देवा ने सिर उठाकर देखा। वो चूहे जैसी शक्ल वाला एक लड़का था। मायूस खड़ा था, उसे देवा अच्छी तरह पहचानता था।

उसने सलवटों-भरे मैले-कुचले से कपड़े पहन रखे थे। सिर पर चार खाने वाले कपड़े की टोपी-सी होती थी।

"क्या बात है ?" देवा ने रूखे स्वर में पूछा।

"हम कुछ लड़कों का दो-चार पेट्रोल पम्पों को लूटने का प्रोग्राम है। तुम साथ चलना चाहोगे ?” लड़के ने उसी बैठी-बैठी और खुरदरी-सी आवाज में पूछा।

"नहीं।" देवा ने जवाब दिया।

"लूट का माल सब लोगों में बराबर-बराबर बांटा जाएगा।" लड़के ने मुस्कराते हुए जैसे सबसे आकर्षक पहलू की तरफ ध्यान दिलाया हो। उसके पपड़ी जमे होंठों के पीछे से पीले-पीले दांत झांकने लगे थे।

"मैं चोरी जैसी छोटी-मोटी वारदातों में कोई दिलचस्पी नहीं लेता । दो-चार हजार रुपये के लिये जेल जाने का रिस्क नहीं ले सकता।" देवा के लहजे में रूखाई कायम थी।

"मैं दो-चार हजार रुपये की बात नहीं कर रहा हूं।” लड़के ने उसकी दिलचस्पी जगाकर उसे राजी करने की कोशिश जारी रखी--- "अक्सर पेट्रोल पम्प पर हर वक्त पचास-साठ हजार रुपये तो होते ही हैं। हम डाका डालने वाले सिर्फ चार लड़के होंगे। इसलिये हर एक के हिस्से में अच्छी-खासी रकम आ जाएगी।"

"जब मैं एक बार इन्कार कर चुका हूं तो तुम मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ते?" देवा ने लड़के को घूरा--- “क्या मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आती? इससे पहले कि मैं घूंसा मारकर तुम्हारी नाक चपटी कर दूं, दफा हो जाओ यहां से ।” देवा का लहजा किसी दरिन्दे की गुर्राहट जैसा था। सूखा, सड़ा लड़का फौरन ही वहां से खिसक लिया। वो कुछ बड़बड़ा रहा था।

गेम हॉल में ज्यादातर जिस किस्म के लड़कों का आना-जाना था उनके लिये देवा किसी पहेली से कम नहीं था। वो एक-दूसरे से बिल्कुल बेतकल्लुफ थे और आने वालों लड़कों से भी जल्दी घुल-मिल जाते थे। लेकिन देवा के ज्यादा करीब जाने की और उससे बेतकल्लुफ होने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ती थी। उन्हें लगता था कि वो अलग किस्म का ही प्राणी है। देवा को भी वो सब अपने आपसे से बिल्कुल अलग लगते थे और उसके दिल में भी उनसे घुलने-मिलने की इच्छा पैदा नहीं होती थी। कोई मस्तिष्क विशेषज्ञ अगर जांच करता तो यही नतीजा निकलता कि दोनों पक्षों के दरम्यान गहरी मानसिक खाई मौजूद थी। एक खास फर्क यही था जंगल में आमतौर पर उन दरिन्दों के गोल निकलता है वो एक दरिन्दा उनकी सरदारी कर रहा होता है। बाकी सब निष्ठा से उसका अनुमान करते हैं। उसके पीछे-पीछे चलते हैं। देवा और दूसरे लड़कों में यही फर्क था। सरदारी या लीडरशिप शायद देवा की मंजिल थी, वो भीड़ में भीड़ का एक अंग बनकर शामिल होने के लिये तैयार नहीं था।

