"क्या बात है ?" - रास्ते में शुक्ला बोला - "तुम तो ऐसे पेश आ रहे थे जैसे वो तुम्हारी कुछ लगती हो ।”
" मैंने अब से पहले जिन्दगी में कभी सूरत नहीं देखी उसकी ।" - अरविन्द बोला ।
"तो फिर ?"
"फिर कुछ नहीं ।"
तभी दोनों हेलीकाप्टर आसमान में उड़ गये और पेड़ों के पीछे पहुंचकर निगाहों से ओझल हो गये ।
लाज के समीप पहुंचने पर उन्होंने देखा टेरेस पर सभी मेहमान मौजूद थे और आसमान की तरफ ही देख रहे थे।
"ये हेलीकाप्टर कहां चले गये ?" - अरविन्द के तरफ देखते ही देसाई बोला ।
“बम्बई ।” - अरविन्द बड़े इतमीनान से बोला ।
“वापिस कब लौटेंगे ?"
"दो हफ्ते बाद ।"
"क्या ?"
"घबराओ नहीं ! यहां हमारी जरूरत की हर चीज मौजूद है।"
"लेकिन मैं यहां दो हफ्ते नहीं रुक सकता।"
"अब तो मजबूरी है । हेलीकाप्टर के बिना यहां से वापिस लौटा नहीं जा सकता । किश्ती वगैरह से लौटने की कोशिश करोगे तो सफर में ही दो हफ्ते लग जायंगे।"
गुस्से में देसाई का चेहरा लाल हो गया ।
"इसलिये इतमीनान से काम लो और पिकनिक का आनन्द उठाओ ।”
देसाई ने होंठ भींच लिए ।
“तस्वीर का दूसरा रुख भी देखो न देसाई साहब ।" - ऊषा भटनागर बोली- "अब हमारे पास चौदह दिन हैं अरविन्द को समझाने के लिए कि वह अपनी दौलत मजदूरों पर लुटाने के अपने खौफनाक इरादे से बाज आये।” - सब ने अरविन्द की तरफ देखा - "हम सब अभी तुम्हारी ही बात कर रहे थे। हमें लग रहा है कि तुमने जानबूझकर सिर्फ उन लोगों को यहां इकठ्ठा किया है, बिजनेस से तुम्हारे सन्यास लेने के वजह से जिन्हें भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ सकती है । लगता है तुम हम लोगों को संकट में डालकर खुद मजा लेने चाहते हो।”
" ऐसी बात नहीं है ।" - अरविन्द बोला - "ऐसा तो मैंने कभी सोचा भी भी नहीं । आप सब लोग मेरे बड़े अजीज दोस्त हैं। मैं आप लोगों को नुकसान पहुंचाने की नहीं सोच सकता । लेकिन मैं अपने कर्मचारियों का भला जरूर करना चाहता हूं जिन्होंने अपना खून-पसीना एक करके मुझे आज की स्थिति में पहुंचाया है। मेरे कारखाने, मेरी कम्पनियां बंद नहीं हो रही, साहबान । उनकी सिर्फ मिल्कियत बदल रही है । अब उनके मालिक वही लोग होंगे जिन्होंने उन्हें परवान चढ़ाया है। मैं उन लोगों के अहसान का बदला चुका रहा हूं जिन्होंने मुझे सहारा देकर गरीबी और आभाव के खड्डे से बाहर निकाला था । माथुर और मलकानी अगर मेहनती और ईमानदार हैं तो ये निजाम में भी बॉस होंगे लेकिन अगर ये लोग ऐसे नहीं हैं तो ये नये मालिकान की किन्हीं मेहरबानियों के हकदार नहीं रह पाएंगे । मेरा भाई महेन्द्र वर्मा भी भूखा नहीं मरने वाला और जहां तक बाकी लोगों का सवाल है ।" उसने देसाई के तरफ देखा- "मुझे मालूम है इनके पास बहुत पैसा है । वे लोग छोटा-मोटा आर्थिक झटका बखूबी बर्दाश्त कर सकते हैं । "
कई मुंह एक साथ खुले लेकिन मोहिनी सबसे पहले बोल पड़ी - "आप खामखाह फिक्र न करें। अरविन्द को मैं समझा लूंगी । हमारे पास चौदह दिन हैं । इन चौदह दिनों में अरविन्द ये अपना बेहूदा ख्याल छोड़ देगा।" - उसने जब अरविन्द की तरफ देखा तो उसकी आंखें बर्फ सी सर्द थीं "हद है ! दौलत क्या यूं लुटाने की चीज होती है!"
