जॉनी नामक वो युवक, जिसका पूर्वी गैंग वालों ने अपहरण कर लिया था और जिसे यातनाएं देने के बाद गोली मार दी गई थी, बच न सका था। जिस रात देवा और उसके साथी एक डॉक्टर की निगरानी में सख्त जख्मी हालत में गैरेज से उठाकर लाए थे, उससे अगली सांझ को ही वो दम तोड़ गया था। उसे बचाने की डॉक्टर की तमाम कोशिशें कामयाब नहीं हो सकी थीं। मरने से पहले जॉनी घटना का विवरण भी नहीं बता सका था, न ही उन लोगों के बारे में कुछ कह सका था, जिन्होंने उसके साथ यह अमानवीय सलूक किया था।
देवा कुछ देर तक मुर्दा जॉनी के पास दुखी-सा खड़ा रहा था। फिर उसने अपने गैंग के समस्त साथियों को आदेश दिया था कि वो चार-चार की टोलियों में आएं और अपने दिवंगत साथी के अन्तिम दर्शन कर लें। इंसानी मानसिकता के बारे में उसका जो ज्ञान था, उसे ध्यान में रखते हुए देवा को उम्मीद थी कि अपने नौजवान साथी को यातनाओं द्वारा वीभत्स लाश को देखकर और उसके सीने में दो गोलियां घुसी पाकर उसके आदमियों के दिलों में प्रतिशोध की तीव्रतम भावनाएं भड़क उठेंगी। देवा यही तो चाहता था। वो खुद भी पूर्वी गैंग वालों से उस कत्ल का प्रतिशोध लेने का दिल में पक्का निश्चय कर चुका था। गैंग के सभी लोग जब जॉनी के अन्तिम दर्शन कर चुके, तो देवा ने उसका कफन-दफन बहुत शानदार तरीके से करने का निर्देश दे दिया था।
वो दिन कुछ इस तरह से गुजरा था कि देवा के दिलो-दिमाग को काफी परीक्षाओं से गुजरना पड़ा था, इसलिये उस रात वो दस बजे ही घर जाने का इरादा कर रहा था। तभी गैंग का बेहतरीन गनमैन बढ़िया कपड़े पहनने वाला युवक मारियो आ पहुंचा था। देवा ने उसे एक खास काम सौंप रखा था।
मारियो के पीछे-पीछे तीन आदमी और चले आ रहे थे। उनमें से दो तो गैंग के ही आदमी थे, लेकिन उनके बीच में एक अज्ञात व्यक्ति था। उसके आगमन का ढंग और उसके चेहरे के भावों से प्रकट हो रहा था कि उसे अपहरण करके लाया जा रहा है। वो सहमा हुआ और भयभीत था। लेकिन चेहरे से गुस्सा जताने की कोशिश कर रहा था।
"मैं इसे पकड़ लाया हूं, बॉस।" मारियो ने उस व्यक्ति की तरफ इशारा करके कहा था।
"कौन है यह?" देवा ने उस व्यक्ति की तरफ देखते हुए पूछा।
"इसका नाम बाबूराव कामले है और यह पूर्वी गैंग का खास आदमी है।" मारियो ने देवा को बताया।
"इसकी तलाशी ले ली ?" देवा ने पूछा।
"जरूर बॉस ।” मारियो ने जवाब दिया। उसे शायद इस सवाल की अपेक्षा नहीं थी--- “इसके पास से दो बढ़िया किस्म की गनें मिली हैं ।"
“एक बार फिर उसकी तलाशी लो।” देवा ने कहा--- "सारे कपड़े उतारकर ।” देवा ने कहा ।
देवा के आदेश का पालन किया गया। उसके तीनों आदमियों ने बंधक के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं रहने दिया था। उसका करखट और खुरदरा चेहरा गुस्से से सुर्ख हो रहा था। लेकिन उसके पास से और कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था, तो उसे कपड़े पहनने की अनुमति दे दी गई थी।
देवा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेज पर अपने सामने रख लिया था।
"बैठ जाओ।" देवा ने एक कुर्सी की तरफ इशारा करके बाबूराव से कहा। फिर उसने अपने आदमियों को निर्देश दिया--- "तुम लोग बाहर जाओ। जब तक मैं न बुलाऊं कोई भी अन्दर न आए।"
वो लोग बाहर निकल गए थे। उनके पीछे दरवाजा बंद हो गया था। देवा उस दौरान अपने रिवॉल्वर से खेलता रहा था। फिर उसने बाबू कामले की आंखों में आंखें डालकर देखा और एकदम देखता ही रहा। यहां तक कि कामले की नजरें झुक गई थीं।
“क्या तुम्हें मालूम है कि इस वक्त तुम कहां हो?" देवा ने पूछा।
"हाँ।" कामले ने गुर्राते हुए जवाब दिया।
"अगर यहां से जिंदा वापस जाना चाहते हो, तो जरा तमीज से बात करो।" देवा बोला--- “तुम्हें मालूम है, मैं कौन हूं?"
