"बात मैं तुम्हें यहां आने से पहले ही बताना चाहता था लेकिन तुम बम्बई में थे नहीं। तुम बाहर गए हुए थे।"


"दिल्ली गया था । एकाएक जाना पड़ा गया था । डेढ़ महीने बाद वहां से लौटा हूं।"


"शुक्ला तुम्हारे पीछे बम्बई में बड़े हंगामे हुए।"


"क्या ?"


"कोई एक महीने पहले, एक शाम को जब मैं अपने ऑफिस की इमारत से बाहर निकला था और सड़क पार कर रहा था तो एक कार ने मुझे अपने नीचे कुचल देने की कोशिश की थी ।"


“कार कौन चला रहा था ?"


"कोई औरत थी जिसकी मैं सूरत नहीं पहचान पाया था।"


"कार का नम्बर देखा था ?"


"देखने की कोशिश की थी । लेकिन नम्बर प्लेट पर मिट्टी थुपी हुई थी इसलिए दिखाई नहीं दिया था।”


"फिर ?"


“उस रोज मैं बाल-बाल बच गया । फिर उस घटना के एक हफ्ते बाद मैंने हमेशा की तरह ऑफिस में अपना लंच मंगाया था लेकिन उसके आने से पहले मुझे बोर्ड की मीटिंग में जाना पड़ा गया था । वहां मीटिंग इतनी लम्बी खिंच गई कि मुझे याद ही नहीं रहा कि मेरे ऑफिस में पड़ा मेरा लंच ठंडा हो रहा था । मीटिंग खत्म होने के तक मेरी भूख मारी गई थी । मेरी सैक्रेट्री लंच की ट्रे लाई तो मैंने खाने से इनकार कर दिया । उसमे से एक चिकन सैंडविच मेरी सैक्रेट्री ने खा ली । वह सैंडविच उसके पेट में पहुंचने की देरी थी कि उसका चेहरा फक पड़ गया, उसके पसीने छूटने लगे और वह हाथ-पांव झटकने लगी जैसे सांस लेने में भी तकलीफ महसूस कर रही हो । उसे फौरन हस्पताल पहुंचाया गया । बेचारी बाल-बाल बची । मालूम हुआ कि सैंडविच में जहर था |"


" यानि कि किसी ने तुम्हें जहर देकर मारने की कोशिश की थी लेकिन इत्तफाक से तुम बच गए थे और शिकार तुम्हारी सैक्रेट्री हो गई थी।"


"हां। दो बार मेरी जान लेने की कोशिश की जा चुकी थी और वह कोशिश फिर भी हो सकती थी। पुलिस इस बारे में कुछ कर नहीं सकती थी । जो लोग मेरी जान के दुश्मन हो सकते हैं वे इतने बड़े और शक्तिशाली थे कि बिना पक्के सबूत के पुलिस की उनकी तरफ निगाह उठाने की भी हिम्मत नहीं हो सकती थी । इसलिए मैंने खुद ही जानने की कोशिश की कि सारे बखेड़े के पीछे कौन था। यहां तुमने मेरा हाउसकीपर जवाहर सिंह देखा ?"


"हां"


"वह वास्तव में एक प्रसिद्ध प्राइवेट डिटेक्टिव है । बम्बई में मैंने उसकी सेवाएं प्राप्त की। उसने अपने आदमी उन तमाम लोगों के पीछे लगा दिये जिन पर मुझे शक था लेकिन नतीजा कुछ न निकला ।”


"इसलिये तुमने उन सबको यहां इकठ्ठा कर लिया ?"


"हां ! और एक तरह से उन्हें अपने कत्ल की दावत दी । मैं तुम्हें भी साथ लाना चाहता था लेकिन तुम दिल्ली गये हुए थे।"


" अब भी मैं सीधा दिल्ली से आया हूं।"


"मोहिनी दिल्ली से तुम्हारे साथ आई है ?"


"हां । दिल्ली में वो मुझे इत्तफाक से मिल गई थी। मैंने उसे बताया कि ऐसी सनसनीखेज जगह से तुम्हारा बुलावा आया था । वह जिद करने लगी कि मैं उसे भी साथ लेकर चलूं । मेरा तो ख्याल था कि तुम उसे यहां आया पाकर खुश हो जाओगे लेकिन... खैर । तुम अपनी कहो।"


"शुक्ला, तुम्हारे ख्याल से कौन मेरे कत्ल की कोशिश कर रहा हो सकता है ?"


