अगले दिन उसने अपने जनरल मैनेजर माथुर के साथ मुर्गियां मारने जाने का प्रोग्राम बनाया । माथुर ने उसे अभियान में कोई विशेष उत्साह न दिखाया लेकिन अरविन्द की जिद पर वह जाने के लिए मान गया ।


दोनों की वह बात ब्रेकफास्ट टेबल पर सारे मेहमानों के सामने हुई थी। किसी ने उनके प्रोग्राम का कोई खास नोटिस नहीं लिया लेकिन न जाने क्यों मालती माथुर की आंखों में वहशत की छाया तैर गई । उसकी आंखों का वह भाव शुक्ला ने भी देखा । उसने एक चेतावनी भरी निगाह अरविन्द पर डाली ।


अरविन्द ने उस निगाह का कोई मतलब समझने की कोशिश नहीं की। अपनी-अपनी रायफलें सम्भाले वे दोनों एक डोंगी में सवार हुये और मुर्गियों के शिकार के लिए रवाना हो गये ।


चप्पू चलते हुए वे नदी में आगे बढ़े। मौसम सुहावना था । आसमान पर सफेद बादलों के गोले उड़ रहे थे । नदी के आसपास का जंगल पशु-पक्षियों की आवाजों से गूंज रहा था । नदी के दहाने पर खड़ा एक बारहसिंघा पानी में चलते चप्पुओं की आवाज सुनकर कुलांचे मारता हुआ वहां से भागा और जंगल में गायब हो गया ।


"इत्तफाक से" - एकाएक माथुर बोला- "आपसे अकेले में बात करने का मौका है इसलिए मैं एक बात कहना चाहता हूं।"


"क्या ?" - अरविन्द सहज भाव से बोला ।


"मेरे ख्याल से आपको अपने कारोबार से यूं अलग नहीं हो जाना चाहिए । मैं जनता हूं मैं आपसे कोई नई मेहरबानी हासिल करने का हकदार नहीं । आप पहले ही मुझ पर भारी अहसान कर चुके हैं। आपने मुझे ऐसा सबक सिखाया है जिसे मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकता । आप चाहे इसे मुझ पर मेहरबानी मानें या कुछ और लेकिन मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि अगर आपने अपना कारोबार अपने कर्मचारियों को सौंप दिया तो उनकी जिंदगियां तो संवर जायेंगी लेकिन कई और जिन्दगियां तबाह भी हो जायेंगी ।"


" ऐसा कुछ नहीं होगा । तुम्हारे समेत कुछ लोगों के ठाट-बाट में थोड़ी कमी जरूर आ जायेगी लेकिन तबाह कोई नहीं होने वाला । और जो फैसला मैं कर चुका हूं, उस पर अमल जरूर करूंगा । यहां से लौटते ही शुक्ला मेरे कारखाने का मालिक मेरे कामगारों को बनाने का सब इंतजाम कर देगा । मैं एक नई वसीयत भी तैयार करवा रहा हूं जिसके अन्तर्गत मेरी मौत के वावजूद भी यह काम होकर रहेगा।"


“आप देसाई की खिलाफत से आशंकित नहीं ?"


"क्या मतलब ?"


आपके कारोबार से हाथ खींच लेने के बाद क्या वह आपकी कम्पनियों को तबाह करने पर नहीं तुल जायेगा ? क्या आप यह महसूस नहीं करते कि आपके मजदूर आप जैसी काबलियत से आपका कारोबार नहीं चला सकते ?"


"लेकिन तुम तो चला सकते हो । आखिर तुम जनरल मैनेजर हो। "


“आपकी सरपरस्ती के बिना मैं इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं उठा सकता ।”


"लेकिन मैं तो हमेशा हर किसी की जिम्मेदारी नहीं उठाये रह सकता । मुझे भी तो चैन चाहिए । मैं भी तो सारी जिन्दगी कोल्हु का बैल नहीं बना रहना चाहता ।"


"लेकिन...”


