सुनसान सडकों पर दौड़ती हुई टैक्सी धोबी नाका क्रीक पहुंची । जब टैक्सी पुल पर दाखिल हुई तो सुनील बोला - " अब रफ्तार कम कर दो।"
टैक्सी अपेक्षाकृत कम रफ्तार से पुल पर दौड़ने लगी । से
तभी उसे आगे फुटपाथ के साथ लगी खड़ी जयन्त सेठी की फियेट दिखाई दी ।
"रोको।" - सुनील बोला ।
टैक्सी फियेट के पीछे आकर रुकी।
सुनील टैक्सी से बाहर निकला । उसने आगे बढकर फियेट में झांका । फियेट में कोई नहीं था । उसने पुल पर दोनों तरफ निगाह दौड़ाई । कहीं कोई नहीं था । वह फियेट के सामने पुल की रेलिंग के पास पहुंचा। उसने नीचे अन्धेरे पानी में झांका । वह कितनी ही देर आंखें फाड़-फाड़ कर नीचे अन्धेरे में झांकता रहा ।
सालों पहले ठीक उसी जगह से समुद्र में छलांग लगाकर नयना देवी ने आत्महत्या की थी ।
फिर एकाएक उसे स्याह पानी की सतह पर सफेदी की झलक दिखाई दी। कोई सफेद चीज कभी दिखाई देती थी और कभी गायब हो जाती थी ।
उसने अपने जूते उतार फेंके, कोट उतार कर टैक्सी ड्राइवर की तरफ उछाल दिया और पुल की रेलिंग पर चढकर बेहिचक समुद्र में छलांग लगा दी ।
पानी बर्फ-सा ठंडा था लेकिन सुनील उसकी परवाह किये बिना जी जान से उधर तैरने लगा जिधर उसने कुछ क्षण पहले कोई सफेद चीज डूबती-उतराती देखी थी ।
अच्छा था माला नर्स की सफेद यूनीफार्म पहने थी अन्यथा उस घने अन्धेरे में वह सुनील को हरगिज दिखाई न देती । वह तैरता हुआ उसके समीप पहुंचा ।
वह जिन्दा थी और पानी में बुरी तरह हाथ पांव मार रही थी । सुनील ने अपनी बांह उसके शरीर के गिर्द लपेट दी और कोशिश करने लगा कि उसका सिर पानी की सतह से ऊपर रहे । माला का भारी फर का कोट गीला होकर और भी भारी हो गया था और उसी वजह से सुनील को माला को पानी की सतह के ऊपर रखने में बड़ी दिक्कत महसूस हो रही थी ।
उसने किसी प्रकार नोचकर उसके जिस्म से उसका कोट अलग किया । अब उसे माला को सम्भालना अपेक्षाकृत आसान लगने लगा ।
तभी उसे पानी में चप्पू चलने की चप्प-चप्प की आवाज सुनाई दी । उसने आवाज की दिशा में देखा ।
एक किश्ती उनकी तरफ आ रही थी ।
सुनील भी माला को सहारा दिये किश्ती की दिशा में तैरने लगा ।
वह किश्ती के समीप पहुंचा तो एक चप्पू उनकी तरफ बढा । सुनील ने समझा कि किश्ती में बैठा कोई चप्पू से उसे सहारा देना चाहता था। उसने चप्पू की तरफ हाथ बढाया लेकिन तभी चप्पू ऊपर उठा और फिर उसके सिर से आ लगा । चप्पू वाले ने चप्पू से उसे जोर से वापिस पानी में धकेला ।
सुनील माला सहित डुबकी खा गया ।
कोई उन्हें बचाने को नहीं, डुबोने की कोशिश कर रहा था।
बड़ी कठिनाई से उसने फिर पानी की सतह से ऊपर सिर निकाला । वह थककर चूर हो चूका था । माला का भार अब और सम्भालना उसे सम्भव नहीं लग रहा था । उसको लगने लगा कि उस पर बेहोशी-सी तारी होने लगी थी ।
एकाएक उसे समीप ही कहीं से एक मोटरबोट के इंजन की आवाज सुनाई दी । फिर दो मजबूत हाथों ने पहले माला को सम्भाल लिया और फिर उसे बगलों के नीचे से पकड़ा और पानी से बाहर खींच लिया ।
अगले ही क्षण वह पत्ते की तरह कांपता हुआ डैक पर खड़ा था । फिर किसी ने उसके गीले कपड़े उतारे, उसके गले में ब्रांडी उंडेली, उसका जिस्म सुखाया और उसे एक मोटा कम्बल ओढा दिया ।
“नखरे छोड़ो।" - उसके कानों में जयन्त सेठी की आवाज पड़ी - "तुम नौजवान आदमी हो । इतनी सी तकलीफ नहीं उठा सकते ! कुछ नहीं हुआ है तुम्हें । तुम एकदम ठीक हो ।"
"माला कैसी है ?" - सुनील ने क्षीण स्वर में पूछा।
"वह भी एकदम ठीक है ।"
"तुम यहां कैसे पहुंच गये ?"
