उसके बाद करीब चार महीने तक शहर में अमन रहा था। तमाम मुजरिम गैंगवार छोड़ पैसा कमाने में लगे रहे थे। शहर में कोई कत्ल नहीं हुआ था।
मगर फिर शायद मुजरिम अमन-शांति के इस वातावरण से उकता गए थे। उनकी फितरत उन्हें मजबूर करने लगी थी कि वो कुछ-न-कुछ करें। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे लड़ाई-झगड़े शुरू होने लगे थे। आरम्भ में केवल मारपीट के मामले सामने आए थे जिनमें कभी किसी की नाक और कभी किसी के दांत टूट जाते थे। फिर चाकूबाजी की इक्का-दुक्का वारदातें होने लगी थीं। उसके बाद फायरिंग भी होने लगी थी।
खासकर दोनों बड़े गिरोहों की हालत कुछ ऐसी थी जैसे शिकार को देखकर शिकारी कुत्ते जंजीरें छुड़ाने की कोशिश कर रहे हों। खून की प्यास फिर भड़क उठी थी।
देवा की बहुत-सी जायदादों में कई जुआघर भी शामिल थे, उनमें से एक जुआघर शहर के मध्य में था । केन्द्र में स्थित होने के बावजूद उस जुआघर के आसपास रात होते ही सन्नाटा छाने लगता था। वहां ज्यादातर ऑफिस वगैरह थे जो शाम होते ही बंद होने लगते थे। जबकि देवा के जुआघर में धन्धा और भी आराम से चलता था। देवा करीब हर रोज उस जुआघर का दौरा करता था और उसने इस मामले को भी ज्यादा गुप्त रखने की कभी कोशिश नहीं की थी। एक शाम वो जुएखाने के सामने पहुंचकर गाड़ी से उतरा ही था और प्रतीक्षक था कि दूसरी गाड़ी से उतरकर उसके बॉडीगार्ड उसे अपने घेरे में ले लें कि तभी अचानक मशीनगन की तड़तड़ाहट गूंज उठी थी।
देवा ने अपने दो बॉडीगार्डों को तुरन्त ही जमीन पर लेटकर पोजीशन लेते हुए देखा था। देवा खुद भागकर बिल्डिंग के बरामदे में चला गया। जिसकी दूसरी मंजिल पर उसका जुआघर था। उसने एक खम्भे की आड़ ले ली थी और स्थिति का जायजा लेने की कोशिश करने लगा था। उस दौरान वो रिवॉल्वर निकाल चुका था और उसके आदमी गाड़ियों की आड़ ले चुके थे।
फायरिंग शुरू होने के बाद और खम्भे की आड़ उपलब्ध होने से पहले ही कई गोलियां देवा के शरीर से टकरा चुकी थीं। लेकिन सौभाग्य से आज वो कपड़ों के नीचे बुलेटप्रूफ जैकेट पहने हुए था।
उसने देखा, उसके दो आदमी सामने स्थित एक छोटे-से होटल की ऊपरी एक खिड़की की तरफ फायरिंग कर रहे थे। उसे अन्दाजा हो गया था कि गोलियां उसी तरफ से आ रही थीं
अब फायरिंग रुक गई थी। शायद फायरिंग करने वालों ने देख लिया था कि उनका मुख्य शिकार ओट में पहुंचकर बच गया है, तो उन्होंने और फायरिंग करना व्यर्थ समझा था। वो पुलिस के पहुंचने से पहले वहां से निकल भागने की फिक्र में लग गए थे। सरेआम इस किस्म की फायरिंग कोई मामूली घटना नहीं थी । देवा और उसके आदमी भी पुलिस की पूछताछ का सामना नहीं करना चाहते थे।
“जल्दी गाड़ियों में बैठो।" देवा ने चीखकर अपने साथियों को निर्देश दिया था।
वो सब गाड़ियों में बैठे थे और पलक झपकते ही गाड़ियां वहां से रफू-चक्कर हो गई थीं। अगली गाड़ी तो उस पुलिस कांस्टेबल को कुचलने ही लगी थी जो सीटी बजाता हुआ नुक्कड़ से दौड़ता आ रहा था।
देवा की आंखों में चिंगारियां-सी सुलगने लगी थीं और जबड़े सख्ती से भिंचे हुए थे। वो सोच रहा था कि आखिर जंग फिर शुरू हो ही गई थी।
“वो लोग उस होटल की तीसरी मंजिल पर थे, बॉस!" देवा के एक बॉडीगार्ड ने हांफते हुए उसे सूचना दी थी--- “वो दो थे, एक के पास लाईट मशीनगन थी....दूसरे के पास रिवॉल्वर या पिस्टल थी।
देवा ने गुस्से में हुंकार भरी थी। ऑफिस पहुंचते ही देवा ने ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर कैलाश पंवार को फोन किया था और कहा था--- "तुम्हारी सूचना के लिये बता रहा हूँ कि बलराम के आदमियों ने समझौता तोड़ने में पहल की है। थोड़ी देर पहले उन्होंने जीवन होटल की तीसरी मंजिल से फायरिंग करके मुझे मार डालने की कोशिश की है।"
"मुझे मालूम हो चुका है।" कैलाश पंवार ने कहा--- "कुछ मिनट पहले पुलिसवालों ने मुझे खबर दी है।"
"तो तुम क्या कर रहे हो इस बारे में?"
