देवा दस दिन से जगमोहन के एक कमरे वाले घर में ही था। जगमोहन देवा का पूरा ध्यान रख रहा था और बाहर की खबर लाकर भी उसे देता था। देवा की टांग की सुबह-शाम मालिश करता था। सब काम दिल से कर रहा था और अब देवा की टांग में आराम था। दो-बार डॉक्टर से दवा भी लाया था देवा के लिए। खाना खुद ही बनाता था। कमरे के एक कोने में उसने गैस और चूल्हा रखा हुआ था। कमरे में डबल बैड था। जिस पर देवा लेटा हुआ था, बैड के दूसरे हिस्से पर जगमोहन रात को सोया करता था। जगमोहन, देवा की सिगरेट भी ला देता था, परन्तु पैसे देवा ही खर्च कर रहा था। जगमोहन के पास ज्यादा पैसे नहीं थे। जगमोहन की वजह से देवा का दिल भी लगा हुआ था। देवा को तसल्ली थी कि उसने छिपने के लिए बढ़िया जगह चुनी है। दस दिनों में कोई भी जगमोहन के घर नहीं आया था । जगमोहन ने बाहर के बारे में बताया था कि पूरे मुम्बई की पुलिस उसकी तलाश में दौड़े फिर रही है। जगह-जगह छापे मारे जा रहे हैं। उसके सब ठिकानों पर रोजाना पुलिस के कई फेरे लगते हैं। उसके लोगों से पूछताछ चलती रहती है।

देवा गम्भीरता से जगमोहन की रिपोर्ट सुनता रहता ।

सुबह का वक्त था जगमोहन नाश्ता कर रहा था। देवा नाश्ता कर चुका था।

“तुमने मालिश के दम पर, मेरी टांग ठीक कर दी।” देवा ने मुस्कुराकर कहा।

“मैंने नहीं, डॉक्टर की दवा ने ठीक की है।" जगमोहन बोला।

देवा उसे देखकर मुस्कुराया फिर बोला।

"मेरे जख्म भी अब ठीक हो गये हैं।"

“तुम कहीं बाहर जाने की तो नहीं सोच रहे?" जगमोहन ने कहा।

"बाहर जाने का मेरा कोई इरादा नहीं है।”

“सोचना भी मत। तुम्हारे लिए बाहर के हालात बहुत बुरे हैं। पुलिस तुम्हें देखते ही मार देगी। जे०सी०पी० कैलाश पंवार और बाकी के पुलिस वालों की हत्या को पुलिस बहुत गम्भीरता से ले रही है। मेरे ख्याल में तो अब तुम मुम्बई में कोई काम-धंधा नहीं कर सकते। पुलिस ने तुम्हारे गैंग के लोगों को वार्निंग दे दी है कि कोई धंधा करने की कोशिश ना करें और अपना गैंग खत्म करके बिखर जायें।" जगमोहन गम्भीर था--- "परन्तु तुम्हारे गैंग वाले अभी उसी ठिकाने पर जमे हुए हैं, लेकिन वो कोई धंधा नहीं कर रहे। मेरे ख्याल में उन्हें तुम्हारे वापस आने का इन्तजार है। उन्हें लगता है कि तुम वापस आओगे। तुम्हारे सब ठिकानों पर सन्नाटा छाया हुआ है।"

देवराज चौहान ने गम्भीर अन्दाज में सिगरेट सुलगाकर कहा।

“मुझे मालूम है कि मैं वापस नहीं जा सकता है।"

“मुम्बई में अब तुम दोबारा खड़े नहीं हो सकते। कोई काम नहीं कर सकते।"

“तुमने मुझे काफी सहारा दिया है। अब समझा हूं कि मैं तुम पर पूरा भरोसा कर सकता हूं।"

"मैंने तुम्हें कहा था कि तुम मुझे अच्छे लगे। तुमने मेरी मां के ऑप्रेशन के लिए लाख रुपया---।"

"छोड़ो इन बातों को-- ।” देवा बोला।

“तुमने मेरा ध्यान रखा, मैं तुम्हारा रख रहा हूं।"

"तुमने एक बार मेरी जान भी बचाई थी।"

“तो तुमने मुझे अच्छी रकम दी थी तब---।"

देवा मुस्कुराकर जगमोहन को देखता रहा ।

"जो भी हो।" देवा बोला--- “तुम मुझे जंचे।"

जगमोहन चुप रहा।

“एक खास काम निपटाना है। करोगे?" देवा ने कहा।

“क्या काम ?”

