छुट्टी का दिन था । उपन्यास लिखने की तैयारी में मैंने कलम सम्भाली थी कि एकाएक टेलीफोन की घण्टी बज उठी । मैंने बुरा सा मुंह बनाकर टेलीफोन पर से रिसीवर उठा लिया और फिर तनिक झुंझलाये स्वर में बोला- "हैलो ।"


“पाठक !” - दूसरी ओर से आवाज आई ।


वह पुलिस सब इन्स्पेक्टर एन एस अमीठिया की आवाज थी ।


 कुछ साल पहले तक मैं और अमीठिया एक ही दफ्तर में काम करते थे। फिर वह पुलिस में भरती हो गया था और नौकरी छोड़ कर चला गया । मैं बिजली की खम्बे की तरह अपनी पुरानी नौकरी में आज भी गड़ा बैठा हूं । अमीठिया जब से पुलिस सब इन्सपेक्टर बना था तभी से मुझे अपराध जगत के ऐसे-ऐसे दिलचस्प किस्से सुनाता रहा जो मेरी कल्पना की उपज से भी कहीं ज्यादा दिलचस्प थे । अपने कई उपन्यास मैंने उसी के मुंह सुनी बातों के आधार पर बनाकर लिखे थे । धन्धे के लिहाज से बड़े फायदे की दोस्ती थी । इसलिये मैंने अमीठिया से बड़े अनुनय के साथ कहा हुआ था कि अगर कभी कोई ऐसी दिलचस्प वारदात हो जिसकी तफ्तीश वह कर रहा हो और किसी बाहरी आदमी को साथ ले जाना सम्भव हो तो वह मुझे बुलाना न भूले ।


आज भी ऐसे ही एक सिलसिले में टेलीफोन आया था ।


"हां।" - मैं टेलीफोन में खोया था ।


"अमीठिया बोल रहा हूं" - वह बोला- "एक केस के सिलसिले में दरियागंज पहुंच रहा हूं। आना चाहते हो ?"


“केस क्या है ?" - मैंने दिलचस्पी भरे स्वर से पूछा ।


" अभी ज्यादा मुझे भी कुछ नहीं मालूम । घटना स्थल पर पहुंच कर ही कुछ पता लगेगा ।"


"मैं कहां पहुंचूं ?"


ले चलूंगा ।" "गोल्चा के सामने पहुंच जाओ। वहां से मैं तुम्हें साथ


"ठीक है ।"


मैंने टेलीफोन रख दिया। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और दरियागंज पहुंचा। वहां मैं गोल्चा के सामने के रेलिंग पर चढ़ कर बैठ गया ।


तभी जीप पर अमीठिया वहां पहुंचा । उसके संकेत पर मैं जीप पर सवार हो गया । जीप तुरन्त आगे बढी । थोड़ी ही देर में वह एक तिमंजिली इमारत के सामने आकर रुकी ।


हम जीप से उतरे । अमीठिया कुछ क्षण इमारत के बाहर लगे इमारत में रहने वाले लोगों के बोर्ड देखता रहा और फिर मेरी बांह पकड़ कर आगे बढा ।


हम दूसरी मंजिल पर पहुंचे ।


उसने एक फ्लैट की घण्टी बजाई । एक अधेड़ आयु के व्यक्ति ने दरवाजा खोला ।


“मिस्टर बोस ?" - अमीठिया अपने व्यवसाय सुलभ खुरदरे स्वर में बोला ।


“जी हां उत्तर मिला ।”


"फोन आपने किया था ?"


"जी हां । "


"मेरा नाम अमीठिया है । क्या बात है ?"


"बात शायद कुछ भी न हो लेकिन यह भी हो सकता है कि मिसेज गुप्त के साथ कोई... कोई हादसा हो गया हो।”


"हादसा !"


