अगले दिन सुबह फिर जगमोहन तैयार होकर घर से निकल गया। देवा को बता गया था कि आज पैसा उठाकर उसके साथियों में बांटकर आयेगा। वापसी में वक्त लग सकता है। देवा ने जगमोहन को समझा दिया था कि इस बात की हवा पुलिस को ना लगे। वरना पुलिस धर-पकड़ शुरू कर देगी। गोलियां भी चल सकती हैं।
जगमोहन ने सबसे पहले उस ठिकाने, जहां पर दौलत रखी थी, पर पहुंचा। वहां कोई नहीं था। अल्मारियों में और लकड़ी के टेबल पर नोटों की गड्डियां लगी थी, जो कि करोड़ों रुपया था। एक ड्रम में हीरे-जवाहरात भरे पड़े थे। जगमोहन सबसे पहले नोटों को वहां पहले से ही मौजूद सूटकेसों में डालने लगा। साथ ही सोच रहा था कि देवा खामखाह ही अपनी दौलत लुटा रहा है। देवा की जगह वो होता तो ऐसा ना करता। पर देवा को ऐसा करना ही ठीक लग रहा था तो ऐसा ही सही। तीन घंटे लगे उसे नोटों को और हीरे-जवाहरातों को सूटकसों में डालने में। फुल साइज के अट्ठारह सूटकेस भर गये थे। अकेले जगमोहन के बस का नहीं था, इतने भारी सूटकेसों को उठाकर कहीं और ले जाना।
सोच-विचार करके वो उस जगह पर ताला लगाकर बाहर आया और फोन बूथ से देवा के हैडक्वार्टर फोन किया तो गार्ड अन्ना से उसकी बात हो गई।
“पहचाना मुझे?" जगमोहन ने कहा।
“हां।” अन्ना की आवाज आई--- "तुम वो ही हो जो सुरेन्द्रपाल की खबर लाये थे।"
"ठीक कहा...।"
“तुम बता रहे थे कि सुरेन्द्र पाल सारा पैसा अपने साथियों में बांटना चाहता है, ये काम कब होगा?"
“इसी वास्ते तुम्हें फोन किया है।" जगमोहन बोला--- “तुम अजीत सावले के साथ कोलाबा पहुंचो। पता सुन लो । खामोशी से आना कोई पीछे ना हो।" जगमोहन ने एक रेस्टोरेंट के बाहर मिलने का पता बता दिया।
डेढ़ घंटे बाद अन्ना और अजीत सावले उससे आ मिले।
“सुरेन्द्र पाल कहां है।” अजीत सावले बोला--- “वो हमसे क्यों नहीं मिल रहा?"
"सुरेन्द्र पाल का सामने आना खतरे से खाली नहीं।" जगमोहन बोला ।
“पुलिस अभी भी सुरेन्द्र पाल की तलाश में है।" अन्ना ने गम्भीर स्वर में कहा।
"सुरेन्द्र पाल मुम्बई में ही है?" अजीत सावले ने जगमोहन से पूछा।
"बेकार की बात मत करो। जिस काम के लिए मैंने तुम्हें बुलाया है, वो बात करो।"
"क्या काम है?"
