पहरेदारी करने दो ताकि तुम्हें आराम का मौका मिल सके।"


अरविन्द ने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया ।


उस रोज और कोई नई घटना नहीं घटी |


उस रात भी अरविन्द सो न सका । जंगल में अपने स्लीपिंग बैग में लेटा वह सारी रात करवटें बदलता रहा । नींद न आने की वजह यह थी कि वह अपने आक्रमणकारी से भयभीत था बल्कि यह थी कि उसे मंजुला का इंतजार था । मंजुला को उसने खुद वहां आने से मना किया था लेकिन फिर भी उसे उसका इंतजार था । वह मानता था कि मंजुला के बारे में सोचना मूर्खता थी लेकिन यह भी हकीकत थी कि उसी के बारे में सोचते रहने की वजह से उसे नींद नहीं आई थी ।


अगली सुबह ब्रेकफास्ट के समय उसकी सूरत पर फटकार बरसती सबने महसूस की।


फिर लोग शिकार पर रवाना होने लगे । महेन्द्र उस रोज भी मछली ही पकड़ने गया । मोहिनी को शायद अपने दो दिनों के व्यवहार से शर्म आ गई । उसने अरविन्द से जिद की कि वह उसके साथ स्विमिंग के लिए चले । उसने मोहिनी की जिद मान ली ।


उस रोज दोपहर तक काफी गर्मी हो गई । ठन्डे पानी में तैरने ने उसे काफी हद तक तरोताजा कर दिया । वह सारी दोपहर उसने कभी तैरते, कभी डॉक पर सुस्ताते और कभी मोहिनी और मालती माथुर से जो कि बाद में वहां आ गई थीं बातें करते गुजारी। -


मंजुला ने पिछले रोज के बारे में अगर मालती से कोई बात की थी तो कम-से-कम मालती ने उसका कोई आभास न दिया ।


वे लंच पर रवाना होने जा रहे थे तो उन्हें झील की छाती को तेजी से चीरती महेन्द्र की डोंगी उधर आती दिखाई दी।


"लगता है फिर कोई बड़ी मछली पकड़ ली है इसने ।” मालती माथुर बोली - “तभी किनारे पे पहुंचने को इतना उतावला हो रहा है ।"


लेकिन यह बात नहीं थी ।


अभी वह किनारे से दूर ही था कि उसने अरविन्द को आवाजें लगानी शुरू कर दीं ।


“क्या बात है ?" - अरविन्द उत्सुक भाव से बोला ।


"झील के दूसरे किनारे पर रात कोई था ।” - महेन्द्र उतेजित स्वर में बोला ।


"कौन ?" "पता नहीं ।” 


"कैसे जाना ?"


महेन्द्र डोंगी में से कूदकर किनारे पर आया और बोला "मैं झील के परले सिरे पर उतरा था। मैंने वहां बुझी हुई राख का ढेर देखा । उसमें कुछ आग सुलग कर बुझ चुकी थी । लकड़ियां अभी भी मौजूद थीं। राख के आस-पास खाने-पीने के सामान की बचत खुचत भी बिखरी हुई थी।"


"तुमने वहां किसी को आवाज भी लगाई थी ?"


"नहीं।"


"क्यों ? लगानी थी । शायद कोई वहां आस-पास ही होता।"


" मैं अकेला था । वह जगह बहुत दूर थी। मेरे पास कोई हथियार भी नहीं था। मैंने सोचा कैसे आदमी हैं वो । अगर वो ठीक आदमी होते तो लॉज पर जरूर आये होते । मैंने सोचा हो सकता था कि वे फरार अपराधी हों जो पुलिस से छुपने की नीयत से वहां आये हों । ऐसे लोग तो मुझे देखते ही गोली चला सकते थे।"


"मुझे दिखाओ वह जगह ।”


तुरन्त मालती माथुर की आंखों में भय की छाया तैर गई


"छोड़ो" - मोहिनी भी बोली- "तुम्हें क्या ?"


"मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं" - अरविन्द बोला - "जो यहां पहुंच तो जायें लेकिन फिर मुझ से परहेज करें ।"


"बेकार बातों में टाइम बरबाद करते हो । तुम्हारे पास मेरे लिए टाइम नहीं, लेकिन उन अजनबियों के लिए टाइम है जिनकी तुमने सूरत तक नहीं देखी ।"


“नानसेंस ।"


"नानसेंस ही सही । लेकिन मेरी एक बात सुन लो । अगर तुम जल्दी वापिस नहीं लौटे तो हो सकता है मैं मलकानी के साथ फ्लर्ट करने लगूं ।"


"मेरा पार्टनर बेचारा गउ आदमी है । "


"अच्छा । लेकिन मेरे बारे में क्या ख्याल है ? "


अरविन्द ने जवाब नहीं दिया । वह महेन्द्र वर्मा की डोंगी में सवार हो गया और झील के दूसरे किनारे की तरफ खेने लगा ।


दूसरे किनारे पर महेन्द्र की बताई जगह तलाश करने में कोई दिक्कत नहीं हुई । उस जगह का जैसा जिक्र किया था, वह वैसी ही मिली ।


लेकिन एक चीज उसने और भी देखी ।


उस जगह से थोड़ी दूर उसने झोपड़ियों में छुपी एक डोंगी देखी।


फिर उसने जंगल की तरफ मुंह करके जोर-जोर से 'कोई है, कोई है' की आवाजें लगाई लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला । अगले तीन घंटे में उसने न केवल वह इलाका छान मारा बल्कि वह नदी का भी दो मील आगे तक चक्कर लगा आया ।


उसे न केवल कहीं कोई नहीं मिला बल्कि उसे किसी के वहां आने या वहां से जाने की चुगली करने वाले कोई निशान भी नहीं मिले ।


यह और भी ज्यादा हैरानी की बात थी । डोंगी झील में थी । अगर उसे नदी से झील तक खुश्की पर से लाया गया होता तो उसके निशान रह जाने अवश्यम्भावी थे | जरूर ऐसे निशान बाद में बड़ी सावधानी से किसी ने नष्ट कर दिये थे ।


लेकिन क्यों ?


उसे जवाब न सूझा |


फिर वापसी में उसे एक ऐसा जवाब सूझा जिसने उसकी फिक्र में और भी इजाफा कर दिया ।


***


उसी शाम उसकी मंजुला से मुलाकात हुई ।


रजनी बाला के जोर-जोर से बोलने की आवाज सुनकर वह अपने कमरे से बाहर निकला । उसने देखा वह मंजुला पर गर्ज-बरस रही थी ।


"देखो तो" - अरविन्द को देखते ही वो बोली- "मैंने इसे कहा मेरा एक ब्लाउज प्रेस कर दे । कमबख्त ने जलाकर ही रख दिया। और ऊपर से कहती है कि मैंने इसे प्रेस करने के लिए कहा ही क्यों था !"


"ठीक ही तो कहती है ।" - अरविन्द अनायास ही मंजुला की तरफदारी करने लगा- "इसका काम तुम्हारे कपड़े प्रेस करना थोड़े ही है ।"


रजनी बाला अपना गुस्सा भूल गई । वह अवाक अरविन्द का मुंह देखने लगी । शायद उसे अरविन्द से ऐसे जवाब की आशा नहीं थी ।


फिर वह पांव पटकती हुई अपने कमरे में घुस गई । उसने भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया ।


मंजुला माथुर दम्पति के कमरे की तरफ बढ़ी | अरविन्द उसके पीछे हो लिया । वह ऐसा करना भी नहीं चाहता था लेकिन पता नहीं कौन सा सम्मोहन था जो उसे ऐसा करने पर मजबूर कर रहा था ।


"सॉरी।" - कमरे में पहुंचकर बोली ।


"किस बात के लिए ?" - अरविन्द हैरानी से बोला ।


"कि मैंने आपके मेहमान का एक ब्लाउज जला डाला


“अरे गोली मारो ब्लाउज को और मेहमान को भी । तुम मुझे यह बताओ कि कल तुम अपनी पहरेदारी की ड्यूटी पर हाजिर क्यों नहीं हुई थी ?"