“वही करूंगा जिसका मैंने मीटिंग में वादा किया था। आज रात तक पुलिस पूर्वी गैंग के जितने भी आदमियों को पकड़ सकेगी, पकड़ लेगी। सुबह उन्हें अदालत में पेश करके जरूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।"
देवा को मालूम था कि उस कार्रवाई का कोई खास फायदा नहीं होगा, बस मीडिया को एक मसालेदार और सनसनीखेज खबर बनाने का मौका मिल जाएगा। हमलावरों को कोई सजा नहीं दी जा सकेगी। देवा ने इस बारे में कैलाश पंवार पर ज्यादा दबाव नहीं डाला था, क्योंकि उसके दिमाग में एक योजना पनपने लगी थी।
अदालत पुलिस हैडक्वार्टर के पास ही थी, बलराम के कई आदमियों को जब एक साथ अदालत में पेश किया जाता तो उस मौके से फायदा उठा सकता था वो। देवा ने फौरन अपने उन आदमियों को बुलाया था, जो मार-धाड़ और निशानेबाजी में माहिर थे। उसने उनको अपनी प्लानिंग के बारे में समझाया। वो अण्डरवर्ल्ड के इतिहास में एक ऐसा भयानक अध्याय लिखने जा रहा था जो उससे पहले कभी नहीं लिखा गया था। थोड़ी देर बाद देवा को एक आश्चर्यजनक खबर मिली। जीवन होटल के जिस कमरे में से उस पर फायरिंग की गई थी, तलाशी लेने पर पुलिस को उस कमरे में से एक लाईट मशीनगन, एक पिस्टल और एक आदमी की लाश मिली थी, लाश को खालिद कुरेशी के रूप में शिनाख्त किया गया था। वही खालिद कुरेशी जो कुछ दिन पहले तक देवा गैंग में नम्बर दो की पोजीशन पर था।
“गद्दार...शैतान...!” खबर सुनकर देवा नफरत से बोला था--- "शायद वो सुअर जाकर दुश्मनों से मिल गया था।"
दूसरे दिन मीडिया में उस हमले की खबर आई थी। खबरों में यह भी बताया गया था कि बलराम समेत उसके कई आदमियों को गिरफ्तार कर लिया गया था और कई इल्जामों के तहत आज उन्हें अदालत में पेश किया जाना था।
देवा के निर्देश पर उसके आदमी दस बजे तक अदालत के सामने वाली सड़क पर इधर-उधर विभिन्न चीजों की आड़ में खड़े हो चुके थे। देवा खुद भी वहां मौजूद था और उसके चेहरे पर मौत की सी क्रूरता थी।
उसे उम्मीद थी कि आज वो बलराम गैंग वालों को ऐसा सबक सिखाने में सफल हो जाएगा जिसे सब लम्बे समय तक याद रखेंगे। अगर आज वो बलराम को भी मारने में सफल हो जाए तो संभव है कि वो गैंग ही टूट-फूटकर बिखर जाए। यह बात तो निश्चित थी कि अदालत से निकलते वक्त बलराम और उसके साथी निहत्थे होते।
लेकिन जल्दी ही देवा को मालूम हो गया कि पुलिस भी इस मामले में गाफिल नहीं थी। पुलिस हैडक्वार्टर का बड़ा-सा गेट खुला था। गेट से बहुत सारे लोग निकले थे और उन्होंने देवा के आदमियों को पकड़ लिया था। वो लोग शायद हैडक्वार्टर की किसी जगह से उनकी हरकतें देख रहे थे।
जिन गाड़ियों में वो लोग आए थे, उनके दरवाजे खुले रखे गए थे और इंजन स्टार्ट रखे गए थे, ताकि भागते वक्त उन्हें कठिनाई न हो।
