देवा एक अच्छा फौजी साबित हुआ था।
ट्रेनिंग के बाद उसे मशीनगन कम्पनी में तैनात किया गया था, इससे वो बहुत खुश था। उसके ऑफिसर्स उसकी निडरता और दिलेरी देखकर सख्त हैरान थे जबकि देवा की नजर में यह कोई खास बात नहीं थी। जान हथेली पर लिये फिरने का देवा का तजुर्बा पुराना था बल्कि उसे तो मैदान-ए-जंग में लड़ना कहीं ज्यादा आसान लगता था । वो दिल ही दिल में सोचता था कि मुजरिमों की दुनिया में तो उसे अकेले ही मौत का सामना करना पड़ता था, जबकि मैदान-ए-जंग में उसके दाएं-बाएं उसके सैकड़ों साथी उसकी मदद के लिये मौजूद होते थे रात-दिन । वो सब सामूहिक रूप से जिन्दगी और मौत की जंग लड़ते थे। यहां अगर खतरे ज्यादा थे, तो सुरक्षा प्रबन्ध भी ज्यादा थे। मसलन खन्दक में बैठकर लड़ने से ही खतरे काफी कम हो जाते थे। मुजरिमों की दुनिया में गली-कूचों की लड़ाईयों में खतरे कहां मिलते थे। कुछ वक्त बाद ही उसे अपनी कम्पनी का सार्जेंट बना दिया गया था।
फौज में ज्यादातार नौजवान गांव-देहात से आए हुए थे, वो बहुत जल्द मुम्बई के तेज-तर्रार जवान देवा से प्रभावित हो जाते थे। ओहदे के हिसाब से भी वो उसका हुक्म मानने के पाबन्द होते ही थे। लेकिन देवा की शख्सियत में जो खास बात थी, उसके चलते वो दिल से भी उसे अपना लीडर मान लेते थे। कई लोग तो ओहदे में देवा से बड़े होते थे। फिर भी उसके दोस्त बन जाते थे।
एक रात तो उसने अपने साथियों को हैरान ही कर दिया था।
उस रात एक पहाड़ी पर जंगल में उनका आतंकवादियों से खूनी मुकाबला हो गया था। तमाम रात दोनों पक्षों की तरफ से फायरिंग और गोलाबारी जारी रही थी। सुबह देवा इस हालत में जंगल से निकला था कि उसने अपनी पीठ पर अपने कैप्टन को डाल रखा था। कैप्टन बुरी तरह जख्मी और बेहोश था।
खुद देवा भी अपने ही खून में नहाया हुआ लग रहा था। उसका चेहरा खून से तर था और आंखों पर भी खून इस तरह फैला हुआ था कि उसके लिये ठीक से देख पाना भी मुश्किल हो रहा था।
खुली जगह पर आकर उसने देखा कि उस मोर्चे पर मौजूद उसके तमाम अफसर शहीद हो चुके थे। फौजियों की कमान करने के लिये कोई नहीं बचा था, वो सारे नए रंगरूट (रिक्रूट) थे और घबराये हुए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करें? कुछ पता नहीं था कि वो कब चौकी छोड़कर भाग निकलते।
देवा ने अपने कैप्टन को आहिस्ता से जमीन पर लिटाया, अपनी आंखों पर से खून पोंछा । फिर दो साथियों को पास बुलाकर कैप्टन की तरफ इशारा करते हुए हिदायत दी---
"तुम अपनी फर्स्ट एड किट से इनकी जितनी भी मरहम-पट्टी कर सकते हो, कर दो।"
उसके बाद एक सार्जेंट की हैसियत से देवा ने उस छोटी-सी चौकी की कमान खुद संभाल ली थी। दिन चढ़ते ही पीछे से कुमुक आ गई थी जिसकी कमान एक कर्नल साहब के हाथ में थी। आने वालों को अन्देशा था कि वो चौकी उनके हाथ से निकल गई होगी। मगर वो यह देखकर हैरान रह गए कि न सिर्फ चौकी पर उनका कब्जा बरकरार था बल्कि इन नए जवानों ने आतंकवादियों को भी पीछे धकेल दिया था। कर्नल ने देवा को कम्पनी की कमान करते हुए इस पोजीशन में एक पहाड़ी पर देख लिया था कि देवा का पूरा चेहरा खून से सनी पट्टियों में लिपटा हुआ था ।
देवा की पतलून सिर्फ घुटनों तक बाकी रह गई थी जख्मी टांगें खून और बर्फ में लिपड़ी हुई थीं। वर्दी की कमीज की जगह महज चिथड़े लिपटे दिखाई दे रहे थे। उसकी पट्टियों में से सिर्फ उसकी आंखें और होंठ ही नजर आ रहे थे।
कर्नल को यह भी पता चला कि देवा को दो रातों और दो दिन से पलक झपकने का मौका भी नहीं मिल सका था। उस दौरान उसके जख्मों में भी इजाफा होता रहा था। इसके बावजूद उसने चौकी की कमान संभालकर न सिर्फ लड़ाई जारी रखी थी बल्कि बढ़त भी बना ली थी। उसे इस सब पर यकीन नहीं आ रहा था। वो हैरत से चिल्ला उठा---
"हे भगवान...! यह आदमी है या कोई जिन्न... भूत? इसने चौकी की कमान बुरे हालात में इतनी अच्छी संभाली कि कोई सीनियर कैप्टन या मेजर भी नहीं संभाल सकता था। अगर दुश्मन इस चौकी पर कब्जा करने में कामयाब हो जाते, तो फिर वो पीछे की तरफ जाकर हमारा सफाया भी कर देते ।"
कर्नल ने यह सब कुछ अपने साथी ऑफिसरों को भी बताया।
फिर उसने देवा को उसकी पोजीशन से वापस आने का हुक्म दिया। वो पहाड़ी पर मशीनगन लिये लगभग आधा लेटा हुआ था।
कर्नल ने अपने मातहतों को हुक्म दिया।
“उसे नीचे लाओ और उसके जख्मों की ड्रेसिंग करो।"
देवा को नीचे लाया गया। कर्नल ने नकली नाराजगी से कहा---"तुमने यह सब क्या किया ?"
