जब मोहिनी को ये पता चला कि उसका होने वाला पति रजनी बाला को सूर्यास्त का लुभावना दृश्य दिखाने के लिए नन्दी हिल पर ले गया था तो वह क्रोध से आग बबूला हो उठी । उसने अपना आक्रोश बिना किसी लिहाज के अपने गिर्द मौजूद हर किसी पर जाहिर किया ।


फिर जयन्त मलकानी शिकार से वापिस लौटा। बारहसिंघे का शिकार तो नहीं कर सका था लेकिन जंगली मुर्गों का वह झोला भर लाया था ।


मोहिनी से सबसे ज्यादा हमदर्दी उसने दिखाई ।


फिर उसी ने उसे ढाढस बंधाया और बोला - "अरविन्द गधा है । खामखाह दिल दुखाने वाली हरकत करता है । आओ मैं तुम्हें नौका विहार कराकर लता हूं । तुम्हारा दिल बहल जायेगा ।"


मोहिनी उसके साथ हो ली ।


उस वक्त अरविन्द और रजनी बाला नन्दी हिल के एकदम ऊपर पहुंचे हुए थे । देवदार के पेड़ों के बीच में से गुजरते हुए वे पहाड़ी के ऐन चोटी पर मौजूद खुले मैदान में पहुंचे। वहां जमीन पर हरी-भरी घास का गलीचा बिछा था और ठंडी हवा चल रही थी । हवा में आसपास खिले जंगली फूलों की महक बसी हुई थी और आसमान एकदम नीला था । वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें ऐसी चढ़ाई चढ़नी पड़ी थी कि कई बार सीधा चलने के स्थान पर उन्हें हाथ और पैरों के बल रेंगना पड़ा था ।


चोटी पर पहुंचकर वे रुके । कितनी ही देर वे नीचे झील की और इतनी ऊंचाई से खिलौना सा लगने वाली लॉज को देखते रहे । वहां से पहाड़ का एक सिरा पांच सौ फुट नीचे तक एक दीवार की तरह सपाट था ।


वे बैठ गए ।


कुछ क्षण मौसम और वातावरण की बातें होती रहीं, फिर एकाएक रजनी बाला बोली- "तुम मोहिनी से खुश हो ?"


"क्यों पूछा ?" - अरविन्द बोला ।


"क्यूंकि वह तुम्हारी किस्म की औरत नहीं । वह तो बड़ी सर्द मिजाज और खुदगर्ज औरत है और ऐसा कतई नहीं लगता कि वो तुमसे प्यार करती है । "


“अच्छा।"


"वह औरत तो उस आदमी के काबिल है जिसे बीवी की नहीं बल्कि नुमायश करने के लिए एक खूबसूरत बुत की जरूरत हो । जो सिर्फ इसलिए उसकी पूजा करे क्योंकि वह खूबसूरत है । जो सिर्फ इसलिए उसकी ज्यादतियां बर्दाश्त कर सके क्योंकि इतनी खूबसूरत बीवी का पति होना के लिए भी इज्जत की बात हो सकती है । " ।


"तुम मोहिनी से जल रही हो ।”


"मेरी जूती जलती है लेकिन इतना मैं फिर भी जानना चाहती हूं कि हम दोनों की बात क्यों नहीं बनी थी ।”


“अब छोड़ो पुरानी बातें ।”


"नहीं बताओ ।"


“सच बताऊं ?"


"हां । "


"मुझे तुमसे मुहब्बत नहीं हो सकी थी ।"


"लेकिन मैं तुम्हें आज भी अपनी जिन्दगी का अबसे अहम मकसद मानती हूं।"


"तुम बुझी हुई आग को कुरेदने की कोशिश कर रही हो । तुम्हारा मकसद मैं नहीं, मेरे जैसा दौलतमंद कोई भी आदमी हो सकता है।"


"तुम मेरा अपमान कर रहे हो ।”


