रात के बारह बज गये थे। जगमोहन अभी तक नहीं लौटा था। देवा उसी कमरे में बंद रहा। आज उसे जगमोहन के लेट हो जाने से दूसरी तरह के अंदेशे उठ रहे थे कि कहीं जगमोहन के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया। अजीत सावले और अन्ना ने मिलकर उसे मार दिया हो और सारा पैसा खुद ले उड़े हों। देवा को किसी पर भी भरोसा नहीं था। वो जानता था कि कभी भी कोई, कैसा भी धोखा दे सकता है। अलबत्ता जगमोहन पर उसे काफी हद तक एतवार था। आज उसके मन में नहीं आया था कि जगमोहन भी उसकी दौलत लेकर खिसक सकता है। ना ही मन में ये आया था कि जगमोहन पुलिस को उसके बारे में खबर दे सकता है। एक ही ख्याल था कि जगमोहन के साथ कुछ बुरा ना कर दिया गया हो?

कमरे की लाइट तो शाम को ही उसने ऑन नहीं की थी। वो नहीं चाहता था लाइट रोशन देखकर जगमोहन का कोई पहचान वाला या अड़ौसी-पड़ोसी वहां आये और उसे देख ले। वैसे जब से वो यहां था, तब से जगमोहन से मिलने कोई नहीं आया था। जगमोहन ने पहले ही बता दिया था कि उससे मिलने कोई नहीं आता, क्योंकि वो कंगला है उसके पास पैसा नहीं तो यार दोस्त भी नहीं। देवा यूं ही इधर-उधर की सोचों में उलझा रहा।

वक्त बीतता गया। जगमोहन की चिन्ता बढ़ती चली गई। अब तक तो उसे वापस आ जाना चाहिये था। मन में खीझ भी उठी कि उसके लिए हालात इतने बुरे हैं कि खुले में जाना खतरनाक था। अगर जगमोहन को कुछ हो गया है तो उसे यहां से चले जाना था। तब यहां रहने का कोई मतलब ही नहीं था। देवा ने सोचा कि आज रातभर जगमोहन की वापसी का इन्तजार करेगा फिर यहां से जाने का प्लान करेगा। अंधेरे में उसने दीवार के साथ रखे सूटकेस को छुआ। इसमें एक करोड़ रुपया था । चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर, चेहरा ठीक कराना था, गाल का निशान गायब होते ही सुरेन्द्र पाल ने कभी लोगों को नज़र नहीं आना था। गाल पर कटे का लम्बा निशान, सुरेन्द्र पाल होने की शिनाख्त कर रहा था। प्लास्टिक सर्जरी के बाद जो पैसा बचना था, उससे खर्चा चलाना था और ये फैसला करना था कि नई शख्सियत के साथ कौन-सा काम करे?

रात के तीन बज गये।

देवा की बेचैनी जरूरत से ज्यादा बढ़ गई। उसे भरोसा होने लगा कि जगमोहन के साथ कुछ बुरा हो चुका है, वरना अब तक तो हर हाल में वापस लौट ही आता। सावले या अन्ना ने, या दोनों ने मिलकर, या इन्होंने पांच-सात को और भी मिला लिया होगा और करोड़ों की दौलत के सामने आते ही जगमोहन की हत्या की और दौलत लेकर खिसक गये। यकीनन ऐसा ही हुआ होगा, तभी तो जगमोहन की वापसी नहीं हो सकी अब तक।

देवा के होंठ भिंच गये। परन्तु उसने अपने को शांत रखा कि गैंग खत्म हो चुका है। अगर गैंग के लोग गलत हरकत करते हैं तो तब भी उसने जवाबदेही नहीं लेनी है। उसने अपनी जिन्दगी बदलने की सोच ली है। अब जो भी होता रहे, उसे किसी बात से कोई मतलब नहीं। अगर जगमोहन की हत्या की जा चुकी है तो उसका उसे अफसोस था, परन्तु किसी भी हालत में कदम वापस नहीं मोड़ने हैं। देवा सोचने लगा कि अब उसे किस तरह जीना चाहिये? अब उसकी जरूरत किसी एक्सपर्ट प्लास्टिक सर्जन की जो उसके चेहरे को दुरुस्त कर सके। पहले तो उसका प्लान था कि जगमोहन के द्वारा अपने काम के प्लास्टिक सर्जन को तलाश करेगा। परन्तु अब ये काम उसे खुद ही करना होगा। उसकी निगाहों में ऐसा कोई नहीं था जो पूरी तरह विश्वासी हो। सालों लम्बा रास्ता तय करने के बाद भी आज देवा अकेला ही खड़ा था।

एकाएक उसकी सोचें टूटी।

दरवाजे पर खटका हुआ फिर थपथपाहट उभरी ?

कौन? क्या जगमोहन आ गया? देवा का हाथ जेब की तरफ गया। परन्तु रिवॉल्वर उसके पास थी नहीं, वो तो जगमोहन को दे चुका था। देवा के होंठ भिंच गये। वो दरवाजे के पास पहुंचा। खामोशी से खड़ा हो गया।

बाहर से कोई आहट ना उभर रही थी।

दरवाजा पुनः थपथपाया गया।

"कौन ?” देवा ने शांत स्वर में पूछा।

“मैं हूं---जगमोहन ।”

जगमोहन की आवाज़ सुनते ही देवा के चेहरे पर राहत के भाव उभरे। उसने दरवाजा खोल दिया।

जगमोहन ने भीतर प्रवेश करते हुए कहा।

"नींद में थे।"

