पिछले रोज की तरह चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर उसकी नींद नहीं खुली । पता नहीं कैसे वातावरण में वैसा कोई शोर मचने से पहले ही उसकी आंख खुल गई ।
उसके समीप एक औरत खड़ी थी ।
उसकी खुली आंखें देखते ही एकाएक वह घूमी और वहां से भाग निकली ।
अरविन्द बड़ी फुर्ती से स्लीपिंग बैग से निकला और उसके पीछे भागा । थोड़ी दूर जाने के बाद अरविन्द ने उसे पकड़ लिया। उसने अरविन्द के पकड़ से छूटने की कोशिश नहीं की ।
अरविन्द ने उसे बांह पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया । वह मालती माथुर की सेक्रेट्री मंजुला थी ।
"क्या मेरी बांह तोड़कर ही मानोगे !" - वह धीरे से बोली ।
अरविन्द ने उसकी बांहें छोड़ दी ।
मंजुला को वहां देखकर उसे बेहद हैरानी हुई थी । कम से कम उसकी उसे वहां उम्मीद नहीं थी ।
"तुम" - वह बोला- "तुम यहां क्या कर रही हो ?"
"मुझे अफसोस है" - वह बोली- "कि मेरी वजह से आपकी नींद खुल गई।
"तुम.. कल भी तुम यहां आई थी ?"
"हां | "
"क्यों ?"
"क्यूंकि मुझे नींद में आपकी सूरत देखना अच्छा लगता है ?"
"क्यों ? क्यों अच्छा लगता है ?"
"क्योंकि मैं आपसे मुहब्बत करती हूं।"
"क... क्या ?"
“बचपन से ही । जब मैं छ: साल की थी।"
"क्या कह रही हो ?"
“आप मुझे भूल गए क्योंकि मैं बच्ची से बड़ी हुई हूं लेकिन मैं आपको नहीं भूली हूं क्यूंकि जब मैं छ: साल की थी, आप तब भी ऐसे ही थे ।
" तुम... तुम हो कौन ?"
"मंजुला ।”
"वह तो तुम हो । इसके अलावा और क्या हो तुम ?"
“अरविन्द साहब, कभी हम कलकत्ता में आपके पड़ोस में रहते थे । तब आप मुझे और इलाके के बच्चों को घुड़सवारी सिखाया करते थे।"
"कलकत्ते में ?"
"हां । मेरे पिता का नाम अमरनाथ गुप्ता है ।"
"जिनका कपड़े का व्यपार था ?"
"हां । "
"तुम उनकी बेटी हो ?"
"हां । कहा न ।”
"लेकिन किसी पैसे वाले आदमी की बेटी किसी की एक मामूली सेक्रेट्री कैसे हो सकती है ?"
"हो सकती है । "
"किस्सा क्या है ?"
"मेरे पिता मर चुके हैं। सट्टे में अपनी सारी दौलत गवां कर उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। मेरी मां उनके गम में उनके थोड़ी देर बाद ही मर गयी थी । आज मैं खुदा का शुक्र मानती हूं कि मैं मिसेज माथुर की सेक्रेट्री तो हूं वर्ना मेरे लिए फाकाकशी की नौबत आ सकती थी ।"
"तौबा ! इतने बड़े आदमी की बेटी को इतने बुरे दिन देखने पड़े।"
"कहां हैं बुरे दिन ? मौज तो कर रही हूं मैं । यह मौज नहीं तो क्या है इस वक्त मैं आपकी मेहमाननवाजी का आनन्द ले रही हूं जो सिर्फ बड़े.. बहुत बड़े लोगों को हासिल है। "
अरविन्द के मानस पटल पर छ: साल की एक गुड़िया सी खूबसूरत बच्ची का अक्स उभरा ।
“और तुम मुझसे मुहब्बत करती हो ?" - वह मन्त्रमुग्ध स्वर में बोला ।
"बचपन से ही ।" - वह बोली ।
“अच्छा मुझे मालूम नहीं था ।"
वह खामोश रहा । अब उसे सूझा कि मंजुला उसे जानी पहचानी क्यों लगा करती थी। उसके अचेतन मन पर कहीं उसकी छवि स्थायी रूप में अंकित थी ।
"मैं इस वीरान जगह पर आने को तैयार नहीं थी " - यह कह रही थी "लेकिन मुझे मालूम हुआ कि मिसेज माथुर आपकी मेहमान बनने जा रही थी तो मैं फौरन तैयार हो गई थी।"
"मालती तुम्हारी असलियत को जानती है ?" अरविन्द ने पूछा।
"हां । उन्होंने मुझे उस जहमत के बारे में बताया था जिसमें आजकल आप फंसे हुए हैं।"
"अच्छा ! मुझे तो ऐसा उसने कुछ नहीं कहा। "
"नहीं कहा होगा ।"
"तुम यहां क्या कर रही हो ?"
