यानि कि कोई पहले से ही अपने लिए एलीबाई तैयार कर रहा था ।
लेकिन कौन ? कौन यह चाहता था कि मौत के बाद उसके कत्ल के लिए जिम्मेदार जंगल में मौजूद अजनबी ठहराया जाए ।
कैसी मजेदार बात थी ? जंगल में अस्तित्वहीन हत्यारे की तलाश में और लोगों के साथ असली हत्यारा भी शामिल होता और सबको वेबकूफ बनाकर मन ही मन अपनी कामयाबी पर अट्टहास कर रहा होता ।
अब वह क्या करे ?
वहां रुकना तो अब बेकार था । अगले रोज दूरबीन लेकर नन्दी हिल भी जाना बेकार था । जंगल में किसी अजनबी का अस्तित्व हो ही नहीं सकता था ।
उसे अपने आप से शिकायत होने लगी कि पहले उसने अपना भेजा इस्तेमाल क्यों नहीं किया था ? उसने अक्ल की जगह एक्शन को तरजीह क्यों दी थी ? उसने यह क्यों नहीं सोचा था कि जो आदमी उसका कत्ल करना चाह रहा था वह एक्शन से ज्यादा अक्ल से काम ले रहा था । उसके सभी मेहमान पढ़े-लिखे और समझदार आदमी थे और सब अपना भेजा इस्तेमाल करने में सक्षम थे। ऐसे लोगों के मुकाबले में अब तक उसने जो हरकतें की थीं, वे अब उसे बचकानी और हास्यापद लगने लगीं ।
उसे अब तक हुई एक एक बात का बड़ी बारीकी में विश्लेषण करना जरूरी लगने लगा ।
जो आदमी बम्बई में उसके खाने में जहर मिलवाने की कोशिश कर सकता था वह जंगल में कपोल कल्पित आदमी के अस्तित्व की स्थापना भी कर सकता था । जो आदमी जनाने कपड़े पहनकर उसे कार के नीचे कुचलने की यूं कोशिश कर सकता था कि अगर वह खुले गटर में न कूदा होता तो...
एकाएक वह जड़ हो गया ।
उसके जहन में अपने वकील राजेश शुक्ला की बात हथोड़े की तरह बजने लगी- "लेकिन तुम्हें मुझे खबर करनी चाहिए थी जब तुम्हारे लंच में जहर मिलाया गया था या जब किसी औरत की कार के नीचे आने से बचने के लिए तुम खुले धीरे से वापिस घूमा ।
सामने शुक्ला खड़ा था ।
उसे गटर वाली बात जरा ही देर में सूझी थी ।
उसकी जान लेने की दोनों कोशिशों की खबर अखबार में नहीं छपी थी । शुक्ला डेढ़ महीने से दिल्ली में था । अरविन्द ने सिर्फ उसे बताया था कि किसी ने उसे अपनी कार के नीचे कुचल देने की कोशिश की थी लेकिन उसने यह नहीं बताया था कि उस कोशिश से वह बचा कैसे था । लेकिन फिर भी शुक्ला को मालूम था कि कार की चपेट में आने से वह सड़क के बीचों बीच खुले पड़े गटर में कूद जाने के वजह से बचा था । यह बात उसे आंखों से देखे बिना नहीं मालूम हो सकती थी ।
शुक्ला निश्चय ही जनाने परिधानों में कार खुद चला रहा था । काश यह बात उसे थोड़ी देर पहले सूझ गई होती ।
उसने देखा शुक्ला के चेहरे पर दृढ प्रतिज्ञा के भाव थे और होंठों पर एक क्रूर मुस्कराहट थी । जाहिर था कि वह उसको शूट करने में सेकंड के लिए भी नहीं हिचकने वाला था |
"मुझसे यह नहीं पूछोगे कि मैं तुम पर रिवाल्वर क्यों ताने हुए हूं ?" - शुक्ला बोला ।
