शरद शिरके के कत्ल ने शहर-भर में दहशत और सनसनी फैला दी थी।
कई दिनों तक विभिन्न क्षेत्रों में अनुमान लगाए जाते रहे थे कि इतना बड़ा कदम कौन उठा सकता है? पुलिस और अण्डरवर्ल्ड के लोगों को अन्दाजा था कि यह किसका काम हो सकता है? पुलिस अफजल सुल्तान को पूछताछ के लिये ले गई थी। वो छः घंटे तक अफजल से पूछताछ करते रहे थे, मगर उससे कुछ उगलवा पाने में नाकाम रहे थे। बल्कि अफजल निहायत सादगी और मासूमियत से उनको यह यकीन दिलाने में कामयाब हो गया था कि वो तफ्तीश में उन्हें पूरा सहयोग देने को दिल से तैयार है। वो लोग उसे जैसा बताएं। लेकिन जब उसकी अपनी समझ में ही कुछ नहीं आ रहा है, तो वो उन्हें क्या बताए? आखिर मजबूर होकर पुलिस ने उसे छोड़ दिया था। वो वारदात की जगह से अपने दूर होने का पक्का सबूत भी पेश कर चुका था। पुलिस ने उसे जरूर छोड़ दिया था, लेकिन पूर्वी गैंग के लोगों को पक्का यकीन था कि उनके बॉस के कत्ल में अफजल सुल्तान का ही हाथ है। वे उससे इन्तकाम लेने का निश्चय भी कर चुके थे ।
उस कत्ल के सिलसिले में देवा या करीना का कहीं नाम नहीं आया था। शायद उनके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं था कि वो ऐसा कोई काम करने की हिम्मत कर सकते हैं ।
अफजल सुल्तान उनकी कार्रवाई से बहुत खुश हुआ था और उसने उन दोनों को एक-एक लाख रुपया कैश इनाम भी दिया था और उनका शुक्रिया भी अदा किया था।
अफजल सुल्तान ने शरद शिरके की अर्थी के लिये फूलों का बड़ा-सा चक्र भिजवाया था। वो इस कत्ल के सिलसिले में अपनी मासूमियत और असम्बद्धता जाहिर करने की भरपूर कोशिश कर रहा था। उसने देवा को शराबखाने वालों को डराने-धमकाने के लिये भेजना भी बंद कर दिया था। अफजल के ख्याल में अब देवा ज्यादा अहम और ज्यादा कीमती आदमी बन चुका था। छोटे-मोटे काम के लिये अब उसकी जान को खतरे में डालना अक्लमंदी नहीं थी। अब देवा को गैंग में लगभग अफजल सुल्तान के करीबी की सी हैसियत हासिल हो गई थी। जिन गुर्गों वा आदमियों से रिपोर्ट लेने की अफजल को फर्सत नहीं मिलती थी, उनसे देवा रिपोर्ट लेने लगा था। गैंग की कोई भी सरगर्मी अब देवा से छुपी हुई नहीं थी। फालतू वक्त में देवा करीना का सामीप्य पाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन करीना का मामला अजीब था। देवा की समझ में नहीं आ रहा था कि करीना की नजर में उसका क्या मुकाम था? वो देवा से कतराती भी नहीं थी। लेकिन इस हद तक भी नहीं जाती थी कि जिस हद तक देवा उसे ले जाना चाहता था। आखिर एक दिन देवा ने हौसला जुटाकर उससे कह ही दिया---
"क्यों न हम एक ही फ्लैट किराये पर लेकर उसमें इकट्ठे रहने लगें ?"