खुशकिस्मती से देवा वहां से दूर एक कार में था, उसका इंजन भी स्टार्ट था। उसने जल्दी से ड्राइवर को निर्देश दिया---
"निकल चलो यहां से।"
कार एक झटके से आगे बढ़ी थी और टायरों की चरचराहट के साथ मोड़ मुड़ गई थी। मगर उस वक्त तक दो गोलियां उससे टकरा चुकी थीं। कार के पिछले हिस्से पर ये फायर पुलिसवालों ने ही किये थे ।
"रुक जाओ।" देवा ने ड्राइवर से कहा।
ड्राइवर ने फौरन ब्रेक लगा दिये। फिर टायर चरचर्राए थे और कार रुक गई । देवा ने अपना रिवॉल्वर जल्दी से गटर में फेंक दिया। रिवॉल्वर साईज में ज्यादा बड़ा था जबकि छोटी और चपटी पिस्टल देवा ने अपनी जुराब में खोंस ली थी। ड्राइवर ने भी अपना रिवॉल्वर फेंक दिया था।
वो पुलिस वाले हांफते हुए उनके पास पहुंचे। दोनों के हाथों में रिवॉल्वर थे देवा ने बड़ी मासूमियत से पूछा---
"क्या तुम लोग हमसे कुछ बात करना चाहते थे?"
"हां, बात तो हम तुमसे बहुत अच्छी तरह करेंगे।" एक पुलिस वाले ने फूली हुई सांस के साथ कहा।
"बात करने के लिये कार पर फायरिंग करनी तो जरूरी नहीं थी।" देवा ने हल्का-सा एतराज किया था--- "तुम सीटी बजाते, हम रुक जाते।"
"हां-हां! हमें मालूम है तुम कितने शरीफ हो।" दूसरा पुलिसिया बोला था--- "वो तो शुक्र है कि सब-इंस्पेक्टर गोबिल की नजर पड़ गई थी। वर्ना तुम लोग न जाने आज कितना खून-खराबा मचाते और पुलिस डिपार्टमेंट की कितनी शामत आती। चलो हमारे साथ तुम्हें हिरासत में लिया जाता है।" पुलिसिया व्यंग्यभरे लहजे में बोला।
“किस इल्जाम में?” देवा ने आश्चर्य से पूछा ।
“हथियार छुपाकर रखने के इल्जाम में।” बताया गया।
“हमारे पास तो कोई हथियार नहीं है।" दोनों ने हाथ उठा दिये।
पुलिस वालों ने उसकी तलाशी ली, लेकिन उसने घुटनों के नीचे देखने का कष्ट नहीं उठाया था। देवा के साथी के पास भी कोई हथियार नहीं मिला। दोनों पुलिसियों ने हैरत से एक-दूसरे की तरफ देखा था। कार की तलाशी ली गई थी। तो वो वहां भी कोई हथियार नहीं मिला था।
"देख लिया तुमने?" देवा ने कहा--- “हमारे पास कोई हथियार नहीं है। हम तो यों ही एक छोटे-से काम को निकले थे। उम्मीद है, आईन्दा कभी तुम हमें रोकने के लिये हमारी गाड़ी पर फायर नहीं करोगे।" फिर उसने हजार रुपये का एक नोट निकालकर पुलिस वालों की तरफ बढ़ा दिया--- "लो, मिठाई खा लेना। भूल जाना कि तुमने मुझे यहां देखा था। मैं भी अपनी गाड़ी पर फायरिंग होने का किसी से जिक्र नहीं करूंगा।"
एक पुलिस वाले ने नोट लेकर जल्दी से जेब में रख लिया और देवा अपने ड्राइवर के साथ गाड़ी में बैठकर रवाना हो गया।
अपने हैडक्वार्टर पहुंचकर देवा ने ए०सी०पी० जयंत तांब्रे को फोन किया और कहा---
“मुझे पता चला है कि पुलिस ने मेरे कुछ आदमियों को पकड़ लिया है?"
