंजाब में फिल्म पहले रिलीज हो गई थी। वहां तो लोग टूट कर पड़े थे इस फिल्म पर । सुना है यहां भी यही हाल है ।"


"मैंने टिकट का इन्तजाम पहले कर लिया था लेकिन बुकिंग से टिकट ली मैंने उसी दिन थी ।"


"मतलब ?"


"एक बुकिंग क्लर्क मेरा दोस्त है । उसने मेरे लिए टिकट रख ली थी। मेरे पास सौ का नोट था । बेचारे को पैसे तुड़वा कर मुझे देने में बड़ी दिक्कत हुई थी। मैं उसके पास नोट छोड़कर ही फिल्म देखने घुस गया था । बाकी के पैसे मैंने के बाद लिए थे।”


"उस बुकिंग क्लर्क का नाम बताइए।" - अमीठिया बोला। 


"मेहरा ।" - उत्तर मिला ।


अमीठिया चुप रहा ।


“आप खुद चैक कर सकते हैं इन्स्पेक्टर साहब" हीरालाल बोला- "कि हत्या के समय के दौरान की मेरे पर बड़ी मजबूत एलीबाई है। मैं उस दौरान प्लाजा सिनेमा में था । मेरी तकदीर ही अच्छी थी कि मैंने प्लाजा टिकट अपने दोस्त मेहरा से ली और सौ की चेंज उससे शो खत्म होने के बाद में ली वर्ना भगवान जाने मुझे अपने निर्दोषिता प्रमाणित करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते ।”


"लगता है आप विदेशी उपन्यास बहुत पढ़ते हैं !"


“कैसे जाना ?" - हीरालाल तनिक हैरानी से बोला ।


"यह 'एलिबाई शब्द तो अक्सर विदेशी जासूसी उपन्यास में ही इस्तेमाल होता है । "


"ओह !"


"एक बात और बताइए, मिस्टर हीरालाल" - अमीठिया बोला - "आपके मिसेज गुप्ता के बारे में क्या विचार हैं ?"


"सच बताऊं ?" - हीरालाल बड़ी संजीदगी से बोला ।


“जी हां। सच ही बताइए । "


“तो उनके बारे में मेरे विचार तो कुछ अच्छे नहीं । मुझे तो वे बड़ी ढीठ, और किसी हद तक कमीनी औरत लगती थी।”


मैंने फिर आगे झुक कर अमीठिया के कान में कुछ कहा । अमीठिया के माथे पर इस बार और भी गहरे बल पड़ गये । उसने फिर सहमति सूचक ढंग से सिर हिलाया । मैं फिर पीछे रह गया ।


"यह एक आखिरी सवाल" - अमीठिया हीरा लाल से बोला - "आप रहते कहां हैं ?" -


हीरालाल ने हमें पंडारा रोड का एक पता बता दिया ।


" अरे मिस्टर हीरालाल, आप उपलब्ध रहियेगा । शायद आप की फिर जरूरत पड़े । इस वक्त आप जा सकते हैं।"


हीरालाल चला गया ।


"क्या ख्याल है ?" - उसने जाने के बाद अमिठिया बोला । 


"मेरे ख्याल से तो हमें प्लाजा सिनेमा का एक चक्कर लगाना चाहिये ।”


"ओ के।"


हम जीप पर सवार होकर प्लाजा सिनेमा पहुंचे ।


वहां अमीठिया ने मेहता को तलाश किया ।


पूछताछ पर मालूम हुआ कि हीरालाल वाकई प्लाजा पर दोपहर का शो देखने आया था । उसने शो के समय पर ही आकर मेहरा से टिकल ली । सौ का नोट उसके हवाले किया था और शो समाप्त हो जाने के बाद बाकी पैसे वापिस लिये थे ।


तभी मैटिनो शो समाप्त हुआ। भीड़ हाल से बाहर निकलने लगी ।


“यार असरानी ने तो कमाल ही कर दिया" - मैंने किसी को कहते सुना - "चाहे फिल्म की कहानी से उसका कोई खास रिश्ता नहीं था लेकिन कर दिया मजा उसने ।”


आगे की बात मैं नहीं सुन पाया । बोलने वाला परे चला गया था । अब उसकी आवाज मेरे कानों तक नहीं पहुंच रही थी ।


"अमीठिया" - एकाएक मैं बोला- "मुझे एक ख्याल आया है ।” 


"क्या ?"


"मेहरा का बयान यह तो सिद्ध करता है कि वह कल शो के वक्त यहां था । यह भी सिद्ध करता है कि वह शो समाप्त होने के समय यहां था लेकिन यह तो सिद्ध नहीं करता कि वह शो के दौरान यहां था । "


"तुम यह कहना चाहते हो कि वह अपनी टिकट गेट कीपर से कटवाकर भीतर बैठा फिर चुपचाप वहां से खिसक गया, जाकर मिसेज गुप्ता का खून कर आया, उसने उसके जेवर चुरा लिये और फिर वापिस सिनेमा पर पहुंच गया ।"


"हां"


"आओ पता करते हैं । "


अमीठिया सिनेमा के गेट कीपरों से पूछताछ करता रहा लेकिन वे इस बारे में कोई निश्चित बात नहीं कह सके कि कोई फिल्म बीच में छोड़कर वहां से गया था नहीं ।


"सुनो" - मैं बोला- "हीरालाल के पास फिर चलो।"


"किसलिये ?"