"मुझे शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है।" वो नाक चढ़ाकर बोली।
"वो तो मुझे भी नहीं है।” देवा जल्दी से बोला--- “शादी की बात किसने की है? मैं तो सिर्फ इकट्ठे रहने की बात कर रहा हूं।"
वो इंकार में सिर हिलाते हुए बोली---
"नहीं। मैं कभी किसी मर्द के साथ नहीं रही।"
"तो अब रहकर देख लो। शायद यह तुम्हारे लिये अच्छा तजुर्बा साबित हो।" देवा ने फौरन कहा।
"हो सकता है।" करीना देवा की आंखों में झांकते हुए बोली--- “लेकिन बुरा तजुर्बा भी साबित हो सकता है। बहुत-से लोग, जो एक-दूसरे से बेहद प्यार करते हैं, जब स्थाई तौर पर इकट्ठे रहना शुरू कर देते हैं तो एक-दूसरे से उकता जाते हैं। बुरे हो जाते हैं।"
"कहीं तुम्हारे इंकार की वजह यह तो नहीं कि तुम्हारी जिन्दगी में कोई और मर्द हो?" देवा ने आखिरकार पूछ ही लिया।
"नहीं। ऐसा तो कोई नहीं है, जिसकी मेरी जिन्दगी में कोई खास अहमियत हो।"
“लेकिन बहरहाल, कोई मौजूद जरूर है।” देवा ने कुरेदा । उसके लहजे में ईर्ष्या थी ।
"जाहिर है। हम जैसी लड़कियों की जिन्दगी में एक से ज्यादा मर्द मौजूद रहते हैं। उनमें से किसी एक को मुझ जैसी कोई लड़की पसन्द भी कर सकती है।"
"क्या मैं तुम्हें पसन्द हूं?" देवा ने पूछा। वो करीना के सामने बैठा हुआ था और उसने करीना का एक हाथ अपने दोनों हाथों में मजबूती से थमा रखा था।
करीना ने "हां" में सिर हिलाया, तो देवा के बदन में सुरूर की लहर दौड़ गई। उसके दिल को जैसे एकदम करार आ गया था।
"इसका मतलब यह कि मैंने जो सुझाव दिया है, तुम उस पर विचार करोगी।” देवा ने आशापूर्ण लहजे में पूछा था।
"हां। मैं इस पर विचार करूंगी।" करीना ने जवाब दिया और उसके बाद देवा को सब्र करना पड़ा।
करीना बहुत अजीब-सी लड़की थी। देवा उसके बहुत करीब था, इसके बावजूद जब कभी वो सोचता था तो उसे महसूस होता था कि वो करीना को बिल्कुल नहीं जानता। वो बड़ी उत्सुकता और जिज्ञासा से करीना के बारे में कुछ सवालों के जवाब मालूम करना चाहता था, मगर उसे कोई जवाब नहीं मिलता था। वो कौन थी, कहां से आई थी, उसकी फैमिली कहां थी? देवा को कुछ भी तो मालूम नहीं था। करीना किसी भी मामले में खुलती नहीं थी, वो कभी-कभी रहस्यमयी लगती थी। यही रहस्यमय स्थिति शायद देवा के लिये ज्यादा आकर्षण का केन्द्र बनती थी। इस दौरान एक अहम बात यह हुई थी कि अनपेक्षित रूप से पूर्वी गैंग वालों ने एक शख्स को अपना लीडर चुन लिया था।
वो बलराम नाम का उत्तर प्रदेश का मूलवासी था और वहाँ से मुम्बई आया था। उसके बारे में कहा जा रहा था कि वो गैंग के कारोबारी मामलों को नए सिरे से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा था। हर चीज को मैनेज कर रहा था। वो अपने गैंग की इन्तकाम की परम्परा को छोड़ने का भी कोई इरादा नहीं रखता था। इसका सबूत कुछ यों मिला कि जब उसने गैंग की सरदारी संभाली थी, तो उसके कुछ ही दिनों बाद अफजल गैंग के एक और आदमी को उठा लिया गया था। उसे भी कार में लम्बी सैर के लिये ले जाया गया था। जब उसकी लाश एक वीरान बाहरी इलाके में पाई गई थी तो उसके सीने पर एक पर्ची लगी हुई थी, जिस पर लिखा हुआ था---