“मैं क्या करता सर?” देवा ने आदर से सैल्यूट ठोकने के बाद कहा--- "कुछ फौजी शहीद हो गए थे, कुछ बुरी तरह जख्मी थे। मैंने उन्हें...पीछे भिजवा दिया... अगर वो लोग बेहोश न होते, तो यकीनन यहां से एक इंच भी पीछे आने को तैयार न होते। वो सब लोग बहुत बहादुरी से लड़े... वो... वो आखिरी सांस तक लड़ने के लिये तैयार थे। जब... जब...कोई ऑफिसर यहां बाकी न रहा...तो मुझको खतरा हुआ सर कि...कि.... कम्पनी बिखर न जाए और हार न मान ले। जब तक जवानों को कमान करने के लिये ऑफिसर मौजूद रहे हैं सर... तब तक जवान जान लड़ा सकते हैं... लेकिन... अगर कोई... उनकी कमान संभालने वाला न हो...तो.... वो घबरा जाते हैं। हौसला छोड़ देते हैं। बिखर जाते हैं। मूर्खता पर मूर्खता करते चले जाते हैं।" देवा ने अटक-अटक कर कहा था।
यह सब कुछ सुनकर कर्नल मुस्कराये बगैर न रह सका। फिर कर्नल ने अपने साथ आने वाले ऑफिसर्स से कहा---
"सुन रहे हो, यह कम उम्र का ताजा-ताजा जूनियर ऑफिसर कैसी बातें कर रहा है, जैसे बड़ा तजुर्बेकार सोल्जर हो। बड़ी बात नहीं थी कि यह इसी जज्बे और जोश के साथ, अगर उस पहाड़ी पर डटा रहता तो इसकी खोपड़ी भी उड़ चुकी होती---और वो बेशक हमारी फौज को बहुत बड़ा नुकसान होता।" फिर वो देवा की तरफ घूमा--- "मैं कर्नल रहीम खान हूँ। इस कम्पनी की कमान अब कैप्टन प्रदीप तोहरा सम्भाल लेंगे। मैं तुम्हें नीचे भेज रहा हूं, ताकि तुम्हारा सही तरह से इलाज हो सके। मैं हरगिज नहीं चाहता कि तुम जैसा आदमी बर्फ की वजह से मर जाए।"
देवा ने कर्नल को सैल्यूट किया और न चाहते हुए भी पीछे चला गया था।
बाद में कर्नल रहीम को इस मोर्चे का और विवरण प्राप्त हुआ था। जिससे देवा की कार्यकुशलता के कुछ और पहलू सामने आए थे। कर्नल इस जवान की बहादुरी, अक्लमंदी और स्थिरमिजाजी से बहुत खुश हुआ था। कर्नल ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके हैडक्वार्टर भेज दी थी, जिसके आधार पर देवा के लिये दो मैडल्स की सिफारिश कर दी गई थी।
देवा इस पर खुश तो था, लेकिन उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर उसको तमगे देने का तकल्लुफ क्यों किया जा रहा है। उसने तो अपनी समझ में कोई कारनामा नहीं कर दिखाया था। देवा के ख्याल में, अगर उसे जुर्म की दुनिया में गली-कूचों में जिन्दगी और मौत की जंग लड़नी पड़ती, तब भी वो ऐसा ही करता। जैसा कि देवा का अनुमान था, आतंकवादी फौजें भाग खड़ी हुई थीं, उन्होंने अपने साथियों की लाशें उठाकर ले जाना तो दूर की बात थी।
देवा को सख्त जख्मी होने के आधार पर फौज से डिस्चार्ज करा दिया गया था। उसे ऑफिस ड्यूटी ऑफर की गई थी, जिससे उसने इन्कार कर दिया था। उस दौरान उसकी सैलरी और भत्तों में से बची हुई रकम जमा होती गई थी, क्योंकि जंग खत्म होने के बाद भी कई महीने उसे अस्पताल में रहकर अपना इलाज करवाना पड़ा था। रकम उसे इकट्ठी मिल गई थी। वो करीब चालीस हजार रुपये थे।
फिलहाल देवा की कुल जमापूंजी वही रुपये थे। देवा ने रकम एक बेल्ट में डालकर बेल्ट को कपड़ों के नीचे कमर पर बांध लिया था। जंग के दौरान देवा को लीना की याद इतनी शिद्दत से आती रही थी कि अगर उस वक्त यह रकम उसके पास होती और कोई उससे वादा करता कि वो इस रकम के बदले लीना को उसके पास ला सकता है, तो देवा हँसी-खुशी यह सौदा कर लेता। इस लिहाज से यह अच्छा ही हुआ था कि यह रकम उसे घर जाते वक्त ही दी गई थी।
मैदान-ए-जंग से वापसी पर देवा जैसे ज्यादा माहिर और ज्यादा तजुर्बे का कातिल बन चुका था। लेकिन कोई उसे कातिल कहकर नहीं पुकार सकता था। अब वो फौज से छुट्टी पाया हुआ एक इज्जतदार जूनियर ऑफिसर था। उसने सरकारी खर्चे पर एक वक्त में एक ही बार में ज्यादा से ज्यादा दुश्मनों को मारने की ट्रेनिंग हासिल कर ली थी। लेकिन जाहिर है कि कोई उससे यह उम्मीद तो हरगिज नहीं रखता था कि वो अमन के जमाने में अपनी योग्यताओं को शहर के गली-कूचों में आजमाने की सोच भी सकता है। उसे एक शरीफ, कानूनपसन्द और इज्जतदार शहरी की हैसियत से घर वापस भेजा गया था। वापस आते वक्त देवा के जेहन में दौलत कमाने की कई नई योजनाएं बन चुकी थीं। उसने अपने मैडल छुपाकर रख दिये थे। उसके ख्याल में उसे समाज में इनके प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं थी।
न ही देवा को अपना चेहरा छुपाने की कोई जरूरत रही थी। जंग से वापसी पर वो जैसे एक नया चेहरा लेकर आ रहा था। जंग ने जहां उसे कई नए और अनोखे तजुर्बे दिए वहीं उसको यह नया चेहरा भी दिया था।
दरअसल जंग के दौरान एक खौफनाक मुकाबले में देवा का चेहरा भी बुरी तरह जख्मी हो गया था। बाकी जख्मों के भर जाने के बाद उनके निशान भी लगभग मिट गए थे। लेकिन उसके बाएं गाल पर जख्म का एक लम्बा और गहरा निशान बाकी रह गया था। यह निशान देवा की ठोड़ी से लेकर गाल की हड्डी से होता हुआ उसके कान की लौ तक चला गया था। जख्म पर कई टांके लगे थे।
निशान के अलावा उस जख्म का एक यह असर भी बाकी रह गया था कि देवा का ऊपरी होंठ कुछ इस तरह से ऊपर की तरफ खिंच गया था कि अब वो सदा ऊपर उठा रहता था। इस वजह से उसका मुंह थोड़ा-सा हर वक्त खुला रहता था। जख्म से और टांके लगने से उसके चेहरे की मांसपेशियां कुछ इस तरह प्रभावित हुई थीं या खिंचकर रह गई थीं कि उसके आधे चेहरे की जैसे बनावट ही बदल गई थी। वो पहली नजर में पहचाना ही नहीं जाता था।