इलाके के बेशुमार लड़के अक्सर रात के वक्त अपनी अपराधिक गतिविधियों में व्यस्त रहते थे लेकिन वो सभी इतनी अक्लमंदी जरूर करते थे कि वो अपने मोहल्ले में या आस-पास की गलियों में वारदातें नहीं किया करते थे। अपने मोहल्ले में वो अपनी बड़ी अच्छी साख बनाकर रहते थे। इसलिये अगर वो कभी आस-पास कहीं वारदात करते पकड़े भी जाते थे तो उनके इलाके का बुलडॉग जैसा नेता पैसा देकर खुद उन्हें छुड़ाने थाने पहुंच जाता था। वो गवाही देता था कि वो सभी बड़े शरीफ बच्चे हैं।

यह शरीफ बच्चे अपने नेता का अहसान उतारना नहीं भूलते थे। जब कभी भी इलाके में कोई इलैक्शन होता था तो ये सभी “शरीफ बच्चे" न सिर्फ खुद बीस-बीस फर्जी वोट डालते थे बल्कि इलाके के घरों में जाकर नीची आवाज, मगर खरतनाक लहजे में बताते थे कि अगर उन्होंने उनके नेता को वोट नहीं दिया तो कभी रात के वक्त किसी हादसे में उनकी टांगें भी टूट सकती हैं। इसलिये शरीफ बाल-बच्चेदार लोग उनकी हिदायत पर वोट दे आया करते थे। हालांकि उन्हें मालूम होता था कि वो जिसे वोट दे रहे हैं वो एक नंबर का गुण्डा और बदमाश है। लेकिन यह सिलसिला यूं ही चलता आ रहा था।

मगर देवा कभी उन लड़कों की सरगर्मियों में शरीक नहीं हुआ था। कभी भी वो लूट के माल के लालच में नहीं आया था। वो तो इस किस्म के लड़कों की सरदारी करते हुए कोई बड़ा काम करना चाहता था।

कभी-कभी तो देवा गंभीरता से सोचने लगता था कि उसे सियासी लीडर बनने के लिये संघर्ष शुरू कर देना चाहिये। उसके पास बड़ा काम करने के मौके भी थे और बड़ी वारदातें करने के भी।

उसके जेहन में लीडरशिप, ताकत और दौलत की जबर्दस्त तलब थी। इन चीजों के लिये वो अपने अन्दर एक अजीब-सी प्यास महसूस करता था। क्योंकि उसने अभी अपनी तलब पूरी करने के लिये कोई बाकायदा जद्दो-जहद नहीं शुरू की थी, न ही कोई ऐसी नौकरी करता था, न अपने सफर की शुरूआत की थी, न ही उसकी कमाई का कोई साधन नजर आता था।

इसके बावजूद वो हमेशा अपने जैसे लड़कों से बेहतर हुलिये में नजर आता था। उसके कपड़े उनसे बेहतर होते थे और छोटी-मोटी जरूरतें पूरी करने के लिये उसके पास पैसे भी होते थे। वो न तो किसी के सामने हाथ फैलाता था, न किसी से उधार मांगता था। उसके हमउम्र लड़कों के लिये यह मामला बड़ा रहस्यमय था, लेकिन वो इस पहेली का हल नहीं कर पाते थे। देवा खुद अपने मामलों में किसी के सामने जुबान नहीं खोलता था।

अचानक गेम्स हॉल के दरवाजे पर कुछ गड़बड़ी हुई थी, फिर लम्बे-लम्बे कुछ लोग अन्दर आ गए थे ।

उन्हें देखकर वहां मौजूद कई लड़कों ने पिछले दरवाजे में से खिसक जाने के लिये उधर का रुख किया था। लेकिन जब उन्होंने पिछला दरवाजा खोला था तो उस तरफ भी बाहर उन्होंने इसी तरह के कुछ लोगों को खड़े पाया था। दरवाजा खुलते ही वो अन्दर आ गए थे।

ये दरअसल क्राईम ब्रांच के सादा लिबास वाले पुलिसिये थे और सावधानी के तौर पर गेम्स-हॉल का जायजा लेने आए थे। कभी-कभार वो इस तरह अचानक वहां आ धमकते थे।

