ठिकाना, जगमोहन के एक कमरे वाला घर ही बना ।
देवराज चौहान अपना नोटों से भरा सूटकेस वहीं ले आया था। उसने जगमोहन को बताया कि यहां से जाने के बाद, होटल में ठहरा था और चेहरे को जांचने के इरादे से, पुरानी पहचान के कई लोगों के पास भी गया था। परन्तु ना तो देवा की पहचान के लोगों ने उसे पहचाना, ना ही सुरेन्द्र पाल की पहचान के लोगों ने उसे पहचाना। ऐसे में देवराज चौहान को काफी अच्छा महसूस हुआ कि पहले की जिन्दगी के सब लोगों से उसे छुटकारा मिल चुका है। नया जीवन जीने के लिए वो आजाद है।
जगमोहन भी नोट कर चुका था देवराज चौहान अब पहले वाला देवा या सुरेन्द्र पाल नहीं रहा। बहुत बदल चुका है। अब शांत, ठहरा हुआ गम्भीर इन्सान लगता है। जगमोहन ने उसमें कभी भी गैंगस्टर सुरेन्द्र पाल की झलक नहीं देखी।
अगले छः महीनों में देवराज चौहान और जगमोहन ने मिलकर दो काम किए।
पहला काम अपहरण का था और दूसरा भी अपहरण का रहा। पहले काम में तो भरपूर सफलता मिली।
तगड़े बिजनेसमैन की बेटी का अपहरण किया। लड़की की उम्र चौदह साल थी। देवराज चौहान ने उसके घर पर फोन करके अपहरण हो जाने की खबर दी। पुलिस को कुछ ना बताने को कहा। फिरौती के रूप में दो करोड़ की डिमांड रखी। घरवालों ने आनन-फानन दो करोड़ रुपये दिए और अपने बेटी को वापस पा लिया। दो दिन में ही ये सारा मामला खत्म हो गया। लड़की को कमरे में ही रखा गया था और जगमोहन हर वक्त उसकी रखवाली और उसे खाने-पिलाने के लिए, पास ही रहा था।
पहली सफलता को देखते हुए दूसरा काम भी अपहरण का ही किया।
इस बार तगड़े पैसे वाली पार्टी के बेटे का अपहरण किया जो कि सोलह बरस का था। उसे भी कमरे में रखा गया, जगमोहन उसके पहरे पर था। अपहरण के बाद लड़का सहम सा गया था। जगमोहन ने उसे तसल्ली दी कि चिन्ता ना करे। एक-दो दिन में ही उसे उसके घर पहुंचा दिया जायेगा। तब तक उसे चुपचाप इस कमरे में रहना होगा।
देवराज चौहान ने फोन बूथ से लड़के के बाप को फोन किया।
बात होते ही गड़गड़ हो गई।
लड़के का बाप फोन पर ही झगड़ा करने लगा कि उसके बेटे का अपहरण क्यों किया? देवराज चौहान ने समझाने की चेष्टा की कि झगड़ा खड़ा ना करे। उसके बेटे की जान खतरे में है, परन्तु सनकी-सा वो इन्सान गालियां देने लगा। फिरौती के रूप में पांच करोड़ की रकम मांगी गई, परन्तु वो पांच सौ भी देने को तैयार नहीं था। देवराज चौहान ने फोन बंद कर दिया कि वो ठण्डे दिमाग से सोचेगा तो तब उसे औलाद की चिन्ता होगी। ऐसे में देवराज चौहान आसामी पर नज़र रखे रहा। परन्तु जल्दी ही उसने आसामी के बंगले पर पुलिस की तीन कारें पहुंचती देखी। पुलिस के कई बड़े अफसर उतरकर भीतर गये। देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी। स्पष्ट था कि बेटे के अपहरण की खबर उसने पुलिस को दे दी है और पुलिस में उसकी पहचान भी है।
देवराज चौहान वापस कमरे में जगमोहन के पास पहुंचा।
लड़का चुपचाप बैड पर चढ़ा बैठा था।
"क्या हुआ?" देवराज चौहान के चेहरे गम्भीरता के भाव देख कर जगमोहन ने पूछा।
"लड़के के बाप ने पुलिस को खबर कर दी है।" देवराज चौहान ने कहा--- "उसकी पुलिस में पहचान भी है। कई बड़े आफिसर उसके घर पहुंचे।"
देवराज चौहान कुर्सी पर बैठा और सिग्रेट सुलगा ली।
"तो अब क्या करें ?"