दूसरे जख्मों के निशान हालांकि हल्के थे, लेकिन थोड़ा-बहुत फर्क उनसे भी पड़ा ही था। यों उसका चेहरा काफी हद तक बदलकर रह गया था।
वो मुस्कराता था, तो उसके होंठ में बाईं तरफ हरकत नहीं होती थी, वो होंठ उसी तरह ऊपर को उठा रहता था।
अब अगर देवा खुद को खतरनाक और जालिम आदमी जाहिर करना चाहता, तो उसे अपने चेहरे पर कोई खास भाव लाने की जरूरत नहीं थी, उसका चेहरा खुद-ब-खुद इस तरह का प्रभाव देता था।
मुम्बई पहुंचकर वो बस स्टैण्ड पर उतरा था और बड़ी उत्सुकता से अपने घर की तरफ चल दिया था। लीना का फ्लैट ही उसे अपना घर महसूस होता था और वो वहीं जा रहा था। हालांकि उसे फौज से डिस्चार्ज कर दिया गया था, लेकिन एक वर्दी उससे वापस नहीं ली गई थी और एक पाकिस्तानी रिवाल्वर जो उसने एक पाकिस्तानी आतंकवादी से छीना था, वो उसने खुद अपने पास छुपा लिया था। ये दोनों चीजें इस वक्त उसके पास थीं।
वही वर्दी इस वक्त उसके जिस्म पर मौजूद थी और अन्दरूनी जेब में उसका वो फौजी रिवाल्वर भी मौजूद था।
चेहरे की थोड़ी-सी भयानकता के बावजूद, इस वक्त वो जिस अन्दाज में घर की तरफ जा रहा था, उससे वो एक खिलंदरा लड़का ही नजर आ रहा था।
रात काफी बीत चुकी थी। थोड़ी दूर तक पैदल चलने के बाद उसे एक टैक्सी नजर आई थी। उसमें बैठकर वो लीना के फ्लैट की तरफ रवाना हो गया था। लीना से मिलने की कल्पना से ही उसके जिस्म में सनसनी दौड़ रही थी। उसके रोम-रोम में जैसे बिजली भर गई थी। उसका दिल चाह रहा था कि टैक्सी सड़क पर दौड़ने के बजाय हवा में उड़ने लगे और वो पलक झपकते ही लीना के पास पहुंच जाए। आखिर उसने टैक्सी ड्राईवर को रफ्तार बढ़ाने के लिये कह ही दिया था। रात के अन्धेरे में भी उसने दूर से ही उस इमारत को पहचान लिया था, जिसमें लीना का फ्लैट था। फ्लैट की खिड़की में रोशनी नजर आ रही थी। इसका मतलब था कि लीना घर पर ही थी। वो खुश हो गया। फिर अचानक एक खौफनाक ख्याल ने उसके जेहन में जन्म लिया।
कहीं वो फ्लैट छोड़कर तो नहीं चली गई? कहीं कोई दूसरा किरायेदार तो नहीं आ बसा था उसके फ्लैट में ?
देवा को मुम्बई से गए करीब पन्द्रह महीने हो गए थे और उस दौरान उसका इस महानगर के किसी भी आदमी से कभी भी कोई सम्पर्क नहीं रहा था।
फौज में जिस तरह उसका वक्त गुजरा था, उससे उसका किसी से सम्पर्क रखना मुश्किल ही था और खुद कुछ सोच-समझकर उसने ऐसी कोई कोशिश भी नहीं की थी। उसका फौज में जाने का मकसद ही अपना कोई सुराग छोड़े बगैर ही गायब हो जाना था और वो अपने इस मकसद में कामयाब भी रहा था।
उसने अपने आपको तसल्ली दी कि लीना जरूर इसी फ्लैट में रह रही होगी। वो तमाम भड़कते जज्बातों के साथ उसका इन्तजार कर रही होगी। उसकी गैरमौजूदगी में तो वो फ्लैट छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकती थी । देवा को याद आया कि उसकी रवानगी के वक्त लीना कैसी दुःखी और मासूम नजर आ रही थी। किस तरह बिलख-बिलख कर रो रही थी। किस तरह उसने उसका इन्तजार करने के वादे किये थे ।
टैक्सी से उतरकर देवा ने ड्राईवर को किराये के अलावा टिप भी दी थी, क्योंकि उसने उसकी हिदायत पर गाड़ी काफी तेज रफ्तार से चलाई थी और उसे काफी जल्दी लीना के फ्लैट तक पहुंचा दिया था। टैक्सी वापस घूमकर रवाना हो गई। इमारत की लॉबी में पहुंचकर देवा ने लैटर बॉक्स पर नजर डाली थी। जो लैटर बॉक्स लीना के नाम पर था, उस पर अब भी लीना के नाम का कार्ड चिपका हुआ था। यह देखकर देवा का दिल खुशी से उछल पड़ा था, वो जोश में आकर ऊपर जाने के लिये एक साथ कई-कई सीढ़ियां फलांगने लगा। फ्लैट के दरवाजे पर दस्तक देते वक्त खुशी के मारे जैसे उसके दिल की धड़कनें ही रुकी जा रही थीं । अन्दर सरसराहट की कुछ क्षीण-सी आवाजें उभरी थीं, लेकिन दरवाजा नहीं खुला था। कुछ क्षण के इन्तजार के बाद देवा ने कुछ बेताबी से दोबारा दस्तक दी।
इस बार दरवाजा थोड़ा-सा खुला और किसी ने बाहर झांका। देवा की फैली हुई बांहें अचानक नीचे की तरफ झूल गईं। क्योंकि दरवाजा खोलकर सावधानी से बाहर झांकने वाला मर्द था। सूरत से वो काफी शातिर और मक्कार नजर आ रहा था।
लेकिन वो काफी हद तक खूबसूरत था। वो आधी आस्तीन की शर्ट पहने हुए था और उसके बाल बिखरे हुए थे। देवा को सिर्फ एक पल के लिये हैरत का झटका लगा था। लेकिन वो फौरन ही संभल गया।
अगले ही क्षण उसकी आंखें जैसे आग उगलने लगी थीं। उसने पूरी ताकत से लात मारकर दरवाजा खोला, तो दरवाजे की टक्कर से वो शख्स पीछे हटा और लड़खड़ाते हुए गिरते-गिरते बचा था। इस बीच देवा अन्दर पहुंच चुका था।
"लीना कहां है?" देवा ने खूंखार लहजे में उस शख्स से पूछा।
मर्द के कोई जवाब देने से पहले ही लीना बैडरूम से बाहर आ गई। वो बौखलाई हुई थी। उसके जिस्म पर सिर्फ एक नाईटी थी। जिसके झीने कपड़े में से उसका छलकता हुआ यौवन काफी हद तक स्पष्ट नजर आ रहा था। यह कीमती और खूबसूरत पीली नाईटी देवा ने ही लीना को खरीदकर दी थी। उसका जिस्म पहले की तरह ही गुलाबी और भरपूर लगा था देवा को ।
"कौन हो तुम?" लीना उत्तेजना से और गुस्से से चिल्लाई--- "और तुम्हें इस तरह जर्बदस्ती मेरे घर में घुसने की जुर्रत कैसे हुई ?"
