शहर के सबसे बड़े और खतरनाक गैंग के लीडर पर कत्ल का मुकदमा कायम होना और उसके खिलाफ अदालती कार्रवाई शुरू होना जैसे साल की सबसे बड़ी खबर थीं। जो सबसे सनसनीखेज खबर भी थी।
देवा के बारे में अब एक आम ख्याल बन चुका था कि वो कानून की पहुंच से बहुत ऊपर पहुंच चुका था। वो इतना ताकतवर हो चुका था कि अब कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। अब, जबकि वो कानून की पकड़ में आ चुका था और उस पर कत्ल के इल्जाम में बाकायदा केस भी चल रहा था, लोगों को हैरानी हो रही थी।
उन दिनों चारों तरफ शांति थी और सनसनीखेज खबरों का मीडिया में अकाल-सा पड़ा हुआ था। इसलिये मीडिया वाले उस खबर पर खास ध्यान दे रहे थे।
देवा के लिये भी मुकदमे की कार्रवाई का हर दिन किसी मुसीबत मे कम नहीं था। उसे सजा का खौफ नहीं था, अपनी असली शिनाख्त जाहिर हो जाने का डर था। सरकारी वकील का कर्त्तव्य पुलिस हैडक्वार्टर का वकील खुद महेश निभा रहा था। जिला अटार्नी का एक असिस्टेंट उसका सहयोगी था।
दूसरी तरफ देवा ने अपने बचाव के लिये शहर के दो बेहतरीन वकीलों की सेवाएं प्राप्त की थीं। उनमें से भी एक जिला अटार्नी का असिस्टेंट रह चुका था। वो दोनों देवा से एडवांस में इतनी फीस वसूल कर चुके थे कि तीन-चार साल तक शाही ठाठ से जिन्दगी गुजार सकते थे ।
नेहा, निःसन्देह सरकार की अहम गवाह थी, लेकिन यह सिर्फ इसलिये संभव हुआ था, क्योंकि देवा ने उसे प्राण दान दे रखा था। वर्ना वो गवाही देने के लिये अदालत तक किसी हालत में भी न पहुंचने दी जाती। उसके साथियों ने नेहा का "पत्ता साफ" करने के लिये कई सुझाव देवा के सामने पेश किये थे।
जाहिर है, देवा ने इन सब सुझावों को सख्ती से रद्द कर दिया था, जबकि उसके आदमियों के लिये नेहा को ठिकाने लगाना चुटकी बजाने से भी आसान काम था। उन सभी सुझावों के रद्द हो जाने पर जहां उसके साथी हैरान हुए थे, वहीं देवा के वकीलों को भी यह बात कतई पसन्द नहीं आई थी। वो देवा को बचाने के लिये हर हथकण्डा इस्तेमाल करने के हक में थे। सबसे पहले वो अहम गवाह को ही रास्ते से हटवाना चाहते थे ।
देवा ने अलबत्ता एक काम जरूर किया था, वो यह कि उसने नेहा के पास बीस लाख रुपये की ऑफर भेजी थी कि वो बीस लाख लेकर तब तक शहर से गायब हो जाए, जब तक कि देवा कोर्ट से बरी न हो जाए। लेकिन नेहा ने न सिर्फ उसकी यह पेशकश ठुकरा दी थी, बल्कि उसने मीडिया वालों को भी यह बात बता दी थी। मीडिया वालों को एक और सनसनीखेज खबर बनाने का मैटर हाथ लग गया था।
जिस दिन कोर्ट में नेहा की गवाही थी, उसके सब घरवाले वहां आए हुए थे। वो सब अच्छे हुलिये में थे और उनके चेहरों पर खुशहाली की चमक थी। देवा को यह देखकर खुशी तो मिली थी, लेकिन साथ ही वो परेशान भी था कि कहीं उसकी मां या कोई भाई-बहन उसे पहचान न ले। उसने मुल्जिमों वाले कटघरे में से अपने चेहरे का जख्म के निशान वाला हिस्सा ही उनकी तरफ किये रखा था। इस तरफ से उसका चेहरा बिल्कुल अलग नजर आता था। उससे कनखियों से देखा, उसकी मां के चेहरे पर उसके लिये नफरत के भाव थे। यह देखकर उसका दिल खुश हो गया।
नेहा ने गर्दन ऊंची करके और देवा को नफरत से घूरते हुए अपना बयान पूरा किया था। सरकारी वकीलों ने जान-बूझकर मारियो का चरित्र बहस का विषय नहीं बनने दिया था कि वो किस किस्म का आदमी था? देवा ने अपने वकीलों को भी मारियो के चरित्र के बखिये उधेड़ने से रोक दिया था। उसके दिमाग में यही था कि आखिर वो उसका बहनोई और उसकी बहन का दिवंगत पति था। नेहा का बयान खत्म हुआ तो देवा के वकीलों में से एक ने उस पर जिरह शुरू कर दी थी।
"जिस वक्त मिस्टर मारियो ने दस्तक सुनकर दरवाजा खोला था, क्या वो अपनी नजर में था हर पल ? उस वक्त तक, जबकि वो गोलियां खाकर फर्श पर गिरे थे?"
"जी हां।"
"आपने यह भी देखा था कि उन्होंने गन निकालने के लिये पतलून की जिप पॉकेट की तरफ हाथ बढ़ाया था?" वकील ने पूछा।
"हां।"
“आपने फायरों के धमाके सुनने से पहले उन्हें जेब की तरफ हाथ बढ़ाते देखा था न ?"
“हां।” नेहा ने बिना एक पल भी हिचके जवाब दिया था।
“इसका मतलब, आपने सिर्फ फायरों के धमाके सुने थे, आपने सचमुच मेरे मुवक्किल देवा को मारियो पर गोलियां चलाकर उसे मारते हुए नहीं देखा था।"
"नहीं... नहीं...।" नेहा ने कुछ कहना चाहा था, लेकिन वकील ने उसकी बात काट दी।
"बस... मुझे इतना ही पूछना था।” वो मुस्कराता हुआ वापस जाकर अपनी सीट पर बैठ गया था।
सरकारी वकीलों की बैंचों की तरफ भनभनाहट-सी उभरने लगी थी। शायद वो लोग हैरान थे कि वकील साहब ने इतनी थोड़ी-सी जिरह क्यों की? उन्हें अहसास हो गया था कि वकील साहब ने नेहा के बयान में कोई प्वाईंट पकड़ लिया है। जो कि आगे केस में सेंध लगा सकता है ।
खुद नेहा को भी अहसास हो गया था कि उससे कोई गलती हो गई है। वो कुछ और भी कहना चाहती थी, लेकिन अदालत के कर्मचारी ने उसे गवाहों के कटघरे से बाहर निकाल लिया।
अदालत में करीना भी मौजूद थी। पुलिस को यह तो जानकारी थी कि अण्डरवर्ल्ड में दो-तीन लड़कियां गनगर्ल का काम करती हैं, लेकिन वो उनमें से किसी को भी शक्ल से नहीं पहचानते थे। इस वक्त भी करीना अदालत में पुलिस वालों के सामने मौजूद थी, लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि जिस गनगर्ल के सबसे ज्यादा किस्से सुने जाते थे, वो यही है।
देवा को यह बात बड़ी अजीब लग रही थी कि करीना की आंखों में उसके लिये अजनबीपन था। उसकी हरकतों से एक पल के लिये भी ऐसा नहीं लगा था कि वो देवा से जरा-सी भी जान-पहचान रखती है ।
फिर उसे याद आया कि करीना तो उसके निर्देश का पालन ही कर रही थी। उसने करीना से कहा था कि उसके बारे में लोगों को जितनी ज्यादा जानकारी होगी उतनी ही ज्यादा उसकी कमजोरियां लोगों के हाथ लगेंगी। इसलिये शायद वो सावधानी बरत रही थी।
अदालत में देवा का भाई शंकर चौहान भी मौजूद था और ऐसा लगता था जैसे वो इस केस में खास दिलचस्पी ले रहा हो। हालांकि केस की तफ्तीश या पैरवी उसके जिम्मे नहीं थी।
देवा ने देखा कि वो पहले के मुकाबले बहुत मोटा हो गया था, उसका चेहरा सुर्ख-सुर्ख और फूला-फूला दिखाई दे रहा था। देवा को मालूम था कि वो खूब जमकर शराब पीता था और अय्याशी का कोई मौका नहीं छोड़ता था। इन बातों के प्रभाव उसके चेहरे पर नजर आने शुरू हो गए थे।
केस की सुनवाई के आखिरी दिन देवा ने अपने भाई शंकर को करीना के साथ दर्शकों की पहली कतार में बैठे देखा था। अदालती कार्रवाई के दौरान दोनों एक दूसरे से बराबर फुसफुसा कर बातें करते रहे थे। कई बार एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कराए थे।
ऐसा लगता था कि उन दोनों में अच्छी पहचान थी। देवा का दिमाग यह देखकर उतावला हो उठा था। उसने बड़ी मुश्किल से उन दोनों की तरफ से ध्यान हटाकर अदालती कार्रवाई की तरफ लगाया था। उसे अन्दाजा था कि इस फास्ट ट्रेक कोर्ट में अब फैसले का वक्त करीब था। केस की सुनवाई के लिये विशेष रूप से ज्यूरी का गठन किया था, हालांकि ज्यूरी का प्रचलन अब समाप्त हो चुका था।
महेश और उसका असिस्टेंट ज्यूरी के सामने तरह-तरह की दलीलें देकर उन्हें कायल करने की कोशिशें कर रहे थे कि सुरेन्द्र पाल का वजूद समाज के लिये किसी पिशाच से कम नहीं था और उसे कत्ल के जुर्म में फांसी की सजा देकर समाज को उससे बचा लेना बहुत जरूरी था।
उनकी बातें सुनकर दवा के बदन में जैसे चिंगारियां दौड़ रही थीं। उसका दिल चाह रहा था कि बढ़कर उनकी गर्दन मरोड़ दे। ये वो लोग थे जो नियमित रूप से उससे भत्ते और हफ्ते के रूप में हर महीने मोटी रकमें वसूल करते आ रहे थे। लेकिन वो इस वक्त ऐसे बातें कर रहे थे जैसे उनसे बड़ा पवित्रात्मा वाला दुनिया में कोई दूसरा आदमी नहीं था और शहर में पाई जाने वाली सारी खराबियों की जड़ देवा ही था। उनकी बातें सुनकर देवा का गुस्से के मारे बुरा हाल था।