कभी किसी वारदात में सन्देह के तौर पर उन्हें किसी लड़के की तलाश होती थी और कभी वो यह देखने आ जाते थे कि वहां किसी फसाद या वारदात की तैयारी तो नहीं हो रही थी।

देवा चूंकि सन्तुष्ट था कि क्राईम ब्रांच को किसी भी सिलसिले में उसकी तलाश नहीं हो सकती थी। इसलिये वो सुकून से अपनी जगह बैठा रहा था। उसके होंठों पर गुप्त-सी मुस्कराहट थी। जासूस इधर-उधर लड़कों का जायजा लेते फिर रहे थे।

कई लड़कों से सवाल भी पूछे जा रहे थे और कईयों की जेबें थपथपाकर देखा जा रहा था कि उन्होंने कोई हथियार तो नहीं छुपा रखा। कईयों को उन्होंने थप्पड़ भी रसीद कर दिये थे।

गेम हॉल के वातावरण में पहले तो सिर्फ सिगरेट का धुआं भरा पड़ा था। अब वहां खौफ और तनाव भी फैल गए थे।

ऐसे में देवा की निर्लिप्तता दर्शनीय थी। वो होंठों पर गुप्त-सी मुस्कराहट लिये उधर खुली आंखों से यह सारी कार्यवाई देख रहा था। जैसे जो कुछ हो रहा था वो उसके लिये का खड़े हों।

फिर एक जासूस देवा की तरफ भी बढ़ा था, मगर उसका साथी बोल पड़ा---

"यह लड़का सही है... यह शंकर चौहान का भाई है।"

देवा ने कहने वाले जासूस को पहचान लिया था। वो डिटेक्टिव सावंत था और करीबी पुलिस स्टेशन में तैनात था। वो देवा के बड़े भाई शंकर का हवाला दे रहा था जो खुद भी एक पुलिस ऑफिसर था।

देवा की तरफ बढ़ने वाला डिटेक्टिव सर्द लहजे में बोला---

"अगर यह शंकर चौहान का भाई भी है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है ?" वह एक रूखे चेहरे वाला भारी-भरकम आदमी था जिसके लहजे से बेलिहाजी और सख्ती टपकती थी। देवा ने अन्दाजा लगाया कि वो पुलिस हैडक्वार्टर से था।

उसके साथ चलने वाले सावंत ने नर्मी से कहा---

“हां। फर्क तो कोई नहीं पड़ता। लेकिन इस बात से पड़ता ही है कि हमने कभी इसके किसी गड़बड़ में शामिल होने की खबर नहीं सुनी। इस इलाके में या किसी और इलाके में होने वाली किसी भी वारदात में कभी इसका नाम नहीं सुनने में आया। यह सबसे अलग-थलग रहता है और अपने काम से काम रखता है।"

"मेरे बारे में अच्छी राय रखने का शुक्रिया।" देवा ने मुस्कराते हुए कहा--- "मुझे तुम्हारे इस तरह सच बोलने से इतनी खुशी हो रही है कि मेरा जी चाहता है कि मैं तुम्हारे और तुम्हारे साथी लड़कों के लिये बढ़िया सिगरेट खरीदकर पेश करूं।"

उसने पुलिस वालों के लिये इस तरह "लड़कों" शब्द का इस्तेमाल किया था जैसे वो खुद कोई बुजुर्ग आदमी हो, जबकि हकीकत बिल्कुल इसके विपरीत थी। वो खुद लड़का था और क्राईम ब्रांच वालों में ज्यादातर अधेड़ उम्र थे।

उस पर वो सब हँस दिये थे और उनके चेहरों पर फैला हुआ तनाव छंट गया था। माहौल एकदम हल्का-फुल्का हो गया था।

देवा कुछ ऐसे अन्दाज में अपनी जगह से उठा जैसे कोई जज किसी अहम मुकदमे का फैसला सुनाकर अपनी बेंच समेत उठ रहा हो और अदालत बर्खास्त कर रहा हो।

