शुरू-शुरू में देवा को अपने चेहरे के जख्म के निशान की मौजूदगी इसलिये भली मालूम हुई थी क्योंकि उसने देवा की पुरानी पहचान को छुपाने में अहम रोल निभाया था। लेकिन वक्त गुजरने के साथ-साथ उसे उस निशान के कुछ नुकसानदेह पहलुओं का अहसास भी होने लगा था। अब वो निशान खुद ही उसकी शिनाख्त बनकर रह गया था। अण्डरवर्ल्ड के ज्यादातर लोग उसे जख्म के निशान वाला सुरेन्द्र पाल के नाम से जानने लगे थे। दूसरे गिरोह के जिन लोगों ने उसे कभी नहीं देखा होता था, वो भी उस निशान को देखकर समझ जाते थे कि यह शख्स कौन हो सकता था। वक्त गुजरने के साथ-साथ वो निशान हल्का भी पड़ गया था। लेकिन फिर भी ऐसा नहीं हो पाया था कि किसी की नजर उस पर न पड़ती।

करीना के साथ उसकी दोस्ती कायम थी और कभी-कभार उनकी रातें भी साथ-साथ गुजरती थीं। इसके बावजूद देवा को महसूस होता था कि उनके बीच में उतना ही फासला अब भी बरकरार था, जितना कि प्रथम परिचय के समय था। देवा को वहम होने लगा कि करीना की निर्लिप्तता की वजह यह जख्म का निशान ही है। उसे मालूम था कि औरतें जिन मर्दों के साथ सम्बन्ध रखती हैं उनमें कोई जिस्मानी कुरूपता या इस किस्म का कोई निशान देखना पसन्द नहीं करतीं। देवा के चेहरे के उस लम्बे और कुरूप निशान ने बहरहाल उसके चेहरे की सुन्दता को बुरी तरह प्रभावित कर रखा था।

एक दिन देवा ने करीना के साथ निर्णायक ढंग से बात छेड़ ही दी---

“देखो लड़की, मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं... बहुत ज्यादा प्यार....। इतना ज्यादा प्यार मैंने शायद इससे पहले किसी भी लड़की से नहीं किया। मुझे ज्यादा बातें नहीं बनानी आतीं। मैं चाहता हूं कि हम दोनों साथ रहें। मैंने तुम्हारे सामने जो प्रस्ताव रखा था, मैं चाहता हूं कि उसके जवाब में तुम हां कह दो। क्या ख्याल है ?"

करीना कुछ सैकेण्ड खामोशी और गंभीरता से उसकी तरफ देखती रही थी। शायद उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था। आखिर वो एक गहरी सांस लेकर जैसे हथियार डालते हुए बोली---

“अच्छा ठीक है। कल हम घूम-फिरकर अपने लिये कोई फ्लैट ढूंढेंगे।"

“क्या वाकई?” देवा खुशी से जैसे भर उठा था। हालांकि इस तरह अपनी भावनाओं का इजहार उसके स्वभाव में नहीं था। मगर इस वक्त तो वो खुद पर काबू रखते-रखते इस हद तक इजहार कर बैठा था। वर्ना खुशी से तो उसका जी चाह रहा था कि उठकर नाचने लगे।

"हां। लेकिन फिलहाल मैं सिर्फ एक महीने के लिये तुम्हारे साथ रहने की हामी भर रही हूं।" करीना ने जैसे उसकी कोई गलतफहमी दूर कर दी। वो गम्भीर नजर आ रही थी। वो अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली--- "हम पहले सिर्फ ट्रायल के तौर पर एक महीना साथ रहेंगे। अगर मुझे वो एक्सपेरीमेंट अच्छा लगा, तो मैं आईन्दा भी तुम्हारे साथ रहती रहूंगी। लेकिन अगर मुझे कोई चीज पसन्द न आई तो मैं अलग हो जाऊंगी और तुम मुझसे उसकी वजह भी नहीं पूछोगे । ना ही कोई स्पष्टीकरण मांगोगे। अगर मैं आईन्दा तुमसे मेल-मुलाकात भी न रखना चाहूंगी, तब भी बता दूंगी और तुम इस बात पर मुझसे नाराज नहीं होओगे। ये मेरी शर्तें हैं। ये अगर तुम्हें मंजूर हो, तो अभी बता दो। वर्ना इस बात को हमेशा के लिए अभी खत्म कर दो।"