कोई कुछ न बोला ।
"आइये, अब दो-दो हाथ ब्रिज के हो जायें ।”
हेलीकाप्टर वापिस लौटते देखने के लिए इकट्ठे हुए लोग बर्खास्त हो गये ।
"बड़े अच्छे लोग जमा किये हैं तुमने यहां" - शुक्ला धीरे से बोला - "ये लोग सिर्फ तुम्हारी जान ही नहीं लेना चाहते, ये तो तुम्हारा पुर्जा उड़ा देना चाहते हैं ।"
अरविन्द ने सहमती में सिर हिलाया ।
लंच के बाद अरविन्द की अपनी मंगेतर से तन्हाई में मुलाकात हुई ।
"तुमने" - उसने फौरन पूछा - "ऊषा और रजनी बाला को यहां क्यों बुलाया है ?"
"यूं ही ।" - अरविन्द लापरवाही से बोला ।
"लेकिन उन्हीं की वजह से तुमने मुझे यहां नहीं बुलाया।"
“गलत । डार्लिंग, जरा सोचो । अगर मेरे इरादे नापाक होते तो मैं उन दोनों में से एक को बुलाता न कि दोनों को।”
"लेकिन..."
"तुम खामखाह जल रही हो । मेरा उन औरतों से कोई मतलब नहीं । आदमियों से मेरा बिजनेस का मतलब था । औरतों को मैंने सिर्फ एक तनहा जगह में रौनक करने के लिये बुला लिया था । "
"यह बात सच है कि तुम अपने कारखाने को अपने मजदूरों के हवाले कर रहे हो ?"
“हां ।”
"लेकिन तुम ऐसा कैसे कर सकते हो ? अगर ऐसा कुछ करना ही है तो बुढ़ापे में करना । अभी..."
"तुम घबराओ नहीं । वैसा करने से मैं गरीब नहीं हो जाऊंगा । तुम्हारे लिए बहुत पैसा है मेरे पास ।”
"लेकिन मैं तो चाहती हूं कि तुम और तरक्की करो । और ... और तरक्की करो । तुम हिंदुस्तान के सबसे बड़े उद्योगपति बनो ।”
"लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहता। मैं मशीनों के साथ मशीन नहीं बनना चाहता हूं। मैं तो तुम से शादी करके चैन और इत्मीनान की जिन्दगी गुजरना चाहता हूं।"
" चैन और इत्मीनान तो बुढ़ापे की चीजें होती हैं । तुम तो अभी सिर्फ चालीस साल के हो ।”
"देखो तुम मेरी बीवी बनने वाली हो । इसलिये बनने वाली हो क्योंकि मैं समझता हूं कि तुम मुझसे और मैं तुमसे मुहब्बत करता हूं। मेरे ख्याल से पत्नी की पति पे इतनी निष्ठा होनी चाहिए कि वह आंख बन्द करके उसकी हर बात पे भरोसा कर सके । इस वक्त उस भरोसे की झलक मुझे तुम में दिखाई नहीं दे रही । अपने बिजनेस के बारे में जो फैसला मैंने किया है, बहुत सोच समझकर किया है। मैं तुमसे उम्मीद करता हूं कि तुम इसलिए इससे इत्तफाक जाहिर करो क्योंकि ये मेरा फैसला है, तुम्हारे होने भी वाले पति का है । अगर तुम्हें ऐतराज है तो अभी बोलो ताकि हम भविष्य के बारे में भी नये सिरे से सोच सकें । "
