उसके बाद---
एक साल तक कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी थी। देवा के प्यादों का दूसरे गिरोहों के कारिन्दों से छोटी-मोटी झड़पों का सिलसिला चलता रहा था। लेकिन कोई बड़ा खून-खराबा नहीं हुआ था। वो बिना शुब्हा अण्डरवर्ल्ड का सबसे ताकतवर आदमी बन गया था। मीडिया में देवा का जिक्र होता रहता था, मगर हकीकत में उसे बहुत कम लोगों ने देखा था। उसे शोहरत का शौक नहीं था।
उस दौरान देवा की दौलत में इतनी बढ़ोत्तरी हो चुकी थी, जिसका उसने कभी ख्वाब भी नहीं देखा था। उस दौरान दो ऐसी खबरें उसकी नजरों से गुजरी थीं, जिन्हें उसने बड़े गौर से पढ़ा था। उनमें एक तो उसके बाप के देहांत की खबर थी, दूसरी खबर उसके भाई शंकर चौहान के बारे में थी। जो प्रमोशन पाकर इंस्पैक्टर बन गया था। वो अब डिटेक्टिवों के एक स्कवार्ड का चीफ इंस्पैक्टर था ।
बाप के देहांत की खबर पाकर देवा ने गुप्त रूप से अपनी मां के लिये बीस हजार रुपये महीना की रकम भिजवाने का इन्तजाम यह झूठ बोलकर करवा दिया था कि उनका कोई दूर-दराज का रिश्तेदार मरते वक्त यह व्यवस्था कर गया था। यह उसने इसलिये किया था कि बाप की मौत के बाद उसके परिवार को, मां को कोई आर्थिक तंगी न पेश आए।
शंकर चौहान की तरक्की की खबर पढ़कर वो तल्ख अन्दाज में हँस दिया था। उसे मालूम था कि शंकर कोई ईमानदार या कर्त्तव्यपरायण पुलिस ऑफिसर नहीं था। वो मौके से फायदा उठाने से नहीं चूकता था। अलबत्ता, सावधान जरूर रहता था। वो क्रप्ट था, मगर क्रप्ट मशहूर नहीं था।
इसके अलावा शंकर चौहान अय्याश और रंगीन मिजाज भी था। किसी भी खूबसूरत औरत से सम्पर्क बढ़ाने का मौका मिलता था, तो वो उससे पीछे नहीं हटता था ।
देवा को हंसी दरअसल यह सोचकर आई थी कि अगर कभी लोगों को मालूम हो गया कि शहर के सबसे बड़े क्रिमिनल गैंग का लीडर एक बहुत बड़े पुलिस ऑफिसर का सगा भाई है.... तो लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी? एक भाई... इतना बड़ा कानून का रक्षक और दूसरा भाई... उतना बड़ा कानून का भक्षक! यह भाग्य की विडम्बना नहीं थी, तो और क्या था?
देवा और करीना अभी इकट्ठे ही रह रहे थे। उनमें झड़पें भी होती रहती थीं, लेकिन वो अभी अलग नहीं हुए थे। वो जिन्दगी के पूरे मजे लूट रहे थे, जी खोलकर खर्च करते थे और अपनी इच्छाएं पूरी करते थे। देवा को अब महसूस होता था कि दौलत कमाना मुश्किल काम नहीं है।
इतने दिनों तक सुविधापूर्ण जीवन जीने के बाद देवा को महसूस होने लगा था कि उसके अन्दर एक बेचैन आत्मा कैद थी। वो सोचता था कि मुम्बई को तो उसने फतेह कर ही लिया था, अब यहां उसके करने को कुछ नहीं बचा था। अब उसे कोई दूसरी दुनिया तलाश करनी चाहिए थी। जिसे वो जीत सके और उसके लिये अपनी योग्यताएं इस्तेमाल कर सके ।
उसने सुना था कि दिल्ली में भी "कारोबार" बहुत अच्छा था, गैर-कानूनी शराब का व्यापार वहां भी बड़े पैमाने पर हो रहा था और बहुत ही मामूली दर्जे के गुण्डे-बदमाश यह काम कर रहे थे। वहां ज्यादा मार-धाड़ भी नहीं होती थी। वो अपने आदमियों के जरिये दहशत फैलाकर उस कारोबार पर कब्जा कर सकता था।
अभी देवा इन्हीं योजनाओं पर सोच रहा था कि उसे पता चला। दिल्ली के कुछ लोग इसी किस्म की प्लानिंग कर रहे थे। वहां सिर्फ जयराज प्रधान हिंसक और खतरनाक आदमी था। उसके बारे में देवा को पता चला था कि वो भी दहशत फैलाकर मुम्बई के नाजायज धन्धों पर कब्जा जमाने की सोच रहा था।
