अफजल सुल्तान शुक्रवार के दिन शहर से विदा हुआ था। देवा उसे मुम्बई सैन्ट्रल रेलवे स्टेशन तक छोड़ने गया था जहां से बंगलुरू की ट्रेन पकड़कर वहां से उसने अपनी किसी खुफिया मंजिल की तरफ रवाना हो जाना था। यह सारा काम सावधानी के तौर पर किया जा रहा था।
दरअसल देवा ही खुद चाहता था कि अफजल चुपके से इस शहर से रवाना हो जाए और उसके जाने की बात वक्त से पहले लोगों के ज्ञान में न आ पाए। प्लेटफार्म पर उपस्थित यात्रियों ने देवा या अफजल की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया था। उन्हें शायद इसकी फुर्सत ही नहीं थी।
देवा अफजल के छोड़ जाने की खबर आम होने से पहले-पहले गैंग पर अपनी पकड़ मजबूत कर लेना चाहता था। खासतौर पर वो दूसरे गिरोहों से यह खबर गुप्त रखना चाहता था कि अफजल सुल्तान ने रिटायरमेंट ले ली है। इन्हीं तमाम मामलों पर सोचता हुआ और अपनी आगामी कार्यनीति पर विचार करता हुआ जब वो अफजल के ऑफिस पहुंचा तो उसे आश्चर्य का हल्का-सा झटका लगा था, क्योंकि अफजल की छोड़ी हुई बड़ी-सी रिवाल्विंग चेयर पर खालिद बड़े शाही अन्दाज में अधलेटा-सा पसरा बैठा था।
इससे पहले देवा ने हमेशा उसे सिगरेट पीते हुए देखा था। मगर इस समय उसके मोटे-भद्दे होंठों में एक सिगार झूल रहा था। शायद यह सिगार उसने अफजल के सिगारों वाले डिब्बे में से ही निकाला था, जो मेज पर पड़ा था।
"आओ...बर्खुरदार आओ।" उसने बुजुर्ग की तरह देवा को सम्बोधित किया।
खालिद के पैर जूतों समेत मेज पर रखे हुए थे, कैप का छज्जा माथे पर झुका हुआ था। उसके नीचे से वो अपनी जैसी आंखों से यूं देवा को देख रहा था जैसे वो बॉस हो और देवा एक मामूली प्यादा, जो अपने काम की रिपोर्ट देने बॉस के पास आया हो।
खालिद के रंग-ढंग देखकर देवा के तन-बदन में आग लग गई थी। वो पहले ही खालिद को पसन्द नहीं करता था, अब उसकी इस छिछोरी अकड़ के प्रदर्शन ने उसे और भी सुलगा दिया था। लेकिन एकदम भड़क उठना भी देवा की फितरत के खिलाफ था। वो बड़ी मुश्किल से ठहरे-ठहरे स्वर में बोला---
“उठो, दूसरी कुर्सी पर बैठ जाओ, यहां मैं बैठना चाहता हूँ।"
"अच्छा... अच्छा!” खालिद ने अपेक्षा के विपरीत तुरंत देवा की आज्ञा का पालन करते हुए कहा और उठकर दूसरी कुर्सी पर बैठ गया।
देवा ने अफजल सुल्तान वाली सिंहासन जैसी कुर्सी सम्भाल ली। खालिद बोला---
“अब... चूंकि हम दोनों ने मिलकर गैंग के मामलों को चलाना है, इसलिये मैंने सोचा कि हमें एक मीटिंग कर लेनी चाहिये।”
“मैं इस वक्त तुम्हारे साथ किसी मीटिंग की जरूरत नहीं महसूस कर रहा।” देवा ने गहन गंभीरता से कहा। उसके चेहरे पर सख्ती के भाव थे--- "फिलहाल मेरे पास कोई ऐसा प्लान नहीं है जिसमें तुम्हारी सेवा की जरूरत हो। जब मुझे तुमसे कोई काम लेना होगा, तो तुम्हें बुलाकर निर्देश दे दूंगा।” कहकर देवा मेज पर रखे पेपर्स उलटपुलट कर देखने लगा। उसके स्टाईल से प्रकट था कि वहां बॉस कौन है।
इस वक्त देवा एक ऐसा बॉस नजर आ रहा था जिसके पास समय नहीं था और वो जरूरी काम के कारण अपने कमरे में किसी की उपस्थिति पसन्द नहीं कर रहा था। जब कुछ देर बाद भी देवा ने खालिद को अपनी जगह से उठते हुए नहीं देखा तो देवा ने सिर उठाया---खालिद अपनी छोटी-छोटी आंखों को और ज्यादा सिकोड़े, देवा की तरफ देख रहा था। कुछ देर तक दोनों उसी तरह आंखों में आंखें डाले एक दूसरे, को घूरते रहे। फिर देवा का हाथ धीरे से कोट की जेब में रेंग गया था। जेब में रिवॉल्चर मौजूद था। देवा को उम्मीद थी कि खालिद आवारागर्दी, उद्दण्डता और शायद बदतमीजी करेगा। लेकिन उसकी यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई थी। शायद उसकी आंखों में कुछ ऐसा था कि अगर खालिद का विचार अकड़ दिखाने का था, भी तो उसने फिलहाल उसे टाल देना ही बेहतर समझा था।
खालिद जैसे ढीला पड़ते हुए मुस्कराकर बोला---
"ठीक है... जैसी तुम्हारी मर्जी ।"
फिर उसने अपनी पी कैप सही करके सिर पर रखी और उठकर खड़ा हो गया। अगले क्षण वो अपने विशेष बेढंगे अन्दाज में चलता हुआ विदा हो गया।
देवा ने गहरी सांस ली। न जाने क्यों उसे महसूस हो रहा था कि फिलहाल उसने खालिद को अपने बॉस होने का अहसास दिला ही, दिया था। लेकिन शायद ये अस्थाई बातें थीं। उसे आशंका थी कि आगे चलकर खालिद उसके लिये एक बड़ी समस्या साबित होगा।
अगले दो-तीन दिन देवा ने रात-दिन काम किया था और गैंग के मामलों का गहरी निगाहों से जायजा लिया था। उसने गैंग की पिछली दो-तीन साल की आमदनी का हिसाब भी देखा था, खाते चेक किये थे। जल्दी ही देवा को अन्दाजा हो गया था कि कमाई के लिहाज से गैंग आगे की बजाय पीछे की तरफ जा रहा है। देवा के ख्याल में इसका कारण अफजल सुल्तान का ढीलापन और उसकी नर्म पॉलिसियां थीं। देवा ने महसूस किया था कि कारिन्दों का मनोबल कुछ ज्यादा ऊंचा नहीं था, उनके कामों में और उनके दिलों में उत्साह भरने के लिये कुछ सरगर्मियां भी जरूरी थीं। देवा के ख्याल में, अगर इस मकसद के लिये विरोधी गिरोहों के दो-तीन आदमियों को कत्ल भी कर दिया जाए, तो कोई हर्ज नहीं था। अपने इलाके में अपने गैंग की पकड़ मजबूत करने के लिये और अपनी योजनाओं की सफलता के लिये उसे अपने गैंग की दहशत कायम करना जरूरी महसूस हो रहा था। देवा ने निश्चय किया कि दो महीने के अन्दर-अन्दर वो गैंग की कमाई में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी करके दिखा देगा।
शनिवार की रात को देवा दस बजे तक ऑफिस में बैठा था कि अन्ना अन्दर आया था। अन्ना देखने में सूखे चेहरे वाला एक दुबला-पतला सा आदमी था, लेकिन हकीकत में वो बहुत खतरनाक था। वो ऑफिस के बाहर गार्ड ड्यूटी देता था।
"ए०सी०पी० तांब्रे आया है।" अन्ना ने सूचना दी।
"कौन....?" देवा ने चौंककर सिर उठाते हुए पूछा था।
"ए०सी०पी० जयंत तांब्रे ।" अन्ना ने दोहराया। फिर जैसे उसने देवा की जानकारी में बढ़ोत्तरी करते हुए कहा--- "वो हैडक्वार्टर में स्पेशल ब्रांच का मुखिया है।"
"ओह...!" देवा के होंठों पर जहरीली सी मुस्कराहट उभर आई थी। वो ए०सी०पी० जयंत तांब्रे को कैसे भूल सकता था, तांब्रे की वजह से ही उसकी जिन्दगी में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ आया था।
ए०सी०पी० तांब्रे वही पुलिस ऑफिसर था जिसके मुंह पर देवा ने क्लब में उस वक्त जबर्दस्त घूंसा जड़ दिया था। जब देवा लीना के साथ था। तांब्रे ने लीना के साथ बदतमीजी शुरू कर दी थी। उस वक्त तांब्रे नशे में धुत्त था। उसके बाद पुलिस के कहर के खौफ से और अपने हाथों विनायक शेट्टी गैंग के एक आदमी का कत्ल हो जाने के बाद देवा को भागकर फौज में भर्ती होना पड़ा था। आज देवा उससे जरा भी भयभीत नहीं था। उसने अपना रिवाल्वर निकालकर मेज पर अपने सामने रख लिया और अन्ना से कहा---
"उसे अन्दर भेज दो।"
कुछ सेकेण्ड बाद ए०सी०पी० जयंत तांब्रे आत्मविश्वास और साथ ही नफरत से भरे ढंग से यों अन्दर दाखिल हुआ जैसे उसे मालूम हो कि यहां उसका स्वागत गर्मजोशी से नहीं किया जाएगा। लेकिन यहां के लोग उसे स्वागततम कहने पर मजबूर होंगे। इसके अलावा वो यहां के तौर-तरीकों से भी अच्छी तरह परिचित मालूम होता था। देवा ने उसे अन्दर आते देखा, तो उसके शरीर में जैसे नफरत की आग भड़क उठी। लेकिन वो दिखावे के लिये शांत ही बैठा रहा था। उस वक्त उसे सबसे ज्यादा फिक्र इस बात की थी कि कहीं तांब्रे उसे पहचान तो नहीं लेगा?
