अगली रात---

शो खत्म होने से पहले ही देवा क्लब के पीछे वाली अन्धेरी गली में दाखिल हुआ। उसकी चाल में हल्की-सी लड़खड़ाहट थी। यहां पहुंचने से पहले वो एक-के-बाद-एक तीन शराबखानों में वक्त गुजारकर आया था। ऐसा उसने इससे पहले कभी नहीं किया था। लेकिन उस दिन उसको न जाने क्या हो गया था? शराब के नशे के अलावा भी कोई बेनाम-सा नशा उसके जेहन पर सवार था। इस वक्त वो खुद को हर काम करने और हर चीज का सामना करने के काबिल महसूस कर रहा था। उसका आत्मविश्वास हद से ज्यादा बढ़ा हुआ था जैसे वो हिमालय की चोटी पर चढ़ सकता है, चाँद पर फंदा डाल सकता है। यहां तक कि दुनिया को फतेह कर सकता है।

गली के कोने पर, सड़क के किनारे, वो एक अच्छी और महंगी कार खड़ी करके आया था। इस किस्म की कारें आम तौर पर पॉश बस्तियों में करोड़पति लोगों के घरों के सामने खड़ी दिखाई देती हैं।

देवा ने वो कार एक रात के लिये किराये पर हासिल की थी।

उसके जानने वालों ने तो उसके इस कदम को खुलेआम बेवकूफी कहा था। उनका ख्याल था कि इससे बेहतर तरीका तो यह था कि कार चोरी कर ली जाती। कोई जुर्म करने और उसके बाद फरार होने के लिये उनके ख्याल में चोरी की कार ही बेहतर रहती थी। ज्यादातर मुजरिम अपनी मुजरिमाना जिन्दगी की शुरुआत ही कारें चुराने से करते थे। उन्हें यह काम सबसे आसान लगता था। लेकिन, देवा आम हालात में भी कारें चुराने के हक में नहीं था। आज की रात तो वो ऐसा घटिया ख्याल भी दिल में नहीं ला सकता था। वो कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अपनी जानेफना, गुले गुलजार को वो कार में बिठाकर ले जा रहा हो और रास्ते में चोरी की कार की वजह से उसे रोक लिया जाता। देवा को यकीन था कि आज रात वो लीना को अपने साथ गाड़ी में बिठाकर ले जाएगा। यह दूसरी बात थी कि लीना को अब तक उसके इरादों की कोई खबर नहीं थी। लेकिन देवा के ख्याल में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। उसने तय कर लिया था कि बहरहाल, आज लीना को उसके पास जाना ही था। देवा की पतलून की एक जेब में नोट भरे होने की वजह से फूली हुई थी। वो कुल दस हजार रुपये थे, यह देवा की कुल जमा-पूंजी थी।

यह रकम इतनी ज्यादा तो नहीं थी। लेकिन इसी से ज्यादा प्रभाव देने की तरकीब भी देवा ने कर ली थी। उसने नोटों में सबसे ऊपर हजार रुपये का एक नोट लिपटा लिया था, उसके नीचे सौ और पांच सौ वाले नोट थे, अन्दरूनी साईड में पचास रुपये के भी नोट रखे थे। उसने उनके अन्दर बीस और दस रुपये के नोट रखे थे।

यों तो रकम एक छोटे, मगर मोटे रोल के रूप में थी और बहुत ज्यादा माल होने का प्रभाव छोड़ रही थी। देवा अपनी इस तरकीब पर बहुत खुश था और अपने आप को शाबाशी दे रहा था। उसका अन्दाजा था कि वो दस हजार रुपये कम-से-कम पचास हजार रुपये का प्रभाव छोड़ सकते थे लीना पर ।