देवा यह खबर सुनकर हँस दिया था। बड़े-बड़े खून-खराबों भरे तजुर्बों से गुजरकर उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया था कि इस किस्म की खबरें उसे डराने के बजाय उसके दिल में उत्साह भर देती थीं। देवा ने उन खबरों पर यकीन नहीं किया था, न ही उन्हें ज्यादा अहमियत दी थी। लेकिन एक दिन उसे मालूम हो गया कि कहीं न कहीं खिचड़ी जरूर पक रही थी।
हुआ यह था कि वो अपने होटल के रेस्टोरेंट के ग्राउण्ड फ्लोर पर बैठा खाना खा रहा था कि अचानक उसे सड़क की तरफ से मशीनगन की गड़गड़ाहट सुनाई दी थी। रेस्टोरेंट की मोटे शीशों वाली दीवारें धमाकों के साथ किर्चियों में तब्दील होकर गिरने लगी थीं। देवा ने अगर फर्श पर गिरने और मेज उलटने में जरा भी देर की होती तो उसका जिस्म गोलियों से छलनी हो गया होता।
अपने आप को फर्श पर गिराने के दौरान ही उसने रिवॉल्वर भी निकाल लिया था लेकिन इस स्थिति में उसका कोई फायदा नहीं था। हमलावरों का मकसद भी शायद यही था कि अगर वो देवा को मार गिराने में सफल हो गए तो क्या कहने, अगर सफल न भी रहे, तब भी दहशत तो फैलेगी ही। दो-तीन बर्स्ट मारने के बाद बाहर किसी गाड़ी के तेजी से दूर जाने की आवाज उभरी, फिर खामोशी छा गई।
हमलावर शायद समझे थे कि देवा डर गया होगा, जबकि देवा उलटी हुई मेज की आड़ में बैठा सोच रहा था कि अगर उसके विरोधी एक बार फिर लड़ाई शुरू करना चाहते हैं, तो यों ही सही। उसका ख्याल था कि यह नई छेड़छाड़ शुरू करने वाले पूर्वी गैंग के ही लोग थे।
उनके इरादे खतरनाक थे, इसका अन्दाजा देवा का बहुत जल्द हो गया। उसी रात उन लोगों ने देवा के बड़े-बड़े गोदामों पर बम फेंके उसके दो आदमियों को मार डाला था वो दोनों आदमी एक ऐसी गाड़ी में जा रहे थे, जो कभी-कभार देवा के इस्तेमाल में रहती थी, मुमकिन था कि उन्हें देवा के धोखे में ही मार डाला गया हो। देवा यह सबकुछ सुनकर भी परेशान नहीं हुआ था बल्कि उसका खून गर्म हो गया था और दिमाग तेजी से काम करने लगा था। उसने पलटवार की योजना बनानी शुरू कर दी थी।
दूसरे दिन भी वो ग्राउण्ड फ्लोर पर मौजूद था। वो अपनी ताजा योजनाओं के बारे में अपने आदमियों को निर्देश देता घूम रहा था कि उसने मारियो को एक लड़की के साथ लिफ्ट में दाखिल होते देखा था।
मारियो उसका बेहतरीन गन मैन था। वो एक उत्कृष्ठ निशानेबाज होने के साथ-साथ बढ़िया कपड़े पहनने वाला जवान था। जब ऊपर जाने के लिये लिफ्ट का दरवाजा बन्द होने लगा तो देवा को मारियो की साथी लड़की की शक्ल भी नज़र आई थी। देवा की आंखों के सामने जैसे बिजली-सी कौंध गई थी। उसकी कनपटिया सनसनाने लगी थीं, उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा था। उसने आंखें फाड़ फाड़कर एक बार फिर लिफ्ट की तरफ देखा था। मगर उस वक्त तक लिफ्ट का दरवाजा बंद हो चुका था। लिफ्ट ऊपर की तरफ रवाना हो चुकी थी।
"यह ... यह लड़की... जो अभी-अभी मारियो के साथ ऊपर गई है.... क्या... तुम जानते हो वो कौन है?" देवा ने पास खड़े एक प्यादे से पूछा। उसकी आवाज में हल्का-सा कम्पन्न था। वो हकला भी रहा था।
"वो...।" प्यादे ने लिफ्ट की तरफ देखा। उसकी आंखों में अजीब-सी चमक आ गई थी और अनचाहे ही उसने होंठों पर जुबान फेरी थी--- "बड़े...गजब की चीज है। बहुत से लोगों की इस पर नजर थी, लेकिन इसे मारियो ले उड़ा। आजकल वो सिर्फ मारियो के साथ ही नजर आती है।"
"क्या तुम्हें उसका नाम मालूम है ?"
