विनायक शेट्टी के कत्ल ने शहर भर में जबर्दस्त सनसनी फैला दी थी।

मुम्बई शहर में विनायक शेट्टी जैसे शख्स का कत्ल मामूली बात नहीं थी। वो एक बड़ा गैंगस्टर था। लड़ाई-झगड़े शहर के बदमाशों में आम बात थी और कभी-कभार कत्ल भी हो जाते थे, जिनसे कोई ज्यादा सनसनी नहीं फैलती थी। लेकिन इतने बड़े गैंगस्टरों से छेड़छाड़ करने की हिम्मत नहीं दिखाई जाती थी। वो मुजरिमों के सरदारों की पहली पंक्ति में शामिल था जो अपनी ताकत और हुकूमत को कायम रखने के लिये आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे थे। अभी तो दूसरे गैंगस्टर उसके तौर-तरीके अपनाने की तैयारियां ही कर रहे थे कि वो अचानक इस तरह मारा गया था।

इस घटना से उन लोगों के इरादों को खासा धक्का लगा था जो उसके नक्शे-कदम पर चलने की तैयारियां कर रहे थे। उन्हें शिद्दत से यह अहसास हो रहा था कि जिसके पास गन होती है और जिसकी अंगुली ट्रिगर पर रहती है, वो हमेशा दूसरों को ही नहीं मार सकता बल्कि कभी खुद उसे भी गोली खानी पड़ जाती है।

वारदात की रात देवा को कुछ अच्छी नींद नहीं आई थी। सुबह वो जल्दी ही जाग उठा था । उसका सिर भारी था। उठते ही उसने सबसे पहले अपनी कोट की जेब में हो गया सुराख रफू कराया था। यह सुराख कोट की जेब में मौजूद गन से फायर करने की वजह से हुआ था। लेकिन देवा ने अपनी मां को बताया था कि गेम्स हॉल में किसी की सुलगती हुई सिगरेट उसके कोट पर गिर गई थी।

मां ने जेब रफू कर दी थी तो देवा उसे देखकर हैरान रह गया था। पता ही नहीं चल रहा था कि वहां कभी कोई सुराख भी हुआ था। उसकी मां ने जेब बहुत बढ़िया से रफू की थी। इस किस्म के घरेलू कामों में निसन्देह उसकी मां बहुत माहिर थी।

मां की इस श्रेष्ठ कार्यवाई पर देवा ने थोड़ा लाड़-प्यार जताया था। लेकिन उसने कोट को अलमारी में टांग दिया था। उसने फैसला किया था कि आईन्दा वो उस कोट को पहनकर बाहर नहीं जाएगा।

किसी हद तक अरुचि से नाश्ता करके वो घर से निकला और सीधा पीटर के बॉर में पहुंचा था। पीटर खुद बार काउंटर पर मौजूद था। वो सुर्ख चेहरे वाला एक दैत्याकार, मजबूत आदमी था। उसके चेहरे से सर्द सख्ती और खुरदरापन झलकता था। वो गोवानी था और जाहिर तौर पर बार चलाता था, लेकिन वह एक गैंग का लीडर था। एक खास इलाके पर उसकी हुकूमत थी, जिसमें उसका बॉर भी आता था।

पीटर बॉर में बार-जुए की मेजें और एक छोटा-सा क्लब जैसा हिस्सा था। पीटर अपने अड्डे को सैलून कहता था। यह सैलून दरअसल एक होटल का ही एक पोर्शन था जो पीटर की मल्कियत था। यह जगह पीटर का हैडक्वार्टर थी, यहां एक बाकायदा ऑफिस भी था, तमाम धन्धे यहीं से कण्ट्रोल होते थे। पीटर यहीं बैठकर अपने कारिन्दों पर हुक्म चलाता था।