“तुम कहो।” देवराज चौहान मुस्कुरा पड़ा।
"वो पैसा देने को तैयार नहीं ?"
“नहीं। उसने साफ मना कर दिया है।” देवराज चौहान बोला।
“ये तो गड़बड़ वाली बात है।" जगमोहन ने लड़के को देखा--- "अब इसका हम क्या करेंगे?"
लड़का और भी ज्यादा सहम गया। वो बातें समझ रहा था।
“पुराने अनुभवों को देखते हुए मैं पुलिस से कोई झगड़ा नहीं चाहता।” देवराज चौहान ने कहा।
“अगर हम पुलिस से झगड़ा करेंगे तो काम कैसे कर पायेंगे।" जगमोहन बोला।
“इसे रात को अंधेरा होने पर, इसके बाप के बंगले के बाहर छोड़ देंगे। इस तरह पुलिस का ध्यान हमारी तरफ नहीं होगा। हमें ढूंढने की जरूरत ही नहीं समझेगी पुलिस और मामला खत्म हो जायेगा।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में बोला ।
जगमोहन ने सहमति से सिर हिला दिया।
शाम के बाद अंधेरा हो जाने के बाद, देवराज चौहान और जगमोहन ने लड़के को साथ लिया और टैक्सी द्वारा लड़के के घर पर पहुंचे और उसे छोड़ दिया। देखते ही देखते लड़का दौड़ता हुआ, बंगले में चला गया।
इसके कुछ दिन बाद उन्होंने एक पुरानी कार खरीद ली।
"अपहरण का काम लम्बा नहीं चलेगा।" जगमोहन बोला।
"मैं ऐसा काम करना चाहता हूं जिसमें पुलिस दखल ना हो। हो तो बाद में हो, जब हम अपना काम खत्म कर लें। मैं किसी भी स्थिति में पुलिस से सामना नहीं करना चाहता।” देवराज चौहान ने कहा।
"ऐसा कौन-सा काम है?"
“ये तो मैं भी नहीं जानता, परन्तु करते-करते कोई काम तो ऐसा दिख जायेगा।”
“मैंने एक पैट्रोल पम्प देखा है।" जगमोहन बोला--- “दिन भर वहां भीड़ रहती है और काफी कैश मिल सकता है। रात को उस पैट्रोल पम्प पर सिर्फ दो लोग ही मौजूद रहते हैं जो पैट्रोल पम्प संभालते हैं और पैट्रोल भी डालते हैं।”
तीन दिन देवराज चौहान और जगमोहन ने पैट्रोल पम्प पर नज़र रखी। दिन में भी और रात को भी। रात के वक्त दो बार वो पैट्रोल' डलवाने के बहाने भी वहां गये। रात को बारह के बाद दो लोग ही वहां ड्यूटी देते थे।
छटे दिन रात डेढ़ बजे देवराज चौहान और जगमोहन पैट्रोल पम्प लूटने वहां पहुंचे। जगमोहन कार में पैट्रोल पम्प से पचास गज दूरी पर बैठा रहा और नज़रें पैट्रोल पम्प के केबिन पर रखी। देवराज चौहान पैदल चलता पैट्रोल पम्प पर पहुंचा। एक लड़का बाहर ही कुर्सी पर बैठा था। पास में शीशे का केबिन था। दूसरा केबिन में दिखा।
“क्या चाहिये साहब जी ?” कुर्सी पर बैठे लड़के ने ऊंची आवाज में पूछा।
“पानी कहां पर है?" आगे बढ़ते देवराज चौहान कह उठा।
“उस तरफ टंकी है।” उसने एक तरफ इशारा किया।
देवराज चौहान उसके पास पहुंच कर ठिठका। हर तरफ नज़र मारी। सब ठीक था। सामने चलती सड़क थी। वाहन आ जा रहे थे। देवराज चौहान ने रिवॉल्वर निकाली और कुर्सी पर बैठे लड़के को दिखाई।
लड़के की आंखें फैल गई।