वह न बोली । बोलने के स्थान पर घूमी और मुट्ठियां भींचे, पांव पटकती हुई वहां से चली गई ।
***
डिनर के बाद जब सब लोग ब्रिज खेलने बैठ गये तो अरविन्द वहां से विदा हो गया ।
हाल में उसे मालती माथुर की सेक्रेट्री मंजुला फिर दिखाई दी । वह मालती के कमरे में दाखिल हो रही थी । अरविन्द को देखकर वो ठिठकी, मुस्कुराई । अरविन्द मुस्कराया । उसका जी चाहा कि वह उससे कोई बात करे लेकिन तभी वो कमरे में दाखिल हो गई और उसने उसके पीछे जाना मुनासिब नहीं समझा ।
वह आगे बढ़ गया ।
वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या वजह थी कि उस पर निगाह पड़ते ही उसके दिल में हलचल सी मच जाती थी । वजह उसकी बेपनाह खूबसूरती नहीं ही नहीं हो सकती थी । कोई और बात भी होनी जरूरी थी। उसके दिल के किसी कोने से कोई अस्पष्ट सी आवाज उठती तो थी लेकिन वह उसे समझ नहीं पाता था ।
वह अपने कमरे में पंहुचा । उसने काल बैल बजायी ।
उसका नाईट सूट पहने एक आदमी वहां पंहुचा ।
अरविन्द ने उसे इशारा किया । वह उसके पलंग पर उसके स्थान पर पहुंच गया। अरविन्द ने एक खिड़की खोली और उसके रास्ते से बाहर निकल गया । कुछ कदम बाहर छजली पर चलने के बाद उसने एक पेड़ की डाल थाम ली और उस पर चढ़ कर पेड़ पर पहुंच गया । फिर पेड़ से वह नि:शब्द जमीन पर उतर गया ।
अगला एक घंटा वह खिड़की के नीचे छुपा अपने मेहमानों में चलता वार्तालाप सुनता रहा लेकिन कोई मतलब कि बात उसे सुनने को न मिली । फिर जब सारे मेहमान अपने-अपने कमरे में चले गए तो वह जंगल की तरफ बढ़ चला । इमारत से कोई एक फलांग आगे आकर एक झाड़ी में से उसने स्लीपिंग बैग निकाला । उसने उसे खोलकर जमीन । पर बिछाया और उसके अन्दर घुस गया।
उसे तुरंत नींद आ गई ।
पौ फटने पर उसकी नींद खुली ।
वातावरण चिड़ियों की चहचहाहट से गूंज उठा था और ठंडी हवा चल रही थी ।
वह स्लीपिंग बैग से बाहर निकला । उसने उसे लपेट कर वापस झाड़ी में छुपा दिया । उसने अपनी रिवाल्वर चौकस की और आगे बढ़ा ।
अभी उसने कुछ ही कदम उठाए थे कि वह ठिठक गया । जमीन पर उसके सोने के स्थान की तरफ बढ़ते तथा वहां से लौटते जनानी संडिलों के निशान बने हुए थे |
रात को उंची एड़ी की सैंडिल पहने कोई औरत उसके पास तक पहुंची थी और फिर वापस चली गई थी ।
कौन औरत ? क्या वह उसका खून करने वहां तक पहुंचीं थी ?