"नहीं।" इस बार कामले ने नॉर्मल लहजे में कहा था।
"मैं सुरेन्द्र पाल हूं। मेरे चेहरे पर जो जख्म का निशान है, कई लोग इसी के सहारे मुझे पहचान लेते हैं। अफजल की जगह अब मैं इस गैंग का लीडर हूँ। मैं जितना जालिम और सख्त हूं, अफजल अगले जन्म में भी उतना जालिम और सख्त होने की कल्पना नहीं कर सकता। सात-आठ आदमी तो मैं अपने हाथों से ठिकाने लगा चुका हूं। अगर तुम जैसा एक चूहा मेरे हाथों और मारा गया, तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मेरी बात समझ में आ रही है ?"
कामले ने केवल "हां" में सिर हिलाने पर निर्भर किया। अब उसके भाव बदल चुके थे। उसने अकड़ दिखाने की कोशिश बिल्कुल छोड़ दी थी। अब उसके चेहरे पर भय ने डेरे डाल लिये थे। उसकी नजर देवा के रिवॉल्वर पर जमी हुई थी।
“मैं कुछ बातें जानना चाहता हूं।" देवा गंभीर लहजे में बोला--- "और वो तुम मुझे बताओगे ।"
“तुमने गलत आदमी को उठा लिया है। मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा। मैं जुबान नहीं खोलूंगा।" कामले ने जैसे हिम्मत करके कहा।
“मैं देखता हूं कि तुम कैसे जुबान नहीं खोलते।” देवा का लहजा खूंखार हो गया था। उसने रिवॉल्वर से बाबूराव कामले के माथे का निशाना ले लिया था--
“क्या तुम भेजे में सुराख कराना चाहते हो?"
"नहीं... लेकिन.... अगर मैंने मुंह खोला, तो मेरे अपने गैंग के लोग मुझे ठिकाने लगा देंगे।" वो कुछ बेबसी से बोला ।
"शायद ऐसा न हो।" देवा बोला--- "तुम अपने गैंग के लिये काम करके कितना कमा लेते हो?"
"करीब दस हजार रुपये हफ्ता ।" कामले ने बताया।
"यह तो कोई ज्यादा रोकड़ा न हुआ, जबकि उन लोगों के लिये तुम तरह-तरह के खतरे मोल लेते होगे। यहां तक कि अपनी जान भी खतरे में डालते होगे ।"
"हां... मेरा हक तो ज्यादा बनता है।" कामले ने होंठों पर जुबान फेरते हुए हिचकिचाते हुए कहा।
"बलराम के लिये काम करते हुए सही हक तुम्हें कभी नहीं मिलेगा।" देवा ने कहा। फिर वो रिवॉल्वर की नाल झुकाते हुए बोला--- “काम करने वालों के लिये मैं बुरा नहीं हूं, अगर वो मुझे आंखें दिखाने की या डबल क्रॉस करने की कोशिश न करें। मेरी कोशिश यही होती है कि मेरे लिये जो आदमी काम करें या मेरे काम आएं, उन्हें कमाई में से उनका उचित हिस्सा मिले। एकमुश्त तीन लाख रुपया कमाने के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ?"
कामले की आंखों में हल्की-सी चमक आ गई। वो फिर होंठों पर जुबान फेरकर बोला---
"इसके लिये मुझे क्या करना होगा ?"