जयंत तांब्रे के भावों में उसे देखकर कोई परिवर्तन नहीं आया तो देवा को अन्दाजा हो गया कि उसने उसे नहीं पहचाना था। वाकई देवा में काफी परिवर्तन आ गए थे। उसके शरीर पर बढ़िया सूट था और बदन इन दिनों भरा-भरा-सा एक जवान मर्द का लगने लगा था, जबकि तांब्रे से भिड़न्त के वक्त वो बिल्कुल छोकरा ही लगता था। देवा का चेहरा भी भरा-भरा और सख्त नजर आने लगा था। फिर उसके गाल पर जख्म का वो निशान तो स्पष्ट था ही। उस निशान ने उसका व्यक्तित्व ही जैसे बदलकर रख दिया था।
ए०सी०पी० जयंत तांब्रे अपनी पुलिस कैप का छज्जा जरा ऊपर करके देवा के सामने आ खड़ा हुआ था। वो आंखें सिकोड़कर देवा को घूरते हुए बोला---
"अफजल सुल्तान कहां है?"
"वो इस वक्त यहां नहीं है।" देवा ने सर्द स्वर में कहा।
"वो तो मैं भी देख रहा हूं। अन्धा नहीं हूं।" तांब्रे भड़ककर बोला-- "मैंने पूछा था वो कहां है?"
"अफजल साहब शहर से बाहर गए हुए हैं और कुछ समय तक वापस भी नहीं आयेंगे।" देवा ने उसी सर्द लहजे में कहा।
"मेरे साथ मजाक न करो।" तांब्रे नाक सिकोड़कर गुर्राया--- "हर महीने की पहली तारीख को अफजल खुद यहां मेरे स्वागत के लिये मौजूद रहता था।"
"ओह...! मैं समझ गया। इस बारे में तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है।" देवा ने कहा और मेज की दराज में से छोटी-सी एक नोट-बुक निकालकर उसके पन्ने उलट-पुलटकर देखने लगा। इस नोट-बुक में छोटे-बड़े उन तमाम ऑफिसरों के नाम लिखे हुए थे, जिन्हें नियमित रूप से गैंग की तरफ से पैसा भेजा जाता था। नाम अल्फाबेटीकली लिखे हुए थे। देवा को उनमें जयंत तांब्रे का नाम ढूंढने में देर नहीं लगी थी। वहां रकम कोड वर्ड्स में पचास हजार रुपये महीना लिखी हुई थी।
देवा ने हजार के नोटों की एक गड्डी निकाली और उसमें से पचास नोट गिनकर मेज पर फेंक दिये। फिर वो रौब से बोला---
"माल खाते हो तो, नमक का हक भी अदा करते रहा करो।"
नोट देखते ही तांब्रे के चेहरे की सख्ती और खुरदरेपन में जैसे कमी आ गई थी। वो नोट उठाकर जेब में डालते हुए बोला---
“मुझ जैसे लोग नमकहलाली कर रहे हैं, तभी तो तुम्हारे धन्धे चल रहे हैं। वर्ना तो मैं तुम्हारा वो हश्र करता कि दुनिया देखती।”
"यह तो वक्त ही बताता कि कौन किसका क्या हश्र करता ।" देवा उसकी आंखों में आंखें डालकर पहले से भी ज्यादा सर्द स्वर बोला--- "लेकिन अच्छा हो कि हम काम की बातें करें।"
“हूं।" तांब्रे ने हुंकार भरी--- “बोलो।"
“मेरा नाम सुरेन्द्र पाल है और मैं इस गैंग का नया बॉस हूं।"
“तुम...?" तांब्रे आश्चर्य से बोला ।
“हां... मैं ।” देवा ने शब्दों पर जोर देते हुए कहा--- "हो सकता है, अफजल कभी वापस आ जाए, लेकिन फिलहाल इसकी उम्मीद नहीं है। वो अनिश्चित काल के लिये छुट्टी पर चला गया है।”
"क्या मतलब?" तांब्रे चौंका था।
"मतलब यह कि वो लगभग रिटायर हो गया है।" देवा ने कहा।
"रिटायर... मगर क्यों ?"
"वो इन धन्धों से थक गया था ऑफिसर!" देवा ने कहा--- “इसलिये उसने ये मामले मेरे सुपुर्द कर दिये हैं।
"और...किसी ने इस बात पर एतराज नहीं किया?" तांब्रे ने गंभीरता से पूछा।
"एतराज करने वालों के लिये मेरे पास खास इलाज है।" देवा ने मेज पर रखे रिवाल्वर को थपथपाते हुए खूंखार लहजे में जवाब दिया।
"बहुत खूब!" तांब्रे ने सिर हिलाया--- “मैं भी महसूस कर रहा था कि कुछ समय से अफजल ढ़ीला पड़ गया था और इस गैंग को किसी गर्म खून वाले नए जवान लीडर की जरूरत थी। दूसरे गिरोहों के लोगों के लिये भी यह खबर चौंका देने वाली होगी।"
"लेकिन मैं नहीं चाहता कि अभी यह खबर फैले।” देवा ने जल्दी से कहा था--- "तुम्हें मैंने इसलिये बता दिया है कि कभी अगर अचानक तुम्हें फोन करना पड़े, तो तुम्हें पहले से यह मालूम हो कि मैं कौन हूं।"
ए०सी०पी० तांब्रे उसके जवाब पर केवल कंधे उचकाकर रह गया।
फिर तांब्रे वापसी के लिये मुड़ गया। देवा विचारपूर्ण मुद्रा में उसे जाते हुए देखता रहा । दौलत की जादूगरी पर उसे अब भी कभी-कभी आश्चर्य होता था। ये रंगीन कागज के पुरजे जिन्हें करेंसी नोट कहा जाता है, कैसी-कैसी मजबूत दीवारें गिरा देते थे। कानून के रक्षकों को कानून के भक्षकों का रक्षक बना देते थे। कैसा उल्टा सिस्टम था । थोड़ी-सी तनख्वाह लेने के लिये जान की बाजी लगा दो और दौलत के अंबार समेटने के लिये कुछ भी न करो। बस अपनी ड्यूटी से मुंह फेर लो।
दरवाजे पर दस्तक की आवाज ने देवा को उसके ख्यालों की दुनिया से बाहर आने पर मजबूर कर दिया। उसने दिल ही दिल में खुद को फटकारा कि वो समझदारों की तरह सोचने की क्यों कोशिश कर रहा है।
"आ जाओ।" उसने ऊंची आवाज में कहा और अनचाहे ही मेज पर रखे रिवाल्वर को इस तरह घुमा दिया कि उसकी नाल का रुख दरवाजे की तरफ हो गया। आने वाला अगर उसका दुश्मन होता, तो देवा अंगुली हिलाता और आने वाले के पेट में सुराख हो जाता।
लेकिन अन्दर आने वाला दुश्मन नहीं बल्कि गार्ड अन्ना था ।
"अभी-अभी नीचे किसी ने फोन पर सूचना दी है कि हमारे एक ड्राईवर जॉनी को किडनेप करके उसे गोली मार दी गई है।" अन्ना ने कहा--- "उसे उठा ले जाने वाले शायद उसे मरा समझकर छोड़ गए थे। मगर वो जिन्दा है और गोदी के इलाके के एक गैरेज में है। फोन करने वाले ने कहा कि उसे तुरन्त डॉक्टरी सहायता की जरूरत है। शायद कोई डॉक्टर उसकी जान बचाने में सफल हो जाए। पता मैंने नोट कर लिया है।" अन्ना ने एक कागज देवा को दिखाया।
“कमाल है!” देवा ने सोचते हुए आश्चर्य से कहा--- "जॉनी ने यहां...ऑफिस वाले फोन पर फोन क्यों नहीं करवाया ?"