"जाग रहा था।" देवा बोला--- "तुमने बहुत देर लगा दी।" कहकर उसने दरवाजा बंद किया।

जगमोहन ने लाइट ऑन कर दी।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

"रिवॉल्वर देने का शुक्रिया।" जगमोहन ने रिवॉल्वर निकालकर बैड पर उछाल दी--- "अगर तुमने रिवॉल्वर ना दी होती तो तुम्हारी सारी दौलत अजीत साबले ले उड़ता और मैं भी ना बचता।”

देवा के होंठ सिकुड़े उसने रिवॉल्वर उठाई और चैम्बर चैक किया। दो गोलियां कम थी।

"कम हुई दो गोलियां इस वक्त साबले की लाश की पीठ में धंसी हुई हैं।" जगमोहन बोला।

"साबले ने अकेले ही ऐसी कोशिश की? अन्ना उसके साथ नहीं था?" देवा ने पूछा।

"अन्ना वहीं था तब, पर साबले के साथ नहीं था। अन्ना ने ईमानदारी से मेरा हर काम में साथ दिया। मैंने खुद वो पैसा सब लोगों को बांटा। हीरे-जवाहरात बांटे। आखिर में चौबीस लाख बिना हिसाब का रुपया बच गया था, वो मैंने अन्ना को दे दिया।" जगमोहन ने थके और गम्भीर स्वर में कहा--- "तुमने जो काम कहा था, वो मैंने पूरा कर दिया देवा ।" कहने के साथ ही सब कुछ खुलासा तौर पर जगमोहन देवा को बताने लगा।

देवा की शांत निगाह जगमोहन पर थी।

■■■

अगले दिन जगमोहन ने नाश्ते में परांठे बनाये।

देवा और जगमोहन ने मिलकर नाश्ता किया। दोनों शांत और चुप-चुप थे। नाश्ते के बाद जगमोहन ने चाय बनाकर देवा को भी दी और खुद भी लेकर कुर्सी पर बैठ गया। बोला।

“खाने-पीने का सामान खत्म हो गया है, हजार रुपया दे देना, सामान ले आऊंगा।"

देवा ने चाय का घूंट भरा और जगमोहन को देखा। कह उठा।

"कल तुमने मेरा करोड़ों रुपया, मेरे कहने पर बांटा, तुम्हें कुछ अपने लिए भी रखना चाहिये था। मैंने तो कहा भी था कि--- "वो पैसा मेरे लिए मिट्टी की तरह था, क्योंकि वो मेरा नहीं था।" जगमोहन ने कहा--- "उस पैसे को कमाने में मैंने मेहनत नहीं की थी। वो सिर्फ तुम्हारा था या फिर उस पर तुम्हारे गैंग के लोगों का हक था।"

देवा ने कुछ नहीं कहा।

दोनों ने चाय समाप्त की। देवा ने हजार रुपया, जगमोहन को दिया और कहा।

"तुमने मेरे काफी काम किए हैं। मुझे यहां लाकर छिपाया। खतरा उठाकर पैसों को, मेरे आदमियों में बांटा। मेरी मां और बहन तक पैसा पहुंचाया। मैं तुम्हारा एहसानमंद हूं।"

"मैंने बिना किसी स्वार्थ के ये सब काम किए हैं।" जगमोहन मुस्कुरा पड़ा--- "क्योंकि मैं इस बात को भूला नहीं हूं कि जब मेरी मां का ऑपरेशन होना था तो तुमने लाख रुपया फौरन निकालकर मुझे दे दिया था।"

“क्योंकि तुमने एक बार गली में मेरी जान बचाई थी।"

“उसकी कीमत मुझे मिल गई थी। वैसे भी वो बात मैं भूल चुका हूं।"

“अब मेरा एक काम बचा है जगमोहन। वो भी कर देते तो मुझे यहां से जाने में आसानी होगी।"

"क्या काम ?" जगमोहन ने देवा को देखा।

"किसी एक्सपर्ट प्लास्टिक सर्जन को ढूंढना है, जो मेरा बिगड़ा चेहरा ठीक कर सके। जब तक ये काम नहीं होता तब तक तुम्हारी सहायता की मुझे जरूरत रहेगी, क्योंकि पुलिस का खतरा अभी सिर पर है।"

"मैं ये काम भी कर दूंगा।" जगमोहन ने कहा।

"डॉक्टर विश्वास वाला होना चाहिये जो अपना मुंह बंद रखे। सब काम तुम्हें ही करना है। मेरा खुले में जाना अभी ठीक नहीं। इस काम के लिए डॉक्टर जितना भी पैसा ले उसकी परवाह नहीं। बेशक उसे मुंह बंद रखने की भी कीमत दे देना। मेरा ये काम ठीक ठाक ढंग से निपट जाना चाहिये।" देवा ने गम्भीर स्वर में कहा।

"मैं ऐसे किसी डॉक्टर को तलाशने की चेष्टा करता हूं।"

जगमोहन तैयार होकर चला गया।

देवा रोज की तरह दिनभर कमरें में बंद रहा और भविष्य के बारे में योजनाएं बनाता रहा।

शाम को जगमोहन लौटा। किचन का सामान भी लेता आया था।

“प्लास्टिक सर्जन के बारे में पता करता रहा जो कि काम बढ़िया करता हो।” जगमोहन बोला— “पर अभी कोई फायदा नहीं हुआ।”

"कोशिश करते रहो। मिल जायेगा।”

