अगले दिन संदीप बोस से उसकी घटिया सी कालोनी घर में मिले। नागेरकर के जुआघर के बारे में बातचीत हुई। बोस ने अपनी योजना बताई जो कि बेकार जैसी थी, परन्तु ये बात उसने ठीक कही कि दीवाली की रात हाथ मारा जाये तो करोड़ तक का माल मिल सकता है। उसने अपना हिस्सा पूछा कि कितना मिलेगा, देवराज चौहान ने कहा कि हिस्से बराबर के होंगे। देवराज चौहान ने ये भी कहा कि उसे उसकी योजना पसन्द नहीं आई। बोस की योजना में कई लोगों की हत्या शामिल थी, जब कि देवराज चौहान चाहता था कि दौलत पाने की खातिर किसी की जान ना ली जाये। जगमोहन इस बात से सहमत था।
योजना दोबारा बनाई जाने लगी।
अगले कई दिन देवराज चौहान जगमोहन नागेरकर के जुआघर जाकर, जुआ खेले और अपने काम की बातें मालूम की। आखिरकार तीनों ने मिलकर दीवाली की रात नागेरकर का जुआघर लूटने की योजना बनाई। योजना का अहम हिस्सा था कि जुआघर के किचन में रखे पानी में बेहोशी की दवा मिला देना। पानी हर कोई पीता था। सादा पानी या व्हिस्की में मिलाकर ये काम जगमोहन ने दिवाली को रात दस बजे करना था, ताकि बारह बजे तक पानी का असर लोगों में दिखाई देने लगे। संदीप बोस को देवराज चौहान की योजना पर ऐतराज था कि बेहोशी की दवा मिले पानी के दम पर डकैती नहीं हो सकेगी। परन्तु देवराज चौहान अपनी योजना पर डटा रहा। इस काम में एक और आदमी की जरूरत थी। बोस ने फौरन चौथे आदमी का भी इन्तजाम कर दिया।
दीवाली की रात पूरी तैयारी के साथ चारों ने नागेरकर के जुआघर पर रात एक बजे डकैती कर ली। तीव्र बेहोशी की दवा मिले पानी ने खूब अपना रंग दिखाया था। साढ़े बारह बजे तक आधे से ज्यादा जुआघर के लोग बेहोशी की हालत में पहुंच गये थे। कर्मचारियों में जुआघर का कोई आदमी ठीक से होश में नहीं था। यहां तक कि नागेरकर भी अपने केबिन में बेहोश था ।
अपने साथ लाये बड़े-बड़े थैलों में उन्होंने उस कमरे से नोट भरे ओर निकल गये। वो कुल एक करोड़ पन्द्रह लाख रुपया था। जिसके कि चार हिस्से किए गये। बोस और उसके साथी को बराबर का हिस्सा दिया गया। होश आने पर नागेरकर ने खूब हंगामा किया। वो माना हुआ गुण्डा था। उसने अपने आदमी दौड़ा दिए कि ये काम किसने किया है। देवराज चौहान और जगमोहन की निगाह नागेरकर पर रही कि क्या वो उनका पता लगा पाता है। पन्द्रह दिन बीत गये। नागेरकर कुछ भी पता नहीं लगा पाया कि उसका जुआघर लूटने वाले कौन लोग हैं। ऐसे में देवराज चौहान और जगमोहन को राहत मिली।
"जगमोहन ।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा--- “एक बात के अलावा सब ठीक रहा।"
“क्या ठीक नहीं रहा?"
"हमने अण्डरवर्ल्ड के आदमी की दौलत पर हाथ डालकर ठीक नहीं किया।" देवराज चौहान ने कहा--- “अगर नागेरकर हमें ढूंढ लेता तो जर्बदस्त झगड़ा खड़ा हो जाता । जबकि दौलत इकट्ठी करने में किसी प्रकार का झगड़ा नहीं होना चाहिये।”
"तो?"
