वापस कमरे में पहुंचकर देवराज चौहान नींद में डूब गया। परन्तु जब जगमोहन दोनों बैगों के नोटों को गिनने लगा। दो घंटे गिनने में लगे, क्योंकि खुले नोटों पर रबड़ चढ़ा रखी थी। वो पच्चीस लाख रुपया था।

अगले दिन ग्यारह बजे वे उठे और चाय पीने के दौरान बात हुई।

“रात खतरा काफी था, जब पुलिस वाले आ पहुंचे। मैं तो समझा कि गड़बड़ हो गई।” जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कहा--- "परन्तु तुमने ठीक से बात संभाल ली। इतना सब होने पर हाथ सिर्फ पच्चीस लाख ही लगा ।"

“खतरा ज्यादा रहा और पैसा बहुत कम हाथ आया ।" देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा।

“हम दोबारा इस तरह का काम नहीं करेंगे। कुछ और देखेंगे।” जगमोहन बोला।

“रात मुझे देखा उन पुलिस वालों ने। अभी हमें संभल कर रहना होगा और कुछ वक्त कोई काम नहीं करना है। जब पुलिस हमें भूल जायेगी तो तब अगला काम करेंगे।" देवराज चौहान बोला।

"ये ठीक रहेगा। तब तक हम अगले काम पर विचार करेंगे कि हमें क्या करना चाहिये। पैसा बहुत है अभी हमारे पास ।”

उसके बाद तीन महीने तक दोनों ने कुछ नहीं किया। घूमते रहे, नये काम की टोह लेते रहे।

एक दिन जगमोहन दोपहर को लौटा तो देवराज चौहान को तैयार होते पाया।

"कहां की तैयारी है देवराज चौहान ?"

"नया काम देखने, समझने की कोशिश में हूं कि क्या...।"

“एक काम तो नज़र में आ रहा है।" जगमोहन सोच में डूबा बोला--- "परन्तु वो मुझे जंच नहीं रहा।"

"क्या काम?" देवराज चौहान ने उसे देखा।

"मर्डर करना है।"

“कर सकते हैं अगर किसी को मारने की वजह हमारे सामने जायज हो तो।” देवराज चौहान ने कहा।

"जायज वजह? मैं समझा नहीं।"

"जिसका मर्डर करना हो, अगर उसने ऐसा कोई काम किया है, जो कि जरूरत से ज्यादा बुरा हो तो, उसे मारने में क्या हर्ज है।"

जगमोहन, देवराज चौहान को देखने लगा।

"मेरे ख्याल में तो किसी की जान लेने का हमें कोई हक नहीं।" जगमोहन बोला।

“बोला तो, अगर कोई जीने का हक खो चुका हो तो उसकी जान लेने में कोई हर्ज नहीं है।" देवराज चौहान ने कहा--- "कोई क्यों किसी का मर्डर कराना चाहता है, ये बताओ मुझे।"

“ये तो मैंने पूछा नहीं।"

“अब पूछ लेते हैं। पार्टी कौन है?"

“पैसे वाली है। हमें इस काम का अच्छा पैसा मिल सकता है। परन्तु किसी की जान पैसे की खातिर लेने का मन नहीं करता।"

"ऐसा कोई मामला आये तो पहले वजह जरूर पूछा करो।" शाम को जगमोहन ने देवराज चौहान को एक व्यक्ति से मिलाया।

ये मुलाकात सड़क किनारे खड़ी कार में हुई। लम्बी-विदेशी और महंगी कार थी। पैंतालीस बरस का ऐसा आदमी उसे चला कर लाया था जो कि तगड़े पैसे वाला लग रहा था। बातचीत कार में बैठ कर हुई। बातों के दौरान जगमोहन चेहरे पर गम्भीरता समेटे बैठा रहा। देवराज चौहान ने ही उससे बात की।

"किसका मर्डर कराना है?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"तुम करोगे ये काम ?" उस व्यक्ति ने देवराज चौहान को गहरी निगाहों से देखा।

"हां।"

"पहले किसी की जान ली है?"

"बहुतों की। तुम सिर्फ अपनी बात करो। किसका मर्डर कराना है?" देवराज चौहान ने सपाट स्वर में पूछा ।

"अपने भाई का।"

"क्यों?"

“इससे तुम्हें क्या... मैं तुम्हें इस काम के मोटे नोट दे सकता हूं।"

"ये जानना बहुत जरूरी है कि तुम अपने भाई की जान क्यों लेना चाहते हो। अगर मुझे वजह जायज लगी तो मैं ये काम करूंगा, नहीं तो नहीं करूंगा।” देवराज चौहान ने अपने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा ।

"मैं वजह तुम्हें क्यों बताऊं ?"

