डिनर बड़ी खामोशी से चला । बद्री की मौत ने वातावरण को बोझिल बना दिया था ।


अरविन्द ने रजनी बाला से वायदा ले लिया था कि पहाड़ी पर जो कुछ हुआ था, उसका जिक्र वह किसी से नहीं करेगी । जब वो दोनों लॉज पर वापिस लौटे थे, जयन्त मलकानी और मोहिनी तब भी झील से वापस लौटे थे । अंधेरा होने के बाद जब वो वापिस लौटे थे तो मोहिनी का व्यवहार ऐसा था जैसे वह अरविन्द को जलाना चाहती हो।


“तुम्हें बिलकुल भी ऐतराज नहीं हुआ ?" - मोहिनी ने उससे पूछा । ने


"ऐतराज का मतलब तो यह हुआ।" - अरविन्द मदिरा की चुस्की लेता हुआ बोला- "कि तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं|"


"तुम्हारा पार्टनर तो बड़ा दिलचस्प आदमी निकला ।"


“क्यों न हो ?" - अरविन्द बात को पूरी तरह मजाक में लेता बोला - "आखिर पार्टनर किसका है।"


मलकानी बात को मजाक में न ले सका । उसने बेचैनी से पहलू बदला ।


फिर देसाई अपने उस रोज के शिकार के तजुर्बात सुनाने लगा ।


" आप लोगों से तो बारहसिंघे का शिकार हुआ नहीं।" ऊषा भटनागर बोली- "कल मैं बारहसिंघा मार कर लाऊंगी ।"


किसी ने उसकी बात को गंभीरता से न लिया ।


“तुम्हें शिकार करने आता है ?" - माथुर ने उससे पूछा


"हां ! खूब । नैरोबी में शिकार के चक्कर में ही तो मैं पहली बार अरविन्द से मिली थी । इसी से पूछ लो ।"


'अरविन्द से क्या पूछना ।" - देसाई बोला- "हमने वैसे भी सुना है कि तुमने बहुत बड़े-बड़े शिकार मारे हैं । "


अरविन्द ने चेतावनी भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा


वातावरण में एकाएक सन्नाटा छा गया ।


देसाई का इशारा ऊषा के पहले दो पतियों की रहस्यमयी मौत की तरफ था, यह किसी से न छुपा रहा ।


फिर खुद ऊषा ने ही खामोशी तोड़ी ।


"बिल्कुल !" - वह विष भरे स्वर में बोली- “सारी दुनिया जानती है मैंने बहुत बड़े-बड़े शिकार मारे हुए हैं । अपने दोनों पतियों का शिकार मैंने ही तो किया था। मैंने तो एक बार अरविन्द का शिकार करने की भी कोशिश की थी । इसके अलावा छोटे-मोटे कत्ल तो मैं कई बार कर चुकी हूं । उनके बारे में जानते हो या सुनाऊं ।"


देसाई बगलें झांकने लगा ।


डिनर के बाद वे सब ड्राइंग रूम में पहुंचे ।


मोहिनी अब भी अपने पार्टनर से मलकानी से चिपकी हुई थी । वे दोनों, रजनी बाला और देसाई ब्रिज की मेज जमा रहे थे। ब्रिज का दूसरा ग्रुप ऊषा भटनागर, राजेश शुक्ला, महेन्द्र वर्मा और कैलाश बिहारी माथुर ने बनाया हुआ था । केवल मालती माथुर की ही ताश के उस खेल में कोई दिलचस्पी नहीं थी । वह अरविन्द से बात करने का मौका तलाश कर रही थी ।


"मैं न तो नौजवान हूं, न खूबसूरत !" - वह उससे बोली "लेकिन मैं फिर भी तुमसे बात करना चाहती हूं । "


दोनों इमारत से बाहर आये ।


मालती अरविन्द को शुरू से ही बहुत पसंद थी । बेचारी के कोई औलाद न हुई थी लेकिन बहुत ममतामयी औरत थी वह । अरविन्द उसके घर अक्सर जाता था और उसके पति की गैरहाजिरी में भी उससे घंटों बात करता रहता था । मालती की वजह से उसने माथुर को छोड़ दिया था और उसे गबन के इल्जाम में जेल जाने से बचा लिया था ।


वे झील के किनारे पहुंचे ।


"तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो ?" - एकाएक वह बोला ।


"हां !" - उसने स्वीकार किया ।


"क्या ?"


“मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूं।"


"जो मर्जी पूछो। तुम जानती हो कि तुम से मैंने कभी कुछ नहीं छुपाया है । अगर तुम मेरी और रजनी बाला की सैर के बारे में पूछना चाहती हो तो हकीकत यह है कि मैंने उसकी उंगली तक नहीं पकड़ी थी। मेरी निष्ठा अभी भी मोहिनी के साथ जुड़ी हुई है। आखिर मैंने उससे शादी भी करनी है और...


"मेरे सवाल का इन बातों से कोई संबंध नहीं । मैं कुछ और पूछना चाहती हूं।"


" और क्या ?"


"देखो, मुझसे झूठ मत बोलना । क्या कल रात तुम्हारे धोखे में बद्री नाम के उस आदमी का खून मेरे पति ने किया था ?"


अरविन्द ने तुरंत उतर नहीं दिया । उसने गौर से मालती की सूरत देखी । उस पर चिंता और उद्वेग के बड़े तीखे भाव थे ।


"मुझे नहीं मालूम" - " अन्त में वह बोला- "लेकिन तुमने ये सवाल क्यों पूछा ?"


"देखो, तुम्हारे आज सुबह के व्यवहार से और लोग बेवकूफ बन गये थे लेकिन मैं नहीं बनी थी। मैं तुम्हारे भीतर की बात भांपने की औरों से ज्यादा काबलियत रखती हं । मैं सुबह ही समझ गई थी कि तुम झूठ बोल रहे थे । मेरा दिल तो यहां कदम रखते ही किसी अज्ञात आशंका से भर उठा था । जब तुम बद्री की मौत को दुर्घटना बता रहे थे, मैं तभी समझ गई थी कि बात कुछ और थी।”


वह एक क्षण ठिठकी और फिर बोली- "मैं नहीं जानती कि दो साल पहले मेरे पति और तुम्हारे बीच क्या हुआ था । लेकिन तब से वह बहुत तब्दील हो गया है । वह हमेशा तुम्हारी प्रशंसा के राग गाता था लेकिन बाद में पता नहीं उसे क्या हुआ था कि वह दफ्तर भी जाता था तो ऐसा लगता था जैसे बहुत बड़ी सजा भुगतने जा रहा हो । पहले वह मुझसे बहुत खुलकर बात किया करता था लेकिन अब वह मुझसे भी छुपाव बरतता है । कल रात वह बिलकुल नहीं सो पाया था । उसे नहीं मालूम लेकिन मैंने उसे दो तीन बार कमरे से बाहर जाते या वापिस लौटते देखा था । और तुम्हारी जानकारी के लिये तीर कमान चलाने में वह ओलंपिक में हिस्सा ले चुका है । "


"अच्छा ?" - अरविन्द के लिये वह एकदम नई बात थी


"हां । अब तुम मुझे साफ-साफ बताओ कि क्या कल रात का घातक तीर उसने चलाया था ? "


"मुझे नहीं मालूम ।"


"सच कह रहे हो ?"


"मैं तुमसे झूठ बोल सकता हूं ?"


"नहीं । लेकिन यह तो बताओ कि यह सब क्या हो रहा है ? इतना तो मैं जानती हूं कि कोई तुम पर घातक आक्रमण कर रहा है और तुमने यही जानने के लिये सब को यहां इकठ्ठा किया है कि वह आक्रमणकारी कौन है । मैं तुमसे इस बारे में इसलिए पूछ रही हूं कि हो सकता है मैं तुम्हारे इस अभियान में तुम्हारी कोई मदद कर सकूं ।"


"तुम बहुत अच्छी हो, मालती । लेकिन तुम्हें इस झमेले में पड़ने की कोई जरूरत नहीं । अब तुम मुझे एक सवाल पूछने दो।"


"क्या ?"