"हां! खबर तो मुझ तक पहुंची है।" उसने स्वीकार किया।
"तो उन्हें छुड़ाने के लिये कुछ करो। हम हर महीने तुम्हें जो मोटी रकम देते हैं उसका कुछ तो फायदा होना चाहिये।"
"सॉरी सुरेन्द्र पाल, यह हैडक्वार्टर का केस है। अगर मैंने इसमें टांग अड़ाई और किसी रिपोर्टर को भनक लग गई तो मामला बिगड़ जाएगा। मैं कोशिश करूंगा कि उन पर सिर्फ हथियार छुपाकर रखने का केस बने, कोई संगीन इल्जाम न लगे। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकता। बेहतर हो कि तुम उनकी मदद के लिये कोई वकील भेज दो।"
देवा ने एक वकील को भेज दिया था। उसकी यह प्लानिंग फेल हो गई थी।
दो दिन बाद देवा को डाक द्वारा एक निमंत्रण-पत्र प्राप्त हुआ। जो उभरे हुए सुनहरे अक्षरों में छपा हुआ था और उसे सुनहरी रिवन में बांधकर बड़ी खूबसूरती से भेजा गया था। यह बड़ा खास किस्म का लिफाफा था।
यह एक बहुत ऊंचे स्तर के क्लब के उद्घाटन समारोह का निमंत्रण-पत्र था और देवा को बड़े आदर से आमन्त्रित किया गया था। क्लब का नाम था “वुड-लैंड कैसीनो” निमंत्रण-पत्र में बताया गया था कि पार्टी में आने वाले मेहमान फैंसी ड्रेस शो के ढंग से पार्टी में हिस्सा लेंगे। यानि उन्होंने तरह-तरह के रूप धर रखे होंगे। उनमें कोई उन्हें पहचान नहीं सकेगा।
निमंत्रण-पत्र पाकर देवा को बहुत खुशी हुई थी। शहर के उच्च वर्ग की तरफ से उसे निमंत्रण-पत्र मिलने लगे थे, इसका मतलब था कि शहर में उसके महत्त्व को स्वीकार किया जाने लगा था और उसकी शोहरत एक गैंग लीडर की ही नहीं रही थी।
थोड़ी देर देवा खुश होता रहा था। लेकिन फिर उसका मुजरिम दिमाग जाग उठा था, शक्की मिजाज होना मुजरिमों की फितरत भी होती है और जरूरत भी। वो सोच में पड़ गया कि कहीं यह उसे एक खास जगह बुलाकर घेरने की योजना ही तो नहीं। उसने एक बार फिर निमंत्रण-पत्र को गौर से देखा, लेकिन उसमें उसे कोई संदिग्ध चीज नजर नहीं आई। उसने गुस्से में लिफाफा तोड़-मरोड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। तभी फोन की घंटी बज उठी थी। दूसरी तरफ करीना थी।
"डियर... क्या तुम थोड़ी देर के लिये घर आ सकते हो? मुझे तुमसे बहुत सारी बात करनी हैं।" करीना ने कहा था।
"अभी फोन पर ही कर लो वो बात।" देवा ने कहा।
"नहीं। फोन का कोई भरोसा नहीं कि कब कोई फोन पर हमारी बातें सुन रहा हो।"
"तो फिर रात तक सब्र कर लो।" देवा बोला था।
"ठीक है... मैं रात तक इंतजार कर लेती हूं। लेकिन...अगर अभी आ जाते, तो अच्छा था।"
"अच्छा ठीक है... मैं आ जाता हूं।" देवा नर्म पड़ गया।
देवा अपने बॉडीगार्डों को लेकर घर पहुंचा था, उन्हें उसने बिल्डिंग के गेट पर छोड़ा था और खुद ऊपर अपने शानदार अपार्टमेंट में पहुंचा था। करीना ने मुस्कराते हुए उसका स्वागत किया था। वो परेशान नहीं बल्कि खुश नजर आ रही थी।
“क्या बात है, डार्लिंग ?" देवा ने राहत की सांस लेते हुए पूछा।