“मुझे तो रत्नाकर देसाई पर शक है ।”


"लेकिन कार तो तुम कहते हो कोई औरत चला रही थी।"


"वह औरत उसकी लड़की हो सकती है। और मेरे लंच में जहर मिलवाने का इन्तजाम वह बखूबी कर सकता है ।"


"लेकिन देसाई जैसा मुअज्जिज आदमी कत्ल जैसी हकीर हरकत पे उतर आये... कमाल है ।”


"मुझे सिर्फ शक है उस पर । वैसे ही जैसे यहां मौजूद और लोगों पर है । लेकिन मेरे पास किसी के खिलाफ कोई सबूत नहीं है । वैसे मेरे मौत से फायदा यहां मौजूद हर किसी को है । मेरी इंडस्ट्री का कन्ट्रोल मेरे कर्मचारियों के हाथ में जाते ही शेयर मार्केट में हमारे स्टॉक की कीमत घट जायेगी । इससे देसाई को लाखों का घाटा होगा। मेरे चचेरे भाई महेन्द्र वर्मा का पत्ता तो मेरी सरपरस्ती हटने के बाद कतई कट जायेगा, मेरे जनरल मैनेजर माथुर की नौकरी भी मेरे बाद छूट सकती है । लेकिन वह और वजह से मेरी मौत की कामना कर रहा हो हो सकता है।"


" और कौन-सी वजह ?"


"दो साल पहले इनसे कम्पनी का दो लाख रूपया गबन किया था और मैंने इसे पकड़ लिया था । वह बड़ी आसानी से तीन-चार साल की जेल की हवा खा जाता लेकिन उसकी बीवी मालती की फरियाद पर मैंने उसे छोड़ दिया था और नौकरी से भी नहीं निकाला था । तब से वो अपने आप को सुधर गया जाहिर करता है। वैसे खतरे की तलवार मैंने उसके सिर से अज तक नहीं हटाई ।”


"मतलब ?"


"मेरे पास उसका हल्फिया बयान है कि उसने गबन किया था । मैं उसे जब चाहूं जेल भिजवा सकता हूं।"


"फिर... सुधरा क्या वो ? फिर तो यूं कहो की जेल जाने का खतरा उसे कन्ट्रोल में रखे हुए है ।"


"हां ! इसलिए मुझे उस पर शक है कि वह मुझे जहन्नुम रसीद करने में दिलचस्पी रखता हो सकता है । "


"ओह !"


"जयन्त मलकानी मेरा पार्टनर है । धंधे की हर ऊंच-नीच में हमेशा मेरा साथ दिया है। कल तक वह मेरे लिए भाई जैसा था लेकिन जब से मैंने उसे अपने व्यापार का मालिक अपने कर्मचारियों को बनाने का फैसला किया है वह सरासर मेरे खिलाफ हो गया है और अपनी भावनाओं को मुझसे छुपाने तक की कोशिश नहीं करता । इसलिए मैंने उसे भी एस कत्ल की दावत में शरीक किये जाने के काबिल समझा था ।"


"हूं।"


“चार आदमी तो हो गये जिन पर मुझे शक है । लेकिन क्योंकि मुझे कुचलने को आमदा कार कोई औरत चला रही थी और जहर भी आमतौर पर औरतों का हथियार माना जाता है इसलिए मेरा ध्यान अपनी जानकारी के दायरे की ऐसी औरतों की तरफ आ गया जो मेरा जान ले सकती थीं । ऐसी एक औरत तो मुझे रजनी बाला लगी । तुम्हें याद होगा कि मैं उससे शादी करने से बाल-बाल बचा था और उसके कोप का शिकार होने से बचने के लिए मुझे कितने ही दिन बम्बई से गायब हो जाना पड़ा था । उसके बाद भी वह मुझे धमकी भरी चिट्ठियां भेजती रहती थी कि वो मेरा कत्ल करवा देगी । रजनी बाला को यहां बुलाने की एक और वजह यह भी है कि जिस रोज मेरे लंच में जहर मिलाया गया था उस रोज वह ऑफिस में मुझसे मिलने की नीयत से आई हुई थी । "


"आई सी ।"