फिर जब उसने अपने वकीलों को इस्तगासा की दलीलों का जवाब देने और उनके इल्जामों की बखिया उधेड़ने के लिये खड़े होते देखा, तो देवा का गुस्सा कम हो गया। उनके कुछ प्वॉइंट सुनकर उनके होंठों पर मुस्कराहट ले आये।
वो बहुत अक्लमंदी से सारे मामले को लेकर चले थे और उन्होंने काफी हद तक अभियोजन पक्ष के आरोपों को उपहासजनक साबित कर दिया था। उनका कहना था कि अगर केवल अनुमानों के आधार पर ही देवा को सजा दी गई, तो यह बहुत बड़ा अन्याय होगा। अदालत का इस किस्म का कोई भी फैसला कानून की हत्या करने के बराबर होगा और राज्य के कानून के रिकॉर्ड पर एक बदसूरत दाग लग जाएगा।
वकीलों की दलीलें बहुत ही बढ़िया और मार्मिक थीं, लेकिन ज्यूरी उनसे ज्यादा प्रभावित नहीं हुई थी। ज्यूरी के सदस्य दरअसल देवा के उस दस बेहतरी बदमाश निशानेबाजों से बहुत "प्रभावित" थे, जो केस की सुनवाई के पहले दिन से लेकर दर्शकों की पहली लाईन में आकर बैठ जाया करते थे। वो एक नम्बर के कमीने-लुच्चे और बदतमीज थे। मगर वो बेहतरीन कपड़े पहने होते थे। वो बस बैठे ठण्डी, सख्त और क्रूर नजरों से ज्यूरी मेम्बरों को घूरते रहते थे। उनकी आंखों में एक खामोश सन्देश होता था।
ज्यूरी के मेम्बर इतने बेवकूफ नहीं थे कि उन आंखों के उस खामोश “सन्देश" को न पढ़ पाते। उनकी आंखें कहती थीं कि "अगर हमारे बॉस को कुछ हुआ, तो तुम्हारी जानों की भी कोई गारण्टी नहीं होगी। फैसला जरा सोच-समझकर सुनाना।”
जाहिर है कि हर इंसान की तरह ज्यूरी मेम्बरों को भी जान प्यारी थी। जज साहब को पचास लाख रुपये सिर्फ इस काम के दिये गये थे कि वो ज्यूरी मेम्बरों को इशारे देते रहे कि उनकी हमदर्दी देवा के साथ रहनी चाहिये। जज साहब ने नमक का हक उससे भी बढ़कर अदा किया था और ज्यूरी को साफ बता दिया था कि उनका झुकाव किस तरफ था।
इन तमाम "इंतजामों" का नतीजा वही निकला था, जो देवा चाहता था। आखिरकार नियमानुसार ज्यूरी के सदस्य एक अलग कमरे में गए और उन्होंने उस कमरे में सिर्फ चौदह मिनट गुजारे थे और वापस आकर अपना फैसला सुना दिया था। उनकी राय में देवा बेगुनाह था। जाहिर है इसके बाद जज साहब को इस फैसले पर मोहर लगाने से कौन रोक सकता था?
बरी होने के बाद देवा ने जाकर ज्यूरी मेम्बरों के साथ बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया था तो वो सब बेहद खुश नजर आने लगे थे। वो बाहर राहदारी में आया था तो उसके गार्डों ने उसे अपने घेरे में ले लिया था। देवा ने देखा कि उसका भाई शंकर एक तरफ दीवार से टेक लगाए खड़ा था। वो देवा को देखकर बोला---
"अगर आज बरी हो गए हो, तो यह मत समझना कि तुम्हें कभी सज़ा मिलेगी ही नहीं, कभी-न-कभी तुम्हारा हिसाब जरूर चुकता होगा।"
देवा ने ऐसे जाहिर किया जैसे उसने शंकर की बात सुनी ही न हो। न ही उसने शंकर की तरफ ध्यान ही दिया था। वो लापरवाही के साथ उसके सामने से गुजरता चला गया था।
सड़क पर बहुत से लोग जमा थे। इस मुकदमे की शोहरत की वजह से बहुत-से लोग हर रोज अदालत पहुंच जाते थे, उनमें से बहुत-से बाहर खड़े रहते थे। जब देवा अपनी बुलेटप्रूफ कार की तरफ बढ़ रहा था तो वो लोग उसे इस तरह देख रहे थे, जैसे वो कोई बहुत बड़ा आदमी हो। उनकी आंखों में देवा के लिये नफरत की बजाय सम्मान के भाव नजर आ रहे थे।
फोटोग्राफरों और रिपोर्टरों की एक भीड़ भी इसी तरह उसकी प्रतीक्षक थी। जैसे प्रधानमंत्री सुपर स्टार्स और विदेशी राष्ट्र हितों के लिये प्रतीक्षक रहती थी। सारे के सारे बॉडीगार्ड लम्बे कद वाले थे। वैसे तो उनका काम देवा को दुश्मनों की गोलियों से बचाना था, लेकिन वो उसको फोटोग्राफरों के आक्रमणों से भी बचाते थे।
इस समय भी उन्होंने किसी फोटोग्राफर को देवा की तस्वीर खींचने का मौका नहीं दिया था। फिर भी गाड़ी में बैठने से पहले देवा रिपोर्टरों से बात करने के लिये एक मिनट को रुक गया। उसने कहा---
“मैं अपनी जीवनधारा बदलने वाला हूं। मेरे पास अब बहुत दौलत है। अब मुझे खामखा के चक्करों में पड़ने की जरूरत नहीं है। अफजल सुल्तान अक्लमंद था जो वक्त पर रिटायर हो गया था। अपने तमाम वर्तमान कारोबार छोड़कर प्रॉपर्टी के काम में आ रहा हूं। बस मेरे पास तुम लोगों के लिये इससे बड़ी खबर कोई नहीं है।" कहकर वो गाड़ी में बैठकर रवाना हो गया था ।
आधे घण्टे बाद वो अपने अपार्टमेंट में था। इन दिनों वो करीना के साथ जुहू इलाके के एक खूबसूरत अपार्टमेंट में रह रहा था। उसे देखकर हैरत हुई थी कि करीना ने उसका स्वागत बड़े ठण्डेपन से किया था।
"मैं बहुत थक गया हूं।” देवा ने कोट उतारते हुए कहा---वो वाकई बुरी तरह थकान महसूस कर रहा था। मुकदमा उसके लिये वास्तव में बड़ा तनावभरा और थकानभरा साबित हुआ था। फिर उसे करीना के ठण्डेपन का अहसास हुआ तो वो उसकी तरफ आकर्षित होकर बोला--- “क्या बात है...तुम कुछ रूठी-रूठी सी लग रही हो?" अपनी समस्त थकान के उपरांत भी देवा ने अपने स्वर की प्रफुल्लता बनाए रखने की कोशिश की थी।
"मुझे तुमसे एक जरूरी बात पूछनी है।" करीना ने संजीदा लहजे में कहा।
"कैसी बात?” देवा ने तीखी नजरों से उसकी तरफ देखा ।
“सच-सच बताओ। वो लड़की तुम्हारे लिये क्या महत्त्व रखती है ?" करीना की संजीदगी बरकरार थी।
“कौन-सी लड़की ?" देवा ने कुछ हैरत से पूछा था।
“वही... वही नेहा... जिसके लिये तुमने मारियो को मार डाला था।"
देवा को एक झटका-सा लगा था। कुछ सेकेण्ड्स के लिये तो वो गड़बड़ा गया था। उसे अपेक्षा नहीं थी कि करीना उससे इस तरह के सवाल करेगी। फिर उसे ख्याल आया कि इसमें करीना का कोई कसूर नहीं है। वो नेहा से उसके वास्तविक रिश्ते से उसी तरह अनजान थी, जिस तरह कि बाकी लोग थे।
"मेरी नजर में उसका कोई महत्त्व नहीं है।" वो संभलकर बोला।
"अगर तुम्हारी नजर में या तुम्हारी जिन्दगी में उसका कोई महत्त्व न होता तो उसकी वजह से मारियो को कत्ल न करते।" करीना ने व्यंग्य से कहा ।
“मैंने मारियो को उसकी वजह से कत्ल नहीं किया।" देवा गुस्सैल लहजे में बोला--- “मारियो को कत्ल करने की वजह कुछ और थी।"
"मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश न करो। मारियो तुम्हारा सबसे खास आदमी था। तुम उसे किसी मामूली बात पर कत्ल नहीं कर सकते थे। उसकी वजह वो लड़की ही थी।"
"तुम पागल तो नहीं हो गई हो? मैंने तो उससे पहले उस लड़की को देखा तक नहीं था ।” देवा के लहजे में कुछ तेजी आ गई थी--- “तुम खुद सोचो अगर मेरा उससे कोई सम्बन्ध होता तो क्या वो मेरे खिलाफ गवाही देती ?"
"कई बार वक्त और हालात के साथ-साथ औरत की भावनाएं भी बदल जाती हैं।" करीना जिद्द पर अड़ी हुई थी।
"सिर्फ औरत की बात न करो।" देवा एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला--- "कई बार मर्द की भी भावनाएं बदल जाती हैं। आज मर्द जिस औरत को पसन्द करता है, उसके साथ रहना चाहता है, जरूरी नहीं कि कल भी उसे पसन्द करे और उसके साथ ही रहना चाहे । कई बार औरत अपनी जिद्द अपने रवैये और अपनी बातों की वजह से मर्द के दिल से दूर हो जाती है।"
करीना फौरन देवा का मतलब समझ गई थी, लेकिन वो शांत होने के बजाय पहले से भी ज्यादा भड़ककर बोली थी---
“मुझे इस तरह की बातें सुनाने की जरूरत नहीं है। मुझे मालूम है तुम बहुत बड़े आदमी बन गए हो। लेकिन मुझे भी कोई ऐसी गिरी-पड़ी औरत न समझो। मुझे अब भी बहुत से चाहने वाले मिल जाएंगे और तुमसे अच्छे मिल जाएंगे।"
"और जितना पैसा मैं तुम पर खर्च करता हूं।" देवा बोला--- “उतने पैसे में मुझे भी तुमसे अच्छी दस लड़कियां मिल जाएंगी।"
"तो ढूंढ क्यों नहीं लेते उन्हें ?"