गेम हॉल के दरवाजे के पास एक छोटी-सी दुकान थी जहां पर जरूरत की बहुत-सी चीजें मिल जाती थीं। देवा ने वहां से बढ़िया किस्म की सिगरेटें खरीदकर सबको एक-एक सिगरेट पेश की थी, जो उन्होंने खुशी-खुशी कबूल कर ली थीं।

उसके बाद वो देवा को “गुड नाईट” कहकर रुख्सत हो गए थे ।

देवा को बहुत पहले पुलिस वालों की नजरों में अपनी साख अच्छी रखने के फायदे मालूम हो चुके थे। इसके अलावा उसे यह भी अन्दाजा हो चुका था कि उन लोगों की सेवा में छोटी-मोटी चीजें पेश करने का असर भी जादू की तरह होता है। सिगरेट जैसी मामूली चीज भी किसी पुलिसिये का मूड ठीक कर सकती थी। इस तरह उन पर अहसान का हल्का-सा बोझ डाला जा सकता था। देवा खुद किसी का अहसान नहीं लेता था। अगर कोई जबर्दस्ती उस पर अहसान कर भी देता था तो वो उससे भी बड़ा अहसान करने की कोशिश करता था।

इस कम उम्र में भी उसको इन बातों की समझ थी। वो काफी हद तक किसी शातिर सियासतदान की तरह सोचता था।

क्राईम ब्रांच वाले जा चुके तो अचानक देवा को अहसास हुआ था कि गेम हॉल के घुटनभरे वातावरण में फैल धुएं ने उसके सिर में दर्द पैदा कर दिया है। उसने फैसला किया कि अब उसे घर चले चलना चाहिये।

वो गेम हॉल से बाहर आया तो उसने देखा कि चारों तरफ, वीरानी फैल चुकी थी। कहीं-कहीं सिर्फ गेम हॉल जैसी जगहों पर जिन्दगी का अहसास हो रहा था। वर्ना ज्यादातर जगहों पर सन्नाटा और अन्धेरा पसरा पड़ा था। स्ट्रीट लाईटें एक-दूसरे से काफी फासले पर थीं। उनकी रोशनी भी न होने के बराबर ही थी।

उस रात बारिश नहीं हुई थी, मगर चारों तरफ एक नमी बसी हुई थी। इस इलाके की गलियां तंग और इमारतें पुरानी तथा जर्जर थीं और उनकी निचली मंजिल की खिड़कियां तख्ते लगाकर बंद कर दी गई थीं। इमारतों के वजूद पर ये खिड़कियां अन्धे की आंखों की तरह नजर आती थी।

एक गली ऐसी थी जिसमें फल, सब्जियां और जिन्दगी की जरूरतों की अन्य चीजें ठेलों पर बेची जाती थीं। इस वक्त वहां प्लास्टिक के खाली क्रेट, रद्दी, कागज, फलों और सब्जियों के छिलकों के साथ-साथ न जाने क्या-क्या गन्दगी फैली पड़ी थी। वहां बदबू उठ रही थी। कभी-कभार कोई गाड़ी मुश्किल से गुजरती दिखाई दे जाती थी।

इन गलियों का माहौल बड़ा अजीब था। उजाले के बावजूद वहां खतरे का अहसास होता था। अगर कोई अजनबी इन गलियों से गुजरता था, तो वो बार-बार खौफ से पलट-पलट कर इधर-उधर देखता चलता था और जरा-सी आहट पर उछल पड़ता था। हर कदम पर ऐसा लगता था जैसे अन्धेरे में कोई घात लगाए बैठा हो और जर्जर दीवारों में से छुपी आंखें हर आने-जाने वाले का जायजा ले रही हों। और ये सब भ्रम नहीं थे, सचमुच ऐसा होता भी रहता था। ज्यादातर ऐसे ही इलाकों से मुजरिमों के गिरोह उभरते थे। फैलते थे, संगठित होते थे, ताकत बटोरते थे और फिर अपनी हुकूमत कायम कर लेते थे । यही इलाके उनकी शिकारगाहें भी होती थीं।