"जैसे तुम समझ गई हो, वैसे क्या और लोग भी समझ गये होंगे कि मेरी असली नीयत क्या है ?"


“नहीं । इसलिए नहीं क्योंकि तुम्हारे अन्तर में झांकने की मेरे जैसी शक्ति कोई नहीं रखता ।"


"फिर ठीक है ।"


उसके बाद वो वापिस लौट पड़े ।


वापिसी पर उन्होंने पाया कि केवल महेन्द्र, देसाई, शुक्ला और मलकानी ही अभी भी वहां जमे हुए थे, बाकी लोग अपने अपने कमरों में जा चुके थे ।


मालती वहां बिना ठिठके अपने कमरे की ओर बढ़ गई


बारह बजे के बाद पुरुषों ने भी वहां से विदा ली और अरविन्द वहां अकेला रह गया ।


उसने वहां मौजूद अपने हथियारों का मुआयना करना आरम्भ किया ।


कमान सभी यथा मौजूद थीं और उन्हें देखकर यह तक नहीं कहा जा सकता था कि उनमें से किसी को वहां से हाल ही में हटाया गया था ।


उस रात उसे सो पाना असम्भव लग रहा था । इसलिए वक्त गुजारने के लिए वह अपने कुछ ऐसे हथियार साफ करने लगा जिन्हें वह समझता था कि सफाई की जरूरत थी ।


उस वक्त उसके हाथ ही सफाई में व्यस्त थे, उसका दिमाग अभी भी उसकी वर्तमान समस्या पर ही लगा हुआ था ।


देसाई ने उस पर गोली चलाने की कोशिश की थी लेकिन बद्री पर तीर उसने नहीं चलाया था । लेकिन उसने तीर चलवाया हो सकता था। हो सकता था उसने किसी आदमी को रिश्वत देकर फोड़ लिया हो ।


लेकिन उसे यह थ्योरी जंची नहीं ।


जवाहर सिंह के आदमी धोखेबाज नहीं हो सकते थे ।


महेन्द्र को उसका कत्ल करने का बहुत शानदार मौका हासिल था लेकिन उसने उसे इस्तमाल नहीं किया था । लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं लगाया जा सकता था कि दूसरा मौका उसे हासिल नहीं होगा या दूसरे मौके की वह खुद तलाश नहीं करेगा।


रजनी बाला ने उसे पहाड़ी से गिरने से बचाया था लेकिन हो सकता था कि उसे नीचे बंधी रस्सी की खबर रही हो और उसने सारा ड्रामा अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए किया हो ।


वह एक पिस्टल की नाल साफ करता हुआ सोचने लगा कि अब वह अपने मौत का कौन सा नया फंदा तैयार करे, अपने नापाक इरादे में कामयाब होने का मौका वह अपने हत्यारे को दे और उस मौके का कैसा तोड़ वह अपनी सलामती के लिए तैयार करे?


उसने पिस्तौल एक और रख दी और एक छुरा उठा लिया। 


एकाएक उसके कान में एक आहट पड़ी। उसके कान खड़े हो गये । आवाज बाहर से आई थी । लगता था जैसे कोई दबे पांव सीढियां उतर रहा हो ।


उसने घड़ी देखी । दो बज चुके थे। इस वक्त सारे मेहमान तो सोये होने चाहिए थे । तो फिर क्या कोई नौकर !


उसने छुरा अपनी गोद में रख लिया। उसने अपने हाथ-पांव ढीले छोड़ दिये और आंखें बंद कर लीं। इस वक्त उसके सामने एक ही बल्ब जल रहा था इसलिए बाकी विशाल हॉल अंधेरा था । बाहर गलियारे में फिर आहट हुई । उसने बड़ी सावधानी से एक आंख थोड़ी खोलकर सामने झांका ।


हाल में ऊषा भटनागर दाखिल हो रही थी । वह खाली हाथ थी । वह और आगे बढ़ी और फिर धीरे से बोली"हल्लो, अरविन्द ! लगता है मेरी तरह तुम्हें भी नींद नहीं आ रही ?"


