"देसाई साहेब साढ़े बारह बजे के करीब अपने बैडरूम में चले गये थे । आपको याद होगा कल आपने मुझसे कहा था कि देसाई साहेब का खास ख्याल रखूं। मैं इस बात की निजी गारंटी कर सकता हूं कि उन्होंने ऐसी कोई हरकत नहीं की जो मेरी जानकारी में न आई हो । वे दो बजे तक नावल पढ़ते रहे थे फिर वो सो गये थे । वे अभी सोये हुए हैं। मेरे एक आदमी ने पावर हाउस की छत से सारी रात उसकी निगरानी की है ।”
" और बाकी ?"
"बाकियों की तो..." - जवाहर सिंह संकोचपूर्ण स्वर में बोला- "इतनी बारीकी से निगरानी नहीं की गई। आप ही ने कहा था कि सिर्फ देसाई साहेब की खास..."
"अब मालूम करने की कोशिश करो कि रात को कौन सोते से उठा था ।” - अरविन्द गुस्से में बोला ।
“यस सर !”
" और जब सब लोग ब्रेकफास्ट के लिए जमा हो जाएं तो मुझे खबर करना । मैं देखना चाहता हूं कि मुझे जिन्दा देखकर कोई चौंकता है या नहीं। तुम भी निगाह खुली रखना । हत्यारा मुझे मरा समझ रहा है । उसे ब्रेकफास्ट के लिए मेरे आगमन की उम्मीद नहीं होगी। समझ गये ?"
"यस सर !"
"और इस बात पर भी कान रखना कि कोई मेरे बारे में क्या पूछता है । मैं ब्रेकफास्ट में लेट पहुंचूंगा । हत्यारा इस बारे में कोई सवाल पूछ सकता है । "
जवाहर सिंह ने सहमति में सिर हिलाया ।
"अब जाओ और लाश उठवाने का इंतजाम करो ।"
जवाहर सिंह चला गया ।
थोड़ी देर बाद बद्री की लाश चुपचाप टूल शेड में पंहुचा दी गई ।
वह आठ बजे जवाहर सिंह का संकेत प्राप्त होने के बाद नीचे पंहुचा । वह इतनी खामोशी से डायनिंग हाल में दाखिल हुआ कि जब वह टेबल के सिर पर न पहुंच गया किसी को उसकी उपस्थिति का आभास न हुआ ।
यह देखकर उसे बड़ी मायूसी हुई कि उसे आया देखकर कोई भी मेहमान चौंका नहीं था। उसने सबका अभिवादन किया ।
उसकी मंगेतर ने उसे मुस्करा कर देखा ।
"आप तो जी भर कर सोये मालूम होते हैं ।" - उसके जनरल मैनेजर ने शिकायत की - "मुझे तो सारी रात नींद नहीं आई। रात को जंगल कैसी अजीब-अजीब आवाजों से गूंजने लगता है।"
"वह लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का बैक ग्राउंड म्यूजिक चल रहा होता है।" - अभिनेत्री बोली ।
सब हंसे ।
“आज मैंने डिनर पर बारहसिंघे का मीट खाने का फैसला किया है ।" - उसका पार्टनर बोला - " और वह बारहसिंघा मैं खुद मार कर लाऊंगा, चाहे कुछ हो जाये।"
ऊषा भटनागर हंसी ।
"मैं तुम्हारा साथ दूंगा ।" - देसाई बोला ।
"महेन्द्र और मैं तो तीरंदाजी करने जा रहे हैं । " रजनीबाला बोली - "महेन्द्र अपने आप को बहुत बड़ा तीरंदाज बता रहा है लेकिन मैं भी कुछ कम नहीं हूं।"
" तुम्हें भी तीर कमान चलाना आता है ?" - अरविन्द हैरानी से बोला ।
"हां । एक फिल्म में मुझे भील की लड़की का रोल मिला था । मुझे उस रोल के लिए खास तौर से तीरंदाजी सिखाई गई थी ।”
"और तुम अरविन्द ने अपने भाई से पूछा । भी जानते हो तीर कमान चलाना ?"