“उसके लिए मुझे बहुत ही भरोसे का आदमी चाहिये ।"

"अपने भरोसे के आदमी का पता बताओ। उसे बुला लाता हूं।" जगमोहन ने कहा ।

"तुम भरोसे के नहीं हो ?" देवा ने गम्भीर निगाहों से जगामोहन को देखा।

"ये तुम पर है कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो।" जगमोहन की निगाह देवा पर जा टिकी।

"मैं तुम पर भरोसा करूंगा जगमोहन।" देवा ने शांत स्वर में कहा--- "भरोसा करके देखूंगा।"

जवाब में जगमोहन मुस्कुराया ।

"तुमने मेरा हैडक्वार्टर तो देखा ही है, जहां आकर तुम मुझसे मिले थे।" देवा बोला।

जगमोहन की नजरें देवा पर थी।

"वहां तुम्हें अन्ना मिलेगा। वो ही अन्ना, जो तुम्हें उस दिन मेरे पास लाया था। उसे जाकर कहो कि सुरेन्द्र पाल ठीक है फिर अजीत सावले से मिलना। अन्ना तुम्हें अजीत सावले से मिलवा देगा। अजीत सावले से मेरी तरफ से कहना कि मैं गैंग को छोड़ रहा हूँ। पुलिस अब मेरे गैंग को फिर से खड़ा नहीं होने देगी। मुझे सब कुछ खत्म करना होगा। परन्तु छोड़ने से पहले मैंने तुम लोगों की मदद से जो पैसा कमाया है, वो तुम सब में बांट देना चाहता हूँ।"

“सारा पैसा?" जगमोहन ने देवा को देखा।

"हां।"

"अपने पास भी तो कुछ रखोगे।" जगमोहन बोला।

“उतना ही, जितनी मुझे जरूरत है।"

"तुम्हें कितनी जरूरत है?"

देवा का हाथ अपने कटे गाल तक पहुंच गया। जहां कान से लेकर होठों तक कट था। जिसकी वजह से लोगों ने उसे देवा के तौर पर पहचानना बंद कर दिया था। इसका उसे काफी फायदा मिला था कि किसी ने उसे पहचाना नहीं और दोबारा मुम्बई में पांव जमाने में आसानी हुई, परन्तु अब ये ही निशान, उसकी मौत का कारण बन सकता था। पुलिस कभी भी, कहीं भी, उसे देखते ही पहचान सकती थी।

“मुझे अपने इस गाल की प्लास्टिक सर्जरी करवानी है। जो खर्चा आयेगा, उतना ही पैसा रखूंगा।” देवा बोला।

"उसके बाद अपना खर्चा कहां से करोगे ?"