सामान एक तरफ रखने के बाद जगमोहन कुर्सी पर बैठता कह उठा।

“कल तक पुलिस तुम्हें लेकर काफी शांत हो गई थी। वो सोचने लगी थी कि तुम मुम्बई से खिसक गये हो या मारे जा चुके हो। पुलिस को तुम्हारी खबर नहीं मिल रही थी, परन्तु आज पुलिस तुम्हारी तलाश में भागी फिर रही है। पुलिस को ये खबर मिल गई है कि कल सुरेन्द्र पाल ने अपने गैंग के लोगों में पैसा बांटा है और गैंग खत्म हो जाने की घोषणा की है। इससे पुलिस को पता चल गया कि सुरेन्द्र पाल जिन्दा है और मुम्बई में ही है ।"

देवा मुस्कुराया ।

“तुम मुस्कुरा रहे हो, जबकि बाहर तुम्हारे लिए खतरा बढ़ गया है।" जगमोहन ने कहा ।

"खतरा बाहर है, यहां नहीं।" देवा बोला--- “इससे ज्यादा खतरा तो पहले था जब मैं गैंग चला रहा था। तब मौत हर वक्त मेरे आस-पास रहती थी। रही बात अब पुलिस के खतरे की तो जिस दिन मेरा चेहरा ठीक होगा, ये खतरा भी खत्म हो जायेगा।”

“मेरे ख्याल में तुम्हें कुछ देर के लिए मुम्बई से निकल जाना चाहिये।”

"अब भागने का मेरा इरादा नहीं है।"

"मेरा वो मतलब नहीं था। तुमने चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करवानी है। ये काम दिल्ली जाकर करा लो। कुछ वक्त भी बीत जायेगा।"

"मैं मुम्बई में ही रहूंगा और यहीं प्लास्टिक सर्जरी कराऊंगा।"

जगमोहन ने दोबारा ये बात नहीं की।

देवा ने सिगरेट सुलगा ली।

"आज सुबह पुलिस को अजीत सावले की लाश भी वहां पड़ी मिल गई है। पुलिस ने तुम्हारे गैंग के कई लोगों को गिरफ्तार किया है पूछताछ के लिए। उनसे वे तुम्हारे बारे में पूछ रहे होंगे।"

"मैंने गैंग खत्म कर दिया है। उनमें सारा पैसा बांट दिया है, उनसे मेरा कोई मतलब नहीं रहा।"

“मुझे अभी-अभी ख्याल आया है कि प्लास्टिक सर्जन के लिए तुम अपने गैंग के डॉक्टर से क्यों नहीं पूछते।" जगमोहन बोला।

देवा ने जगमोहन को देखा।

"वो डॉक्टर तुम्हारी समस्या हल कर सकता है।”

"कदम आगे उठाकर मैं पीछे नहीं लेना चाहता।" देवा ने गम्भीर स्वर में कहा--- “पहले के वास्ता रखते लोगों से मैंने पूरी तरह दूरी बना ली है। मेरा किसी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में रहना ही गलत है जो जानता हो कि सुरेन्द्र पाल अपना चेहरा ठीक कराकर नई जिन्दगी जीने लगा है। मुझे किसी पर भरोसा नहीं है।"

“मुझ पर है?" जगमोहन मुस्कुराया ।

देवा ने गहरी निगाहों से जगमोहन को देख कर कहा।

“उस वक्त तुम्हारा साथ लेना मेरी मजबूरी थी। मैंने इस बात का खतरा उठाकर, तुम्हारें घर में ठिकाना बनाया था कि भी शायद मेरे साथ गद्दारी कर दो। परन्तु अब तुम पर भरोसा जमता जा रहा है। मेरे ख्याल में तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता तो मेरा पैसा लेकर भाग गया होता। मैंने तुम्हारे बारे में भी ऐसा ही सोचा था कि कहीं तुम भी ऐसा ना कर दो और एक बार मुझे शंका भी हुई कि तुमने ऐसा कर दिया है। लेकिन सब ठीक रहा। तुमने मेरा भरोसा नहीं तोड़ा।"

जगमोहन सिर हिलाकर रह गया।

"मेरे दोस्त।" देवा मुस्कुराकर बोला--- “अब तुम जल्दी से मेरे लिए प्लास्टिक सर्जन की तलाश करो कि मैं अपना चेहरा ठीक कराकर नई जिन्दगी शुरू कर सकूं, और कोई मुझे पहचान भी ना सके। बीती जिन्दगी में मैंने जो गलतियां की अब वो गलतियां नहीं करूंगा। मैंने अण्डरवलर्ड की दुनियां को अच्छी तरह जान लिया है, इस बात का फायदा मुझे भविष्य में मिलेगा। मैं समझ चुका हूं कि समंदर में रहकर लम्बी जिन्दगी जीनी है तो कैसे जीनी है। क्या करना है और क्या नहीं करना है। तुम ये भी कह सकते हो कि आज तक मेरी ट्रेनिंग चल रही थी, असल जिन्दगी तो अब शुरू करूंगा।"

“काम क्या करोगे?” जगमोहन ने पूछा।

“हम जैसे लोग शराफत से भरा काम तो नहीं कर सकते परन्तु शराफत से तो काम कर ही सकते हैं। दौलत बनाकर चुपचाप निकल जाने का काम। पुलिस से कोई झगड़ा नहीं। अंडरवर्ल्ड से कोई झगड़ा नहीं, जब चेहरा ठीक हो जायेगा तो सुरेन्द्र पाल को लोग भूल जायेंगे। मैं कोई ऐसा काम करने की सोचूंगा जो खामोशी से किया जाये। देवा नाम भी मुझे छोड़ना होगा। तब मैं अपने लिए देवराज चौहान का नाम इस्तेमाल करूंगा जो कि लोगों के लिए नया होगा और कोई भी मुझे पहचान नहीं सकेगा।” देवा ने कहा।