"अगर तुम हमसे काम करवाना चाहते हो तो, वजह तुम्हें जरूर बतानी होगी।” देवराज चौहान ने स्पष्ट स्वर में कहा।

“अजीब लोग हो तुम।" वो झल्लाया फिर कह उठा--- "भाई से मेरी पटती नहीं है। हम दोनों इकट्ठा बिजनेस करते हैं, जो कि करोड़ों में है। अब वो शादी करने जा रहा है। जिससे कि जायदाद का एक और हिस्सेदार पैदा हो जायेगा, यानी कि उसकी पत्नी । अब अगर उसे कुछ हो जाये तो, उसकी सारी जायदाद मुझे ही मिल जायेगी।"

“तो तुम अपने भाई का हिस्सा पाने की खातिर, उसकी जान लेना चाहते हो।" देवराज चौहान बोला।

“हां। मैं...।"

"मैं तुम्हारा ये काम नहीं कर सकता।" देवराज चौहान ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा।

“क्या कह रहे हो। मैं तुम्हें पच्चीस लाख रुपया दूंगा।"

"पचास लाख भी नहीं। किसी की जान लेने की वजह बहुत घटिया है ये।” देवराज चौहान कार से बाहर निकल गया।

जगमोहन भी बाहर आ गया।

“तुम लोग बेवकूफ हो।” वो आदमी सिर बाहर निकाल कर बोला--- “मैं पचास लाख भी दे सकता हूं ये...।"

जगमोहन और देवराज चौहान फुटपाथ पर चढ़े और कुछ आगे खड़ी अपनी कार की तरफ बढ़ गये।

फिर उन्होंने उस आदमी की कार को जाते देखा।

“तुमने अच्छा किया जो उसे इन्कार कर दिया। वो पैसे के लालच में अपनी भाई की जान लेना चाहता है।" जगमोहन ने कहा ।

“तुम इस आदमी के भाई का पता करो और उसे बता दो कि उसके भाई के इरादे क्या हैं।" देवराज चौहान बोला।

“ये बढ़िया रहेगा। मैं आज ही ये काम करता हूं।" जगमोहन फौरन कह उठा ।

दस दिन बाद देवराज चौहान जगमोहन के साथ संदीप बोस नाम के ऐसे व्यक्ति से मिला जो पैंतीस बरस का था। सिर ऊपर से गंजा था। छोटी-छोटी मूछें थी। कद-काठी साधारण थी। देवराज चौहान इसके बारें में काफी जानकारी रखता था। संदीप बोस खास कुछ नहीं करता था और आज तक इसने कोई धमाके वाला काम किया भी नहीं था। परन्तु करने की चेष्टा मन में उछलती रहती थी। उसी चेष्टा के तहत ये ऐसी कई जगहों की जानकारी रखता था, जहां नोट होते थे और ख्यालों ही ख्यालों में उस पैसे पर हाथ मारने की योजना बनाता रहता था। योजना तैयार करके ठण्डे बस्ते में डाल देता था। योजना से आगे बढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। खर्चे-पानी के लिए उठाई गिरी जैसे काम किया करता था। अक्सर रात को विक्टर के दारू के अड्डे पर ही संदीप बोस शाम को आया करता था। देवराज चौहान और जगमोहन यहीं पर उससे मिले।

देवराज चौहान दो बार संदीप बोस से पहले भी मिल चुका था। ये तब की बात थी जब वो देवा के नाम से जिन्दगी जिया करता था। संदीप बोस ने तब उसे ऑफर दी थी कि वो कुछ ऐसी जगहों को जानता है जहां पैसा है और योजना भी है उसके पास। अगर हिम्मत से काम किया जाये तो बढ़िया माल हाथ लग सकता है। परन्तु तब उसने ऐसे कामों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। लेकिन आज वो उससे मिलना चाहता था। संदीप बोस के बारे में देवराज चौहान ने जगमोहन को बता दिया था कि उससे उन्हें अपने काम की जानकारी मिल सकती है।

देवराज चौहान ने संदीप बोस को पहचाना तो विक्टर के दारू के अड्डे के पीछे वाले कमरे में छोटी से टेबल पर देसी दारू की बोतल लिए बैठा था। अभी बोतल खोल कर पहला गिलास ही तैयार किया था। बोतल लगभग भरी हुई थी।