“नहीं ।” - अरविन्द सहज भाव से बोला - "मुझे अभी सूझा है कि मेरे कत्ल की तमाम कोशिशें तुमने की हैं । दस मिनट पहले मुझे यह सूझा होता तो बाजी उलटी होती । तब मेरी रिवाल्वर का रुख तुम्हारी छाती की ओर होता और तुम हाथ उठाए खड़े होते ।"
“यानी कि मैं बाल-बाल बचा हूं। मेरी जुबान से अनायास ही गटर के बारे में बात निकल गई थी, मैं यही सोच रहा था कि उसकी अहमियत कब तुम्हारी समझ में आएगी । मैं बहुत सस्पेंस में था। मुझसे और इंतजार नहीं हो रहा था । अच्छा हुआ मेरे धीरज का बांध टूट गया मैंने और इंतजार नहीं किया ।"
अरविन्द खामोश रहा ।
“अरविन्द, मैं तुम्हारा वकील ही नहीं, तुम्हारा दोस्त भी हूं। मैं तुम्हें पसंद करता हूं, तुम्हारी इज्जत करता हूं । लेकिन तुम्हारा कत्ल करना मेरी मजबूरी है । तुम्हारा कत्ल ही मुझे मेरी मौजूदा दुश्वारियों से निजात दिला सकता है। मैंने बताया ही था कि आजकल मैं पैसे से तंग हूं। मैं न सिर्फ तंग कर्जदार भी हूं और कर्जदार मैं ऐसे लोगों का हूं जो मुझे जेल नहीं भिजवाएंगे अपना रूपया वापिस न मिलने के सूरत में जो यूं उसने अपने हाथ से चुटकी बजाई - मेरा कत्ल करवा देंगे। तुमने अपनी वसीयत में अपनी दौलत का एक हिस्सा मेरे नाम भी लिखा है, इसी बात ने तुम्हारी मौत बुलाई है । अब तुम मुझे वसीयत बदलने को कह रहे हो और अपनी दौलत मजदूरों के हवाले करने के लिए आमदा हो, इसलिए नई वसीयत साईन होने से पहले तुम्हारा मर जाना मेरे लिए और भी जरूरी है । तुम्हारा दोस्ती में किसी को उधार न देने का उसूल भी आज तुम्हारी मौत का कारण बन रहा है । मैं तुमसे कोई रकम भी तो नहीं हासिल कर सकता था । खैर । अब अपनी मौत के लिए तैयार हो जाओ, दोस्त ।”
"मुझे मारने से पहले इतना तो अपने मुंह से कबूल कर लो कि बम्बई में मेरे लंच में जहर तुमने मिलवाया था ।"
"दुरुस्त ।"
"जनाने कपड़े पहनकर कार चलाते समय मुझे कार के नीचे कुचल देने की कोशिश तुमने की थी ।"
"हां"
"यह जंगल में गोली चलाने और आग वगैरह से किसी की मौजूदगी का आभास देने वाली स्टेज भी तुम्हीं ने सेट की थी ?"
"बिल्कुल ।”
"बद्री पर तीर भी तुम्हीं ने चलाया था ?"
"हां। मुझे मालूम होता कि तुम्हारी जगह पर वह सोया हुआ था तो न चलाता।”
"और यह बात तुम्हें रात को ही मालूम हो गई थी कि मरा मैं नहीं कोई और था । "
"हां । अब बराय मेहरबानी तुम रेलिंग के पास से हटकर जरा पानी के करीब हो जाओ ताकि गोली खाने के बाद तुम्हारी लाश पानी में जा गिरे। "
"एक और बात बता दो ?"
“जल्दी पूछो ।”
"तुम अभी गोली चलाओगे तो गोली की आवाज लॉजbहैं, कुछ में भी सुनाई देगी। कुछ लोग अभी भी जाग रहे हैं, आवाज सुनकर आ जाएंगे। लोगों को फौरन मालूम चल जाएगा कि तुम लॉज में मौजूद नहीं हो। फिर क्या तुम पर शक नहीं किया जायेगा ?"