फिर शायद ऐन मौके पर उसका हौसला जवाब दे गया था और वह वापिस भाग गई थी ।
या क्या हो सकता था कि कोई आदमी जनानी सैंडिल पहन कर वहां तक आया हो और फिर ऐन मौके पर किसी वजह से डरकर भाग गया हो ।
उसे देसाई का ख्याल आया ।
लेकिन वह भारी भरकम आदमी था। अगर वह सैंडिले पहनकर चला होता तो जमीन पर एड़ी के नोंक के निशान ज्यादा गहरे होते ।
फिर एक बड़ा अप्रिय ख्याल उसके मन में आया ।
इस बात की क्या गारंटी थी कि लाज में मौजूद जवाहर सिंह का सारा स्टाफ वफादार था ? देसाई किसी को रिश्वत देकर अपनी ओर भी तो मिला सकता था ।
भोर का उजाला निखरता जा रहा था ।
वह वापिस लौटा ।
पिछली रात को जैसे अपने कमरे से बाहर निकला था वैसे ही पेड़ पर चढ कर वह उसमें वापस लौटा ।
डबल पलंग पर वह स्थिर पड़ा था । जरूर वह आदमी सोया पड़ा था, हालांकि उसे खास हिदायत थी कि उसने सोना नहीं था । उसकी ड्यूटी जागते रहकर इस बात पर निगाह रखना था कि अरविन्द की जान लेने की दिशा में अगला कदम कौन सा उठाया जाने वाला था ।
वह पलंग के समीप पंहुचा ।
उस आदमी के शरीर में फिर भी हरकत न हुई ।
फिर उसकी समझ में आ गया कि वह आदमी क्यों यूं स्थिर पड़ा था ।
वह एक पहलू के बल लेता हुआ था, उसकी पीठ खिड़की की तरफ थी और उसमें एक तीर धंसा हुआ था।
वह मरा पड़ा था ।
यानी कि अरविन्द को जिस बात का डर था वही हुई थी । किसी ने खिड़की पर से कमान से तीर चला कर अपनी तरफ से अरविन्द की जान ले ली थी ।
उसने कालबैल बजाकर जवाहर सिंह को बुलाया ।
फिर उसने पलंग पर पड़ी लाश की तरफ इशारा कर दिया ।
जवाहर सिंह के छक्के छूट गए ।
" हत्यारा खिड़की तक जरूर आया होगा।" - अरविन्द बोला- "यहां तक आये बिना भीतर तीर नहीं चलाया जा सकता । खिड़की पर उसके उंगली के निशान हो सकते हैं । तीर पर भी । धनुष उसने जरूर नीचे ड्राइंगरूम में से उठाया होगा जहां कि अब तक वो वापिस पहुंच चुका होगा । उस पर भी उंगलियों के निशान होंगे। तुम्हें या तुम्हारे किसी आदमी को उंगलियों के निशान उठाने आते हैं ?"
"मुझे ही आते हैं !" - जवाहर सिंह बोला- "लेकिन सर, यहां हमारे पास उंगलियों के निशान उठाने के लिए प्रयुक्त होने वाला सामान तो नहीं । मुझे तो सूझा नहीं था कि ऐसी नौबत भी आ सकती है ।"
"तुम्हें सूझना चाहिए था !" - अरविन्द शुष्क स्वर में बोला।
"सॉरी, सर ।"
" अब अपने भरोसे के दो आदमी को बुलवाओ और लाश को यहां से उठाकर टूल शेड में बंद करवा दो । फिलहाल इस घटना की खबर तुम्हारे आदमियों के अलावा किसी को नहीं लगनी चाहिए । "
"लेकिन सर, कानून की निगाह से..."
"यह बम्बई नहीं है, जवाहर सिंह । यह जंगल है और यहां जंगल का कानून चलता है। दो हफ्ते तक यहां कानून के रखवाले भी हम हैं और उसको तोड़ने वाले भी हम हैं । यहां हमारा कोई मददगार नहीं आने वाला । यहां इस आदमी के हत्यारे को तलाश हमीं ने करना है और उसे सजा भी हमीं ने देनी है । अंडरस्टैंड ?"
“यस सर !" - जवाहर सिंह तत्पर स्वर में बोला- "मैं बद्री की लाश उठवाने का अभी इन्तजाम करता हूं। लेकिन, " सर...
"यस ।"
"बद्री का खून किसी ने भी किया हो, देसाई साहब ने नहीं किया ।"
“अच्छा !" - अरविन्द के चेहरे पर हैरानी के भाव आये|
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