“तुम्हारा भाई शंकर चौहान तुम्हें पहचान सकता है। वो पुलिस वाला है।” जगमोहन ने कहा ।

“वो कभी सोच भी नहीं सकता कि मैं उसका भाई देवा हूं। मेरे चेहरे में तब काफी बदलाव आ चुके होंगे प्लास्टिक सर्जरी कराकर । मेरे ख्याल में तो मुझे देखकर भी वो पहचान नहीं सकेगा।” देवा ने जगमोहन को देखा--- "लेकिन तुम्हें मैं हमेशा याद रखूंगा कि तुम मेरे बहुत काम आये। इसके पीछे तुम्हारा कोई लालच भी नहीं रहा और तुम देवराज चौहान की हकीकत से पूरी तरह वाकिफ हो ।”

“तुम्हारे बारे में मेरा मुंह हमेशा बंद रहेगा।" जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।

जवाब में देवा सिर हिलाकर रह गया।

अगले चार दिन तक जगमोहन मुम्बई में घूमता एक्सपर्ट प्लास्टिक सर्जन को तलाश करता रहा जो कि अच्छे ढंग से देवा के चेहरे की सर्जरी कर के चेहरे के सारे निशानों को गायब कर दे।

चौथे दिन जगमोहन को सफलता मिली।

तीन-चार डॉक्टरों ने इस बारे में आर०के० पटेल यानी कि राजेश कुमार पटेल का नाम बताया था, जो कि गुजरात, अहमदाबाद से था और खास इलाके में उसका अपना क्लीनिक था। यूं वो अन्य अस्पतालों में भी बैठता था। पटेल के बारे में पता चला कि उससे बेहतर प्लास्टिक सर्जन दूसरा नहीं। एक से अधिक डॉक्टरों ने उसका नाम लिया तो जगमोहन ने पटेल से मिलने का इरादा किया और खार में उसके क्लीनिक पर जा पहुंचा। शाम को पांच बज रहे थे। क्लीनिक में स्टॉफ मौजूद था। दो पेशंट उसके देखते ही देखते आये थे और बैठकर इन्तजार करने लगे। जगमोहन को रिसेप्शन से पता चला कि डॉक्टर पटेल छः बजे तक आयेंगे। जगमोहन भी अपना नम्बर लेकर इन्तजार में बैठ गया।

साढ़े छः बजे डॉक्टर राजेश कुमार पटेल वहां पहुंचा। वो पैंतालिस की उम्र का स्वस्थ व्यक्ति लग रहा था। रंग सांवला था। आंखों पर नज़र का चश्मा था। सवा सात बजे जगमोहन का नम्बर आया, भीतर जाने का। वो डॉक्टर पटेल के केबिन में पहुंचा और सीधे-सीधे बात शुरू की।

“मेरे एक दोस्त का चेहरा कुछ बिगड़ गया है। वो चाहता है कि सर्जरी करवाकर उसका चेहरा ठीक हो जाये।" जगमोहन बोला।

"वो साथ आया है?" डॉक्टर पटेल ने पूछा।

"नहीं।"

“उसे ले आओ। चेहरा देखने के बाद ही मैं कुछ बता सकूंगा। क्या हुआ था चेहरे को। जल गया था ?"

"वो फौज़ में था और आंतकवादियों से लड़ाई के दौरान, उसका चेहरा बिगड़ा था।" जगमोहन ने कहा।

“उसे मेरे पास ले आओ। मैं उसके चेहरे की जांच करूंगा।"

“वो अण्डरवर्ल्ड से वास्ता रखता है।" जगमोहन ने स्पष्ट कहा--- “इन दिनों पुलिस उसकी तलाश में है।”

डॉक्टर पटेल ने गहरी निगाहों से जगमोहन को देखा।

“क्या ये बात आप राज रख सकेंगे। "

डॉक्टर पटेल ने पहलू बदला ।

"फीस आपको इतनी मिलेगी कि आपको कोई शिकायत नहीं होगी।" जगमोहन ने कहा।

डॉक्टर पटेल कुछ राहत में आता दिखा।

"कौन है वो ?" पटेल ने पूछा।

"सुरेन्द्र पाल ।"

"ओह वो तो काफी खतरनाक है।" डॉक्टर पटेल को होठों से निकला।

“इस काम की फीस तुम्हें मुंहमांगी मिलेगी। मुंह बंद रखना होगा सुरेन्द्र पाल के बारे में। अब भी बाद में भी। खोला तो मौत। बंद रखा तो पैसा। इस काम को शुरू करने से पहले ही फैसला कर लो कि ईमानदार रहोगे या नहीं?" जगमोहन गम्भीर था।

“सुरेन्द्र पाल का कोई आदमी ही पुलिस को बता देगा कि मैंने उसके चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी की है और...।"

“अब सुरेन्द्र पाल का कोई साथी नहीं है। सिर्फ मैं हूँ। ये बात कोई दूसरा नहीं जानता। तुम उसके चेहरे के जख्मों की प्लासिटक सर्जरी करोगे तो उसका चेहरा खुद ही बदल जायेगा कि उसे कोई पहचानेगा नहीं। तुम पर कभी कोई बात नहीं आयेगी। पैसा तगड़ा मिलेगा। लेकिन सुरेन्द्र पाल के मामले में अपनी जुबान हमेशा बंद रखनी होगी।" जगमोहन का स्वर शांत था।

“ठीक है।” पटेल ने सिर हिलाया--- “तुम सुरेन्द्र पाल को यहां ले आओ।"