देवा के चेहरे पर गम्भीरता आ ठहरी। कुछ पल रुककर कह उठा।

"जब से यहां आया हूं, अपनी बीती जिन्दगी पर गौर कर रहा हूं। बहुत सोचा मैंने और आखिर में इसी नतीजे पर पहुंचा कि मैंने जिन्दगी की शुरुआत ही गलत तरीके से की। मुझे कोई समझाने वाला नहीं था। कुछ बचपना भी था। सारा सिलसिला ही गलत चला। मुझे जिन्दगी का अनुभव नहीं था, जोकि अब हो चुका है। मैंने कई काम ऐसे किए जो मुझे नहीं करने चाहिये थे। जबकि मैं सोचता रहा कि मैं ठीक कर रहा हूं। अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अब मैं नई जिन्दगी की शुरुआत करूंगा जिसमें मुझे लड़कियों से दूर रहना होगा। पुलिस रास्ते अलग होंगे और मेरे अलग। पुलिस अगर कभी मेरे रास्ते में आ भी जाती है तो मैं रास्ता बदल लूंगा। पुलिस, कानून, एक आदमी का नाम नहीं है ये सरकारी संस्था है, जो कभी खत्म नहीं हो सकती। हम जैसे लोग आते-जाते रहते हैं, परन्तु पुलिस अपनी जगह कायम रहती है। पुलिस से टकराना, बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं है। अब कोई गैंग भी खड़ा नहीं करूंगा । ये खामखाह की मौत की राह है। करीना की तरह कोई भी मुखबिरी करेगा और मुझे खत्म करा देगा। इस तरह जीने का कोई फायदा नहीं कि ये पता ना हो कि आने वाला दिन देख पाऊंगा या नहीं। साथ ही अण्डरवर्ल्ड लोगों से, जहां तक हो सके, झगड़ा नहीं करना है। ये लोग स्थाई नहीं होते, आज कोई है तो कल कोई इन्होंने चले ही जाना है। इनसे झगड़े का कोई फायदा नहीं होता।”

“तुम्हारी बातें सुनकर मुझे हैरानी हो रही है।" जगमोहन बोला।

"क्यों?"

"लड़की से दूर रहना तो समझ में आता है, परन्तु तुम ऐसा क्या करने वाले हो कि पुलिस से दूर रहोगे। गैंग तुम नहीं बना रहे। अण्डरवर्ल्ड से झगड़ा नहीं करोगे तो क्या शराफत से जिन्दगी बिताने की सोच रहे हो।"

“मुझे पैसा इकट्ठा करना होगा।”

"दो नम्बर के धंधे करोगे?"

"हां।"

"तब तो पुलिस जरूर तुम्हारे रास्ते में आयेगी।"

"बेशक आये। पर मैं कभी भी पुलिस से झगड़ा खड़ा नहीं करूंगा। रास्ता बदल लूंगा। पुलिस की ताकत का मुझे एहसास हो चुका है। पुलिस का मुकाबला नहीं किया जा सकता। अब पुलिस की वजह से ही मुझे सब कुछ खाक करना पड़ रहा है। पुलिस के पास हत्या करने का लायसेंस होता है। जैसे कि अब पुलिस मुझे देखते ही खत्म कर देने पर आमादा है।"

जगमोहन के चेहरे पर गम्भीरता थी।

"तो क्या काम करोगे?"

“सोचा नहीं। नई राह चुनना आसान भी तो नहीं है।" देवा ने सोच भरे स्वर में कहा।

“मुझे नहीं लगता कि तुम इस तरह काम कर पाओगे।"

"पहले प्लास्टिक सर्जरी करवाकर चेहरा ठीक करा लूं। तब लोग सुरेन्द्र पाल को भूलने लगेंगे। पुलिस भी बाद में सोचने लगेगी कि सुरेन्द्र पाल मर खप गया होगा, जबकि मैं नये चेहरे के साथ, कोई नया खेल शुरू करूंगा। इस दुनिया में सबसे बड़ा अभिशाप है पैसा ना होना, हाथ तंग रहना। मैं किसी रास्ते से पैसा इकट्ठा करूंगा। इतना कि खुद को सुरक्षित महसूस करने लगूं और आराम से जिन्दगी बिता सकूं।" देवा ने शांत स्वर में कहा।

"मुझे तो ऐसा कोई काम दिखता नहीं।" जगमोहन ने सोच भरे स्वर में कहा-- "तुम इतने खतरनाक गैंगस्टर हो, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि तुम दूसरे किसी काम में खुद को कैसे सैट कर पाओगे।"

"चेहरा ठीक करा लूं ताकि मुझे कोई पहचान ना सके। पुलिस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जायेगा।"