"नाम... हां... हां... उसका नाम नेहा है।"
"हे भगवान...!" देवा के मुंह से सीटी जैसी आवाज निकल गई थी।
"क्या हुआ बॉस, कुशल तो हैं?" प्यादे ने चिंतित लहजे में पूछा था, क्योंकि देवा का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
"हां-हां, सब ठीक है।" देवा ने कमजोर सी आवाज में जवाब दिया था। उसके दिमाग में यादों की आंधी-सी चल रही थी। जब उसकी मां स्टोर चलाती थी और नेहा घर संभाला करती थी और अब शायद उसकी बहन ने जिन्दगी का काफी सफर तय कर लिया था और उसकी जिन्दगी में वो मोड़ आ गया था कि वो मारियो जैसे बदमाश के साथ शायद इस बदनाम होटल के किसी कमरे में जा रही थी।
वो बड़ी हो गई थी। लेकिन शायद उसे मालूम नहीं था कि मारियो कौन था। देवा सोच रहा था। मारियो जैसे मर्दों के लिये तो औरत महज एक खिलौने की हैसियत रखती थी, लेकिन वो मारियो को बता सकता था कि इस बार उसने गलत लड़की पर हाथ डाला था। दुनिया में कोई ऐसा मर्द नहीं था जो देवा उर्फ सुरेन्द्र पाल की बहन को खिलौना समझकर उससे खेल सकता।
“तुमने मारियो को कौन-सा कमरा दिया है?" उसने सीधा डेस्क-क्लर्क से जाकर पूछा।
“छः सौ बारह ।” क्लर्क ने जवाब दिया। फिर हिचकिचाते हुए बोला--- “लेकिन उसके साथ उसकी कोई लेडी गेस्ट भी गई हैं अगर आप उससे मिलने जाना चाहते हैं, तो बेहतर है कि पहले उसे फोन पर खबर कर दें।"
"मैं...उससे मिलने नहीं जा रहा हूं।" देवा गुर्राया और लिफ्ट की तरफ बढ़ गया। आज से पहले उसमें इज्जत और गैरत का अहसास इस तरह नहीं जागा था। शायद पहले उसे मालूम ही नहीं था कि ये चीजें क्या मायने रखती हैं।
उसे यह भी मालूम था कि वो मौत का सामना करने जा रहा है। जरूरी नहीं था कि वो जान लेने में कामयाब हो जाए, उसकी अपनी जान भी जा सकती थी, मारियो इस वक्त शहर का बेहतरीन निशानेबाज और गनमैन था।
लेकिन देवा मौत से नहीं डरता था। उसने पहले भी कई बार मौत का सामना किया था और अब भी मौत का सामना करने के लिये तैयार था। छटे फ्लोर पर देवा लिफ्ट से बाहर निकला था, तो उसका हाथ कोट की जेब में था। धीरे-धीरे कदम उठाता हुआ वो कमरा नम्बर छः सौ बारह के सामने जा रुका था।
उसका दांया हाथ जेब से बाहर आया, उसमें गन थी। बाएं हाथ से उसने दरवाजे की नॉब घुमाने की कोशिश की तो उसे पता चला था कि दरवाजा लॉक्ड था। उसने उसी हाथ से दरवाजा पीट डाला।
"कौन है... क्या काम है ?" अन्दर से मारियो की गुस्सैल आवाज उभरी थी।
“दरवाजा खोलो।" देवा घुटी घुटी-सी आवाज में बोला।
मारियो यकीनन उसकी आवाज नहीं पहचान सका था। वो पहले से भी ज्यादा गुस्से से चीखा था---
"जो भी है, दफा हो जाओ। मैं व्यस्त हूं।"
"मैं सुरेन्द्र पाल हूं...तुम्हारा बॉस...।" देवा दहाड़ा--- "फौरन दरवाजा खोलो। वरना मैं डुप्लीकेट चाबी मंगवाकर दरवाजा खोल दूंगा।"
तब अन्दर खामोशी छा गई थी। फिर कपड़ों की सरसराहट और बहुत धीमी स्त्री स्वर में हंसी सुनाई दी थी, जिसमें एक खास किस्म का खुमार था। देवा दरवाजे के सामने से हटकर दीवार के साथ कमर टेककर खड़ा हो गया।
फिर दरवाजा खुला था और मारियो की क्रोधित आवाज सुनाई दी थी---
"आखिर ऐसी भी क्या मुसीबत आन पड़ी है बॉस ? आपको जो भी बात करनी है, क्या बाद में नहीं कर सकते?"