अपने ख्याल में देवा ने लीना की दोनों शर्तें पूरी कर दी थीं।

देवा ने लीना की फरमाईशों के अलावा भी एक चीज का बन्दोवस्त कर लिया था। वो एक रिवाल्वर था जो उसके कोट की जेब में मौजूद था। यह उसने उसी दिन दोपहर को चोर बाजार से खरीदा था। इससे पहले भी देवा ने रिवाल्वर इस्तेमाल किया था और उसे थोड़ी-बहुत निशानेबाजी की भी प्रेक्टिस थी, लेकिन उसने कभी कोई गन बाकायदा अपने पास नहीं रखी थी। आज वो पहली बार जेब में गन लेकर घूम रहा था, तो उसे एक अजीब-सी ताकत का अहसास हो रहा था। यह उसके लिये एक नया तजुर्बा था, जिससे उसे एक अनोखी सनसनी का अहसास हो रहा था। जेब में गन की मौजूदगी ने जैसे उसे सारी दुनिया की सतह पर लाकर खड़ा कर दिया था। अब तो जैसे वो विनायक शेट्टी की भी बराबरी कर सकता था। गन हासिल करने के बाद वो एक अजीब किस्म की निडरता महसूस कर रहा था, लेकिन दिल ही दिल में उसने कई बार इस पहलू पर भी गौर किया था कि अगर गन की मौजूदगी में उसका सामना विनायक शेट्टी से हो गया और मामला जिन्दगी और मौत का आन पड़ा तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या करेगा वो ?

मुकर्रर वक्त पर लीना क्लब के पिछले दरवाजे से बरामद हुई। वो जैसे हवा में हिलकौरे लेती चली आ रही थी। उसका सलमा सितारा लगा लिबास और जेवर अन्धेरे में भी झिलमिला रहे थे। उसके आगमन के साथ ही उस परफ्यूम की खुशबू हवा में फैल गई, जिसे वो इस्तेमाल करती थी।

“हे भगवान...!” देवा पर निगाह पड़ते ही वो बोली--- "उसकी आंखें हैरत और आश्चर्य से फैल गई थीं--- "तुम फिर आ गए? बच्चू लड़के, मुझे यकीन नहीं आ रहा। भई, तुम तो बहुत ही ढीठ बच्चे हो ।"

“इसमें ढिठाई की क्या बात है?" देवा ने पलकें झपकाए बगैर उसकी आंखों में देखते हुए संजीदगी से कहा--- “तुमने ही तो कहा था कि अगर मेरे पास माल और अच्छी-सी कार हो तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाने के लिये आ सकता हूं। मैंने तुम्हारी फरमाईश पूरी कर दी है। मेरी जेब में मोटा नोट है।" उसने अपनी फूली-फूली जेब पर हाथ मारा। फिर गली के नुक्कड़ की तरफ इशारा किया--- “और मेरी बहुत बढ़िया किस्म की कार उधर खड़ी है।"

"क्या वाकई?" वो व्यंग्य से मुस्कराई--- “भई तुमने तो अपने तमाम हम उम्र लड़कों को पीछे छोड़ दिया है। अब तो तुम्हें कुछ अहमियत देनी ही पड़ेगी। इसके एवज में इतना ही काफी है कि मैं मुस्कराकर तुमसे बात कर रही हूं।" फिर उसने देवा को बच्चों की तरह पुचकारा और बोली--- "तुम जाओ बच्चे, कल फिर आ जाना... कल फिर मैं तुमसे हँस-हँसकर बात करूंगी।"

देवा ने अचानक आगे बढ़कर लीना का बाजू पकड़ लिया। उसके चेहरे के भाव एकदम बदल गए। नर्मी की जगह सख्ती आ गई, आंखें पत्थर की तरह सख्त और सर्द हो गई। वो बदले हुए कठोर लहजे में गुर्राकर बोला---

"मेरा मजाक उड़ाने या मेरी बातों को मजाक में उड़ाने की कोशिश न करना। तुम आज मेरे साथ चल रही हो, आज की शाम हम साथ गुजारेंगे। तुमने सुन लिया?"