"ठीक है। मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है।" देवा फौरन बोल पड़ा था।

"तो फिर... मैं तैयार हूं।” करीना ने धीरे से कहा ।

उस रात देवा जब करीना के घर से निकला, तो जैसे खुशी से उसके पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे, वो तो जैसे हवा में उड़ा जा रहा था। आखिर उसने उसे पा ही लिया था। फिलहाल यह मिलाप चाहे एक महीने के लिये ही था। लेकिन देवा के लिये इतना ही बहुत था। उसका इरादा था कि वो करीना को हर लिहाज से खुश और सुखी रखने की कोशिश करेगा। इतनी ज्यादा कोशिश करेगा कि वो उसे छोड़कर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकेगी।

अगले दिन जब उसकी मुलाकात अफजल से हुई थी, तो उसने करीना से इस बारे में कोई बात नहीं की थी। उसने सोचा था कि यह पूर्णतया उसका निजी मामला है। उसकी पेशेवर लाईफ से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इसलिये अफजल सुल्तान को उससे अवगत कराना जरूरी नहीं था। वैसे भी जब वो अफजल के पास पहुंचा था तो वो पहले से ही कुछ उलझा हुआ था और परेशान नजर आ रहा था। वो बेताबी से अपने ऑफिस में टहल रहा था। उस दौरान कभी वो छत की तरफ देखता था और कभी फर्श को घूरने लगता था।

“मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है सुरेन्द्र पाल ।” वो देवा को देखते ही बोला --- "बैठ जाओ।" वो दिल ही दिल में जैसे किसी अहम फैसले पर पहुंच गया था।

देवा बैठ गया, तो अफजल भी अपनी कुर्सी पर आ बैठा और उसने सिगार सुलगा लिया। देवा प्रतीक्षक ढंग से उसकी तरफ देख रहा था।

"मैंने सुना है कि दो दिन पहले तुमने फूलों के शोरूम पर मशीनगन से फायरिंग की है?" अफजल ने बात शुरू करते हुए कहा।
"हां...की थी।" देवा ने कहा। देवा अन्दाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि उससे पूछताछ की जा रही थी या अफजल के दिल में कोई और बात थी।"

"था तो वो बड़ी हिम्मत का काम। लेकिन बहरहाल बहुत खतरनाक भी था। तुम्हें इस तरह अपनी जान को खतरे में नहीं डालना चाहिये थी सुरेन्द्र पाल...।"

अफजल ने ठहर-ठहरकर कहा। उसका अन्दाज डांटने-डपटने वाला नहीं था। उसके लहजे में प्यार भरी चिंता थी। उसका लहजा ऐसा उसी वक्त होता था जब वो अपने दिल में जागने वाले के लिये अपना प्यार महसूस करता था और उसकी जान को खतरा पाकर परेशान हो जाता था।

"कभी-कभी ऐसा करना जरूरी हो जाता है!” देवा ने गंभीर लहजे में कहा--- "मैं आईन्दा सावधान रहने की कोशिश करूंगा। वैसे आपस की बात है कि मुझे उनकी हरकत का उन्हीं की भाषा में जवाब देने में बड़ा मजा आया।"