फिर मारियो थोड़ा आगे आया, क्योंकि वो देवा को देख नहीं पाया था। देवा ने देखा, मारियो के जिस्म पर सिर्फ पतलून थी, बाल बिखरे हुए थे। उसकी हालत उसकी व्यस्तता की कहानी कह रही थी। देवा की आंखों में खून उतर आया।
फिर अचानक मारियो की निगाह देवा पर पड़ी। उसने देवा के हाथ में गन और उसकी आंखों में गुस्से के शोले भड़कते देखे। वो भी कोई सीधा-सादा आम-सा नौजवान नहीं था, मौत की आहट को पहचानता था। उसका हाथ तेजी से पतलून की हिप पॉकेट की तरफ गया। उसकी जेब में यकीनन उसकी गन मौजूद थी। लेकिन उसे गन निकालने का मौका नहीं मिल सका।
“हरामजादे... तुझे इस लड़की पर हाथ नहीं डालना चाहिये था।" कहते हुए देवा उसके शरीर में छः की छः गोलियां उतार चुका था। ऐसी स्थिति में मारियो जैसे आदमी का सामना करते वक्त वो एक पल भी देर का खतरा भी नहीं मोल ले सकता था।
मारियो की आंखें फटी-की-फटी रह गई थीं। उसके ऊपरी धड़ में छः सुराख हो गए थे। जिनमें से खून उबल पड़ा था।
छः फायरों के धमाके कुछ इस तरह उभरे थे कि वो लगभग एक ही धमाके की तरह सुनाई दिये थे, दरो-दीवार हिलकर रह गए थे। मारियो धीरे से फर्श पर ढेर हो गया। उसकी निर्जीव आंखों में आश्चर्य के भाव स्थिर होकर रह गए थे। तभी देवा को अहसास हुआ कि कमरे के अन्दर कोई लड़की डर से चीख रही थी। उसकी चीखों की तेज आवाज ने जैसे देवा की आंखों के सामने से सारी सुर्ख-सुर्ख धुन्ध साफ कर दी थी---उसे होश आ गया हो। जैसे किसी ने उस पर ठण्डा पानी उड़ेल दिया हो। हर चीज उसे साफ नजर आने लगी थी।
वो मारियो की लाश को एक तरफ पांव से खिसकाकर कमरे में दाखिल हुआ तो उसने नेहा को अपने कपड़े संभाले दहशत में खड़े चीखें मारते देखा---उसने सोचा भी नहीं था कि बरसों बाद किसी मोड़ पर छोटी बहन से उसका इस तरह सामना होगा।
“शटअप...!" देवा गुर्राया--- "पुलिस के आने से पहले यहां से फूट जाओ।"
“खूनी... दरिन्दे... तूने उसे मार डाला।" वो रोते हुए बोली। उसने अब चीखना बन्द कर दिया था।
देवा को यह अन्दाजा करके राहत महसूस हुई कि नेहा ने उसे पहचाना नहीं था। उसे खुशी थी कि उसने अपने ही एक जानवर जैसे साथी के हाथों अपनी छोटी बहन की इज्जत लुटने से बचा ली थी।
उसने नेहा को कमरे से निकालने के लिये उसका बाजू थामने की कोशिश की, लेकिन नेहा ने नफरत से उसका हाथ झटक दिया। वो सिसकते हुए बोली---
"मुझे हाथ मत लगाओ कातिल... खूनी... तुमने इसे मार डाला, जो दुनिया में मुझे सबसे ज्यादा प्यारा था।"
नेहा आगे बढ़ी और मारियो की लाश पर जा गिरी। वो पागलों की तरह उसके चेहरे पर हाथ फेर रही थी। उसकी आंखों में आशा की एक क्षीण-सी चमक थी। आंसू गालों पर बह रहे थे। शायद वो सोच रही थी कि किसी चमत्कार से मारियो उठ खड़ा होगा, उसके मुर्दा शरीर में जान पड़ जाएगी।
देवा आश्चर्य और अविश्वास से नेहा की तरफ देख रहा था। उसके लिये यह भी जैसे जिन्दगी का एक नया तजुर्बा था। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि दुनिया में कोई किसी से इतना प्यार भी कर सकता है।
अजीबो-गरीब मनोःस्थिति का शिकार होकर देवा की कनपटियां सनसनाने लगी थीं---उसके दिलो-दिमाग में न जाने कैसे-कैसे जज्बात की कशमकश चल रही थी। उसे यों लग रहा था कि जज्बात की शिद्दत से उसकी नसें फट जाएगी। दिल की धड़कनें बन्द हो जाएंगी। उसने झुककर सख्ती से नेहा का बाजू पकड़कर उसे झटके से उठाया था और बड़ी निर्दयता से उसे दरवाजे की तरफ धकेल दिया था।