“सुरेन्द्र पाल ने आज पैसा तुम सब में बाँट देने को कहा है।” जगमोहन बोला।
अजीत सावले मुस्कुरा पड़ा ।
अन्ना ने सिर हिलाया ।
"सुरेन्द्र पाल ने कहा है कि पैसा लेने के बाद सब अपने-अपने रास्तों पर लग जायें। गैंग खत्म कर दें। उसके ना मिलने पर पुलिस का गुस्सा तुम लोगों पर उतरेगा। बेहतर होगा कि पैसे से कोई काम-धंधा शुरू कर लो।"
अजीत सावले और अन्ना की निगाह जगमोहन पर थी।
“मैंने तुमसे कहा था कि गैंग के आदमी मुझे गिनकर बताना। जिनमें पैसा बंटना है।" जगमोहन ने अन्ना से कहा ।
"छियत्तर लोग हैं।"
"छियत्तर?" जगमोहन ने सोच भरे स्वर में कहा--- “मैं अभी पैसा गिनकर आया हूं। उन्नचास करोड़ की नकद दौलत है, बाकी हीरे-जवाहरात है। इस हिसाब से हर एक को उन्चास लाख नकद मिलेंगे और बाकी हीरे-जवाहरात बांटे जायेंगे। सबके लिए ही ये अच्छी रकम है। मेरे ख्याल में इस पैसे से काफी लोग शराफत का धंधा कर लेंगे।"
“पैसा कहां है?" अजीत सावले ने पूछा।
“पास ही हैं।" जगमोहन ने अन्ना को देखा--- “मेरे ख्याल में पैसा बांटने का काम हमें किसी ठिकाने पर ना करके किसी वीरान जगह पर करना चाहिये। पैसे लेते जाओ और निकलते जाओ। सब कुछ खामोशी से होगा।"
"क्या कहते हो?" अन्ना ने अजीत सावले को देखा।
"ख्याल बुरा नहीं।" सावले ने कहा--- "ठिकाने पर ये काम करने में खतरा है।"
"तो कोई ऐसी जगह सोचो, जहां ये काम किया जा सके।" जगमोहन ने कहा।
अन्ना और अजीत सावले पांच-सात मिनट आपस में बातें करते रहे फिर एक जगह तय कर ली। वो जगह जगमोहन को भी ठीक लगी। एकदम सुनसान जगह थी, बेशक दिन हो या रात।
“अपने आदमियों को वहां पहुंचने को कहो।” जगमोहन बोला--- “उन्हें कहना कि एक साथ ठिकाने से ना निकलें। दो-तीन के ग्रुप में सावधानी से निकलें और पुलिस का ध्यान रखें कि, पुलिस की निगाह उन पर ना हो।"
"मैं फोन करके आता हूं।" अजीत सावले ने कहा।
“मैं भी तुम्हारे साथ रहूंगा ताकि सुन सकूं कि तुम किसे फोन कर रहे हो।"
“तुम मुझ पर शक कर रहे हो।" सावले तीव्र स्वर में बोला ।
“गलत मत कहो, मैं बस किसी पर भरोसा नहीं कर रहा। वक्त और हालात खतरनाक चल रहे हैं। पुलिस के रॉडार पर तुम लोगों का सारा गैंग है और मैं फंसना नहीं चाहता।"
"तुम पैसा हमें दो, हम आपस में बांट लेंगे।” अजीत सावले बोला--- “मेरे साथ अन्ना है।"
"पैसा बांटने का काम मेरे सामने होगा। सुरेन्द्र पाल ने ऐसा ही कहा है।" जगमोहन बोला।
उसके बाद एक पब्लिक बूथ से अजीत सावले ने हैडक्वार्टर फोन किया। अन्ना और जगमोहन उसके पास ही थे। सावले ने फोन पर उसके साथी को पैसा बांटने की बात बताई और उस जगह के बारे में बताया जहां ये काम होना था। उनसे कहा कि अन्य ठिकानों पर भी मौजूद अपने लोगों को वहां पहुंचने को कह दिया जाये। साथ ही ये समझा दिया कि बहुत सावधानी से अपने ठिकानों से निकला जाये।
इस काम से निपटने के बाद जगमोहन बोला।
"आओ, पैसे के पास चलते हैं। वो अट्ठारह सूटकेस हैं और हर सूटकेस भारी है। उन्हें ले जाने के लिए वैन की जरूरत है।"
"वैन का इन्तजाम हो जायेगा।” अन्ना ने कहा।
जगमोहन के साथ वे दोनों आगे बढ़ गये।
"कितनी दूर है पैसा?" सावले ने पूछा।
“पास ही, दस मिनट में हम वहां होंगे।" जगमोहन ने कहा।
"तुम्हें पहले कभी नहीं देखा, सुरेन्द्र पाल के साथ क्या रिश्ता है तुम्हारा?" अजीत सावले बोला।
“कुछ भी नहीं। बस ईमानदारी का रिश्ता है।"
“मुझे हैरानी है कि सुरेन्द्र पाल ने इतना बड़ा काम तुम्हारे हवाले कर दिया। तुम पैसा लेकर भाग भी सकते थे।"
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।
“मुझे हैरानी है कि मैंने तुम्हें पहले क्यों नहीं देखा ?"