देवा वाला इलाका भी ऐसा ही था। उसने यहीं आंख खोली थीं, यहीं परवरिश पाई थी और यहीं पर उसका नौजवानी का नाजुक दौर गुजर रहा था।

यह माहौल क्या था जैसे एक सांचा था, जिसमें धीरे-धीरे देवा की शख्सियत ढल रही थी और उसे इसका अहसास भी नहीं था।

देवा निसन्देह तेज और तर्रार था। मगर परवरिश की इन पेचीदगियों को समझने में असमर्थ था। व्यवस्था की बारीकियों को समझने में अक्षम था। उसे नहीं मालूम था कि आसपास के माहौल में जिन्दगी उसके लिये कौन-सी राहें निश्चित कर रही थीं।

तकदीर उसे धीरे-धीरे महसूस न होने देने वाले ढंग से किस तरफ ले जा रही थी।

वो उस ग्रासरी स्टोर के सामने से गुजरा, जो उसके बाप की प्रोपर्टी थी। उसकी ऊपरी मंजिल पर वो रहते थे।

देवा इमारत के सामने से गुजरकर पिछली तरफ पहुंचा। स्टोर बहुत देर पहले बंद हो चुका था। सीढ़ियों का दरवाजा बंद था। उसमें ताला लगा हुआ था।

अपनी चाबी से देवा ने ताला खोला था और गंदी, असमतल सीढ़ियां चढ़कर वो ऊपर पहुंचा था। उस कमरे में रोशनी थी जो सबसे ज्यादा काम आता था। खाना भी वहीं खाया जाता था। वो एक तरह का लाऊंज कहा जा सकता था।

देवा ने देखा उसका बड़ा भाई शंकर चौहान वहां मौजूद था, वो एक पुरानी और मरम्मत की गई कुर्सी पर बैठा अखबार देख रहा था। पुलिस की वर्दी अभी उसके जिस्म पर ही थी। उसने भारी जूते समेट एक तिपाई पर टिका रखे थे। उसका रिवाल्वर होलस्टर और गोलियों की बेल्ट दूसरी पुरानी कुर्सी की बैक पर पड़े हुए थे। उन पर उसकी पुलिस वर्दी पड़ी हुई थी।

देवा कमरे में आया था तो शंकर ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा था। शंकर एक गठे हुए जिस्म वाला नौजवान था, उसकी उम्र पच्चीस के करीब थी, उसके मजबूत जबड़ों और जलते-जलते होंठों से एक अजीब-सी खुदगर्जी और क्रूरता का अहसास होता था। कभी-कभी शंकर चौहान की आंखों में अजीब-सी चमक उतर आती थी। न जाने क्यों देवा को लगता था कि एक पुलिसिये के तौर पर उसके भाई का भविष्य बहुत उज्ज्वल था। लेकिन उसने यह बात कभी किसी से कही नहीं थी।

वैसे देवा के ख्याल में पुलिस वालों और मुजरिम गिरोह वालों में सिर्फ इतना ही फर्क था कि पुलिस वाले वर्दी में होते थे और उनके सीनों पर एक नेम प्लेट लगी होती थी। आमतौर पर दोनों एक ही जैसे इलाकों में जन्म लेते थे। एक जैसी ही शिक्षण संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त करते थे। उनकी आदतें और समस्याएं भी मिलती-जुलती होती थीं।

लेकिन फिर न जाने जिन्दगी में किस मोड़ पर उनकी राहें जुदा हो जाती थीं। एक पुलिस वाला बन जाता था और दूसरा किसी जरायमपेशा गैंग में जा मिलता था। अगर मुजरिम के पास पुलिस को देने के लिये रोकड़ा होता था, तो दोनों की बनी रहती थी।

"इतनी देर से घर आ रहे हो देवा। कहां थे अब तक ?" सब-इंस्पैक्टर शंकर चौहान ने तेज लहजे में पूछा।

