उसके बाद देवा पीटर के गैंग में शामिल हो गया।
पीटर का गैंग ज्यादातर गोवानी लोगों पर आधारित था। शुरुआत में राजस्थान के नौजवान को अपने गैंग में शामिल होते देखकर उन्हें सख्त हैरत हुई थी, कईयों ने नाक-भौंह चढ़ाई थीं। लेकिन ज्यों ही उन्हें मालूम हुआ था कि देवा ही वो नौजवान था, जिसने पलक झपकते ही विनायक शेट्टी जैसे को टपका दिया था, तो सबका व्यवहार बदल गया था।
गैंग वालों ने न सिर्फ गर्मजोशी से उसको 'वेलकम' कहा बल्कि वो उसके करीब होने की होड़ में लग गए थे।
देवा ने कभी भी अपनी जुबान से शेट्टी के कत्ल का न कभी इकरार किया था, न ही इन्कार, न ही उसने कभी इस बारे में शेखी बघारने की कोशिश की थी। इस सिलसिले में अगर कोई देवा को कुरेदने की कोशिश करता भी था तो जवाब में उसे खामोशी के सिवा कुछ नहीं मिलता था। वो मामला यूं ही चलता रहा।
अपनी इतनी सावधानी के बावजूद देवा विनायक शेट्टी के गैंग की तरफ से निश्चिंत नहीं था। उसे यकीन था कि उन लोगों की तरफ से कोई-न-कोई बदले की कार्रवाई जरूर की जाएगी। कोई-न-कोई उससे बदला लेने की कोशिश जरूर करेगा। इसलिये देवा ने बॉडीगार्ड बनकर अपने पीछे लगे रहने वाले जगमोहन की छुट्टी नहीं की थी। अपने उस 'बॉडीगार्ड' के बारे में उसने अपने पीटर गैंग के साथियों को भी कुछ नहीं बताया था। वो उनसे भी यह राज छुपाए रखता था। गैंग में देवा की विशेषताएं जल्दी ही सामने आने लगी थीं। पीटर को भी अन्दाजा हो गया था कि यह लड़का अपने अन्दर जन्मजात सरदारी की योग्यता रखता था। इसलिये देवा पीटर के खास आदमियों में गिना जाने लगा था।
देवा ने शुरू से ही पीटर पर स्पष्ट कर दिया था कि वो चोरी, लूटपाट और इसी तरह के घटिया कामों में हिस्सा नहीं लेगा। देवा ने अपना यह जो उसूल बना रखा था, वो गैंग में भी मशहूर हो गया था। लोग देवा के उसूलों को इस तरह दोहराते थे---
“भई, मैं छोटे काम के लिये जेल जाने का खतरा नहीं मोल ले सकता ।"
यह उसूल देवा ने किसी किस्म की नैतिकता के आधार पर नहीं बनाया था, नैतिकता का तो उसकी जिन्दगी में ज्यादा अमल- दखल था ही नहीं। उसने बाकायदा हिसाब-किताब जोड़ा था कि इन कामों में जितना खतरा था उतना लाभ था या नहीं?
लूटपाट, चोरी, राहजनी में कई बार तो बहुत थोड़ा माल हाथ लगता था, जबकि खतरा बहुत ज्यादा था। कई बार तो हाथ कुछ भी हाथ नहीं लगता था, उल्टा जेल जाना पड़ता था। देवा का ख्याल था कि जुर्म में भी अक्ल का इस्तेमाल जरूरी है।
देवा ऐसे धन्धे 'सैट' करने के पक्ष में था जो एक बार कष्ट उठाने के बाद लगातार आमदनी देते रहें। चोरी, लूटपाट और राहजनी से बढ़िया तो फिरोतियां थीं, जिन्हें वो बेहतर समझता था।
वो किसी छोटे-मोटे दुकानदार को कुछ मिनट में ही कायल कर सकता था कि अगर उसके यहां आए दिन डकैतियां होने लगें, या अगर वो रात को घर जा रहा हो तो, कोई पीछे से वार करके उसकी खोपड़ी चटका दे, तो क्या इससे बेहतर यह नहीं होगा कि वो दो-चार हजार रुपया महीना देकर इन तमाम आशंकाओं से निजात पा ले। यानि उसे इस तरह की घटनाओं के लिये सिक्योरिटी मिल जाए। क्या उसके लिये अच्छा न रहेगा?