उसके होंठों पर अब मुस्कराहट का नामोनिशान नहीं था। बल्कि होंठ अजीब-से अन्दाज में भिंचकर रह गए थे। अधखुले होंठों के पीछे से झांकते दांतों की वजह से उसका आकर्षक चेहरा अचानक खौफनाक लगने लगा था। एक क्षण में ही जैसे उसकी शख्सियत बदलकर रह गई थी।

"क्या वाकई?" लीना बदस्तूर मुस्करा रही थी, मगर अब उसकी मुस्कराहट में वो पहले वाली चमक नहीं थी। वो फीकी पड़ गई थी।

"हां, वाकई ।" देवा ने पलकें झपकाए बगैर कहा ।

"तुम तो बहुत गंभीर लगते हो इस मामले में।" लीना ने सूखते होंठों पर जुबान फेरी ।

"हां, और मैं चाहता हूं कि तुम भी गंभीर हो जाओ, इस मामले में। मैं इस बेहूदा गली में खड़ा होकर और वक्त जाया नहीं कर सकता। तुम सोच-समझकर जवाब दो कि तुम्हें मेरे साथ चलना है या नहीं चलना ?” उसने लीना की आंखों में झांका तो न जाने क्यों लीना झुरझुरी लेकर रह गई। फिर कुछ क्षण बाद वो धीमे लहजे में बोली---"आज रात शेट्टी मुझे लेने नहीं आ रहा। इसलिये मेरा ख्याल है कि मैं तुम्हारे साथ जाने का खतरा मोल ले सकती हूं। लेकिन मैं चाहती हूँ कि कोई हमें साथ-साथ जाते न देखे ताकि विनायक शेट्टी तक बात न पहुंच सके।" वो दोनों बिल्कुल धीमी आवाज में बात कर रहे थे। गली में जो दूसरे लोग मौजूद थे वो उनसे दूर थे। लीना ने एक बार फिर झुरझुरी-सी ली और पहले से भी ज्यादा धीमे स्वर में बोली--- "लड़के, विनायक शेट्टी बहुत खतरनाक आदमी है। मैं नहीं चाहती कि उसे पता चले। मैं तुम्हारे साथ गयी थी। तुम अपनी गाड़ी में बैठकर गोखले स्ट्रीट की नुक्कड़ पर पहुंचो। वहां कार रोककर अन्दर ही बैठे रहना। मैं टैक्सी लेकर पांच मिनट में वहां पहुंच रही हूं। टैक्सी से उतरकर मैं जल्दी से तुम्हारी गाड़ी में बैठ जाऊंगी। ठीक है ?"

“ठीक है...। लेकिन एक बार फिर सोच लो। तुम मुझे टरकाने की कोशिश तो नहीं कर रही हो?" देवा ने उसकी आंखों में झांका, जहां खौफ के साये लहरा रहे थे।

“हरगिज नहीं। मैं पांच मिनट में जरूर पहुंच जाऊंगी।" लीना ने फौरन कहा ।

"इसी में तुम्हारी भलाई है।" देवा के स्वर में शेर की-सी गुर्राहट थी--- "अगर तुम न पहुंची तो कल मैं क्लब में आकर स्टेज पर फायरिंग शुरू कर दूंगा।"

"इसकी नौबत नहीं आएगी।" लीना के लहजे में अब मिठास थी।

देवा ने लीना का बाजू छोड़ दिया था और गली की नुक्कड़ पर आकर अपनी कार में बैठा था और आगे रवाना हो गया था।

गोखले स्ट्रीट की नुक्कड़ पर पहुंचकर देवा ने गाड़ी रोक ली थी, वो गाड़ी में ही बैठा रहा था। वो उत्तेजित हो रहा था। उसके दिलो-दिमाग में हलचलें पैदा हो रही थीं।

लीना अपने वादे के मुताबिक पांच मिनट बाद पहुंच गई थी। वो देवा की गाड़ी से कुछ आगे जाकर टैक्सी से उतरी थी और वापस आकर जल्दी से देवा की गाड़ी में घुसी थी और उसके बराबर बैठ गई थी। उसका बदन एक पल के लिये देवा से सटा था और देवा के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गई थी। फिर लीना ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराते हुए देवा की तरफ देखा, तो देवा समझ गया कि वो उसकी जेब में गन की मौजूदगी को महसूस कर चुकी है।

