शायद वह किसी खास मकसद से जान बूझकर वहां आई थी । शायद दिल्ली में शुक्ला से इत्तफाक से नहीं मिली थी बल्कि वह स्पेशल वहां यही जानने के लिए गई थी कि अरविन्द कहां था । उसे यह भी मालूम था कि अरविन्द अपनी वसीयत बदलने वाला था । पुरानी वसीयत के अनुसार उसे लाखों का माल मिल सकता था जब कि नई वसीयत में से उसका जिक्र ही गायब हो सकता था । वह भी वसीयत बदलने की नौबत आने से पहले उसकी मौत की कामना कर रही हो सकती थी उसकी मौत बुलाने की।


हर किसी से उसको जान का खतरा था। पता नहीं उसे नशा हो गया था जो मालती जैसी नेकनीयत स्त्री और जवाहार सिंह जैसा वफादार आदमी भी उससे अपने दुश्मन लगने लगे थे । मालती अपने पति की खातिर खून कर सकती थी । जवाहर को देसाई दौलत से खरीद सकता था ।


ऊपर से जंगल में मौजूद अजनबियों का खतरा ।


अब क्या करे वह ?


मुसीबत यह थी कि खुद उसने ऐसा इंतजाम किया था कि अगर वह भी चाहता तो दो हफ्ते का वक्त पूरा होने से पहले वह अपनी हेलीकाप्टर वापिस बुलवा सकता था । यानी कि औरों की तरह वह भी वहां फंसा हुआ था और अब चाहकर भी सभ्यता के दामन में नहीं पहुंच सकता था।


हत्यारे के चेहरे से नकाब हटाने के लिए अब तक उसने जो भी खतरे मोले थे, वे उसे बेमानी और मूर्खतापूर्ण लगने लगे थे । अगर देसाई ने बातों में लगने की जगह तुरंत गोली चला दी होती तो ?


अगर नन्दी हिल पर रस्सी टूट गई होती तो ?


अगर माथुर ने डोंगी को धक्का दे दिया होता और वह समय रहते उसके तले से बंधा चप्पू न खोल पाया होता तो ?


अगर महेन्द्र गोली चलाने से न हिचकिचाया होता तो ?


अगर ऊषा ने उस पर छुरा चला दिया होता और वह उसका हाथ न पकड़ पाया होता तो ?


क्या पता उस वक्त भी जंगल का कोई अजनबी आदमी उसे अपनी रायफल का निशाना बनाने की ताक में बैठा हो ।


जब से वह वहां आया था तब से पहली बार उसे चिंता के साथ-साथ भय भी लगा । उस रात उसने जवाहर सिंह को आज की बहुत सख्त पहरेदारी करवाने का निर्देश दिया ।


डिनर समाप्ति पर था जब वह डायनिंग हाल में पहुंचा ।


जैसे तैसे करके उसने भोजन किया । फिर वे सब ड्राइंग रूम में इकट्ठे हुए और मनोरंजन का सिलसिला आरम्भ हुआ ।


ग्यारह बजे के करीब माथुर दम्पति वहां से विदा हो गए । फिर थोड़ी देर के लिए अरविन्द ने ब्रिज की टेबल छोड़ी तो मोहिनी उसे पकड़कर एक तरफ ले गई।


"क्या हुआ है तुम्हें ?" - वह बोली ।


"कुछ भी नहीं" - वह बोला- "मैं तो एकदम ठीक हूं "


उसने एक बार गौर से ऊपर से नीचे तक देखा और फिर बोला - "उलटे तुम मुझे कुछ परेशान और उखड़ी-उखड़ी लग रही हो ।"


"मुझे मालूम है" - वह धीरे से बोली- "मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूं।"


"क्या ?"


उसने एक बार चारों ओर यह देखने के लिए निगाह फिराई कि कोई उनकी बात सुन तो नहीं रहा था। फिर उसने गहरी सांस ली । कुछ कहने के लिए अपने आपको तैयार किया लेकिन फिर उसकी हिम्मत दगा दे गई ।


"कुछ नहीं ।" - वह बोली ।


"फिर भी ?"


"छोड़ों कोई बात नहीं है । तुम थके हुए लग रहे हो । जाकर आराम क्यों नहीं करते हो ? मैं तो जा रही हूं।"


वह सबको गुडनाइट कहकर वहां से चली गई ।


देसाई ने ब्रिज की मेज से आवाज दी - "खेल तो ठंडा पड़ता जा रहा है । क्यों न कल जंगल की तलाश का कोई प्रोग्राम अभी निर्धारित कर लिया जाए।"


अरविन्द ने सहमति में सिर हिलाया । उसने उस इलाके का नक्शा निकाला । फिर सारे मर्द सिर जोड़कर जंगल छानने की स्कीम बनाने लगे ।


एक घंटे बाद वह महासभा बर्खास्त हुई और सब लोग वहां से विदा हो गये । ऊषा और रजनी बाला तो नक्शा खोले जाने से पहले ही जा चुकी थीं ।


अरविन्द भी अपने बैडरूम में लौटा। उसने बत्तियां बुझा दी और पलंग पर बैठ गया । अपना शोल्डर होल्स्टर छाती से खींचकर उसने अपनी गोद में रख लिया । भारी रिवाल्वर के निरन्तर दबाव और बोझ से उसकी बाई बगल दुखने लगी थी। वह सोच रहा था कि क्या नदी और खुश्की के रास्ते वहां से कूच कर जाने की कोशिश करे ?


