ए०सी०पी० जयंत तांब्रे की प्रतिक्रिया सामने आने में ज्यादा देर नहीं लगी थी।
शनिवार नाईट को उसके साथ ब्लूम्ज क्लब में वो अप्रिय घटना घटी थी, जब उसका देवा से टकराव हो गया था। इसके तीसरे पहर पुलिस की एक गाड़ी पीटर के सैलून के सामने आ रुकी थी । चार पुलिसिये गाड़ी से उतरे थे और दनदनाते हुए अन्दर आ घुसे थे। पीटर भी वहां था और देवा कई दूसरे लोगों के साथ बैठा हुआ था। पुलिसिये सीधा देवा की तरफ गए थे और उनमें से एक ने हुक्म दिया था---
“उठो, हमारे साथ चलो।"
देवा गहरी सांस लेकर उठ खड़ा हुआ। पीटर कुछ हैरत से यह सब तमाशा देख रहा था। देवा ने पीटर से कहा---
“मुझे मालूम है यह सब क्यों हो रहा है। मेरा ख्याल है कि मैं इस मुसीबत से सही-सलामत निकल आऊंगा। तुम वकीलों को दौड़ाने और जमानतनामा तैयार करवाने में ज्यादा जल्दी न करना। अगर वकील दो घंटे बाद भी जमानतनामा लेकर पहुंच जाए तो गनीमत है।"
पुलिसिये देवा को साथ लेकर डिटेक्टिव ऑफिस पहुंचे थे। फिर उसे ले जाकर ए०सी०पी० तांब्रे के कमरे में धक्का दे दिया गया और कमरे का दरवाजा बंद हो गया।
देवा की जगह अगर कोई आम-सा नौजवान होता तो उसकी वही हालत होती जो पुराने जमाने में उस मुजरिम की होती थी जिसे फराऊन के हुक्म पर भूखे शेरों के पिंजरे में फेंक दिया जाता था। लेकिन देवा ने अपने चेहरे से किसी किस्म का खौफ नहीं जाहिर होने दिया था।
तांब्रे उठा, घूमकर मेज के पीछे से निकला और देवा के सामने आ खड़ा हुआ । देवा ने उसे ठीक तरह से देखा। वो निसन्देह लम्बा-चौडा और मजबूत आदमी था। उसके कंधे चौड़े थे और मजबूत जबड़ों से उसकी सख्त मिजाजी जाहिर होती थी। उसके होंठ जिस अन्दाज से थोड़े खिंचे-खिंचे थे उससे भी उसके मिजाज की क्रूरता प्रकट होती थी। इस वक्त वो नशे में नहीं था, लेकिन इस वक्त भी उसकी आंखें सुर्ख नजर आ रही थीं। वो देवा को घूरता हुआ बोला---
"तो...तुम हो वो लफंगे, जिसने मेरे मुंह पर घूंसा जड़ दिया था?” वो गुर्राया--- “और मेरे गिरने के बाद मेरी पसलियों पर लातें भी मारी थीं।"
"यस सर !” देवा ने आराम से और अदब के साथ जवाब दिया--- "मेरी जगह कोई भी होता तो यही करता। आपके साथ जो लड़की थी, अगर कोई घटिया दर्जे के बदमाशों की तरह बार-बार उसे छेड़ता रहता...अपमान करता रहता, वो आप भी यही करते।"
“अच्छा....!” तांब्रे व्यंग्य से बोला--- “मैं नहीं समझता कि तुम जैसे लफंगे के साथ कोई ऐसी लड़की भी हो सकती है जिसका किसी बात से अपमान हो सकता हो।" कहते-कहते अचानक उसने देवा के मुंह पर उल्टे हाथ का भरपूर थप्पड़ दे मारा।
देवा लड़खड़ा गया, उसका दिमाग हिलकर रह गया था। उसके होंठों से खून रिसने लगा था। एक क्षण के लिये उसका हाथ यों उठा था जैसे वो तांब्रे पर जवाबी वार करने वाला हो। मगर उसने वक्त पर अपने आप को रोक लिया था।
“अब मुझ पर हाथ उठाने की जुर्रत न करना।" तांब्रे जहरीले सांप की तरह फुंफकारा--- "वर्ना अभी बाहर से दस-बारह आदमियों को बुलाकर इतना पिटवाऊंगा कि तुम्हारा सारा जिस्म पिलपिला हो जाएगा।"
"तुमसे यही उम्मीद की जा सकती है।" देवा बड़बड़ाया--- "तुम इसी टाईप के आदमी लगते हो।"
"क्या बकवास कर रहे हो ?” तांब्रे ने उसे घूरा। असल में वो देवा की बड़बड़ाहट सही तरह से सुन नहीं पाया था।
"कुछ नहीं ।" देवा ने टालने की कोशिश की।
“तुम्हारा धन्धा क्या है?” तांब्रे ने पूछा।
"मेरा कोई धन्धा नहीं है।" देवा ने जवाब दिया।
"मेरा ख्याल है कि तुम शहर के किसी बहुत बड़े खुशहाल परिवार के कुल दीपक हो।" वो जहरीले लहजे में बोला। फिर एकदम चिंघाड़ उठा--- "मैं कहता हूं सीधी तरह मुझे अपने धन्धे के बारे में बता दो। तुम्हें पीटर के गैंग के गर्गों के साथ देखा जाता है और वो सब-के-सब मुजरिम हैं, जरायमपेशा हैं। तुम पीटर के लिये क्या काम करते हो?"