"यह किसलिये लेकर आए हो?" लीना ने उसकी जेब की तरफ इशारा किया।

"बस... यों ही... सावधानी के तौर पर... ।" देवा ने लापरवाही से कहा। फिर जैसे उसे तसल्ली दी--- "बेफिक्र रहो। मैं इसे तब तक इस्तेमाल नहीं करूंगा जब तक कि बहुत मजबूरी न आन पड़े।"

वो लीना को नाममात्र के एक ऐसे रेस्तरां में ले गया, जहां ज्यादा भीड़-भाड़ नहीं रहती थी । वो ऊपर की मंजिल के एक छोटे-से प्राईवेट डायनिंग-रूम में आ गए। वहां दरवाजा बंद करके आराम से खाना खाया जा सकता था।

पहले उन्होंने सस्ती शैम्पेन की दो बोतलें खाली कीं। फिर निहायत उम्दा खाना खाया। खाना खत्म होने तक लीना काफी तरंग में आ चुकी थी और एक खास कोण से फूंक मार-मारकर अपने माथे पर झुक आई सुनहरे बालों की लट को हटा रही थी। इसके अलावा वो लगातार एक खास अन्दाज में खुमार-भरी हँसी भी हँसे जा रही थी।

पहले वो आमने-सामने की कुर्सियों पर बैठे हुए थे, लेकिन अब देवा सौफे जैसी उस कुर्सी पर से उठकर लीना के बराबर आ बैठा था। वो उसका हाथ थामकर बोला---

“अब बताओ, कैसा महसूस कर रही हो?"

"बहुत अच्छा...।” वो एक बार फिर नशीले अन्दाज में हँस पड़ी।

सुबह पांच बजे के करीब देवा उसे छोड़ने उसके घर पहुंचा था। वो बहुत प्यार भरे अन्दाज में देवा को गुड नाईट कहकर एक लम्बी, बोझिल सांस लेकर गाड़ी से उतरी। उसका अन्दाज ऐसा था जैसे उसका अपने घर जाने को जी न कर रहा हो। दरअसल उसका घर भी कोई घर नहीं था, वो सस्ते से एक होटल में रहती थी। जाने से पहले वो कार की खिड़की पर झुकते हुए बोली---

"आह...! मैं तो तुम्हें बच्चा ही समझ रही थी...। तुम तो अच्छे-खासे उस्ताद निकले। प्यार करने का आर्ट तुम्हें खूब आता है।"

"अभी तुमने देखा ही क्या है? मुझसे दोस्ती रखोगी तो तुम पर नित नए राज खुलेंगे।” देवा ने शाही अन्दाज में कहा।

अब देवा का रवैया लीना के साथ ऐसा था जैसे वो कोई टीन एजर नातजुर्बेकार लड़की हो और वो खुद बड़ा तजुर्बेकार मर्द हो। आखिर लीना से विदा लेकर वो रवाना हुआ और घर आकर चुपके से ताला खोलकर वो दबे पांव चलता हुआ बिस्तर में आकर दुबक गया।

दोपहर तक वो सोता ही रहा था। फिर उसने उठकर अच्छी तरह शेव बनाई थी और गर्दन पर अच्छी तरह पाउडर वगैरहा छिड़का था। तब कहीं जाकर उसके चेहरे से रात की थकान से जन्म लेने वाली वहशत दूर हुई थी। वैसे अन्दर ही अन्दर वो बहुत खुश और ताजादम था, उसका रोम-रोम जैसे एक अनोखी विजय के अहसास से गुनगुना रहा था। यह कोई मामूली बात नहीं थी कि उसने उम्र में अपने से कहीं बड़ी और तजुर्बेकार औरत को "बुरी तरह" प्रभावित किया था। रुख्सत होते वक्त वो देवा से बहुत खुश नजर आ रही थी और उसने जैसे देवा की हुकूमत को कबूल कर लिया था।