"कत्ल की इस दावत की आखिरी मेहमान है ऊषा भटनागर । यह भी मुझसे इसी बात से खफा है कि मैंने उससे शादी नहीं की । शुक्ला, यह औरत दो शादियां पहले ही कर चुकी है और इसके दोनों पति बड़ी रहस्यपूर्ण स्थितियों में एक्सीडेंट के शिकार होकर अपनी जान से हाथ धो चुके दोनों एक्सीडेंट के दौरान ऊषा अपने पतियों के साथ थी । जब मुझे ये बात मालूम हुआ तो मैं पीछे हट गया था। मैं नहीं चाहता था कि मेरा भी अंजाम उसके पहले दो पतियों जैसा ही हो । एक पार्टी के दौरान जब मैंने उसे बाहर ले जाकर लान की तन्हाई में ले जाकर उससे शादी करने में अपनी असमर्थता प्रकट की थी तो वह ऐसे बिफरी थी कि उसने माली की दराती से मेरा गला काट देने की कोशिश की थी । ऊषा मुझे बड़ा काबिल बिजनेसमैन मानती है इसलिए उसका बहुत रूपया हमारी कम्पनी के शेयरों में लगा हुआ है । कम्पनी का निजाम बदलने से होने वाले घाटे से वह भी बेखबर नहीं । और दौलत की वह दीवानी है । "


" इसलिए वह तुम्हारी खून कर सकती है ।"


"हां ।"


"बाकी जने भी तुम्हारा खून कर सकते हैं ?"


"हां ! मैं किसी न किसी तरीके से इन लोगों को यहां बुलाने में कामयाब हो गया हूं। देखो, छुपकर किये गये वार से बचना मुश्किल होता है, लेकिन जब पता हो कि वार होने वाला है तो उससे बचने का इन्तजाम किया जा सकता है । यहां के सारे कर्मचारी प्रशिक्षण प्राप्त जासूस हैं । यहां हार किसी को बारी-बारी अपने कत्ल का मौका देने का मेरा इरादा है । फर्क सिर्फ यही होगा कि मैं तैयार होऊंगा और यह बात मेरे हमलावर को मालूम नहीं होगी। शहरों में बहुत भीड़ होती है। वहां आदमी की करतूतें छुप जाती हैं लेकिन यहां ऐसे नहीं हो सकेगा ।”

"इस कत्ल की दावत में" - शुक्ला हंसता हुआ बोला "तुमने मुझे क्यों नहीं बुलाया ? तुम जानते ही हो की तुम्हारी वसीयत में मेरा भी जिक्र है । तुम्हारी मौत से तुम्हारी दौलत का एक हिस्सा मुझे भी मिलने वाला है और तुम यह भी जानते हो कि आजकल मैं पैसे से तंग हूं । तुम्हारी मौत से हाथ आने वाला मोटे माल से मेरा भी कल्याण हो सकता है । फिर तुमने मुझे क्यों नहीं बुलाया ? या शायद तुमने सोचा था कि मैं जब यह सब सुनूंगा तो खुद ही चला आऊंगा ?" -


अरविन्द ने जोर से अट्टहास किया और फिर बोला "बहरहाल मुझे खुशी है कि तुम आये हो ।" -


"लेकिन तुम्हें मुझे तभी खबर करनी चाहिए थी जब तुम्हारे लंच में जहर मिलाया गया था या जब किसी औरत की कार के नीचे आने से बचने के लिए तुम खुले गटर में कूदे थे । यहां भी तुम कत्ल की दावत का आयोजन किये बैठे हो और मुझे ही खबर नहीं । अरविन्द, मैं नहीं मानता कि इस माहौल में इतने सीमित लोगों के बीच कोई तुम्हारा कत्ल करने की कोशिश करेगा । तुम्हारी यह स्कीम निश्चय ही फेल हो जायेगी ।”


"नहीं होगी । तुम्हारी जानकारी के लिये मेरे कत्ल की एक कोशिश तो आज सुबह हो चुकी है । "


"क्या ?"