“जरूर ढूंढ लूंगा, क्योंकि अब मेरे पास वक्त है।" देवा ने कहा--- “और हां, अब जबकि यह जिक्र छिड़ ही गए हैं, तो यह बताओ कि तुम अदालत में उस पुलिस ऑफिसर से बड़ी घुल-मिलकर बातें क्यों कर रही थीं?"
“कौन पुलिस ऑफिसर ?” करीना ने उत्तेजित लहजे में पूछा।
"मैं शंकर चौहान की बात कर रहा हूं, जो उस लड़की नेहा चौहान का भाई है।"
“तुम तो उस पूरी फैमिली को अच्छी तरह जानते लगते हो ?" करीना के लहजे में तीखा कटाक्ष था।
"बकवास बंद करो।” देवा का लहजा अचानक क्रूर हो गया था। वो इस तरह करीना की तरफ बढ़ा था, जेसे उसे मार बैठेगा। लेकिन फिर वो ढीला पड़ गया था--- "क्योंकि मुझे अभी बहुत-से जरूरी काम करने हैं, इसलिये निजी लड़ाई-झगड़ों से दूर ही रहना चाहिये। अभी पता नहीं कब तक हमें साथ रहना है।"
"कौन-से जरूरी काम करने हैं, तुम्हें?" करीना का लहजा अब भी तीखा था।
"जयंत तांब्रे और वकील पुलिसिये महेश से हिसाब बराबर करना है। उन शैतान के बच्चों ने मुझे डबल-क्रॉस किया है और मुझे धोखा देने वाला इतनी आसानी से बचकर नहीं जा सकता। तांब्रे चाहता तो मुझे बचा सकता था। लेकिन इसके बजाय वो मुझे गिरफ्तार करने आ गया था। उसने मुझे हथकड़ियां भी लगवाई। क्या मैं उसे इस काम के लिये हर महीने मोटी रकम देता था। ऐसा ही कुछ उस हरामी वकील महेश ने भी मेरे साथ किया। मैं उन दोनों को छोडूंगा नहीं। मैं उन तीनों से निपटूंगा। वो महेश का बॉस जो ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर बना फिरता है, उसे भी नहीं छोडूंगा। उन हरामखोरो को इतनी रकमें खिलाने का मुझे कोई फायदा नहीं हुआ।"
देवा का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। वो अपने-अपने गुस्से और शिकवे-शिकायतों को भूलकर इन बातों में उलझ गए थे। लेकिन दोनों के दिलों में दरार भी जोरदार पड़ गई थी, वो बन्द नहीं हुई थी।
वक्ती तौर पर करीना और देवा अपने शिकवे-शिकायतें भूल गए थे। लेकिन एक-दूसरे के लिये उनकी भावनाएं अब पहले जैसी नहीं रहीं थीं। देवा उन तीनों पुलिस वालों और वकील से इन्तकाम लेने की योजनाएं बनाता रहा था।
अगले दिन देवा अपने हैडक्वार्टर पहुंचा। उसके आदमियों ने उसे देखकर खुशी प्रकट की। लेकिन देवा ने महसूस किया कि इसमें कोई अलग बात भी थी। उसे कुछ उत्सुकता सी हो गई। लेकिन उसने किसी से भी कुछ भी पूछने से परहेज ही किया था।
जल्दी ही उसे "वो बात" मालूम भी हो गई। उसके आठ-दस आदमी एक प्रतिनिधि मण्डल की तरह उसके पास पहुंचे थे।
अजीत सावले नामक एक नौजवान अनौपचारिक रूप से उनका लीडर बना हुआ था।
कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद वो असल की तरफ आया था---
“वो... बॉस...खबर गर्म है कि आप सारे वर्तमान धन्धे छोड़कर प्रॉपर्टी के कारोबार की तरफ आकर्षित हो रहे हैं?"
"अभी मैंने सोचा है इस बारे में...कोई पक्का फैसला नहीं किया।” देवा ने जवाब दिया--- "बहरहाल, मेरे पास अब इतनी दौलत है कि मैं रिटायरमेंट का फैसला भी ले सकता हूं और प्रॉपर्टी डीलर का रियल स्टेट जैसा कोई कारोबार भी शुरू कर सकता हूं, जो रिटायरमेंट जैसी जिन्दगी में भी चलाया जा सकता है।”
“हां-हां। यह तो सब ठीक है। लेकिन आप शायद भूल रहे हैं कि आपके लिये यह दौलत जमा करना हम सबकी वजह से ही संभव हुआ है।" अजीत सावले बोला था--- "हम सब हर अच्छे और बुरे वक्त में आपके साथ रहे हैं और कभी आपका साथ नहीं छोड़ा।"
"मुझे सब मालूम है और मुझे इन बातों से इंकार नहीं है। लेकिन...तुम मुझे ये सब बातें क्यों याद दिला रहे हो ?” देवा ने कुछ आश्चर्य से पूछा था।
"क्योंकि आपके इरादों ने हमें चिंता में डाल दिया है। हमें हमारा भविष्य खतरे में नजर आने लगा है।" अजीत सावले ने जवाब दिया--- “अगर आपने हमें छोड़ दिया, गैंग की जिम्मेदारियों से हाथ खींच लिया, तो गैंग बिखर जाएगा। फिर हम सब क्या करेंगे? कहां जाएंगे? आप इस तरह हमें बीच रास्ते में छोड़कर नहीं जा सकते।"
अजीत बड़ी गंभीरता से बातें कर रहा था और बाकी लोग उसके समर्थन में सिर हिला रहे थे। देवा के ख्याल में उनका इस किस्म की बातें करना और इस किस्म का विषय छेड़ना अवज्ञा और उद्दण्डता की पहली निशानी था। उसके अन्दर एक उबाल सा उठने लगा। पहले उसने सोचा कि उन्हें डांटकर कमरे से भगा दे। लेकिन उसकी किसी अज्ञात इन्द्री ने उसे ऐसा करने से रोके रखा था।
उसे उन लोगों के रंग-ढंग में कुछ ज्यादा ही संजीदगी और फिक्रमंदी नजर आ रही थी। यह कोई अच्छी निशानी नहीं थी। देवा को महसूस हुआ कि इस मामले को सख्ती से हैण्डिल नहीं करना चाहिये। उसे यह भी अहसास हो रहा था कि गैंग को ज्यादा-से-ज्यादा ताकतवर बनाते वक्त खुद उसने एक भयानक और ताकतवर राक्षस का निर्माण कर डाला था, जो वक्त पड़ने पर उसी की गर्दन मरोड़ सकता था। वो चाहता भी तो उस प्रेत से छुटकारा नहीं पा सकता था। अगर इन लोगों को अपनी आमदनी खत्म होती नजर आती और भविष्य अन्धकारमय दिखाई देता, तो ये लोग उसे खत्म भी कर सकते थे।
"मैंने मीडिया के सामने जो कुछ कहा था, उसे ज्यादा अहमियत न दो।” देवा ने अपने लहजे में खुशी भरने की कोशिश करते हुए कहा--- "हम जैसे लोगों को डिप्लोमेसी के तहत न जाने कहां-कहां क्या-क्या कहना पड़ता है। सिर्फ दिखावे के लिये। वो बात मैंने पुलिसवालों को जरा गलतफहमी में डालने के लिये कही थी, क्या समझे?"