“मुझे एक ऐसी जगह का पता चला है डार्लिंग, जहां हम आसानी से बलराम को ठिकाने लगा सकते हैं।" वो प्रसन्नता से बोली थी--- "वो कल रात वुडलैंड कैसीनो की उद्घाटन पार्टी में आ रहा है। यह उसे निशाना बनाने का बेहतरीन मौका है।"
"तुम्हें यह बात कैसे मालूम हुई?" देवा ने सन्देह से उसकी तरफ देखा ।
"यह बात न ही पूछो तो अच्छा है। यह महत्त्वपूर्ण है कि मुझे यह बात मालूम हो गई है। कैसे मालूम हुई, इसका कोई महत्त्व नहीं है। इस किस्म की पार्टी में बलराम को ज्यादा खतरा नहीं महसूस होगा। हो सकता है उसका एक भी बॉडीगार्ड उसके साथ न हो। पार्टी में सबके चेहरे छुपे हुए होंगे, इसलिये कोई हमें पहचान नहीं सकेगा।"
"लेकिन... हम भी तो किसी को नहीं पहचान सकेंगे।" देवा बोला ।
"हम पहचानने के लिये कोई तरीका अपनाएंगे।" करीना ने कहा।
"ठीक है। मैं सोचता हूं इस बारे में।" देवा ने कहा और हैडक्वार्टर वापस आ गया।
उसने रद्दी की टोकरी में से वो कार्ड उठाया और फिर उसे गौर से देखने लगा। उसके अन्दर से कोई आवाज उससे कह रही थी कि उस पार्टी में जाकर वो खतरा मोल लेगा। लेकिन बलराम को ठिकाने लगाने का मौका मिलने की उम्मीद उसे उक्सा रही थी। यह उम्मीद उसे वुडलैंड की पार्टी की तरफ खींच रही थी।
अगले दिन शाम को वो उस नए कैसीनो की तरफ पूरी तैयारी के साथ रवाना हुए थे। देवा ने एक भारतीय महाराजा का लिबास पहन रखा था, यह लिबास उसने इसलिये पसन्द किया था, क्योंकि इसमें कई हथियार छुपाए जा सकते थे। दूसरे इस बहरूप में घनी दाढ़ी भी शामिल थी। जिसके नीचे उसके गाल का वो जख्म भी छुप सकता था, जो उसकी सबसे बड़ी शिनाख्त बन चुका था। देवा के चार बॉडीगार्ड्स भी विभिन्न रूपों में उनके साथ थे।
फिर वो कैसीनो जा पहुंचे थे। देवा ने गाड़ी को सड़क की तरफ रुख करके खड़ी की थी। ताकि फरार होते वक्त एक पल भी नष्ट न हो। गार्ड ने एक ही कार्ड पर उन सबको बड़ी खुशी से अन्दर भेज दिया था, जिस पर देवा को थोड़ी हैरानी भी हुई थी। क्योंकि करीना ने यह तो मालूम कर लिया था कि पार्टी में बलराम मौजूद होगा। लेकिन वो इस कैसीनो के बारे में बहुत सी बातें मालूम नहीं कर सकी थी।
देवा के वहमो-गुमान में भी नहीं था कि उसके कार्ड के एक कोने में जो छोटा-सा एक नाम उभरा हुआ था, वो सिर्फ उसके कार्ड पर ही था। देखने में वो प्रिंटिंग प्रेस का नाम महसूस होता था जिसमें कार्ड छापा गया हो। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। वो एक शिनाख्त थी देवा चाहे किसी भी रूप में या किसी भी कास्ट्यूम में वहां पहुंचता, गार्ड के हाथ में उसका कार्ड पहुंचते ही गार्ड को मालूम हो जाता कि वो देवा है। वो फौरन इस बारे में सम्बन्धित लोगों को सूचना दे सकता था। देवा और उसके साथी इन बातों से बिल्कुल अनजान थे।
वुडलैंड बहुत बढ़िया कैसीनो था। इस वक्त उसके लम्बे-चौड़े खूबसूरती से सजे हॉल में म्यूजिक गूंज रहा था और वेटर ड्रिंक्स की ट्रे उठाए इधर-उधर घूम रहे थे। भली-भांति के बहरूपों में मेहमानों का आगमन भी जारी था।