“दफा हो जा यहां से।" वो दांत पीसकर बोला--- “इस मामले में अपनी जुबान बंद रखना वरना पछताओगी।”
नेहा ने गर्दन घुमाकर आंसुओं भरी निगाहों से उसकी तरफ देखा और बच्चों की तरह सिसकियां लेते हुए बोली---
“मैं प्रार्थना करूंगी कि....तुम जरूर पकड़े जाओ...और... और तुम्हें फांसी हो जाए।" फिर वो उसी तरह सिसकियां लेती हुई कमरे से निकल गई। उसके सैण्डिलों की खट-खट से देवा को पता चल गया कि वो लिफ्ट से नहीं सीढ़ियों से जा रही थी।
फिर देवा ने आगे बढ़कर फोन का रिसीवर उठाया। जब डेस्क क्लर्क की आवाज सुनाई दी, तो वो बोझिल-से स्वर में बोला---
“मारियो कुछ देर पहले मर गया है। मैं उसके कफन-दफन के इन्तजाम के बारे में बाद में बताऊंगा। अपने तमाम आदमियों को खबरदार कर देना कि जब पुलिस तफ्तीश के लिये आए, तो वो हर बात से अज्ञानता प्रकट करें। अगर यह बात पुलिस को मालूम हो भी जाए कि कोई लड़की मारियो के साथ ऊपर गई थी, तब भी कोई लड़की का नाम न ले। अगर किसी ने लड़की का नाम लिया, तो वो उसे अपने लिये मौत का पैगाम समझे। मेरी तरफ से सबको यह बातें समझा देना।" उसने फोन बंद किया, तो अपने आप को बिल्कुल हल्का-फुल्का महसूस किया। वो एक बार मारियो की लाश के पास पहुंचा और झुककर उसे देखने लगा। अचानक उसके अन्दर एक उबाल-सा उठा। उसने खाली रिवॉल्वर मारियो की लाश पर दे मारा। रिवॉल्वर उछलकर दूर जा गिरा।
फिर वो नीचे आया और अपने ऑफिस में अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर ढेर हो गया।
उसे कुछ अन्दाजा नहीं था कि वो कितनी देर यों ही बैठा रहा। था। फिर उसे अहसास हुआ था कि पास ही कहीं कदमों की धमक उभरी थी और कमरे में शायद कई लोग आ गए थे। देवा ने धीरे से आंखें खोली है। तो ए०सी०पी० जयंत तांब्रे को सामने खड़ा पाया था। तांब्रे के हाथ में रिवॉल्वर था, जिसका रुख देवा की तरफ था।
पहले तो देवा को यह दृश्य धुन्धला-धुन्धला दिखाई दिया था। अभी उसके होशो-हवास सही तौर पर काम नहीं कर रहे थे। इससे पहले उसके हाथों जब भी कोई कत्ल हुआ था, उसकी हालत ऐसी नहीं हुआ करती थी। किसी को कत्ल करने के बाद उसे एक किस्म की फतेह का अहसास हुआ करता था। लेकिन आज....मारियो को कत्ल करने के बाद उसे एक अजीब-सी पराजय का अहसास हो रहा था।
ए०सी०पी० जयंत तांब्रे को अपने सामने खड़े देखकर और उसके हाथ में पकड़े रिवॉल्वर का रुख अपनी तरफ पाकर वो अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आया। उसने देखा, कमरे में और भी कई पुलिस वाले मौजूद थे।
"देवा, आखिरकार आज तुम पकड़े ही गए।" तांब्रे विजेता के से अन्दाज में बोला--- “आज हमने तुम्हें सबूत के साथ पकड़ लिया है। तुमने एक लड़की के चक्कर में ईर्ष्या की वजह से अपने खास आदमी को कत्ल कर दिया।”
देवा सीधा होकर बैठ गया। उसने कहर भरी निगाहों से कमरे में मौजूद पुलिस वालों को घूर-घूरकर देखा। ए०सी०पी० तांब्रे को शायद आशंका हुई कि वो कुछ करने का इरादा रखता है। वो रिवाल्वर को लहराता हुआ बोला----"खबरदार...कोई बेवकूफी मत करना, वरना पछताने का मौका भी नहीं मिलेगा।" जब उसने देखा कि देवा उसी तरह निश्चिंत बैठा हुआ था, तो तांब्रे आगे बोला--- “तुम्हें हमारे साथ जे०सी०पी० के ऑफिस चलना होगा ।"
कमरे में धातु की चीजों के टकराने की खड़खड़ाहटें उभरीं और एक कांस्टेबल हथकड़ियां लेकर देवा की तरफ बढ़ा। देवा हाथ उठाकर गुर्राया---