लीना के इस सवाल पर और उसके अन्दाज पर देवा कुछ क्षण के लिये स्तब्ध रह गया था। उसे अपने चेहरे के बदलाव का तो अहसास था, लेकिन यह उम्मीद हरगिज नहीं थी। तब्दीलियों की वजह से लीना भी उसे नहीं पहचानेगी। वो देवा था। लीना का अपना चाहने वाला... देवा...।
"तुमने मुझे पहचाना नहीं ?" देवा के मुंह से सरसराती आवाज निकली--; "ठीक है...मेरा चेहरा थोड़ा-सा बदल गया है....लेकिन... मैं देवा हूं।" अनचाहे ही उसका हाथ चेहरे पर पहुंच गया।
"देवा...!" वो हैरत और अविश्वास से चिल्ला उठी थी।
उसने पास आकर गौर से देवा का चेहरा देखा। फिर बड़बड़ाई---
“लेकिन....लेकिन....तुम देवा कैसे हो सकते हो? अखबार में मरने वाले फौजियों की लिस्ट छपी थी... उसमें तुम्हारा भी नाम था। लेकिन... तुम तो वाकई देवा हो। इसका मतलब है, तुम मरे नहीं हो। अखबार में तो लिस्ट दो महीने पहले छपी थी।"
“यानि.... तुम्हारे ख्याल में मुझे मरे हुए दो महीने गुजर चुके हैं ?" देवा के लहजे में व्यंग्य था--- "लेकिन अफसोस...मैं मरा नहीं, मैं जिन्दा.... सलामत तुम्हारे सामने खड़ा हूं।"
फिर देवा को उस आदमी का ख्याल आया, जिसने दरवाजा खोला था। देवा ने पलटकर देखा, वो आदमी दरवाजा बन्द करके उसके पीछे खड़ा हुआ था।
"यह कौन है ?" देवा ने उस आदमी की तरफ इशारा करके गुस्से में लीना से पूछा।
उसका लहजा इतना खूंखार था कि लीना खौफ से अपनी जगह सिकुड़कर रह गई थी। फिर वो बड़ी मुश्किल से बोल पाई थी---
"यह... यह... मेरा... मेरा दोस्त है...।" वो हकला रही थी।
"अच्छा... तुम्हारा दोस्त है?" देवा ने जहरीले लहजे में कहा। फिर उसने दो क्षण कहरभरी नजरों से उस आदमी को घूरा और फिर तेजी से लीना के बैडरूम में जा घुसा और कपड़ों की अलमारी खोलकर देखने लगा। अलमारी में लीना के कपड़ों के साथ-साथ छः-सात मर्दाना जोड़े भी लटके हुए थे। मर्दाना जूते भी मौजूद थे, नाईट ड्रेस भी नजर आ रही थी, टाईयां भी थीं।
देवा जब यहां से गया था तो इन अलमारियों में इसी तरह उसके कपड़े और दूसरी चीजें मौजूद थीं, मगर इस वक्त वो सबकुछ गायब था। उनकी जगह दूसरे कपड़े वगैरहा नजर आ रहे थे, जो यकीनन इसी मर्द के थे जो दूसरे कमरे में खड़ा था और जिसे लीना ने अपना दोस्त बताया था। देवा जब बैडरूम से वापस आया, तो गुस्से की वजह से उसका जिस्म कांप रहा था।
"कुतिया... मेरे घर से बाहर पैर निकालते ही तूने दूसरे मर्द को घर में घुसा लिया ?" वो गुर्राया--- "मैं इन्तजाम करके गया था कि पीटर तुम्हें हर हफ्ते पैसा भेजता रहे। मेरा ख्याल है कि उन्हीं पैसों से तुम इस चूहे के बच्चे को भी पाल रही होगी।" उसने हिकारत से उस मर्द की तरफ इशारा किया।
लीना का हाथ खौफ से अपने गले पर चला गया और वो फंसी-फंसी-सी आवाज में बोली---
"नहीं... नहीं। तुम गलत समझ रहे हो। देवा! तुम्हारे जाने के बाद मैंने उस वक्त तक किसी आदमी की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा था, जब तक कि वो रिपोर्ट अखबार में नहीं छपी थी जिसमें मरने वालों की लिस्ट भी शामिल थी। उस लिस्ट में तुम्हारा भी नाम था देवा । मैं कसम खा सकती हूं... कि...!"