देवराज चौहान और जगमोहन खाली पड़ी कुर्सी पर जा बैठे।

संदीप बोस ने नज़रें घुमाकर उसे देखा फिर जगमोहन को।

जगमोहन ने पास की टेबल की कुर्सी इस तरफ खींची और बैठ गया। देवराज चौहान ने मुस्कुराकर बोस को देखा वो जानता था कि उसका चेहरा बदल चुका है, संदीप बोस सोच भी नहीं सकता कि वो देवा है। देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और पैकिट बोस की तरफ सरका दिया।

संदीप बोस की आंखें सिकुड़ी वो कह उठा ।

“कौन हो तुम लोग ।”

“तुम मुझे नहीं पहचानते संदीप बोस। क्योंकि हम पहली बार मिल रहे हैं।" देवराज चौहान बोला।

“तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?" बोस की आंखें सिकुड़ी।

"देवा ने बताया था।”

"देवा ?" संदीप बोस चौंका--- "कौन देवा।”

“देवा को भूल गये तुम। वो ही देवा, जिसे तुमने नागेरकर के जुआघर की प्लानिंग बताई थी उसे लूटने की...।”

"चुप रहो।" संदीप बोस सकपका कर बोला--- “ये बात तुम कैसे जानते हो?"

"देवा ने बताया था। वो मेरा दोस्त था।” देवराज चौहान ने कहा।

"क्या नाम है तुम्हारा?"

"देवराज चौहान ।"

"और ये ?" उसने जगमोहन को देखा।

"मेरा दोस्त जगमोहन---।"

“देवा के बारे में सुना था कि वो फौज़ में चला गया था फिर वहां उसकी मौत हो गई।" संदीप बोस ने कहा।

“हां, मैंने भी ऐसा सुना था।"

“वो हिम्मती बंदा था। पता नहीं फौज में क्यों चला गया। तब अण्डरवर्ल्ड में भी उसका कोई पंगा खड़ा हो गया था। ठीक से याद नहीं ।"

देवराज चौहान ने जगमोहन से कहा।

"व्हिस्की की बढ़िया बोतल लाओ।"

“इसे व्हिस्की पिलाओगे?" जगमोहन के होंठों से निकला।

“देवा का दोस्त है ये तो मेरा भी दोस्त हुआ। संदीप बोस हमारे साथ व्हिस्की पिएगा।"

"ये ठीक है।" संदीप बोस बोला--- "दारू की ये बोतल कल मेरे काम आ जायेगी।" जगमोहन व्हिस्की की बोतल ले आया गिलास।लाया। एक गिलास देखकर बोस बोला।

“एक और गिलास लाओ ।"

"मैं नहीं पीता।" जगमोहन बोला।

“हैरानी है कि तुम नहीं पीते।" फिर उसने बोतल को देखा--- "ये तो मैं खत्म कर दूंगा।"

देवराज चौहान ने अपना गिलास तैयार किया। संदीप बोस का तैयार किया।

दोनों ने शुरुआत कर दी।

संदीप बोस शुरुआत तो क्या, पीने में दौड़ लगा रहा था।

“देवा ने मुझसे कहा था कि जब कभी ज्यादा पैसा कमाना हो तो संदीप बोस के पास पहुंचकर, मेरा नाम ले लेना। ये भी कहा था कि बोस ऐसी जगहों की जानकारी रखता है जहां पैसा है।" देवराज चौहान ने कहा।

बोस ने नशे भरी आंखों से देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान मुस्कुराया ।

जगमोहन खामोश बैठा उनकी बातों में हिस्सा ले रहा था।

"जगह तो अब भी है।" संदीप बोस ने धीमें स्वर में कहा--- "पर क्या तुम भरोसे के हो?"

"पूरी तरह।"

"मुझे कैसे पता लगे कि तुम सही आदमी हो।"

"एक बार मेरे साथ काम करके देख लो।"

संदीप बोस सोच भरी नज़रों से देवराज चौहान और जगमोहन को देखने लगा।

देवराज चौहान ने उसका गिलास फिर भर दिया।

"अब तक क्या काम करते रहे?" संदीप बोस ने धीमें स्वर में पूछा।

"बहुत कुछ किया है, वो सब तुम ना ही जानो तो अच्छा है। देवराज चौहान बोला--- “तुम्हारे पास अगर काम है तो बोलो। देवा ने तो कहा था कि तुम्हारे पास हर वक्त काम तैयार रहता है।"

"वो तो अब भी है।"

कहां?"