देवा या उसके किसी साथी को भनक भी नहीं लग सकी थी नकाबों के पीछे से कम से कम बारह आंखें बड़ी क्रूरता से उन्हें घूर रही हैं।
वो लोग दूसरी मंजिल पर पहुंच गए जहां लम्बे-चौड़े कमरे में जुआघर फैला हुआ था। वहां जुआ खेलने की हर किस्म की मेजें और मशीनें सजी हुई थीं। यहां मामूली दांव नहीं लगाए जा सकते थे, सिर्फ मोटे दांव लगाए जाते थे। यहां हर चीज में भव्यता और ऐश्वर्य झलकता था। नीचे मेहमानों की तादाद में इजाफा हो चुका था, म्यूजिक की लहरों का स्वर भी कुछ तेज हो गया था और मेहमानों की तेज आवाजें भी ऊंची होने लगी थीं। रौनक और माहौल का सम्मोहन निरंतर बढ़ रहा था।
देवा और उसके साथियों के दिमाग अगर अपने खतरनाक मिशन में न उलझे होते तो वो भी इस वातावरण का आनन्द उठा सकते थे । देवा ने फुसफुसाकर अपने गार्डों को निर्देश दिया था कि वो उसके ज्यादा करीब न रहें बल्कि कुछ फासले से उस पर नजर रखें ताकि किसी को उन पर सन्देह न हो।
करीना देवा के साथ थी और देवा तीन-चार बार उसके साथ डांस कर चुका था। अब उसने करीना से कहा---
"तुम जरा इधर-उधर घूमकर मेहमानों से मिल-जुलकर मालूम करने की कोशिश करो कि क्या बलराम भी यहां मौजूद है ? अगर है, तो किस बहरूप में है?"
करीना ने "हां" में सिर हिलाया था और इधर-उधर चकराने लगी थी। उसी दौरान देवा की नजर एक औरत पर पड़ी जिसकी शारीरिक बनावट और चाल-ढाल गजब की थी। वो एक मल्लिका के बहरूप में थी। देवा के ख्याल में उसके लिये इससे बढ़िया रूप कोई हो ही नहीं सकता था।
लेकिन उसकी चाल-ढाल और शारीरिक बनावट देखकर देवा को महसूस हो रहा था, जैसे वो पहले भी उसे कहीं देख चुका है। उसके चेहरे पर मल्लिका का मास्क था। देवा को याद नहीं आ रहा था कि यह चाल-ढाल उसने पहले कहां देखी थी। यह बात उसे बुरी तरह उलझा रही थी। देवा उसे मल्लिका के रूप में डांस करते देख रहा था। फिर उसने महसूस किया कि एक और आदमी की विशेष नजर भी उस नकली मल्लिका पर थी।
वो शख्स शैतान के बहुरूप में था, उस रूप में उसका कसरती शरीर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वो बड़ी फुर्ती से इधर-उधर आ-जा रहा था। वो भड़कते सुर्ख रंग के चुस्त कपड़ों में था, जो उसके शरीर पर मढ़ दिया गया लगता था । उसने सींग और दुम भी लगा रखी थी। उसने उस नकली मल्लिका के साथ कई राउण्ड डांस किया था।
फिर मल्लिका उसकी बांहों के घेरे से निकल गई थी और इधर-उधर लहराती हुई जैसे संयोग से ही देवा के सामने पहुंच गई थी। उसकी आंखें नकाब के पीछे होने के बावजूद देवा को महसूस हुआ था कि उन आंखों में निमंत्रण के भाव थे। फिर डांस के ही स्टाईल में लहराती, बलखाती, हिलकोरे लेती हुई दरवाजे की तरफ चल दी थी। दरवाजे पर रूककर उसने पलटकर देवा की तरफ देखा था। उसकी आंखों में निमंत्रण अब और भी स्पष्ट हो गया था। उस आमंत्रण को जैसे शब्दों की जरूरत नहीं थी ।