"देखो, रजनी । तुम सालों से मेरे फिराक में हो । लेकिन क्या तुम जानती हो कि मैं तुम्हें इस लॉज पर क्यों लाया हूं ? मैं तुम्हें इस तनहा पहाड़ी पर क्यों लाया हूं ? इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम मेरा पीछा छोड़ दो । तुम हमेशा के लिए मेरा ख्याल छोड़ दो। मेरे तुम्हारे बीच कोई बात बननी कतई मुमकिन नहीं है। "


क्रोध और अपमान से रजनी बाला का चेहरा लाल हो गया । यही अरविन्द चाहता था । उसको भड़काना । भड़काना ही उसका मकसद था । क्रोध में रजनी बाला की आंखें अंगारों की तरह दाहक उठीं और उसका शरीर कांपने लगा । ।


" जी चाहता है" - वह कहर भरे स्वर में बोली- "कि अभी तुम्हारा खून कर दूं । तुमने मेरी जिन्दगी को तमाशा बना दिया है । तुमने..."


“तुमने खुद अपनी जिन्दगी को तमाशा बनाया है । तुम्हें मैंने तो नहीं कहा था तुम मेरे पीछे पड़ो। तुम अभी भी मेरे पीछे पड़ी हुई हो । आत्म-सम्मान का भाव तो लगता है तुम्हें छू तक नहीं गया । अगर तुम में जरा भी गैरत होती तो..."


रजनी बाला के बायें हाथ का जोरदार तमाचा अरविन्द के मुंह पर पड़ा । वह खामोश हो गया ।


“कितने कमीने हो गये हो तुम ?" - वह नफरत भरे स्वर में बोली- “अगर मैं आदमी होती तो इस वक्त तुम्हें तुम्हारे इस कमीनगी का ऐसा मजा चखाती कि तुम याद करते कि कोई मिला था । "


अरविन्द उठकर खड़ा हो गया । वह अपना दहकता हुआ गाल सहलाता हुआ पहाड़ी के किनारे तक गया और वहां रजनी बाला की तरफ पीठ करके खड़ा हो गया । वह एक कदम और बढ़ा तो उसका पांव फिसल गया । वह नीचे गिरा तो जमीन उसके शरीर के नीचे से भरभरा कर सरकने लगी । उसने जल्दी से किनारे पर उगी लम्बी, झाड़ियों की मुट्ठी भर ली । उसका बाकी शरीर नीचे पांच सौ फुट गहरी खाई में लटक गया। उसके पांव बिना सहारे के हवा में लहराने लगे ।


"रजनी ।" - वह आतंकित भाव से चिल्लाया - "रजनी।”


उसकी चीख सुनकर रजनी ने सिर उठाया । फिर वह भागती हुई उसके समीप पहुंची। उसने अरविन्द को उस खतरनाक हालात में एक हाथ के सहारे नीचे लटका पाया तो उसकी अपनी चीख निकल गई ।


रजनी को यही दिखाई दे रहा था कि अरविन्द केवल कमजोर लचकीले झाड़ियों के सहारे पहाड़ी से नीचे लटका हुआ था और झाड़ी हाथ से छूट जाने या उखड़ जाने पर वह किसी भी क्षण नीचे गिर सकता था लेकिन वास्तव में उसे वैसा खतरा नहीं था । उस ड्रामे में अपनी सुरक्षा का इंतजाम वह पहले ही कर चुका था । उसके एक हाथ में वह नाजुक झाड़ी थी लेकिन दूसरे हाथ में पहाड़ के पहलू में विशेष रूप से बांधी गई एक मजबूत रस्सी थी जो ऊपर से रजनी को दिखाई नहीं दे सकती थी। उस रस्सी की वजह से वह पूर्णतया सुरक्षित था और एक सेकंड में वापिस पहाड़ी पर चढ़ सकता था लेकिन रजनी को उस वक्त उसकी हालत ऐसी लग रही थी कि वह अब गिरा कि गिरा |