“मेरे लिये हथकड़ियों की जरूरत नहीं है। तुम मुझे जहां भी ले जाना चाहते हो मैं चलने के लिये तैयार हूं। लेकिन उससे पहले मैं अपने वकील को फोन करके बुलाना चाहता हूं। जो कि मेरा हक है ।"
उसने फोन रिसीवर उठाया, लेकिन एक पुलिसिये ने लपककर उसके हाथ से रिसीवर झपटकर क्रेडिल पर पटक दिया। उसे ऐसा करने के लिये तांब्रे ने इशारा किया था। इस वक्त तांब्रे कुछ ज्यादा ही विजेता के से जोश में भरा दिखाई दे रहा था।
"जे०सी०पी० ऑफिस पहुंचने से पहले तुम किसी को फोन नहीं करोगे।” तांब्रे ने फैसला सुनाया--- “और तुम हाथकड़ियां भी जरूर पहनोगे। तुम जैसे बड़े भाई पर हाथ डालने के मौके हमें बार-बार नहीं मिला करते।"
"मैं तुम्हें हर महीने रकम देता रहा, उसका तुम यह सिला दे रहे हो ?" देवा ने तांब्रे को पूछा।
"कैसी फिजूल बकवास कर रहे हो?" जयंत तांब्रे बिफर कर बोला--- "कैसी रकम...कौन-सी रकम ? मैंने आज तक तुम जैसे किसी भी बदमाश से कोई रकम नहीं ली। अब तुम फंसने लगे हो, तो मुझ पर इल्जाम घड़ने लगे।"
ए०सी०पी जयंत तांब्रे इतनी सफाई से मुकर गया था और इतनी ढिठाई से देवा की आंखों में आंखें डालकर देख रहा था देवा हैरान रह गया। देवा ने और कुछ कहने की कोशिश नहीं की। पुलिस वालों ने आखिर उसे हथकड़ियां लगा दी थीं और उसे अपने घेरे में नीचे ले चले थे।
जब वो रेस्टोरेंट के हॉल के सामने से गुजरे थे, तो वहां गैंग के बहुत-से आदमी खड़े हुए थे। उन्होंने अपने बॉस को हथकड़ियां लगे बहुत से पुलिसवालों के घेरे से बाहर जाते देखा। उनकी आंखों में हैरत...खौफ और अविश्वास सब एक साथ थे। फिर उनकी आंखों में पुलिस के लिये नफरत उभर आई। लेकिन इस वक्त वो कुछ नहीं कर सकते थे ।
देवा को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि आगे उसके साथ क्या होने वाला था। वो बस उदास था ।
वो बाहर पहुंचे, तो वहां फुटपाथ के साथ पुलिस की कई गाड़ियां लगी खड़ी थीं और होटल के सामने छः पुलिस वाले यों मशीनगनें लिये खड़े थे, जैसे कोई किला फतेह करने वहां आए हों। यह बात सच है कि खुद पुलिस भी यह कदम उठाते हुए डर रही थी, इसीलिये इतनी ज्यादा फोर्स और इतने ज्यादा हथियार लेकर आए थे।
देवा सोच रहा था कि किसी ने उस वारदात के बारे में मुखबरी की थी आखिर पुलिस इतनी भारी तादाद में...इतनी जल्दी कैसे आ धमकी थी? लेकिन किसने मुखबरी की थी कि मारियो के कत्ल में फौरन किस पर हाथ डाला जा सकता है?
'बहरहाल... वो जो कोई है, उसे अपनी इस हरकत का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।' देवा ने दिल ही दिल में सोचा।
जे०सी०पी० कैलाश पंवार के ऑफिस में पहुंचकर देवा को वकील महेश के कमरे में ले जाया गया, जो पंवार का असिस्टेंट भी था। इसके साथ-साथ वो कैलाश पंवार के लिये हफ्ते जमा करने का काम भी करता था। देवा उसके हाथों अब तक कैलाश पंवार के लिये लाखों रुपये कैश भिजवा चुका था। लेकिन इस वक्त महेश के चेहरे पर भी अजनबियत और परायापन नजर आ रहा था।
“हां तो देवा, क्या तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?" महेश ने सपाट लहजे में पूछा।
“नहीं।” देवा ने जवाब दिया--- “क्या तुम मुझे बेवकूफ समझते हो कि मैं अपनी सफाई पेश करने की कोशिश करूंगा। मुझे मालूम है कि इस वक्त मैं अपनी सफाई में जो कुछ कहूंगा, उस पर कितना यकीन किया जाएगा ?"