"बेचारे ने अपनी समझ में सावधानी बरती होगी। मैं उसे जानता हूं, वो बड़ा होशियार और भरोसेमंद नौजवान है।" अन्ना ने कहा ।
“अगर यह सूचना सही है, तो मैं जॉनी की हर संभव मदद करना चाहूंगा।” देवा बोला--- “लेकिन मुझे डर है कि कहीं यह पूर्वी गैंग वालों का मेरे लिये फैलाया गया जाल न हो। इस तरह वो मुझे किसी खास जगह बुलाना चाहते हों।"
अफजल सुल्तान का गैंग बहुत व्यवस्थित और सुसंगठित था। किसी-न-किसी जगह किसी-न-किसी रूप में, उनके पास हर चीज का रिकॉर्ड रहता था। पांच मिनट के अन्दर अन्दर जॉनी का पूरा रिकॉर्ड देवा के सामने रखा हुआ था। उसमें यह भी लिखा हुआ था कि उस दिन जॉनी ने कहां-कहां जाना था।
जॉनी को गैंग से जुड़े दो साल हुए थे और उन दो सालों में जॉनी का काम शानदार रहा था। उसकी वफादारी सन्देह से ऊपर थी। उसका रिकॉर्ड बेदाग था। उस शाम जॉनी को शराब का एक ट्रक शहर के बाहरी इलाके तिलक पार्क से बांद्रा लेकर आया था, तिलक पार्क इलाके में ज्यादातर गोवानी रहते थे। उनमें से बहुतों ने अपने घरों में नाजायज शराब की फैक्ट्रियां लगा रखी थीं। गोवानी लोग बड़ी निडरता और इत्मीनान से नकली शराब बनाने का काम करते थे, ठीक-ठाक पैसा कमाते थे और इस काम को बहुत ही उपयुक्त व्यापार या जीवनयापन का एक बढ़िया साधन मानते थे।
देवा ने तिलक पार्क में अपने एक आदमी को फोन किया, तो उसे पता चला कि जॉनी अपने शैड्यूल के अनुसार, “माल” लेकर रवाना हो गया था। एक और फोन कॉल से देवा को पता चला कि जॉनी माल का ट्रक लेकर, ठिकाने पर यानि गोदाम तक नहीं पहुंचा था। इससे जाहिर होता था कि फोन पर मिलने वाली सूचना ठीक दी थी। उसे रास्ते में ही ट्रक सहित अगवा कर लिया गया था। देवा का दिल तो पहले ही चीख-चीखकर कह रहा था कि सूचना सही थी, लेकिन एक अच्छे और सावधान व्यक्ति की तरह उसने हर संभव तरीके से संतुष्टि कर लेनी जरूरी समझी थी।
"नीचे जाकर कहो कि छः-सात आदमी और दो कारें चलने के लिये तैयार हो जाएं, उन्हें काफी हथियार भी ले जाने हैं।" देवा ने शांत स्वर में अन्ना से कहा--- "मैं जाकर देखता हूं, मामला क्या है?" देवा की आंखों में एक अजीब-सी चमक प्रकट हो चुकी थी, जैसे किसी दरिन्दे को दूर कहीं शिकार की झलक नजर आ गई हो।
लेकिन ऊपर से देवा बिल्कुल शांत नजर आता था। अन्ना जल्दी से बाहर निकल गया था। नीचे होटल की इमारत में ही एक तम्बाकू स्टोर भी था। गैंग के वो लोग जो व्यस्त नहीं होते थे, तम्बाकू स्टोर में जमा रहते थे जिस तरह पुलिस हैडक्वार्टर में रेस्ट रूम होते हैं, ठीक उसी तरह का सिस्टम था यहां भी।
उस दौरान देवा ने एक डॉक्टर को फोन किया जो बहुत भारी फीस लेकर गैंग के जख्मियों का उपचार वगैरहा किया करता था और पुलिस को सूचना नहीं देता था। वो गोलियों के जख्मों की सर्जरी भी चुपके से कर डाला करता था। देवा ने डॉक्टर को गैरेज का एड्रेस बताकर उसे तुरन्त वहां पहुंचने का निर्देश दिया और खुद अपनी, गन जेब में डालकर तेजी के साथ ऑफिस से निकल आया था।
सीढ़ियां उतरकर देवा पिछली गली में आया था। वहां दो कारें खड़ी हुई थीं और नीम अन्धेरे में कुछ साये हिलते-डुलते नजर आ रहे थे। यह पिछली गली आमतौर पर गैंग के लोग ही इस्तेमाल किया करते थे। दूसरे लोग इधर से गुजरने का काम कम ही किया करते थे। गली वीरान पड़ी रहती थी । देवा ने कारों के दरवाजे खुलने-बंद होने और धातु की चीजों के एक-दूसरे से टकराने की क्षीण-क्षीण-सी आवाजें सुनी थी। वो समझ गया कि उसके साथी जरूर मशीनगनें भी कारों में रख रहे थे। वो सन्तुष्ट हो गया।
"दो-चार आदमी मशीनगनें लेकर आ जायें।" देवा ने एक कार की पिछली सीट पर खुलकर बैठते हुए ऊंची आवाज में कहा।
उसकी आवाज पर उसकी दाएं-बाएं और अगली सीटों पर उसके आदमी आ बैठे और कारें तेज रफ्तारी से रवाना हो गईं।
कारों की खिड़कियों पर पर्दे पड़े हुए थे। देवा जिस कार में बैठा था, उसमें भी उसने दो मशीनगनों की झलक देख ली थी। उसने सन्तुष्टि की गहरी सांस ली थी।
वो गैरेज, जो उनकी मंजिल थी, उससे कुछ दूरी पर ही उन्होंने कारें रोक ली थीं। इंजन और हैडलाईटें बंद की गईं।
अन्धेरे और सन्नाटे में उन्होंने आसपास का निरीक्षण किया। लेकिन उन्हें कोई संदिग्ध चीज या हलचल नजर नहीं आई थी। सन्तुष्ट होकर उन्होंने दोबारा कारें स्टार्ट की थीं और तेजी के साथ गैरेज की सीमा में जा घुसे थे। वो हर तरह की स्थिति से निपटने के लिये पूरी तरह तैयार थे।
खाकी वर्दी में लिपटा एक आदमी ग्रीस में लिथड़े अपने हाथ पोंछता और हिचकिचाता हुआ उनके पास आया।
"हमें सूचना मिली है कि हमारा एक आदमी जख्मी हालत में यहां मौजूद है?” देवा ने अपनी तरफ का दरवाजा खोलते हुए कहा ।
“हां....वो मेरे ऑफिस में है।" मैकेनिक ने कहा--- "एक मिनट पहले ही एक डॉक्टर भी उसे देखने पहुंच चुका है।" उसने एक छोटी-सी गाड़ी की तरफ इशारा किया था, जिसे देवा ने फौरन पहचान लिया। वो डॉक्टर की ही कार थी।
देवा गाड़ी से उतर आया और मैकेनिक के मार्गदर्शन में एक तरफ चल पड़ा। उसका हाथ जेब में रिवॉल्वर के दस्ते पर जमा हुआ था । देवा को मालूम था कि उसके आदमी मशीनगनों के साथ लोकेशन संभाले सतर्क बैठे हुए थे। वो खुद भी किसी चीते की तरह सतर्क था । गैरेज में पार्टीशन द्वारा बनाए गए एक छोटे से कमरे में पहुंचे, वहां कई तरह का काठ-कबाड़ बिखरा पड़ा था। डॉक्टर वहां मौजूद था। उसने सिर उठाकर देवा की तरफ देखा। वो बेचैन आंखों वाला एक छोटा-सा आदमी था, मगर अपने काम में बड़ा दक्ष था।
"इसकी हालत खतरनाक है।" डॉक्टर ने उस जख्मी नौजवान की तरफ इशारा करके कहा, जो कैनवास की एक स्ट्रेचर जैसी चारपाई पर लेटा हुआ था और बेहोश लगता था--- "इसके सीन में दो गोलियां लगी हैं। काफी खून बह चुका है। इसे जल्दी से जल्दी ऐसी जगह ले जाना जरूरी है जहां मैं इसकी सर्जरी कर सकूं और टांके लगा सकूं।"
वो नौजवान आंखें बंद किये पड़ा था और उसकी सांस उखड़ी-उखड़ी-सी चल रही थी। देवा ने पूछा---
“क्या इस हालत में इसे कहीं ले जाया जा सकता है?"