“अब तुम सही तरीके से बात कर रहे हो।" देवा ने सिर हिलाया--- "तुम्हें सिर्फ मेरे कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। मुझे बलराम के गैंग के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानकारियां चाहिये। जैसे कि उनके गोदाम कहां-कहां हैं? माल तैयार करने के लिये उन्होंने कहां-कहां फैक्ट्री लगा रखी हैं। सस्ती शराब तैयार करने के उनके प्लांट कहां-कहां हैं। अपने मालवाहक ट्रक वो कहां खड़े करते हैं? माल लाने, ले जाने के लिये वो आमतौर पर कौन-कौन सी सड़कें इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा...हम जब बात शुरू करेंगे तो शायद मुझे तुमसे कुछ और बातें पूछने का ख्याल आ जाए।”
“हे भगवान!" कामले जैसे कराह उठा--- "ये सारी बातें मैं तुम्हें नहीं बता सकता।" उसकी आंखें फैल गई थीं।
"क्यों नहीं बता सकते ?"
“वो लोग मुझे मार डालेंगे।”
“नहीं बताओगे, तो मैं तुम्हें मार डालूंगा।" देवा ने सर्द और सख्त स्वर में कहा--- "वो तो पता नहीं कब तुम्हें मारेंगे। मैं अभी तुम्हें ठिकाने लगा दूंगा।” कहकर देवा ने फिर रिवॉल्वर सीधा कर लिया।
“हे मेरे भगवान... यह मैं किस मुसीबत में फंस गया!” कामले अपने बाल नोचते-खसोटते रह गया।
“मेरी बात गौर से सुन गधे कहीं के।" देवा गुर्राया--- “मैंने तुझे तीन लाख रुपये ऑफर किये हैं। यह मामूली रकम नहीं है। अपने गैंग के लिये काम करके तुम छः महीने में भी इतना पैसा नहीं कमा सकते, न ही तुम्हें कभी उन लोगों से इकट्ठी इतनी रकम मिलेगी। उस रकम से तुम कोई छोटा-मोटा धन्धा करके आराम से जिन्दगी गुजार सकते हो ।"
"हां, यह मुझे मालूम है। लेकिन मुझे यह भी मालूम है कि वो कहीं भी मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे।" वो पूर्ववत् भयभीत था।
"उन्हें कैसे पता चलेगा कि तुम फरार हो गए हो ?” देवा कुछ भड़ककर बोला--- "वो तो यही समझेंगे कि तुम्हें किसी ने ठिकाने लगा दिया है। क्या हर गैंग के कुछ लोग हर साल गायब नहीं हो जाते?"
"हां, हो तो जाते हैं।" कामले ने विवशता से स्वीकार किया— “लेकिन मेरा ख्याल है मेरे बारे में उन्हें मालूम हो जाएगा। वो मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। मरने के बाद भला रकम मेरे किस काम की ?"
"बकवास बंद।" देवा गर्जा। उसके सब्र का पैमाना जैसे भर गया था। वो रिवॉल्वर से कामले के माथे का निशाना लेकर बोला--- “जुबान खोल या मर।"
बाबू कामले का चेहरा पहले से ही जर्द था, अब उस पर पसीने के कतरे भी उभर आए थे और आंखों में मौत का आतंक उतर आया था।
वो होंठों पर जुबान फेरने लगा, फिर बोला---
“मुझे दोनों ही सूरतों में मरना है...अगर मैं जुबान खोलता हूं....तब भी मौत मेरी किस्मत है। इसलिये मैं जुबान खोले बगैर ही मरने को तरजीह दूंगा।" उसने आंखें बंद कर लीं और मरने के लिये तैयार हो गया।
"आंखें मूंदने की जरूरत नहीं। तुम्हें इतनी आसानी से मौत नहीं मिलेगी।” देवा बदले हुए लहजे में बोला। इस लहजे में पहले से भी ज्यादा क्रूरता थी।
फिर उसने घंटी बजाकर अपने आदमियों को बुलाया।
"यह अपने आपको जरा ज्यादा ही सख्तजान समझ रहा है।" देवा ने बाबू कामले की तरफ इशारा करते हुए अपने आदमियों को निर्देश दिया--- "इसे तहखाने में ले चलो।"
तहखाने का जिक्र सुनकर मारियो जैसे खूंखार कातिल के चेहरे पर भी जर्दी फैल गई। बहरहाल, उसे आदेश पालन करना था।