देवा ने खुद भी महसूस किया था कि हर मामले में उसे उस वक्त आत्मिक खुशी महसूस होती थी, जब कोई उसकी हुकूमत मान लेता था। कभी-कभी उसे खुद भी अपने आप पर हैरत होती थी। उसे दूसरों पर कण्ट्रोल करने की और उस पर हुकूमत करने की इच्छा इतनी प्रबल क्यों थी? जबकि वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसे भविष्य में ऐसी कोई सूरत नहीं नजर आती थी कि वो किसी पर भी हुकुम चला सकने के काबिल हो जाएगा। इसके बावजूद उसके दिल में यह इच्छा दिन-प्रतिदिन बलवती होती जा रही थी।

उसकी बहन ने उसके लिये खाना तैयार किया था। वो सोलह साल की एक खूबसूरत लड़की थी।

देवा ने खामोशी से खाना खाया था। उसका जेहन न जाने किन-किन ख्यालों में उलझा हुआ था। न जाने कितने काम थे जो उसको करने थे।

खाना खाकर वो खटखट सीढ़ियां उतरता हुआ नीचे जा रहा था कि नीचे दुकान में मौजूद उसकी मां ने उसे देख लिया था। मकान और सीढ़ियों की बनावट कुछ इस तरह की थी कि सीढ़ियों पर आने-जाने वालों की झलक दुकान में मौजूद लोगों को दिखाई दे जाती थी।

“यहां आओ देवा...दुकान में।" उसकी मां ने सख्त आवाज में चिल्लाकर उसे दुकान में आने का हुकुम दिया था।

देवा कुछ क्षण ठिठका था। फिर रूठी-रूठी-सी शक्ल बनाकर दुकान में दाखिल हो गया था। उसकी मां करीब पचास साल की एक मोटी-बेढंगी-सी औरत थी। वो मोटी और भद्दी तो थी ही...लेकिन कपड़े भी बेतुके-से पहनती थी। वो बड़ी-सी एक तोरी जैसी नजर आती थी, जिसके बीच में कसकर रस्सी लपेट दी गई हो। उसके चेहरे पर सलवटें पड़ चुकी थीं, वो अपने सफेद और अर्ध काले बालों को जूड़ा बनाकर बांधे रखती थी। इन तमाम बातों के बावजूद उसका चेहरा बताता था कि किसी जमाने में वो बहुत खूबसूरत रही होगी। अजीब बात यह थी कि उसकी तमतमाहट के बावजूद उसके चेहरे से एक अजीब-सी सादगी और दयालुता का अहसास होता था। उसके चेहरे को गौर से देखने पर अहसास होता था कि यह औरत कुछ नियमों और सिद्धान्तों के तहत जिन्दगी गुजारने की आदी है। वो एक कानूनपसन्द शहरी थी और उसका पति भी ऐसा ही था, उनकी इच्छा थी कि वो अपने बच्चों को भी ऐसा ही बना सकें। उसकी समझ में नहीं आता था कि ऐसा क्यों नहीं हो सका था? उन्होंने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी।

"रात को कहां थे तुम? सुबह को पांच बजे तुम घर में दाखिल हुए थे?" उसकी मां ने पूछा था ।

"मेरी एक आदमी के साथ कारोबारी मीटिंग थी, अम्मा।" देवा ने जवाब दिया था।

"सुबह पांच बजे तक आखिर तुम्हारी कौन-सी कारोबारी मीटिंग चल रही थी?” उसकी मां कृष्णा चौहान की बात जारी रही--- "तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे तुम बहुत बड़े कारोबारी हो गए हो। पूरी दुनिया में तुम्हारा कारोबार फैला पड़ा हो।” उसके लहजे में व्यंग्य था ।

फिर वो सांस लेने के लिये रुकी थी। उसके बाद कुछ नर्मी से बोली थी---

"भगवान के लिये तुम अच्छे आदमी बनने की कोशिश करो। शंकर की तरह रात को जल्दी घर आने की कोशिश किया करो। हमें किसी मुसीबत में न फंसा देना।”