"मैं इसे इंजेक्शन दे देता हूं, जिससे इसमें कुछ ताकत आ जाएगी।" डॉक्टर ने कहा और एक इंजेक्शन तैयार करके उस नौजवान को लगा दिया।
वो लड़का हिम्मती था, मुश्किल से बीस बरस का होगा। उसके चेहरे पर इस समय मौत की जर्दी फैली हुई थी। मगर इंजेक्शन लगते ही थोड़ी देर बाद उसने धीरे से आंखें खोल दी थीं। डॉक्टर जल्दी से बोला---
"इससे बात करने की कोशिश न करना। इस वक्त इसकी हालत ऐसी नहीं है।" उसने खबरदार किया था।
मगर देवा ने उसके निर्देश को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया। उसने आगे बढ़कर बड़े अपनेपन से उसका हाथ थाम लिया था।
नौजवान की आंखों में उभरने वाली चमक से जाहिर था कि उसने देवा को पहचान लिया था। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी खुशी और स्फूर्ति की चमक दौड़ गई थी, शायद उसे यह उम्मीद नहीं थी कि उसका बॉस इतनी जल्दी उसकी मदद को आन पहुंचेगा।
"यह पूर्वी साईड गैंग वालों की करतूत थी न?" देवा ने पूछा--- "तुम्हें बलराम के आदमियों ने उठाया था?” देवा उसके करीब पंजों के बल बैठ गया था ।
नौजवान में शायद जवाब देने की शक्ति नहीं थी। उसने केवल हल्के से हां में सिर हिलाकर पुष्टि कर दी थी।
“चिंता मत करो, उन्हें उनकी इस करतूत की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।" देवा ने जैसे उससे वादा किया था। उसका लहजा कुछ ऐसा था कि गैरेज के मालिक की आंखें भय से फैल गई थीं। शायद अब उसे यह अहसास हो रहा था कि वो अपने अन्दाज से भी कहीं ज्यादा खतरनाक मामले में फंस गया है।
देवा ने जब गैराज वाले से इस मामले में कुछ विवरण जानना चाहा, तो उसने बताया कि वो गढ़े में फंसी कार को निकालने लगा था जिसे उसने अपनी गाड़ी के साथ बांधकर लाना था। उसके बारे में उसे फोन पर सूचना दी गई थी। वापसी में उसने इस नौजवान को बुरी तरह जख्मी हालत में झाड़ियों के पास पड़े देखा था और तरस खाकर उसे गाड़ी में डाल लिया था। उस समय तक वो कुछ होश में था। उसने प्रार्थना की थी कि उसके बारे में न तो पुलिस को सूचना दी जाए, न ही एम्बूलेंस बुलाई जाए। बस एक नम्बर पर फोन कर दिया जाए। मैकेनिक ने उसकी बात पर अमल किया था और उसके बताए नम्बर पर फोन कर दिया गया था।
"तुमने बहुत अच्छा किया।” देवा ने उसका कंधा थपककर कहा--- "और मेरा ख्याल है कि अब तुम अपनी याददाश्त कमजोर होने का सबूत भी दोगे। तुम्हें कतई याद नहीं रहेगा कि ऐसी कोई घटना घटी है।"
देवा ने पांच हजार रुपये उसकी जेब में डाल दिये। वो मुस्कराया और बोला---
"जी....सर ! मेरी यादाश्त तो बचपन से ही बहुत खराब है।"
देवा को खुशी हुई कि मैकेनिक को ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं पड़ी थी।
उन लोगों ने अपने जख्मी साथी जॉनी को बड़ी सावधानी से अपनी गाड़ी में डाला था---और अपने हैडक्वार्टर ले आए थे जहां डॉक्टर ने निहायत आपात स्थिति में उसकी जान बचाने की कोशिश शुरू कर दी थी।
उस बीच देवा अपने कमरे में आ गया था और उसने खालिद को बुलावा भेजा था। आखिर खालिद उसका फर्स्ट लेफ्टीनेंट था और अफजल ने जाते समय उसे असाधारण रूप से विश्वास प्रकट किया था। देवा के ख्याल में अब खालिद की वफादारी और क्षमताओं को आजमाने का समय आ गया था। खालिद अन्दर आया तो उसका मुंह कुछ फूला हुआ था। लेकिन देवा ने उसके इस रवैये की परवाह न करते हुए उसे जॉनी के अपहरण से लेकर उसे होटल में लाए जाने तक के बारे में बता दिया। फिर कहा---
"डॉक्टर उसकी जान बचाने की कोशिश कर रहा है। मैं चाहता हूं कि पूर्वी साईड वालों को फिर से ऐसी हरकत करने का साहस न हो ।"
“क्या तुम उन्हें ऐसी हरकतें करने से रोक सकते हो ?" खालिद ने पूछा। बात करते समय भी उसके होंठों में लम्बी सिगरेट दबी हुई थी। उससे उठते धुएं की लकीर की वजह से उसकी बाईं आंख जरा-सी बन्द थी।
"हां, मैं उन्हें रोकूंगा ।" देवा ने मेज पर घूंसा मारकर कहा--- "अगर उन्हें सबक सिखाने के लिये मुझे अपने समेत अपने गैंग के हर आदमी की बलि भी देनी पड़ेगी तो मैं तैयार हूं। बहुत समय से हमारी तरफ से नर्म पॉलिसी चली आ रही है। अब मैं उनके साथ वो सलूक करने वाला हूं कि वो सपनों में भी डर-डरकर चीखेंगे। अफजल का ख्याल था कि शरद शिरके को मारकर हमें जरा शांति मिलेगी और हम अपने कारोबार की तरफ ध्यान दे सकेंगे। लेकिन उन लोगों को बलराम जैसा लीडर मिल गया। जो शिरके से भी अच्छा लीडर साबित हो रहा है। आज से बस यूं समझ लो कि हमारे और उनके बीच में एलान-ए-जंग हो चुका है। बाकी छोटे-मोटे गिरोहों की मुझे इतनी फिक्र नहीं है। उनके धन्धे भी छोटे-छोटे हैं और वो हमसे टक्कर नहीं ले सकते।" दो क्षण रुकने के बाद देवा ठहरे-ठहरे से स्थिर और सपाट स्वर में बोला--- “जॉनी को कत्ल करने की कोशिश करके उन्होंने छेड़खानी में पहल की है। लेकिन उन्हें यह भी अच्छी तरह मालूम होगा कि जॉनी जैसे लड़कों के मरने से भी गैंग नहीं टूटता या बिखरे दूसरे लड़के फौरन उनकी जगह ले लिया करते हैं। गैंग जब अपने महत्त्वपूर्ण लोगों को खो देते हैं, तब वो टूटते और बिखरते हैं। ऐसे लोग, जो उन गिरोहों को चला रहे होते हैं। यह बात जरूर बलराम जैसा शातिर और चालाक आदमी भी जानता होगा। उसका असली निशाना भी जॉनी जैसे लड़के नहीं होंगे। बल्कि मैं और तुम होंगे। जल्दी ही उनका रुख हमारी तरफ होने वाला होगा खालिद ।" देवा ने रुककर गहरी सांस ली। फिर एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बोला--- “लेकिन... मैं उन्हें इसका मौका नहीं दूंगा। अब इस मामले में मैं पहल करूंगा और इस काम के लिये मैंने तुम्हें चुना है।"
"मैं ही क्यों ?" खालिद गुर्राया। उसके चेहरे पर तनाव के भाव आ गए थे।
"क्योंकि यह काम किसी भरोसे के आदमी से लेना चाहता हूँ, जिसके बारे में मुझे विश्वास हो कि वो यह काम सही तरीके से कर सकता है।" देवा ने बेहिचक जवाब दिया।
"तुम... खुद ही यह काम क्यों नहीं कर लेते?" खालिद ने जानना चाहा।
देवा कुछ सेकेण्ड उसे खामोशी से घूरता रहा। उसके दिल में गुस्सा आग की तरह भड़कने लगा था। उसका अन्दाजा था कि उस आग की आंच उसकी आंखों से भी झलकने लगी होगी। लेकिन उसने बड़ी मुश्किल से गुस्से को काबू में रखते हुए कहा।
"मैं इसलिये इस काम को नहीं कर रहा, क्योंकि फिलहाल मैं इसे अक्लमंदी नहीं मानता। गैंग लीडर के रुप में मेरी ड्यूटी यह है कि खुद पर्दे के पीछे रहकर मामलों को चलाऊं और विभिन्न लोगों की योग्यताओं के अनुसार उनके सुपुर्द विभिन्न काम कर दूं।" उसका स्वर स्थिर था ।
खालिद व्यंग्य से हँस दिया। उसकी आंखें जैसे कह रही थीं---
"साफ-साफ क्यों नहीं कह देते कि तुम्हारे अन्दर इस काम की हिम्मत नहीं है।” लेकिन उसने इतनी अक्लमंदी जरूर की कि मुंह से कुछ नहीं कहा।
देवा की आंखों में शोलों की लपक साफ दिखाई दे रही थी। वो दबे-दबे से रोष के साथ गंभीरता से बोला---
"अगर मैं अपने हाथों से बलराम को कत्ल करना जरूरी समझूंगा तो अड़तालीस घंटे के अन्दर अन्दर इस काम को निपटा दूंगा। मेरे लिये यह कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। मैं गैंग के किसी भी आदमी को कभी भी ऐसा कोई काम नहीं बताऊंगा जिसे मैं खुद न कर सकता हूँ । इससे पहले मैं शरद शिरके और दूसरे लोगों को ठिकाने लगा चुका हूं। कई बार मैं यह साबित कर चुका हूं कि मुझे जो काम सौंपा जाता है उसे मैं हर हाल में पूरा करता हूं, चाहे काम कितना ही मुश्किल क्यों न हो। लेकिन मैंने तुम्हें यह साबित करते कभी नहीं देखा। जरा मैं भी तो तुम्हारी योग्यता का प्रदर्शन देखूं । तुम्हारे लिये अपनी काबलियत का सबूत देने का यह स्वर्ण अवसर है, सुनहरा मौका।"
गुस्से से खालिद का चेहरा जैसे विकृत होकर रह गया था। लेकिन देवा ने जो कहा था, उसका जवाब भी खालिद के पास नहीं था। वो थोड़ी देर खामोशी से देवा को घूरता रहा था। ऐसा लगता था जैसे वो किसी भी क्षण गन निकाल लेगा।
देवा उससे पहले गन निकालने के लिये पूरी तरह तैयार था। लेकिन खालिद ने जल्दी ही खुद पर कण्ट्रोल पा लिया था। वो पूरी तरह रबर दिमाग का नहीं लगता था, उसमें अभी थोड़ी-बहुत अक्ल बाकी थी।
“मेरे बाद तुम ही गैंग के महत्त्वपूर्ण आदमी हो खालिद भाई।" देवा ने अब कुछ नर्म और मुलायम स्वर में कहा था-- "मैं यह नहीं कह रहा कि यह काम तुम जरूर अपने हाथों से ही करो। तुम्हें सिर्फ इसकी प्लानिंग ही करनी है। जिन आदमियों से काम लेना जरूरी समझो, उनसे काम लो। जहां तुम्हारा खुद कुछ करना जरूरी हो जाए, वहां खुद करो। मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि यह काम हो जाए। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि काम कैसे होगा और तुम किससे क्या काम लोगे ?"