"मौसम सुहाना है, माथुर । उसका आनन्द उठाओ।"


माथुर खामोश हो गया ।


"मुर्गियां तो कहीं दिखाई नहीं दे रही ।"


“आगे होंगी।" - वह एक क्षण को ठिठका और फिर बोला - "यह नदी का बहाव तेज क्यों होता जा रहा है ?"


" आगे झरना है । मालूम नहीं क्या तुम्हें ?"


"नहीं ।”


"झरने की आवाज नहीं सुनाई दे रही तुम्हें ?"


"मैं उसे तेज हवा का बहाव समझा था।"


"आगे झरना है। दो साल पहले एक बार उसमे गिरने से बाल-बाल बचा था । उस बार मेरे साथ तुम्हारी ही तरह जो आदमी था, वह नहीं जनता था कि डोंगी ऐसी नाव है जो जरा भी संतुलन बिगड़ने से उलट सकती है । वह एकाएक डोंगी से उतर गया । मैं अपना चप्पू पहले ही किनारे पर फेंक चुका था । डोंगी असंतुलित होते ही एकदम धार के साथ बह निकली । उसने किनारे पर से उठाकर चप्पू मेरी ओर फेंक देने की समझदारी न दिखाई होती तो मैं डोंगी को हरगिज काबू में न कर पाया होता । मैं झरने में बह जाता और फिर डोंगी समेत मेरे पुर्जे उड़ जाते।"


"झरना बहुत नीचे जाकर गिरता है ?"


"हां । कम से कम सौ फुट का फाल है ?”


“ओह ।”


“उधर देखो । उधर खरगोश हैं । मुर्गियां नहीं दिखाई दे रही हैं तो एकाध खरगोश ही हो जाए।"


उसने डोंगी को नदी के रेतीले किनारे की तरफ खेना आरम्भ कर दिया । वह पहले ही यह बात देखकर जा चुका था कि उस रेतीले किनारे के साथ डोंगी एक ही धक्के से नदी के तेज बहाव में पहुंच सकती थी और सवार के पास चप्पू न होने की सूरत में निश्चय ही झरने में जाकर गिर सकती थी । वहां पानी इतना गहरा था और उसका बहाव इतना तेज था कि वहां से नदी में तैर कर भी नहीं निकला जा सकता था ।


क्या माथुर उसका काम तमाम करने का वह सुनहरा मौका इस्तेमाल करेगा ?


डोंगी के तले के साथ ऐसी स्थिति में एक अतिरिक्त चप्पू बंधा था कि अरविन्द जब चाहता, उसे वहां से खींच सकता था ।


झरने का गर्जन अब तेज होता जा रहा था ।


कत्ल के लिए क्या शानदार ठिकाना था वह ।


अरविन्द के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।


अब वह मन-ही-मन प्रार्थना कर रहा था कि माथुर उसे पानी में धक्का दे ही दे ताकि सस्पेंस खत्म हो । या तो वह मर जायेगा या फिर उसके सिर पर मंडराता मौत का खतरा हमेशा के लिए टल जाए ।


“वहां डोंगी रोकेंगे हम ।" - अरविन्द अपने सामने किनारे के एक स्थान की ओर संकेत करता हुआ बोला ।


"वह जगह तो झरने के बहुत करीब है।"


"चलेगी । वहां से एक तलाब करीब है। वहां मुर्गियां जरूर होंगी।"


अब नदी का बहाव बहुत तेज हो गया था। अपने सामने अब उन्हें एक सीधी रेखा दे रही थी जिससे आगे नदी झरने का सूरत अख्तियार कर रही थी । वहां पानी में इतनी झाग उठ रही थी कि नदी की सारी सतह दूध जैसी सफेद हो रही थी । झरने का घन गर्जन अब उनके कानों का पर्दा फाड़ रहा था । ऐसा लगता था जैसे अभी डोंगी लहरों के काबू में आकर झरने में जा गिरेगी।


दोनों ने डोंगी का रुख मोड़ा । कुछ क्षण बाद उसका अगला सिरा किनारे की रेत के साथ छुआ ।