“दिन में उसे खतरा है कि कोई पहचान लेगा। मैं उसे रात को लेकर आऊंगा।"

“तुम कहो तो मैं उसे जाकर देख लेता हूं अभी तो चेहरे की जांच ही करनी है।" डॉक्टर पटेल ने कहा।

“सुरेन्द्र पाल गुप्त जगह पर छिपा है और वो पसन्द नहीं करेगा कि किसी को उस जगह का पता चले। उसे मैं ही लेकर आऊंगा। तुम ये बताओ कि रात को कितने बजे, कहां पर लेकर आऊं ?” जगमोहन बोला।

"यहीं ले आओ। मैं इन्तजार करूंगा। ग्यारह बजे तक तो तुम सुरेन्द्र पाल को ले ही आओगे।”

"बारह बजे तक।" डॉक्टर पटेल ने सिर हिला दिया।

"तुम्हारा परिवार है?" जगमोहन ने शांत स्वर में पूछा।

"हां क्यों ?"

“बच्चे क्या करते हैं?"

“स्कूल में पढ़ रहे हैं---।" डॉक्टर पटेल ने सामान्य स्वर में कहा।

“अपने बच्चों का ख्याल रखना और मुंह बंद रखना। समझ गये।" जगमोहन का लहजा शांत था।

डॉक्टर पटेल कुछ बेचैन दिखा। बोला।

"मैं ये काम करके शायद मुसीबत मोल लेने जा रहा हूं।"

“अगर मुंह खोलने का इरादा है पुलिस के सामने तो तुम सही कह रहे हो।" जगमोहन ने कहा।

“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है।"

“फिर तुम मुसीबत मोल नहीं ले रहे, बल्कि मोटे नोट कमाने जा रहे हो।" जगमोहन मुस्कुरा पड़ा।

जगमोहन, देवा के साथ रात साढ़े बारह बजे डॉक्टर पटेल के क्लीनिक में पहुंचा। क्लीनिक में खामोशी छाई हुई थी और स्टॉफ के नाम पर सिर्फ एक लड़का ही नज़र आ रहा था। डॉक्टर पटेल उनके इन्तजार में था। वो खुशी से देवा से मिला। उसके चेहरे की जांच परख करने में डेढ़ घंटा लग गया फिर उसने बताया कि सुरेन्द्र पाल का चेहरा ठीक हो जायेगा और काफी हद तक बदल भी जायेगा कि कोई पहचान नहीं सकेगा।

“आमतौर पर ऐसे केस में कितना खर्चा आता है डॉक्टर ?” देवा ने पूछा ।

"बीस लाख।"

“मैं तुम्हें पचास लाख दूंगा। जुबान बंद रख के काम करना सारा पैसा काम के बाद दूंगा। मेरे बारे में पुलिस या कोई और ना जान पाये कि मैंने प्लास्टिक सर्जरी करवाई है और चेहरा भी बदल गया है।" देवा ने कहा।

डॉक्टर पटेल ने विश्वास दिलाया कि वो कोई भी गलत हरकत नहीं करेगा।

उसके बाद जगमोहन देवा के इसी काम पर लग गया। डॉक्टर पटेल ने उन्हें कई बार क्लीनिक पर बुलाया। रात का ही टाइम तय होता था। इस सारे काम में डॉक्टर पटेल ने छ: महीनों का वक्त लिया। चेहरे के छोटे-छोटे दस से ज्यादा आप्रेशन किए। ऊपर होंठ भी थोड़ा सा कटा हुआ था उसे भी दुरुस्त किया। आप्रेशन के दौरान देवा पन्द्रह-पन्द्रह दिन उसके क्लीनिक में ही रहा। जगमोहन हर वक्त देवा के साथ रहा था इन छः महीनों के दौरान उसे खर्चा पानी देवा से मिल रहा था। जगमोहन देवा से उतना ही पैसा लेता जितनी कि उसे जरूरत होती। वैसे करोड़ रुपया सूटकेस में बंद उसी के कमरे में ही पड़ा था।

डॉक्टर पटेल एक्सपर्ट प्लास्टिक सर्जन था।

छः महीने बाद जब उसने कहा कि चेहरा फाइनल हो गया है तो देवा ने चेहरे को शीशे में ध्यान से देखा। एकदम बदल गया था चेहरा। पहचान में नहीं आ रहा था। नये चेहरे के साथ ही सुरेन्द्र पाल खत्म हो गया था। जगमोहन को भी देवा के नये चेहरे के साथ खुशी हो रही थी कि इस चेहरे को कोई नहीं पहचान सकता कि ये वो ही देवा है या सुरेन्द्र पाल। एक नई जिन्दगी शुरू करने के लिए ये नया चेहरा बहुत सहायक था। अब चेहरे पर लम्बे कट का कोई निशान नहीं था। कटा होंठ सामान्य हो चुका था। दो-तीन और निशान भी थे चेहरे पर, वो भी गायब हो चुके थे।

देवा के साथ-साथ जगमोहन को भी तसल्ली थी कि डॉक्टर पटेल ने बढ़िया काम किया है। वादे के मुताबिक डॉक्टर पटेल को पचास लाख रुपया दे दिया गया।

देवा जब जगमोहन के साथ क्लीनिक से बाहर निकला तो आजाद था। अब पुलिस का कोई डर नहीं था कि वो उसे पहचान कर खत्म कर देगी। गैंग पुराने लोग भी उसे नहीं पहचान सकते । उसकी मां-बहन, या शंकर द्वारा पहचान पाना तो बिल्कुल ही नामुमकिन था। अब एक नई जिन्दगी उसके सामने खड़ी उसकी राह देख रही थी।