"और मेरे मरने के बाद शायद तुमने एक हफ्ता भी इन्तजार नहीं किया होगा ।" देवा ने उसकी बात काटकर जहरीले स्वर में कहा--- "तुमने तो मेरा शोक मनाने का कष्ट भी नहीं उठाया होगा। तुमने तो लिस्ट में मेरा नाम देखकर किसी और जरिये से उसकी पुष्टि कर लेने की जरूरत भी नहीं महसूस की होगी।" वो कहर भरे लहजे में कहता चला गया। फिर उसने एक नफरत भरी निगाह दोबारा मर्द पर डाली--- "और इससे तुम्हारे सम्बन्ध मेरी मौत की खबर पढ़ने से भी पहले से रहे होंगे, ऐसा तो नहीं हो सकता कि मेरी मौत की खबर पढ़ते ही यह आसमान से आ टपका हो और तुमने इसे तुरन्त साथ में रख लिया हो। ऐसी सिचुएशन आने में कुछ वक्त तो लगता ही है।" फिर उसकी आवाज नीची हो गई थी। लेकिन उसमें नफरत और आक्रोश बढ़ गया था--- "अगर तुम्हारे ख्याल में मैं मर भी गया था, तब भी इस घर में शोक मनाने की कोई निशानी तो क्या, तुम्हारे चेहरे पर गम का कोई भाव तक नहीं है। मेरे आने तक तुम हमेशा की तरह बड़ी गर्मजोशी से इसके साथ रंगरलियां मना रही होंगी। तुम्हारे जेहन के किसी कोने तक में मेरी कोई कल्पना तक नहीं होगी।" फिर उसकी आवाज में कहर और आक्रोश के साथ-साथ व्यंग्य का पुट भी शामिल हो गया--- “तुम्हारी नजर में मेरी अहमियत ही क्या थी? मैं तो बस तुम्हारे लिये ऐशो-आराम से रहने का एक साधन था। एक मूर्ख...आशिक था... जो तुम्हें जी-जान से चाहता था। आशिकों की तुम्हारे पास कमी नहीं है, ज्यों ही तुमने मेरे मरने की खबर पढ़ी, लाईन में सबसे आगे खड़े आशिक को स्थाई रूप से अपने साथ रहने के लिये अन्दर बुला लिया। तुम तो वेश्याओं से भी गई-गुजरी हो लीना ।" यह कहते-कहते देवा की आंखों में खून उतर आया था। वो गुस्से में अन्धा हो रहा था। इस दौरान उसका हाथ खुद-ब-खुद जेब में चला गया था।
पलक झपकते ही देवा की गन बाहर आई और एक जोरदार धमाका हुआ।
लीना सीने पर हाथ रखकर कालीन पर ढेर हो गई। सीने पर रखे उसके हाथ के नीचे से खून उबल रहा था। जो उसकी नाईटी को भिगो रहा था। पीली नाईटी तेजी से लाल-पीली होती जा रही थी। देवा ने उस पर दो फायर और झोंक दिये। फिर वो मर्द की तरफ घूमा। वो एक सोफा-चेयर के पीछे छुपने की कोशिश कर रहा था।
देवा ने बाकायदा पोज बनाकर उसका निशाना लिया और गन में मौजूद बाकी की तीनों गोलियां उसके जिस्म में उतार दीं।
फिर खाली रिवॉल्वर उसने एक सोफे के कुशन के नीचे छुपा दिया और फ्लैट से निकल आया। उसका सफारी बैग अभी तक उसके कंधे पर झूल रहा था।
बिल्डिंग से निकलने तक देवा को कहीं कोई दिखाई नहीं दिया था। उसकी खुशकिस्मती थी कि आते वक्त भी उसे कोई नजर नहीं आया था। न ही उसे अहसास हुआ था कि कोई उसे देख रहा है। उसे इत्मीनान था कि यहां उसके आगमन की कोई गवाही नहीं दे सकता था।
वो अन्धेरे में लम्बे-लम्बे डग भरता कुछ ही सेकेण्ड में उस बिल्डिंग से दूर निकल गया था, फिर करीब आधा मील बाद उसे एक टैक्सी दिखाई दी थी और वो एक अच्छे-से होटल का पता बताकर टैक्सी में सवार हो गया था।
पहले तो उसे उम्मीद थी कि लीना और उसके नए आशिक के कत्ल के सिलसिले में 'देवा' को तलाश करने की कोशिश नहीं की जाएगी। देवा को तो अब तक लोग भूल ही चुके होंगे। यहां तक कि पुलिस ने भी उसके बारे में सोचना छोड़ दिया होगा।
लेकिन.... अगर पुलिस ने या किसी और ने उसे तलाश कर भी लिया तो कोई सोच नहीं पाएगा कि वो इस किस्म के होटल में पाया जा सकता है।
खन्ना होटल में उसने अपना नाम एच०एस० लिखवाया और अपना सम्बन्ध पंजाब से बताया। उसे एक बढ़िया-सा कमरा दे दिया गया, जिसमें बाथरूम अटैच्ड था। कमरे में पहुंचकर देवा ने सबसे पहले ड्रिंक मंगवाई थी और आरामकुर्सी पर बैठकर सिगरेट के कश लेने लगा था, साथ-साथ व्हिस्की के छोटे-छोटे घूंट ले रहा था।
लीना और उसके नए आशिक को कत्ल करने का उसे कोई अफसोस या पछतावा नहीं था। हालांकि उसने यह काम बड़े गुस्से और उत्तेजना की हालत में किया था। लेकिन अब गुस्सा उतरने और उत्तेजना खत्म हो जाने पर भी उसे पश्चात्ताप नहीं महसूस हो रहा था। उसे पहली बार इस तल्ख हकीकत का अहसास हुआ था कि लीना को कभी भी उससे मोहब्बत नहीं रही थी...शायद वो मोहब्बत करने वाली किस्म की औरत ही नहीं थी। देवा के लिये यह हकीकत बड़ी दिल दुखाने वाली और दुखदायक थी।
देवा के दिल पर गहरी चोट लगी थी, लेकिन उसके दर्द पर देवा ने जल्दी ही काबू पा लिया था। अब वो खुद का बड़ा हल्का-फुल्का महसूस कर रहा था। उसे सन्तोष भी था कि लीना हमेशा के लिये खामोश हो गई थी, क्योंकि वो इस बात की चश्मदीद गवाह थी कि देवा ने ही विनायक शेट्टी को कत्ल किया था। लीना जब तक जिन्दा रहती, देवा के इस संगीन जुर्म की गवाह रहती। उसके जुबान खोलने से वो कभी भी बुरी तरह फंस सकता था। हमेशा उसके सिर पर संगीन तलवार लटकी रहती ।