"शरद शिरके की याद में।"
यह पर्ची इस तरह मृतक के सीने पर लगी हुई थी कि पर्ची में छेद करके एक छोटा-सा चाकू मृतक के सीने में घुसेड़ दिया गया था। सिर्फ यही नहीं, बलराम के बारे में यह सुनने में आया था कि वो अपने कारोबारी मामलों में शहर में सबको सीधा कर देना चाहता था। यह खबर काफी चिंताजनक थी।
अब अफजल के मकबूल कारिन्दे की लाश उसके सामने लाई गई थी, तो अफजल का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो गया था।
"यह ठीक नहीं हो रहा सुरेन्द्र पाल ।” उसने घुटी घुटी-सी आवाज में कहा था--- "मैं यह सबकुछ कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।"
"तुम डर रहे हो?" देवा उर्फ सुरेन्द्र पाल ने इत्मीनान से पूछा। वो अब अफजल सुल्तान के साथ बेतकल्लुफी से बात करने लगा था।
"नहीं।" अफजल सुल्तान ने मजबूत लहजे में कहा--- “लेकिन यह कोई अच्छी निशानी नहीं है। इसका मतलब है, कल को तुम्हारी या मेरी बारी भी आ सकती है।"
देवा को अफजल की उत्तेजना और गुस्सा कुछ बनावटी-सा लग रहा था। ऐसा लगता था जैसे अन्दर ही अन्दर उस पर खौफ हावी हो चुका है और अपना रौब-दाब कायम रखने की कोशिश कर रहा है।
"तुम्हें इस सिलसिले में परेशान होने की जरूरत नहीं है।" देवा ने किसी बुजुर्ग की तरह मशवरा दिया--- “यह सब खेल का एक हिस्सा है। हम उस वक्त तक उनका मुकाबला करेंगे, जब तक कि उनका गैंग खत्म नहीं हो जाता। अगर जरूरी हुआ, तो हम उनके इस नये लीडर बलराम का भी पत्ता साफ कर देंगे।"
“उसने हिसाब बराबर कर लिया है, हो सकता है अब वो लड़ाई-झगड़ा बन्द कर दे ।" अफजल ने उम्मीद जाहिर की--- "मैं नहीं चाहता कि हमारा सारा वक्त और ताकत उससे लड़ने-भिड़ने में ही जाया होती रहे। इन्सान अगर झगड़ों में उलझा रहे, तो फिर दौलत नहीं कमा सकता।"
उस दिन देवा अफजल से बातचीत करके उसके ऑफिस से निकला तो खुश नहीं था । उसे पहली बार अहसास हुआ था कि उसके और अफजल सुल्तान के विचारों में बड़ा फर्क था। अफजल किसी गैंग लीडर से ज्यादा एक बिजनेसमैन था और दौलत के लिये कुछ भी कर सकता था और वो स्वाभिमानी तथा लड़ाका नहीं था। जबकि देवा ईंट का जवाब पत्थर से देने का कायल था। उसने जिस तरह की जिन्दगी गुजारी थी उसके बाद उसके लिये दूसरों की तो क्या खुद अपनी जान की भी कोई अहमियत नहीं रही थी। दूसरे दिन देवा को यह तजुर्बा भी हुआ था कि कानून और मुजरिमों का आपस में कितना गहरा और करीबी ताल्लुक था।
उस दिन ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर कैलाश पंवार ने अफजल को अपने ऑफिस में बुलाया था, अफजल ने देवा को भी साथ ले लिया था। देवा की मौजूदगी से हौसला बंधा रहता था उसका कि कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वो अफजल सुल्तान का बॉडीगार्ड, असिस्टेंट और एडवाईजर सब कुछ था।