"अन्ना ने देखा है।” जगमोहन बोला।
“ये एक बार सुरेन्द्र पाल से मिलने आया था।” अन्ना चलते-चलते कह उठा।
“तुम जरूर सुरेन्द्र पाल के खास हो। तभी सुरेन्द्र पाल ने तुम पर इतना बड़ा भरोसा किया...।"
“सुरेन्द्र पाल से भी मुलाकात हो जाती तो बहुत अच्छा लगता।” अन्ना बोला--- “क्या तुम उसे कहोगे कि हमसे एक बार मिल ले।"
“जरूर कहूंगा।" जगमोहन बोला, “परन्तु मिलना या ना मिलना उसकी मर्जी पर निर्भर है।"
“तुम जानते हो कि सुरेन्द्र पाल कहां है?" अजीत सावले बोला।
“नहीं।" जगमोहन ने शांत स्वर में कहा--- “वो मेरे घर पर आया था। परसों की बात है। मुझे सब कुछ समझाकर, बातें करके चला गया और हर रोज सुबह पूछने के लिए फोन करता है कि मैंने इस काम को किया या नहीं ? "
“ये पक्का है कि सुरेन्द्र पाल तुम पर नजर रख रहा होगा।" अन्ना बोला--- "इतना बड़ा भरोसा वो किसी पर नहीं करेगा।"
जगमोहन खामोश रहा।
वे तीनों एक गली के भीतर, उस ठिकाने पर जा पहुंचे, जहां दौलत मौजूद थी।
जगमोहन ताला खोलकर भीतर प्रवेश हुआ, वो दोनों भी भीतर आ गये। वहां सूटकेस भरे देखकर वे ठिठके फिर अजीत सावले तेजी से सूटकेस की तरफ बढ़ता कह उठा ।
“तुमने इनमें पैसा भर दिया?”
“हां। हाथ मत लगाना। इन्हें बंद ही रहने दो।”
"मैं देख भी नहीं सकता?" सावले ने उसे देखा ।
जगमोहन ने इन्कार में सिर हिला दिया।
"हीरे-जवाहरात कहां पर हैं?"
“उन दो सूटकेसों में।" जगमोहन ने अलग से जड़े सूटकेसों की तरफ इशारा किया।
अन्ना खामोशी से, गम्भीरता से खड़ा नज़रें घुमा रहा था।
“तुमने इस माल में से कितनी हेरा-फेरी की?” अजीत सावले ने हंसकर पूछा।
जगमोहन ने कठोर निगाहों से सावले को देखा।
"ये कहोगे कि हेराफेरी नहीं की तो, मैं किसी भी हाल में यकीन नहीं करूंगा। पैसा तो सबका ईमान खराब कर देता है। देखने वाली बात तो ये है कि तुम्हारा कितना ईमान खराब हुआ? दस-पन्द्रह करोड़ तो 'पार' कर ही लिया होगा।”
“अगर मेरा ईमान खराब होता तो तुम सब खाली हाथ रह जाते।" जगमोहन ने चुभते स्वर में कहा।
अजीत सावले बहुत खुश नजर आ रहा था और उसने पलक झपकते ही रिवॉल्वर निकाल ली।
जगमोहन चौंका। परन्तु रिवॉल्वर उस पर तन चुकी थी।
जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।
अन्ना सतर्क हो उठा।
"तुम्हारा ईमान बिगड़ा हो या ना बिगड़ा हो। लेकिन मेरा ईमान जरूर बिगड़ गया है।" अजीत सावले ने हंसकर कहा--- "एक सूटकेस खोलो। मुझे दिखाओ।"
जगमोहन के दांत भिंच गये।