ये सब बातें अपनी जगह थीं, लेकिन इस वक्त देवा की नजर में पीटर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वो विनायक शेट्टी का सबसे बड़ा दुश्मन था। यह दूसरी बात थी कि वो आज तक शेट्टी का बिगाड़ कुछ नहीं सका था। लेकिन देवा को यह मालूम था कि वो शेट्टी से सख्त नफरत करता था और उससे अपनी दुश्मनी में बेहद निष्ठावान था। उस दुश्मनी में शायद इसलिये ज्यादा शिद्दत थी कि वो कोशिश के बावजूद कभी विनायक शेट्टी को कोई काबिले-जिक्र नुकसान नहीं पहुंचा सका था, जबकि शेट्टी उसे कई बार नुकसान पहुंचा चुका था। देवा को काफी हद तक यही अन्दाजा था कि पीटर जब उसकी नई-नई हरकतों के बारे में सुनता होगा तो कितने पेंचोंताव खाता होगा।

"हैलो, मैं देवा हूं।" देवा बोला--- "लिंक रोड के करीब रहता हूं।" उसने पीटर को अपना परिचय दिया।

"कहो, क्या चाहते हो?" पीटर ने सिर हिलाकर पूछा। वो गहरी नजरों से देवा का जायजा ले रहा था।

"मेरा ख्याल है कि तुमने अखबारों और टी०वी० न्यूज से जान लिया होगा कि पिछली रात विनायक शेट्टी की जिन्दगी की आखिरी रात थी?" देवा ने कहा ।

“हाँ।" पीटर ने सिगार को अपने दांतों में घुमाते हुए सतर्क लहजे में जवाब दिया।

“मुझे मालूम है कि तुम दोनों में जबर्दस्त दुश्मनी चल रही थी। मैंने सोचा, अगर पुलिस मुझे शेट्टी के कत्ल के इल्जाम में पकड़ती है, तो शायद तुम्हारी हमदर्दी मेरे साथ हो। शायद तुम मेरे लिये कम से कम इतना तो कर ही दो कि मुझे किसी अच्छे वकील की सेवाएं प्राप्त हो जाएं।" देवा ने गंभीरता से कहा।

उसकी बात का मतलब समझते ही पीटर की आंखें हैरत से फैल गई थीं। वो अविश्वास से देवा का सिर से पैर तक जायजा लेते हुए धीरे से बोला---

"क्या तुम मेरे को यह बताने की कोशिश कर रहे हो कि उस हरामजादे को तुमने टपकाया है? तुम ऐसी कौन-सी तोप हो ? अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है ? ज्यादा-से-ज्यादा तुम निचले दर्जे के गुण्डे होंगे। तुम उस सुअर के बच्चे को कैसे कत्ल कर सकते हो ?”

“मैंने यह तो नहीं कहा कि मैंने उसे कत्ल किया है।" देवा ने अपनी गंभीरता और ठहराव को बरकरार रखते हुए कहा--- "मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि अगर पुलिस ने मुझे सन्देह के आधार पर पूछताछ के लिये हिरासत में लिया, तो क्या मुझे किसी अच्छे वकील की सेवाएं मिल सकेंगी?"

पीटर को शायद अब उसकी बात का यकीन आ गया था। वो जोशो-खरोश से बोला--

“जरूर... जरूर। इस बात की तो तुम फिक्र ही न करो और तुमको जब फुर्सत मिले तो मेरे पास जरूर चले आना। तुम्हारे जैसे नौजवानों की मुझे हमेशा जरूरत रहती है।" अब पीटर का लहजा और भाव पूरी तरह बदल चुके थे।

"थैंक्यू ।” देवा ने कहा और वहां से बाहर निकल गया।

उसके मुड़ने से पहले पीटर ने हाथ बढ़ाकर खुद ही गर्मजोशी के साथ उससे हाथ मिलाया था और अहसानमंदी जताई थी । देवा ने कुछ राहत की सांस ली थी।