देवा की बातें सुनकर उसके आदमियों के चेहरे पर से तनाव खत्म हो गया था। उनके दिमागों से जैसे कोई बड़ा बोझ उतर गया था। देवा पहले से भी ज्यादा खुशदिली से बोला---"तुम लोग जाओ और पहले की तरह अपनी सरगर्मियां जारी रखो। किसी किस्म की फिक्र करने की जरूरत नहीं है। मैं कहीं नहीं जाने वाला ।"
उसके आदमी खुश होकर विदा हो गए थे। उसके बाद देवा ने अपनी प्रतिशोधी योजनाओं पर अमल करने में जरा भी देर नहीं की थी। उसने अपने कुछ आदमियों की ड्यूटी लगा दी थी कि वो ए०सी०पी० जयंत तांब्रे की निगरानी करें और उसे एक पल के लिये भी अपनी नजरों से ओझल न होने दें। उसके मामलों पर गहरी नजर रखें।
पांच दिन तक जयंत तांब्रे की दिन-रात निगरानी होती रही थी। फिर उन पांच दिनों की रिपोर्टों को सामने रखकर देवा ने योजना तैयार की थी।
एक रात वो उस शानदार बिल्डिंग के गेट पर पहुंचा, जहां उसका अपार्टमेंट था। असामान्य रूप से सिक्योरिटी गार्ड के पास रुक गया था। उसने बड़े प्यार से गार्ड का हाल-चाल पूछा था और उसे अपना कीमती सिगार भी पेश किया था। फिर चलते वक्त उसने गार्ड से टाईम भी पूछा था।
फिर वो लिफ्टमैन के पास भी रूका था जो एक अधेड़ आदमी था और रिटायर्ड, रौबदार फौजी था। देवा ने उससे भी दोस्ताना लहजे में बात की थी और उसे भी सिगार पेश किया था। लिफ्ट में सवार होने से पहले देवा ने उससे भी वक्त पूछा था और अपनी घड़ी की तरफ देखकर बोला था---
“मुझे शक है कि मेरी घड़ी कुछ गलत चल रही है।" लिफ्टमैन ने अपनी घड़ी में देखकर वक्त बताया तो देवा बोला था--- "इसका मतलब, मेरी घड़ी ठीक ही चल रही है, थैंक्यू ।"
उसका अपार्टमेंट तीसरी मंजिल पर था। जब लिफ्ट वापस नीचे जाने के लिये रवाना हो चुकी थी, तो देवा अपने अपार्टमेंट में जाने के बजाय राहदारी के दूसरे सिरे पर मौजूद दरवाजे की तरफ चल पड़ा था।
बिल्डिंग के पीछे फायर एस्केप की लोहे की तंग-सी सीढ़ियां बनी हुई थीं। जो बलखाती हुई हर फ्लोर के करीब से गुजर रही थीं देवा दरवाजा खोलकर उन सीढ़ियों पर पहुंच गया। खामोश कदमों से वी नीचे जा पहुंचा था। वहां एक काली गाड़ी उसकी प्रतीक्षक थी। वो फुर्ती से भीतर जा बैठा था। गाड़ी फौरन रवाना हो गई। वैसी ही एक गाड़ी उसकी गाड़ी के पीछे थी और एक गाड़ी आगे थी।
रात के घोर अन्धेरे में वो गाड़ियां पूर्वी साईड को एक गली में जा पहुंची। एक गाड़ी गली के एक कोने पर रुक गई और दूसरी कार दूसरे कोने पर, तीसरी कार बीच में ही रही। वो लाल ईंटों से बनी एक इमारत के सामने रुकी थी। इमारत दो मंजिला थी। उस कार में बैठे चारों आदमियों ने सिर नीचे कर लिये थे। कार के शीशे भी नीचे कर दिये गए थे। पहली नजर देखने से अब वो कार खाली नजर आती थी। देवा उसी कार में मौजूद था, उसके साथ तीन आदमी और थे, उनमें एक ड्राइवर था।
कुछ देर वो सभी निश्चिंत बैठे रहे। फिर उनमें से एक ने खिड़की में से सिर निकालकर पुलिसवालों जैसी व्हिसिल जोर से बजाई। रात को गश्त करने वाले कांस्टेबल इसी प्रकार की सीटी बजाया करते थे।
रात के सन्नाटे में उस सीटी की आवाज उभरते ही गली के एक सिरे पर फायरों के दो धमाके गूंजे थे। सीटी बजाने वाले आदमी ने दोबारा सिर कार में नीचे कर लिया था।
कुछ क्षण बाद ही सुर्ख ईंटों वाली इमारत का दरवाजा खुला था और एक भारी-भरकम आदमी नाइट ड्रेस में बाहर आया था, उसके हाथ में रिवॉल्वर था। वो यकीनन यह देखने बाहर निकला था कि बाहर क्या गड़बड़ थी? यह जयंत तांब्रे था।
उसने सामने खड़ी कार को देखा और शायद यही समझा कि कार खाली है। उसी बीच गली के दूसरे सिरे से भी दो फायरों के धमाके सुनाई दिये। तांब्रे हिचकिचाते हुए सावधानी से रिवॉल्वर इधर-उधर लहराते हुए उस तरफ दीवार के साथ-साथ बढ़ने लगा।
जब कार की तरफ उसकी पीठ हो गई, तो कार का दरवाजा बेआवाज धीरे से खुला था। देवा ने लाईट मशीनगन की नाल दरवाजे से निकाली और ट्रिगर दबा दिया था। गोलियों की गड़गड़ाहट के सहज तांब्रे बुरी तरह लड़खड़ाया था और फिर जमीन पर गिरता चला गया था।
तीन सेकेण्ड बाद वो औंधा पड़ा हुआ था। उसका मुंह एक गड्ढे के बिल्कुल किनारे पर था। कार तेजी से आगे बढ़ गई। दूसरी दोनों कारें भी चल पड़ी थीं
देवा जिस तरीके से खामोशी के साथ अपनी अपार्टमेंट बिल्डिंग से निकला था। उसी तरह वापस ऊपर पहुंच गया था और फुर्ती से कपड़े बदलकर अपने बैड पर जा बैठा था। उसे यकीन था कि उसे जाते हुए और वापस आते हुए किसी ने नहीं देखा था।
जयंत तांब्रे को रास्ते से हटाना देवा की बहुत बड़ी सफलता थी। वो बहुत देर तक यह सोचकर खुश होता रहा था कि उसने एक भ्रष्ट और तानाशाह किस्म के पुलिस ऑफिसर को उसके अंजाम तक पहुंचा दिया था।
मगर दूसरे दिन "इवनिंग न्यूज" की खबरें पढ़कर देवा को जरा फिक्र लग गई थी। तांब्रे जैसा भी था, बहरहाल पुलिस विभाग का एक सीनियर ऑफिसर था। उसकी मौत पर पुलिस विभाग की सख्त प्रतिक्रिया प्रकट हुई थी। पुलिस कमिश्नर ने खुद पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि मुजरिमों के हौसले बहुत बढ़ गए हैं और अब बहुत ज्यादा सख्ती से उनका सफाया करना जरूरी हो गया है। इस काम के लिये नौजवान पुलिस-ऑफिसरों को आगे लाया जाना बेहद जरूरी था।
इसलिये पुलिस कमिश्नर ने इंस्पैक्टर शंकर चौहान को प्रमोशन देकर उसे पूरे शहर का चीफ डिटेक्टिव बना दिया था। पुलिस विभाग में अब शंकर चौहान की हैसियत कमिश्नर के बाद सबसे ऊपर हो गई थी। उसके पास असीमित अधिकार थे और उसे अपराधी गिरोहों के साथ सख्ती से निपटने की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।
शंकर चौहान ने यह ओहदा संभालते ही तमाम कूटनीति और लाग-लपेट को ताक पर रखकर बयान दे दिया था कि उसके खयाल में ए०सी०पी० जयंत तांब्रे का कत्ल सुरेन्द्र पाल के सिवा और किसी की कार्रवाई नहीं हो सकती थी। उसने कहा था कि मौका पाते ही वो सुरेन्द्र पाल के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करने से कतई नहीं हिचकिचाएगा। अगर सुरेन्द्र पाल ने अपना आक्रामक रवैया जारी रखा और पुलिस फोर्स से टकराने की कोशिश की, तो मौत उसका मुकद्दर होगी।
देवा पहले तो यह पढ़कर मुस्करा पड़ा था। उसने सोचा था कि उसके भाई ने नए और बड़े ओहदे का रौब दिखाने के लिये खुद को बड़ा सख्त ऑफिसर जाहिर करने की कोशिश की है।
मगर फिर उसने गंभीरता से सोचा था कि अगर कभी ऐसा मौका आ गया कि जब दोनों भाई आमने-सामने होंगे। तो वो क्या करेगा? शंकर अगर कानून का बहुत बड़ा ठेकेदार बनकर उसके सामने आ गया, तो वो क्या करेगा? जाहिर है कि शंकर की निगाह में तो वो एक कानून तोड़ने वाला था ।
रात को जब देवा खाना खाने अपने ही ग्राउण्ड फ्लोर वाले रेस्टोरेंट में गया, तो खुद को बहुत हल्का-फुल्का महसूस कर रहा था। उसे इस वक्त शंकर पुलिस कमिश्नर या कैलाश पंवार की कोई परवाह नहीं थी।
एक वेट्रेस उससे ऑर्डर लेने आई। उसने ऑर्डर दे दिया और सोचने लगा। अब उसे जे०सी०पी० कैलाश पंवार और उसके अस्सिटेंट महेश से इन्तकाम लेना था। खाना खाते हुए भी वो इसी समस्या पर सोचता रहा था।
उसकी प्राथमिकता में पहले तो वकील महेश को ठिकाने लगाना था। उस शख्स पर उसे बहुत क्रोध और आक्रोश था।
अचानक फोन की घण्टी तेज आवाज में चीखने लगी थी। देवा ने रिसीवर उठाया था और भारी आवाज में "हैलो" कहने के बाद सुनने लगा था। उसकी आंखों में चमक उभर आई थी। दूसरी तरफ से उसे एक "महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट” प्राप्त हो रही थी। कुछ देर बाद उसने सिर्फ एक जोरदार हुंकार भरकर फोन बंद कर दिया था।
थोड़ी देर बाद ही वो अपने चार अतिविश्वसनीय आदमियों के साथ गाड़ी में बैठा उत्तरी इलाके की तरफ जा रहा था। तेज रफ्तार से उस इलाके में पहुंचने के बाद गाड़ी के ड्राइवर ने रफ्तार कम कर दी थी । शायद वो इस इलाके में किसी का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींचना चाहते थे। क्योंकि यह उनके दुश्मनों का इलाका था। अगर उनकी इस इलाके में मौजूदगी की खबर जरा-सी भी इधर-उधर फैल जाती, तो शायद छोटे-मोटे गिरोहों के आदमी भी उन्हें घेरकर मारने के लिये निकल खड़े होते ।
समस्या सिर्फ गार्डों और दुश्मनों की ही नहीं, पुलिस की भी थी। अगर किसी वजह से पुलिस उन्हें घेर लेती और गाड़ी की तलाशी की नौबत आ जाती, तो उनके लिये कई चीजों का स्पष्टीकरण देना मुश्किल हो जाता। कई ऐसी चीजें उनकी गाड़ी में मौजूद थीं जिनके बारे में वो कुछ नहीं बता सकते थे। खासतौर पर दुश्मन के इलाके में।
आखिर उनकी गाड़ी एक अन्धेरी-सी गली में जा रुकी थी। कार के रुकते वक्त भी कोई खास आवाज पैदा नहीं हुई थी। उसी तरह बेआवाज तरीके से गाड़ी के दरवाजे खुले थे और देवा के साथ उसके तीन साथी कार से उतरे थे। अब उनके चेहरों पर नकाबें चढ़ी हुई थीं और उनके हाथों में हल्की मशीनगनें थीं।
गाड़ी ऐसी जगह रुकी थीं, जहां से वो एक छोटी गली को क्रॉस करके दूसरी तरफ निकल सकते थे। जहां दूसरी सड़क थी।
बिल्ली की तरह बेआवाज कदमों से उन्होंने वो गली क्रॉस की और खुली सड़क पर पहुंच गए थे। इस वक्त वो गहरे रंग के कपड़ों में, चेहरों पर नकाबें लगाए, हाथों में मशीनगनें उठाए वो साफ तौर पर मौत के फरिश्ते मालूम हो रहे थे।
सामने ही एक शराबखाना था जो जरा स्टैण्डर्ड का माना जाता था। "प्रेजीडेंट वार ।” उन्होंने एक झटके के साथ दरवाजा खोला था। काउंटर के पास वकील महेश खड़ा दो आदमियों से बातें कर रहा था।
शक्ल-सूरत और हुलिये से ही वो आदमी ऐसे लग रहे थे, जिन्हें कम से कम ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर के वकील असिस्टेंट के दोस्त तो नहीं होना चाहिये था। मगर महेश उनके साथ हँस-हँसकर बातें कर रहा था। हकीकत यह थी कि महेश ने कुछ समय पहले प्राइवेट तौर पर मोटी फीस लेकर उनके खिलाफ एक कल्ल के केस की कोर्ट में पैरवी की थी। वो दोनों ही दुर्दांत हत्यारे थे ।
उसने कत्ल के उस मुकदमे की पैरवी सरकारी वकील के तौर पर की थी। वो अभियोजन पक्ष का वकील था। मगर बड़ी उत्कृष्टता से वो केस हार गया था और ये दोनों महानुभाव बाईज्जत बरी हो गए थे। ये उत्तरी इलाके में गैर-कानूनी ठर्रे की भट्ठियां चलाने वाले काफी बदनाम बदमाश थे। लेकिन महेश को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि कोई उसे इन कातिलों के साथ देख लेगा तो क्या सोचेगा ?