लेकिन क्या यूं भयभीत होकर भाग निकलना मर्दानगी की बात थी ?


नहीं । वह हत्यारे का पर्दाफाश करके ही वहां से जायेगा । आखिर उसकी जिन्दगी के साथ-साथ उसके मेहमानों की जिंदगियां भी तो खतरे से घिरी हुई थीं । हत्यारा तो एक था लेकिन उसके शिकार तो एक से ज्यादा हो सकते थे।


तभी बाहर से आती एक हलकी सी आहट कान में पड़ी । वह सावधान हो गया । उसने होस्ल्टर से रिवाल्वर निकाल कर हाथ में ले ली और खिड़की पर पहुंचा ।


उसने सावधानी से बाहर झांका ।


बाहर की छत पर उसे दीवार के साथ चिपका बैठा एक साया दिखाई दिया । साया तनिक हिला तो उसे जनानी पोशाक का आभास मिला और उसकी गोद में रखी रिवाल्वर का लोहा चमका ।


"मंजुला !" - वह वह फुसफुसाकर बोला ।


वह हड़बड़ाई ।


“नमस्ते !" - फिर वह संभलकर बोली ।


अरविन्द ने खामोशी से खिड़की पूरी खोली और उसे फांदकर वह मंजुला के पास पहुंच गया । वह भी उसके समीप दीवार के पास पीठ लगाकर बैठ गया । अपनी रिवाल्वर उसने मंजुला की तरह अपनी गोद में डाल ली ।


"यहां क्या कर रही हो ? - वह फुसफुसाया ।


"रखवाली !" - वह सहज भाव से बोली ।


"तुम पागल हो ।"


"कुछ भी कहिये पर एक बात आपको माननी पड़ेगी"


"क्या ?"


"मेरे जैसा सुन्दर चौकीदार आपको दूसरा नहीं मिलेगा


"अपने मुंह मियां मिट्ठू मत बनो ।”


“अच्छा ।”


"तुम अपनी जान से हाथ धो बैठोगी ?"


"उससे तो मैं पहले ही हाथ धो बैठी हूं । मेरी जान अब मेरी जान कहां है । उसे तो मैं छ: साल की थी जब मैंने किसी के हवाले कर दिया था ।”


अरविन्द का दिल प्यार से भर आया । एक क्षण के लिए वह अपनी जान पर मंडराते खतरे को भूल गया अपनी मौत कि जगह अब उसे खूबसूरत झीलें, चमकीले सितारे, हवा को खुशगवार बनाते फूल दिखाई देने लगे । उसकी आंखों के सामने वह नजारा घूम गया जब उसने मंजुला को अपनी बांहों में लेकर उसके होंठों पर एक चुम्बन अंकित किया था । अजीब लडकी थी । उसका जी चाहा कि वह उसका हाथ थाम ले और फिर उसे कभी न छोड़े ।


इसे सारी रात मेरी खिड़की के बाहर बैठे रहने से कोई एतराज नहीं - उसने मन ही मन सोचा और मुझ पर अहसान जताना तो दूर, यह तो यह भी नहीं चाहती थी कि इस बात को मुझे खबर लगती । ऐसी निष्ठा की उम्मीद क्या मैं मोहिनी से कर सकता हूं? उसे मालूम है कि उसके होने वाले पति के सिर मौत मंडरा रही है लेकिन वह अपने बैडरूम में सोयी पड़ी है। -


उस क्षण उसने मंजुला को अपनी बनाने का पक्का फैसला कर लिया ।


उसने हाथ बढ़ा कर उसे अपने आगोश में खींच लिया । मंजुला उसके साथ सट गयी ।


“अब मैं क्या कहूं ?" - वह बोला ।


"कुछ भी नहीं।" - वह बोली- “जो आप कहना चाहते हैं, वह मुझे मालूम है ।"


"अच्छा ।"


"हां ।" - वह पूरे विश्वास के साथ बोली ।


"अब मुझे मोहिनी से पीछा छुड़ाना होगा ।"


“क्या जरूरत है ? आप इतने बड़े आदमी हैं । क्या आप दो बीवियां नहीं रख सकते ?"


"बकवास मत करो।"


“अच्छा ।"


"पहले हमने इस मौजूदा मुसीबत से निजात पानी है जिसमें मैं फंसा हुआ हूं।"


"हां" "क्या हां ?"


"आप ठीक कह रहे हैं । "


"जानती हो ?"


"क्या ?"


"तुम्हारी यहां मौजूदगी का आभास मिलने से पहले मैं कायरों की तरह यहां से भाग निकलने की सोच रहा था ।"


" और अब ?"