"और... अगर मैं यह जिम्मेदारी अपने सिर न लूं तो...?” खालिद भी कुछ-न-कुछ टेढ़ापन दिखाने पर तुला नजर आता था।
"तो फिर तुम अपने आपको गैंग से बाहर समझना ।" देवा ने बेहिचक लेकिन सख्त स्वर में जवाब दिया था।
"अफजल जो कुछ कहकर गया है, उसके बावजूद तुम यह बात कह रहे हो?" अब खालिद के गुस्से में अविश्वास भी शामिल था।
“अफजल मुझे गैंग का बॉस बनाकर गया है और वही बॉस होता है जिसकी अवज्ञा कोई न कर सके। मैं अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जानता हूं। गैंग में जो भी मेरा ऑर्डर मानने से इंकार करेगा, उसके लिये गैंग में कोई जगह नहीं रहेगी। यह नियम तुम पर भी लागू होता है और छोटे-मोटे प्यादों पर भी।" देवा ने एक पल में रिवाल्वर जेब से निकालकर मेज पर रख दिया और गहन गंभीर, ठण्डे स्वर में बोला--- “मेरे पास अपनी अथॉर्टी प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन यह है।" अब देवा पलकें झपकाये बगैर खालिद की पीली आंखों में देख रहा था।
खालिद कुछ सेकेण्ड स्तब्ध-सा बैठा रहा। फिर उठते हुए बोला---
"ठीक है... मैं यह काम कर लूंगा।"
उसके जाने के बाद देवा सोचता हुआ दरवाजे को घूरता रहा था। फिर उसके होंठों पर एक गुप्त-सी क्षीण मुस्कराहट आ गई थी। उसे उम्मीद बन चली थी कि वो इस अड़ियल घोड़े को सधा लेगा और उसे गैंग के लिये ज्यादा फायदेमंद बना सकेगा। वो थोड़ी देर और इसी तरह बैठा सिगरेट फूंकता रहा था और बलराम के बारे में सोचता रहा था। बलराम वाकई एक चतुर योजनाकार था। अब अपनी योजनाओं पर अमल करवाने के लिये उसके पास एक शक्तिशाली गैंग मौजूद था। वो सही मायनों में देवा के गैंग का प्रबल प्रतिद्वन्द्वी था ।
देवा को ऐसा लगता था कि उसने अपने गैंग को और ज्यादा ताकतवर और मजबूत बनाने की जो योजनाएं बनाई थीं, उन पर बलराम ने पहले ही अमल शुरू कर दिया था। इधर उत्तरी साईड के बारे में भी देवा को सूचनाएं मिल रही थीं कि वहां के तीन गिरोहों ने मिलकर एक बड़े गैंग के रूप में उभरने के लिये योजनाएं बनानी शुरू कर दी थीं। इसका मतलब था कि जल्दी ही शहर में दो के बजाय तीन बड़े और शक्तिशाली गैंग सक्रिय हो जाने वाले थे और वो अपने धन्धे एक-दूसरे के इलाकों में फैलाने की कोशिशें करने वाले थे। उस स्थिति में सबसे ताकतवर और सबसे खूंखार गैंग ही अपनी रक्षा कर सकता था। देवा इस स्थिति से भयभीत नहीं था, वो किसी भी मौके और हालात के लिये पूरी तरह से तैयार था।
कुछ देर बाद देवा ने घंटी बजाई, चूहे जैसी शक्ल का अन्ना फौरन अन्दर हाजिर हो गया।
“जरा नीचे जाकर देखो।" देवा बोला--- "तम्बाकू स्टोर में हमारे कितने आदमी हैं और कौन-कौन हैं?"
अन्ना पांच मिनट बाद लौट आया था और उसने देवा को उन लोगों के नाम बताए थे, जो नीचे तम्बाकू स्टोर में मौजूद थे।
देवा ने कुछ सेकण्ड जैसे उन नामों पर सोचा। फिर कहा---
"मारियो डिकोस्टा को यहां भेजो।"
कुछ सेकेण्ड में ही मारियो आ पहुंचा। वो छरहरे शरीर का एक फैशनेबल प्रोफेशनल था, हमेशा मॉडर्न स्टाईल के कपड़े पहना करता था और अच्छा खासा शरीफ आदमी नजर आता था। मारियो गैंग का चीफ गनमैन था। बन्दूकों का इस्तेमाल बड़ी निडरता से और बेहिचक करता था और गजब का निशानेबाज था। देवा भी दिल ही दिल में उसकी क्षमताओं का प्रशंसक बन चुका था।
"बैठो मारियो।" देवा ने गहरी निगाहों से उसका निरीक्षण करते हुए कहा--- "मैं तुम्हें एक काम सौंपना चाहता हूं।"
मारियो की पतलून की क्रीज तलवार की धार जैसी थी। वो सावधानी से कुर्सी पर बैठ गया। उसने चांदी के लाईटर से इम्पोर्टेड सिगरेट सुलगाई और देवा की तरफ देखने लगा था।
"तुम पूर्वी साईड गैंग के किसी आदमी को जानते हो?" देवा ने पूछा।
"कुछ लोगों को... सिर्फ चेहरों से पहचानता हूं।” मारियो ने सतर्क लहजे में जवाब दिया। उसकी आंखें कुछ सिकुड़ गई थीं। सवाल शायद उसके लिये अनपेक्षित था--- "क्या बात है, बॉस ?” मारियो ने पूछा।
"मैं चाहता हूं कि तुम उनमें से किसी एक को उठा लाओ।" देवा ने कहा।
"मैं... मैं समझा नहीं बॉस...?" मारियो कुछ उलझकर बोला था।
“मुझे बलराम के गैंग का एक आदमी चाहिये। वो गैंग में जितना महत्त्वपूर्ण हो, उतना ही अच्छा है। मैं चाहता हूं कि तुम उसे यहां लेकर आओ। मुझे इससे सरोकार नहीं कि तुम यह काम कैसे करते हो। बस जब वो आदमी यहां पहुंचे, तो उसे जिन्दा होना चाहिये। मैं उससे बलराम गैंग के धन्धों और उनकी कार्य-प्रणाली के बारे में जानकारियां प्राप्त करना चाहता हूं।” देवा ने बता दिया।
“ल....लेकिन बॉस... उनका कोई आदमी मुंह नहीं खोलेगा ।" मारियो ने हिचकिचाहट भरे स्वर में कहा।
“इसकी फिक्र न करो।” देवा ने लापरवाही से हाथ हिलाकर कहा--- "तुम्हें शायद पता नहीं कि यहां हमारे पास एक छोटा-सा तहखाना भी है। तुमने वो देखा है ?"
“न... नहीं...। लेकिन उसके किस्से सुने हैं।" मारियो ने जल्दी से कहा। उसके चेहरे पर जर्दी झलक आई थी।
"तुम जिसको लाओगे, उसकी जुबान खुलवाने का काम मुझ पर छोड़ दो। उसको जो कुछ भी मालूम होगा, जरूर बताएगा। अगर किसी ऐसे आदमी को ले आए, जिसके पास कुछ ज्यादा और काम की जानकारी हुई, तो तुम्हें पचास हजार का नकद इनाम दिया जाएगा।" देवा ने गम्भीर लहजे में कहा था।
मारियो ने सहमति में सिर हिलाया और उठकर बाहर निकल गया। रात का एक बज चुका था और देवा को भी करीना की याद आने लगी थी। उन्होंने इकट्ठे रहने के लिये जो फ्लैट लिया था, उसमें उनके दिन-रात बड़े रंगीन और मस्ती भरे गुजर रहे थे। दोनों एक-दूसरे की संगत में बेहद खुश थे। देवा को यकीन था कि इस वक्त भी करीना अपने शरीर की तमाम मस्तियों के साथ अपनी गर्म और गुदाज बांहें फैलाए उसकी प्रतीक्षा में होगी।
वो घर पहुंचा तो उसने करीना को बैड पर तकियों के सहारे बैठे पाया। एक मैगजीन उसकी गोद में खुली पड़ी थी। लेकिन शायद करीना का ध्यान उस मैगजीन की तरफ नहीं था। करीना अधखुली आंखों से हवा में घूरते हुए न जाने क्या सोच रही थी। उसके शरीर पर एक पारदर्शी-सी नाईटी थी, जिसमें से झांकते हुए उसके भरपूर विकसित अंग-प्रत्यंग झांक-झांककर प्रलय मचा रहे थे। मगर इस वक्त उसे शायद इसका भी होश नहीं था।
"क्या हुआ डियर ?" देवा ने उसे बांहों के घेरे में भींचते हुए चिंतित स्वर में पूछा--- "अभी तो हमें साथ रहते हुए एक महीना भी पूरा नहीं हुआ, हमारी शादी भी नहीं हुई तुमने उससे पहले ही दुखी रहना शुरू कर दिया है।"
"ऐसी बात नहीं है।" करीना फंसी-फंसी-सी आवाज में बोली थी--- "मैं तो तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत खुश हूं। इसलिये...परेशान भी हूं।”
"यह क्या बात हुई?" देवा ने हैरत से कहा--- “तुम मेरे साथ रहकर खुश भी हो... और परेशान भी...?"