"आप बेफिक्र रहिये माँ! मेरी वजह से आपको कोई परेशानी नहीं होगी।” देवा ने जान छुड़ाने के लिये कहा और जल्दी से बाहर निकल गया। बाहर आकर उसने भगवान का शुक्र मनाया था कि उसकी जान जल्दी छूट गई थी और उसकी मां के लेक्चर ने तूल नहीं पकड़ा था।

उसने जब से होश संभाला था, इसी किस्म की नसीहतें सुनता आया था। उसके मां-बाप इसी तरह उसकी हरकतों और मामलों पर एतराज उठाते आए थे और अक्सर उसे इनके नतीजों की चेतावनी देते आए थे। देवा की समझ में नहीं आता था कि वो उसे अपने उसूलों और रास्तों पर क्यों चलाना चाहते थे। वो भी उनकी बातें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया करता था।

उसे अपने मां-बाप से प्यार तो बहुत था, लेकिन वो उनके विचारों से सहमत नहीं था। देवा का ख्याल था कि वो जिस शहर में आकर बस गए थे अभी तक उसके माहौल में रच-बस नहीं पाए थे। वो मन से अभी भी राजस्थान के गांव के वासी ही थे।

अभी तक वो मराठी भाषा भी ठीक से नहीं सीख सके थे। देवा के ख्याल में ये बहुत बड़ी खराबी थी। उन्हें मुम्बई आए तीस बरस गुजर चुके थे लेकिन वो अभी तक यहां के लिये अजनबी मालूम होते थे। मुम्बई की बहुत-सी बातों पर वो अब भी आंखें फाड़कर रह जाते थे ।

देवा के ख्याल में अपने इन्हीं तौर-तरीकों की वजह से वो जिन्दगी की दौड़ में पिछड़े हुए थे। वर्ना मुम्बई तो एक जबर्दस्त शहर था, यहां मौकों की कमी नहीं थी। उसका बाप एक जगह नौकरी करता था और सख्त मेहनत करता था। उसकी मां यह छोटा-सा किराना स्टोर चलाती थी। इसके बावजूद उनकी गुजर-बसर बड़ी खींचतान के होती थी ।

देवा के ख्याल में इसकी वजह यही थी कि वो जिस शहर में आकर बस गए थे, उसके समाज के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पा रहे थे। दूसरी वजह देवा के ख्याल में यह थी कि उनकी फैमिली बड़ी थी, उनकी जरूरतें ज्यादा थीं, खर्चे भी ज्यादा थे।

इसलिये देवा का अपने मां-बाप की नसीहतों पर चलने का और उनके तौर-तरीके अपनाने का कोई इरादा नहीं था। वो बड़ा आदमी बनना चाहता था चाहे उसके लिये उसे कुछ भी करना पड़े। उसके ख्याल में बड़ा आदमी वही होता था जिसके पास ढेरों दौलत होती थी । उससे कोई नहीं पूछता था कि उसके पास यह दौलत आई कहां से? बस लोग उससे रौब खाते थे और प्रभावित होते थे। और अगर उसने वो दौलत जुर्म से या नाजायज तरीकों से कमाई होती थी तो लोग उसका खौफ भी खाते थे। क्योंकि इसका मतलब यही होता था कि उसके हाथ बहुत लम्बे हैं। इन्हीं ख्यालों के साथ देवा अपने घर में दिन-रात बसर कर रहा था। उसके मां-बाप को जरा भी अन्दाजा नहीं था कि उनके बेटे की विचारधारा क्या थी और वो किस राह पर जा रहा था? एक और चीज भी थी जो देवा के ख्यालों को इस धारा पर डालने की वजह बनी थी। वो एक घटना थी जो उसके साथ मात्र छः साल की उम्र में घटी थी। उसके बाद कानून और उसके रक्षकों के बारे में उसके ख्याल और नजरिये में तब्दीली आती चली गई थी।