"जी हां, दरअसल कल से उनके फ्लैट में कतई कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही । कल से उनके फ्लैट का दरवाजा तक नहीं खुला ।"


"कौन सा फ्लैट है उनका ? "


"वह मेरे सामने वाला ।" - उसने गलियारे के पार के एक बन्द दरवाजे की ओर संकेत किया ।


अमीठिया के साथ ही मेरी निगाह भी उस दरवाजे पर पड़ी । बन्द दरवाजे के बाहर हो दूध की बोतलें और रबड़ बैण्ड में बंधा हुआ अखबार पड़ा था ।


"दूध की बोतलें और अखबार पड़ा देख रहे हैं आप ?" बोस बोला- "दोपहर होने को आई, अभी तक उठाई नहीं गई हैं। हालांकि वे सुबह सवेरे इस्तेमाल होने वाली चीजें हैं"


"शायद वे पिछली रात से ही कही गई हुई हों ?"


“यह सम्भव नहीं । वे जब भी ऐसे जाती हैं तो मुझे कह कर जाती हैं कि दूध वाले को दूध के लिए मना कर दूं और अगर वे अगले ही दिन भोर आने का इरादा रखती हों तो मुझे कह जाती है कि मैं उनका दूध लेकर अपने पास रख लूं ।”


"हूं।" - अमीठिया ने हूंकार भरी ।


उसने आगे बढकर मिसेज गुप्त के फ्लैट की घण्टी बजाई, फिर बजाई, फिर जोर से दरवाजा खटखटाया लेकिन नतीजा कुछ न निकला ।


"मिसेज गुप्ता इस फ्लैट में अकेली रहती हैं ?" - अमीठिया ने चिन्तित स्वर से पूछा ।


"जी हां ।”


"फिर तो इस फ्लैट की चाबी किसी और के पास तो होने का सवाल ही नहीं पैदा होता । "


बोस कुछ क्षण हिचकिचाया और फिर बोला - "ग्राउन्ड फ्लोर पर सामने के फ्लैट में अग्रवाल साहब रहते हैं । वे संगीत प्रेमी हैं और उनका मिसेज गुप्ता से कोई रिश्ता भी है । मिसेज गुप्ता का नाम शायद आपने सुना ही । वे बड़ी मशहूर क्लासिकल सिंगर हैं । आप अग्रवाल साहब से पूछ लीजिये, उनके पास चाबी हो । "


हम ग्राउण्ड फ्लोर पर पहुंचे।


अमीठिया ने अग्रवाल के फ्लैट की घण्टी बजाई । वहां से भी कोई उत्तर नहीं मिला ।


अमीठिया ने अपने पीछे पीछे चल रहे सन्तरी को आदेश दिया - किसी ताले वाले को तलाश करके लाओ । ताला खुलवाना पड़ेगा ।


सन्तरी फौरन चला ।


"थोड़ी देर देखते हैं" - अमीठिया बोला - "जामा मस्जिद के आपपास ताले वाले बहुत मिलते हैं। अगर हवलदार किसी को ले आया तो ठीक है, नहीं तो दरवाजा तोड़ना पड़ेगा ।"


लेकिन दरवाजा तोड़ने की नौबत नहीं आई। हवलदार एक ताले वाले को लेकर लौटा। दस मिनट की मेहनत के बाद उसने दरवाजा खोल दिया ।


हम फ्लैट में दाखिल हुए ।


बैडरूम के पलग पर एक अधेड़ आयु की महिला पड़ी थी और सूरत से ही मृत मालूम हो रही थी । उसकी बगल की मेज पर एक पानी से आधा भरा गिलास रखा था और गिलास के पास ही एक शीशी पड़ी थी जो छोटी-छोटी सफेद गोलियों से आधी भरी हुई थी ।


"नींद की गोलियां ?" - मेरे मुंह से निकला ।


अमीठिया ने आगे बढकर शीशी को बिना हाथ लगाये उसका अच्छी तरह निरीक्षण किया फिर उसने सहमति सूचक ढंग से सिर हिला दिया ।