जब तक लीना उसके साथ प्यार जताती रहती, तब तक तो सब ठीक था। लेकिन गुस्से, ईर्ष्या और प्रतिन्द्विता में वो कुछ भी कर सकती थी। वो देवा की गर्दन में पड़ा हुआ ऐसा खूबसूरत हार थी जो कभी भी फांसी का फंदा साबित हो सकता था। देवा को याद आया कि लीना ने कहा था, अखबार में उसने शहीद होने वाले फौजियों की लिस्ट में उसका नाम छपा देखा था और यकीन कर लिया था कि वो मर चुका होगा।
देवा ने सोचा, कोई नई बात नहीं कि लीना उसका गुस्सा देखकर जान बचाने के लिये वो बहाना बना रही हो।
इस बात की तस्दीक बड़ी अहम साबित हो सकती थी। अगर वाकई उसका नाम मरने वालों की लिस्ट में छप गया था, तो देवा के लिये यह बड़ी खुशी की बात थी, अफसोस की नहीं। इससे उसे भविष्य की योजना बनाने में बड़ी मदद मिल सकती थी। कुछ देर सोचने के बाद देवा ने इस बात की तस्दीक के लिये पीटर के सैल्यून का फोन नम्बर मिलाया। दूसरी तरफ से एक अजनबी आवाज उसके कानों में पड़ी---
“मुझे पीटर से बात करनी है।" देवा ने अपनी आवाज बदलकर कहा।
“पीटर को तो...चार महीने पहले कत्ल कर दिया गया था।" दूसरी तरफ से जवाब दिया गया था। बोलने वाले के लहजे में दुख का भाव नहीं था।
"ओह...! बड़ा अफसोस हुआ सुनकर।" देवा ने कहा। वाकई उसे बड़ा अफसोस हुआ था। वो बोला--- “दरअसल... मैं काफी दिनों से शहर में नहीं था इसलिये मुझे यह बात मालूम न हो सकी। दरअसल मैं यह जानना चाहता था कि पीटर के लिये देवा नामी एक लड़का काम करता था। उससे कहां सम्पर्क किया जा सकता है? क्या वो अब भी वहां आता-जाता है ?"
"नहीं। उस पर तो देश-प्रेम का जबर्दस्त दौरा पड़ा था।" दूसरी तरफ से कहा गया--- “वो फौज में भर्ती हो गया था और कुछ महीने पहले कश्मीर में कहीं लड़ता हुआ मारा गया था।"
"ओह...! तुम्हें यह बात कैसे मालूम हुई?" देवा ने पूछा ।
"अखबारों में मरने वालों की जो लिस्टें छपी थीं, उनमें उसका नाम भी छपा था।” अजनबी ने जवाब दिया था, फिर पूछा था--- "वैसे तुम कौन बोल रहे हो?"
देवा ने जवाब देने के बजाय रिसीवर रख दिया। दूसरी बार अपनी मरने की सूचना सुनकर उसे बड़ा सुकून मिला था। उसे यह जानकर खुशी हुई थी कि मुम्बई में उसके जान-पहचान के क्षेत्रों में उसे मुर्दा मान लिया गया था। इसका मतलब उसकी समझ में यह आया कि पुलिस और विनायक शेट्टी गैंग के लोगों ने भी उसका पीछा छोड़ दिया होगा। बल्कि शायद वो उसे भूल भी गए होंगे। जमाना बड़ा तेज रफ्तार से दौड़ रहा था।
देवा के चेहरे में इतनी तब्दीली आ गई थी कि उसके बताए बगैर लीना भी उसे नहीं पहचान सकी थी, जो काफी दिन उसके साथ रही थी। वो सोच रहा था---इसका मतलब कि मेरी पुरानी शख्सियत खत्म हो चुकी है। अब मैं आसानी से नई शिनाख्त अपना सकता हूं। एक नए इंसान की हैसियत से नई जिन्दगी शुरू कर सकता हूं, बिल्कुल आजाद पंछी की तरह ।" देवा को यकीन था कि इससे उसकी फैमिली को भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। क्योंकि वो उसे मरा समझकर, शांत बैठ गए होंगे।
उसके मां-बाप, उसके भाई-बहन, सब उसकी तरफ से सब्र कर चुके होंगे। वो इस विडम्बना को झुठला नहीं सकता था। उसकी मौत की खबर उसके लिये नई जिन्दगी का पैगाम थी।
अगले दिन वो दिन चढ़े होटल के कमरे से निकला और बाहर चला गया।
करीबी डिपार्टमेंटल स्टोर से उसने कुछ कपड़े और न्यूज स्टैण्ड से अखबार खरीदे। होटल के कमरे में वापस आकर उसने अखबारों का जायजा लिया।
लीना और उसके प्रेमी के कत्ल की खबर मोटी सुर्खियों में छप चुकी थी। फिलहाल पुलिस की नजर में वो वारदात एक पहेली ही थी। अखबार से देवा को पता चला कि लीना के साथ उसने जिस शख्स को कत्ल किया था, वो माने था। विनोद माने, जो अण्डरवर्ल्ड में मेंढक के नाम से ज्यादा जाना जाता था। वो कमाठीपुरा के एक जुखाने का मालिक था और अवैध शराब का धन्धा भी करता था।
पुलिस ने शायद इस वारदात की बारीकी से तलाशी नहीं की थी क्योंकि उसे रिवाल्वर नहीं मिला था।
वो यह पढ़कर भी कड़वी हँसी हँसे बगैर न रह सका था कि उसका सगा भाई इंस्पैक्टर शंकर चौहान दोहरे कत्ल के उस केस की तफ्तीश और पैरवी कर रहा था। वो तरक्की पाकर इंस्पैक्टर बन चुका था और होमी साईड के जासूस के तौर पर काम कर रहा था। देवा यह सोचकर मुस्करा दिया कि कभी उसका शंकर से टकराव या सामना होगा तो कितना मजा आएगा! लेकिन अगले ही पल उसकी मुस्कराहट खत्म हो गई थी। उसके मन में आशंका जागी थी कि शायद वो टकराव मजेदार साबित न हो।
उसके बाद देवा नाश्ता करके नए कपड़े पहने होटल से निकला था और अपने पुराने इलाके में जा पहुंचा था जहां उसके मां-बाप अब भी रह रहे थे। वो सड़क की दूसरी तरफ से अपनी मां की दुकान के सामने से भी गुजरा। बड़ी शिद्दत से उसका दिल तड़पा था कि वो दुकान में चला जाए और अपनी मां से मिले। लेकिन फौरन ही उसने अपनी इस ख्वाहिश पर काबू पा लिया था। रास्ते में देवा को कई ऐसे लोग भी मिले थे, जिन्हें वो जानता-पहचानता था। लेकिन उसने जरा भी पहचान जाहिर नहीं की थी। उन्होंने भी देवा पर एक उचटती-सी निगाह डालकर अपनी राह ली थी। फिर देवा ने दिन का ज्यादातर हिस्सा विभिन्न ढाबों, बारों और सैलूनों में बैठकर गुजारा था। उसका मकसद शराब पीना नहीं बल्कि जुर्म की दुनिया की ताजा-तरीन स्थिति की जानकारी हासिल करना था।