छः साल की उम्र में उसने एक बार भूख से बेताब होकर एक ठेले से एक सेब उठा लिया था और दौड़ लगा दी थी। एक पुलिसमैन उसके पीछे दौड़ा था। पुलिस वाले ने देवा से न सिर्फ सेब छीनकर रख दिया था बल्कि उसको हल्का-सा थप्पड़ भी जड़ दिया था और खूब डराया धमकाया भी था।

तब से उसके अब-चेतन में यह धारणा जड़ पकड़ गई थी कि पुलिस गरीबों की रक्षक नहीं बल्कि उनको डराने-धमकाने वाली एक ताकत थी। सरकारी ताकत ।

पुलिस एक गरीब और भूखे बच्चे की एक सेब से पेट की आग बुझाने के रास्ते में भी रुकावट थी। वो सिर्फ उन्हीं लोगों की रक्षक थी जिनके पास पहले से ही बहुत कुछ था। उनकी जान और दौलत की रक्षा के लिये पुलिस बड़ी मुस्तैद रहती थी। उम्र के पांच साल तक इस तरह के विचार उसके जेहन में पुख्ता होते चले गए थे।

अब लीना के इश्क जाल में फंस जाने के बाद जैसे जिन्दगी का रास्ता उसके सामने साफ हो गया था। उसने सोच लिया था कि वो अपनी मनचाही चीजें हासिल करके रहेगा। करता रहेगा। चाहे इसके लिये उसे कुछ भी करना पड़े। उसके सोचने के अन्दाज में अब और ज्यादा क्रूरता आ गई थी, कानून का खौफ उसके दिल से कुछ और कम हो गया था।

उसके अहसासों का इतनी जल्दी इस सतह तक पहुंच जाना खुद उसके लिये बड़ा हैरानी भरा था। ऐसा लगता था जैसे कई बरसों का सफर उसने एक ही रात में तय कर लिया हो।

एक कैमिस्ट शॉप के बाहर बने टेलीफोन बूथ से उसने लीना को फोन किया। उसके होटल के कमरे में उससे सम्पर्क होने पर देवा ने बेताबी से कहा---"हैलो डार्लिंग कैसी हो तुम? इस वक्त कैसा महसूस कर रही हो ?"

"बहुत थकी हुई हूं।" उसने शायद जम्हाई लेते हुए जवाब दिया था। ऐसा लगता था जैसे वो फोन की घंटी सुनकर ही नींद से जागी हो।

“थका हुआ तो मैं भी हूं।” देवा ने स्वीकार किया--- "लेकिन यह थकान भी अच्छी लग रही है।"

"क्यों?" लीना ने पूछा था ।

“क्योंकि रात बड़ी अच्छी-अच्छी गुजरी थी...बहुत ही अच्छी...।" उसने शब्दों पर जोर दिया था। लीना खुमार-भरी हल्की-सी हँसी हँस दी थी। उसने कोई टिप्पणी नहीं की थी। लेकिन उसकी हँसी बता रही थी कि वो भी देवा से सहमत थी।

"सुनो लीना डार्लिंग !” देवा ने पहले से ज्यादा मस्ती में कहा--- “तुम्हें याद है न हमारी आज रात की मुलाकात तय है? आज रात भी हम बाहर खाना खाएंगे, सैर-सपाटा करेंगे और बहुत अच्छा वक्त गुजारेंगे।”

“लेकिन... मैंने...तुमसे ऐसा कोई वादा नहीं किया था ।" लीना कुछ हैरत से बोली थी।

"नहीं किया था तो क्या हुआ?" देवा के लहजे में शरारत थी--- "अब तो मैं कह रहा हूं न । क्या मेरे कहने की कोई कीमत नहीं है ?"