"बहुत खूब...! बहुत अक्लमंद आदमी हो।" महेश का लहजा अब भी शुष्क था।
"हाँ, मैं अकेले में जरूर तुमसे बात करना चाहूंगा।" देवा ने भी शुष्क लहजे में कहा।
महेश ने कुछ सेकेण्ड सोचा, फिर पुलिस वालों से बोला---
"तुम लोग बाहर जाओ और जब तक मैं न बुलाऊं, कोई अन्दर न आए।" कहते हुए उसने अपना सर्विस रिवॉल्वर निकालकर अपने सामने मेज पर रख लिया था--- "जरा-सी भी गलत हरकत का नतीजा तुम्हारी मौत होगा।"
देवा गुस्से से गुर्राकर रह गया था। फिर नफरत से बोला--- “तुम जैसे कमीनों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?"
महेश ढिठाई से मुस्कराकर बोला---"अगर तुम मेरे हाथों मारे गए, तो सरकार बहुत सारे खर्चा और सिरदर्दी से बच जाएगी। उसे तुम्हारे ऊपर अदालती कार्रवाईयां और तुम्हें फांसी के तख्ते तक पहुंचाने का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।”
"तुम मुझे सजा नहीं दिला सकते।" देवा ने हिकारत से कहकहा लगाकर कहा।
“क्यों नहीं दिलवा सकते ?" महेश ने त्यौरी चढ़ाकर पूछा था--- “जे०सी०पी० साहब तो इस बार तुम्हें सजा दिलवाने पर तुले बैठे हैं। तुम्हारे खिलाफ सरकारी वकील का फर्ज भी मुझे ही निभाना पड़ेगा ।"
"इससे तुम्हें क्या फायदा होगा?" देवा ने कुछ आश्चर्य से पूछा था--- "अगर मैं मर गया तो गैंग बिखर जाएगा तुम्हारी ढेरों ऊपर की कमाई का जरिया खत्म हो जाएगा। क्या अब तुम्हें मेरी ऊपरी कमाई की परवाह नहीं रही ?"
"अगर तुम्हारा गैंग खत्म हो जाएगा, तो इस बड़े शहर में दो-तीन गिरोहों की गुंजाईश निकल आएगी। उनसे हमें और भी ज्यादा आमदनी होगी। हमारी ऊपरी कमाई खत्म नहीं होगी बल्कि उसमें और ज्यादा बढ़ोत्तरी हो जाएगी।"
"इससे अच्छा क्या यह नहीं रहेगा कि मैं ही तुम्हारी मासिक रिश्वत को बढ़ा दूं?" देवा ने कहा--- “इतने लम्बे लफड़े की जगह तुम आसान तरीका चुन सकते हो।"
"अब हम सरकारी लोगों का विचार यह है कि किसी एक गैंग को ज्यादा ताकत न पकड़ने दी जाए। तुम पहले ही हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा ताकतवर बन चुके हो। तुम्हारा मामला हमें हाथों से निकलता दिखाई देने लगा है। इससे पहले कि तुम और तुम्हारा गैंग पूरी तरह ही हमारे हाथ से निकल जाए, हम तुम्हारा सिर कुचल देना चाहते हैं। इसका सुनहरा मौका इस वक्त हमें मिल गया है। तुम्हारी जगह दो-तीन छोटे-छोटे गिरोहों को मौका देना हमारे लिये बेहतर होगा क्योंकि उन्हें आसानी से कण्ट्रोल किया जा सकेगा।” महेश ने बड़े इत्मीनान से अपने इरादे और कूटनीति बता दी थी। वो सरकारी प्रतिनिधि था और एक प्रकार से “भीतरी" सरकारी कार्यनीति का ही वर्णन कर रहा था। देवा उसके इस तरह इत्मीनान से ये सब कुछ कह देने से हैरान रह गया था।
तभी देवा के अन्दर से उसका स्वाभाविक क्रोध और आक्रोश उमड़ पड़ा था। उसके दिलो-दिमाग में आंधियां-सी चलने लगी थीं। जब वो बोला था, तो उसके लहजे में बला की ठण्डक और क्रूरता थी---
"मिस्टर महेश... माननीय सरकारी वकील, कान खोलकर मेरी बात सुन लो। अगर तूने मुझे सजा दिलवाने की कोशिश की, तो तू और तेरा वो रिश्वतखोर बॉस बहुत पछताओगे।” उसने एक-एक शब्द को नफरत से चबा-चबाकर कहा था ।