"हां । आज सुबह रत्नाकर देसाई ने मुझे शूट करने की कोशिश की थी ।"


" देसाई ने तुम पर गोली चलाई थी ?" - शुक्ला अविश्वासपूर्ण स्वर में बोला ।


" आमादा था वो गोली चलने के लिये लेकिन मैंने ऐसी नौबत नहीं आने दी थी ।"


अरविन्द ने उसे पूरी कहानी सुनाई।


"तौबा !" - शुक्ला के मुंह से निकला ।


"देख लेना वो अभी फिर कोशिश करेगा ।"


"मेरे ख्याल से तो अगर उसे अकल होगी तो यहां रुकेगा भी नहीं ।"


"रुकना तो उसे पड़ेगा। दो हफ्ते के लिए यहां हर कोई गिरफ्तार है । दो हफ्ते से पहले यहां से कोई नहीं जा सकता । मेरे दोनों हेलीकाप्टर अभी यहां से लौट रहे हैं । वे अब दो हफ्ते बाद ही वापिस लौटेंगे।"


"कमाल है ।"


"शुक्ला, तुमसे मैं ये चाहता हूं कि तुम मेरी नई वसीयत तैयार करके दो । नई वसीयत की बात यहां लोगों के कानों में भी डाल देना । हर किसी को जता देना कि मैंने उससे ये लिखवाया है कि अगर मैं मर जाऊं तो भी मेरा बिजनेस मेरे कारखानों के कर्मचारियों को ही हस्तांतरित किया जायेगा । और यह काम मेरे यहां से मुम्बई लौटते ही हो जायेगा ।"


"ठीक है। अपने कत्ल का मौका तुम देसाई के अलावा किसी और को भी दे चुके हो ?"


“हां । अपने भाई को। मैं उसके साथ फिशिंग के लिये गया था। मैंने एक रिवाल्वर जानबूझकर किश्ती में उसके समीप रखी थी । वह उसके तरफ हाथ बढाता तो मैं अपनी रिवाल्वर से पहले ही उसे कवर कर लेता लेकिन उसने ऐसी कोशिश ही नहीं की थी ।"


“कोई आ रहा है ।”


अरविन्द ने पेड़ों की ओट में से सामने झांका ।


"यह मेरे जनरल मैनेजर की बीवी मालती माथुर की सेक्रेट्री मंजुला है ।" - वह बोला - "बड़ी खूबसूरत लड़की है । ताजा खिला हुआ गुलाब मालूम होती है। नौजवानी....


“छोड़ो । मालती माथुर साथ सेक्रेट्री लेकर क्यों आई है ?"


"वह लेखन में दिलचस्पी रखती है। आजकल भी एक उपन्यास लिख रही है । स्क्रिप्ट तैयार करने के लिये उसे सहायक चाहिये होती है इसलिए मंजुला को साथ लेकर आई है।"


"खूबसूरत तो यह वाकई बहुत है।" - शुक्ला ने स्वीकार किया - "क्या कोई फिल्म अभिनेत्री भी मुकाबला करेगी इसका ?"


"बिलकुल ।"


"अब मेरी समझ में आया कि मोहिनी के यहां आने पर खुश क्यों नहीं हुये हो ।"


अरविन्द ने उतर नहीं दिया। लेकिन वह महसूस करता था कि मंजुला को देखकर उसके दिल में ऐसा कुछ होने भूल लगता था कि वह एकबारगी तो वाकई अपनी मंगेतर को जाता था । न जाने क्यों उसे ऐसा लगता था कि वह उस लड़की को जनता था।


लेकिन यह उसका वहम हो सकता था ।


"हल्लो !" - लड़की समीप पहुंची तो शुक्ला बोला ।


"हल्लो, सर ।" - वह अपने चेहरे पर एक बड़ी स्निग्ध मुस्कराहट लाती हुई बोली- "मैंने आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया ?"


" हरगिज नहीं । उलटे तुम्हारे यहां आने से तो रौनक आ गई है।"


"थैंक्यू ।"


न जाने क्यों शुक्ला का मंजुला से फ्लर्ट करना अरविन्द को अच्छा नहीं लगा ।


"चलो।" - वह उसकी बांहें पकड़कर खीचता हुआ बोला।


"तुम जाओ।" - शुक्ला बोला - "मैं तो जरा इनके साथ टहलकर आता हूं।"


"मैं और आगे नहीं जा रही ।" - मंजुला बोली ।


'शुक्ला ।" - अरविन्द तनिक अधिकारपूर्ण स्वर में बोला - "हमने बहुत काम करना है ।”


शुक्ला ने लड़की का अभिवादन किया और अरविन्द के साथ हो लिया ।