"वैसे ही जैसे तुम पहुंच गये । फर्क केवल इतना है कि मुझे जरा देर से यह बात सूझी कि माला की मां ने यहीं से समुद्र में कूदकर आत्महत्या की थी और मैं तुम्हारी तरह पुल से छलांग लगाने की जगह यह मोटरबोट लेकर आया।"
"वह... वह किश्ती कहां गई ?"
"डूब गई।" "कैसे ?”
"मैंने किश्ती चलाने वाले को तब शूट कर दिया था जब वह चप्पू मार-मार कर तुम दोनों को डुबोने की कोशिश कर रहा था । फिर किश्ती उलट गई और डूब गई।"
"कौन था किश्ती में ? "
"पवन कपूर । बेचारा ! अपनी हीरोइन को बचाने के उपक्रम में पानी में डूबकर जान से हाथ धो बैठा । बिल्कुल फिल्मों की तरह । बहुत बढ़िया एक्टर था । जिन्दा रहता तो बहुत तरक्की करता ।" - जयन्त सेठी के स्वर में विष का समावेश था ।
***
सुनील कम्बल लपेटे धोबी नाका क्रीक के समीप की पुलिस चौकी के एक कमरे में बैठा था । उसके गीले कपड़े, सूखा कोट और जूते एक गठरी की सूरत में एक बगल की कुर्सी पर पड़े थे । समीप ही एक अन्य कुर्सी पर कालीचरण बैठा था और सामने मेज के पार इंस्पेक्टर प्रभूदयाल मौजूद था ।
"क्या किस्सा है ?" - प्रभूदयाल ने पूछा ।
"सब दौलत का फेर है ।" - सुनील बोला- "पवन कपूर ने तुम्हारे सामने ही कहा था कि वह मोहन कपूर का भतीजा था और उसका इकलौता वारिस था । नयना देवी की वसीयत के मुताबिक अगर माला मर जाती है और नयना देवी के दूसरे पति मोहन कपूर की लाश बरामद हो जाती है तो नयना देवी की करोड़ों की जायदाद का मालिक पवन कपूर बन जाता । पवन कपूर को जब वसीयत की उस शर्त की खबर लगी तो उसने माला का काम तमाम करने का फैसला कर लिया लेकिन उसने सीधे-सीधे माला का कत्ल करने या करवाने की कोशिश नहीं की क्योंकि उस सूरत में पुलिस की तफ्तीश बड़ी बारीक होती और वह आदमी स्वाभाविक रूप से सन्देह का केन्द्र बन जाता जिसे कि माला की मौत से फायदा पहुंचने वाला था । इसलिये पवन कपूर ने माला को सीधे-सीधे कत्ल करने के स्थान पर पहले उसे कुछ ऐसी घटनाओं में उलझाया जिनसे लगे कि माला को कोई दिमागी बीमारी थी और वह अपनी मां की ही तरह आत्महत्या करने की कोशिश कर रही थी। आत्महत्या की दो-तीन नाकाम कोशिशों के बाद जब माला कत्ल कर दी जाती तो पुलिस यही समझती कि अन्त में माला आत्महत्या करने में सफल हो ही गई । इस प्रकार कत्ल की तरफ उसका ध्यान तक न जाता और अगर कत्ल की तरफ ध्यान न जाता तो कातिल की ओर ध्यान जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था।"
सुनील ठिठका । वह दो बार जोर से छींका और फिर आगे बढा - "लेकिन पवन कपूर खूब जानता था कि कत्ल को आत्महत्या का रंग देना कोई आसान काम नहीं था । खासतौर से इंस्पेक्टर प्रभूदयाल जैसे काबिल पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में ।"
“मस्का मत मारो ।” - प्रभूदयाल रूखे स्वर में बोला ।