“तुम....तुम मुझे धमकी दे रहे हो?" महेश ने गुस्से से कहा था।
"नहीं। मैं तुम्हें एक मूर्खता से दूर रखने की कोशिश कर रहा हूं।" देवा ने ठहरे हुए स्वर में कहा--- “मुझे सजा दिलवाने की तुम्हारी कोशिश कामयाब नहीं होगी। तो असफलता तुम्हारे सर्विस रिकॉर्ड पर एक काले धब्बे के रूप में दर्ज होगी और पूरे अण्डरवर्ल्ड तथा पुलिस, कचहरी में बरसों तक तुम्हारा मजाक उड़ाया जाता रहेगा।"
“यह तुम्हारी खुशफहमी है कि हम नाकाम रहेंगे। तुम्हें सजा दिलवाने के लिए एक ही गवाह काफी है।"
"कौन-सा गवाह?" देवा ने धड़कते दिल से पूछा था।
“वही लड़की, जिसने हमें इस कत्ल के बारे में तुरन्त सूचना दी थी और जिसकी खातिर तुमने मारियो को कत्ल किया था। वो सरकारी गवाह बनने के लिये तैयार है।"
“कौन लड़की?” देवा ने चौंककर कहा।
"नेहा चौहान ।"
महेश ने इत्मीनान से जवाब दिया था और देवा के दिमाग में जबर्दस्त धमाका हुआ था। महेश बात जारी रखते हुए बोला---
"उस लड़की की खातिर तुमने प्रतिद्वन्द्विता का शिकार होकर मारियो को कत्ल कर दिया और वही तुम्हारी गिरफ्तारी की वजह बन गई। अब उसी की वजह से तुम फांसी पर भी चढ़ोगे। यह कोई नई बात नहीं है। अक्सर बड़े-बड़े गैंगस्टर और डाकू किसी औरत की वजह से ही तबाही का शिकार होते रहे हैं। बड़े-बड़े आतंकियों की बर्बादी की वजह भी औरत ही बनती रही है। किसी-न-किसी औरत ने ही उन्हें मौत के मुंह में पहुंचाया है।"
देवा स्तब्ध बैठा उसकी बातें सुन रहा था। मुश्किल यह थी कि वो महेश की बातों का खण्डन भी नहीं कर सकता था और उसे असल बात भी नहीं बता सकता था। अभी वो उस रहस्योद्घाटन के सदमे से ही उभर नहीं पाया था कि महेश ने एक बार फिर उसके दिमाग पर बिजली-सी गिरा दी थी। वो कुछ सेकेण्ड रुककर बोला---
“तुमने खामखा बेचारे मारियो को कत्ल किया---तुम्हें उसको अपना मुकाबलेबाज भी नहीं समझना चाहिये था, क्योंकि मारियो पिछले हफ्ते ही कोलाबा के एक चर्च में उस लड़की से शादी कर चुका था।"
देवा के लिये यह बात और भी ज्यादा अविश्वसनीय थी। वो मारियो को अच्छी तरह जानता था। वो एक हरजाई भंवरा था और हर कली पर मंडराने का आदी था। लेकिन महेश जैसे आदमी की सूचना भी गलत नहीं हो सकती थी।
वो सोच रहा था कि अगर महेश की सूचना सही थी, तो जिन्दगी में पहली बार मारियो ने स्थिर मिजाजी और शादी जैसी जिम्मेदारी का बोझ उठाने की शुरुआत की थी। मगर उसने पहले ही पड़ाव पर उसे मौत के मुंह में पहुंचा दिया था।
इस तरह उसने किसी हद तक सीधी राह की तरफ पलटने वाले एक आदमी को ही कत्ल नहीं किया था बल्कि अपनी सगी बहन का सुहाग भी उजाड़ डाला था। उसकी मोहब्बत की दुनिया बर्बाद कर दी थी।
"हे भगवान... यह मैंने क्या कर दिया?" देवा ने दिल ही दिल में अफसोस से सोचा अब कुछ नहीं हो सकता। जो कुछ हो चुका है, उसकी भरपाई का कोई तरीका नहीं है। और इसकी प्रतिक्रिया मुझे तबाह कर देने का इशारा रखती है, तो इसमें उस बेचारी का कोई कसूर नहीं है।"
देवा की आंखें धुन्धलाई जा रही थीं और उसका दिमाग चकरा रहा था। उसी हालत में उसे हवालात में पहुंचा दिया गया।
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