कैलाश पंवार छोटे कद और चपटी नाक वाला आदमी था, उसकी भौहें घनी और लगभग एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। उसकी आंखें सांप जैसी छोटी-छोटी थीं और जबड़ा टेढ़ा था। देखने से ही वो एक कमीना और लालची आदमी लगता था।
वो बिना किसी भूमिका के भड़ककर बोला था---
“मुझे किसी बड़ी गैंगवार के आसार दिखाई देते हैं अफजल सुल्तान, और मैं यह हरगिज़ बर्दाश्त नहीं करूंगा कि शहर में कोई गैंगवार हो। यह फायरिंग वगैरह का सिलसिला फौरन बंद होना चाहिये।"
"आपको मेरे साथ इस तरह बात नहीं करनी चाहिये, जे०सी०पी० साहब।" अफजल ने नर्म लहजे में कहा--- "हम अपने हितों के लिये हर महीने आपको बाकायदगी से मोटी रकम भिजवा देते हैं।"
"वो तो तुम भिजवाते ही रहोगे अफजल !” उसने इस बार सुल्तान नहीं कहा था। उसके लहजे में ढिठाई और बेखौफी थी--- "अगर तुम रकम नहीं भिजवा रहे होते तो इस वक्त जेल में होते। लेकिन वो रकम तुम अपने धन्धे की सुरक्षा के लिये भिजवाते हो, शहर में लाशें गिराने और खून-खराबा फैलाने के लिये नहीं। मैं तुम्हारे धन्धों पर एतराज नहीं कर रहा हूं। लेकिन खून-खराबे से शहर में पुलिस की बदनामी होती है। मीडिया वाले हमारे पीछे पड़ जाते हैं इसलिये मैं कह रहा हूं कि शहर में खून-खराबे का सिलसिला आगे नहीं बढ़ना चाहिये।"
"हम तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं, साहब!" अफजल ने मासूम बनकर कहा--- "ये सारी बदमाशियां तो पूर्वी गैंग वालों की हैं।"
"लेकिन...उनका तो कहना है कि यह सारी बदमाशी तुम्हार गैंग की है।" जे०सी०पी० (ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर) कैलाश पंवार ने संजीदा लहजे में कहा--- “आज सुबह मैंने पूर्वी गैंग के नये चीफ बलराम को भी बुलाया था, मेरी एक घंटे तक उससे बात हुई थी उसने वादा किया है कि अगर तुम अब उसका कोई आदमी नहीं मारोगे, तो वो लोग भी इस तरह की कोई हरकत नहीं करेंगे। तो अब यह समझूं कि तुम लोगों की वजह से अब शहर में कोई कत्ल नहीं होगा। कोई गैंगवार नहीं शुरू होगी ?"
दोनों गिरोह के सरदारों की ज्वॉइंट पुलिस कमिश्नर कैलाश पंवार से उस मीटिंग के बाद शहर में इस हद तक शांति रही कि दोनों गैंगों का कोई आदमी कत्ल नहीं हुआ था। फिर भी छुट-पुट के लड़ाई-झगड़े और चाकूबाजी की वारदातें होती रही थीं। एक-दूसरे के आदमियों को जख्मी या मारा-पीटा जाता रहा। एक-दूसरे के इलाकों में नाजायज धन्धों पर कण्ट्रोल करने के लिये रस्साकशी जारी रही।
साफ नजर आता था कि किसी भी वक्त मामला हाथ से निकल जाएगा। एक बार फिर “खून का बदला खून" का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
पूर्वी गैंग और उत्तरी साईड गैंग की लड़ाई का मामला तो अपनी जगह था, लेकिन खुद उत्तरी साईड के दो गैंग मौजूद थे जो एक-दूसरे के धन्धों से छीना-झपटी करते रहते थे। इधर पश्चिमी साईड के गैंग भाईयों ने मिलकर एक नया गैंग स्थापित कर लिया था और गैरकानूनी धन्धे शुरू कर दिये थे। वो गैंग भी काफी ताकत पकड़ने लगा था।