"कल मैंने आपको गलियारे की एक खिड़की में से देखा था जब आप अपने कमरे की खिड़की से निकल कर एक पेड़ पर चढ़े थे और नीचे उतरे थे। मैं बहुत हैरान हुई थी । मैंने फौरन आपके पीछे जाने का फैसला कर लिया था । उस वक्त मैं नंगे पांव थी लेकिन रजनी बाला के कमरे के दरवाजे के सामने एक जोड़ी सैंडिल पड़ी थी जो कि उसने पालिश करवाने के नीयत से वहां रख दी थी । मैं उन्हीं को पहनकर आपके पीछे यहां आ गई थी और सारी रात आपकी रखवाली करती रही थी ।"
"हे भगवान । तुम सारी रात मेरे सिरहाने बैठी रही ?"
"खड़ी रही ।"
"तुम्हारे पास कोई हथियार था ?"
"नहीं । लेकिन अगर मुझे आप पर कोई खतरा आता दिखाई देता तो मैं शोर मचा सकती थी।"
"पिछली रात भी तुम मेरी रखवाली करती रहीं ?"
"हां । "
"तुम मेरी खातिर दो रातों से जाग रही हो ?”
"मैं नींद पूरी कर लेती हूं अपनी । दिन में जब सब लोग तफरीह के लिए चले जाते हैं तो मेरे पास सोने का बहुत टाइम होता है।"
मालूम है ?" "मालती को तुम्हारी रात की इस पहरेदारी के बारे में
“हां । उनकी जानकारी के बिना तो यह बात मुमकिन ही नहीं।"
“कमाल है ।”
"अब मैं चलूं ?"
"हां । लेकिन जो कुछ तुमने कल और परसों रात किया, भगवान के लिए दोबारा मत करना । किसी औरत की पहरेदारी..."
वह हंसी ।
" और सुनो !"
उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से उसके तरफ देखा ।
"यह रिवाल्वर रख लो।" - वह उसे अपनी रिवाल्वर सौपता हुआ बोला - “अभी अंधेरा है और जंगल में तुम्हारे लिए खतरा हो सकता है । "
"लेकिन मैं तो जा रही हूं।"
"तुम अभी नहीं जा रही हो । पहले मैं जाऊंगा । तुम कम से कम आधे घंटे बाद यहां से निकलना ।”
"क्यों ?" - उसने बड़ी मासूमियत से पूछा ।
"क्योंकि अगर मेरी मंगेतर ने हम दोनों को एक साथ जंगल से निकलते देख लिया तो वह मेरी ऐसी तैसी कर देगी |"
"ओह !"
अरविन्द उसे वहीं खड़ा छोड़ कर जंगल से निकल गया और अपने पुराने रास्ते से अपने कमरे में पहुंच गया । उसने जवाहर सिंह को वहां से भेज दिया और पलंग पर लेट गया । वह छत पर निगाह टिकाये मंजुला के बारे में सोचने लगा ।
लड़की दीवानी तो नहीं थी ?
बचपन के मोह को अभी तक अपने मन में संजोये हुए थी। या इसमें मालती की कोई शरारत थी ।
मालती मंजुला को जानती थी । जरूर उसने जानबूझ कर ऐसा माहौल पैदा किया था कि उसकी और मंजुला की मुलाकात हो जाये । वह जनता था मालती को उसकी मंगेतर मोहिनी पसन्द नहीं थी । तो क्या मालती मोहिनी के विकल्प के रूप में मंजुला की तरफ उसका ध्यान आकर्षित करना चाहती थी ?