अरविन्द डोंगी में नदी की ओर वाले छोर में बैठा था । माथुर डोंगी में से किनारे पर उतरा तो डोंगी उसकी तरफ से ऊंची उठ गई । माथुर ने अपना चप्पू किनारे पर फेंका दिया और उसने डोंगी के उस छोर को एक हाथ से थाम लिया उसके दूसरे हाथ में उसकी रायफल थी ।


अरविन्द ने भी अपना चप्पू किनारे पर उछाल दिया और अपनी जेब से पैकेट निकाल कर एक सिगरेट सुलगाने का प्रयास करने लगा ।


उस वक्त डोंगी को किनारे से दिया गया एक धक्का उसकी इहलीला समाप्त कर सकता था । माचिस की पहली तीली से सिगरेट न सुलग सकी । उसने नई तीली सुलगाई ।


माथुर डोंगी को खींचकर और किनारे करने की कोशिश कर रहा था । उसकी इस कोशिश में डोंगी डगमगाई और अरविन्द नदी में गिरते-गिरते बचा । तभी डोंगी का तला किसी सख्त चीज से टकराया और वहां बंधा अतिरिक्त चप्पू वहां से खुल गया और डोंगी के नीचे से निकलकर उससे परे पानी में तैरने लगा । उस तीसरे चप्पू पर माथुर की निगाह पहले पड़ी । चप्पू एक बार गोल घूमा, और तेज पानी के साथ बहता हुआ झरने में जा गिरा। पलक झपकते ही वह निगाहों से ओझल हो गया था ।


माथुर ने कांपते हुए अरविन्द की तरफ देखा ।


अरविन्द इतनी शर्मिंदगी महसूस करने लगा कि एक बार भी उसके मुंह से बोल न फूटा । उसे उम्मीद नहीं थी कि ऐसी गड़बड़ हो जाएगी कि माथुर उसके इरादों को समझ जाएगा।


वह किनारे पर पंहुचा ।


“आप” - माथुर कम्पित स्वर में बोला- "मुझसे यह उम्मीद कर रहे थे कि मैं पहले किनारे पर पहुंचकर आप समेट डोंगी को वापिस नदी में धकेल दूंगा? आपने मुझे शह दी ?"


"हां।" - अरविन्द ने स्वीकार किया ।


"लेकिन अगर मैंने ऐसा कर दिया तो आप डोंगी के नीचे बंधा चप्पू निकालकर डोंगी को झरने में गिरने से बचा लेते ?"


"हां । मुझे तो एक क्षण के लिए लगा भी था कि तुम मुझे धक्का देने वाले थे । "


माथुर कई क्षण हैरानी और अविश्वास भरी निगाहों से उसे देखता रहा ।


"ओह" - अन्त में उसके मुंह से निकला - "तो यह बात है । अब मेरी समझ में यह भी आ रहा है कि बद्री कैसे मरा और यह भी कि कुछ खास-खास लोगों को ही लॉज पर क्यों बुलाया गया है । आप बारी-बारी हम लोगों का इम्तिहान ले रहे हैं । "


"करेक्ट ।"


“आपको कुछ भी करने का हक है । आप मालिक हैं । आप मेरा कैसा भी इम्तिहान लेने के हकदार हैं। मैं आपके अहसानों के नीचे दबा हुआ हूं। दो साल पहले आपने मुझ पर तरस न खाया होता तो आज मैं जेल में होता । लेकिन फिर भी मैं आपसे हमेशा भयभीत रहता हूं । आप चाहें तो मुझे आज भी जेल भेजवा सकते हैं । इस खतरे की तलवार मैं अपने सिर पर हर क्षण लटकी महसूस करता हूं और जाहिर है कि, इससे निजात पाना चाहता हूं । यह बात आप भी जानते हैं । इसलिए शायद आपने मुझे यह मौका दिया कि मैं आपका खून करके हमेशा के लिए अपनी जान को सांसत से निकाल लूं । "


"हां | "