दरवाजे पर कंधे से कंधे मिलाए बन्दूकधारी आदमियों पर सबसे पहले वार टेण्डर की नजर पड़ी थी और हैरतभरे खौफ से उसकी आंखें फैल गई थीं। उसे इस तरह दहशत से दरवाजे की तरफ देखते पाकर दूसरे दो आदमियों ने भी महेश के साथ ही साथ दूसरे दोनों आदमियों ने भी गर्दन मोड़कर उस तरफ देखा था।
"डोंट मूव ।” देवा गरजा था।
वार में मौत की सी खामोशी छा गई थी। उस खामोशी में महेश की आवाज उभरी---
"हे भगवान... यह तो...!"
उसकी बात अधूरी ही रह गई थी। मशीनगन की तड़तड़ाहट ने उसे बात पूरा करने की मोहलत नहीं दी थी। वो मुंह से जरा-सी भी आवाज निकाले बगैर फर्श पर गिरता चला गया था। देवा ने इस तरह मशीनगन का बर्स्ट मारा था कि महेश का शरीर बीच में से दो हिस्सों में बंटते- बंटते रह गया था।
देवा के साथी बार में मौजूद तमाम लोगों को कवर किए हुए थे। देवा ने उन दोनों आदमियों को भी नहीं बख्शा था, जो महेश से बातें कर रहे थे।
उसके ख्याल में, घटिया शराब की भट्ठियां चलाने वाले ऐसे आदमी, जिन पर कल का मुकदमा चला हो और वो मुकदमा महेश जानबूझकर हारा हो, वो इस काबिल नहीं थे उन्हें जिन्दा छोड़ा जाता। उसने एक और बर्स्ट मारकर उनका भी काम तमाम कर दिया था।
मशीनगन खामोश होने के बाद बार में खामोशी छा गई थी। उस खामोशी को देवा ने ही तोड़ा था। वो लाईट मशीनगन की नाल को इधर-उधर लहराते हुए दहाड़कर बोला था---
"किसी और को गोलियों की खुराक चाहिये ?"
बार में खामोशी ही रही, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया था। सबने "हैण्डअप" कर लिया था। उनके उठे हुए हाथ साफ तौर पर कांपते हुए दिखाई दे रहे थे। देवा फिर गरजकर बोला था---"हमारे जाने से पांच मिनट बाद तक कोई बाहर नहीं निकलेगा। अगर कोई निकला, तो उसे गोलियों की डोज मिलेगी।"
उसके आदमियों ने बाहर झांककर देखा और इशारे से उसे बताया कि बाहर रास्ता साफ था। उस दौरान ड्राइवर गाड़ी वहीं ले आया था। वो फुर्ती के साथ वार से निकलकर गाड़ी में बैठे थे और कार तेजी से रवाना हो गई थी।
देवा का दिल इस ताजा कामयाबी से बेकाबू हुआ जा रहा था। उसने काफी हद तक अपना हिसाब चुकता कर दिया था। अब सिर्फ जे०सी०पी० कैलाश पंवार बाकी बचा था।
इसके अलावा देवा को उत्तरी इलाके में सिर उठा रहे नए गिरोहों पर भी गुस्सा था, जिनमें से किसी ने उसके जेल जाने से पहले उस पर हमला भी किया था। यह सोचकर ही उसका दिमाग ज्वालामुखी बनने लगता था कि अब छोटे-मोटे बदमाश पर निकालने लगे थे और उस जैसे आदमी पर हमला करने की जुर्रत करने लगे थे। बहुत पुराने जमाने से यह मान्यता चली आ रही है। पैसे में बड़ी ताकत होती है खासतौर पर अण्डरवर्ल्ड में तो पैसे से ऐसे-ऐसे काम भी हो जाते हैं, जो देखने में लगभग असंभव ही नजर आते हैं।
देवा को नहीं मालूम था कि करीना ने उस पर नजर रखने के लिये उसके ही एक खास आदमी को सैट कर लिया था। इसके लिये करीना ने भारी-भरकम रकम खर्च की थी।
उसे देवा की दूसरी सरगर्मियों के कोई सरोकार नहीं था और उनका उसे काफी हद तक पता भी था। वो तो देवा के किसी दूसरी औरत से अफेयर को लेकर चिंताग्रस्त थी। देवा की जिन्दगी में किसी दूसरी औरत की कल्पना भी उसके लिये कष्टकारक थी, चाहे उनके आपसी सम्बन्ध कैसे भी थे।
नेहा के बारे में जब से उसे पता चला था कि देवा ने उसकी खातिर मारियो को कत्ल किया था, तब से उसका शक बरकरार था। आम राय भी यही थी। हालांकि देवा ने इसका सख्ती से खण्डन भी कर दिया था। मगर करीना का शक दूर नहीं हो पाया था। सिर्फ इस मामले में देवा की जासूसी कराने के लिये करीना ने उस आदमी को सैट किया था। लेकिन उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा था।
लेकिन उस "जासूस" ने अपना हक अदा करने के चक्कर में करीना को देवा के एक औरत से सम्बन्धों के बारे में झूठी और भड़काऊ रिपोर्ट दे दी थी। औरत का नाम नेहा था।
करीना के लिये इतना जान लेना ही काफी था। बाकी अन्दाजे वो खुद ही लगा सकती थी। जब औरत सन्देह और ईर्ष्या की अग्नि में सुलग रही हो तो ऐसे मामलों में उसके ख्याल और कल्पनाएं खूब काम करती हैं।
गुस्से से करीना की हालत खराब हो रही थी। वो अपना अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि उसके होते हुए देवा किसी दूसरी औरत के रूप-जाल में फंस जाए। आखिर करीना ने भी तो अपने बहुत-से चाहने वालों को ठुकराकर सिर्फ देवा के साथ नाता जोड़ लिया था और अब देवा ने दूसरी लड़की ढूंढ़ ली थी।
वैसे, अब खुद करीना का दिल भी देवा से भरने लगा था। उसे अपनी जिन्दगी के खतरों भरे एडवेंचर के दिन-रात याद आते थे और उन दिनों की रंगीनी अच्छी लगने लगी थी। जब अण्डरवर्ल्ड में एक गनगर्ल के रूप में उसका अपना अलग से एक नाम था।
दो घण्टे तक करीना इसी तरह की सोचों में उलझी रही थी और अपना खून जलाती रही थी । फिर आखिरकार वो एक फैसले पर पहुंच गई थी। उसने चीफ इंस्पैक्टर डिटैक्टिव शंकर चौहान को फोन किया था और मधुर स्वर में उससे काफी ज्यादा बात की थी।
शंकर से बात करने के बाद करीना ने देवा को फोन किया था। वो छूटते ही बोला था, "डार्लिंग, आज रात मैं बहुत व्यस्त रहा हूं और अभी तक व्यस्त ही हूं।"
"हां। मुझे तुम्हारी व्यस्तताओं का अन्दाजा है।" करीना ने तीखे लहजे में कहा था। लेकिन देवा उसके लहजे के तीखेपन को महसूस नहीं कर सका था। उसका दिमाग इस वक्त न जाने कहां फंसा हुआ था।
'और हां बेवी... तुम्हें एक खास खबर सुनाऊं... वकील महेश को कुछ अज्ञात लोगों ने फायरिंग करके मार डाला है।" देवा के लहजे में एक गुप्त सी खुशी थी। देवा ने अपनी समझ में तो उस खुशी को छुपा लिया था, लेकिन करीना उसे महसूस किए बगैर नहीं रह सकी थी।
"ओह... बेचारा...!" वो चुभते हुए लहजे में बोली--- “तुम तो उस वक्त यकीनन कहीं दूसरी जगह होगे, जब वो घटना घटी थी।"
"हां... जाहिर है।" वो इत्मीनान से बोला था ।
"मेरे पास भी तुम्हें सुनाने के लिये एक खास खबर है देवा।" करीना ने कहा--- “दिल्ली अण्डरवर्ल्ड के लोगों की आज आधी रात के समय राम भण्डारी के ठिकाने पर एक बहुत महत्त्वपूर्ण मीटिंग है। वो लोग यहां पांव जमाने के लिये उन सब लोगों को संगठित करने का प्रोग्राम बना रहे हैं, जो तुम्हें पसन्द नहीं करते। वो लोग दिल्ली से बहुत सारे आदमी लाने के बजाय यहीं के लोगों को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल करके तुम्हें और तुम्हारे गैंग को खत्म करने का प्लान बना रहे हैं।"
"ओह... अच्छा!" देवा ने कुछ हैरत से पूछा---"लेकिन तुम्हें यह खबर कहां से मिली है?"
"इस बात को छोड़ो और फौरन फैसला करने की कोशिश करो, कि तुम्हें क्या करना है? दिल्ली माफिया के लोग गहरे नीले रंग की चार मर्सीडीज कारों में आएंगे। अभी साढ़े ग्यारह बजे हैं, अगर तुम थोड़ी-सी तेजी दिखाओ तो उन्हें उस वक्त सबक सिखा सकते हो जब वो मीटिंग खत्म करके निकल रहे हों।" करीना ने कहा था।
"सूचना के लिये धन्यवाद हनी... मैं ऐसा ही करूंगा।" देवा ने खुश होकर कहा और रिसीवर रख दिया था !
करीना ने इधर फोन बंद किया था तो उसके पंखुड़ियों जैसे होंठों पर बड़ी क्रूर-सी मुस्कराहट थी जो इससे पहले कभी उसके होंठों पर नहीं देखी गई थी। वो सोच रही थी कि अगर सब कुछ उसके अनुमानों के अनुसार ही होता रहा, तो कल के अखबार एक सनसनीखेज खबर के विवरणों से भरे हुए होंगे।
और अगर... उसके अनुमान गलत साबित हो गए... कोई गड़बड़ हो गई, तो सुबह बिस्तर में उसकी अपनी लाश मिलेगी।
कुछ क्षण के लिये वो भयभीत हो गई। मगर फिर उसने भय को अपने दिमाग से झटकते हुए अपने आपको समझाया कि जिस तरह की जिन्दगी वो गुजार रही थी। वहां इस तरह का खतरा तो हर वक्त लगा ही रहता था।
इधर !