"तुम्हें इससे मतलब ?” देवा ने भी आक्रामक लहजा अपनाया। फिर उसे अचानक याद आ गया कि उसको तो अपने बड़े भाई से एक काम लेना था। वो फौरन नर्म पड़ते हुए बोला था--- "मेरे सिर में सख्त दर्द रहा है इसलिये मैं जरा चिड़चिड़ा हो रहा हूं। तुम ख्याल न करना।"

“मेरे ख्याल में तो तुम इस वक्त गेम्स हाल से आ रहे हो?" शंकर बोला।

"शाम के वक्त इन्सान को तफरीह के लिये कहीं जाने की जरूरत महसूस होती है।" देवा ने जैसे बड़े भाई को समझाने की कोशिश की--- "इस इलाके में तफरीह की दूसरी जगह तो क्लब ही है जहां घटिया औरतों की भीड़ लगी रहती है।"

“ओहो--तो साहब को अब घटिया और बढ़िया औरतों के बीच का फर्क भी पता चल गया है, और तुम्हारे इतने नखरे भी हो गए कि तुम घटिया औरतों के पास जाना भी पसन्द नहीं करते।" शंकर के लहजे में व्यंग्य था ।

“हां। मैं हर मामले में स्टैंडर्ड का कायल हूं।" किशोर देवा ने जवाब दिया। उसके चेहरे पर बुजुर्गी जैसा रौब था।

“खैर... यह तो तुम्हारी समझदारी है।" शंकर के चेहरे पर गुप्त-सी मुस्कराहट थी--- "इन्सान को इतनी तेजी से कोई और चीज तबाह नहीं करती जितनी तेजी से एक घटिया औरत करती है ।" उसके चेहरे पर पैदा होने वाली नर्मी और मुस्कराहट कुछ क्षण के लिये ही बरकरार रही थी। फिर वो पहले की तरह ही संजीदा नजर आने लगा था और चेहरे पर सख्ती भी तैर आई थी। एक झटके से उसने पांव तिपाई पर से उतारकर फर्श पर रखे और आगे की तरफ झुकते हुए छोटे भाई की आंखों में आंखें डालकर सख्त लहजे में बोला---

"और हां। मैंने सुना है कि तुम हैरी को कुछ पैकट पहुंचाने का काम कर रहे हो। यह क्या किस्सा है देवा ?"

"हां। अगर मैं हैरी को पैकेट पहुंचा रहा हूं, तो क्या प्रॉब्लम है?"

"क्या तुम्हे मालूम नहीं है कि उन पैकेटों में ड्रग्स होती है?" शंकर गुर्राया ।

"नहीं। मुझे तो मालूम नहीं था।" देवा ने सादगी और मासूमियत से जवाब दिया--- "लेकिन अब तुमने बता दिया है तो मैं अपने पैसे बढ़ा लूंगा। कमीने हैरी ने मुझे बताया ही नहीं, यह तो खतरनाक काम है, मैं इसे मामूली काम समझकर मामूली-से पैसों पर ही कर रहा था।"

"मैं तुम्हें इसलिये यह बात नहीं बता रहा हूं कि तुम मुआवजे में इजाफा कर दो।" शंकर कड़क कर बोला--- “मैं यह कहना चाहता था कि तुम मेरे मेरे भाई हो, ऐसे चक्करों में न पड़ो।"

“मैं समझ गया।” देवा ने सोचते हुए सिर हिलाया--- “तुमसे किसी पुलिस वाले ने इस सिलसिले में शिकायत की होगी। वो खुद यह काम करना चाहता होगा। तुम उससे कह दो, वो यह काम पकड़ ले, मुझे कोई ऐतराज नहीं। मैं कोई और काम तलाश कर लूंगा। मेरे लिये कामों की कोई कमी नहीं है।"

"हां। यह तो मुझे मालूम है कि तुम्हारे पास इस किस्म के कामों की कोई कमी नहीं है।" शंकर शुष्क लहजे में बोला--- “मैंने यह भी सुना है कि तुम माईकल के जुएखाने में गार्ड का भी काम करते हो?"