रजनी पहाड़ी के दहाने पर बैठ गई। उसने नीचे झुक कर उसकी बाहें थामी और उसे वापिस खीचने की कोशिश की, लेकिन अरविन्द बहुत भारी था । अरविन्द ने उसके आतंकित चेहरे पर निगाह डाली और फिर हांफता हुआ बोला - "अगर तुम मुझसे इतनी नफरत करती हो तो झाड़ी क्यों नहीं उखाड़ देती हो ?" "


रजनी बाला ने उसकी बात की ओर ध्यान नहीं दिया । वह और जोर से उसे वापिस खीचने की कोशिश करने लगी और बोली - "हे भगवन ! मुझे शक्ति दो ।”


“मैं गिर जाऊंगा" - अरविन्द बोला- "तो हर कोई इसे दुर्घटना ही मानेगा । तुम्हारे ऊपर जरा भी हर्फ नहीं आयेगा |"


रजनी बाला ने उसका हाथ छोड़ दिया । उसने आनन-फानन अपनी साड़ी उतारी और उसकी रस्सी बनाकर उसका एक सिरा समीप उगे एक पेड़ के तने से बांध दिया । उसने दूसरा सिरा अरविन्द की तरफ लटका दिया और बोली .“अब ऊपर आने कि कोशिश करो।"


“अच्छा !” - वह बोला ।


साड़ी के सहारे इंच-इंच सरकता हुआ वह वापिस पहुंचने लगा । उसकी छाती किनारे से आकर लगी तो रजनी बाला ने भी उसकी बगलों में हाथ डालकर उसे ऊपर घसीटना आरम्भ कर दिया ।


वह सुरक्षित पहुंच गया ।


आतंकित रजनी बाला जोर-जोर से रो रही थी ।


अरविन्द बड़ी मुश्किल से उसे चुप करा पाया ।


- यह औरत उसकी खून की प्यासी नहीं हो सकती थी उसने मन ही मन सोचा । अगर यह पहले उसकी हत्या के तीन प्रयत्न कर चुकी होती तो यह अब उसका काम तमाम करने का इतना सुनहरा मौका छोड़ न देती । और फिर एक्टिंग नहीं कर रही थी । वह सचमुच आतंकित थी ।


रजनी बाला ने रोते हुए पेड़ से अपनी साड़ी खोली और उसे दोबारा बांध लिया ।


वह उसे चुप कराने लगा और अपनी काली जुबान के लिए उससे माफी मांगने लगा ।


"माफी मांगने कि जरूरत नहीं ।" - एकाएक वह बड़े संतुलित स्वर में बोली- "मुझे अब अहसास हो रहा है कि गलती मेरी ही थी । प्यार जबरदस्ती का सौदा नहीं होता । लेकिन भविष्य में हमें और कुछ न हो तो अच्छे दोस्त तो बने रह सकते हैं।”


“जरूर ।" - अरविन्द बड़ी संजीदगी से बोला ।


"मैं आजकल जिन्दगी से कुछ परेशान हूं लेकिन यहां से जाने के बाद मैं अपनी परेशानी दूर कर लूंगी। अब मेरा दिमाग ठिकाने लग गया है इसलिए मुझे उम्मीद है कि मेरी परेशानियां खुद ही दफा हो जाएंगी।”


"तुम एक दिन मेरे ऑफिस में आई थी लेकिन तभी मेरी सेक्रेट्री की जहर से हालत खराब हो गई थी और उसे हस्पताल ले जाने की अफरा तफरी मच गई थी । रजनी, मुझे आज तक मालूम न हो सका कि उस रोज तुम आई किसलिए थी ?"