“मेरे ख्याल में तुम्हें मुम्बई से निकल जाना चाहिये।" जगमोहन ने कहा।

"कभी नहीं।" देवा ने दृढ़ स्वर में कहा--- "मुम्बई मेरी जन्मस्थली है। मुम्बई से दूर जाने की तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता। मुझे सिर्फ पुलिस का डर है, चेहरे पर निशान गायब होते ही, मैं पुलिस के लिए अन्जान बन जाऊंगा। तब सुरेन्द्र पाल के तौर पर मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा और मैं सुरक्षित होकर किसी नये काम की तरफ ध्यान दे पाऊंगा।"

"ये तुम सोचो। तुम्हारी समस्या है ये। मुझे ये बातें समझ नहीं आ रही।" जगमोहन बोला।

"तुम मेरे हैडक्वार्टर जाकर अन्ना से मिलो और अजीत सावले से बात करो। बेहतर होगा कि अजीत सावले को हैडक्वार्टर से बाहर ले जाकर बात करना और इस बात का ध्यान रखना कि वापसी पर कोई तुम्हारा पीछा ना करे।"

जगमोहन तैयार होकर चला गया।

देवा ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया था। उसके बाद खुद ही गैस पर चाय बनाई और कमरे में पड़ी एकमात्र कुर्सी पर बैठकर सोच भरे ढंग से घूंट भरने लगा। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि अपने भविष्य को कैसे सुधारना है। कुछ इस तरह जिन्दगी बितानी है कि खामखाह के खतरे ना हों। खुद को सुरक्षित महसूस करें और पैसा इकट्ठा किया जा सके। इन हालातों में तो देवा बाहर जाने की सोच ही नहीं सकता था। पुलिस शिकारी कुत्तों की तरह उसकी तलाश कर रही थी। जे०सी०पी० कैलाश पंवार की मौत पुलिस नहीं भूल सकती थी। उस रात और पुलिसवाले भी मरे थे। उसके गैंग को किसी भी हाल में नहीं पनपने देगी। देवा मन ही मन इस बात का हिसाब लगाने लगा कि उसके पास कितनी दौलत जमा है। बहुत सोचने पर इसी नतीजे पर पहुंच सका कि पचास साठ करोड़ तक नकद रखा है बाकी सोना और हीरे-जेवरात हैं।

शाम को जगमोहन ने वापस आकर बताया।

“तुम्हारी खबर पाकर अन्ना और अजीत सावले खुश हुए।"

“तुम्हारा पीछा तो नहीं किया किसी ने?" देवा ने पूछा।

“मैं सतर्क था।" जगमोहन बोला--- “मैंने उन्हें बताया कि तुम गैंग खत्म कर रहे हो और कमाया पैसा अपने साथियों में बांटने का इरादा है तुम्हारा। सुनकर उन्होंने राहत महसूस की कि तुम उन्हें पैसा देने वाले हो ! अजीत सावले का कहना है कि पुलिस उन पर सख्ती से दबाव डाल रही है कि वो बिखर जाये। यहां से चले जायें। वो जगह खाली कर दें। पुलिस ने उन्हें पन्द्रह दिन का वक्त दिया है। पन्द्रह में से दस दिन बीत चुके हैं।"

“पाचं दिन बाकी के, बहुत लम्बे होते हैं।" देवा ने सोच भरे स्वर में कहा--- “सब काम तुम्हें करना होगा।”

"क्या काम ?"