"कौन कहता है गोली चलाने के वक्त मैं लॉज में मौजूद नहीं था ?" - वह हंसता हुआ बोला ।
"क्या मतलब ?"
"तुम क्या मुझे बेवकूफ समझते हो ? तुम्हें उस ऊदबिलाव के बच्चे की याद है जो मलकानी और मोहिनी पकड़ कर लाये थे?"
"हां"
"इस वक्त वह मेरे कमरे के बाथरूम में मौजूद है। मैंने उसे बाथटब में में बिठा कर एक रस्सी के सहारे उसकी गर्दन नल के टूंटी के साथ बांध दी है । नल को मैंने चालू कर दिया है और बाथटब से पानी की निकासी का ढक्कन मैंने निकाल दिया है। पानी टब में जमा होता है और बहता जाता है और उस पानी में बंधन मुक्त होने की कोशिश में लगा ऊदबिलाव अपनी पूंछ पटक रहा है। उसकी पूंछ पटकने से होती छप-छप की आवाज बाहर गलियारे में सुनाई देती है । गोली की आवाज सुनकर जब लोग गलियारें में आयेंगे तो वह आवाज वे भी सुनेंगे । सब यही समझेंगे कि गोली चलते वक्त मैं बाथरूम में मौजूद था । वहां से निकलकर जिस्म सुखाने में और कपड़े पहनने में वक्त लगता ही है । उतने वक्त में मैं खिड़की के रास्ते चुपचाप अपने कमरे में पहुंच जाऊंगा । मेरे भाई खिड़की के रास्ते अगर तुम अपने कमरे में चुपचाप आ सकते हो तो यही काम कोई दूसरा नहीं कर सकता ?"
“जरूर कर सकता है। मैं कबूल करता हूं कि तुम बहुत होशियार हो । मैं यह भी कबूल करता हूं कि इस वक्त तुरुप के सारे पत्ते तुम्हारे हाथ में हैं... सिवाय..." - वह एक क्षण ठिठक कर बोला - "एक पत्ते के ।”
"क्या मतलब ?"
“मिसेज माथुर की सेक्रेट्री, मंजुला जिसे पहली बार देखते ही तुम्हारी लार टपकने लगी थी, इस वक्त अपने हाथ में एक रिवाल्वर लिए और उससे तुम्हारी खोपड़ी का निशाना बनाये तुम से सिर्फ दो फुट पीछे खड़ी है ।"
"यह घिस्सा और किसी को देना ।" - शुक्ला पीछे घूमने का प्रयत्न किये बिना उपहासपूर्ण स्वर में बोला - "ऐसे घिस्से फिल्मों और जासूसी नोवलों में ही चलते हैं। तुम चाहते हो कि मैं पीछे घूमकर देखूं और तुम मुझ पर झपट पड़ो। मैं तुम्हारी ऐसी किसी चाल से बेवकूफ बनने वाला नहीं ।"
"मर्जी तुम्हारी ।"
"भगवान को याद कर लो ।"
एक फायर हुआ ।
शुक्ला का भेजा उड़ गया । वह औंधे मुंह अरविन्द के कदमों में गिरा ।
“मर गया ?" - रिवाल्वर को अभी भी नीचे गिरे शुक्ला पर ताने मंजुला ने पूछा ।
"हां ।" - अरविन्द बोला ।
एकाएक मंजुला ने रिवाल्वर जमीन पर फेंक दी । उसका शरीर एक बार जोर से कांपा और फिर हवा में लहराया । अरविन्द ने झपटकर उसे सम्भाल न लिया होता तो वह शुक्ला की लाश की बगल में ही ढेर हो गयी होती । अरविन्द ने उसे लाश से बहुत परे ले गया ।
"मैंने आपका कहना नहीं माना ।" - वह क्षीण स्वर में बोली - "अच्छा हुआ मैंने आपका कहना नहीं माना ।”
“लेकिन तुम यहां कैसे पहुंच गई ?" - अरविन्द ने पूछा - "क्या शुरू से ही तुम मेरी ताक में थी ?"