"नागेरकर का जुआघर।” संदीप बोस फुसफुसाया--- “पहले तो छोटी रकमें होती थी। अब तो वहां बड़ी रकमें भी लगाई जाती हैं। पन्द्रह दिन बाद दीवाली है, तब तो और भी बड़ी रकमें लगेंगी टेबल पर। कानून की नज़रों से छिपकर नागेरकर का जुआघर चलता है। और पुलिस को तगड़े नोट मिलते हैं नागेरकर से। मैं कई बार वहां जा चुका हूँ। परन्तु खेला कभी नहीं। वहां सिर्फ ताश का खेल होता है, तीन पत्ती या दूसरी तरह के पत्ते । ऊपर की और नीचे की मंजिल पर कुल मिलकार पैंतीस टेबल लगी है। छोटी टेबल भी है और बड़ी टेबल भी। खेल शुरू करने से पहले खेलने वालों को नोटों के टोकन लेने होते हैं। जो कि बाद में कैश करा लिए जाते हैं। कमीशन के तौर पर पन्द्रह परसेंट नागेरकर लेता है। खेलने वालों का सारा पैसा एक कमरे में रखा जाता है। उस कमरें की ज्यादा सुरक्षा नहीं है। दरवाजा बंद रहता है भीतर एक-दो आदमी छोटी सी खिड़की से नोट लेते-देते, रहते हैं। दो-तीन दादा टाइप उस कमरे के बाहर पहरे के तौर पर घूमते रहते हैं। मैंने पूरी योजना बना रखी है कि काम कैसे किया जा सकता है। कैसे उस कमरे को लूटा जा सकता है। ये काम तो मैं कब का कर चुका होता परन्तु मेरे में दम-खम नहीं है बड़ा काम करने का। तुम कर सकते हो क्या?"

"कर सकता हूं।"

“सोच लो बीच रास्ते में ही फुस्स मत हो जाना।” संदीप बोस ने गिलास उठाकर एक ही सांस में खाली कर दिया और नया गिलास तैयार कर लिया। बोतल आधी से नीचे हो गई थी। देवराज चौहान का आधा गिलास, पहले वाला ही भरा हुआ था।

“फुस्स नहीं होने वाला। तुम मुझे अपनी योजना बताओ।"

"अभी?" संदीप बोस ने अपने गिलास को देखा--- "अभी तो पीने का वक्त है। तुम कल दोपहर मेरे कमरे पर आना।"

“पता बोलो।"

संदीप बोस ने अपना पता बताया।

"हम कल दोपहर को तुम्हारे पास आयेंगे। कहीं, कल तक तुम भूल तो नहीं जाओगे कि हमसे ये बातें हुई हैं।"

"क्या बात करते हो मेरे दोस्त।" संदीप बोस ने दांत फाड़े--- "यहां तो पीकर ही होश आता है। मैं कल दोपहर तक एक बार फिर अपनी योजना पर गौर करूंगा। पर तुम ये काम कर लोगे ना? हौंसला है ना? मुझे तो बहुत डर लगता...।"

"चिन्ता मत करो, काम हम कर लेंगे।" देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ--- "कल तुम्हारे घर पर आऊंगा ।"

"वो तो ठीक है पर अब कहां चले, बोतल अभी बाकी है।"

जगमोहन ने भी कुर्सी छोड़ दी।

"ये तुम खाली करो।" देवराज चौहान मुस्कुराया--- "मुझे कुछ काम है। जाना पड़ेगा।"

“कल आओगे ना?"

"पक्का।"

'देवराज चौहान और जगमोहन वहां से निकल कर नागेरकर के जुआघर में पहुंचे, जोकि चैम्बूर के एक भरे बाजार के पीछे, अंधेरी गली में सीढ़ियां चढ़कर था। गली में ही नागेरकर के दो लोग पहरेदारी के तौर पर टहल रहे थे कि कोई गलत बंदा ना आये। सीढ़ियों पर एक बल्ब जल रहा था । देखने में वो जगह बेहद साधारण और पुरानी लगती थी। दोनों सीढ़िया चढते ऊपर चले गये। नागेरकर के आदमी उन्हें घूर कर देख रहे थे, परन्तु कहा कुछ नहीं ।

"जगमोहन।” देवराज चौहान फुसफुसा कर बोला--- “संदीप बोस की योजना तो हम कल सुनेंगे। परन्तु आज हमें नागेरकर का ये जुआघर अच्छी तरह देख लेना चाहिये, ताकि बोस की बातों को समझने में आसानी हो। हमने नोटों वाला कमरा भी देखना है और सारे रास्तों को पहचानना है। ये भी देखना है कि जुआघर में नागेरकर के आदमी कहां-कहां पहरा देते हैं और उनकी संख्या कितनी है। नागेरकर भी अगर यहां मौजूद रहता है तो किधर बैठता है।"