उसने उतर न दिया तो वह और आगे बढ़ी और उसके एकदम समीप आ खड़ी हुई । जब उसे विश्वास हो गया कि वह सोया पड़ा है तो उसने बड़ी खामोशी से सारे ड्राइंग रूम का चक्कर लगाया । डायनिंग रूम में भी झांका। उसके बाद वह वापिस ड्राइंग रूम में आकर दीवारों पर लगी ट्राफियों और हथियारों को देखने लगी ।


अरविन्द छुपी आंखों से उसकी हर हरकत देख रहा था । अन्त में वह वापिस लौटी। उसने धीरे से उसकी गोद में पड़ा छुरा उठा लिया । उसने उसकी धार और नोंक को परखा फिर छुरे को अपनी उंगलियों में तौला ।


क्या वह उस पर आक्रमण करने की तैयारी कर रही थी । अरविन्द सावधान था और ऐसे किसी आक्रमण के लिए तैयार था । अपनी पलकों के नीचे से वह उसकी हरकत को नोट कर रहा था । लेकिन उस पर आक्रमण नहीं हुआ । कुछ क्षण बाद उसने वैसे ही धीरे से छुरा उसकी गोद में रख दिया जैसा उसने उठाया था । फिर वह उसके समीप की एक कुर्सी पर बैठ गई ।


कुछ क्षण बाद अरविन्द ने कसमसा कर आंखें खोली । उसने एक दो बार आंखें मिचमिचाई और फिर अपने समीप बैठी ऊषा भटनागर को देखकर हैरानी जाहिर करता हुआ बोला- "हल्लो, तुम कब आई ?”


“अभी आई हूं ।" - वह बोली ।


"क्या बात है ?"


"मुझे नींद नहीं आ रही थी, इसलिए यूं ही अपने कमरे से निकल पड़ी थी । तुम्हें यहां बैठा देखकर तुम्हारे पास आ गई थी लेकिन तुम सोये पड़े थे। थोड़ी देर यूं ही तुम्हारे पास बैठ गई थी ।


ओह !"


"इस इमारत में पता नहीं क्या बात है कि अंधेरा होते ही मुझे डर लगने लगता है। मैं आंखें बंद करती हूं तो मुझे


भूत दिखाई देने लगते हैं।”


अरविन्द को उन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी । उसकी दिलचस्पी ऊषा में तभी समाप्त हो गई थी जब उसने छुरा वापस उसकी गोद में रख दिया था। उसने घड़ी पर निगाह डालते हुए और फिर हड़बड़ा कर बोला- "हे भगवान ! सवा दो बज गये । मैं तो सोने चला ।”


"अच्छे मेजबान हो !" - वह शिकायत भरे स्वर में बोली । 


“तुम भी सोने की कोशिश करो।" - वह नकली हंसी हंसता हुआ बोला - "मेरी इस गारन्टी के साथ कि इस इमारत भूत नहीं बसते ।" में


वह उसे वहीं बैठा छोड़कर अपने कमरे पंहुचा ।


उसने जवाहर सिंह को बुलाया और बिस्तर पर उसे अपनी जगह लेने के लिए कहा ।


"तुम सो मत जाना ।" - वह चेतावनी भरे स्वर में बोला


वह हंसा और बोला - "बद्री के कत्ल के अंजाम के बाद क्या मेरी सोने की हिम्मत होगी ?"


अरविन्द खिड़की और पेड़ के रास्ते बाहर निकल गया । पिछले रोज की तरह झाड़ी से अपना स्लीपिंग बैग निकाला और उसे जंगल में एक स्थान पर बिछा लिया । वह स्लीपिंग बैग में घुस गया ।


फिर पता नहीं कब उसकी आंख लग गई ।


***