वो सब बाबू कामले को अपने घेरे में लिये नीचे तहखाने में पहुंच गए। होटल के नीचे एक तहखाना तो वो था, जो आम इस्तेमाल में आता था और जिसकी मौजूदगी को छुपाने की कोशिश नहीं की जाती थी। लेकिन उसके नीचे एक और तहखाना भी मौजूद था जिसका रास्ता भी गुप्त था। उसके बारे में सिर्फ खास-खास आदमियों को ही मालूम था। उस तहखाने की दीवारें कंक्रीट की थीं और उन मोटा-मजबूत दीवारों में लोहे की जंजीरें, हथकड़ियां और न जाने कैसी-कैसी अजीबो-गरीब चीजें लगी हुई थीं। फर्श के कोनों में भी कुछ ऐसी चीजें और उपकरण रखे हुए थे जो यकीनन यातनाएं देने के काम आते थे। वहां पहुंचते ही कुछ ही सेकेण्ड में कामले के ऊपरी धड़ से कपड़े उतार दिये गए थे और उसे दो लोहे के कुण्डों द्वारा इस तरह लटका दिया गया था कि उसकी कलाइयां कुण्डों में फंसी हुई थीं और पांव फर्श से ऊपर थे।
यह काम इतनी फुर्ती और दक्षता से हुआ था कि उसे जरा-सा भी प्रतिशोध करने का अवसर नहीं मिला था। दीवार पर वो किसी बलि के जानवर की तरह लटका हुआ बड़ा अजीब-सा लग रहा था। उसकी आंखें खौफ से फैली हुई थीं।
देवा ने बिजली से चलने वाली एक आरी उठा ली, लम्बी-सी तार के सिरे पर उसका प्लग एक सॉकेट में लगा हुआ था । देवा ने उसका बटन दबाया, तो उसका तेज दनदानेदार और चमकदार फल तेज घर-घर की आवाज के साथ आगे-पीछे होने लगा था। जरा-सा भी जोर लगाए बगैर उस आरी से बहुत-सी चीजें काटी जा सकती थीं।
देवा ने कामले का सिर से पैर तक जायजा लेते हुए मशवरा चाहने वाली निगाहों से मारियो की तरफ देखा था।
"क्या ख्याल है, पहले इसकी बाईं टांग काटी जाए या दाईं ?"
पूछने का ढंग कुछ ऐसा था जैसे वो किसी पेड़ की शाखाओं के बारे में पूछ रहा हो। बात की भयानकता को बढ़ाने के लिये वहां दीवारों पर खून के बड़े-बड़े काले पड़ चुके पुराने धब्बे भी मौजूद थे, वो इस बात के गवाह थे कि वहां पहले भी कुछ कैदियों के साथ ऐसा सलूक हो चुका था। आरी या किसी और चीज से उनके अंग काटे जा चुके थे। मौत की दहशत से कामले के चेहरे की जर्दी का रंग और भी गहरा हो गया था।
मारियो ने भी देवा की तरह सरसरे अन्दाज में मशवरा दिया---
"मेरा ख्याल है कि काम किसी और ही तरीके से शुरू किया जाए।" उसने छोटी-सी एक इलैक्ट्रिक भट्ठी की तरफ भी इशारा किया। भट्ठी के ऊपर लोहे की एक नुकीली सलाख रखी हुई थी। उसका दस्ता लकड़ी का था ।
"हां। यह ठीक रहेगा।" देवा ने सिर हिलाकर उसका समर्थन किया और इलैक्ट्रिक आरी बंद करके फर्श पर एक तरफ रख दी।
मारियो इलैक्ट्रिक भट्टी के पास चला गया और उसने भट्टी का स्विच ऑन कर दिया। कुछ ही सेकेण्ड में वो किसी हीटर की तरह दहकने लगी थी।
देवा एक लम्बे फल वाला तेज धार चाकू उठा लाया और उसकी धार पर अंगुली फेरता हुआ बाबू कामले से बोला---
"तुम्हें तो मालूम ही होगा कि अण्डरवर्ल्ड के लोग जब अपने किसी विरोधी को उठाकर ले जाते हैं तो आमतौर पर उसके नाक-कान, जुबान और कुछ दूसरे अंग कटे हुए मिलते हैं। आंखें फटी हुई होती हैं। उसे कत्ल जरूर किया जाता है। लेकिन उससे पहले उसे न जाने किन-किन यातनाओं से गुजरना पड़ता है।"
कामले फटी-फटी आंखों से देवा की तरफ देखकर रह गया था। उस दौरान भट्ठी पर रखी नुकीली सलाख भी अंगारों की तरह सूर्ख हो गई थी। मारियो ने उसे लकड़ी के दस्ते पर से पकड़कर उठाया और देवा के पास ले आया।
देवा ने सलाख मारियो के हाथ से ले ली और उसकी नोक कामले के पेट के पास ले जाकर खूंखार लहजे में बोला---