इन तमाम तब्दीलियों के दौरान देवा कोई खास रोल नहीं निभा पा रहा था और वो खुद को बड़ा कन्फ्यूज-सा महसूस कर रहा था। इसकी वजह से उसके अन्दर एक अजीब-सी व्याकुलता करवटें लेती रहती थी।
अफजल गैंग के जिस आदमी को कत्ल किया गया था, अभी तक उसका इन्तकाम भी नहीं लिया जा सका था। दूसरे गिरोहों के जो लोग सिर उभार रहे थे या एक-दूसरे की सीमाओं में कारोबारी उसूलों के खिलाफ काम कर रहे थे, उन लोगों से गोलियों की भाषा में बात नहीं की जा रही थी। उन्हें कोई सबक नहीं सिखाया जा रहा था। ये तमाम बातें देवा को अन्दर ही अन्दर व्याकुल कर रही थीं। उसने सोच लिया था कि अब अगर कोई बड़ा हादशा पेश आ गया तो वो अकेला ही उसके जिम्मेदारों को सबक सिखाने निकल पड़ेगा। फिर चाहे जो भी हो।
एक दिन देवा और अफजल उस रेस्तरां में खाना खा रहे थे। जिसके ऊपर अफजल का ऑफिस था। वो रेस्तरां अफजल सुल्तान की ही प्रॉपर्टी था। अचानक गोलियां चलने की तड़तड़ाहट और शीशे टूटने के धमाके सुनाई देने लगे।
देवा ने फुर्ती से मेज उलट दी और एक हाथ से अफजल को खींचकर उल्टी मेज की आड़ में कर दिया। कुछ गोलियां सनसनाती हुईं उनके सिरों के ऊपर से भी गुजर गई।
देवा ने फौरन ही अन्दाजा लगा लिया कि फायरिंग मशीन गनों से की जा रही थी। इसका मतलब था कि गैंगवारों में मशीनगनों का इस्तेमाल शुरू हो रहा था। देवा को अफसोस हुआ कि मशीनगन के इस्तेमाल की पहल उसने क्यों नहीं की। वो तो मशीनगन चलाने में बड़ा माहिर था। मैदाने-जंग में उसने मशीनगनों से लाशों के ढेर लगाए थे।
उसके ख्याल में अब भी वो एक तरह के मैदाने जंग में ही था। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले वाली जंग देश की सुरक्षा के लिये थी, जबकि यह वाली जंग पैसे के लिये थी ।
उसी क्षण देवा ने दिल ही दिल में यह फैसला किया कि आईन्दा वो दुश्मनों को उन्हीं की भाषा में जवाब देगा और उन्हें बता देगा कि इस भाषा का यानि मशीनगन की भाषा का वो उनका भी गुरु है। यह हमला सीधा अफजल सुल्तान को खत्म करने के लिये था। यह निसन्देह विरोधी गैंग का निहायत जुर्रत भरा कदम था। अफजल के कंधे में एक गोली लग भी गई थी। जख्म हालांकि ज्यादा गहरा नहीं था, फिर भी तय था कि अगर देवा ने उसे मेज की आड़ में खींचने में एक पल की भी देर की होती तो अफजल की खोपड़ी भी उड़ सकती थी। अफजल पर इस किस्म का हमला पहली बार हुआ था।
अफजल का जख्म तो कुछ दिनों में ठीक हो गया था, लेकिन उस हमले के बाद से उसकी आंखों में खौफ स्थाई रूप से जमकर रह गया था, जैसा कि उस जानवर की आंखों में होता है, जिसे मारने के लिये दरिन्दे उसके पीछे लग गए हों। खून-खराबे और कत्ल के खून के हुक्म जारी करना और बात थी। खुद बरसती गोलियों का सामना करना एक दूसरी तरह का तजुर्बा था। अफजल का जेहन उस तजुर्बे से गुजरने के लिये पूरी तरह उपयुक्त नहीं साबित हुआ था। खुद मौत का सामना करना उसके लिये किसी हद तक नाकाबिले-बर्दाश्त था। हमला अफजल सुल्तान पर हुआ था, लेकिन इस पर ज्यादा गुस्सा देवा को आ रहा था। हमलावर गाड़ी में थे और रेस्तरां पर फायरिंग करते हुए तेज रफ्तारी से गुजरते चले गए थे। रेस्तरां की बाहरी शीशे की दीवार किरची-किरची होकर बिखर गई थी, अन्दर भी काफी तबाही फैली थी। दो-तीन दूसरे लोग भी जख्मी हुए थे, गनीमत थी कि कोई मारा नहीं गया था ।