“हां... मेरे दिल में हर वक्त यह डर समाया रहने लगा है कि कहीं यह खुशी मुझसे छीन न ली जाए।" वो सिसककर देवा के सीने से लगते हुए बोली--- “आज मैंने सोचा तो अहसास हुआ कि तुम्हारी जिन्दगी कितने खतरों में घिरी रहती है। अब जब कि तुम अफजल की जगह गैंग के लीडर बन गए हो, तो तुम्हारे खतरे और भी बढ़ गए हैं। हर गैंग तुम्हें रास्ते से हटाने के चक्कर में होगा। अब तुम्हें हर समय अपने साथ बॉडीगार्ड रखने चाहिये।"
"तुम ठीक कह रही हो। लेकिन मैं सुबह इस बारे में सोचूंगा ।" देवा ने कहा।
"और मैंने सोचा है कि हमें घर पर भी कोई हथियार जरूर रखना चाहिये।" करीना ने गंभीरता से कहा।
"ठीक है। तुम कहती हो, तो मैं घर पर भी एक मशीनगन लाकर रख दूंगा।” देवा ने सोचते हुए जवाब दिया था--- "वैसे किसी को यहां के बारे में मालूम नहीं है। अगर मालूम भी हो, तो ऐसी भरी-पूरी जगह पर हमें मार डालने की कोशिश करके कोई अपनी बेवकूफी का सबूत नहीं देगा।"
"इस बारे में तुम इतने विश्वास से कुछ मत कहो देवा ।" करीना ने चिंतित स्वर में कहा--- “सारे गिरोहों में लालच और खूंखारी इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि सब एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। ऐसे में कहीं भी कुछ भी हो सकता है। हमें खामखाह की खुशफहमी में नहीं रहना चाहिये।"
"क्या बात है, क्या अचानक ही तुम बुजदिल हो गई हो ?" देवा ने कुछ आश्चर्य से करीना की तरफ देखा ।
“ऐसी कोई बात नहीं है।" करीना जल्दी से बोली थी--- "तुम्हें मालूम ही है कि मैं कई बार अपनी निर्भीकता और दिलेरी का सबूत दे चुकी हूं। लेकिन मैं अनावश्यक रूप से और मूर्खतापूर्ण ढंग से खतरे मोल लेने के हक में नहीं हूं। अब मैं जिन्दगी के बारे में किसी और तरीके से सोचने लगी हूं। ऐसे में भगवान न करे, अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगी।"
देवा घुमाव-फिराव वाली बातों पर ज्यादा सिर नहीं खपाता था। इसलिये उसने करीना की बातों को गहराई से समझने की या उससे कोई स्पष्टीकरण लेने की कोशिश नहीं की थी। वो कपड़े बदलकर बैड पर करीना की बगल में लेट गया था।
लेकिन अगले दिन नाश्ते की मेज पर देवा अखबार देखकर हैरान रह गया था। सभी अखबारों में मोटे शीर्षकों के साथ अलग-अलग शब्दों में, लेकिन एक ही खबर छपी हुई थी। जिसका अर्थ था---
"गैंग लीडर फरार हो गया।"
खबरों में नीचे विस्तार से लिखा था कि गैंग-लीडर अफजल सुल्तान शहर से फरार हो गया था और नवयुवक सुरेन्द्र पाल ने उसकी जगह गैंग की सरदारी संभाल ली थी। खबर में ए०सी०पी० जयंत तांब्रे का इंटरव्यू भी शामिल था। जिसमें उसने सफलता का सेहरा अपने सिर बांधा था। खबरें दरअसल तांब्रे के इंटरव्यू पर ही आधारित थीं।
तांब्रे ने अपनी और अपने डिपार्टमेंट की कार्यकुशलता का बखान करते हुए कहा था कि वो लोग अफजल के गैंग पर घेरा तंग करने की निरंतर कोशिशें कर रहे थे और उनकी कोशिशों से ही दरअसल गैंग की चूलें हिल गई थीं। गैंग बिखरकर रह गया था। इसलिये अफजल ने भाग जाने में ही अपना भला समझा था। कानून के रखवालों को उस गैंग का ताना-बाना तोड़ने में निसन्देह बहुत मेहनत करनी पड़ी थी और उन्होंने जान पर खेलकर यह काम किया था वगैरह... वगरह...।
तांब्रे ने अपने आपको एक हीरो, एक कर्त्तव्यपरायण पुलिस ऑफिसर, एक देशभक्त और न जाने क्या-क्या साबित करने की कोशिश की थी।
अखवारों को अफजल के "फरार" की खबर भी उसी ने उपलब्ध करवाई थी। यह अन्दाजा लगाना देवा के लिये जरा भी मुश्किल नहीं था। खबर पढ़ते हुए बार-बार देवा के दिमाग में वो दृश्य उभर रहा था, जब जयंत तांब्रे उससे अपना महीना लेने आया था।
“हरामजादा...।” आखिर देवा अखबार एक तरफ फेंकते हुए फुंफकारा था--- "मैं उस सुअर के बच्चे को छोडूंगा नहीं।"
उस दिन जब देवा ऑफिस जाने के लिये निकला था, तो गुस्से में इस तरह गाड़ी चला रहा था कि दूसरी गाड़ियों वालों ने और पैदल राहगीरों ने होंठों ही होंठों में दर्जनों जगहों पर उसे कोसा था। मगर जब वो ऑफिस पहुंचकर अपनी कुर्सी पर बैठा था, तो उस समय तक उसका क्रोध और आक्रोश भड़कती ज्वाला के बजाय ज्वालामुखी का रूप ले चुका था। एक ऐसा ज्वालामुखी, जिसके ऊपर प्रकटतया बर्फ जमी हुई थी। देवा का ऐसा गुस्सा बहुत खतरनाक माना जाता था।
“पिछले एक घंटे से ज्वॉइंट कमिश्नर कैलाश पंवार हर पांच मिनट बाद लगातार फोन कर रहा है। वो तुमसे फौरन बात करना चाहता है।” ऑफिस पहुंचकर कुर्सी पर उसके बैठते ही गार्ड अन्ना ने उसे बताया था--- “उसने कहा है कि जैसे ही तुम आओ, उससे बात कर लो । ऐसा लगता है, वो किसी बात पर सख्त परेशान हो रहा है।"
“भाड़ में जाए जे०सी०पी० ।” देवा गुर्राया--- “उसे जरूरत होगी, तो एक बार फिर कॉल कर लेगा। वो माल खाता है तो काम भी उसी को करना चाहिये।"
“उसके साथ जरा सावधानी से बात करने का है भाई।" अन्ना ने उसे होशियार किया--- “वो बहुत शैतान ऑफिसर है। एक नम्बर का कमीना और मक्कार। वो किसी भी गैंग-लीडर से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि उसके पास कानूनी सुरक्षा और पुलिस की ताकत है। वो इसका नाजायज इस्तेमाल करना खूब जानता है। कुछ खास-खास बदमाश किस्म के पुलिस वालों को तो उसने बाकायदा अपना कारिन्दा ही बना रखा है। निजी दुश्मनी की बिनाह पर वो कई लोगों को उन पुलीसियों से उठवाकर “लम्बी सैर" के लिये भिजवा चुका है। उससे खबरदार रहने का है।"
अन्ना यूं तो एक अनौपचारिक गार्ड ही था, मगर देवा जानता था कि वो पुराना और बहुत काम का आदमी था। देवा ने उसकी बात बड़े गौर से सुनी थी और फिर जैसे ठण्डे दिमाग से उस पर विचार किया था। फिर उसने गुर्राने वाले ढंग से हुंकार भरकर फोन की तरफ हाथ बढ़ा दिया था। कैलाश पंवार का नम्बर मिलाकर वो इन्तजार करने लगा था।
कुछ सेकेण्ड बाद रिसीवर में जो खरखराती हुई आवाज उभरी, उसे देवा ने फौरन पहचान लिया था।
“मैं सुरेन्द्र पाल... ।” देवा ने कहा।
"सुरेन्द्र पाल...।" जे०सी०पी० कैलाश पंवार ने उसका नाम सुनकर दोहराते हुए कहा था--- "मैंने सुना है कि अफजल सुल्तान शहर छोड़कर भागा है और अब उसकी जगह तुम गैंग के कर्ता-धर्ता हो ?”
“हां। यह सही है।” देवा ने गरिमापूर्ण लहजे में जवाब दिया था।
"क्या तुम्हें मालूम है कि अफजल के साथ मेरे कुछ मामले सैट थे?" पंवार ने कुछ सतर्क लहजे में पूछा था।
"हां, मुझे मालूम है। अफजल मुझे सबकुछ विस्तार से समझाकर गया है और सबकुछ कोडवर्ड्स के साथ लिखित रूप में भी मौजूद है। जिन लोगों को जो हफ्ता या महीना जाता था, वो उसी तरह भेजा जाता रहेगा। मैं उसी तरह मामलों को चलाता रहूंगा। जिस तरह अफजल चलाया करता था। तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है।" देवा ने कटाक्षभरे स्वर में कहा था।
मगर कैलाश पंवार का ध्यान इस वक्त देवा के लहजे की तरफ नहीं था। वो जल्दी से कुछ सहमे हुए ढंग से बोला---
"फोन पर इस किस्म की बातें नहीं किया करते। तुम्हारा मतलब कि सबकुछ पहले की तरह ही है...?"