“मेरे पास पचास से साठ करोड़ नकद रुपया है। मैं तुम्हें बताऊंगा कि कहां-कहां रखा है और चाबियां किस-किस के पास रखी हैं। तुमने उसमें से एक करोड़ मेरे लिए रखना है कि मैं अपना चेहरा ठीक करा सकूं और बचा पैसा मेरे तब तक के खर्चे के काम आयेगा, जब तक कि मैं अपने काम करने की राह नहीं चुनता। दस करोड़ तुम मेरी मां को दे आओगे। उसे सिर्फ इतना ही कहोगे कि देवा ने भेजा है। इससे ज्यादा कुछ नहीं बताओगे कि देवा जिन्दा है या मर गया या कहां पर है। तुम मां के पास पैसा छोड़कर खड़े पांव वापस आ जाओगे ।”

जगमोहन ने सिर हिलाया।

“सोना और कुछ हीरे-जवाहरात का बैग मां को देना कि ये नेहा के लिये है।” देवा गम्भीर था--- "बाकी का सारा पैसा और हीरे-जवाहरात तुम सावले और अन्ना को दोगे और अपनी मौजूदगी में देखोगे कि सारी दौलत उसने मेरे आदमियों में बांट दी कि नहीं। परन्तु तुम सावधान रहना। तुम्हें तगड़ा खतरा हो सकता है। अजीत सावले और अन्ना सोच सकते हैं कि तुम्हें खत्म करके वो सारा पैसा आपस में बांट ले। ये धंधा ही ऐसा है। यहां कुछ भी हो सकता है।"

“ऐसे वक्त पर मैं सतर्क रहूंगा।" जगमोहन बोला।

देवा ने रिवॉल्वर निकालकर जगमोहन को दी।

“इसे अपने पास रखो, तुम्हें जरूरत पड़ सकती है।"

जगमोहन ने रिवॉल्वर रख ली।

"सबसे पहले कैसे काम शुरू करोगे?" देवा ने पूछा।

"मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि सारा पैसा मत बांटो। अपने लिए भी रखो।" जगमोहन ने कहा।

"वो पैसा मेरे गैंग के लोगों की मेहनत से ही इकट्टा हुआ है।" देवा बोला।

“उनसे ज्यादा मेहनत तुमने की...।"

"तुम्हें कुछ पैसा चाहिये तो रख सकते हो।” देवा कह उठा।

“तुम्हारे पैसे पर मेरा हक नहीं है। क्योंकि उसे कमाने में मेरा हाथ नहीं रहा। मैं नहीं लूंगा।” जगमोहन बोला।

“तुम्हारी मर्जी। तो काम कैसे शुरू करोगे। पैसे को कहां-कहां और कैसे...।"

“पहले एक करोड़ तुम्हें लाकर दूंगा। फिर दस करोड़ तुम्हारी मां को और तुम्हारी बहन नेहा के लिए बैग में सोना और हीरे-जवाहरात इतने डालूंगा कि जिन्दगी भर के लिए, उसे कमी ना रहे। वो बैग भी तुम्हारी मां को, नेहा का कहकर दूंगा।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा--- “मेरी बात को ठीक करना चाहते हो तो, बता दो।”

“तुम ठीक चल रहे हो। ऐसे ही करना। मैं तुम्हें बताता हूं कि पैसा और हीरे-जवाहरात कहां पर हैं। चाबियां किसके पास से मिलेगी और उसे कोर्ड वर्ड में क्या कहना है।" देवा, जगमोहन को समझाने लगा।

जगमोहन दस मिनट में सब कुछ समझ गया।

"मैं तुम पर भरोसा कर रहूं जगमोहन ।” देवा ने शांत स्वर में कहा।

जगमोहन मुस्कुराया ।

"तुम्हारे पास पूरा मौका और वक्त होगा कि मेरी सारी दौलत को लेकर खिसक सको ।”

"ये तो तुम्हें कल का वक्त बतायेगा कि मैं वापस लौटता हूं या नहीं।" जगमोहन कह उठा।

देवा ने कुछ नहीं कहा।

"अब मुझे रात का खाना तैयार करना है।" जगमोहन बोला--- "तुमसे एक बात पूछें, बुरा तो नहीं मानोगे?"

