रात को देवा गोखले स्ट्रीट की नुक्कड़ पर उसी जगह पहुंच गया, जहां पिछली रात लीना से उसकी मुलाकात हुई थी। आज रात को उसने लीना को वहीं पहुंचने को कहा था। उसे काफी हद तक उम्मीद थी कि लीना उसकी बात मानेगी। लेकिन दिल के किसी कोने में क्षीण-सी आशंका भी थी कि कहीं विनायक शेट्टी का खौफ लीना पर भारी न पड़ जाए और वो आज का इरादा बदल दे। लेकिन उसकी यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई। लीना पिछली रात के वक्त से भी कुछ पहले ही आ गई थी। लेकिन उसके चेहरे और बॉडी लेंग्वेज से यह अन्दाजा लगा लेना मुश्किल नहीं था कि वो बहुत बेचैन और डरी हुई है। जब वो गाड़ी में देवा के बराबर बैठी तो उसके बदन में हल्की-सी कंपकंपी थी। जिसे देवा ने भी फौरन महसूस कर लिया था।
"डर रही हो?" देवा उसकी खूबसूरत आंखों में झांकते हुए आत्मविश्वास से मुस्कराया।
“इन हालात में एक औरत को डरना ही चाहिये।" उसने गहरी सांस लेकर कहा था।
"जब तक तुम मेरे साथ हो, तुम्हें डरना नहीं चाहिये।” देवा ने उसका कंधा थपथपाया। लीना के बदन का गुदाज महसूस करके उसके जिस्म में सनसनी दौड़ गई।
उसने गाड़ी आगे बढ़ाई तो लीना ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा। वो पहले भी बार-बार पीछे देख रही थी। गाड़ी अभी ज्यादा दूर नहीं पहुंची थी कि लीना खौफजदा अन्दाज में सख्ती से देवा का बाजू पकड़ते हुए घुटी घुटी-सी आवाज में बोली---
"हमारा पीछा किया जा रहा है, एक गाड़ी हमारे पीछे आ रही है।"
“घबराने की जरूरत नहीं है, डार्लिंग!" देवा ने हँसकर उसे तसल्ली दी--- "वो मेरा आदमी है, मेरा बॉडीगार्ड है।"
"ओह....!" लीना ने जैसे इत्मीनान की सांस ली थी।
लेकिन फिर शायद उसे कुछ याद आ गया था और उसका खौफ उभर आया था---
“आज ज्यों ही मैं क्लब पहुंची एक भयानक चेहरे वाले आदमी ने मेरा रास्ता रोक लिया था।" वो बताने लगी।
"कौन था वो और उसकी इतनी हिम्मत कैसे पड़ गई? क्या तुम्हारे क्लब में सिक्योरिटी के इन्तजाम नहीं हैं?" देवा ने तेजी से पूछा।
“थोड़े-बहुत सस्ते से इन्तजाम तो हैं। लेकिन ज्यादा गुण्डे और बड़े बदमाश इन इन्तजामों की परवाह नहीं करते।” लीना झुरझुरी लेकर बोली--- “कभी-कभी तो लगता है जैसे इस शहर में कोई कानून-व्यवस्था ही नहीं है। कानून लागू करने वाली कोई संस्था नहीं है, यहां बस गुण्डों, बदमाशों ओर मुजरिमों का राज चलता है। जहां उनका जी चाहता है दनदनाते हुए घुस जाते हैं।” खास तौर पर होटलों और क्लबों में काम करने वाली हम जैसी लड़कियों को वो अपनी जागीर... अपनी प्रॉपट्री समझते हैं।"
उसकी आवाज में कम्पन्न और आंखों में नमी झलक उठी थी।
देवा ने एक नजर उसकी तरफ देखा और घुटी-घुटी मगर गुस्सेली आवाज में पूछा---
“क्या उसने तुम्हारे साथ हाथापाई या बदतमीजी की?" उसके लहजे से साफ जाहिर हो रहा था कि वो अपने गुस्से को काबू में रखने की कोशिश कर रहा है।