“हां। और मैं क्यों न करूं? चार पैसे कमाने के ये काफी हद तक शरीफ तरीके हैं। क्या तुम चाहते हो कि मैं इलाके के और बहुत-से लड़कों की तरह पेट्रोल पम्पों या दुकानों को लूटा करूं?”

"हरगिज नहीं। मैं ऐसा हरगिज नहीं चाहूंगा।" शंकर ने गहन गंभीर स्वर में कहा--- "मैं तुम्हें खबरदार कर रहा हूं देवा, कभी किसी संगीन मामले में पुलिस के हत्थे न चढ़ जाना। इससे पुलिस हैडक्वार्टर में मेरी साख तबाह हो जाएगी। मैं अपने अफसरों को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगा।"

"मेरी तरफ से तुम बेफिक्र रहो।" देवा के लहजे में हल्की-सी तलखी थी--- "मैं ऐसी कोई बात नहीं करूंगा जिससे तुम्हारी इज्जत या साख पर बट्टा लगे। तुम्हारी नाक कटवाने के लिये तो तुम्हारी अपनी हरकतें ही काफी हैं। अगर तुम्हारी हरकतें किसी की नजर में आ गईं तो तुम्हारे लिये बड़ी समस्या हो जाएगी। तुम्हें खुद बहुत होशियार रहने की जरूरत है।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" शंकर तेजी से बोला ।

"कुछ भी नहीं।" देवा ने मुस्कराकर जवाब दिया। देवा ने महसूस कर लिया था कि शंकर की आंखों और लहजे में हल्का खौफ झलक आया था। देवा दिल ही दिल में उसकी इस कैफियत से आनन्द उठाते हुए बोला--- “यह एक दोस्त की तरफ से इशारा है। एक ऐसे दोस्त की तरफ से, जिसके बारे में तुम समझते हो कि वो कुछ नहीं जानता। मगर वो सबकुछ जानता है।"

"कौन है वो दोस्त?" शंकर की आवाज अचानक कुछ बैठ गई थी।

“मैं ।” देवा ने जवाब दिया और सिगरेट फर्श पर फेंककर जूते से मसल दी। एक-दो पल बाद देवा मुस्कराते हुए बोला--- “एक बात बताओ शंकर, क्या कल रात के लिये तुम अपनी कार मुझे उधार दे सकते हो ?"

"नहीं, कल रात मुझे खुद कार की जरूरत है। कल मेरी छुट्टी है। तुम्हें मालूम है कि जब मुझे ड्यूटी पर न जाना हो तब मुझे निजी कार की ज्यादा जरूरत पड़ती है।" शंकर ने जवाब दिया था।

“चलो... परसों रात दे देना।" देवा ने कहा।

“मैं तुम्हें अपनी कार दे ही नहीं सकता। तुम अभी कम उम्र हो और कम उम्र लड़कों को कार उधार देना मुसीबत मोल लेना है।” शंकर ने नम्र लहजे में कहा।

"अच्छा ठीक है।" देवा ने सिर हिलाया--- "मैं अट्ठारह साल का हूं, जल्दी ही मैं अपनी खुद की कार खरीद लूंगा और इतनी ही आसानी से खरीद लूंगा जितनी आसानी से तुमने खरीदी है।" उसका स्वर चुभता हुआ और अर्थपूर्ण था। उसने जवाब का इन्तजार नहीं किया था और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया था। दरवाजा उसने बहुत जोरदार आवाज के साथ बन्द किया था। उसे मालूम था कि उसके भाई की तनख्वाह मात्र कुछ हजार रुपये महीना थी और उसके पास दो कारें। थीं, उसकी कीमत कम-से-कम तीन-चार लाख रुपये थी। देवा मूर्ख नहीं था, वो एक तेज-तर्रार बल्कि शातिर लड़का था। वो आसानी से समझ सकता था कि शंकर ने कार कैसे हासिल की है।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी कि देवा को मालूम था। उसने अपनी आंखों से देखा था कि ज्यादातर पुलिस वालों के पास बड़ी-बड़ी कारें मौजूद थीं और इलाके का डी०सी०पी० भी कई बिल्डिंगों का मालिक था, कमिश्नर का उसे मालूम नहीं था। देवा इन बातों से बेखबर नहीं था, वो अपनी आंखें और कान खुले रखता था। आस-पास के माहौल पर उसकी नजर रहती थी।