“अब तुम जुबान खोलोगे या यह सलाख तुम्हारे शरीर में सुराख खोलेगी।" उसका स्वर बेहद खौफनाक था ।
फिर उसने दहकती सलाख की नोक धीरे-धीरे कामले के पेट के पास और पास ले जानी शुरू कर दी थी। अभी सलाख ने कामले के पेट को छुआ भी नहीं था कि कामले दहशत से चीख उठा था।
“चीखो... चीखो...खूब जोर से चीखो।" देवा मुस्कराहट के साथ बोला--- “यहां कोई तुम्हारी आवाज नहीं सुनेगा....कोई तुम्हारी मदद को नहीं आएगा।"
बाबूराव कामले भी एक जाना-माना गुण्डा था और बहुत क्रूर कातिल माना जाता था। लेकिन ऐसा लगता था कि उसने बन्दूक और रिवॉल्वरों का सामना तो खूब किया था लेकिन दहकती हुई लोहे की सलाख को अपनी नाभि के इतने पास कभी नहीं देखा था जो उसके पेट में घुसने को एकदम तैयार थी।
यह दहशत उसके लिये असहनीय थी। वो चिल्ला उठा---
"रुको...रुक जाओ...म...मैं बताने के लिये तैयार हूं...बताता....बताता हूं...भगवान के लिये यह सलाख मुझसे दूर रखो।"
उस वक्त वो सलाख उसकी नाभि से मुश्किल से एक इंच दूर थी। देवा ने सलाख को पीछे हटा लिया।
कामले का चेहरा पसीने से तर था और उसकी सांस यूं तेज-तेज चल रही थी जैसे वो मीलों दूर से भागता हुआ आ रहा हो। उसके बाद कामले ने जो बोलना शुरू किया था, तो एक घंटे तक बोलता ही चला गया था। देवा उससे सवाल करता रहा था और कामले उसके हर सवाल का जवाब देता रहा था---मारियो समस्त विवरण कागज पर नोट करता रहा था।
ज्यों-ज्यों कामले का बयान आगे बढ़ता जा रहा था, देवा की आंखों की चमक भी बढ़ती जा रही थी। दुश्मन का हर राज उसके सामने खुल रहा था। समस्त जरूरी जानकारियां उसे प्राप्त हो रही थीं। आखिरकार कामले हांफने के से ढंग से बोला---“अब तो मैंने तुम्हें हर बात बता दी है, जो मुझे मालूम थी। क्या वो रकम मुझे मिल जाएगी, जिसका तुमने वादा किया था?"
“हां।” देवा ने तुरंत कहा--- "परन्तु मुक्ति अभी नहीं मिलेगी। मैं जरा पुष्टि करूंगा कि तुम्हारी बताई हुई बातें सही हैं भी या नहीं। मेरे दिमाग में काफी दिनों से कई योजनाएं हैं पहले मैं उन पर कार्रवाई करने की कोशिश करूंगा। उस दौरान तुम यहीं रहोगे। मैं यह खतरा नहीं मोल लूंगा कि तुम यहां से छोड़े जाओ और सीधे दौड़ते हुए बलराम के पास जाकर सब कुछ उगल दो कि तुम पर क्या बीती है? तुम्हारी कथा सुनने के बाद बलराम अपने सारे ठिकाने और सारी गतिविधियां बदल देगा और उसका बेड़ागर्क करने की मेरी मनोकामना शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देगी।"
देवा ने तुरंत अपने छः आदमी चुने, जिनमें मारियो भी शामिल था। उसने उन्हें इन सारी बातों की पुष्टि की जिम्मेदारी सौंप दी जो बाबू कामले ने बताई थीं।
उन लोगों ने निरंतर एक सप्ताह तक भारी दौड़-धूप की। सरसरी से ढंग में इधर-उधर पूछताछ की थी... बहुत-से स्थानों की निगरानी की थी... बहुत सारे लोगों की जासूसी की थी। उन्होंने बड़ी सावधानी और दक्षता से काम किया था और आखिर आकर देवा को रिपोर्ट दी थी कि कामले ने जो कुछ बताया है, सब कुछ सच बताया है।
यह सुनकर देवा बहुत खुश हुआ था और उसने अपने गैंग वालों को तुरंत ही कुछ विशेष प्रकार की तैयारियां करने का निर्देश जारी कर दिया था।
गुप्त रूप से दुबई से बारह नई मशीनगनें मंगवाई गई थीं जो वहां काबुल से पहुंची हुई थीं और गैंग के कुछ "विशेषज्ञों" को बम तैयार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। गैंग की भाषा में कोड में बम को "पाइनएपल" (अनानास ) कहा जाता था ।