जगमोहन महसूस कर रहा था कि गैंगस्टर देवा में और अब के देवा में बहुत बदलाव आ चुका है। गैंगस्टर देवा बात-बात पर गुस्से होना, हर समय चेहरे पर कठोरता दिखना, रिवॉल्वर को हर समय तैयार रखना और सामने वाले को शक भरी निगाहों से देखना। हर वक्त मुम्बई में धाक जमाए रखने के लिए खून-खराबा करना वो सब कुछ अब देवा में दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा था। अब देवा शांत रहता था। तीखा नहीं बोलता था। सामान्य ढंग से बात करता था। जगमोहन से अक्सर मुस्कुरा कर बात करता था। देवा की आंखों और चेहरे पर छाई रहने वाली खूंखारता जाने कहां गायब हो गई थी। छः महीने से जगमोहन देवा के साथ था ये सारे बदलाव जगमोहन ने महसूस किए थे। उस दिन जब सारे काम निपट कर डॉक्टर पटेल के क्लीनिक से निकले तो शाम हो रही थी। देवा के चेहरे पर राहत थी। मुस्कान थी।

“जगमोहन ।” देवा बोला--- “आज किसी रेस्टोरेंट में डिनर करते हैं।"

“अब तुम कहीं भी जा सकते हो देवा।" जगमोहन मुस्कुराया--- “अब तुम्हें कोई भी पहचान नहीं सकता।"

“मुझे देवा मत कहो। देवा को भूल जाओ। अब मैं अपने असली नाम के साथ जिन्दगी जिऊंगा। मुझे देवराज चौहान कहो।”

“देवराज चौहान ?”

“ये ही मेरा असली नाम है और आगे की जिन्दगी मुझे इसी नाम के साथ जीनी है। लेकिन हमारा साथ भी अब छूटने वाला है। तुम्हें मैं हमेशा याद रखूंगा। मेरे बुरे वक्त में तुम मेरे काम बहुत आये।"

"बार-बार ये बात मत कहो देवा---ओह देवराज चौहान। ये नया नाम भी अच्छा है।" जगमोहन बोला।

(पाठकों अब हम आगे देवा को उनके नाम देवराज चौहान कहकर ही सम्बोधित करेंगे)

उसके बाद जगमोहन और देवराज चौहान ने बढ़िया रेस्टोरेंट में डिनर किया। देवराज चौहान खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था कि अब उसे देवा या सुरेन्द्र पाल के तौर पर कोई नहीं पहचान सकता। डॉक्टर पटेल की तरफ से उसे तसल्ली थी कि इस बारे में वो कभी भी मुंह नहीं खोलेगा। जगमोहन पर उसे भरोसा था। उसने जगमोहन के साथ छः महीने बिताये थे और काफी हद तक उसे समझा था कि वो कैसा इन्सान है।

डिनर के पश्चात् दोनों उसी एक कमरे वाले घर में पहुंचे।

देवराज चौहान ने कमरे में निगाह मारी फिर अपने चेहरे पर हाथ फेर कर कहा।

"कैसा लग रहा हूं मैं?"

"बहुत बढ़िया। अगर मैं इलाज के दौरान तुम्हारे साथ ना रहा होता तो, आज पहचान नहीं पाता कि ये तुम ही हो।" जगमोहन ने कहा।

"एक तरह से मेरा असली चेहरा ही है ये। तब मैं अठारह का हुआ करता था आज चौबीस का हूं। ऐसे में मेरे चेहरे में काफी बदलाव आ चुका है। जिन्होंने मुझे 18 की उम्र में देखा होगा आज मुझे देखकर पहचान सकेंगे।" देवराज चौहान ने कहा।

जगमोहन इन्कार में सिर हिलाकर रह गया।

"आज यहां आखिरी रात है मेरी। तुम्हारा-मेरा इतना ही साथ था।" देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा--- “मेरे पास पचास लाख रुपया है, मैं तुम्हें पच्चीस लाख देना चाहता हूं। इतना ही है मेरे पास देने को और ।"

“मुझे नहीं चाहिये।"

"इन्कार मत करो। पैसा तुम्हारे काम आयेगा जगमोहन ।”

“मैंने तुम्हारे लिए जो किया है, उसकी कीमत नहीं लेना पाहता।” जगमोहन ने कहा--- “मैंने किसी स्वार्थ की खातिर कुछ नहीं किया। तुम मुझे शुरू से ही अच्छे लगते रहे हो। फिर तुमने मेरी मां के ऑप्रेशन के लिए लाख रुपया दिया। ऐसे में मेरा मन किया कि मैं तुम्हारे काम आऊं तो मैं तुम्हारे काम आया। पैसा कमाना मुझे भी आता है, वक्त ठीक रहा तो जल्दी ही पैसा इकट्ठा कर लूंगा।"

“मेरी खुशी की खातिर तो पच्चीस लाख ले सकते.... ।”