“बिल्कुल... बल्कि पहले से भी अच्छा है।" देवा ने कहा। अपेक्षा होंठों पर मुस्कराहट थी--- “और हमें तुमसे भी पहले की बजाय ज्यादा उम्मीदें हैं।"
“ठीक है... लेकिन मामलों को मीडिया से दूर रखो।" ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर कैलाश पंवार ने निर्देश दिया।
"अगर तुम्हारे पुलिस वालों को हीरो बनने का और मीडिया के सामने बक-बक करने का शौक न हो, तो गिरोहों की खबरें मीडिया में न आएं जैसी कि आज अखबारों में और टी०वी० चैनलों में आई हैं।" देवा ने अपने लहजे की शुष्की छुपाने की कोई कोशिश नहीं की थी।
"कई पुलिस वालों की अपनी समस्याएं होती हैं।" कैलाश पंवार ने हल्का-सा कहकहा लगाकर खुशमिजाजी का सबूत देने की कोशिश की थी। देवा को उसकी आवाज बत्तख की आवाज जैसी लगी थी। पंवार बात जारी रखते हुए बोला--- “आखिर बेचारे पुलिसवालों को भी तो अपनी नौकरियां बरकरार रखनी हैं न। यह तभी संभव है जब वो अपनी कार्यकुशलता का परिचय देते रहें।"
इसके जवाब में देवा धीरे से गुर्राकर रह गया था। फिर कैलाश पंवार जैसे मतलब की बात पर आते हुए बोला था---
“ठीक है.... मैं कल शाम, महेश को तुम्हारे पास भेजूंगा।"
उसके स्वर में जो सन्देश छुपा हुआ था, उसको समझकर देवा ने फिर एक बार हल्के से गुर्राकर रिसीवर रख दिया था।
देवा को अन्दाजा हो गया था कि कैलाश पंवार उस खबर से परेशान होकर बार-बार फोन कर रहा था कि अफजल सुल्तान शहर छोड़कर चला गया है। अफजल की तरफ से जिन लोगों की मासिक रकमें बंधी हुई थीं, उनमें जे०सी०पी० कैलाश पंवार भी शामिल था। उसे शायद यह धड़का लग गया कि कहीं उसका मासिक भत्ता बंद तो नहीं हो जाएगा।
जे०सी०पी० कैलाश पंवार ने अगले दिन जिस महेश को देवा के पास भेजने की बात की थी, वो पुलिस का नौजवान वकील था। वो एक योग्य वकील था, लेकिन चूंकि वो कैलाश पंवार के मातहत था, इसलिये खाली समय में उसे अपने बॉस के लिये रकमें जमा करने की ड्यूटी भी निभानी पड़ती थी।
अफजल के शहर छोड़ जाने की खबर मीडिया में आने के बाद रिपोर्टरों ने सुबह से ही उसके "हैडक्वार्टर' पर धावा बोल दिया था। वो सब देवा से मिलना चाहते थे। लेकिन देवा ने उन्हें मिलने से इंकार कर दिया था । उसे पब्लिसिटी का शौक नहीं था। उसके ख्याल में उस जैसे लोगों का मीडिया में सूरत दिखाना उसके हक में अच्छा नहीं था। देवा का सोचना था कि मीडिया में उसका जिक्र जितना भी कम-से-कम हो उतना ही अच्छा था। रफ्ता-रफ्ता सभी रिपोर्टर निराश होकर वापस चले गए थे।
दोपहर बाद अन्ना एक पर्ची लेकर देवा के पास आया था। सफेद कागज के छोटे से टुकड़े पर बढ़िया राईटिंग में निहायत सलीके से छोटा-सा मैसेज लिखा हुआ था---लिखावट पर एक नजर डालने पर ही अन्दाजा हो जाता था कि वो किसी स्त्री के द्वारा लिखा गया था---
"डियर सुरेन्द्र पाल ! क्या मैं सिर्फ पांच मिनट के लिये आपसे मिल सकती हूं। एडवांस में थैंक्यू !"
देवा के माथे पर बल पड़ गए। उसने सिर उठाकर अन्ना की तरफ देखा--
"कौन है यह औरत ?"
"यह तो मैं भी नहीं जानता, बॉस!" अन्ना ने क्षमा-याचना के से ढंग में कहा--- “मैंने इससे पहले उसे कभी नहीं देखा। लेकिन... है बड़े गजब की आईटम ।" अन्ना की एक आंख थोड़ी-सी दब गई थी।
देवा यह सुनकर कुछ नर्म पड़ गया था और उत्सुकता से बोला था--- "वो कोई गनगर्न...या इसी किस्म की कोई चीज तो नहीं लगती ?"
"नहीं। वो हमारे धन्धे की नहीं लगती। उसके चेहरे पर इतनी शालीनता है कि उसने शायद कभी किसी चींटी को भी पांव से न कुचला हो।" अन्ना ने चेहरे से पहचानने का सबूत पेश करने की कोशिश की थी।
"ठीक है। मैं उससे मिलने का खतरा मोल ले लेता हूं। भेजो उसे !" देवा के कहने के कुछ सेकण्ड बाद सोनाली ने कमरे में कदम रखा तो देवा को अहसास हुआ कि उस जैसी खूबसूरत और आकर्षक महिला से मिलने का फैसला करके उसने अच्छा ही किया था। वो देवा के अन्दाजों से ज्यादा और अन्ना की तारीफ से कहीं बढ़कर आकर्षक थी, जवान थी, हसीन थी। उसके अलावा उसकी पर्सनलिटी में एक अलग किस्म की गरिमा और दर्प की झलक थी।
वो इस किस्म की लड़कियों में से थी, जिन्हें देखकर युवकों के दिलों में खामखाह उनसे जान-पहचान बढ़ाने की इच्छा बलवती हो जाती थी, उसके अंग किसी एथलीट की तरह बेहद गठे हुए और सुडौल थे। उसने अच्छे कपड़े पहन रखे थे और बड़ी गरिमापूर्ण चाल चलती हुई देवा के ऑफिस में दाखिल हुई थी ।
"कैसे हैं आप ?” उसने हाथ मिलाने के लिये बढ़ाते हुए बड़ी शालीनता से पूछा।
देवा ने उसका हाथ थाम लिया था और उसका जी चाहा था कि कुछ देर के लिये हाथ को थामे ही रखे। लेकिन फिर उसने भी सभ्यता और शालीनता दिखाते हुए हाथ छोड़ दिया और कोशिश करके शालीनता से मुस्कराते हुए बोला था---
"मैं ठीक हूं। आशा है आप भी बेहतर होंगी।"
लड़की की शख्सियत की तरह उसकी आवाज भी बहुत मधुर और सुरीली थी, बिल्कुल चांदी की घाटियों की तरह। उसकी आंखों में बुद्धिमत्ता की चमक थी।
“मैं आपके पास मदद की छोटी-सी फरियाद लेकर आई हूं, सुरेन्द्र पाल साहब।" सोनाली का लहजा कुछ और मधुर हो गया था--- "मेरे आंकलन के अनुसार आप जैसे इन्सान अकसर निडरता और हमदर्दी के गुणों से सपनामाल होते हैं और विशेष परिस्थितियों में वो दूसरों के काम आने की भरपूर कोशिश किया करते हैं।"
"ओह....हां...!" देवा कुछ पल के लिये हड़बड़ा गया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे मौके पर वो क्या कहे? फिर वो जल्दी से बोला था-- "मैं आपके लिये जो भी संभव हो सका, जरूर करूंगा।"
"मुझे उम्मीद थी...।" सोनाली आकर्षक अदा से बोली--- "फिलहाल समस्या यह है कि मैं नौकरी कर रही हूं जो मुझे बहुत पसन्द है। परन्तु इस वक्त मेरी नौकरी का सारा दारोमदार आप हैं। आप चाहें तो मेरी नौकरी जारी रह सकती है न चाहें तो खत्म हो सकती है। इस शहर में आप इकलौते आदमी हैं जिसके हाथ में यह काम है।"
"यह भला कैसे संभव है?" देवा ने आश्चर्य और उलझन से कहा।
“मैं अपनी बात को स्पष्ट करती हूं।” सोनाली ने कहा--- "बात दरअसल यह है कि मैं डेली पेपर टाईम्स में काम करती हूं। मेरे सिटी एडिटर का हुक्म है कि अगर आज मैं आपका इंटरव्यू लेने में सफल न हो सकी, तो वो मुझे नौकरी से निकाल देगा। यह है सारी समस्या सुरेन्द्र पाल साहब।"
"ओह...! तो तुम अखबारी रिपोर्टर हो?" देवा आश्चर्य से चिल्ला उठा--- "सुबह से मैं रिपोर्टरों से मिलने से इंकार कर रहा हूं और तुम...तुम यहां तक आ पहुंचीं ?”
“मुझे मालूम था कि आप किसी रिपोर्टर से मिलने को तैयार नहीं हैं।” सोनाली के मधुर स्वर में थोड़ी-सी निराशा और उदासी झलक आई थी--- "लेकिन आप....मेरी मजबूरी समझ सकते हैं कि मेरा आपसे मिलना कितना जरूरी था। मुझे अपनी नौकरी बचानी थी। इसलिये मैं किसी-न-किसी तरह यहां तक तो पहुंच गई। लेकिन लगता है, मैं अपनी नौकरी नहीं बचा सकूंगी।" उसकी आवाज भर्रा गई थी और वो एक हल्की-सी सिसकी लेकर रह गई थी। अनायास वो बहुत पीड़िता और दयनीय-सी नजर आने लगी थी।
देवा ने भड़ककर कुछ कहना चाहा था, मगर कह न सका था। वो केवल खंखारकर रह गया था। उसने एक सिगरेट सुलगाई और लम्बा कश लेकर नर्मी से बोला---
"देखो मैडम, अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें अपने कारोबार और गतिविधियों के बारे में बताऊं, तो मैं वो नहीं बता सकता।"
"ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।" सोनाली ने जल्दी से कहा था। उसकी आंखें फैल गई थीं--- "यह अपेक्षा तो मैं पाल ही नहीं सकती थी कि आप मुझे अपने बिजनेस के बारे में कुछ बताएंगे....न ही मैं इतनी बेवकूफ हूं कि आपसे इस बारे में कोई सवाल पूंछू । चाहे मामला मेरी नौकरी का ही क्यों न हो।" उसने पहलू बदला, कुछ देर कुछ सोचती रही। फिर बोली--- “मैं तो सिर्फ पुष्टि करने आई थी कि क्या वास्तव में मिस्टर अफजल सुल्तान शहर छोड़कर चले गए हैं और उनकी जगह जिम्मेदारियां आपने संभाल ली हैं ? यदि यह सच है, तो मुझे इस पर बहुत आश्चर्य होगा।"
"क्यों?" देवा ने भौंहें उचकाई ।
"क्योंकि आप तो बहुत कम उम्र युवक हैं... क्या आप इतने बड़े गैंग... मेरा.... मतलब है इतने बड़े कारोबार की जिम्मेदारियां संभाल सकेंगे? तमाम समस्याओं से निपट सकेंगे?"