“उठो।" देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा--- "केबिन में, अपने साथी के पास चलो।"
"क... क्या चाहते हो?" लड़का घबराया सा खड़ा हो गया।
"चलो।" देवराज चौहान का स्वर कठोर हो गया।
देवराज चौहान लड़के को लिए, केबिन का दरवाजा धकेलते भीतर प्रवेश कर गया।
भीतर पचास बरस का एक व्यक्ति कुर्सी पर बैठा, टेबल पर रखे कुछ कागजातों पर नज़रें दौड़ा रहा था। आहट पाकर उसने सिर उठाया। दोनों को देखा तो देवराज चौहान ने उसे रिवॉल्वर दिखाई।
रिवॉल्वर देखकर वो सतर्क हुआ।
"कोई शरारत मत करना। मैं सिर्फ यहां रखा पैसा लेने आया हूं।" देवराज चौहान ने बाहर शांत स्वर में कहा।
“पैसा।” वो कुर्सी से खड़ा हो गया--- "यहां कोई पैसा नहीं है। दो चार हजार ही पड़ा है। शाम को पैसा बैंक में जमा करा दिया जाता है।"
“ऐसा ही होता है पर आज ऐसा नहीं हो सका।" देवराज चौहान बोला--- “पैसा यहीं है।"
"त...तुम्हें कैसे पता?"
“इस पैट्रोल पम्प के एक कर्मचारी को सिर्फ दस हजार रुपया देकर ये जानकारी मालूम की थी।"
“किसने बताया...।”
“पैसा कहां रखा है?” देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा और आगे बढ़ कर उसकी छाती पर रिवॉल्वर की नाल रख दी। परन्तु दूसरे के प्रति भी सतर्क रहा कि वो कोई शरारत ना कर बैठे--- “जल्दी बताओ, मेरे पास वक्त कम है।"
रिवॉल्वर की नाल छाती पर लगाते ही उसकी हवा निकल गई।
“उ... उस अलमारी में दो बैग रखे हैं।" उसने जल्दी से कहा।
“ये तो अच्छी बात है कि तुम लोगों ने पहले से ही नोट पैक कर रखे हैं।" देवराज चौहान ने लड़के से कहा--- “नोटों वाले बैग निकालो।"
लड़के ने उस व्यक्ति को घबराई नज़रों से देखा।
"इसे बैग निकालने को कहो।" देवराज चौहान गुर्रा उठा ।
“इसकी बात मानो।" रिवॉल्वर की नाल छाती पर तनी थी। लड़का जल्दी से अलमारी की तरफ बढ़ गया।
“ये...ये तुम अच्छा नहीं कर रहे।" उसने हिम्मत करके देवराज चौहान से कहा।
"दोबारा जुबान खोली तो गोली मार दूंगा।” देवराज चौहान ने शब्दों को चबाकर कहा।
लड़का अलमारी से दोनों बैग निकाल लाया।
देवराज चौहान ने उसकी छाती पर से रिवॉल्वर हटाई और पीछे हटकर लड़के से बोला ।
"बैग खोलकर दिखाओ।"
लड़के ने बैग खोले ।
दोनों बैगों में नोट भरे पड़े थे। उन्हें बंद कर दिया गया।
"मेरे बारे में पुलिस को बताने की कोशिश मत करना। दूसरा हुलिया बता देना। अगर मेरा हुलिया पुलिस को दिया तो मैं वापस आकर तुम दोनों को शूट कर दूंगा।” देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा।
दोनों घबराये से मौजूद, देवराज चौहान को देखते रहे।