"हां !" - वह गर्वपूर्ण स्वर में बोला- "बहुत अच्छी तरह से।"
"तीर कमान चलाने और कौन जनता है ?" - अरविन्द ने तनिक ऊंचे स्वर में बोला ।
कोई उतर न मिला ।
फिर राजेश शुक्ला ने टेनिस की बात की तो ऊषा भटनागर फौरन उसका साथ देने को तैयार हो गई ।
"लेकिन पहले मुझे अपने जूते बदलने अपने कमरे जाना होगा ।" - वह बोली ।
अरविन्द ने सब महिलाओं के जूतों पर निगाह डाली । कोई भी ऊंची एड़ी की सैंडिल नहीं पहने थी । लेकिन उसने पहले ही तमाम महिलाओं की सैंडिल को चुपचाप चैक करवाने का फैसला किया हुआ था । किसी ऊंची एड़ी की सैंडिल के तले में लगे उसे कच्ची मिट्टी या घास के तिनके लगे मिल सकते थे ।
वह सिर झुकाकर ब्रेकफास्ट करने लगा ।
उसके डायनिंग हाल में नाटकीय प्रवेश का कोई फायदा सामने नहीं आया था । उसे देखकर कोई मेहमान नहीं चौका था । किसी के चेहरे पर नाटकीय पर संदेह जगाने वाले भाव नहीं थे | जरूर हत्यारा उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा चालाक था । फिर उसका ध्यान रजनी बाला की तरफ गया ।
उसने अपने मुंह से कहा था कि वह तीर कमान चलाना जानती थी । यह बात साधारणतया निर्दोषिता का सबूत मानी जा सकती थी लेकिन अगर वह हद से ज्यादा चालाक अपराधिनी थी तो इसका जिक्र जानबूझकर भी किया जा सकता था ताकि बाद में यही समझा जाए कि अगर घातक तीर उसने चलाया होता तो वह अपने जुबान से खुद क्यों कबूल करती कि उसे तीर चलाने आता था, अभी उसने कमान नहीं देखी थी और तीरों में से एक तीर भी गायब होना लाजमी था लेकिन कमान अब तक झाड़-पोंछकर अपने स्थान पर लौटाई हो चुकी होनी थी और घातक तीर से उसके चलाने वाले के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त होने वाली नहीं थी ।
मेहमानों में से किसी के चेहरे पर उसे देखकर कोई भाव न आने की एक और भी वजह हो सकती थी ।
शायद तीर चलाने के बाद हत्यारा यह देखने के लिये खिड़की के रास्ते कमरे में घुसा था कि उसका शिकार मर भी गया था या नहीं। और इस प्रकार शायद उसे पहले से ही मालूम था कि मरा वह नहीं था, यानी कि उसके पास अपने मन के भाव छुपाने का रिहर्सल कर लेने का प्रयाप्त समय था । हत्यारा जनता था कि उसने गलत आदमी का खून कर दिया था ।
ब्रेकफास्ट के बाद सब लोग ड्राइंग रूम चले गए ।
अरविन्द ने जवाहर सिंह को एक और बुलाया और बोला - “अपने सारे आदमी को बुला लो और उनसे कह दो कि अभी जो कुछ मैं कहूं उसे गौर से सुनें और उसे हकीकत मान कर चलें । उन्हें यह समझा दो कि हम यह बहाना करके ही बद्री के हत्यारे को पकड़ने में कामयाब हो सकते हैं कि उसकी मौत दुर्घटनावश हुई थी । फिर केवल हत्यारा ही यह बात जानता होगा कि असलियत यह नहीं है समझे ?"