"लेकिन मैं इस किस्म के कामों में मजा लेने वाला आदमी नहीं हूं।" अफजल ने स्वीकार किया--- "मैं हालात को सामान्य देखना और दौलत कमाने में बिजी रहना ज्यादा पसन्द करता हूं। अब वो बात कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गई है। लड़ाई में मशीनगनें इस्तेमाल होने लगी हैं।" वो रुककर कुछ सोचने लगा। फिर कुछ देर बाद बोला--- “मेरे पास अब काफी दौलत जमा हो गई है, देवा! अगर मैं अक्ल से काम लेकर सारी जिन्दगी बैठकर भी खाता रहूं और अपने दिन-रात ऐशो-आराम से भी गुजारूं, तब भी मेरी दौलत खत्म नहीं होगी। मैं सोच रहा हूं, तब मैं अमरीका-फ्रांस या ब्रिटेन, ऐसी ही किसी जगह चला जाऊं जहां जिन्दगी ऐश से गुजरे। जहां हर रंगीनी और ऐशो-आराम का हर सामान मौजूद हो, मुकम्मल तफरीह का सामान हो। मैं गोलियों की बौछार और मशीनगनों की तड़तड़ाहट से दूर चला जाना चाहता हूं।”

"कितने अर्से के लिये ?" देवा ने जानना चाहा।

“कुछ साल के लिये, बल्कि इस बात की संभावना ज्यादा है कि मैं वापस ही न आऊं।"

"तो फिर... गैंग का क्या बनेगा? क्या तुम गैंग को टूटने-बिखरने के लिये छोड़ जाओगे ?” देवा ने चौंककर कहा--- "यह तो बड़ी शर्म की बात होगी, भाई! इतनी मेहनत से इतना मजबूत गैंग बनाया गया। ऐसा मजबूत गैंग टूट जाए... बिखर जाए ?"

अफजल सुल्तान सिर हिलाकर बोला---

"क्या कोई और आदमी इस गिरोह के मामलों को आगे नहीं चला सकता? क्या कोई और इसकी सरदारी नहीं संभाल सकता?"

"शायद कोई इतनी अच्छी तरह न चला सके। जितनी अच्छी तरह तुमने चलाया है!” देवा के लहजे में हल्का-सा अफसोस उभर आया था--- "इस पड़ाव पर तुम्हारा इस तरह छोड़कर चले जाना बड़ी अजीब बात होगी। इतनी आमदनी हो रही है... थोड़ी सी कोशिश की जाए, तो आमदनी बहुत बढ़ सकती है।"

“मुझे मालूम है और मैं इस आमदनी से पूरी तरह वंचित भी नहीं होना चाहता।" अफजल बोला। फिर उसने एकदम मेज पर झुककर देवा को कहा--- "सुनो सुरेन्द्र पाल, क्या तुम इस गिरोह की सरदारी को नहीं संभाल सकते हो।"

"संभाल सकता हूं।" देवा ने बेहिचक कहा--- "अगर तुम मुझे मौका दो, तो मैं तुम्हारे विश्वास पर पूरा उतरने की भरपूर कोशिश करूंगा।"

"मैं तुम्हें यह मौका देने जा रहा हूं सुरेन्द्र पाल ! मुझे मालूम है कि तुम्हारे जैसे नातजुर्बेकार नौजवान के लिये तो क्या किसी पकी उम्र वाले तजुर्बेकार आदमी के लिये भी यह कोई आसान काम नहीं है। लेकिन मेरा दिल कह रहा है कि तुम्हारे कंधों पर मैं यह जिम्मेदारी डाल सकता हूं और तुम यह जिम्मेदारी अच्छे तरीके से संभाल भी सकोगे। तुम्हें उस आमदनी का पचास फीसदी हिस्सा जहां मैं कहूंगा वहां हर माह भेजना होगा। मगर मुझे मेरा फिफ्टी परसेंट नहीं मिला, तो जाहिर है, मुझे वापस आना पड़ेगा। फिर मैं दोबारा गिरोह की सरदारी संभाल लूंगा या कोई दूसरा बंदोबस्त करूंगा।"

दोनों कुछ सेकेण्ड के लिये एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले देखते रहे थे। दोनों बेहद गंभीर थे। दोनों को इस बातचीत की संजीदगी का पूरी तरह अन्दाजा था। दोनों को यह भी मालूम था कि बेशक यह समझौता कहीं लिखा नहीं जा रहा था, लेकिन इसके एक-एक शब्द पर अमल होना लाजिमी था।