वो देवा को बाहर बरामदे की तरफ बुला रही थी। देवा जैसे मंझे हुए खिलाड़ी के दिल की धड़कनें भी तेज होने लगी थीं। उसकी नसों में सनसनी दौड़ रही थी। देवा मेहमानों के बीच से रास्ता बनाता हुआ उसकी तरफ बढ़ने लगा था। अचानक उसे याद आ गया था कि वो इस तरह की चाल-ढाल और ऐसे शरीर पहले कहां देख चुका था। याद आते ही उसके दिमाग में धमाका-सा हुआ और उसका सारा जोश ठण्डा पड़ गया था।
देवा को याद आ गया था कि मल्लिका के रूप में वही लड़की थी, जो पत्रकार सोनाली मुखर्जी बनकर उससे उसके ऑफिस में मिल चुकी थी और बाद में देवा को करीना से पता चला था कि वास्तव में वो पूर्वी गैंग के लीडर बलराम की प्रेमिका और गनगर्ल भी थी।
देवा को अहसास हुआ कि अगर मल्लिका के रूप में वो बलराम की प्रेमिका थी, वो शैतान के रूप में निश्चित तौर पर बलराम ही था। उसी क्षण देवा को यह अहसास भी हुआ कि किसी-न-किसी तरह उसे पहचान चुके हैं कि महाराजा के रूप में वो देवा ही था। वो लोग बाहर किसी जगह उसे ठिकाने लगाना चाहते थे। देवा ने दिल ही दिल में निश्चय किया था कि वो उन्हें उनके इरादों में कभी सफल नहीं होने देगा। वो मल्लिका के पीछे जाने के बजाय सीढ़ियां चढ़ गया। ऊपर पहुंचकर उसने टेरेस से झांका तो नीचे, इमारत के पहले हिस्से में उसे पांच आदमी मास्क चढ़ाए प्रतीक्षक ढंग से टहलते हुए नजर आए थे। कास्ट्यूम और मास्क वाले उन लोगों में "शैतान" भी मौजूद था।
वहां वाकई उसके लिये मौत का जाल फैलाया गया था। वो जल्दी से वापस नीचे पहुंचा था, लेकिन उसने किसी किस्म की उतावली प्रकट न करते हुए धीमे स्वर में अपने एक आदमी से कहा---
"करीना को बाहर ले जाकर गाड़ी में बिठाओ और तुरन्त निकल भागने के लिये इंजन स्टार्ट करके रखो।" फिर उसने बाकी आदमियों को निर्देश दिया--- "तुम लोग मेरे साथ आओ।"
अपने आदमियों को लेकर देवा तेजी से किचन की तरफ बढ़ा था। उसे यकीन था कि ज्यादातर इमारतों की तरह यहां किचन में भी पिछला दरवाजा जरूर होगा। उसके जरिये वो पिछली तरफ निकल सकता था। किचन में पिछला दरवाजा मौजूद था उससे पहले कि बावर्ची उन लोगों को किचन में घुसते देखकर हैरान होते वो पिछले दरवाजे से बाहर भी निकल गए थे। अब वो इमारत की पिछली तरफ से खुले हिस्से में पहुंच गए। थे।
देवा ने आगे जाकर इमारत का आधा चक्कर काटकर अगली तरफ झांका। वो सब लोग उसी तरह प्रतीक्षक अन्दाज में वहीं मौजूद थे। अब उनमें वो नकली मल्लिका भी शामिल हो चुकी थी।
वो बेचारी गर्दन मोड़े बरामदे की तरफ देख रही थी और शायद सोच रही थी कि देवा उसके पीछे-पीछे बाहर क्यों नहीं आ रहा।
"वो लोग हमें कत्ल करने के लिये वहां जमा हैं।” देवा ने सरगोशी में अपने साथियों को बताया--- "लेकिन हम बाजी पलट देंगे। मैं उस शैतानरूपी आदमी को निशाना बनाऊंगा। तुम बाकी आदमियों का सफाया करो।"
उसने धीरे से अपना गन वाला हाथ उठाया, सावधानी और सतर्कता से निशाना लेकर ट्रिगर दबा दिया।
उस वक्त उसका दिल प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भर उठा। जब उसने शैतान के बहरूप वाले लम्बे-चौड़े आदमी को गोली के धमाके के साथ ही जमीन पर गिरते देखा उसके गिरने के बाद भी देवा ने सावधानी के तौर पर उस पर चार फायर और झोंक मारे।