“तुम्हारी खुशी की खातिर ही तो छः महीनों से तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारे सारे काम पूरे किए। इन छः महीनों में मेरा खर्चा तुम चलाते रहे। ये ही बहुत है। मुझे कुछ देने की कोशिश ना करो।" जगमोहन ने सामान्य स्वर में कहा--- “इन छः महीनों में मैंने तुम्हें काफी बदलते हुए देखा है। तुम जब गैंग चलाते थे तो बहुत खतरनाक हुआ करते थे। तुम्हारे चेहरे पर दरिन्दगी दिखती थी। तुम्हारी बातें पैनी धार की तरह होती थी। तब तुम से कैसी भी आशा रखी जा सकती थी, परन्तु अब तुम शांत हो गये हो जैसे। जिस चेहरे पर कभी मुस्कान नहीं होती थी वहां अब मैं अक्सर मुस्कान देखता हूं। तुम्हारें हाव-भाव में चैन के भाव दिखते हैं। मुझे लगता ही नहीं कि तुम कभी वो सुरेन्द्र पाल या वो देवा थे। तुम सच में उन दोनों नामों के रूपों को पीछे छोड़ चुके हो। अब तुममें एक नया देवराज चौहान जिन्दा होता जा रहा है। ऐसे में मैं सोच सकता हूं कि तुम अच्छे ढंग से नई जिन्दगी की शुरुआत कर सकोगे।"

"मैं जरूर बदलता जा रहा हूं जगमोहन।" देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा--- “परन्तु मेरा दिमाग नहीं बदला। दिमाग में पहले की कड़वी यादें भरी हुई हैं। मैं ही जानता हूं कि मैं कैसे-कैसे हालातों से निकल कर आज अपने नाम देवराज चौहान तक पहुंच पाया हूं। मैंने जिन्दगी की शुरुआत ही गलत ढंग से की और मुझे कोई राह दिखाने वाला भी नहीं था। परन्तु अब मैं ठीक से फैसले ले सकता हूं, क्योंकि मेरे पास बीती जिन्दगी के अनुभव हैं। मेरे क्या कदम उठाने से क्या अन्जाम होगा, ये मुझे पहले ही पता है। अब मैं सोच-समझ कर कदम उठा सकता हूं। अब मैं कोई गलती नहीं करूंगा।"

अगले दिन जब देवराज चौहान की आंख खुली तो सुबह के नौ बज रहे थे। जगमोहन गहरी नींद में सोया हुआ था। देवराज चौहान ने उठकर चाय बनाई। अपने लिए भी और जगमोहन के लिए भी। तब तक जगमोहन भी उठ गया था। दोनों की नज़रें मिली। देवराज चौहान ने चाय का गिलास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा ।

“अब तक तुम ही मुझे सुबह की चाय देते रहे। आज मेरा जाने का दिन है इसलिए आज मेरे हाथ की चाय पिओ।”

दोनों के होंठों पर मुस्कान थी ।

जगमोहन ने चाय का गिलास थामा और घूंट भरा।

“कहां जा रहे हो?" जगमोहन ने पूछा।

“अभी कुछ भी फैसला नहीं किया।" देवराज चौहान ने कहा।

“मुम्बई से बाहर?"

"नहीं। मुम्बई से दूर मैं जा ही नहीं सकता। यहीं मैं पैदा हुआ यहीं बड़ा हुआ... मुम्बई से बाहर नहीं जाऊंगा। परन्तु किसी भी पुराने रास्ते पर पुरानी पहचान के बंदे के पास नहीं जाऊंगा। नई जिन्दगी नये लोग सब कुछ नया होगा।"

"मैं तुम्हारे लिए आज शानदार नाश्ता बनाऊंगा।"

देवराज चौहान ने मुस्कुराकर जगमोहन को देखा।

"मेरे जाने के बाद तुम क्या करोगे?"

"वो ही पुराना काम। काम की तलाश करूंगा कि कहीं से नोट हाथ लग जायें। तुम्हारी और मेरी राहें जुदा हैं।”

देवराज चौहान नहा-धोकर तैयार हुआ तब तक जगमोहन ने नाश्ते की तैयारी कर ली थी।

“आज हम दोनों साथ-साथ नाश्ता करेंगे। आज के नाश्ते को हम हमेशा याद रखेंगे।” देवराज चौहान मुस्कुरा कर कह उठा।

नाश्ता तैयार हुआ।

दोनों ने साथ-साथ नाश्ता किया इसी में बारह बज गये थे।

देवराज चौहान ने नोटों से भरा सूटकेस उठाया और बोला ।

“तुम मुझे हमेशा याद रहोगे क्योंकि तुम मेरे भरोसे पर पूरी तरह खरे उतरे। ऐसा इन्सान मैंने पहले कभी नहीं देखा।”

जगमोहन मुस्कुरा कर रह गया।

देवराज चौहान चला गया।

जगमोहन फिर उस कमरे में अकेला रह गया। छः महीने रहा था देवराज चौहान उसके साथ। उसका दिल भी लगा रहता था, वरना मां की मौत के बाद तो इस एक कमरे वाले घर में दिल नहीं लगता था। देवराज चौहान के जाने के बाद फिर खाली-खाली सा लगने लगा था। परन्तु वो जानता था कि दुनिया में वो अकेला है और अकेला ही रहना है। देवराज चौहान का उसके पास छः महीना तक रहना तो वक्ती हवा थी। अब उसे अपना काम देखना है। नोट पैदा करने हैं। कोई ऐसा रास्ता बनाना है कि पैसा की तंगी हमेशा के लिए दूर हो सके। अपनी जिन्दगी को बेहतर बना सके ।

उसके बाद जगमोहन अपने कामों में व्यस्त हो गया।

चार दिन बीत गये और वो सुबह पांचवें दिन की थी सोये उठने के बाद जगमोहन ने चाय बनाई थी और कुर्सी पर बैठे चाय के गिलास से घूंट भर रहा था कि कमरे के खुले दरवाजे पर किसी के आ खड़े होने का एहसास पाकर उसने गर्दन घुमाई। अगले ही पल उसके चेहरे पर अजीब से भाव आ गये। आंखों में हैरानी आ गई।

दरवाजे पर देवराज चौहान खड़ा था।

“तुम?" जगमोहन के होंठो से निकला।

देवराज चौहान उसे देखे जा रहा था।

जगमोहन जाने क्यों सतर्क-सा खड़ा हो गया। उसने चाय का गिलास एक तरफ रखा और खड़ा हो गया। नज़रें देवराज चौहान पर ही थी इस वक्त, जगमोहन का दिमाग तेजी से दौड़ रहा था। वो सिर्फ एक ही बात सोच रहा था कि ये वापस क्यों आया? इसे जाने के बाद वापस नहीं लौटना था। परन्तु पांचवें दिन ये फिर क्यों लौटा ?