“बाकी पचास परसेंट किस तरह बांटा जाएगा?” देवा ने जानना चाहा था।

"उसका सत्तर परसेंट तुम रखोगे। तीस परसेंट खालिद को दोगे, जिसे मैं तुम्हारा खास आदमी बनाने जा रहा हूं।" अफजल ने जवाब दिया।

अण्डरवर्ल्ड में सहायक को 'फर्स्ट लेफ्टीनेंट' कहा जाता है। सरदार या लीडर के बाद वही सबसे अहम आदमी होता था। वो गैंग लीडर की गैरहाजिरी में गैंग की कमान भी संभाल सकता था। देवा। समझ गया। उसने पूछा---

"क्या तुम खालिद को मेरा फर्स्ट लेफ्टीनेंट बनाना जरूरी समझते हो?" वो खालिद को पसन्द नहीं करता था।

"हां। खालिद उम्र में तुमसे बड़ा है। गिरोह का पुराना मेम्बर है। वे तमाम मामलों में माहिर है। हमेशा वो मेरा वफादार रहा है और मुझे यकीन है कि वो कभी कोई ऐसी हरकत नहीं करेगा जिससे गिरोह को कोई नुकसान पहुंचे। इसके अलावा अगर तुम्हें कभी कुछ हो जता है, तो खालिद ही गिरोह की सरदारी संभालेगा।"

"क्या उसे ये सब बातें बता दी गई हैं?" देवा ने पूछा।

"नहीं। मेरा एक-दो घंटे बाद उससे बात करने का प्रोग्राम है। उससे पहले मैं तुम्हारे साथ तमाम बातें तय कर लेना चाहता था।" अफजल ने जवाब दिया था।

वो दो घंटे तक तमाम मामले तय करने में व्यस्त रहे थे।

अफजल सुल्तान की हर बात पर देवा 'हां-हां' करता जा रहा था। उसने कहीं भी किसी बात पर जरा-सा भी ऐतराज नहीं उठाया था।

देवा ने उसे विश्वास दिला दिया था कि गैंग के मामले उसी तरह चलेंगे जिस तरह वो चाहता है। लेकिन ये सब बातें करते हुए उसके दिमाग में एक दूसरी और समान्तर विचारों की लहर भी चल रही थी। उसके दिमाग में यह पक्का इरादा था कि वो गैंग को अपने ढंग से चलाएगा। उसकी पहली तरजीह आक्रामक थी, वो प्यादों और लेफ्टीनेंटों के तौर-तरीकों में तब्दीली लाना चाहता था। वो अपने गैंग की सरगर्मियों को आक्रामक रखना चाहता था और कुछ ऐसे कदम उठना चाहता था जिससे दूसरे गिरोहों पर उनकी दहशत बैठ जाए।

आखिर जब देवा और अफजल सुल्तान में सारे मामले तय हो गए, तब खालिद को बुलाया गया और उसको ताजा स्थिति से अवगत कराया गया।

खालिद अख्तर पैंतीस-छत्तीस की उम्र का एक बदशक्ल-का आदमी था और गिरोहबाजी में वो पुराने ख्यालों का आदमी था। उसके स्टाईल और तौर-तरीकों में आक्रामकता नहीं थी। वो उन बदमाशों में से था जिनकी हर वक्त यह कोशिश होती है कि वो अपने हुलिये और टेढ़े-मेढ़े अन्दाज से ही छंटे हुए बदमाश दिखाई दें। वो आमतौर पर ढीली-ढीली, तरंगी और बेढंगी-सी कमीज पहनता था जिस पर अक्सर सिलवटें पड़ी रहती थीं। सिर पर चेक वाले कपड़े की भी कैप होती थी, उसकी शेव बढ़ी हुई होती थी और अधखुले होंठों में लबी-सी सिगरेट झूलती रहती थी। बात करते वक्त बार-बार गुर्राना और भेड़िये की तरह दांत निकालना उसकी आदत थी। वो अक्खड़ और उज्जड़ नजर आने की भरपूर कोशिश करता रहता था। कहने का मतलब यह कि वो पुराने दौर का बदमाश था जैसे कि पुरानी फिल्मों में दिखाए जाते हैं और जो आज के दौर में बदमाश कम और कार्टून ज्यादा नजर आते हैं। खालिद के ख्याल भी पुराने थे, इसके अलावा वो तंगदिल, कमीना और मक्कार भी था।