"उसे कहो कि वह सुनाये उसने 'शोले' में क्या देखा ।"


"फायदा ? मैंने फिल्म देखी नहीं । मुझे क्या पता लगेगा वह क्या कह रहा है ?"


"मैंने देखी है ।”


"अच्छा ? कब ? फिल्म अभी अभी कल तो रिलीज हुई है।"


" तुम्हें याद होगा कुछ दिन पहले मेरे एक ताया जी की मृत्यु हो गई थी और उनकी क्रिया की रसम में शामिल होने के लिये मैं पंजाब गया था। पंजाब में 'शोले' बात पहले रिलीज हो गई थी । लौटती बार मैं अमृतसर में 'शोले' देखकर आया था।"


"ठीक है । चलते हैं। "


हम हीरालाल के घर पहुंचे ।


हीरालाल घर पर मौजूद था।


"हीरालाल जी" - अमीठिया बिना किसी तकल्लुफ के मतलब की बात पर आता हुआ बोला - "आपने अपने ब्यान में कहा था कि कल नून शो में आपने प्लाजा पर शोले देखी थी । जरा सुनाइये तो फिल्म में क्या देखा था आपने ?”


"आपका मतलब है मैं आपको फिल्म की कहानी सुनाऊं ?" - हीरालाल हैरानी से बोला ।


"जी हां । सविस्तार । कोई बात छोड़िये मत । आपने अभी कल ही फिल्म देखी है । कुछ भूले नहीं होंगे आप उसका ।"


“फायदा ?”


"शायद कुछ हो । शायद न हो । बहरहाल जो आपको कहा गया है कीजिये । "


"बेहतर ।"


हीरालाल ने सविस्तार शोले की कहानी सुनानी आरम्भ कर दी । उसकी याददाश्त निश्चय ही बहुत अच्छी थी । उसका विचार विवरण सीन पर सीन सही था ।


“हीरालाल जी" - जब वह चुप हुआ तो मैं बोला "आपने असरानी का जिक्र नहीं किया ?" -


" असरानी ?" - हीरालाल अचकचा कर बोला "वह कहां था फिल्म में ?"


"उसका तो फिल्म में अच्छा खासा रोल था । वह फिल्म में हिटलर नुमा जेलर बना था ।”


"आप मजाक कर रहे हैं । "


"मैं गम्भीर हूं । फिल्म मैंने भी देखी है । "


"लेकिन... लेकिन मैंने तो..."


"ऐक्जैक्टली । आपने फिल्म में असरानी को नहीं देखा । क्योंकि आपने शोले प्लाजा पर नहीं देखी । आपकी जानकारी के लिये शोले के दो प्रकार के प्रिन्ट नुमायश के लिये आये हैं । एक में असरानी का रोल एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक एक दम गायब है लेकिन दूसरे में असरानी का बड़ा दिलचस्प कामेडी रोल है। प्लाजा में जो प्रिन्ट दिखाया जा रहा है उसमें उसका असरानी वाला भाग है । अगर आपने प्लाजा पर शोले देखी होती तो आपको यह बात मालूम होती "


हीरालाल में चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं ।


“वास्तव में आप शोले को दिल्ली से बाहर पंजाब या हरियाणा के किसी शहर में पहले ही देख आये होंगे। बाद में इसी बात को अपनी शहादत बनाने के लिये आपने अपने दोस्त मेहरा से प्लाजा का भी टिकट हासिल किया होगा । जानबूझ कर आपने शो के समय पर ही फिल्म का टिकट हासिल किया होगा ताकि मेहरा की गवाही आपके काम आये कि शो के समय आप वहां थे। फिर जानबूझ कर ही आपने सौ का नोट उसके पास छोड़ा होगा ताकि शो कि समाप्ति के समय पर आप उससे अपने पैसे वापिस लेकर यह सिद्ध कर सकें कि उस समय भी आप वहीं थे। जबकि वास्त में आप हाल में दाखिल हुये होंगे, थोड़ी देर फिल्म देखी होगी और फिर चुपचाप वहां से खिसक आये होंगे। आपने दरिया गंज आकर मिसेज गुप्ता का कत्ल किया होगा, उसके जेवर चुराये होंगे, उन्हें कसी सुरक्षित स्थान पर छुपाया होगा और वापिस सिनेमा हाल पहुंच गये होंगे ।"


हीरालाल के मुंह से बोल नहीं फूटा ।


कहने की जररूत नहीं कि हीरालाल मिसेज गुप्ता की हत्या के अपराध में गिरफ्तार हो गया। बाद में उसी ने बताया कि वह कोई एक हफ्ता पहले करनाल में शोले देखकर आया था और वहां जो प्रिंट दिखाया जा रहा था उसमें असरानी नहीं था । उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि ताजी रिलीज हुई कोई फिल्म दो भिन्न स्थानों पर दो भिन्न प्रकार की हो सकती है ।


समाप्त