" आप ने ही तो मना किया था । "


"मैं तो सारी रात जागता रहा और तुम्हारा इन्तजार करता रहा था ।”


"मुझे मालूम था ।" - उसकी आंखों में एक शैतानी चमक पैदा हुई ।


"क्या ?"


" कि आप सारी रात मेरा इंतजार करेंगे।"


"तुम तो बड़ी दुष्ट लड़की हो ।”


“हां । "


"क्या हां ।"


"बड़ी दुष्ट लड़की हूं।"


"जानती हो इस वक्त मेरा जी क्या चाह रहा है । "


“बताइये ।”


"कि मैं तुम्हें कोई सजा दूं ।"


"कैसी सजा ?”


"तुम्हें दो चार तमाचे लगाऊं ?"


वह उसके एकदम समीप आ खड़ी हुई । उसने अपना फूल सा चेहरा उठाकर उसकी आंखों में झांका और फिर बोली- "जरा मेरा चेहरा देखिये । "


"देख रहा हूं।" - अरविन्द का स्वर एकाएक उसके गले में फंसने लगा ।


"हम पर तमाचा जड़ने का दिल कर आयेगा आपका ?"


एकाएक अरविन्द ने उसे अपनी बांहों में भर लिया । वह लता की तरह उसके साथ लिपट गई । उसने अपने तपते हुए होंठ उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे अधखुले होंठों पर रख दिये ।


उसकी आंखें अपने आप बंद होने लगी ।


फिर - जैसे एकाएक उसने उसे अपने आलिंगन में भर लिया था, वैसे ही एकाएक उसने उसे अलग कर दिया ।


“पता नहीं मैंने ऐसा क्यों किया ।" - वह भराये स्वर में बोला - "मुझे माफ कर देना । प्लीज । "


और वह दरवाजे के तरफ बढ़ा ।


"मैं रात को पहरेदारी कि लिए हाजिर होऊं ?" मंजुला ने पीछे से आवाज दी ।


"नहीं।" - अरविन्द बिना गर्दन घुमाये बोला - "खबरदार।"


अपने कातिल की तलाश की कोशिश को किसी अन्जाम तक न पहुंचते पाकर अब वह बोर होने लगा था । ऊपर से अब उसे इस बात की भी चिंता सता रही थी कि जंगल में कौन था । और भी ऊपर से अभी उससे मंजुला ने बुरी तरह आन्दोलित कर दिया था । इन तमाम बातों का सामूहिक नतीजा उसने यह निकाला कि उसे तरीके से आराम की जरूरत थी ।


उस रात उसने अपनी पहरेदारी पर एक गार्ड तैनात करके अपने आरामदेह बेडरूम में ही सोने का फैसला किया ।


डिनर के तुरंत बाद उसने अपने मेहमानों से विदा ली और अपने कमरे में आ गया। अपनी रखवाली के लिए उसने जवाहर सिंह को बुलाने का फैसला किया हुआ था लेकिन जब वास्तव में वह घड़ी आई तो हर किसी के प्रति अविश्वास ने उसके मन में ऐसा सिर उठाया कि उसने जवाहर सिंह को तलब करने का ख्याल छोड़ दिया। उसने बड़ी सावधानी से अपने बैडरूम को बन्द किया, वहां से दो कम्बल उठाये और फिर पूरी सावधानी के साथ खिड़की के रास्ते दूसरी मंजिल की छत पर पहुंच गया ।


उसका अपने बैडरूम में सोना तो खतरनाक थी ही, अब उसे जंगल कि तन्हाई में भी सोना भी असुरक्षित लगने लगा था । वह संतुष्ट था किसी ने उसे दूसरी मंजिल की छत तक चढ़ते नहीं देखा था और किसी को उसके वहां होने का ख्याल भी आने वाला नहीं था ।


उसने एक कम्बल नीचे बिछाया और दूसरे को ओढ़ कर सो गया । नींद उसके लिए जरूरी थी । कोई आदमी बिना सोये इक्की

स आदमियों द्वारा प्रस्तुत जान के खतरे का मुकाबला नहीं के सकता था । और अब तो जंगल में मौजूद अनजाने लोगों का भी खतरा था । वह बड़ी इत्मीनान की नींद सोया ।


***