"पूछो।"

"मैं मारियो के बारे में पूछना चाहता हूँ जिसके साथ नेहा ने शादी की थी।" जगमोहन बोला।

"क्या पूछना चाहते हो?” देवा की निगाह, जगमोहन के चेहरे पर टिक गई।

"तुमने मारियो की हत्या इसलिये की कि उसने तुम्हारी बहन से शादी कर ली थी।"

"मैं जानता ही नहीं था कि मारियो और नेहा ने शादी कर ली है । ये ही बात मारियो की हत्या की वजह बनी। मैंने सोचा कि मारियो मेरी बहन को खराब कर रहा है। काश मुझे मालूम होता कि वो दोनों पति-पत्नी है।” देवा के चेहरे पर अफसोस के भाव आ गये--- “मारियो की मौत का जितना मुझे दुःख हुआ, उससे ज्यादा इस बात की खुशी हुई कि मां ने---नेहा ने---शंकर ने मुझे पहचाना नहीं। मिलिट्री में युद्ध के दौरान, चेहरे पर लगे घाव ने मेरा चेहरा इस हद तक बदल दिया कि मेरे अपने ही मुझे नहीं पहचान सके।”

जगमोहन गम्भीर दिखा। बोला।

"तुम चेहरा बदलवा कर अपनी मां-बहन और शंकर से मिल सकते...।"

“कभी नहीं मिलूंगा।” देवा के होठों से निकला।

“क्यों?"

“अनजाने में मैंने अपनी मां को, नेहा को बहुत तकलीफ दी। मारियो मेरे हाथों से मरा। मैं जब भी नेहा को देखूंगा तो मुझे तकलीफ होगी। मैं उस तकलीफ से दूर रहना चाहता हूं। जो करोड़ों की दौलत तुम मां और नेहा तक पहुंचाओगे उससे सब ठीक हो जायेगा। नेहा अपनी जिन्दगी फिर से संवार सकेगी। वक्त के साथ मारियो नाम का जख्म भूल जायेगी। मैं अपनी राह में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पलट कर वापस नहीं जा सकता। जाना भी नहीं चाहता। जाने क्यों महसूस होता है कि मेरा उनका इतना ही साथ था। मैं उनके पास जन्म लेने और वहीं पर बड़ा होने ही आया था। मेरा सफर उन लोगों से जुड़ा है। मेरे रास्ते अलग हैं। मुझे अपनी जिन्दगी जीनी हैं। अब।" देवा ने सपाट स्वर में कहा।

"मैं तुमसे सिर्फ मारियो के बारे में जानना चाहता था कि उसे तुमने क्यों मारा। वो जान लिया।" जगमोहन बोला--- "अपने परिवार के बारे में तुम बेहतर जानते हो कि उनके साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता है। वो मैं नहीं जानना चाहता।" कहने के साथ ही जगमोहन उठा और खाना बनाने की तैयारी में लग गया।

देवा सोच में डूबा रहा।

घंटे भर में जगमोहन ने खाना तैयार कर लिया। इस दौरान उनमें कोई बात नहीं हुई थी।

“खाना तैयार है, जब भी चाहो बता देना।"

“तुम मेरे बहुत काम आ रहे हो।" देवा ने जगमोहन को देखा--- "एक करोड़ तुम रख लेना।"

"मैंने एक करोड़ का कोई काम नहीं किया। इस वक्त मैं तुम्हारे लिए जो भी कर रहा हूं, इसलिये कि तुमने मेरी मां के ऑप्रेशन के लिए मुझे लाख रुपया दिया था और कभी वापस नहीं मांगा।”

देवा ने कुछ नहीं कहा। जगमोहन को सोच भरी निगाहों से देखता रहा।

अगले दिन जगमोहन सुबह आठ बजे ही तैयार होकर निकल गया। जाते वक्त देवा को नींद से उठा गया था और चाय का प्याला उसे थमा दिया था। बता गया था कि आज वो उसी का नोटों वाला काम करने जा रहा है। देवा दिन-भर घर में रहा और जगमोहन के आने का इन्तजार करता रहा। शाम के पांच बजने लगे तो जगमोहन की वापसी को लेकर देवा कुछ चिन्तित हुआ कि अब तक तो उसे आ जाना चाहिये। वक्त और आगे सरका, छः-सात बज गये।