इन सब बातों की वजह से ही देवा उसे पसन्द नहीं करता था। खालिद ने भी कभी देवा के लिये पसन्दगी का इजहार नहीं किया था। वो दोनों बिल्कुल अलग-अलग किस्म के इंसान थे और अण्डरवर्ल्ड में दो अलग-अलग तबकों का प्रतिनिधित्व करते थे।

देवा अण्डरवर्ल्ड के उस तबके का प्रतिनिधि था, जो बदमाश के बजाय बिजनेसमैन दिखाई देते थे---हालांकि अन्दर से वो खालिद जैसे बदमाशों से ज्यादा खतरनाक होते थे। वो इतनी तेजी, सफाई और क्रूरता से अपना काम करते थे कि खालिद जैसे लोग उसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे।

देवा जैसे लोगों की एक कोशिश यह भी होती थी कि वो लोग अपनी कार्रवाईयों के सिलसिले में अपना कोई सुराग न पीछे छोड़ें, जबकि खालिद जैसे लोग इतने सावधान नहीं होते थे। वो वैसे भी जरा मोटे दिमाग के होते थे। ज्यादा गहराई से नहीं सोच पाते थे। इसके अलावा, देवा को इस बात का भी ज्यादा यकीन नहीं था कि खालिद गैंग का या उसका बहुत ज्यादा वफादार था। देवा ने आज तक खालिद की वफादारी का कोई सक्रिय प्रदर्शन नहीं देखा था। न ही उसे गिरोह के मामलों में खालिद की तजुर्बेकारी और 'काबलियत' का कोई सबूत ही मिला था।

देवा को यह बात अच्छी नहीं लगी थी कि एक ऐसे आदमी को उसका फर्स्ट लेफ्टीनेंट बनाकर उसके साथ नत्थी कर दिया गया था। उससे न जाने कैसी कार्यकुशलता और परिणामों की अपेक्षा की जा रही थी। देवा ने भी एक बात सोच ली थी, वो यह कि अगर उसकी खालिद से पटरी न बैठ सकी, तो वो खालिद से छुटकारा पा लेगा। देवा के पास नापसन्दीदा चीजों से छुटकारा पाने के बहुत से तरीके थे। जब खालिद को सारी बातें समझाई जा चुकीं, तो खालिद बेतकल्लुफी से देवा के कंधे पर हाथ मारकर बोला---

"ठीक है बरखुरदार, हम दोनों मिलकर सबकुछ बहुत अच्छे से संभाल लेंगे।" उसकी आंखों में धूर्तताभरी चमक थी। उसकी आवाज बेहद खुरदरी थी। उसका स्टाईल कुछ ऐसा था जैसे वो देवा को अपना साथी बनाकर उसे गौरव प्रदान कर रहा हो। उसकी इज्जत बढ़ा रहा हो। जबकि उसे स्पष्ट बता दिया गया था कि देवा उसका बॉस रहेगा और वो देवा का असिस्टेंट होगा।

मगर वो मोटे दिमाग का आदमी था और अजब बात जरा देर से ही उसकी समझ में आती थी। कई बातों को तो वो समझते हुए भी नहीं समझता था। अपनी इन्हीं बातों और तौर-तरीकों की वजह से तो देवा को अच्छा नहीं लगता था। इस वक्त तो देवा को और भी बुरा लग रहा था। लेकिन देवा ने फिर भी धैर्य से काम लिया और सिर्फ इतना ही कहा था---