"इसलिए" - सुनील कहता रहा - "उसने जानबूझकर उसे पहले ऐसे घटनाक्रम में फंसाया जिससे लगे कि माला चाहकर भी आत्महत्या करने में कामयाब नहीं हो सकी थी । हालांकि उसको समुद्र में धक्का देने वाली आखिरी घटना से पहले वह चाहता ही नहीं था कि माला मर जाये । इसलिये उसने उसकी जिन में जहर की अपर्याप्त मात्रा मिलाई और फिर उसकी नौकरानी को भी अपनी मालकिन के पास फौरन पहुंचने को कहकर घर भेज दिया। दूसरी बार जब उसने उसकी कलाइयों पर ब्लेड फेरा तो ऐसी नसें बचाकर फेरा जिनका कटना घातक सिद्ध हो सकता था और यह काम उसने मेड के कमरे में आने के समय से थोड़ी ही देर पहले किया ताकि वह जल्दी से हस्पताल पहुंचाई जा सके । तीसरी बार उसने उसे होटल के प्रोजेक्शन पर धकेल दिया लेकिन यह पहले देख लिया कि प्रोजेक्शन खूब चौड़ा था और एकदम सुरक्षित था । उसे उम्मीद थी कि थोड़ी देर बाद वह खुद ही प्रोजेक्शन पर चलती हुई कमरे में आ जायेगी लेकिन इत्तफाक से उसकी यह उम्मीद पूरी न हुई । फिर भी उसे कोई नुक्सान नहीं हुआ । तब वह बात ज्यादा धूमधाम से स्थापित हो गई कि माला हर हाल में जान देने पर आमादा थी । केवल मुझे इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। मुझे जब मालूम हुआ कि माला घंटों से उस प्रोजेक्शन पर बैठी थी तो मैं समझ गया कि वह वहां भय से जड़ हुई बैठी थी । उसे अपनी जिन्दगी से बहुत मोह था इसलिए वह वहां से हिलने से भी डर रही थी । अर्थात उसका छलांग लगाने का कोई इरादा नहीं था ।”
"लेकिन अगर वह वहां से कूद जाती" - जाती” - प्रभूदयाल बोला - "तो जो कोई भी वहां पहुंचकर लिपस्टिक से शीशी पर लिखी अलविदा वाली बातें पढता, वह यही समझता कि माला ने सोच-समझकर आत्महत्या की थी।"
“इसी प्रकार अगर वह समुद्र में ऐन उसी जगह डूबकर मर गई होती, जहां कि सालों पहले उसकी मां मरी थी, तब भी तुम यही समझते कि माला ने इसलिये आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उससे अपने सौतेले पिता की पीपल के नीचे से बरामद हुई लाश देखने का सदमा बर्दाशत नहीं हुआ था । और यह कि उसने समझा था कि जरूर उसकी मां ने ही अपने दूसरे पति की हत्या करके उसकी लाश को पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया था ।”
"लेकिन लाश का पता बताने वाला वह कागज का पुर्जा माला के अपने हाथ का लिखा हुआ था ?"
"वह उसके हाथ का लिखा हुआ जरूर था लेकिन उसे इस बात की कोई खबर नहीं थी कि उस इबारत का कोई विशेष मतलब भी हो सकता था ।"
"तो फिर उसने वह लिखा क्यों ?"
"किसी के कहने पर । मिसाल के तौर पर मैं तुमसे कहूं, प्रभूदयाल, जब तुम बाजार जाओ तो मेरे लिये एक रिकार्ड खरीद लाना या यह कहूं कि फलां गाना बहुत बढ़िया है, कभी रिकार्ड पर सुनना । तुम पूछोगे कौन-सा ! मैं तुम्हें गाने का मुखड़ा बताऊंगा । गाना अगर तुम्हारा पहचाना हुआ नहीं होगा तो क्या तुम उसे कागज पर नोट नहीं कर लोगे ?"
“जरूर कर लूंगा ।"
"बिल्कुल ! और याद करो कि उस इबारत में लाश का संकेत खासतौर पर ऐसे शब्दों में दिया गया था जैसे वे किसी गीत के बोल हों । बंगले में बाग, बाग में पीपल । पीपल के नीचे क्या ?"
"हूं।"
"पवन कपूर ने किसी बहाने से उससे वे शब्द लिखवा लिये और बाद में वह कागज अपने अधिकार में कर लिया जिस पर कि माला ने वे शब्द लिखे थे। फिर मुनासिब मौका हाथ में आने पर उसने वह कागज माला की डायरी में उस पृष्ट से आगे रख दिया जहां तक कि डायरी लिखी हुई थी ।"
"ऐसा क्यों किया उसे ?"