इन जगहों पर देवा ने बहुत से लोगों से सरसरी तौर पर बातचीत की थी। इस बातचीत से उसे पता चला था कि मुजरिमों के गिरोहों की आमदनी का इस वक्त सबसे बड़ा जरिया गैरकानूनी शराब का धन्धा था। अब इस सिलसिले में गिरोहों की एक-दूसरे के इलाकों में दखलअन्दाजी और मुकाबलेबाजी बड़ी तेज हो चुकी थी। किसी भी वक्त खून-खराबे की संभावना नजर आ रही थी। शराब पर पाबन्दी लगने और टैक्सों में जर्बदस्त बढ़ोत्तरी के जमाने से भी पहले से इस धन्धे पर एक ही शख्स का एकछत्र राज्य था।
वो एक बड़े गैंग का सरगना था, हिंसा उनके लिये मामूली काम था। लेकिन एक दिन वो शख्स घुड़सवारी के दौरान घोड़े से गिरकर मर गया था।
वो शख्स ... जिसकी गर्दन पर न जाने कितने इंसानों का खून था और जिसके बारे में लोगों को यकीन था कि उसकी मौत तो बड़ी भयंकर होगी, वो पार्क में घोड़े से गिरकर मर गया था। शायद उन्हीं लोगों के खून के बोझ से उसकी गर्दन टूट गई थी, जिन्हें उसने अपने गुर्गों से कत्ल करवाया था या खुद कत्ल किया था।
उसके सभी खास-खास आदमियों ने उसकी मौत के बाद उसका कारोबार संभालने की कोशिश की थी। लेकिन गिरोह की सरदारी करने में कोई भी कामयाब नहीं हुआ था। धीरे-धीरे उनमें से हर कोई अपने कुछ वफादार साथियों को लेकर गिरोह से अलग हो गया था। इसलिये अब शहर में छः बड़े-बड़े गैंग राज कर रहे थे। इनमें से हर एक की शहर के एक खास हिस्से में हुकूमत चलती थी और दूसरा गैंग उसके उस इलाके में घुसने की कोशिश में लगा रहता था। देवा ने इस तमाम स्थिति का आंकलन और विश्लेषण करके यह नतीजा निकाला कि भविष्य में सिर्फ वही गैंग सब पर हावी रहेगा और सबसे ज्यादा दौलत कमाएगा, जिसके चीफ के पास थोड़ी-बहुत अक्ल होगी। जो अपने धन्धे को किसी बड़े कारोबार की तरह किसी बेल मैनेज कम्पनी-किसी कार पोस्ट बिजनेस की तरह चलाएगा।
फिलहाल देवा को सबसे बड़ा मामला यह नजर आया था कि उन सभी गिरोहों के सरगनाओं में से किसी के पास भी अक्ल नाम की कोई चीज नहीं । वो बस ताकत की हुक्मदराजी पर यकीन रखते थे। उन गिरोहों को चलाने वाले सिर्फ गन की भाषा समझते थे और खुद भी उसी भाषा में बात किया करते थे। उसका ख्याल था कि अण्डरवर्ल्ड में "जिसकी लाठी, उसकी भैंस" का कानून ही चल रहा है। उनके सामने अगर कोई दिमाग वाला आदमी आ जाता, तो वो उन्हें काफी पीछे धकेल सकता था, बल्कि रिंग से बाहर भी कर सकता था।
देवा ने सरसरी तौर पर कुछ और लोगों से भी शराब पिला-पिलाकर सवाल-जवाब किये थे---उसे मालूम हुआ था कि इस वक्त एक गैंग का सरगना अफजल सुल्तान कुछ अक्लमंद और सबसे तेज था । उसका 'हैडक्वार्टर' बांद्रा में था और उसका 'कारोबार' शहर के पश्चिमी इलाके में फैला हुआ था। पश्चिमी इलाके में भी वो बहुत बाहरी इलाका था और उसका अपना अलग ही प्रशासन था---अलग ही व्यवस्था थी, जिसमें पुलिस कम ही दखलअन्दाजी करना पसन्द करती थी ।
देवा दिल-ही-दिल में अफजल सुल्तान को सराहे बगैर न रह सका। उसने अपने पंजे गाड़ने के लिये बेहतरीन इलाका चुना था।
उसी रात देवा अफजल सुल्तान से मिलने जा पहुंचा।
अफजल सुल्तान का 'हैडक्वार्टर' बांद्रा के एक होटल की ऊपरी मंजिल पर था। वो होटल देवा को अपनी अपेक्षा से कहीं ज्यादा साफ-सुथरा और उच्चस्तरीय नजर आया था। उसे एक खुशगवार-सी हैरत का अहसास हुआ था।
अफजल सुल्तान तक पहुंचने में देवा को कोई खास परेशानी नहीं पेश आई थी, क्योंकि उसके पास दिन में मिले एक छोटे गैंग लीडर का हवाला था।
अफजल छोटे कद का कुछ सांवले रंग का आदमी था, जिस्म उसका काफी मजबूत और गठा हुआ था, नाक-नक्श भी कुछ खास नहीं थे। अफजल सुल्तान के होंठों में एक मोटा-सा सिगार फंसा हुआ था। वो उम्दा और नफीस सूट पहने हुए था। जुर्म और नाजायज धन्धों की दुनिया में उसका नाम कई बरसों से चमक रहा था, लेकिन जब शराब पर पाबन्दी लगी थी और टैक्सों में बेशुमार बढ़ोत्तरी हुई थी तो अफजल को अपने नाजायज शराब के धन्धे में अपनी दौलत के अम्बार और ज्यादा ऊंचे करने का सुनहरा मौका मिल गया था।
अफजल की उम्र पैंतीस के करीब थी और इतनी-सी उम्र में ही वो काफी ताकतवर और दौलतमंद गैंगस्टर बन चुका था। अफजल से मिलकर न जाने क्यों देवा को अहसास हो रहा था कि वो एक अच्छा गैंग लीडर है, उसके पास थोड़ा-बहुत दिमाग मौजूद है। वो प्लानिंग करने की योग्यता रखता है।
"मैं दो दिन पहले आर्मी से डिस्चार्ज हुआ हूं।" देवा ने वक्त जाया किये बगैर मतलब की बात शुरू करते हुए कहा--- "और मैं नाजायज धन्धों की दुनिया में कदम रखना चाहता हूँ।"
"हूं।" अफजल बोला--- “मैं क्या कर सकता हूं इसमें ?"