वहां से देवा उस रास्ते से होटल में पहुंचा था, जहां लीना रहती थी।

लीना ने देवा की आवाज सुनने के बाद बड़े सतर्क अन्दाज में अपने कमरे का दरवाजा खोला था। वो परेशान और बेचैन दिखाई दे रही थी। मगर इसके साथ ही देवा को उसकी नीली आंखों में एक गुप्त-सी चमक भी महसूस हो रही थी।

देवा के लिये यह बहुत जरूरी था कि विनायक शेट्टी के कत्ल के सिलसिले में लीना अपनी जुबान बंद रखती। ऐसा लगता था कि खुद लीना को भी इस बात की अहमियत का अन्दाजा हो चुका था। वो समझ गई थी कि उसकी खामोशी देवा के लिये क्या मायने रखती है।

वो देवा के सीने से लगकर सिसकियां लेते हुए बोली---

"तुमने शेट्टी को मुझसे छीन लिया। वो मेरे लिये तो बहुत बड़ा सहारा था। मेरी जरूरतों का सबसे ज्यादा बोझ वही उठाता था। अब यह जिम्मेदारी तुम्हें उठानी होगी। क्या तुम खुद को इसके काबिल समझते हो ?” उसने सिर उठाकर देवा की तरफ देखा, उसकी नीली आंखों में आंसू भरे हुए थे।

“मुझसे ज्यादा सवाल-जवाब करने की जरूरत नहीं है।" देवा तेजी से बोला--- “तुम्हारे कहने से पहले ही इस बारे में सोच चुका हूं। सबसे पहले तो तुम्हें होटल का यह कमरा छोड़ना है। मैं तुम्हें कोई अच्छा-सा फ्लैट किराये पर ले देता हूं। जल्दी से अपना सामान पैक करो लीना ।"

लीना ने हैरत से देवा की तरफ देखा। उसे शायद यकीन नहीं था कि यह कम उम्र लड़का इतनी जल्दी इतने बड़े-बड़े फैसले करने लगेगा।

फिर शायद उसे देवा का वो रूप याद आ गया जब उसने बेधड़क विनायक शेट्टी को गोली मार दी थी।

लीना जल्दी-जल्दी अपना सामान पैक करने लगी। उसका सामान था ही क्या, होटल के कमरे में रहने की वजह से उसे पर्सनल सामान की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। उसके पास सिर्फ कपड़े, जूते, जेवर और मेकअप का सामान ही था। सारा सामान दो सूटकेसों में समा गया था। होटल का कुछ खास बकाया उसकी तरफ नहीं था। उसने हिसाब चुकाया और दोनों देवा की किराये की कार में बैठकर रवाना हो गए। देवा अखबार में छपे दो-तीन फर्निश्ड फ्लैटों के छोटे-छोटे इश्तहारों पर निशाने लगा चुका था। उन्होंने जाकर एक-एक करके वो फ्लैट देखे। उनमें से एक फ्लैट दोनों को पसन्द आ गया। वो कोई बहुत बड़ा-सा शानदार फ्लैट नहीं था, लेकिन ठीक था। किराया भी ठीक ही था।

ज्यादा बड़ा और शानदार फ्लैट देवा अफोर्ड भी नहीं कर सकता था। वर्तमान स्थिति में उन्हें वो फ्लैट ही बहुत अच्छा लग रहा था। फ्लैट में दो कमरे और छोटा-सा लाउंज था। जरूरत की सभी चीजें उसमें मौजूद थीं।

देवा ने एक महीने का किराया एडवांस दे दिया और लीना ने एग्रीमेंट दस्तखत कर दिये। उसने अपने कपड़े भी अलमारियों में लटका दिये थे।

अब वो देवा की गैररस्मी बीवी, यानि अवैध पत्नी के तौर पर उस फ्लैट में रहने के लिये तैयार थी। जरा सख्त भाषा का प्रयोग किया जाए तो अब वो देवा की रखैल थी।