उस शाम देवा अपने खास ठिकाने यानि गेम हॉल में मौजूद था। लीना से मुलाकात के लिये जाने में अभी काफी देर थी इसलिये वक्त गुजारने के ख्याल से वहां आ गया था। लेकिन वहां भी वो इर्द-गिर्द की सरगर्मियों में हिस्सा लेने के बजाय अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था। अचानक उसे अहसास हुआ कि कोई धम्म से उसके बराबर की कुर्सी पर आकर बैठ गया है। उसने चौंककर सिर उठाया---

उसके बराबर एक बदशक्ल-सा आदमी बैठा हुआ था। देवा को अपनी तरफ देखता पाकर उस आदमी ने अपने छितरे, पतले और भद्दे दांत निकाल दिये। मगर उसका अन्दाज हँसने या खशी प्रकट करने वाला नहीं था बल्कि मजाक उड़ाने वाला था। वो गठे हुए मजबूत जिस्म का एक कद्दावर आदमी था। देवा इस वक्त किसी से उलझने का कोई लफड़ा करने के मूड में नहीं था। उसने मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। मगर उस वक्त वो हैरान हुए बगैर न रह सका, जब उस आदमी ने कोहनी से उसे ठोका दिया---देवा ने सिर घुमाकर सर्द निगाहों से उसे घूरा और गुर्राकर पूछा---

"क्या बात है?"

"तुम देवा हो न ?” अजनबी ने पुष्टि करनी चाही थी।

"हां, तो फिर....?”

“तुम्हें एक मैसेज पहुंचाना था।" वो आदमी गहन गंभीरता से बोला था।

“बोलो...।" देवा का लहजा सर्द था ।

“अगर तुम अब विनायक शेट्टी की गर्लफ्रैंण्ड के साथ देखे गए तो तुम्हारी जिन्दगी की गारंटी कोई नहीं दे सकेगा। यह मैसेज खुद बॉस ने भेजा है।"

“मुझे किसी से अपनी जिन्दगी की गारण्टी लेने की जरूरत भी नहीं है। लेकिन मैं यह जरूर जानना चाहता हूं कि इन शब्दों से तुम्हारा मतलब क्या है? सीधे-सीधे बताओ।" देवा ने निडरता से गर्दन तानकर कहा।

"इतने नादान मत बनो। तुम मेरा मतलब अच्छी तरह समझ रहे हो। लेकिन अगर तुम्हारी फरमाईश साफ-साफ सुनने की है, तो मैं साफ-साफ ही बता देता हूं। किसी रात किसी गली-वली में पड़े पाए जाओगे और गला कटा हुआ होगा।"

"अच्छा... वाकई...?" देवा हिकारत से हँसा। फिर एकदम गहरी संजीदगी से उसकी आंखों में आंखें डालकर बोला--- “तो तुम विनायक शेट्टी के प्यादे हो ?"

"हां।" बदशक्ल आदमी सहमति से सिर हिलाकर बोला।

देवा एक बार फिर गुर्राकर बोला---

"जाकर अपने बॉस से कह देना कि मैं उससे या उसके गुर्गों से डरने वाला नहीं हूं। तुम चाकू से गला काटने की बात कर रहे हो। लेकिन मेरे ख्याल में गन चाकू से बेहतर रहती है। मैं तुम सबसे बढ़िया गन चला सकता हूं । अब चलते-फिरते नजर आओ बरखुरदार, जाकर अपने पूरे गैंग से कह देना कि तुममें से जिसे भी मेरे साथ उलझने का शौक हो वो अपना शौक पूरा कर ले।"

देवा की बेखौफी और स्टाईल ने बदशक्ल मैसेन्जर को हैरान कर दिया था। वो आंखें सिकोड़े कुछ क्षण हैरत से देवा की तरफ देखता रह गया था।

देवा जैसे उसकी हालत से लुत्फ उठाते हुए एक बार फिर हँस पड़ा। कुछ सेकेण्ड बाद वो फिर गंभीर हो गया। उसने कुछ ऐसी नजरों से उस बदशक्ल आदमी की तरफ देखा कि वो फौरन उठकर चल दिया। देवा तब तक उसे देखता रहा जब तक कि वो दरवाजे से निकलकर उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गया।

फिर उसने जेब में हाथ डालकर रिवाल्वर को टटोला।

देवा ने विनायक शेट्टी के गुर्गे पर खाली-पीली रौब नहीं झाड़ा और महज बड़ाई नहीं हांकी थी। रिवाल्वर की मौजूदगी से उसमें एक ऐसा ठोस आत्मविश्वास भर गया था कि उसने असली निडरता से वो सारी बातें कही थीं। उसके अन्दर एकदम जैसे इंकलाब आ गया था या फिर वो ऐसा ही किरदार अदा करने के लिए पैदा हुआ था। उसके अन्दर यह बेखौफी हमेशा से मौजूद थी और उसको प्रकट करने के लिये सिर्फ एक हल्के से सहारे की जरूरत थी या फिर हथियार चीज ही ऐसी है जो बुजदिल शख्स को भी दिलेर बना देती है। बहरहाल, जो कुछ भी रहा हो, उस शाम देवा ने सावधानी से उपाय भी किये थे।

एक लड़का उसकी कुछ पहचान का था जगमोहन नाम का। जिसका निशाना बहुत अच्छा था। उसके पास गन भी थी लेकिन उसने कभी गन डाके या राहजनी में इस्तेमाल नहीं की थी। हालांकि उसे पैसों की सख्त जरूरत रहती थी। देवा ने उसकी ड्यूटी लगा दी थी कि वो हर जगह साये की तरह उसके पीछे लगा रहे। जरा फासले पर रहकर उसे देवा की निगरानी करनी थी। अगर कोई देवा पर गन तानकर गोली चलाने के लिये तैयार नजर आता, तो जगमोहन की जिम्मेदारी थी कि वो छुपा रहकर फौरन उस आदमी को गोली मार दे और वहां से खिसक जाए। वो लड़का जरूरतमंद भी था। उसने थोड़े-से पैसों में ही यह सेवा करने की हामी भर दी थी।

अब जगमोहन जैसे देवा का अनौपचारिक बॉडीगार्ड था, एक ऐसा बॉडीगार्ड जिसकी मौजूदगी के बारे में किसी को पता नहीं चल सकता था। उसे अपने एक्शन में आने से पहले भी और एक्शन के बाद भी दूसरों की निगाहों से औझल रहना था। देवा ने उसको तमाम हिदायतें अच्छी तरह याद करा दी थीं और यह भी बता दिया था कि रात को उसे लीना से मिलने जाना है। उस दौरान जगमोहन को आस-पास नजर रखनी थी। यह सारे इन्तजाम करने के बाद देवा एकदम सन्तुष्ट था।