अपने विरुद्ध मालती के इस षडयन्त्र से अरविन्द खफा भी हुआ और खुश भी हुआ ।
मालती से बड़ा अरविन्द का हितचिंतक उस घड़ी में कोई नहीं था । अगर वह मंजुला को उसके काबिल मानती थी तो वह शर्तिया उसके काबिल थी ।
***
आने वाले तीन दिनों में उसने महसूस किया कि मंजुला को अपने जहन से निकालना उसके लिए असंभव था । उन तीन दिनों में मंजुला उसे बहुत कम दिखाई दी, जब भी दिखाई दी मोहिनी ने उसके बारे में कुछ न कुछ जरूर कहा ।
“नौकर-चाकर की नसल बड़ी खूबसूरत होती जा रही है।" - एक बार वह बड़े ईर्ष्यापूर्ण स्वर में बोली- "देखो तो कमबखत को । कैसी मुटिया रही है हराम का माल खा-खाकर ।"
उन दिनों में न केवल अरविन्द ने बल्कि हर किसी ने महसूस किया कि मोहिनी, जयन्त मलकानी की संगत कुछ ज्यादा ही कर रही थी । वह फैसला न कर सका कि ऐसा मोहिनी उसे चिढाने के लिए कर रही थी या उसका पार्टनर उसे ज्यादा ही भा गया था ।
उन तीन दिनों में वहां ऐसी घटनायें भी घटीं जिनका मौजूदा समस्या से वह कोई सीधा रिश्ता तो न जोड़ सका लेकिन जो रहस्यपूर्ण बहुत थीं, जो रात को उसे नींद नहीं आने देती थीं ।
पहले दिन की सुबह उस दिन जब उसका मंजुला जंगल में टकराव हुआ था, कोई खास घटना नहीं घटी थी । उसके मेहमान भी उस दिन बहुत निश्चिन्त दिखाई दिए थे। सुबह वे टेनिस खेलते रहे थे । देसाई ने बारहसिंघा मार दिया था । वह शिकार संयोगवश नहीं कर पाया था जहां उन दोनों की डोंगी नदी में उलटी थी । मलकानी और मोहिनी एक ऊदबिलाव का बच्चा पकड़ लाए थे। लॉज में वे घंटों उसके लिए एक घर बनाने की कोशिश करते रहे थे । लंच में देसाई का लाया हुआ बारासिंघा ही पका था जो कि सबने पसंद किया था । महेन्द्र ने इतनी बड़ी मछली पकड़ी थी कि अगर वह दिखाने के लिए मछली साथ न लाया होता तो कोई उसकी बात पर विश्वास न करता ।
फिर लंच के दौरान यह फैसला हुआ कि बद्री के अंतिम संस्कार में हर किसी को शामिल होना चाहिए था ।
एक खुले मैदान में बद्री की चिता चुनी गई थी और लॉज के इक्कीस लोग वहां मौजूद थे।
जवाहर सिंह ने चिता को आग लगाई।
तभी वहां नई घटना घटी ।
कहीं गोली चली थी ।
गोली की आवाज सबने सुनी । दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना में झुके सबके सिर एक साथ उठे । जंगल में कोई था जो गोली चला रहा था। अरविन्द की निगाह पैनी होती हुई सबके चेहरे पर टिक गई ।
लेकिन कैसे ?
सब तो वहां मौजूद थे ।
कोई भी तो गायब नहीं था ।
उसने बहुत कान लगाकर सुना लेकिन पहली आवाज के बाद दूसरी आवाज न हुई । शायद कोई पहली गोली में वांछित शिकार करने में कामयाब हो गया था । लेकिन जंगल मैं कौन था ?
उसकी लॉज और किसी नजदीकी दूसरी इमारत में कम से कम चार सौ मील का फासला था । क्या कोई शिकार खेलने वहां तक पहुंच गया था ? अगर ऐसा था तो वो लॉज में भी अपेक्षित था क्योंकि उसकी मेहमाननवाजी तो सारे इलाके में प्रसिद्ध थी और ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई लॉज के आसपास आये और उससे मिलकर न जाए। लेकिन फिर भी न जाने क्यों उसका दिल गवाही दे रहा था कि उस गोली को चलाने वाला आदमी वहां नहीं पहुंचने वाला था ।
उस शाम सूर्यास्त के समय राजेश शुक्ला उसे डॉक पर मिला । उस समय अरविन्द डोंगी पर सवार होकर जंगल में जाने की सोच रहा था ।
“गोली की आवाज तुमने भी सुनी थी ?" - शुक्ला ने पूछा।
"हां । लगता है जंगल में कोई शिकारी पहुंच गया है । वे जरूर कहीं डेरा डाले हुए होंगे। मैं तो सोच रहा हूं कि जंगल में उनकी तलाश में जाऊं ।"
“क्या जरूरत है ? कल तक वो खुद ही तुम्हारे हुजूर में पेश हो जाएंगे।"
"वह तो है । "
" या किसी नौकर-चाकर को भेज दो।"
"छोड़ो । कल तक इंतजार करते हैं ।"
अरविन्द, तुम बहुत थके हुए लग रहे हो । लगता है सोते नहीं हो तुम मेरा कहना मानो तो एकाध रात मुझे अपनी पहरेदारी करने दो ताकि तुम्हें आराम का मौका मिल सके।"
अरविन्द ने उसका प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया ।
उस रोज और कोई नई घटना नहीं घटी |
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