"हम अण्डरवर्ल्ड से वास्ता रखते किसी आदमी की दौलत पर हाथ नहीं डाला करेंगे। ये गलत बात होगी।”
देवराज चौहान और जगमोहन के अपने नियम और कानून धीरे-धीरे बनते जा रहे थे।
संदीप बोस से अभी भी मुलाकातें हो रही थी। इतना पैसा पाकर वो बहुत खुश था और कह रहा था कि तीन जगह और भी है, जहां वो मजे से हाथ मार सकते हैं।
बहरहाल तीन महीने बाद संदीप बोस की बताई जगह पर सुरक्षित योजना बनाकर, दो अन्य लोगों को अपने साथ मिलाकर डकैती की तो एक करोड़ पैंतीस लाख हाथ आया, जो कि बराबर में बांटा गया। सफलता मिलते जाने की वजह से देवराज चौहान और जगमोहन के हौसले बुलन्द होते जा रहे थे। कोई नहीं जानता था कि हिन्दुस्तान में जाने-माने डकैती मॉस्टर देवराज चौहान का उदय होने जा रहा है। इन छोटे-छोटे कामों ने आगे जाकर रंग दिखाना था। संदीप बोस की बताई अगली जगह को देवराज चौहान ने छोड़ दिया क्योंकि वो पैसा अण्डरवर्ल्ड के आदमी का था। परन्तु बोस ने एक बैंक के बारे में बताया, जो कि आबादी से हटकर था और वहां ज्यादा भीड़ भी नहीं होती थी। बोस ने बताया था कि हर सोमवार बैंक में पैसा आता है जो कि दोपहर तक बैंक की गाड़ियों में वहां से ले जाया जाता है। और ये देवराज चौहान की पहली बैंक डकैती थी, जिसमें से उसे साढ़े तीन करोड़ हासिल हुआ था। बोस के अलावा दो और लोग इस काम में शामिल थे। पैसा बराबर बांटा गया और बैंक डकैती करने का काम देवराज चौहान और जगमोहन को जंचा। वो दोनों ऐसा ही बड़ा हाथ मारने की राह फिर देखने लगे। महीने भर बाद ही बोस नशे की हालत में एक कार के साथ टकरा गया। दो दिन अस्पताल में रहने के बाद उसकी मौत हो गई। परन्तु देवराज चौहान और जगमोहन के जो कदम आगे बढ़ चुके थे वो रुके नहीं, आगे ही बढ़ते रहे। वे अपनी पसंदीदा जगह चुनते जहां डकैती करनी है, पूरी तरह टोह लेते। एक मजबूत योजना बनाते, जरूरत के मुताबिक लोगों को इकट्ठा करते और डकैती को अन्जाम दे देते। देवराज चौहान द्वारा की गई डकैती में किसी की भी जान नहीं जाती। ऐसा कोई मौका आता तो वे डकैती से पीछे हट जाते। ये ही सिलसिला आगे चलता रहा। मामला आगे बढ़ता रहा। उनके अपने नियम कायदे भी बनते जा रहे थे। धीरे-धीरे पुलिस देवराज चौहान, और जगमोहन के नाम से वाकिफ होने लगी। चूंकि बात सिर्फ पैसा लूटने की थी। पुलिस भी मामले को ढीला-ढाला लेती रही। जब-जब जरूरत पड़ती पुलिस तेजी दिखाती, लेकिन देवराज चौहान और जगमोहन उनके हाथ नहीं लगे और यदा-यदा डकैतियां वे करते रहते थे। इसी दौरान ताला-तिजोरी खोलने वाले की जरूरत पड़ी तो तलाश करने पर सोहनलाल से मुलाकात हो गई। सोहनलाल तिजोरी जल्द खोलने में एक्सपर्ट था। अक्सर वे साथ काम करते । सोहनलाल ने देवराज चौहान और जगमोहन का धीरे-धीरे विश्वास जीता और उनका खास बनता चला गया। इस काम में कई साल का वक्त लगा। ये देवराज चौहान की नई जिन्दगी की शुरुआत थी। जिसमें उसके कदम जमते जा रहे थे और धीरे-धीरे डकैती मास्टर देवराज चौहान का नाम लोगों की जुबां पर आना शुरू हो गया। देवराज चौहान और जगमोहन ने डकैतियों की जो शुरुआत की थी वो आज भी जारी थी अपने नियम और कायदों पर वे आज भी बिना रुके चले जा रहे थे। अब तो सब कुछ पाठकों के सामने है कि देवराज चौहान का कहां से शुरू हुआ सफर, कहां तक आ पहुंचा है और आगे भी बहुत लम्बा सफर, रास्ता दूर तक साफ नज़र आ रहा है आगे बढ़ने के लिए। अभी ना जाने देवराज चौहान के कितने रंग पाठकों के सामने आने हैं, ये सब कुछ सिर्फ एक सफर के सिवाय कुछ भी नहीं, ये दास्तान जब शुरू हुई तब देवराज चौहान मात्र 18 बरस का था। अंडरवर्ल्ड में कुछ ही सालों में उसे जो अनुभव हुए, वो भविष्य में उसके बहुत काम आये और आज वो हिन्दुस्तान का नामी डकैती मास्टर बन चुका था।
समाप्त
0 Comments