अब देवा जरूरत से ज्यादा बेचैन हो गया। मन में अंदेशे उठने लगे। बुरे ख्यालों ने सिर पर डेरा जमा लिया। जगमोहन ने कहा था कि पहले वो एक करोड़ यहां पर रखने आयेगा। उसके बाद दस करोड़ उसकी मां को और बहन नेहा के लिए हीरे-जवाहरात बैग में भरकर ले जायेगा। इस तरह से जगमोहन को कब का उसके पास फेरा लगा जाना चाहिये था। परन्तु सुबह से गये जगमोहन की अब तक कोई खबर नहीं थी। ये ही ख्याल मन में आया कि कहीं जगमोहन उसके साथ खेल तो नहीं खेल गया। उसकी सारी दौलत देखकर वो बे-ईमान हो गया हो। देवा के होंठ भिंच गये। उसे खतरा दिखने लगा। अगर जगमोहन ने ऐसा कुछ कर दिया है तो जरूर उसने पुलिस को उसके यहां होने की खबर भी दे दी होगी कि ताकि पुलिस उसे हमेशा के लिए खत्म कर दे और वो उस दौलत से मजे ले सके और निश्चिंत होकर जी सके। कहीं बाहर पुलिस का घेरा तो नहीं पड़ गया?

इस विचार के साथ उसका हाथ जेब की तरफ गया, परन्तु रिवॉल्वर तो उसने खुद ही जगमोहन को दे दी थी। जगमोहन ने पुलिस को ये भी बता दिया होगा कि उसके पास कोई हथियार नहीं है।

देवा जल्दी से उठा और दरवाजा थोड़ा-सा खोलकर सावधानी से बाहर झांकने लगा। गली में लोग आ-जा रहे थे। वो खड़ा बाहर देखता रहा। पन्द्रह मिनट बीत गये। बाहर अंधेरा छाना शुरू हो चुका था। कमरे में अंधेरा फैल गया था। इन हालातों में देवा ने कमरे की लाइट जलाना ठीक नहीं समझा। कुछ ही देर में बाहर पूरा अंधेरा फैल गया। अंधेरे में यहां से निकल सकता था। बाहर शायद ही उसे कोई पहचाने। परन्तु पुलिस की नज़रें इधर टिकी हुई है तो वो उसी पल उसे ढेर कर देंगे। जो भी हो, यहां रहना खतरनाक था। देवा का चेहरा कठोर हो चुका था। सबसे ज्यादा तकलीफ तो उसे ये हो रही थी कि उसके पास हथियार नहीं था कि अगर कुछ हो तो अपना बचाव कर सके। तभी मन में ये भी ख्याल आया कि क्या पता जगमोहन कहीं फंस गया हो। वो उसके बारे में गलत सोच रहा हो, परन्तु ये ख्याल ज्यादा देर टिका नहीं (पाठकों, आप इस वक्त देवराज चौहान की तब की जिन्दगी को जान रहे है, जब वो 18 की उम्र से 24 की उम्र का था और तब मोबाइल फोन इस्तेमाल में नहीं होते थे) यहां से निकल जाना ही ठीक था। देवा को लगा कि जगमोहन से सम्पर्क बनाकर उसने नई मुसीबत मोल ले ली है। ये वक्त किसी पर भरोसा करने का नहीं है। भरोसा भी ऐसा, जिसके साथ भारी दौलत जुड़ी हो। जगमोहन तो अब तक मुम्बई से काफी दूर निकल चुका होगा।

अब तक बाहर पूरी तरह स्याह अंधेरा छा गया था। कमरे के भीतर भी घुप्प अंधेरा था। देवा ने दरवाजे का एक पल्ला खोला और फुर्ती से बाहर निकला कि ठिठक गया। कदम जड़ हो गये। दरवाजे के बाहर सिर्फ दो कदम ही उठा पाया था। तभी सामने, चंद कदमों के फासले पर जगमोहन दिखा, जो कि सूटकेस उठाये पैदल ही आ रहा था और देखते ही देखते उसके करीब आ पहुंचा था