“हां। मुझे भी यही उम्मीद है।" देवा का लहजा ठण्डा और और सपाट था।

जब देवा अफजल के ऑफिस से निकला था तो विचित्र-सी मनोस्थिति थी उसकी। एक तरफ जहां उसे खुशी थी कि उम्मीद से कहीं पहले ही उसे इतना बड़ा मौका मिल गया था, वो एक महत्त्वपूर्ण पोजीशन पर आ गया था जहां उसे अपनी मर्जी से कुछ बड़ा करने के अवसर प्राप्त हो सकते थे। दूसरी तरफ, खालिद के बारे में सोचकर उसका मूड खराब हो रहा था।

वो खालिद के बारे में जितना सोच रहा था, उसका मूड उतना ही खराब हो रहा था। फिर देवा को ख्याल आया कि शायद अफजल सुल्तान खालिद को अपने भरोसे का आदमी समझकर उसे उसके साथ अपने जासूस और मुखबिर के रूप में नत्थी करके जा रहा था। उसने यह कहकर खुद को समझाया कि आने वाला समय खुद ही इस समस्या का हल लेकर सामने आ जाएगा।

उसी दिन देवा ने करीना को भी यह खुशखबरी सुना दी।

वो दोनों फ्लैट की तलाश में जा रहे थे, करीना उसकी प्रमोशन की खबर सुनकर बच्चों की तरह खुश नजर आने लगी थी, फिर वो बोली---

"बॉस बनकर तो दो साल में ही इतना कमा लोगों कि तुम रिटायर होकर ऐशो-आराम की जिन्दगी गुजार सकोगे।"

"लेकिन.... रिटायर कौन होना चाहता है, करीना ? अभी मेरी उम्र ही क्या है ?" देवा बोला।

"मैं तो इसलिये कह रही थी, क्योंकि यह जिन्दगी खतरों भरी है।" करीना ने कहा ।

“मुझे खतरों से खेलने में ही मजा आता है।” देवा बोला--- "मैं सिर्फ पैसों के लिये ही नहीं बल्कि एन्जॉय करने लिये भी ज्यादा-से-ज्यादा दिनों तक इस मैदान में रहना चाहता हूं।” देवा ने कहा--- "बॉस बन जाने का यह मतलब नहीं कि मैं कमरे में बंद होकर बैठ जाऊंगा और सिर्फ ऑर्डर दिया करूंगा। प्यादों और लेफ्टीनेंटों के तमाम खतरनाक काम मैं खुद किया करूंगा, गोलियों का सामना किया करूंगा....तुम्हें मेरा हाथ बंटाना होगा करीना...मेरी मदद करनी होगी। हमें मिलकर बहुत-से अहम काम करने हैं। मुझे अगर इस गैंग को चलाना है, तो मैं इसे अपने तरीके से चलाऊंगा। जो लोग हमारा मुकाबला करने की कोशिश करेंगे या हमें आंखें दिखाएंगे, उन्हें मैं शहर से निकाल दूंगा या वो हमारे हाथों मारे जाएंगे।” देवा की बातें सुनकर और उसके स्वर में छुपी क्रूरता को महसूस करके करीना जैसी लड़की भी कुछ पल के लिये भयभीत-सी नजर आने लगी थी। लेकिन फिर शायद उसने भय को दिमाग से झटक दिया था और हल्के से गर्दन हिला दी थी। उन्हें एक अच्छे इलाके की शानदार बिल्डिंग में एक फर्निश्ड फ्लैट मिल गया था। किराया काफी ज्यादा था, लेकिन देवा को अब ऐसे खर्चों की कोई परवाह नहीं थी। फ्लैट दोनों को ही पसन्द आ गया था, देवा ने औपचारिकताएं पूरी कर दी थीं और अगले दिन वो दोनों उस फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे। करीना किसी नवब्याहता दुल्हन की तरह खुश दिखाई दे रही थी।