देवा ने करीना से वो "खास खबर" सुनने के बाद फोन बंद किया था और अपने आदमियों को निर्देश देने शुरू कर दिये थे। उसके हैडक्वार्टर में जल्दी ही भाग-दौड़ और सरगर्मी शुरू हो गई थी।
खास-खास निशानेबाजों और लड़ाकों को जमा किया गया था और जल्दी ही चार कारें आदमियों से भरकर वहां से रवाना हो गई थीं। देवा सबसे आगे अपनी जाती कार में अपने गार्ड्स के साथ था।
राम भण्डारी का ठिकाना एक सैलून था जिसमें वार और जुआघर भी शामिल था। यहां ज्यादातर अण्डरवर्ल्ड के लोगों का ही आना-जाना था। यह जगह शहर के एक ऐसे इलाके में दूर-दराज थी जहां से बाहरी इलाका शुरू हो जाता था। इलाका काफी पिछड़ा हुआ था और यहां अभी पूरी आबादी नहीं थी। भण्डारी का ठिकाना देखने में ही खतरनाक जगह लगता था। वहां बहुत सारी खतरनाक वारदातें भी हो चुकी थीं।
देवा ने सैलून से काफी दूर रुककर ही आसपास का जायजा लिया था। नीम अन्धेरी नजर आगे वाली उस इमारत के सामने कई गाड़ियां खड़ी दिखाई दे रही थीं। लेकिन उनमें देवा को गहरे नीले रंग की मर्सीडीज गाड़ी कोई नहीं दिखाई दे रही थी। उसने सोचा था, शायद वो लोग अभी पहुंचे नहीं है। वैसे भी अभी बारह बजने में कुछ मिनट बाकी थे।
अभी वो लोग इधर-उधर देख ही रहे थे कि तभी उन्हें शहर की तरफ से चार गाड़ियां भण्डारी के ठिकाने की तरफ आती दिखाई दी थीं। वो मर्सीडीज कारें ही थीं।
देवा के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं और गोद में रखी लाईट मशीनगन पर उसकी गिरफ्त मजबूत हो गई थी। वो सोच रहा था कि आज वो साबित कर देगा कि इस शहर पर सिर्फ और सिर्फ उसी की हुकूमत है। जो भी उसे चैलेंज करेगा, वो पछताएगा।
योजनानुसार वो गाड़ियों से उतरे और अंधेरे में छुपते-छुपाते एक कतार की सूरत में आगे बढ़ने लगे। उनका इरादा था कि अर्धचन्द्राकार रूप में कारों को घेरकर दुश्मनों को खून में नहला देने का था।
लेकिन जो कुछ हुआ, उसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। अभी उन्होंने पहला पहला बर्स्ट ही मारा था कि चारों गाड़ियों में से सायरन की जोरदार आवाजें सुनाई देने लगी थीं। यह पुलिस कारों सायरनों की ही आवाजें थीं।
“हे भगवान....!” देवा गुर्राया--- "ये तो पुलिस की गाड़ियां हैं ।" उसे यकीन नहीं आ रहा था। पुलिस की काफी बड़ी फोर्स पर इस तरह घात लगाकर हमला करना बड़ा संगीन जुर्म था। वैसे तो शायद देवा को उन्हें खत्म करने में एक पल की भी हिचकिचाहट न होती। लेकिन उसे मालूम था कि पुलिस पर इस तरह सुगठित ढंग से फायरिंग करने का खामियाजा उसे और उसके गैंग को इस तरह भुगतना पड़ेगा कि वो कहीं के नहीं रहेंगे।
मगर पुलिस कारों की तरफ से फायरिंग शुरू हो चुकी थी। दोनों तरफ से शोले लपक रहे थे और लगभग वीरान पड़े इलाके की शांति तहस-नहस हो चुकी थी। अब यह जिन्दगी और मौत की जंग थी, देवा चाहते हुए भी अब फायरिंग नहीं रोक सकता था। वो लोग अगर अपने बचाव में फायर न करते तो चूहों की तरह मारे जाते ।
देवा का ड्राइवर भी उस मुकाबले में शामिल था, उसने देवा की ढाल बनकर फायरिंग करते हुए उसे बचाकर निकाल ले जाने की कोशिश की। वो दोनों अपनी गाड़ी में फायरिंग करते जा घुसे थे और गाड़ी मस्त हाथी की तरह लहराती हुई तेजी से आगे बढ़ गई। मगर एक स्कवार्ड कार उनके पीछे रवाना हो गई थी।
दोनों कारें तूफानी रफ्तार से खतरनाक अन्दाज में लहराती हुई करीब एक मील तक दौड़ती चली गई थीं। दोनों कारों की खिड़कियों में से शोलों की लपक के साथ गोलियों की बारिश हो रही थी।
देवा की गाड़ी में उसके दो आदमी और भी थे जिनमें से एक मर चुका था और दूसरा भी खून से लथपथ बुरी तरह कराह रहा था। आखिर देवा ने ही उसके सिर पर जबर्दस्त घूंसा मारकर उसे खामोश कर दिया था। पुलिस स्कवार्ड कार किसी तरह भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी। फिर देवा ने खुद ही मशीनगन से अपनी कार का पिछला शीशा तोड़ डाला था और उस तरफ से मशीनगन की नाल बाहर निकाल दी थी। धुएं और बारूद की दुर्गन्ध से उसको सांस लेना मुश्किल हो रहा था। सही तौर पर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। ऐसी स्थिति में सही निशाना लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। बस, एक-दूसरे पर अन्धाधुन्ध फायरिंग हो रही थी।
पुलिस स्कवार्ड कार शायद बूलेटप्रूफ थी। देवा ने उस कार के टायरों को निशाना बनाने की कोशिश की। आखिर एक टायर बुरी तरह धमाके से फट गया था। स्कवार्ड कार बुरी तरह लहराई थी, लेकिन अगले ही पल खुद देवा की कार भी उलट गई थी। ड्राइवर का एक मोड़ काटते वक्त अन्दाजा गलत हो गया था।
फिर गाड़ी पहियों के बल कुछ देर रगड़ खाकर रुक गई थी। उसके पहिये अब भी घूम रहे थे। ड्राइवर की तरफ से कोई आवाज नहीं उभरी थी। लगता था, वो मर चुका था।
देवा अभी तक जोश में था, लेकिन अब उसका सिर घूम रहा था। उसे खुद अन्दाजा नहीं था कि उसे कहां-कहां चोटें आई थी। वो अपने जख्मी और मुर्दा साथियों के नीचे दब गया था।
बड़ी मुश्किल से देवा ने खुद को उनके नीचे से निकाला और किसी तरह गाड़ी से बाहर निकला। उसने मशीनगन की नाल गाड़ी के नम्बर पर टिकाई। कार स्कवार्ड थोड़े फासले पर आ रुकी थी और उसमें से दो आदमी उतर कर देवा की उलटी हुई गाड़ी की तरफ बड़ी सावधानी से बढ़ रहे थे। उन दोनों के हाथों में रिवॉल्वर थे।
देवा ने ट्रिगर दबाया, लेकिन उसकी मशीनगन से महज "क्लिक" की आवाज निकलकर रह गई थी। उसकी मैगजीन खाली हो चुकी थी। उसी क्षण उन दोनों आदमियों ने चौंककर देखा था। इससे पहले उन्हें देवा की वहां मौजूदगी का अहसास नहीं हुआ था।
उनके रिवॉल्वरों का रुख देवा की तरफ हो गया था। लेकिन देवा ने उनमें से किसी को फायर करने की मोहलत नहीं दी थी। वो निहायत फुर्ती से अपना रिवॉल्वर निकाल चुका था। उसने फौरन फायर किया था। एक आदमी लड़खड़ाया था और सड़क पर गिर पड़ा था।
दूसरा आदमी अब पूरी तरह देवा की तरफ आकर्षित हो गया था। वो अपने ढेर हो चुके साथी पर दो क्षण के लिये झुका था, फिर अपना रिवॉल्वर देवा की तरफ घुमाते हुए तेजी से सीधा हुआ था।
परन्तु गहरा अंधेरा होने के बावजूद भी देवा उस दूसरे आदमी को, उसकी आकृति की वजह से पहचान चुका था। वो जे०सी०पी० कैलाश पंवार था। उसका शिकार, जो कि अभी तक बचा हुआ था। इससे पहले कि वो देवा पर फायर कर पाता, देवा ने एक दो फायर उस पर कर दिए। अगले ही पल सड़क पर कुछ गिरने की आवाज आई। देवा समझ गया कि वो रिवॉल्वर गिरने की आवाज थी फिर कैलाश पंवार को गिरते देखा। देवा के होठों से गुर्राहट निकली, पुलिस ने जबर्दस्त घेरा डाला था उसे खत्म करने के लिए। खतरा अभी सिर पर था, और पुलिस वाले भी आ सकते थे। देवा कार से निकलने की कोशिश करने लगा। वो जानता था कि अब उसका खेल खत्म हो चुका है। पुलिस उसे छोड़ेगी नहीं। जाने कितने पुलिस वाले मारे गये थे। उनमें से अभी तक वो सिर्फ कैलाश पंवार को ही पहचान सका था। देवा कार से निकलने की चेष्टा करने लगा, परन्तु कार की सीट इस तरह मुड़ चुकी थी कि वो बीच में फंसा पड़ा था। देवा पूरी कोशिश करने लगा कि सीट की पुश्त को वापस धकेलकर, उसके बीच में से निकल सके।
उसी पल देवा सतर्क हो गया। उसके दांत सख्ती से भिंच गये।
उसके कानों ने करीब आते कदमों की आहट सुनी थी।
तो आखिर और पुलिस वाले आ ही गये। देवा को अपनी मौत नज़र आने लगी। कार उसके लिये चूहेदान साबित होने वाली थी। पुलिस वालों ने गोलियां बरसाकर, उसे कार में ही खत्म कर... ।
“देवा।" तभी उसके कानों में जो आवाज पड़ी, वो उसे राहत देने वाली थी। ये जगमोहन की आवाज थी--- “गोली मत चलाना देवा, ये मैं हूं, जगमोहन । मेरी आवाज सुन रहे हो तो, जवाब दो।”
जगमोहन के ऐसे मौके पर यहां होने पर वो हैरान भी था।
"मैंने तुम्हारी आवाज पहचान ली है।” देवा ऊंचे स्वर में बोला।
"मैं कार के पास आ रहा हूं, गोली मत चला देना।" जगमोहन की आवाज पुनः आई फिर कदमों की आहट सुनाई दी।
“कार के बाहर क्या हाल है?" देवा ने पूछा।
“दो पुलिस वाले मरे पड़े हैं। बाकी सब ठीक है।" जगमोहन की आवाज कानों में पड़ी।
जगमोहन कार के पास आ पहुंचा था।
“बाहर निकलो देवा ।"
"सीट की पुश्त टेढ़ी होकर मुझे दबाये हुये है। निकल नहीं पा रहा।” देवा ने कहा।
“ठहरो मैं देखता हूं।" बाहर से जगमोहन ने कहा।
जगमोहन की कोशिशों के बाद, पांच मिनट में देवा कार से बाहर था। देवा के शरीर पर कई जगह जख्म बन गये थे। एक टांग में दर्द हो रहा था।
"निकलो यहां से।" देवा ने गहरे अंधेरे में नज़रें दौड़ते हुये कहा।
“वो पुलिसवालों की कार खड़ी है।” जगमोहन बोला।
“उसे रहने दो। यहां से निकलने में हमें अंधेरे का फायदा मिलेगा ।"
दोनों अंधेरे में भागने लगे। घटनास्थल से वो दूर हो जाना चाहते थे। देवा की टांग में दर्द हो रहा था, परन्तु भागकर यहां से दूर और दूर हो जाना बहुत जरूरी था। पुलिस आती ही होगी। उसकी तलाश में पुलिस का कई किलोमीटर तक घेरा पड़ जाना था कि वो पास में कहीं घायल ना पड़ा हो। हालात खतरनाक हो गये थे। जे०सी०पी० कैलाश पंवार के साथ और जाने कौन कौन-सा पुलिसवाला मरा था। देवा जानता था कि अब उसका खेल खत्म हो चुका था। पुलिस ने अब उसे मोहलत नहीं देनी थी जाने की।
दस मिनट बाद वे दौड़ते हुए रुके। दोनों ही हांफ रहे थे। फिर वो तेज-तेज चलने लगे।
“तुम्हारे पास कार नहीं है?” देवा ने तेजी से कदम आगे बढ़ाते हुए पूछा।
"नहीं। कार नहीं है।"
"तुम यहां कैसे पहुंचे ?"