“नहीं। खैर... वो इस हद तक तो नहीं गया था।" लीना ने जैसे संभलने की कोशिश करते हुए कहा था--- "उसने बस मेरे हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा-सा कागज थमा दिया था और एक बार खूंखार नजरों से मुझे देखता हुआ आगे बढ़ता चला गया था।"
"क्या लिखा था उस कागज पर?" इस बार देवा ने उसकी तरफ देखे बगैर पूछा।
"पेंसिल से टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में कुछ लाईनें लिखी गई थीं। उनका सार यह था--आज मैं जरा जल्दी आऊंगा। अगर तुमने मुझे इन्तजार कराया, तो याद रखना, तुम किसी काम की नहीं रहोगी। मैसेज भेजने वाले ने अपना नाम नहीं लिखा था। लेकिन जाहिर है कि वो विनायक शेट्टी की तरफ से भेजा गया था। उसे यकीनन पता चल गया है कि मैं कल रात तुम्हारे साथ गई थी।"
“हां।” देवा ने सहमति से सिर हिलाकर कहा--- "उसका एक गुर्गा गेम्स हॉल में मेरे पास भी आया था। उसने मुझे धमकाने की कोशिश की थी कि मैं तुमसे दूर रहूं।"
“फिर... तुमने क्या जवाब दिया?" लीना के लहजे में अब भी खौफ था।
"मैंने यह कहकर उसे भगा दिया था कि मैं अपनी हिफाजत करना खूब जानता हूं और मुझे शेट्टी जैसे किसी बदमाश की कोई परवाह नहीं।” देवा ने बताया।
"हे भगवान!" लीना अपना सिर थामते-थामते रह गई । देवा के जवाब ने उसे ज्यादा खौफजदा कर दिया था।
“जब तक तुम मेरे साथ हो, तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है।" देवा ने उसकी बात का थोड़ा बुरा मानते हुए कहा।
तब शायद लीना उसे दिखाने के लिये खुश और बेफिक्र नज़र आने की कोशिश करने लगी। उसके होंठों पर फीकी-सा मुस्कराहट आ गई थी। वो एक बार फिर उसी रेस्तरां में आ पहुंचे जहां पिछली रात आए थे। वेटर ने उन्हें छोटे-से प्राईवेट डाइनिंग केबिन में पहुंचा दिया।
पहले उन्होंने शैम्पेन मंगवाई और उसका लुत्फ लेने लगे।
आधे घण्टे बाद जैसे वो दोनों ही अपने खौफ और आशंकाओं को भूल चुके थे और एक-दूसरे के सामीप्य से आनन्द उठाने की कोशिशों में मग्न हो गए थे। अचानक छोटा-सा केबिन का दरवाजा जोरदार आवाज के साथ खुला। शायद किसी ने उसे जोरदार लात मारकर खोला था।
दोनों ने हड़बड़ाकर एक-दूसरे की बांहों से निकलकर कुछ दूर होने की कोशिश की और दरवाजे की तरफ देखा था। वहां विनायक शेट्टी सफेद सूट पहने खड़ा था।
गुस्से की अधिकता से शेट्टी का खुरदरा चेहरा विकृत हो रहा था, ऑंखें जैसे आग उगल रही थीं। होंठ क्रूरता से भिंचे हुए थे और उनके पीछे से दांत झांक रहे थे, जैसे कोई भेड़िया दांत दिखा रहा हो खूंखारी से। सबसे ज्यादा खतरनाक बात यह थी कि उसका हाथ कोट की जेब में था। जेब काफी उभरी हुई दिखाई दे रही थी। वो उभार सिर्फ शेट्टी के हाथ का नहीं हो सकता था।
लीना की जैसे ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे ही रह गई थी।