इन तैयारियों के दौरान देवा बेहद जोश में दिखाई देता था। उसका वो जोश जैसे गैंग के लोगों में प्रवेश कर रहा था। वो सब दुश्मन पर झपट पड़ने के लिये व्यग्र थे। यह सबकुछ अत्यंत खतरनाक दिखाई दे रहा था। हर गैंग मेम्बर के शरीर में जैसे बिजली भर गई थी उस समय। एक शाम खालिद अपने विशेष लंगड़ाहटभरे ढंग से चलता हुआ देवा के कमरे में दाखिल हुआ था और बोला था---
"मेरा ख्याल है कि अब हम जंग शुरू करने के लिये तैयार हैं। हमारी पहली कार्रवाई कहां शुरू होगी ?"
“अभी मैंने फैसला नहीं किया। जब फैसला कर लूंगा, तो तुम्हें बता दूंगा।” देवा ने सपाट स्वर में जवाब दिया था।
“और वो, जो पूर्वी साईड गैंग का बन्दा हमारे कब्जे में है, उसका क्या करना है?"
"करना क्या है ? जैसे ही पूर्वी गैंग वालों के साथ हमारी जंग चरम पर पहुंचेगी, मैं बाबू कामले को वो रकम दे दूंगा, जिसका मैंने वादा किया है। रकम देकर उसे किसी ट्रेन में सवार करा दिया जाएगा। मुझे यकीन है कि उस वक्त वो शहर से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझेगा और भगवान को धन्यवाद देगा ।"
"हां, यह बात तो है। लेकिन मैं सोच रहा हूं कि अब उसे रकम देने की भी क्या जरूरत है? उसने सारी जरूरी बातें तो हमें बता ही दी हैं। अब उसे पैसा देना बेवकूफी होगी। उसे गाड़ी में बिठाकर लम्बी सैर के लिये भिजवाकर ठिकाने लगवा देना, अच्छी खासी रकम बच जाएगी।" खालिद ने कहा था।
देवा को इस सुझाव पर जैसे धचका-सा लगा था। उसने कहरभरी नजरों से खालिद की तरफ देखा---
“मैं हर हाल में अपने वादे पर कायम रहने वाला इंसान हूं। चाहे वो वादा दोस्त के साथ हो या किसी दुश्मन के साथ।” वो एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बोला था--- "कुछ दिन पहले मैंने तुम्हें एक काम सौंपा था। मैंने तुम्हें एक खास आदमी को ठिकाने लगाने के लिये कहा था। । वो काम तुमने अभी तक नहीं किया। मैंने तुम्हें यह भी बताया था कि अगर तुम वो काम नहीं कर सके, तो तुम्हारे साथ क्या होगा। उम्मीद है, तुम्हें वो बात याद होगी। मैं अपने वादे पर कायम रहूंगा। मगर यह भी याद रखना कि मैं गर्मियों के पूरे मौसम उस काम के पूरा होने का इन्तजार नहीं करूंगा। बेहतर हो कि उस काम को जरा जल्दी करने की कोशिश करो।"
"बलराम को ठिकाने लगाना इतना आसान काम नहीं है...जितना कि तुम समझ रहे हो ।" खालिद कुछ अप्रिय स्वर में बोला था।
"अगर वो काम आसान होता, तो मैं उसे तुम्हारे सुपुर्द कभी न करता।" देवा ने सर्द और सख्त लहजे में कहा--- "गैंग का कोई भी मामूली-सा प्यादा वो आसान काम कर सकता था। तुम गैंग के खास आदमी हो। मैं अब गैंग में “नम्बर-वन" हूं और तुम “नम्बर-टू” हो । अगर तुम यह काम नहीं कर सकते, तो फिर तुम्हें नम्बर टू रहने का भी कोई हक नहीं है।" कहकर देवा मेज पर झुककर कुछ कागजात देखने लगा। यह जैसे इस बात का संकेत था कि उनकी मीटिंग खत्म हो चुकी है और अब खालिद वहां से जा सकता है।
खालिद को कमरे से जाना ही पड़ा।
इस बात को दस मिनट ही बीते थे कि गार्ड अन्ना ने भीतर प्रवेश करके कहा।
"दो घंटे से एक आदमी बाहर खड़ा है। टल नहीं रहा। वो बार-बार आपसे मिलने को कह रहा है।"
देवा ने नज़रें उठाकर सवालियां निगाहों से अन्ना से पूछा ।
"कौन है वो ?"
"मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा।"
"नाम ?"
"अपना नाम नहीं बता रहा। कई बार पूछा मैंने। जब मैंने इन्कार कर दिया कि तुम सुरेन्द्र पाल से नहीं मिल सकते तो कहने लगा, वो बाहर ही खड़ा है, सुरेन्द्र पाल कभी तो बाहर निकलेगा।" अन्ना ने कहा।
"उसे मुझसे क्या काम है। काम के बारे में तो बताया होगा?" देवा बोला।
वो कुछ भी नहीं बता रहा, बस, आपसे मिलना चाहता है। मैंने सोचा उसे भगाने से पहले आपसे बात कर लूं।"
देवा के चेहरे पर सोच के भाव उभरे। वो अन्ना को देखता रहा फिर बोला ।
"उसे बाहर दरवाजे पर लाओ। मैं दरवाजे की छोटी खिड़की से उसे देखता हूं।"
अन्ना बाहर निकल गया। पांच मिनट बाद लौट आया। देवा कुर्सी से उठा और दरवाजे के पास पहुंचकर, दो इंच चौड़ी, दो इंच लम्बी खिड़की, जो कि दरवाजे पर लगी थी, सरकाई और वहां आंख लगा दी। अगले ही पल उसकी आंखें सिकुड़ गई। चेहरे पर अजीब से भाव आ गये।वो जगमोहन था।
वो ही जगमोहन, जिसने खतरे के समय कभी उसके बॉडीगार्ड का काम किया था और एक बार एक अंधेरी गली में उसकी वजह से उसकी जान बची थी। देवा, छोटी खिड़की पर आंख लगाये उसे देखता रहा। गार्ड अन्ना के कमरे में जगमोहन बेचैन सा खड़ा था। जबकि देवा सोच रहा था कि अब तो उसकी शक्ल भी काफी बदल चुकी है। सब उसे सुरेन्द्र पाल के नाम से जानते हैं। देवा का नाम भूल चुके हैं, तो जगमोहन उसके पास क्या करने आया है। क्या जगमोहन जानता है कि वो देवा है या फिर उसका आना इत्तफाक ही है। देवा खिड़की बंद करके पलटा और अन्ना से बोला ।
"उसे अन्दर भेजो।"
अन्ना बाहर निकल गया।
देवा तुरन्त दरवाजे पर पहुंचा और छोटी खिड़की खोलकर देखा। अन्ना जगमोहन की तलाशी ले रहा था। देवा ने खिड़की बंद की और वापस कुर्सी पर बैठते हुए, टेबल पर पड़ी रिवॉल्वर को देखा। चेहरे पर सोच के भाव दिखाई दे रहे थे। वो समझ नहीं पा रहा था कि जगमोहन किस वजह के तहत उसके पास आया है।
तभी अन्ना ने जगमोहन के साथ भीतर प्रवेश किया।
देवा ने जगमोहन पर उड़ती निगाह मारी। अभी वो जानना चाहता था कि जगमोहन उसे पहचानता है या नहीं? किस बात के लिए उसके पास आया है। तभी अन्ना ने कहा।
"तलाशी में कोई हथियार नहीं मिला।"
देवा ने अन्ना को इशारा किया कि वो जाये और दरवाजा बंद कर जाये।
अन्ना बाहर निकल गया था और दरवाजा बंद कर गया था।
देवा और जगमोहन की नज़रें मिली।
“बोलो।" देवा ने कहा।
देवा पर नज़रें टिकाये जगमोहन टेबल के पास आया।
देवा हर तरह के हालात के लिए सतर्क था। वो नहीं जानता थी कि जगमोहन के मन में क्या है।