"नहीं । मैं तो चली ही गई थी लेकिन मैं सो नहीं सकी थी । मेरा ध्यान आपकी ही तरफ लगा हुआ था । आपके कमरे से आपकी कोई आहट लेने की नीयत से मैं गलियारें में पहुंची थी तो, मैंने देखा कि इसके" - उसने दूर पड़ी शुक्ला के लाश की ओर संकेत किया "कमरे के दरवाजे के नीचे पानी बह-बहकर बाहर गलियारों में निकल रहा था। मैंने दरवाजे पर दस्तक दी तो भी नतीजा फिर सिफर निकला । दरवाजा भीतर से बंद था । उत्सुकतावश मैं बाहर के तरफ से इसके बाथरूम की खिड़की पर पहुंची । खिड़की खुली थी । मैंने उसके पल्ले धकेल के भीतर झाका तो पाया बाथरूम में नल के साथ ऊदबिलाव बंधा हुआ था । उसकी पूंछ बाथटब से पानी के निकासी के रास्तें में फंसी हुई थी और पानी टब से निकलना बंद हो गया था। टब ऊपर तक भरा हुआ था, नल अभी भी चल रहा था और पानी बाहर बहा जा रहा था । मैं फौरन समझ गई कि सारी मुसीबत की जड़ शुक्ला था। मैंने आपको डॉक की तरफ जाते अपने कमरे के खिड़की में से देखा था। मैं खुदा का... फौरन रिवाल्वर सम्भाले उधर बढ़ी । शुक्र है उसका शरीर फिर पत्ते की तरह कांपा - "कि ऐन वक्त पर इस कमीने के पीछे पहुंच गई।"
" मैंने तुम्हें आते देखा लिया था। इसीलिए मैं किसी न किसी तरह उसे बातों में लगाये रहा था ताकि तुम करीब पहुंच सको । दूर से शायद तुम उसे अपनी गोली का निशाना न बना पाती । "
"मुझे यही करिश्मा दिखाई दे रहा है कि मैं करीब से उसे अपनी गोली का निशाना बना पाई।"
“आज तुमने मेरा कहना नहीं माना । इसी वजह से मेरी निश्चित मौत टल गई ?"
"मैं आपका हर कहना नहीं मान सकती । अगर आप मुझसे अपना हर कहना मनवाना चाहते हैं तो मैं समझुंगी कि आपको एक बीवी की नहीं नौकरानी की जरूरत है ।”
उस बोझिल वातावरण में भी अरविन्द की हंसी निकल गई । फिर उसने खींचकर उसे अपने गले लगा लिया ।
दोस्तों की महफिल से एक दुश्मन के निकलते ही लॉज का माहौल बदल गया । अब किसी के दिमाग पर टेंशन का बोझ न रहा । राजेश शुक्ला की मौत का किसी को रत्ती भर अफसोस नहीं हुआ । ।
फिर अरविन्द की आखिरी समस्या इतनी सहूलियत से हल हो गई कि वह खुद हैरान हो उठा ।
मोहिनी ने खुद ही उससे कह दिया था कि वह शादी नहीं कर सकती थी। उसे उसके पार्टनर जयन्त मलकानी से मुहब्बत हो गई थी और वह उसी से शादी करना चाहती थी ।
फिर उसने भी मंजुला से अपने शादी के इरादे की घोषणा कर दी । हर किसी ने सच्चे दिल से उन्हें बधाई दी ।
खास तौर से मालती माथुर ने ।
समाप्त
0 Comments