देवा की रंगत सफेद पड़ गई थी, लेकिन उसकी आंखें सुलग रही थीं। वो अपनी जगह निश्चिंत बैठा हुआ था। उसने ऐसी कोई हरकत नहीं की थी, जिससे किसी किस्म की बदहवासी या घबराहट जाहिर होती हो।
विनायक शेट्टी उसके सामने गजब के गुस्से की हालत में आ खड़ा हुआ था। अब यह जिन्दगी और मौत का मामला था। देवा इस बारे में किसी खुशफहमी में नहीं रह सकता था।
लीना ने कुछ कहने की कोशिश की---
“विना... यक... भगवान... के लिये...! "
इससे ज्यादा वो कुछ न कह सकी थी। उसका ध्यान विनायक शेट्टी की तरफ से हटकर देवा की तरफ हो गया था।
लीना ने देखा, देवा भी पलकें झपकाए बगैर शेट्टी की तरफ देख रहा था। दोनों एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले हुए थे।
वातावरण में मौत की सी खामोशी और सन्नाटा था। ऐसा लगता था जैसे एकदम जिन्दगी की घड़ी रुक गई हो। सृष्टि निश्चित हो गई थी।
"अच्छा!” आखिरकार विनायक शेट्टी फुंफकारा--- "तुम दोनों पर ही मेरी धमकी का कोई असर नहीं हुआ। तुम दोनों ने ही उसे कोई अहमियत नहीं दी? क्योंकि तुम दोनों पर इश्क का भूत सवार है। तुम्हारा ख्याल था कि मेरे पिछवाड़े पर लात मारकर तुम दोनों इश्क की राह पर आगे बढ़ जाओगे। इश्क के गीत गाते हुए हम बने...तुम बने एक दूजे के लिये...।" वो अजीब-से अन्दाज में हँसा। उसकी हँसी उस दरिन्दे जैसी थी जो अपने शिकार पर झपटने वाला हो।
“तुम हो कौन?" अचानक देवा ने पूछा।
गुस्से की शिद्दत से अचानक शेट्टी की रंगत काली-सी पड़ गई। इससे ज्यादा उसकी तौहीन क्या हो सकती थी कि गंदे इलाके का एक अट्ठारह साल का आवारा लड़का उससे सवाल करे कि वो है कौन?
“मैं कौन हूं ?" विनायक शेट्टी गुर्राया। उसके होंठों की कोरों से झाग निकलने लगा था--- "मैं तुम्हें बताता हूं कि मैं कौन हूं---"
उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही देवा ने फायर कर दिया था। उसके ख्याल में अब उनके पास मोहलत नहीं बची थी।
उसने कोट की जेब से ही फायर कर दिया था। विनायक शेट्टी ने उसे जरा भी अहमियत नहीं दी थी। उसके गुमान में भी नहीं था कि एक अट्ठारह साल का लड़का जो सूरत से बदमाश भी नहीं लगता था, उस पर इस तरह गोली दाग देगा।
फायर करने से पहले देवा अन्दर ही अन्दर नर्वस था। जाहिर है, जिन्दगी का पहला कत्ल करना कोई आसान काम नहीं था---और कत्ल भी ऐसे शख्स का जिसके नाम से ही इलाके के अच्छे-अच्छे गुण्डे-बदमाश कांपते थे । देवा तो किसी गिनती में ही नहीं था।
देवा को खुद भी इस बात का अहसास था। इसलिये जब वो शेट्टी की निगाह बचाकर अपना हाथ कोट की जेब की तरफ ले आया था तो उसके स्नायु-तंत्र गिटार के तारों की तरह तन गए थे। शेट्टी का ध्यान बंटाने के लिये उसने उसी क्षण अपना दूसरा हाथ मेज पर से नमकीन उठाने के लिये बढ़ा दिया था।