देवराज चौहान ने रिवॉल्वर जेब में रखी और उन दोनों के प्रति सतर्क रहते दोनों बैग उठाये और पलट कर दरवाजे की तरफ बढ़ गया। दरवाजा खोला और बाहर निकला ही था कि ठिठक गया उसी वक्त मोटरसाइकिल की आवाज पास में सुनाई दी। फिर गोल सी हैडलाइट पास आती दिखी और पैट्रोल पम्प के भीतर प्रवेश कर आई। वो पुलिस की मोटरसाइकिल थी। पीले रंग की बुलट हवलदार उसे चला रहा था, पीछे डण्डा थामें कांस्टेबल बैठा था।
देवराज चौहान पुनः आगे बढ़ गया। दोनों हाथों में एक-एक बैग थाम रखा था।
“ऐ सुनो!" हवलदार ने उसे पुकारा।
देवराज चौहान ठिठका और पलट कर मोटरसाइकिल के पास जा पहुंचा। तब तक मोटरसाइकिल का इंजन बंद किया जा चुका था। पीछे बैठा कांस्टेबल नीचे उतर चुका था।
"बैगों में क्या है?" हवलदार मोटरसाइकिल से उतर कर, उसे स्टैड पर लगाते पूछा ।
"नोट हैं साहब जी ।" देवराज चौहान ने मुस्कुरा कर कहा।
तभी दूर खड़े जगमोहन ने कार स्टार्ट की और आगे बढ़ाते कार को उसके पास, मात्र पन्द्रह कदम दूर ले आया। रिवॉल्वर भी निकाल ली थी कि कोई पंगा खड़ा हुआ तो संभाल लेगा। नज़र इधर ही थी।
“बैग दिखा।" हवलदार बोला।
देवराज चौहान ने बैग नीचे रखे। उन्हें खोला। भीतर नोटों की गड्डियां दिखी।
"नोट कहां ले जा रहा है? तू कौन है?"
“आज पैसा बैंक में नहीं जमा हो सका तो मालिक ने कहा, इतना पैसा यहां रखना ठीक नहीं। उनके पास ले आऊं !"
“तो तुम अग्रवाल साहब के ही आदमी हो?"
"जी साहब जी।"
“ठीक है जाओ। नोटों को संभाल के ले जाना। खो गये तो, हमें ही भागदौड़ करनी होगी।"
देवराज चौहान ने दोनों बैगो की जिप बंद की और उन्हें उठाकर सामने कार की तरफ बढ़ गया। सब कुछ ठीक से निपटते पाकर जगमोहन ने चैन की सांस ली। देवराज चौहान ने नोटों से भरे बैगों को कार की पीछे की सीट पर डाला और फुर्ती से आगे जगमोहन के बगल की सीट पर बैठा तो जगमोहन ने कार दौड़ा दी।
कांस्टेबल और हवलदार शीशे के केबिन की तरफ बढ़ गये।
"साहब जी ।" कांस्टेबल बोला--- “थकान हो रही है। चाय पीने का मन है।"
“अभी पिलवाता हूं तुम्हें चाय। मुन्ना से कहता हूं।"
“साथ में कुछ खाने को भी मिल जाये तो...।"
"यहां तो सिर्फ चाय ही मिलेगी। बाद में फकीरचंद के यहां चलेंगे। वो रात के लिए कुछ खाने का सामान रखता है।"
तभी दरवाजा खुला और केबिन से पचास बरस वाला व्यक्ति घबराया सा बाहर निकला।
"आपने उसे जाने क्यों दिया?" वो हवलदार से कह उठा।
"रोकता क्यों ?" हवलदार ने अजीब से स्वर में कहा।
"वो हमारे पैसे को लूटकर ले जा रहा...।"
"वो तो अपने को अग्रवाल साहब का कर्मचारी बता---।"
"वो लाखों रुपया लूट कर ले गया। आपने देखा भी कि वो नोट ले जा रहा है, पर उसे रोका नहीं...।"
"तुमने तब क्यों नहीं बताया?” हवलदार की हवा खुश्क हो गई।
"उसके पास रिवॉल्वर थी। तब मैं तुम्हें बताने की चेष्टा करता तो वो गोलियां चला देता।” वो चीखकर बोला।
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