"ये क्या कर रहे हो सावले ।" अन्ना कह उठा--- "इसे सुरेन्द्र पाल ने भेजा है।"
"सुरेन्द्र पाल गैंग खत्म कर रहा है। अब वो हमारा बड़ा नहीं रहा।" अजीत सावले कहर भरे स्वर में बोला--- “अब मैं अपना गैंग खड़ा करूंगा। ये पैसा मेरे बड़े काम आयेगा। मुझे इसकी बहुत जरूरत...।"
“सावले।" अन्ना ने गम्भीर स्वर में कहा--- “सुरेन्द्र पाल मरा नहीं है। छिपा हुआ है। वो तुम्हारी गर्दन पकड़ लेगा ।"
“सुरेन्द्र पाल कुछ नहीं कर सकता अब।" अजीत सावले हंस पड़ा--- “वो अपनी जान बचा ले, उसके लिए इतना ही बहुत है। उस पुलिस कभी भी इतना वक्त नहीं देगी कि वो मेरी तलाश में खुले में आ सके।"
जगमोहन ने अजीत सावले की आंखों में झांका।
अन्ना सतर्क नज़र आ रहा था।
“अब तुम मरोगे।” सावले रिवॉल्वर थामें जगमोहन से बोला ।
जगमोहन ने अन्ना से कहा।
“इसकी इस हरकत में तुम इसके साथ हो?" अन्ना ने खामोशी से इन्कार में सिर हिला दिया।
तभी जगमोहन को लगा, सावले उस पर फायर करने जा रहा है ।
“रुको, मुझे मत मारना।" जगमोहन ने तेजी से कहा ।
“ना मारूं ?” सावले की आंखें सिकुड़ी।
“मैं-मैं तुम्हारे साथ हूं।”
“मेरे साथ ?” सावले ने व्यंग से कहा--- “पर मुझे तो तुम्हारे साथ की जरूरत नहीं है।"
"मुझे मत मारो। मुझे सिर्फ एक करोड़ दे दो, मैं चुपचाप यहां से चला जाऊंगा। मैं तुम्हारा दोस्त बन... ।”
"जुबान बंद रख हरामजादे। मैं तेरे चक्कर में नहीं आने वाला ।" सावले ने दांत भींचकर कहा--- "तू सुरेन्द्र पाल का आदमी...।"
"पहले ये तो देख ले कि इन सूटकेसों में क्या है।" जगमोहन जल्दी से कह उठा।
“तुमने बताया था कि नोट हैं। उन्चास करोड़ रुपया नकद और हीरे-जवाहरात...।"
"वो तो मैंने कहा था, पर तुमने तो नहीं देखा कि बीच में क्या है।" जगमोहन गम्भीर नज़र आ रहा था।
अजीत सावले आंखें सिकोड़े जगमोहन को देखने लगा।
अन्ना ने जगमोहन को देखा। वो इन हालातों से परेशान लग रहा था।
“सूटकेस खोल के दिखा।” सावले गुर्राया ।
"कौन-सा खोलूं।" जगमोहन ने सूटकेसों को देखा।
“खोल---।” दांत किटकिटा कर अजीत सावले गुर्रा उठा ।
जगमोहन आगे बढ़ा कि उसी पल सावले के पीछे देखता कह उठा
“सुरेन्द्र पाल---।"
अजीत सावले ये सुनते ही फुर्ती से घूमा। पीछे देखा ।
जगमोहन ने बिजली की सी तेजी से रिवॉल्वर निकाला और लगातार दो बार ट्रेगर दबा दिया। दोनों गोलियों अजीत सावले की पीठ में जा धंसी । उसके शरीर को झटका लगा और उसके घुटने मुड़ते गये। वो नीचे जा लुढ़का।
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