देवा को उम्मीद नहीं थी कि उसकी यह हरकत शेट्टी की नजरों से छुपी रहेगी। मगर शेट्टी को तो शायद गुस्से ने अन्धा कर दिया था या फिर अपनी ताकत और शोहरत के घमण्ड में उसने देवा की इस हरकत को कोई अहमियत नहीं दी थी। बेशक कुछ भी रहा हो। बहरहाल, यह निश्चित था कि देवा जिन्दगी और मौत की यह जंग जीत चुका था। जो सिर्फ तनाव और खामोशी के कुछ क्षणों पर आधारित थी । देवा की दूसरी खुशकिस्मती यह थी कि कोट की जेब से ही फायर कर देने के बावजूद उसका निशाना सही बैठा था।
शेट्टी फर्श पर ढेर हो गया। हैरत उसके चेहरे पर स्थिर होकर रह गई थी। आंखें फटी-की-फटी रह गई थीं।
देवा ने जल्दी से रिवाल्वर को नेपकिन से रगड़कर उस पर अपने फिंगर-प्रिंट्स साफ कर दिये और पिछली खिड़की के रास्ते उसे दूर अन्धेरी पिछली गली में फेंक दिया।
जिन्दगी और मौत की इस जंग में फतेह हासिल करने के अहसास से उसे जैसे एकदम ही करार आ गया था। उसके अन्दर की उत्तेजना, बेचैनी और बेतावी एक पल में दूर हो गई थी। जो अंग तने हुए थे, अब ढीले पड़ गए । अब वो शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह शांत था और उसका जेहन मुस्तैदी से काम कर रहा था। वो अपने आपको पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और आत्मविश्वास से भरपूर महसूस कर रहा था। जिन्दगी और मौत की वो जंग जीतने के बाद अब जैसे वो किसी भी मुसीबत का सामना करने के लिये तैयार हो गया था।
“आओ डार्लिंग!” उसने लीना को बाजू से पकड़कर उठाते हुए कहा---वो खुद भी उठकर खड़ा हो गया था।
लीना थर-थर कांप रही थी। देवा ने उसको हौसला देने के लिये उसकी कमर थपथपाई और छोटे डायनिंग केबिन से निकल आया । लेकिन बाहर आने से पहले वो रेस्तरां के बिल की अदायगी के लिये पांच-पांच सौ के दो नोट मेज पर रखना नहीं भूला था।
लीना का बाजू पकड़कर वो उसे खींचता हुआ पिछली सीढ़ियों तक लाया, जो एमरजेंसी में इस्तेमाल की जाती थीं।
तेजी से सीढ़ियां उतरकर वो पिछली गली से गुजरते हुए उस जगह पहुंचे जहां पर देवा की कार खड़ी हुई थी। इस बार कार छोटी, मगर बेहद कीमती थी। देवा उस वक्त कार स्टार्ट करके आगे बढ़ चुका था, जब उसने सामने से दो बावर्दी पुलिस वालों को रेस्तरां की तरफ बढ़ते देखा। वो लपकते जा रहे थे।
इससे देवा को कोई फिक्र न हुई। क्योंकि उसे मालूम था कि रेस्तरां के मैनेजर और वेटरों वगैरहा से पूछा जाएगा कि उस केबिन में कौन बैठा हुआ था, जिसके दरवाजे पर विनायक शेट्टी मारा गया था, तब वो ग्राहकों का बिल्कुल फर्जी हुलिया बतायेंगे क्योंकि कारोबारी होटलों या रेस्तरां वाले इन कानूनों पचड़ों से बचने की हर मुमकिन कोशिश किया करते थे । देवा का ख्याल था कि उन्होंने सच भी बोल दिया, तो एक लड़के और लड़की का ऐसा धुन्धला-सा खाका सामने आएगा। जिन्हें शिनाख्त करना मुश्किल होगा।
वो हुलिया और निशानियां शहर के हजारों लड़कों और लड़कियों पर फिट होती थीं। इस किस्म की शहादतें आमतौर पर पुलिस के लिये बेकार ही साबित होती थीं।
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