देवा के सारे अंदेशे भांप की तरह गायब हो गये।

“बाहर क्यों निकले ? ” जगमोहन आंखें सिकोड़कर बोला--- “भीतर चलो।"

देवा ने गहरी सांस ली और होंठ भींच कर कमरे में आ गया।

जगमोहन भी सूटकेस के साथ भीतर आया। दरवाजा बंद किया और लाइट जलाकर देवा को देखा। देवा उसे ही देख रहा था।

"मैं समझ रहा हूं कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा था।" जगमोहन गम्भीर स्वर में बोला।

"तुम्हारी सुबह से कोई खबर नहीं थी। तुमने एक करोड़ यहां छोड़ना था।” देवा ने तनाव भरे स्वर में कहा ।

“लेकिन मैंने प्रोग्राम बदल दिया। दस करोड़ के नोटों को गिनकर सूटकेसों में भरना जल्दी का काम नहीं था। जब ये काम पूरा कर लिया। दस करोड़ के चार सूटकेस बन गये। एक हीरे-जवाहरात का बैग और एक ये सूटकेस। तब मैंने सोचा कि क्यों ना सब एक साथ लेकर चलूं और तुम्हारी मां-बहन को सामान देते हुए यहां पहुंचूं। इन्हीं कामों में देर हो गई।"

जवाब में देवा सिर्फ मुस्कुराकर रह गया।

लेकिन जगमोहन गम्भीर था। वो बोला।

“और तुम क्या सोच रहे थे देवा ?"

“तुम जानते ही हो कि मैं क्या सोच सकता था इन हालातों में।" देवा ने कहा।

"यही कि मैं तुम्हारी सारी दौलत लेकर खिसक गया।"

“और पुलिस को तुमने मेरे यहां होने की खबर भी कर दी होगी।" देवा ने गहरी सांस ली।

"तुमने अभी जगमोहन को ठीक से पहचाना नहीं।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा--- "मुझे पैसे की जरूरत जरूर है, परन्तु इस हद तक कमीना नहीं कि तुम्हारा पैसा लेकर भाग जाऊं।"

"मैं आज तक जिस तरह काम करता रहा हूं वहां ये ही सब होता था।” देवा बोला।

“तुम्हारी मां और बहन नेहा को दस करोड़ और हीरे-जवाहरातों से भरा बैग दे आया हूं। उन्हें कहा कि देवा ने भेजा है, तुम्हारा नाम सुनकर वो खुश हो गई, तुम्हारे बारे में पूछने लगे, परन्तु मैं उसी पल वहां से निकल गया। मेरे शब्दों से उन्हें ये तो पता चला गया कि तुम जिन्दा हो ।”

देवा सिर्फ सिर हिलाकर रह गया ।

“और इस सूटकेस में एक करोड़ है, जो कि तुमने अपने लिए मांगा था।”

“इन सब बातों से ज्यादा खुशी मुझे इस बात की है कि तुम मेरे विश्वास पर खरे उतरे।” देवा के होठों पर मुस्कान फैल गई--- “मैंने आज तक बे-ईमान ही देखें हैं। ईमानदार पहली बार देखा है।”

जगमोहन कुछ पल देवा को देखता रहा फिर मुस्कुराकर रह गया।

“बाकी जो भी पैसा पड़ा है वो कल मेरे गैंग साथियों में बांट आना। सावधान रहना। अन्ना और अजीत सावले गड़बड़ भी कर सकते है तुम्हारे साथ । शायद सब कुछ ठीक भी रहे। तुम अपनी रिवॉल्वर तैयार रखना। इस काम के बाद मुझे लगेगा जैसे मैंने अण्डरवर्ल्ड के कुंए से मुक्ति पा ली। सब कुछ पीछे छोड़ आया हूं।"