फिर भी देवा इस घटना पर ताव खा रहा था। उसका ख्याल था यही बात बड़ी अपमानजनक थी कि दुश्मन ने इतनी हिम्मत की थी। अगर उन्हें सबक न सिखाया गया, तो यह इससे भी ज्यादा अपमान की बात होती। इस तरह वो अफजल सुल्तान के गैंग की नाक के साथ-साथ कान भी कट जाते। इन लोगों को अगर शहर में रहना था और यही धन्धे जारी रखने थे, तो फिर देवा के ख्याल में इस तरह की हरकतों का जवाब देना भी बहुत जरूरी था। आखिरकार जब देवा से और ज्यादा बर्दाश्त नहीं हुआ था तो उसने अपने जरियों से एक मशीनगन खरीदकर मंगवा ली थी। इस बारे में उसने किसी को नहीं बताया था और इन्तकाम के अन्जाम पर एक रात अकेला ही निकल पड़ा था।
पूर्वी साईड गैंग का हैडक्वार्टर फूलों की एक दुकान के ऊपर था जहां महंगे-महंगे 'बुके' बिकते थे। यह शोरूम खुद गैंग लीडर बलराम का था और यहां से उसे लाखों रुपये महीने की कमाई थी। यह उसका प्रिय शौक भी था। गिरोह के नाजायज धन्धों के बावजूद उसने यह शोरूम बंद नहीं किया था। शोरूम के बिल्कुल सामने एक चौराहा था। रात को जब देवा वहां पहुंचा था तो चारों तरफ सन्नाटा और गहरा अन्धेरा फैला हुआ था। फूलों का शोरूम इस वक्त बन्द था लेकिन ऊपर की मंजिल पर रोशनी नजर आ रही थी।
देवा कार की पिछली सीट पर था, गाड़ी ड्राइवर चला रहा था। देवा ने उसे कह रखा था कि वो गाड़ी तेज रफ्तार से फूलों के शोरूम के सामने से गुजारता हुआ ले जाए और चौराहे से बांई की तरफ घूम जाए।
ज्यों ही गाड़ी शोरूम के सामने पहुंची, देवा ने मशीनगन उठाकर कंधे से लगा ली। यह मॉडर्न बनावट की एक हल्की मशीनगन थी जिसे एस०एम०जी० कहा जाता था। मगर इसका काम बड़ा खौफनाक होता था। वो अपने निशाने को तबाह कर देती थी। देवा ने फौरन ही फायर खोल दिया था। उसने दुकान को ही नहीं, ऊपरी मंजिल को भी निशाना बनाया था और गोलियों की बौछार कर दी थी। गोलियों की तड़तड़ाहट उभरते ही ऊपरी मंजिल की लाईटें बुझ गई थीं। काफी तबाही कुछ ही क्षणों में फैल गई थी। तमाम शीशे और खिड़कियां टूट गई थीं, लेकिन देवा यकीन से नहीं कह सकता था कि कोई मरा भी था या नहीं।
ड्राइवर ने शोरूम के सामने से गुजरते हुए कुछ सेकेण्ड के लिये गाड़ी की रफ्तार कम कर दी और कुछ सैकेण्ड में ही बहुत तोड़-फोड़ और तबाही मच गई थी। फिर गाड़ी तेज रफ्तार से आगे बढ़ती चली गई। वो अन्धेरे में गायब हो गई।
गोलियों की तड़तड़ाहट की गूंज खत्म होते ही वातावरण में जो सन्नाटा फैला, उसमें दहशत का भी बहुत बड़ा प्रभाव शामिल था। देवा ने सब मशीनगन नीचे सीट के पास डाल दी थी और इत्मीनान से थोड़ा चौड़ा होकर बैठ गया था। वो खुश था कि आज उसने हिसाब बराबर कर दिया था।
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