इस तरह बातें शुरू हुई थीं और फिर होती ही चली गई थीं।
बीस मिनट की बातचीत इस काबिल तो जरूर थी कि उससे एक अच्छा खासा इन्टरव्यू तैयार किया जा सकता। देखने में तो सोनाली के सभी सवाल हानिरहित थे। उसने ज्यादातर वही बातें पूछी थीं जो पहले से ही आम लोगों की जानकारी में थीं या फिर जल्दी ही सबको मालूम हो जाने वाली थीं। लेकिन देवा को अन्दाजा नहीं हो सकता था कि जवाब देते समय वो कितना आगे बढ़ गया था और कितना सावधान रह पाया था? वो वार्तालाप के प्रवाह में काफी हद तक बह गया था। वैसे भी देवा को इंटरव्यू देने का कोई अनुभव नहीं था, न ही वो मीडिया वालों के दांव-पेंचों को समझता था। उसे तो जिस तरह बात करनी आती थी, उसने कर डाली थी। बातों के दौरान सोनाली ने कहा---
“मुझे विश्वास है, आप एक अच्छे पति भी साबित होंगे। आप जैसे लोग जो खतरों-भरी जिन्दगी गुजारते हैं, आमतौर पर एक सुख-शांति-भरी घरेलू जीवन चाहते हैं। इसलिए वो पत्नी को बहुत खुश रखते हैं।" कहते हुए सोनाली की खूबसूरत आंखों में अजीब-सी चमक उभर आई थी। इस तरह की बातें छेड़कर वो देवा को प्यार-मोहब्बत, शादी और घरेलू जिन्दगी के विषयों की तरफ ले आई थी। प्रकटतया वो आम सी बातें कर रहे थे, लेकिन सोनाली ने बीच-बीच में विभिन्न विषयों पर देवा की निजी राय भी उगलवा ली थी। वो चाहती, तो इस बातचीत के आधार पर ही काफी सनसनीखेज इंटरव्यू तैयार कर सकती थी। जिससे कुछ किस्म की सुर्खियां भी निकाली जा सकती थीं---
"मोहब्बत के बारे में एक गैंग-लोडर के दृष्टिकोण ।"
"गैंग-लीडर कैसी घरेलू जिन्दगी के सपने देखता है?"
देवा की सोनाली के साथ बातचीत जारी थी कि अचानक सोनाली ने पूछ लिया था---
"बातों-बातों में हल्का-सा जिक्र... क्या कभी किसी लीना नामक महिला से भी आपकी जान-पहचान रही थी ?"
इस सवाल से देवा को झटका लगा था। वो अनायास ऊंची आवाज में कुछ कहने जा रहा था, मगर ऐन वक्त पर उसने खुद को रोक लिया था और कोई कड़ी या आश्वर्यभरी प्रतिक्रिया प्रकट करने से बचा रहा था। सोनाली का यह सवाल कुछ-कुछ ऐसा ही था, जैसे कोई मजनू से पूछता कि क्या वो लैला को जानता था ? यो प्रलयकारी डांसर देवा की जिन्दगी में पहला प्यार थी जिसकी याद आज भी देवा की नसों में चिंगारियां दौड़ा रही थी। लीना के प्यार ने ही तो देवा को ऐसा दीवाना कर दिया था कि उसने लड़कपन में ही शहर के एक बड़े और खतरनाक गैंग के सरदार विनायक राव शेट्टी को मार डाला था और यह भी नहीं सोचा था कि उसके इस कदम का परिणाम क्या होगा?
सोनाली के इस सवाल ने देवा के दिमाग में उस इश्क की तमाम बातें इस तरह ताजा कर दी थीं जैसे उसकी आंखों के सामने कोई फिल्म चल रही हो। उस इश्क का अंजाम हालांकि दर्दनाक था और लीना की बेवफाई का जख्म अब भी कभी-कभार उसे टीसें दे जाता था। मगर सोनाली का सवाल सुनकर उसने आंखें सिकोड़ ली थीं। उसकी आंखों में हल्के-हल्के से मैत्री भाव का जो रंग छलक आया था, वो एकदम गायब हो गया। वातावरण में एक बनाम या तनाव और भारीपन लौट आया था।
“नहीं।" देवा ने शुष्क स्वर में जवाब दिया--- "मैं इस नाम की किसी भी लड़की को नहीं जानता। लेकिन... तुम क्यों पूछ रही हो?"
"मैंने एक बार उसका भी इंटरव्यू किया था।" सोनाली ने जवाब दिया--- “उसके कमरे में एक नौजवान की तस्वीर लगी हुई थी। आपकी शक्ल उस तस्वीर वाले नौजवान से बहुत मिलती है...खासतौर पर आंखें...।"
देवा के दिमाग में हलचल-सी मच गई थी। उसकी जानकारी के अनुसार लीना के पास उसकी कोई तस्वीर मौजूद नही थी। सच्ची बात तो यह थी कि देवा को याद ही नहीं था कि होश संभालने के बाद कभी किसी ने उसकी कोई तस्वीर खींची हो। होश संभालने के बाद वो जान-बूझकर तस्वीर खिंचवाने से बचने लगा था। उसका ख्याल था कि तस्वीर कभी भी गलत हाथों में जा सकती थी और किसी गलत मौके पर शिनाख्त का कारण बन सकती थी।
सोनाली बात जारी रखते हुए कह रही थी---
“एक और लड़की के बारे में भी पूछती चलूं... क्या आप भूरे बालों वाली उस लड़की से दोबारा भी मिले थे, जो उस रात आपके साथ थी, जिस रात रॉक्सी क्लब में शरद शिरके का कत्ल हो गया था?"
इस सवाल पर देवा के लौह स्नायु भी कुछ पल के लिये झनझनाकर रह गए थे। सोनाली करीना के बारे में पूछ रही थी, जो उस रात "गनगर्ल" के रूप में देवा के साथ रॉक्सी क्लब गई थी। उसी के सहयोग से देवा ने शरद शिरके को कत्ल किया था। उस रात क्लब में करीना की मौजूदगी के बारे में देवा के सिवा कोई नहीं जानता था।
'फिर... यह सवाल इस पत्रकार लड़की ने क्यों पूछा?' देवा ने सोचा।
"मेरी समझ में नहीं आ रहा कि तुम किस तरह की बातें कर रही हो?" देवा त्यौरी चढ़ाकर बोला था।
“उस रात वास्तव में मैं भी किसी के साथ रॉक्सी क्लब में मौजूद थी और मेरे साथी ने मुझे क्लब में मौजूद खास-खास लोगों के बारे में बताया था। वो सबकुछ जानता था। आपके बारे में उसने कहा था कि आप अभी ज्यादा मशहूर आदमी नहीं हैं, लेकिन लक्षण बताते हैं कि आपने अपने लिये जो फील्ड चुनी है, उसमें बहुत आगे तक जाएंगे.... बहुत नाम कमाएंगे।” सोनाली हौले से हँसी थी।
"कौन था तुम्हारा साथी ?” देवा ने पूछा।
"मेरे ख्याल में यह बताना उचित नहीं होगा।" सोनाली ने मोहक मुस्कान के साथ जवाब दिया था और जाने के लिये उठ खड़ी हुई थी---हाथ मिलाने के लिये बढ़ाकर बोली--- “मुझे अहसास है कि आपका वक्त बहुत कीमती है, मैं आपका और वक्त नहीं लूंगी। शायद हम आईन्दा कभी बैठकर गप्प-शप्प कर सकें। बहरहाल, एक दिलचस्प इंटरव्यू के लिये थैंक्स ! आपने मेरी नौकरी बचाने का सामान इकट्ठा कर दिया।"
वो विदा हो गई, तो जैसे देवा के दिमाग से वो सम्मोहन खत्म हो गया जो उसकी उस मौजूदगी की वजह से था।
उसकी शख्सियत और खूबसूरती के जादू से बाहर आकर देवा ने महसूस किया था कि अपनी आदत के विपरीत उसकी बातचीत के सम्मोहन में आकर बहुत ज्यादा बोल चुका था। वो अजनबियों से तो क्या, अपने करीबी लोगों से भी ज्यादा नहीं खुला करता था। लेकिन सोनाली को वाकई अच्छा खासा इंटरव्यू दे बैठा था । यकीनन वो बड़े-से-बड़े रूखे-सूखे और सख्तजान आदमी को भी बातचीत के लिये राजी कर लेने के आर्ट में माहिर थी। इस सवाल ने भी देवा के दिमाग में खलबली मचा दी थी कि वो इतना कुछ कैसे जानती थी? उसके अतीत के बारे में सवाल करने का उसका उद्देश्य क्या था? देवा ने इन बातों के बारे में जितना ज्यादा सोचा था, उतनी ही उसकी चिंता बढ़ती गई थी। उसके दिल और दिमाग में हलचल मची हुई थी । आखिर उसने अपनी बेचैनी से मजबूर होकर फोन की तरफ हाथ बढ़ा दिया था। कुछ सेकेण्ड बाद ही वो डेली टाईम्स के नम्बर डायल कर रहा था।
लाईन मिल जाने पर उसने मिस सोनाली मुखर्जी से बात कराने के लिये कहा।
इन्तजार के कुछ सेकेण्ड देवा ने बड़ी व्याकुलता और व्यग्रता से गुजारे थे। फिर उसने बहुत आहिस्ता से रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया था। देवा के जबड़े भिंचे हुए थे और सिर कुछ चकरा रहा था। आंखें शून्य में किसी अदृश्य चीज को घूर रही थीं। अखबार के ऑफिस से देवा को बताया गया था कि वहां सोनाली मुखर्जी नाम की कोई लड़की काम नहीं करती। न ही अतीत में वहां कोई इस नाम की लड़की ही नौकरी कर चुकी थी।
"तो फिर वो लड़की कौन थी और उसका मुझसे मिलने का ध्येय क्या था?” देवा अपने आपसे पूछ रहा था। मगर उसके पास अपने ही इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।
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