"ये मिसेज गुप्ता हैं ?" - उसने बोस से पूछा ।


बोस ने थूक निकली और फिर वह जोर जोर से स्वीकारात्मक ढंग से सिर हिलाने लगा ।


" आप बाहर जाइये ।" - अमीठिया बोला । "बोस फौरन फ्लैट से निकल गया ।”


मेज पर एक अन्तर्देशीय पत्र पड़ा था। अमीठिया ने उसे उठा कर खोला कि मैं उसके कन्धे पर से उचक कर पत्र देखने लगा । पत्र में लिखा था :


आदरणीय चाची जी,


मैंने कल आपको फोन किया था लेकिन खेद है कि बात न हो सकी । चाची जी ! आप से कोई बात छुपी नहीं है । आपको मेरी मुश्किलों की पूरी जानकारी है। मुझे कुछ रुपयों की सख्त, फौरन जरुरत है। अगर आप इजाजत दें तो शुक्रवार, दोपहर के बाद आपके फ्लैट पर हाजिर हो जाऊं आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगी । मैं


आपका


गौतम गुप्ता


अमीठिया ने वह पत्र अपनी जेब में रख लिया और बड़ी तरतीब से फ्लैट की तलाशी लेनी आरम्भ कर दी । एक मेज की एक दराज से एक जेवर रखने वाला बक्सा खाली था ।


"चोरी !" - मेरे मुंह से निकला ।


अमीठिया ने उत्तर नहीं दिया । तभी बाहर गलियारे से बोस के बोलने के आवाज आई। वह किसी को बता रहा था कि मिसेज गुप्ता के फ्लैट पर पुलिस आई हुई थी ।


अमीठिया जल्दी से बैडरूम से बाहर निकला । मैं भी बाहर आ गया । उसने बैडरूम का दरवाजा बन्द कर दिया । और फ्लैट से निकलकर बाहर गलियारे में आ गया ।


बाहर बौखलाया हुआ सा आदमी बोस के पास खड़ा था । 


"ये ग्राउन्ड फ्लोवर वाले अग्रवाल साहब हैं ।" - बोस ने जल्दी से बताया ।


" आप भीतर आइये ।" - अमीठिया बोला और वापिस कमरे में दाखिल हो गया ।


अग्रवाल झिझकता हुआ कमरे में घुसा ।


"ये मिस्टर बोस क्या कह रहे थे ?" - वह घबराये स्वर से बोला - "क्या मिसेज गुप्ता के साथ कोई हादसा हो गया है ?"


“जी हां" - अमीठिया स्थिर स्वर से बोला- “मिसेज गुप्ता के कमरे में चोरी हो गई है। उनके जेवरात चोरी हो गये मालूम होते हैं।"


"हे भगवान !" - वह बोला - "उनके जेवर बहुत खूबसूरत थे । मिसेज गुप्ता ने उन पर बहुत पैसा खर्च किया था चोरी के वक्त वे कहां थीं ?"


"वे मर चुकी हैं ।" - अमीठिया धीरे से बोला ।


“कत्ल ?” - अग्रवाल हक्का-बक्का सा अमीठिया का मुंह देखता हुआ बोला ।


"हां"


"किसने किया ?"


“अभी कुछ पता नहीं लेकिन हमारे सन्देह के दायरे में वे तमाम लोग आ जायेंगे जो मिसेज गुप्ता से परिचित थे । इस लिहाज से सन्दिग्ध लोगों की लिस्ट में आप भी शामिल हैं । मैंने सुना है आपकी मिसेज गुप्ता के कोई रिश्तेदारी भी है ?"


"जी हां ! बहुत दूर की ।"


"आप उनके गौतम गुप्ता के किसी भतीजे को जानते हैं ?"