देवराज चौहान की एकटक निगाह जगमोहन पर थी।

जगमोहन और सतर्क हो गया था।

“अगर तुम सोचते हो कि मैंने तुम्हारे सूटकेस में से पैसे निकाले हैं तो गलत सोच रहे हो, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।" स्वर को शाँत रखने की चेष्टा में जगमोहन ने जल्दी से कहा--- “मैं हर मौके पर तुम्हारे साथ शराफत से पेश आया हूं।"

देवराज चौहान ने कदम उठाये और कमरे में आ गया।

"मैंने पता किया कि तुमने मेरी मां-बहन को पैसे पहुंचाये कि नहीं... ।” देवराज चौहान ने कहा।

"मैने तुमसे सच कहा था, मैंने तुम्हारी मां को दस करोड़ और हीरे-जवाहरातों से भरा बैग दिया था।" जगमोहन ने तेज स्वर में कहा--- “तब तुम्हारी बहन नेहा भी वहां थी। तुम पता कर सकते हो...।"

“मैंने तुमसे कहा था कि बाकी का सारा पैसा, मेरे खत्म हो रहे गैंग में बांट देना...।"

"तो क्या मैंने नहीं बांटा ?" जगमोहन की आंखें सिकुड़ गई।

"अब तुम कहते हो कि मेरे नोटों से भरे सूटकेस में से तुमने कोई रकम नहीं निकाली।”

"सच में मैंने ऐसा कुछ नहीं...।”

"यही तो समस्या है जगमोहन कि तुमने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया?" देवराज चौहान शांत स्वर में बोला--- "तुम इतने सच्चे क्यों निकले कि तुमने कहीं भी हेराफेरी नहीं की। अगर हेराफेरी की होती तो मुझे वापस नहीं आना पड़ता तुम्हारे पास।"

"क्या मतलब?" जगमोहन चौंका--- "तुम इसलिए वापस आये हो कि मैंने हेराफेरी नहीं की।"

देवराज चौहान ने गम्भीरता से सहमति से सिर हिला दिया।

"मैं-मैं अभी भी नहीं समझा।" जगमोहन ने उलझन भरे स्वर में कहा।

"तुम जैसा सच्चा और ईमानदार इन्सान मुझे कहीं नहीं मिल सकता। चार दिन मुझे तुम्हारा ही ख्याल आता रहा। तुम्हारी ईमानदारी का मुझे एहसास होता रहा और पांचवें दिन में, अब मैं तुम्हारें पास चला आया।"

जगमोहन देवराज चौहान को देखता रहा।

"मेरे साथ काम करोगे जगमोहन?"

"तुम्हारे साथ ?" जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

"हां। हम दोनों जो भी काम करेंगे इकट्ठे करेंगे।" देवराज चौहान बोला।

जगमोहन लम्बे पलों तक देवराज चौहान को देखता रहा फिर कह उठा।

“तुम्हें गलतफहमी हो रही है। मैं इतना ईमानदार नहीं जितना कि तुम सोच रहे हो। मैं...।"

“मेरे साथ तो तुम ईमानदार ही हो। दुनिया के साथ तुम क्या हो, वो मैं नहीं जानता।” देवराज चौहान बोला।

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

“जबर्दस्ती नहीं है। अगर मेरा साथ पसन्द नहीं तो...।"

"अगर तुम गैंग खड़ा करने की सोच रहे हो तो...।"

"इन सब बातों को मैंने बहुत पीछे छोड़ दिया है। जो भी काम करूंगा, अकेले करूंगा, या फिर तुम्हारे साथ। मुझे तुम जैसे साथी की जरूरत महसूस हो रही है मेरा भी कोई नहीं, तुम्हारा भी कोई नहीं। सोच लो, कुछ दिन बाद जवाब दे देना।”

जगमोहन की गम्भीर निगाह देवराज चौहान पर थी।

"अगर मैं तुम्हारे साथ हो जाऊं तो मेरी क्या हैसियत होगी, तुम्हारे साथ?" जगमोहन ने पूछा।

"दोस्त की, भाई की, बराबर की हैसियत होगी तुम्हारी।" देवराज चौहान मुस्कुरा पड़ा।

"और अगर मैं बाद में तुमसे, किसी कारण अलग होना चाहूं तो तुम वजह नहीं पूछोगे। एतराज नहीं करोगे।"

"बेशक । अगर तुम्हें मेरी कोई बात पसन्द ना आये, इस हद तक पसन्द ना आये कि तुम मुझसे अलग हो जाना ही बेहतर समझो तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं।" देवराज चौहान के चेहरे पर मुस्कान थी ।

जगमोहन के चेहरे पर भी मुस्कान आ ठहरी।

“ठीक है। मैं तुम्हारे साथ काम करूंगा देवराज चौहान।” जगमोहन बोला--- “हो सकता है हम में, अच्छी पट जाये। ना भी पटे तो कोई बात नहीं। हम दोनों ये कोशिश करके देखते हैं।”