उस दौरान देवा के आदमी भी फायरिंग शुरू कर चुके थे, मगर बलराम के आदमी पहली गोली की आवाज सुनते ही जमीन पर गिर गए थे ताकि उन्हें आसानी से निशाना न बनाया जा सके। उन्होंने जवाबी फायरिंग भी शुरू कर दी थी। दोनों तरफ से शोले लपकने लगे थे।
धमाके गूंज रहे थे, गोलियां सनसनाती हुई इधर-से-उधर जा रही थीं, दीवारों में घुस रही थीं, दूसरी चीजों से टकरा रही थीं। देवा अपने आप को एक बार फिर मैदाने जंग में महसूस कर रहा था। पहले तो महसूस हो रहा था कि दूसरी तरफ से चार रिवॉल्वरों से फायरिंग की जा रही थी। फिर ऐसा लगा था जैसे उनमें से तीन ही रह गए हैं...फिर जैसे दो ही रह गए थे...फिर एक और आखिरकार खामोशी छा गई थी ।
"निकलो यहां से।" देवा ने नीची मगर जोशीली आवाज में हुक्म दिया था।
वो सब अपनी कारों में घुसे थे और तेज रफ्तारी के साथ वहां से रवाना हो गए थे। देवा को मालूम था कि क्लब के अन्दर बलराम के और भी गनमैन मौजूद होंगे। वो उनके साथ मुकाबले में नहीं उलझना चाहता था।
वहां से दूर होते हुए देवा ने गर्दन घुमाकर जो आखिरी दृश्य देखा था, वो यह था कि मल्लिका की पोशाक वाला आकार का साया भी लड़खड़ाकर जमीन पर गिर रहा था और क्लब से बहुत सारे लोग भागते हुए बाहर आ रहे थे।
वहां जो कुछ भी हुआ था, वो मात्र कुछ ही क्षण में हो गया था। गाड़ियां तेज रफ्तार से देवा के इलाके की तरफ दौड़ रही थीं। देवा ने करीना से पूछा---
"तुम्हें कैसे मालूम हुआ था कि बलराम आज रात क्लब में मौजूद रहेगा?" उसका लहजा खतरनाक था।
“बलराम की प्रेमिका ने बताया था।" करीना ने जवाब दिया।
“क्या...? उसने कैसे बता दी तुम्हें यह बात ?"
"वो...मेरी बहन है।" करीना ने बैठी हुई सी आवाज में कहा।
"हे.... मेरे ईश्वर...!" देवा की आंखें फैल गईं।
"मैं जब कल सोनाली से बात कर रही थी, तो मैं यही समझ रही थी कि मैं बड़ी होशियारी से काम लेते हुए उससे अपने मतलब की बात निकलवा रही हूं।" करीना धीरे से बोली--- "जबकि हकीकत में वही मुझे जाल में फंसा रही थी।" उसके लहजे में शर्मिंदगी थी।
"खैर... कोई बात नहीं।" देवा खुले दिल से काम लेते हुए बोला--- “इनकी चाल उन्हीं पर उलटी पड़ गई। बलराम अपने चार साथियों समेत मारा गया।"
अगले दिन बलराम की मौत की पुष्टि हो गई। उसकी रहस्यमय हमले में मौत की ख़बर ने शहर भर में सनसनी ला दी थी, उसकी अर्थी बड़ी धूमधाम से उठी थी। अर्थी के पीछे बड़े-बड़े कानून के रक्षक और प्रतिष्ठित लोग, चल रहे थे। उनमें ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर कैलाश पंवार ए०सी०पी० जयंत तांब्रे, तीन-चार जज और दसियों सियासतदार शामिल थे।
खुद देवा ने भी बलराम के मृत शरीर पर रखने के लिये बहुत बड़ा और खूबसूरत पुष्प-चक्र भिजवाया था। जिसकी कीमत दस हजार रुपये से भी ज्यादा थी । देवा को अफसोस सिर्फ यह था कि उसे यह पुष्प चक्र भिजवाने का मौका काफी देर से मिला था।
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