जवाहर सिंह ने सहमति में सिर हिलाया ।
अरविन्द ड्राइंग रूम पंहुचा ।
वहां से कुछ लोग तफरीह के लिए विदा होने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अरविन्द के अनुरोध पर वे रूक गये ।
फिर जब लॉज में मौजूद नौकर चाकर समेत सब लोग जो कि इक्कीस थे, वहां जमा हो गए तो अरविन्द ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और बोला - "साहबान, लगता है कल हममे से किसी एक ने तीर कमान से शिकार का आनन्द लेने की कोशिश की थी । उसने जरूर ऐसा काम पूरा दिन छुप पाने से पहले किया होगा क्योंकि तीर का शिकार कोई जानवर होने के स्थान पर मेरा बद्री नाम का नौकर हो गया है। तीर ने उसकी जान ले ली । जिसने भी उस पर तीर चलाया है उसने कमान पोंछ कर वापिस यथास्थान रख दिया है और प्रत्यछक्ष: इस बात की खबर किसी को करना जरूरी नहीं समझा है ।" - उसने बारी-बारी सब पर निगाहें फिराई - "साहबान, दो हफ्ते के लिए यहां हम अकेले हैं। यहां हम पुलिस को नहीं बुला सकते । बद्री का अंतिम संस्कार भी यहीं होना है और हमी ने करना है । मैं जनता हूं कि शिकार में ऐसे एक्सीडेंट होते ही रहते हैं लेकिन ऐसे मामलों में खामोश रहना ठीक नहीं होता । मौजूदा हालात में मैं आपसे दरखवास्त करता हूं कि जिस किसी ने भी तीर चलाया है, वह सामने आ जाए वर्ना बहुत बुरा होगा । फिलहाल तो कानूनी तौर पर भी इसे दुर्घटना ही माना जायेगा लेकिन इसको छुपाने की कोशिश का बड़ा गलत मतलब लगाया जा सकता है । "
कोई कुछ न बोला ।
अन्त में रत्नाकर देसाई ने चुप्पी तोड़ी- "बड़े अफसोस की बात है कि यूं एक आदमी की जान चली गई ?"
"मैं वकील हूं !" - राजेश शुक्ला उठते हुए बोला- "मैं इन बातों को ज्यादा समझता हूं।"
फिर अगले दस मिनट तक वह नौकरों चाकरों से बद्री के बारे में कुल जहान के सवाल करता रहा लेकिन नतीजा सिफर निकला । कोई बद्री को ज्यादा जानता नहीं था और किसी की भी बद्री से अदावत नहीं थी ।
अन्त में शुक्ला अरविन्द से बोला- "हमें वहां चलना चाहिए जहां लाश पाई गई थी ।"
"हम दोनों चलते हैं । " - अरविन्द सहमति में सिर हिलाता हुआ बोला । फिर वह मेहमानों से संबोधित हुआ - " आप लोग अब अपनी तफरीह में लग सकते हैं । कल दोपहर बाद बद्री का अंतिम संस्कार किया जायेगा । उसमे शामिल होना आप लोगों की मर्जी है। अगर आप चाहें तो वहां आ सकते हैं ।"
वह अपने वकील के साथ इमारत से बाहर निकल गया
"तुमने तो घटनास्थल का मुआयना पहले ही कर लिया होगा ।" - रास्ते में शुक्ला बोला - "कुछ मिला ?" -
"वह सारी कहानी झूठी थी, शुक्ला ।" - अरविन्द एक खोखली हंसी हंसते हुए बोला- "असल में बद्री मेरी जगह मेरे बिस्तर पर सोया हुआ था। मैं खुद बाहर जंगल में एक स्लीपिंग बेड में सोया हुआ था । असल में उसने अपनी आंखें खुली रख कर इसी बात का इंतजार करना था कि मुझ पर कोई हमला होता था या नहीं । लेकिन वह सो गया और किसी ने उसको मुझे समझ कर उसकी हत्या कर दी ।"
"किसने ? देसाई ने ?"