“क्योंकि वसीयत के अनुसार उसके वारिस बनने के लिये मोहन कपूर की लाश बरामद होनी भी जरूरी थी । इस इबारत के माध्यम से जिसका भी ध्यान पीपल की तरफ जाता, वह उसके नीचे खुदाई करके जरूर देखता कि वहां क्या था ? साथ ही वह इबारत माला के अन्तिम सुईसाईड नोट का भी काम करती। बाद में यही समझा जाता कि उसने इस पश्चाताप में आत्महत्या कर ली थी कि उसकी मां ने अपने दूसरे पति का कत्ल किया था ।”
"लेकिन उसकी मां ने अपने दूसरे पति का कत्ल क्यों किया ?"
सुनील ने तुरन्त उत्तर नहीं दिया । उसने एक सरसरी निगाह अपने समीप बैठे कालीचरण पर डाली और बोला "क्योंकि वह घटिया आदमी था और नयना देवी की जिन्दगी खराब कर रहा था । कालीचरण ने माला के बंगले पर तुम्हें बताया ही था कि मोहन कपूर नयना देवी से धोखाधड़ी कर लेता था । वह रुपये-पैसों के मामले में भी उसे ठगने से बाज नहीं आता था । कभी उसकी किसी बहुत ही जलील हरकत पर नयना देवी को गुस्सा आ गया होगा और उसने अपने पति को शूट कर दिया होगा। लेकिन बाद में अपने इस कृत्य पर उसे इतना पश्चाताप हुआ कि उसने भी आत्महत्या कर ली "
"तुमने यह बात इतने दावे के साथ कैसे कह दी थी कि माला होटल के प्रोजेक्शन से कूदने वाली नहीं थी ?"
" उसके कमरे की ड्रेसिंग टेबिल पर लिपस्टिक से लिखे अलविदा अलविदा, ऐ जालिम जमाने अलविदा जैसे सन्देशों की वजह से।"
"मतलब ?"
"वे सन्देश शीशे पर बहुत गहरे रंग की लिपिस्टिक से लिखे गये थे । मैंने माला को बहुत हल्की लिपिस्टिक लगाये देखा था। मैंने उसे कहा था कि हल्के रंग की लिपिस्टिक उसकी गोरी रंगत से बहुत मेल खाती थी । जवाब में उसने कहा था कि गहरे रंगों से उसे नफरत थी । कहने का मतलब है कि जिस गहरे रंग की लिपिस्टिक से वे सन्देश लिखे गये थे, वह माला की नहीं हो सकती थी। इसी से मुझे सुझा था कि शीशे पर जो कुछ लिखा हुआ था, वह किसी और ने लिखा था माला ने नहीं ।"
"घर क्या यह कम्बल ओढकर ही जाओगे ?"
"और क्या करूंगा ? अपने गीले कपड़े तो मैं पहनने से रहा और बिना कम्बल के... "
प्रभूदयाल मुस्कराया ।
"मुझे एक टैक्सी मंगा दो।" - सुनील बोला ।
"मेरे पास गाड़ी है ।" - कालीचरण व्यग्र स्वर में बोला - "मैं तुम्हें घर छोड़ आता हूं।"
“अच्छी बात है ।”
उसने प्रभूदयाल से विदा ली, अपने कपड़े और जूते उठाये और नंगे पैर चलता, कम्बल में लिपटा, कालीचरण की गाड़ी में आ बैठा ।
“किधर चलूं ?" - कालीचरण ने पूछा ।
"बैंक स्ट्रीट ।" - सुनील बोला ।
कालीचरण ने गाड़ी बैंक स्ट्रीट की दिशा में भगा दी ।
"मैं जानता हूं तुमने मुझे लिफ्ट क्यों दी है ?" - सुनील धीरे से बोला ।
कालीचरण ने सड़क से निगाह हटाकर एक क्षण के लिये उसकी ओर देखा ।
"तुम हैरान हो कि मैंने प्रभूदयाल को यह क्यों नहीं बताया कि मोहन कपूर का कत्ल वास्तव में तुमने किया था ["
"हां । तुमने कैसे जाना ?”