“अब जो होगा देखा जायेगा । अब मैं अपने दुश्मनों का डट कर मुकाबला करूंगा।"


"वैरी गुड | मैं आपके साथ हूं।"


"नहीं । तुम यहां से फूटो और जाकर सो जाओ।"


"मैं नहीं जाऊंगी ।”


"जानती हो पत्नियों में मुझे सबसे ज्यादा कौन सी बात नापसंद है जिसकी वजह से चालीस साल की उम्र तक शादी नहीं की ?"


"नहीं ! क्या ?"


"कि वे अपने पतियों का कहना नहीं मानती । क्या तुम भी मुझे ऐसी शिकायत का मौका देना चाहती हो ?"


"नहीं । आप कहते हैं तो मैं चली जाती हूं।"


"शाबाश ।”


खिड़की के रास्ते वो दोनों अरविन्द के बेडरूम पहुंचे । फिर वह उसे गलियारे तक छोड़ने गया ।


गलियारे के आखिरी सिरे पर केवल एक बत्ती जल रही थी और सारे बैडरूमों के दरवाजे बंद थे । उसे अपने पति की किसी बात के जवाब में मालती की खनकती हुई हंसी सुनाई दी । उससे अगला कमरा मोहिनी का था जिसमे इतने रात गये भी स्टीरियो चलने की आवाज आ रही थी। उसके सामने उसका अपना और उसके पार्टनर का कमरा था । उसके पार्टनर की खर्राटे की आवाज बाहर तक आ रही थी । बाकी कमरों में खामोशी थी ।


एक नए जोश-खरोश से भरा हुआ वह वापिस अपने कमरे में पहुंचा। जंगल में मौजूद अजनबियों के बारे में उसने पहले ही एक योजना बना ली थी । कल उसने एक शक्तिशाली दूरबीन के साथ नन्दी हिल की चोटी पर जाने का फैसला किया था । वहां से दूर-दूर तक सारा जंगल दिखाई देता था और दूरबीन की सहायता से वह वहां होती मामूली सी हरकत भी देख सकता था ।


फिर उसे ख्याल आया कि रात की स्तब्धता में डॉक पर से मामूली से मामूली आवाज भी सुनी जा सकती थी । अगर उसका हत्यारा कोई अजनबी था तो वह उस रास्ते वहां पहुंच सकता था ।


उसने डॉक पर जाने का फैसला कर लिया ।


दस मिनट बाद एक टॉर्च और रिवाल्वर से लैस वह डॉक के अंधेरे कमरे में मौजूद था । वह रेलिंग पर कोहनियां टिकाकर खड़ा हो और आंख और कान खुले रख कर ही किसी नई, आपरिचित घटना के घटित होने की प्रतीक्षा करने लगा ।


वक्त गुजर गया ।


वह एक-एक करके बड़ी तरतीब के साथ पिछले दिनों घटी तमाम घटनाओं को अपने जहन में दोहराने लगा । उसके मानस पटल पर न्यूज रील सी चलने लगी ।


जंगल में मौजूद आदमी कौन हो सकते थे। उसने सोचा- लॉज का कौन सा आदमी उनके सम्पर्क में था जिसने कि उन्हें बताया था कि अरविन्द के कत्ल की पहली कोशिश नाकाम गई थी । लॉज का हर आदमी शिकार या फिशिंग के लिये कभी न कभी जंगल में गया था । कोई भी बड़ी सहूलियत से जंगल में मौजूद अजनबी या अजनबियों से सम्पर्क स्थापित कर सकता था । जवाहर सिंह । राजेश शुक्ला । जयन्त मलकानी । रत्नाकर देसाई । ऊषा भटनागर । रजनी बाला । महेन्द्र वर्मा । कैलाश बिहारी माथुर । उसकी बीवी । मोहिनी । कोई भी अजनबियों से मिला हो सकता था !


“हे भगवान !” - एकाएक उसके मुंह से निकला ।


मिला क्यों ? कोई भी खुद अजनबी हो सकता था । कोई भी जंगल में जाकर वहां आग जला और बुझा सकता था और उसके इर्द-गिर्द खाने पीने के सामान की बचत खुचत बिखेर सकता था ।


यह हरकत खुद महेन्द्र वर्मा की हो सकती थी जो कि इस बात की खबर लाया था। जरूर किसी ने वह स्टेज इसलिए सैट की थी कि यह समझा जाये कि जंगल में कोई और भी लोग थे और जब उसकी हत्या हो जाये तो उन्हीं को हत्या का जिम्मेदार ठहराया जाये जबकि वास्तव में कोई भी नहीं था ।


लेकिन वो गोली चलने की आवाज जो बद्री के दाह संस्कार के वक्त सुनी गई थी ?


एकाएक वह हंसा ।


उसका इन्तजाम करना क्या मुश्किल काम था ? उसका इन्तजाम तो गोली चलने से घंटों पहले किया जा सकता था ? एक रिवाल्वर को जंगल में कहीं फिट करके उसके ट्रिगर के साथ एक डोरी बांध कर उसे एक अलार्म क्लॉक के साथ इस प्रकार जोड़ा जा सकता था कि किसी पूर्वनिर्धारित समय पर जब अलार्म बजे तो अलार्म के हथोड़े से ही डोरी खीचें और रिवाल्वर चल जाए ।