इसके अलावा घरेलू औरतों से भी कहा जाता था---
"हर वक्त हर पल तो बच्चों की हिफाजत नहीं की जा सकती, उन्हें किडनैप भी किया जा सकता है और कोई उनके बदले भारी फिरोती भी मांग सकता है। क्या इससे बेहतर नहीं था कि हजार-पांच सौ रुपये महीने के देकर बच्चों की पुख्ता की गारंटी हासिल कर ली जाए।"
देवा इसे इंश्योरेंस का नाम देता था। उसका कहना था कि अगर एक बार मेहनत करके कुछ सौ या कुछ हजार लोगों को यह 'इंश्योरेंस पॉलिसी' खरीदने के लिये तैयार कर लिया जाए, तो उसके बाद वो खामोशी से मुद्दतों तक 'प्रीमियम' अदा करते रहेंगे। इस तरह एक शानदार स्थाई आमदनी का जरिया पैदा हो जाएगा। जिसमें रोज-रोज कोई बड़ी सिरदर्दी भी मोल नहीं लेनी पड़ेगी या पकड़ा-धकड़ी नहीं होगी।
कभी-कभार छोटी-मोटी समस्याएं सिर उठा सकती थीं जिन्हें आसानी से हल किया जा सकता था। देवा ने पीटर को यकीन दिलाया था कि वो आमदनी के ऐसे दो-तीन जरिये सोचकर उनकी प्लानिंग कर सकता है।
उसने पीटर को कायल करते हुए कहा था---
“आए दिन लोगों को गन दिखाकर या उनकी खोपड़ियां चटकाकर पैसा लूटने की क्या जरूरत है। उन्हें सिर्फ बातचीत से प्रभावित करेंगे हम और थोड़ी-थोड़ी रकम जिन्दगी-भर उनकी जेबों से निकालते रहेंगे। यह दौलत कमाने का ज्यादा प्रतिष्ठित और समझदारी भरा तरीका है। इसमें ज्यादा समय तक आमदनी होते रहने की प्रबल संभावनाएं हैं।"
उसकी इस तरह की कई योजनाएं कामयाब रहने लगी थीं। इसके साथ-साथ हर तरफ उसकी दहशत भी फैल चुकी थी। उस पर जैसे एक लेबल लग गया था कि उसने विनायक शेट्टी जैसे खतरनाक बदमाश को पलक झपकते ही कत्ल कर दिया था, जबकि हकीकत यह थी कि शेट्टी को महज अपनी रक्षा में कत्ल किया था। वो यदि उस पर पहले फायर न करता तो शेट्टी उसे जिन्दा न छोड़ता। और कल्ल करते वक्त देवा के भीतर डर शामिल था। मगर उस घटना ने खुद उसे खौफ का प्रतीक बना दिया था।
लोगों के बीच देवा की 'इमेज' एक खतरनाक कातिल की बन गई थी। लेकिन इसमें उसे नुकसान कम और फायदे ज्यादा पहुंच रहे थे ।
उसकी कमाई अब पचास हजार रुपये हफ्ते से ऊपर पहुंच चुकी थी, जो उसकी उम्र के लिहाज से बहुत ज्यादा थी ।
एक तरफ तो देवा सामाजिक तौर पर खुद को बड़ा खुशहाल और सन्तुष्ट महसूस करने लगा था, दूसरी तरफ लीना की बदौलत उसे ऐशो-आराम भी उपलब्ध था। उसने अब लीना को ज्यादा बढ़िया फ्लैट किराये पर दिला दिया था और उसका क्लब में काम करना छुड़वा दिया था।
लीना को क्लब छोड़ने के बारे में देवा ने कहा था---
"हनी, अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता कि क्लब में मामूली लोग तुम्हारे हुस्न का नजारा करें---तुम्हें आवाजें कसें और सीटियां बजायें। अब कोई मजबूरी भी नहीं है। मेरी कमाई इतनी तो है ही कि उसमें हम दोनों का गुजारा बड़ी अच्छी तरह हो सकता है। इसलिये अब तुम इस घटिया क्लब में नाचना बंद कर दो।"
लीना खुद भी सुख-सुविधा और आराम की जिन्दगी बसर करना चाहती थी। उसने फौरन देवा का यह हुक्म मान लिया था ।
देवा खुद अभी तक अपने मां-बाप के साथ अपने घर में ही रह रहा था और मां-बाप को वह यह बताने के लिये जुर्रत कर रहा था कि वो स्थाई रूप से लीना के साथ रहने जा रहा है। यह ऐलान करना अब भी उसे एक मुश्किल काम महसूस हो रहा था।
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