"मुझे बताते शर्म आती है लेकिन हकीकत यह है कि तब मेरी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि तुम से कुछ पैसा उधार मांगने आई थी। मैं तुम्हारे ऑफिस में पहुंची थी तो मुझे बताया गया कि तुम बोर्ड मीटिंग में हो। मैं तुम्हारे फ्री होने के इंतजार में बैठ गई थी । मेरा वहां बैठना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि मैंने नीचे इमारत से बाहर, सड़क के पार एक कार में ऊषा भटनागर को बैठे देखा था । मैंने यही समझा कि तुम ऊषा के साथ कहीं जाने वाले थे, और वह नीचे कार में तुम्हारा इन्तजार कर रही थी । उस वक्त मुझे छोटेपन का कुछ अहसास हुआ था कि मैंने ऊषा की निगाहों में आना मुनासिब नहीं समझा था ।"


"मेरा उसके साथ कोई प्रोग्राम नहीं था ।”


"लेकिन वह बाहर कार में मौजूद थी। वह एक किताब पढ़ रही थी और उसके हाव-भाव से लगता था कि वह काफी देर से किसी के इंतजार में वहां मौजूद थी ।"


"लेकिन मेरे इंतजार में नहीं । वह वहां किसी और का इंतजार कर रही होगी ।"


"हो सकता है। लेकिन बाद में जब मैं एक लिफ्ट में दाखिल हो रही थी, तो बगल के दूसरे लिफ्ट से मैंने उसे निकलते देखा था और उसे तुम्हारे ऑफिस की तरफ बढ़ते देखा था ।"


"तुम तो उसके जाने के बाद तक वहां रुकने वाली थी


"मुझे नीचे उसकी कार नहीं दिखाई दी थी तो मैं समझी थी कि वह चली गई थी लेकिन वास्तव में वह कार को कहीं पार्क करके ऊपर आ रही थी ।"


"उसने तुम्हें देखा था ?”


“नहीं !”


"मुझे किसी ने नहीं बताया कि उस रोज ऊषा भी मेरे ऑफिस आई थी । तुम्हारी तो मुझे खबर लगी थी । वैसे अच्छा हुआ उस रोज तुमने मेरा इंतजार नहीं किया । उस रोज कान्फ्रेस बहुत लम्बी चली थी ।”


“अगर मैं पैसे मांगने के नीयत से न आई होती और मुझे ऊषा न दिखाई दे गई होती तो मैं शाम तक तुम्हारा इंतजार करती ।"


"ओह ! मेरा लंच तुम्हारे सामने वहां पंहुचा था ?"


"हां ! और मैंने ट्रे में झांककर देखा था कि लंच के लिए तुमने क्या मंगवाया था । मुझे भूख लगी हुई थी । मेरा तो जी भी चाहा था कि मैं एक सैंडविच उठाकर खा लूं । "


"तुमने अच्छा किया जो सैंडविच नहीं खाई वरना मेरी सेक्रेट्री की जगह तुम हस्पताल पहुंच गई होती ।"


वह खामोश रही ।


"अब रुपये पैसे की क्या स्थिति है ?"


“अब ठीक है । इत्तफाक से अगले ही दिन मुझे नया कॉन्ट्रैक्ट मिल गया था और एडवांस पैसे मिल गये थे । "


"मैं मुंबई पहुंचते ही सब ठीक कर दूंगा । फिल्म इंडस्ट्री में मेरे बहुत दोस्त हैं । मैं तुम्हें नए रोल भी दिलवा दूंगा और तुम्हारे बैंक में एक मोटी रकम भी जमा करवा दूंगा ।"


"अब इसकी जरूरत नहीं है । जब मैं...


"और इस बारे में तुम कुछ नहीं कहोगी । जो कुछ मैं करूंगा उसे तुम खामोशी से कबूल करोगी। तभी मैं मानूंगा कि तुम मुझे अपना दोस्त समझती हो ।"


उसके नेत्र फिर सजल हो उठे ।


" और मैं अपने व्यवहार के लिए शर्मिंदा हूं। दिल से शर्मिंदा हूं।"


वह खामोश रही ।


"अब अपने एक सच्चे दोस्त से हाथ मिलाओ।"


रजनी बाला ने बड़ी खूबसूरती

 से अरविन्द का हाथ थाम लिया ।


"मुझे खुशी है ।" - अरविन्द बोला- "कि आज दुर्घटना घटी । दिलों का मैल साफ हो गया ।"


इस बार रजनी बाला भी हंसी ।


***