"मैं तुम्हारे गिरोह में शामिल होना चाहता हूं।" देवा ने बताया।
"लेकिन तुम हो कौन ?" अफजल सुल्तान इस बार वाकई किसी गैंगस्टर की तरह हल्का-सा गुर्राकर बोला था। उसकी आंखों में सन्देह की परछाईयां तैरने लगी थीं।
"सुरेन्द्र पाल ।” देवा ने अपना नाम बदलते हुए कहा--- "सुरेन्द्र पाल।" वो अपनी पुरानी पहचान छोड़ने का फैसला तो पहले ही कर चुका था।
"क्या तुम पहले किसी गिरोह के लिये काम कर चुके हो ?" अफजल ने पूछा। वो सिर से पैर तक देवा का जायजा ले रहा था। उसकी नजरें जैसे देवा के वजूद की गहराइयों में उतर जाने की कोशिश कर रही थीं।
"हां। जंग में जाने से पहले मैं पीटर के गैंग में शामिल था और उसका सबसे खास आदमी माना जाता था। लेकिन मैं अब अपना वो हवाला अपने साथ नहीं रखना चाहता। मैं चाहता हूं कि अब यह बात लोगों को मालूम न हो ।” देवा सीधी, साफ और ईमानदारी से बातें कर रहा था।
"उस हवाले को छोड़ देना ही तुम्हारी अक्लमंदी है।" अफजल सुल्तान सराहनीय अन्दाज में सिर हिलाकर बोला था--- "पीटर का गिरोह बहुत छोटा था और उन लोगों के धन्धे भी छोटे थे। जाहिर है तुम भी उन लोगों के लिये कोई छोटा-मोटा काम ही करते होगे ?"
“इतना छोटा भी नहीं ।" देवा ने जैसे उसकी गलतफहमी दूर कर दी--- "मैं तब भी, यानि जंग पर जाने से पहले अपना हिस्सा करीब पचास हजार रुपया हफ्ता ले रहा था।"
"अच्छा...!" अफजल सुल्तान की आंखें चमकने लगी थीं--- "इसका मतलब है, तुम एक होशियार और जहीन आदमी हो ?"
"हां, इसमें कोई शक नहीं।" देवा ने जरा भी विनम्रता प्रकट किये बगैर विश्वास और गर्वभरे लहजे में कहा था--- "और मैं कोई घटिया किस्म का काम भी नहीं करता था। चोरी-चकारी, राहजनी, या लड़ाई-भिड़ाई के धन्धों में मैंने कभी हिस्सा नहीं लिया था।"
"मैं समझ गया।" अफजल ने यों सिर हिलाते हुए कहा जैसे वो कल्पना में देवा की गतिविधियों को देख रहा हो--- “मेरा ख्याल है, आगे चलकर तुम मेरे लिये एक अहम आदमी साबित हो सकते हो। लेकिन...जाहिर है कि शुरुआत तो तुम्हें नीचे से ही करनी होगी। कुछ अर्सा मैं तुम्हें आजमाऊंगा भी। सबसे पहले मैं तुमसे ड्राइवर का काम लूंगा। जरूरत के वक्त तुम्हें एक ट्रक चलाना होगा। तुम्हें पांच हजार रुपये हफ्ता मिलेगा।"
देवा का दिल डूबने लगा। उसने ट्रक ड्राइवर बनकर ट्रक चलाने के बारे में सोचा तक नहीं था। वो काफी हद तक इज्जतदार किस्म के काम करने का आदी रहा था। वो असल में एक 'व्हाईट कॉलर' गैंगस्टर था और अण्डरवर्ल्ड में उसकी 'कुछ इज्जत' थी।
लेकिन फिर उसने अपने दिल को समझाया कि वक्त बदल चुका है, अब उसे नए सिरे से शुरुआत करनी थी। ज्यादा बड़े गैंग में....ज्यादा बड़े धन्धों में अपने लिये ज्यादा बड़ी जगह बनानी थी।
“ठीक है।” उसने जैसे न चाहते हुए कहा---- "मैं यह काम कर लूंगा। लेकिन, सिर्फ उतना ही अर्सा करूंगा, जब तक कि तुम्हें इस काम के लिये कोई दूसरा आदमी नहीं मिल जाता। यह काम तो कोई भी आम-सा छोटा-मोटा गुण्डा कर लेगा।"
"फौज में जाने से पहले तुम्हें हथियार इस्तेमाल करना आता था?” अफजल ने पूछा।
“हां। और मैंने कई मौकों पर इस्तेमाल किया भी था।" देवा ने बेहिचक कह दिया।
अफजल सुल्तान कुछ देर खामोशी से उसे गौर से देखता रहा था। फिर बोला---
“मुझे उम्मीद है, तुम ज्यादा दिन ट्रक नहीं चलाओगे। आजकल तुम्हारे पास कोई गन है?"
“नहीं। मेरे पास करीब चालीस हजार की पूंजी है।" देवा ने साफगोई से कहा।
"किसी और से इसका जिक्र न करना। सामने वाले बैंक में मेरा आदमी तुम्हें एक लॉकर दिलवा देगा, अपनी रकम उस लॉकर में रख देना। ज्यादा कैश अपने पास रखना या रखकर घूमना अक्लमंदी नहीं है। इससे बन्दे की सेहत और सलामती के लिये खतरे पैदा हो जाते । कल दोपहर को यहां आ जाना।"
अब देवा मुजरिमों के एक ताकतवर गैंग का कारिन्दा बन गया था। मुम्बई के इस दूसरे नम्बर के सबसे बड़े गैंग के हिस्से में हर तरह के जुर्मों की कमाई का एक तिहाई हिस्सा आता था। एक बड़े इलाके में वो लोग सक्रिय थे।
0 Comments