मकान में इस वक्त शांति फैल चुकी थी। देवा उस शांति में आनन्द लेते हुए नींद की आगोश में जाने की कोशिश कर रहा था। इस घर में उसे इसी वक्त सुकून के कुछ घंटे नसीब होते थे। वर्ना बाकी तमाम वक्त घर में ऐसा शोर मचा रहता था कि अगर कभी देवा को घर में रहना पड़ता था तो उसे महसूस होता था कि वो पागल होता जा रहा है।

जितना शोर-शराबा घर के अन्दर रहता था, उससे ज्यादा बाहर से सुनाई देता था। बाहर का माहौल भी मानसिक संतुलन बिगाड़ देने वाला ही था।

आसपास की दुकानों से खट-खट और फट-फट की आवाजों की चीख-पुकार, गाड़ियों का शोर। ये सब कुछ किसी इन्सान को बाल नोचने पर मजबूर कर सकता था।

एक बार देवा ने सोचा था कि क्या उसके घर का माहौल ही ऐसा था या आसपास के घरों में भी ऐसा ही महसूस होता था। उसे आसपास के भी घरों में जाने का मौका मिला था, उसने वैसा ही महसूस किया था, जैसा उसे अपने घर में महसूस होता था।

कमरे में बड़ा-सा बैड मौजूद था। उस पर दोनों भाई सोते थे। देवा ने उस पर एक तरफ दुबककर जल्दी से आंखें बंद कर लीं। उसकी कोशिश थी कि शंकर के अन्दर आने से पहले वो सचमुच सो जाए ताकि उससे और बात करने की नौबत न आए।

लेकिन बिस्तर पर लेटते ही एक बार फिर लीना की सूरत उसकी कल्पना में घूम गई थी जो उसे सोने नहीं दे रही थी। लीना का ख्याल आते ही देवा के जेहन में अजीब-सी सनसनी दौड़ गई थी जो जेहन से बदन में उतरी थी। उसके वजूद में बेचैनी पैदा हो गई थी।

ऐसी हालत लीना का ख्याल आते ही हो जाती थी और देवा सोचता था कि जब उसे लीना की संगत प्राप्त होगी तो उसका क्या हाल होगा? यह निश्चय तो उसने बहरहाल कर ही लिया था कि वो लीना को हासिल करके ही रहेगा। वो इस हकीकत को एक पल के लिये कबूल करने को तैयार नहीं था कि अभी उस औरत पर किसी दूसरे का अधिकार है। वो उस शख्स की ही थी। शायद वो उसकी दोस्त थी। लेकिन देवा किसी से डरने को तैयार नहीं था ।

देवा इस कम उम्र में ही इस नतीजे पर पहुंच गया था कि पूरी जिन्दगी एक निरंतर चलने वाली जंग ही थी। जो लोग जंग से घबराते थे, उनके लिये जिन्दगी गुजारना मुश्किल हो जाता है। उसे यह भी मालूम था कि जंग जीतने वालों को ही सफलता मिलती थी। वो विनायक शेट्टी की आंखों में आंखें डालकर खड़ा होने या उससे जंग करने के लिये भी तैयार था। लीना के लिये वो कुछ भी कर सकता था। लेकिन उससे पहले देवा उसी तरीके पर अमल करना चाहता था। जो लीना ने बताया था। लीना ने कहा था कि अगर उसके पास अच्छी-सी कार हो, उसकी जेब में काफी रकम हो तो वो उसके साथ शाम गुजारने के बारे में सोचेगी। देवा ने फैसला कर लिया था कि आने वाली रात को वो जेब में नोट लेकर और अच्छी-सी कार में बैठकर क्लब की पिछली गली में लीना का इन्तजार कर रहा होगा।