"वह रात को अपने कमरे से निकला तक नहीं था । "
'असली बात किस-किस को मालूम है ?"
"जवाहर सिंह और उसके दो आदमियों को । या फिर हत्यारे को ?"
"जो कि तुम्हारे ख्याल में मेहमानों में से कोई है ?"
"हां शुक्ला, बद्री के शिकार में मरने की कहानी मैंने हत्यारे को चिन्ता में डालने के लिये घड़ी थी, इससे हत्यारा समझेगा कि हम जितना बता रहे हैं उससे कहीं ज्यादा जानते हैं और उसके खिलाफ कोई षडयंत्र रच रहे हैं इससे वह नर्वस हो जायेगा और जरूर कोई गलत चाल चलेगा ।"
" यानी कि तुम हत्यारे के साथ चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे हो ?"
" और क्या करू ? मेहमानों को मैं यह हकीकत कैसे बता सकता हूं कि उनमे से कोई एक अपने मेजबान का कत्ल करने का इरादा रखता है। इससे हासिल तो कुछ होगा नहीं उलटे यहां ऐसा आतंक बैठ जायेगा कि आने वाले दो हफ्ते उन्हें सख्त सजा लगने लगेंगे । ऊपर से हत्यारा सावधान हो जएगा । और दोबारा ऐसा कोई कदम उठायेगा ही नहीं जो उसकी तरफ इशारा कर सकता हो । नतीजा यह होगा कि हम वापिस वहीं पहुंच जाएंगे जहां से हम चले थे ।”
" बेचारे बद्री की तो खामखाह जान चली गई ।"
"मुझे इसका अफसोस है। मुझे अफसोस है कि मेरी वजह से उसकी जान चली गई। हालांकि गलती उसकी थी । वह एक दक्ष जासूस था और जिस विशेष काम के लिए उसे मेरे बैडरूम में भेजा गया था, वह उसे ठीक से अंजाम नहीं दे पाया था । उसे अपनी आंखें खुली रखनी थी लेकिन वो सो गया था । अगर वह चौकन्ना रहता तो न केवल उसकी जान बचती बल्कि हो सकता था कि वह हत्यारे को भी पकड़ लेता। पकड़ न लेता तो कम से कम पहचान तो जरूर कर लेता ["
"अब भविष्य में तुम क्या करोगे ? मेरा मतलब है रात को ओने के बारे में ?"
"अभी मैंने कोई फैला नहीं किया है। लेकिन सोना तो मैंने होगा ही। दो हफ्ते मैं जगता तो नहीं रह सकता।"
“कहो तो बद्री की जगह मैं ले लूं।"
"नहीं । अब जरूरत नहीं । अब हत्यारा यह चाल समझ चुका है।'
"ओह !"
“आओ वापिस चलें । मैं जरा औरतों की सैंडिलों का मुआयना करना चाहता हूं।"
"क्यों ?"
अरविन्द ने वजह बताई ।
रजनी बाला के कमरे में उन्हें सैंडिलों का एक जोड़ा मिला जिस पर नमी और घास के तिनके वाली मिट्टी लगी हुई थी । उन सैंडिलों को लेकर वो बाहर निकले और एक चट्टान पर बैठे रजनी बाला और महेन्द्र वर्मा के एकदम सामने से गुजरे। उन दोनों ने शायद तीर कमान से निशाना आजमाने का ख्याल छोड़ दिया था ।
वे सैंडिल जंगल में बने सैंडिल के निशानों पर एकदम फिट बैठी |
यानी कि रात को अरविन्द के सोने की जगह पर रजनी बाला पहुंची थी । और उसने यह भी माना था कि तीरंदाजी का उसे ज्ञान था । और जिस दिन उसके लंच में जहर मिलाया गया था, उस दिन वह उसके ऑफिस में लंच के साथ अकेली मौजूद थी ।
“अब रजनी बाला को अपनी जान लेने का अगला मौका मैं खुद दूंगा ।" - अरविन्द बोला ।
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