"जाती तौर पर तो नहीं जानता" - उत्तर मिला - "लेकिन उसका जिक्र बहुत सुना है । सुना है एकदम निकम्मा, नाकारा आदमी है जो अपनी चाची से रुपया पैसा ऐंठने की फिराक में लगा रहता । लेकिन अपने इन प्रयत्नों में वह कोई खास कामयाब नहीं हो पाता था । मिसेज गुप्ता रुपये पैसे को दान्त से पकड़ने वाली औरत थी ।”


अमीठिया ने उससे और कोई सवाल नहीं पूछा ।


फिर लाश पोस्ट मार्टम के लिए भिजवा दी गई ।


उसी दिन मैडिकल रिपोर्ट प्राप्त हो गई। मालूम हुआ कि हत्या गला घोंट कर की गई थी और हत्या शुक्रवार को दोपहर एक दो बजे के बीच हुई थी। पेट में नींद की गोलियों के कोई अवशेष नहीं मिले थे ।


अखबारों में उस हत्या और चोरी के बारे में कुछ भी प्रकाशित हो पाने से पहले अमीठिया ने गौतम गुप्ता को भी खोद निकाला और एक अन्य सन्दिग्ध व्यक्ति की भी खोद निकाला । उस व्यक्ति का नाम हीरालाल था । अग्रवाल और बोस दोनों ने ही उसका जिक्र किया था ।


गौतम गुप्ता का बयान सन्तोष जनक नहीं था । वह एक सूरत से ही लापरवाह और गैरजिम्मेदार युवक लगता था और स्वयं को अभिनेता बताता था । उसके कथानुसार जिस वक्त चोरी हुई थी (किसी ने कत्ल का जिक्र नहीं किया था ) उस समय अर्थात एक और दो के बीच में वह जन्तर मन्तर के लान में लेटा हुआ उपन्यास पढ रहा था । वह वास्तव में ही ऐसा कर रहा था इस बात की वह कोई शाहदत पेश नहीं कर पाया था ।


"लेकिन आपका मतलब क्या है ?" - वह तनिक घबरा गया - "क्या कोई आदमी कहीं तनहाई में जाकर दो घड़ी चैन से नहीं बैठ सकता ?”


"बैठ सकता है" - अमीठिया कठोर स्वर से बोला "अगर बैठा हो तो।"


गौतम चुप रहा ।


फिर अमीठिया ने मिसेज गुप्ता के कमरे से बरामद हुआ अन्तर्देशीय पत्र अपनी जेब से निकाला और उसे खोलकर गातम के सामने कर दिया ।


"इसे पहचानते हो ?" - वह बोला ।


गौतम कुछ क्षण पत्र को देखता रहा और फिर स्वर से बोला - “पहचानता हूं । मेरी चिट्ठी है । मैंने चाची जी को लिखी थी ।" -


"आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए ?"


“जाहिर है । इतना पैसा है उनके पास । क्या करेंगी उसका वे । थोड़ा अपने जरूरतमन्द भतीजे को दे देंगी तो क्या आफत आ जायेगी ?"


"बड़े अच्छे ख्यालात हैं तुम्हारे अपनी चाची ने बारे में । लेकिन शायद तुम ये नहीं जानते कि इस चिट्ठी की वजह से तुम सन्देह के बड़े तगड़े दायरे में आ गये हो । शुक्रवार दोपहर के जिस समय का तुम कोई सन्तोषजनक हिसाब नहीं दे सकते - अर्थात एक और दो बजे के बीच के उसी समय तुम्हारी चाची के फ्लैट से सारे जेवरात चोरी हुए हैं।"


"लेकिन मेरा जेवरात से क्या वास्ता साहब" - गौतम तनिक क्रोधित स्वर से बोला - "मैं तो थोड़ा बहुत रुपया ही हासिल करना चाहत था जेवरात का मुझे क्या करना था ?"


"तुम वहां गये थे ?"


"जी हां । लेकिन एक और दे को बीच में नहीं, उसके बाद में । उसके काफी बाद में। लेकिन मेरी कंजूस मक्खीचूस चाची ने दरवाजा तक नहीं खोला था । मैं कितनी देर घन्टी बजाता रहा था और फिर निराश होकर वापस आ गया था।"