"लेकिन अरविन्द साहब, मैं ईश्वर की सौगंध खाकर कहता हूं कि मेरा ऐसा कोई इरादा कभी नहीं था । मैं आप जैसे मेहरबान आदमी की जान लेने की सपने में कल्पना नहीं कर सकता । अलबता मैं उस आदमी की जान लेने पर उतारू हो सकता हूं जो आपकी जान लेने पर आमादा हो ।”


"मुझे यह सुनकर खुशी हुई । "


“आप ने मुझे नई जिन्दगी बख्शी है, अरविन्द साहब|"


“अब तुम्हारी नई जिन्दगी हमेशा बरकरार रहेगी । समझ लो तुम्हारे सिर से खतरे की तलवार हट गई । समझ लो मैंने तुम्हारा हल्फिया बयान फाड़ दिया ।”


माथुर के आंखों में कृतज्ञता के आंसू तैर गए ।


***


वे लॉज मैं लौटे तो उन्होंने सबको ड्राइंग रूम में मौजूद पाया । 


हर कोई जंगल में मौजूद अजनबियों का ही चर्चा कर रहा था । अरविन्द को उन्होंने बताया कि वे सब झील के पार होकर आये थे और उन्होंने वह स्थान देखा था जहां पिछली रात किन्हीं लोगों ने डेरा जमाया था ।


"जरूर बद्री की मौत में भी उन्हीं अजनबी लोगों का हाथ है।" - मोहिनी ने अपनी राय पेश की।


"यह कैसे हो सकता है ?" - अरविन्द बोला- "इसका मतलब यह हुआ कि उन अजनबी लोगों में कोई एक तीर कमान चुराने के लिए लॉज में भी आया था । मुझे यह बात मुमकिन नहीं लगती ।”


 अधिकतर लोगों ने अरविन्द की बात से सहमति प्रकट की ।


“काम इतना असंभव तो नहीं ।" - शुक्ला बोला - "मेरे ख्याल से तो कल हमको जंगल में जाना चाहिए और सामूहिक रूप से उन अजनबियों की तलाश शुरू करनी चाहिए।"


" आज ही क्यों नहीं ?" - मोहिनी बोली ।


'आज बहुत देर हो चुकी है। अन्धकार हो जाने पर जंगल में भटक जाना आसान है हम कल सुबह तलाश शुरू करेंगे ।"


सबने सहमति प्रकट की।


अरविन्द ने देखा उसकी मंगेतर एक सोफे पर उसकी उसके पार्टनर के साथ जरूरत से ज्यादा सटकर बैठी हुई थी ।


उसे और माथुर को सलामत लौटा देखकर मालती के चेहरे पर ऐसी राहत के भाव आए थे कि अरविन्द को उस पर तरस आने लगा था और उसका जी चाहने लगा था कि वह वहीं उसको तसल्ली दे कि अब उन तीनों के बीच चिंता और उद्वेग का वातावरण हमेशा के लिए खत्म हो गया था । लेकिन उसे उम्मीद थी कि मालती वैसे भी ये बात समझ जाएगी ।


वह अपने कमरे में पंहुचा ।


उसने स्नान करके कपड़े बदले ।


डिनर का समय हो गया था लेकिन उसका नीचे जाने का जी नहीं कर रहा था। जंगल में मौजूद अजनबियों का ख्याल उसके दिमाग से निकल नहीं पा रहा था । उसने जवाहर सिंह को बुलाकर खास तौर से पूछा था कि क्या उसे ऐसा कोई आभास मिला था कि उसके किसी मेहमान का किन्हीं बाहरी लोगों से सम्पर्क था ?


जवाहर सिंह को वैसी कोई जानकारी नहीं थी ।


उसने अपने लिए विस्की का एक पैग बनाया और उसकी चुस्कियां लेते हुए सोचने लगा ।


पहली बार उसके जहन में यह ख्याल आया कि उसके कत्ल की कोशिश में उसकी मंगेतर मोहिनी का हाथ हो सकता था । मूल रूप से क्योंकि वो आमंत्रित नहीं थी इसलिए कत्ल के सन्दर्भ में उसने उसके बारे में सोचा नहीं था ।