"कीमत तो है...।" लीना के लहजे में हिचकिचाहट थी--- "मुझे -तुम्हारे साथ वक्त गुजारकर खुशी हुई...लेकिन...मेरी विनायक शेट्टी से मुलाकात तय है।"

“भाड़ में गया विनायक शेट्टी ।" अचानक देवा का लहजा बदल गया था। प्यार और मिठास की जगह उसमें गुस्सा भर आया था। अगले ही क्षण उसने जैसे फैसला सुना दिया--- "आईन्दा तुम कभी भी विनायक शेट्टी से नहीं मिलोगी। यह सिर्फ आज रात की बात नहीं है। अब यह किस्सा हमेशा के लिये खत्म समझो।"

“यह तुम...क्या कह रहे हो...?" लीना के लहजे में खौफ झलक आया था --- "क्या तुम जानते नहीं कि शेट्टी कितना खतरनाक आदमी है?"

“मैं तो उसके बारे में जानता हूं, डार्लिंग! लेकिन तुम मेरे बारे में कुछ नहीं जानतीं।" देवा एक शाही रौब से बोला था--- "वो सिर्फ इसलिये खतरनाक कहलाता है क्योंकि उसके साथ लड़ाकों का एक गैंग है। वो लड़ाके उसके इशारों पर नाचते हैं। उन्हीं के बूते पर वो अकड़ता है, वर्ना उसकी अपनी क्या औकात है?"

"फिर भी देवा...!" लीना के स्वर में अब भी खौफ था।

"तुम्हें डरने या परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है डार्लिंग।" देवा उसकी बात काटते हुए बोला था--- "अगर उसने अकड़-फूं दिखाई या लड़ाई-झगड़ा करने की कोशिश की, तो मैं उससे निपट लूंगा। मेरे पास भी लड़ने वालों की कमी नहीं है। जितने लड़के वो ला सकता है उतने मैं भी ला सकता हूं।"

लीना खामोश रही थी। देवा कुछ देर की खामोशी के बाद बोला था---

“आज रात तुम क्लब से जरा जल्दी निकलना और उसी जगह आ जाना जहां कल टैक्सी में आई थीं। मैं कल की ही तरह गाड़ी में तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूंगा। शेट्टी अगर तुम्हें लेने आता है, तो जरा देर से ही आता है। उसके वहां पहुंचने से पहले ही तुम निकल चुकी होगी। वो यही समझेगा कि तुम किसी वजह से जल्दी चली गई हो।"

लीना अब भी खामोश थी। कुछ क्षण के बाद देवा बोला तो उसका लहजा धमकी भरा हो चुका था---

"मैं जैसा कह रहा हूं, तुम्हें वैसा ही करना होगा। हम जहां कल मिले थे, आज भी तुम्हें वहीं आना है। जरूर पहुँच जाना, वर्ना बहुत बुरा होगा।"

देवा ने लीना का जवाब सुनने की जहमत नहीं की थी और फोन काट दिया था। उसके बाद उसने अपने उन तमाम धन्धों का जायजा लेना शुरू कर दिया जिनसे उसे आमदनी होती थी या हो सकती थी। उसने अपने जेहन के अन्धेरे कोनों को खंगालकर ऐसे लोगों के नाम भी निकाल लिये जिन्होंने उसे कभी कोई काम बताया था। मगर उसने महज इसलिये इन्कार कर दिया कि उसे वो लोग पसन्द नहीं थे। अब वो अपनी पसन्द-नापसन्द को ताक पर रखकर सोचता जा रहा था कि उसे कहां से कोई फायदा हो सकता है?

वो छोटे-मोटे फायदों के बारे में नहीं सोच रहा था क्योंकि अब उसे अपनी आमदनी में मोटा इजाफा करना था। उसे अन्दाजा था कि उसके खर्चे काफी बढ़ने वाले हैं। लीना से इश्क के पेंच लड़ाना आसान काम नहीं था। यह कोई सस्ता सौदा नहीं था।

उसने जिन लोगों की लिस्ट बनाई थी, एक-एक करके सबको फोन करने शुरू कर दिये। वो सबसे सम्पर्क ताजा कर रहा था। यह जैसे एक जन-सम्पर्क अभियान था।