“मैंने तुम्हें एक बार देखा था और देखते ही पहचान लिया था कि तुम देवा हो ।” जगमोहन गम्भीर किन्तु धीमे स्वर में बोला--- "परन्तु फौज के वक्त तुम्हारी मौत की खबर अखबार में छपी थी। सब जानते हैं कि देवा मर गया है। तुमने वापस लौटकर कभी अपने को देवा नहीं कहा। सुरेन्द्र पाल नाम रख लिया। ऐसे में मैंने भी किसी को नहीं बताया कि तुम देवा ही हो।"
कुल पल चुप रहकर देवा मुस्करा पड़ा।
"बैठो जगमोहन ।”
जगमोहन बैठ गया।
"तुमसे दोबारा मिलकर खुशी हुई। मुझे वो वक्त याद है जब तुम मेरे पीछे रहकर, मुझे बचाने का काम करते थे।" देवा ने दोस्ताना लहजे में कहा--- "एक तुम ही हो, जिसने मुझे पहचान लिया।"
जगमोहन खामोश बैठा देवा को देखता रहा।
"मेरे पास क्यों आये हो?" देवा ने धीमे स्वर में पूछा।
"मैं कभी ना आता, परन्तु कोई और रास्ता नहीं था मेरे पास।” जगमोहन बोला--- "आज सुबह मेरी मां को हार्ट अटैक हुआ था। मैं मां को अस्पताल ले गया। अभी वो जिन्दा है, परन्तु डॉक्टर कहता है उसका फौरन ऑपरेशन जरूरी है। मेरे पास पैसे नहीं हैं।"
“क्या खर्चा है ऑप्रेशन का?" देवा ने सामान्य स्वर में पूछा।
"साठ हजार रुपये।” जगमोहन ने बेचैन स्वर में कहा।
देवा ने टेबल की ड्रा खोली और पांच सौ के नोटों की दो गड्डियां निकालकर टेबल पर रख दी।
“और जरूरत पड़े तो ले जाना।” देवा ने कहा।
जगमोहन टेबल पर पड़ी गड्डियों को देखने लगा। चुप-सा रहा।
“क्या बात है जगमोहन ?” देवा ने पूछा।
“मैं सोच रहा हूं कि ये पैसा तुम्हें कहां से वापस दूंगा, मेरे पास तो... ।”
“वापस देने की जरूरत नहीं।" देवा मुस्करा पड़ा--- “मैं वो वक्त भूला नहीं हूं, जब गली में तुमने मेरे दुश्मनों पर गोलियां चला कर मेरी जान बचाई थी। तुमने हमेशा मेरी सहायता की। मेरे कहने पर चले । तुम्हें अपना दोस्त मानता हूं मैं।”
जगमोहन ने आभार भरी निगाहों से देवा को देखा और गड्डियां उठाकर कर कहा ।
"इन पैसों के बदले मैं तुम्हारा कोई भी काम करने को तैयार हूं।"
"कोई जरूरत नहीं। अपनी मां का ध्यान रखो। जाकर डॉक्टर से कहो कि ऑप्रेशन कर दें। मैं बात करूं डॉक्टर से?"
“सब ठीक है।" जगमोहन उठता हुआ बोला--- "सिर्फ पैसे की जरूरत थी। बहुत मेहरबानी दोस्त, तुम बहुत वक्त पर काम आये।"
देवा मुस्कराकर उसे देखने लगा।
जगमोहन नोटों की गड्डियां जेब में डाली और पलटकर दरवाजे की तरफ बढ़ गया। फिर दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। देवा खुले दरवाजे को कुछ पल देखता रहा। पहले का बीता वक्त उसे याद आ गया था जब वो देवा के नाम से जाना जाता था। अब सीढ़ियां चढ़कर कितना आगे आ गया था वो। उसने टेबल की ड्राज बंद की और अन्ना को भीतर बुलाकर कहा।
"जो अभी आया था, ये लड़का जब भी आये, इसे सीधे मेरे पास ले आना। इन्तजार मत कराना।"
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