"मेरा अनुमान है। क्योंकि तुम्हीं ने कहा था कि मोहन कपूर की तमाम खामियों के बावजूद नयना देवी को उससे बहुत प्यार था, बहुत मोह था और नयना देवी का यह मोह उसकी आखिरी सांस तक नहीं टूटा था । अगर तुमने यह सच कहा था तो नयना देवी अपने पति को गोली नहीं मार सकती थी।"
"मैंने सच कहा था।"
"जब नयना देवी नौजवान थी तब तुम भी नौजवान थे और उसके सैकेट्री थे । मेरा ख्याल है कि तुम्हें नयना देवी से मुहब्बत थी। इतनी खूबसूरत औरत के लगातार साथ रहकर कोई नौजवान आदमी उससे मुहब्बत किये बिना रह ही नहीं सकता था । तुमने देखा कि नयना देवी को मोहन कपूर बहुत तंग करता था और नयना देवी बहुत दुखी रहती थीं । तुमने एक तरह से नयना देवी को उसके दुखों से निजात दिलाने के लिये मोहन कपूर को गोली मार दी लेकिन उसके मर जाने के बाद तुम्हें मालूम हुआ कि मोहन कपूर कैसा भी था, नयना देवी उसे दिल से चाहती थी । मोहन कपूर एकाएक गायब हो गया तो नयना देवी को अलहदगी का वह सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने आत्महत्या कर ली। कालीचरण, कबूल करो, अपने मुंह से कबूल करो कि तुम्हीं ने मोहन कपूर को गोली मारी थी । ”
"हां । " - वह दबे स्वर में बोला- "मैंने उसे गोली मारी थी और मैंने ही उसे पीपल के पेड़ के नीचे दफनाया था । हाल ही में एक बार मैं नशे में पवन कपूर के सामने मुंह फाड़ बैठा था और उसे मालूम हो गया था कि उसके चाचा मोहन कपूर की लाश नयना देवी के बंगले में पीपल के पेड़ के नीचे दबी हुई थी । लेकिन मुझे यह मालूम नहीं था कि वह इस जानकारी को ऐसे खतरनाक ढंग से माला का कत्ल करने के लिये इस्तेमाल करने वाला था ।”
सुनील खामोश रहा ।
"मैं गाड़ी वापिस मोडूं ?" - कालीचरण ने पूछा । "किसलिये ?" - सुनील बोला ।
"शायद अब तुम इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल को बताना चाहो कि मोहन कपूर का असली कातिल कौन था !”
"तुम नयना देवी से बहुत मुहब्बत करते थे ?"
"हां"
"दिल से ?"
"हां । क्या वही इस बात का काफी सबूत नहीं है कि उसको सुखी देखने की खातिर मैंने एक ऐसे आदमी का कत्ल कर दिया जिसमें मुझे अदावत नहीं थी ।"
"शायद तुमने सोचा हो कि मोहन कपूर के मर जाने के बाद वह तुमसे शादी कर लेगी !”
"मेरा ईश्वर गवाह है मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा । मोहन कपूर होता या न होता, मेरी नयना देवी से शादी नहीं हो सकती थी । उसके सामने मैं एक भिखमंगे की हैसियत रखता था । मेरा उसका कोई मुकाबला नहीं था । "
“प्यार में ऐसी बातों की कोई अहमियत नहीं होती ।"
"लेकिन मैंने अपना प्यार कभी नयना देवी पर जाहिर भी तो नहीं किया था । उसे नहीं मालूम था कि मैं उससे प्यार करता था । मैं अपने एकतरफा प्यार से ही पूरी तरह खुश था । मैं उसे देख लेता थे, उससे बात कर लेता था, उसके सामीप्य का सुख भोग लेता था, इसी से मुझे तृप्ति होती थी
"जब वह मर गई तो तुम्हें कैसा लगा ?"
"मुझे लगा कि जैसे प्रलय आ गई । मुझे तबाही ही तबाही दिखाई देने लगी। मैं उसके साथ तो न मर सका लेकिन, मेरे भाई, मैं केवल देखने में ही जिन्दा हूं । भीतर से मैं हजार-हजार मौतें मर चुका हूं। आज नयना देवी को मरे बीस साल हो गये हैं लेकिन मुझे मौत कल की बात लगाती है । मोहन कपूर की हत्या के इलजाम में अगर मैं पकड़ कर फांसी पर चढा दिया गया होता तो यह मेरे लिये बहुत कम, बहुत मामूली सजा होती । हर रोज मरने से तो एक बार मर जाना कहीं बेहतर है । "
"तुमने शादी नहीं की ?"
"पागल हुए हो ! मैंने अपनी सारी जिन्दगी में नयना देवी के अलावा किसी दूसरी औरत की तरफ झांका तक नहीं"
"यहां से दायें मोड़ लेना । आगे बैंक स्ट्रीट है।"
"तुम मुझे पुलिस को नहीं सौपोगे ?”
"नहीं।"
"क्यों ?"
"कत्ल के इलजाम में जितनी सजा के तुम हकदार हो, उससे कहीं ज्यादा सजा तुम भुगत चुके हो। और अभी और भुगतोगे । गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा !”
कालीचरण के मुंह से एक आह-सी निकली । वह चुपचाप कार चलाता रहा ।
सुनील को लगा जैसे वह उससे अपने आंसू छुपाने की कोशिश कर रहा हो ।
समाप्त
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