“मुझे राम भंडारी के खास आदमी ने अपने ठिकाने पर बुलाया था। वो मुझे कोई काम देने वाला था। मैं ठिकाने पर ही था और तब मुझे पता चला कि राम भण्डारी आजकल पुलिस का खास बना हुआ है। उसके एक आदमी के मुंह से निकल गया कि पुलिस आज सुरेन्द्र पाल को मारने वाली है। सुरेन्द्र पाल तक खबर पहुंचा दी गई है कि राम भण्डारी के ठिकाने पर उसके खिलाफ कुछ किया जा रहा है और सुरेन्द्र पाल कभी भी यहां पहुंच सकता है। राम भण्डारी इस मामले में पुलिस का पूरा साथ दे रहा है। यानी कि तुम्हारे लिए पुलिस ने यहां जाल बिछाया हुआ है। ये खबर सुनी तो मैं सोचने लगा कि तुम्हें कैसे खबर दूं। कैसे सतर्क करूं कि तभी बाहर गोलियां चलने की आवाजें आने लगी। मैं बाहर निकला। पता नहीं क्या-क्या हो रहा था। कौन किस पर गोलियां चला रहा था। अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया। तभी मैंने एक कार, जोकि तुम्हारी ही थी को एक तरफ जाते और उसके पीछे एक अन्य कार को जाते देखा तो समझ गया कि आगे वाली कार में तुम हो और पीछे वाली कार में पुलिस है। मैं छिपते-छिपाते पैदल ही उस दिशा में भागा जिधर तुम्हारी और पुलिस की कार गई थी। मैं जानता था कि पुलिस तुम्हें ज्यादा दूर नहीं जाने देगी। ये ही हुआ, जब यहां पहुंचा तो गोलियां चलने की आवाज मैंने सुन ली थी। पहले तो मैंने सोचा कि तुम गये। परन्तु फिर मैंने उल्टी पड़ी तुम्हारी कार के बाहर खड़े एक पुलिस वाले को गोलियों की आवाज के साथ गिरते देखा तो समझ गया कि तुम जिन्दा हो।"
देवा और जगमोहन अब तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे। जगमोहन नहीं देख पाया था कि देवराज चौहान के चेहरे पर दरिन्दगी बरस रही है। गहरा अंधेरा था। यहां तो स्ट्रीट लाइट की रोशनी भी नहीं थी। देवा के चलने में कुछ लंगड़ाहट थी।
परन्तु वो पूरी तरह तेज चल रहा था। यहां से दूर हो जाना बहुत जरूरी था।
"तुमने आज भी मुझे बचाया।” देवा बोला--- “उस दबी सीट के बीच में से निकलना आसान नहीं लग रहा था मुझे।"
“मैंने तुम पर कोई एहसान नहीं किया।" जगमोहन ने कहा ।
“ये सुनकर कि पुलिस मुझे राम भण्डारी के ठिकाने पर घेरने वाली है, तुम परेशान होकर बाहर क्यों आ गये वहां से?"
"पता नहीं। मन में ये ही आया कि मुझे तुम्हारी सहायता करनी चाहिये।"
"क्यों?"
कुछ पल चुप रहकर जगमोहन बोला।
“तुम मुझे पसन्द हो। अपने काम से मतलब रखते हो और हर बार मुझे अच्छे नोट दिए।"
तभी उसके कानों में पुलिस सायरन की आवाजें पड़ने लगी। दूर से आवाज आ रही थी। वो समझ गये कि बाकी के पुलिसवाले उल्टी पड़ी कार और दो पुलिस वालों की लाशों के पास पहुंच गये हैं। उन्होंने वो सड़क छोड़ दी, रास्ता बदल दिया और खुले मैदान जैसी जगह को मार करके आगे बढ़ने लगे।
"तुम्हें डॉक्टर की जरूरत है? मैं एक डॉक्टर को जानता हूं।” जगमोहन बोला।
“डॉक्टर तो मेरा है।” देवा कठोर स्वर में बोला--- “परन्तु डॉक्टर से भी जरूरी, एक और काम है पहले।"
“क्या?"
देवा खामोश रहा।
दोनों तेजी से आगे बढ़ते रहे।
"तुमने बताया नहीं, क्या जरूरी काम है?" जगमोहन बोला।
"तुम क्यों जानना चाहते हो?"
"यूं ही, मत बताओ।"
"मेरे साथ रहने में तुम्हें खतरा है जगमोहन। पुलिस अब खुलकर मेरे पीछे पड़ जायेगी। कुछ देर पहले मेरे हाथों से जे०सी०पी० कैलाश पंवार भी मारा गया है। और भी कई पुलिसवाले मरे हैं। समझो मेरा गैंग खत्म हो गया। पुलिस को पता चल गया कि हम एक-दूसरे को जानते हैं या इस मौके पर तुम मेरे साथ हो तो...।"
"मैं ऐसी बातों से डरता नहीं।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।
"मेरे साथ क्यों रहना चाहते हो?"
"तुम्हें याद होगा कि मैंने तुम्हें कहा था कि मैं तुम्हें पसन्द करता हूं। तुम हिम्मती हो। दिलेर हो। वादे के पक्के हो। जब-जब भी मैं तुम्हें मिला, तुममें मैंने कोई बुराई नहीं देखी।" जगमोहन बोला।
"ठीक है, अभी तो तुम मेरे साथ रहो। मुझे तुम्हारी जरूरत भी है।" देवा गम्भीर और सख्त था इस समय ।
वहां से काफी आगे निकल आने के बाद उन्हें टैक्सी मिल गई। वो उस इलाके में पहुंचे जहां करीना का फ्लैट था। टैक्सी छोड़ी और पैदल ही आगे बढ़ गये। रात के ढाई बज रहे थे। रह-रहकर वाहन सड़क पर से गुजर रहे थे। परन्तु पैदल जाता कभी-कभार ही कोई दिखता था।
उस इलाके में पहुंचते ही देवा ने सिगरेट सुलगाई। पल भर के लिए जगमोहन ने तब देवा का चमकता चेहरा देखा जो कि उसे बेहद खतरनाक लगा था। जगमोहन ने कहा।
“तुम्हें इस वक्त उस लड़की के पास नहीं, डॉक्टर के पास जाना---।"
"कौन-सी लड़की?"
"करीना ।"
“तुम जानते हो उसे?" देवा ने जगमोहन को देखा।
“उसका नाम जानता हूं और एक बार उसे तुम्हारे साथ देखा था। खबरें हर तरफ की रखता हूं।" जगमोहन बोला।
देवा ने कुछ नहीं कहा। कुछ आगे जाकर वे ठिठके ।
जगमोहन ने सामने की इमारत को देखा जहां फ्लैट बने हुये थे। फिर बोला ।
“मुझे ये भी पता है कि वो किस फ्लैट में रहती है।"
"तो जाकर देखो वहां पुलिस तो नहीं फैली हुई?" देवा ने दांत भींच कर कहा।
"मेरी मानो तो इस वक्त डॉक्टर के पास...।"
“मुझे डॉक्टर से ज्यादा उस दगाबाज की जरूरत है।" देवा गुर्रा उठा।
"क्या मतलब?”
“मुझे पुलिस के घेरे में पहुंचाने वाली करीना ही है। उसने पुलिस से मुखबिरी की है।"
"ओह!" जगमोहन के जिस्म में सिरहन दौड़ गई।
"इस बात का उसे इनाम देना है।”
जगमोहन, देवा को देखे जा रहा था।
“डर तो नहीं गये?” देवा का स्वर सख्त था।
"ये सब कुछ मेरे लिये नया नहीं है।"
“वहां देखकर मुझे बताओ कि पुलिस है या नहीं।"
जगमोहन सड़क पार करके इमारत की तरफ बढ़ गया।
देवा वहीं अंधेरे में खड़ा रहा।
बीस मिनट बाद जगमोहन ने आकर कहा।
“पुलिस कहीं भी नहीं है।"
देवा ने जेब में मौजूद रिवॉल्वर पर हाथ लगाकर कहा।
"तुम यहीं रुको। मैं फौरन लौट आऊंगा।” कहकर देवा आगे बढ़ गया।
देवा करीना के फ्लैट के बंद दरवाजे पर जा पहुंचा। कॉलबेल दबाई । भीतर से बेल बजने का स्वर उभरा। देवा का चेहरा कठोरता से भरा चमक रहा था। गैलरी की मध्यम रोशनी में सब दिखाई दे रहा था। हर तरफ खामोशी व्याप्त थी। रात के इस वक्त कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही थी। भीतर से कदमों की आहट उभरी। देवा की आंखों में मौत का तूफान उठ खड़ा हुआ। फिर उसे करीना की आवाज सुनाई दी। जो भीतर से आई थी।
"कौन है?"
जवाब में देवा ने होंठ भींच कर पुनः बेल बजा दी।
भीतर से दरवाजा खोले जाने का स्वर उभरा।
देवा ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली।
तभी दरवाजा खुला और नाइटी में करीना दिखी। देवा को देखते ही उसकी आंखें फैल गई।
"तुम?" करीना का चेहरा दहशत और खौफ से भर उठा। वो जड़-सी खड़ी रह गई।
“जिन्दा हूं।” देवा ने दरिन्दगी भरे स्वर में कहा--- "मेहरबान तो तुम मुझ पर बहुत थी परन्तु तुम्हारी मेहरबानी मुझ पर काम ना कर सकी। कम से कम, मैंने ये नहीं सोचा था कि हमारी आखिरी मुलाकात इस हाल में होगी। मैं तुम्हें धन्यवाद देने आया हूं कि तुमने मेरा कितना ख्याल रखा।" स्वर में जहरीलापन आ गया था।
बुत बन गई थी करीना, उसे देखते हुए।
देवा ने खुले दरवाजे से भीतर जाने की चेष्टा ना की। रिवॉल्वर हाथ में थी।
"क्यों किया तुमने ऐसा?" देवा ने क्रूर स्वर में पूछा।
करीना का जिस्म इस तरह कांपा जैसे उसे होश आ गया हो।
“जवाब दो। क्यों किया तुमने ऐसा?"
"तु... म... तुमने नेहा को पाने के लिए मारियो की हत्या कर दी। तुम अब मेरे से दूर होते जा रहे...!"
"नेहा मेरी छोटी बहन है।" देवा गुर्रा उठा।
“क्या ?" करीना का मुंह खुला का खुला रह गया--- "तु... तुम्हारी बहन ?"
“छोटी बहन ।” देवा के होठों से फुंफकार निकल रही थी--- "कौन-सा पुलिस वाला तेरे साथ था मुझे मार डालने के लिए?"
“शंकर चौहान।” करीना की हालत अजीब सी थी--- "शंकर चौहान तो नेहा का बड़ा भाई है। फिर तुम...।”
“मैं शंकर चौहान का छोटा भाई देवराज चौहान हूं परन्तु लोग मुझे देवा के नाम से जानते हैं।” देवा ने दांत भींच कर कहा।
“ओह---।" करीना की हालत अजीब-सी थी। डर-हैरानी-दहशत ने उसके चेहरे पर डेरा डाल लिया था--- "मुझे माफ कर दो। मैं नहीं जानती थी कि नेहा तुम्हारी बहन है। तुमने भी तो नहीं बताया कि...।"
देवा का रिवॉल्वर वाला हाथ ऊपर उठा ।
करीना की आंखें मौत के भय से फैल गईं।
"ये सब कुछ मैंने तुझे इसलिये बताया कि तू ये बात किसी को बताने के काबिल नहीं रहेगी।"
“नहीं सुरेन्द्र, ओह देवा---मैं तो...।"
तेज आवाज के साथ एक साथ तीन फायर हुए। पूरी इमारत रात के सन्नाटे में कांप उठी।
एक गोली करीना के माथे में जा लगी। दो छाती में और वो इस तरह पीछे गिरी, जैसे किसी ने धक्का दे दिया हो। देवा ने रिवॉल्वर जेब में रखा और पलटकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
इमारत से बाहर निकलकर देवा, जगमोहन से मिला। दोनों आगे बढ़ गये। देवा अभी भी लंगड़ाकर चल रहा था। टांग में दर्द बढ़ गया था। देवा के चेहरे पर कठोरता नाच रही थी।
“वहां ज्यादा लोग थे क्या?" जगमोहन ने पूछा--- "मैंने तीन गोलियां चलने की आवाज सुनी ?"
"मैंने दिल खोलकर उसे गद्दारी का इनाम दिया है।” देवा गुर्राया ।
“उसने ऐसा क्यों किया था?" जगमोहन ने पूछा।
“वो बेवकूफ थी। उसकी सोचें गलत थी परन्तु वो मुझे इतना तो समझा गई कि मुझे औरतों से दूर रहना होगा। मैं नहीं चाहता कि दोबारा कभी औरत के धोखे का शिकार होकर फिर मौत के मुंह में पहुंच जाऊं।"
“तुम अभी भी खतरे में हो। पुलिस तुम्हें छोड़ेगी नहीं।"
“सही कहते हो। मुझे अपने बारे में फिर से सोचना होगा। मेरे लिए हालात खतरनाक हो चुके हैं। तुम जाओ।”
“क्या?" जगमोहन के होठों से निकला।
"तुम जाओ। मेरी वजह से तुम बे-मौत मारे जाओगे।" देवा बोला।
कुछ पल खामोशी से जगमोहन चलता रहा फिर उसने कहा।
"तुम्हें डॉक्टर के पास...।"
"मैं चला जाऊंगा---।"
“अगर मैं तुम्हारे साथ रहूं तो---उसके बाद तुम्हें छोड़ दूंगा।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।
कुछ देर बाद उन्हें टैक्सी मिल गई। देवा, जगमोहन के साथ अपने खास डॉक्टर के पास पहुंचा। सुबह के चार बज रहे थे। सड़कों पर लोगों का, वाहनों का आना-जाना शुरू हो चुका था। डॉक्टर नींद से उठा था। उसका परिवार भी वहीं रहता था। देवा को अपने घर आया पाकर चौंका। परन्तु देखते ही समझ गया कि देवा घायल है। उसने तुरन्त देवा का चैकअप किया। घायल जिस्म पर दवा लगाई। कई जगह पट्टी बांधी। खाने को दवा दी। टांग के बारे में उसने कहा कि तेज झटका लगने की वजह से टांग में समस्या पैदा हुई है। वो दवा खाता रहे। आराम करे और सुबह-शाम टांग की मालिश करवाये। पन्द्रह दिन में टांग ठीक हो जायेगी। देवा को पता था कि जब गाड़ी पलटी थी, तब टांग गाड़ी में कहीं अटक गई थी और तभी टांग में तेज दर्द हुआ था। डॉक्टर ने चाय पिलाई उन्हें।
उसके बाद देवा और जगमोहन बाहर आ गये। दिन निकल आया था। देवा सड़क किनारे रुक गया और सिगरेट सुलगा ली। चेहरे पर कठोरता थी तो गम्भीरता भी थी।
"तुम्हें इस तरह दिन के उजाले में खुले में नहीं रहना चाहिये।” जगमोहन बोला।
"मैं अपने किसी भी ठिकाने पर नहीं जाना चाहता।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा--- "करीना से एक बार मुझे धोखा मिल चुका है। पुलिस अब बुरी तरह मेरे पीछे है। मेरा ही कोई आदमी, पुलिस तक खबर पहुंचा सकता है। अब लोगों पर से मेरा भरोसा उठ गया है।"
"तो कहां जाओगे?"
"यही सोच रहा हूं।"
"मुझ पर भरोसा है?" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में पूछा।
देवा ने जगमोहन को देखा। जगमोहन की निगाह, देवा पर ही थी।
"जहां मैं रहता हूं वहां चलो।" जगमोहन बोला--- “एक कमरे का घर है। मेरे से मिलने भी कोई नहीं आता। तुम वहां आराम से छिपे रह सकते हो और किसी को पता भी नहीं चलेगा।"
“तुम्हारी मां भी तो...।” देवा ने कहना चाहा।
“वो मर चुकी है।" जगमोहन ने सपाट स्वर में कहा--- “जिस दिन तुमसे पैसे लेकर गया था उससे अगले दिन मां का ऑपरेशन हुआ और तीसरे दिन वो मर गई। मैं अकेला रहता हूं। मां नहीं, बाप नहीं, भाई-बहन नहीं। मुझ जैसे कंगले को कोई दोस्त भी नहीं बनाता। परन्तु तुम मेरे घर में सुरक्षित रह सकते हो। मैं भी चाहता हूं कि तुम पुलिस से बच जाओ। अगर कोई और जगह है तुम्हारे पास तो बेशक वहां जा सकते हो।"
देवा, जगमोहन को देखे जा रहा था।
जगमोहन ने दोबारा कुछ नहीं कहा था।
“अगर पुलिस मुझ तक पहुंच गई तो वो तुम्हें भी मार देगी। तुम्हें इस बात की फिक्र नहीं ?"
जगमोहन मुस्कुरा पड़ा।
"मेरी फिक्र मत करो। मैं इन बातों से डरने वाला नहीं। परन्तु मेरा दावा है कि पुलिस तुम तक नहीं पहुंच सकेगी। मेरे घर पर पहुंचने के बाद तुम सुरक्षित हो जाओगे। खाना वही खिलाऊंगा जो मैं घर पर बनाता हूं । दस-पन्द्रह दिन में ये मामला पूरी तरह शांत हो जायेगा। पुलिस सोचेगी कि तुम मुम्बई से कहीं दूर भाग गये हो। तब तुम्हारे पास बहुत वक्त होगा कि सोच सको अब तुमने कौन-सा कदम उठाना है। मेरे ख्याल में तो मुम्बई से निकल जाना।”
“ठीक है।” देवा ने गम्भीर स्वर में कहा--- “मैं कुछ दिन तुम्हारे घर पर ही रहूंगा।"
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