"कुछ खास नहीं।" देवा ने जवाब दिया।
"ओह...! तुम तो कुछ ज्यादा ही स्मार्ट बनने की कोशिश कर रहे हो।" उसने देवा के मुंह पर एक और थप्पड़ रसीद किया--- "लेकिन मैं तुम्हें पुलिसवालों की इज्जत करना सिखा दूंगा। जल्दी बोलो तुम पीटर के लिये क्या काम करते हो? क्या काम है तुम्हारा, चोरी-चकारी...लूटपाट.. राहजनी...या कुछ और...?"
"मैंने जिन्दगी में कभी चोरी नहीं की...कभी लूटपाट नहीं की... कभी किसी राहगीर को नहीं लूटा। तुम लोगों के पास इस किस्म के मामलों में मेरा कोई रिकॉर्ड नहीं है।" देवा ने दूसरे थप्पड़ से संभलने के बाद बुलन्द आवाज में कहा ।
"तो फिर तुम इतने अच्छे-अच्छे कपड़े कैसे पहनते हो? मैंने सुना है कि तुम जिस कार में घूमते हो, वो भी तुम्हारी कार है।" तांब्रे बोला ।
"मेरे आमदनी के अपने जरिये हैं।" देवा बोला।
"वो तो जरूर होंगे।” तांब्रे ने जहरीले अन्दाज में सिर हिलाते हुए कहा--- "उन्हीं के बारे में तो मैं जानना चाहता हूं कि वो क्या जरिये हैं? जल्दी बोलो। वर्ना मैं अपने आदमियों को बुलाता हूं। वो तुम्हारे साथ जो करेंगे, उसे तुम जिन्दगी-भर नहीं भूलोगे।”
"अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो हरगिज ऐसा नहीं करता ।" देवा ने सीधा उसकी आंखों में झांकते हुए निडरता से कहा--- "हो सकता है कल को मैं इस शहर का ताकतवर और दौलतमंद आदमी बन जाऊं और तुम्हारे लिये कोई मोटी माहवार रकम फिक्स कर दूं।"
“तुम...तुम मेरी माहवार रकम फिक्स करोगे? और मैं तुमसे वो रकम ले लूंगा...? मैं...मैं... रिश्वतखोर हूं?"
"अगर नहीं हो, तो यह तुम्हारी बेवकूफी है। सारे पुलिसिये और डिटेक्टिव को जहां से मिल सकता है, वहां से ले लेते हैं। बहुत-सी जगहों से उनकी रकमें बंधी हुई हैं।" देवा ने कहा ।
तांब्रे का गुस्से से बुरा हाल था। उसका चेहरा सुर्ख तो पहले ही हो चुका था अब खूंखार हो गया। ऐसा लगता था जैसे गुस्से से उसका जिस्म फूल रहा हो और कुछ देर में ही उसके कपड़े फटने वाले हों। वो हांफते हुए बोला---
“मैं तुम पर और वक्त नहीं बर्बाद करना चाहता। मैंने तुम्हारा एक बेहतर इलाज़ सोच लिया है। मैं तुम्हें चौबीस घंटे की मोहलत दे रहा हूँ... चौबीस घण्टे के अन्दर अन्दर अपनी मनहूस शक्ल लेकर इस शहर से कहीं और दफा हो जाओ। चौबीस घंटे बाद मैं इस शहर में तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहता। समझ गए?"
“समझ गया। लेकिन यह जरूरी नहीं कि मैं तुम्हारा हुक्म मानूं।" देवा ने कहा और दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकल गया।
देवा वहां से वापस पीटर के पास में पहुंचा। उसका होंठ कट गया था और सूजा हुआ था। गाल की हड्डी पर झोल पड़ गया था।
पीटर परेशान बैठा था, देवा की हालत देखकर और भी परेशान हो गया। देवा ने जब उसे तांब्रे से होने वाली बातचीत के बारे में बताया तो उसकी चिंता और बढ़ गई। पीटर चिंतित लहजे में बोला---
"यह तो बहुत बुरा हुआ, तांब्रे बड़ा सख्त आदमी है। अगर वो किसी के पीछे पड़ जाए तो उसका जीना हराम कर देता है।"
"भाड़ में जाए वो।" देवा गुस्से से गुर्राया--- "मैंने उसका रौब नहीं खाया। मैं किसी हालत में भी उसका हुक्म नहीं मानूंगा।"
वो तांब्रे की दी हुई मोहलत खत्म होने के बाद भी शहर छोड़कर नहीं गया था।
पीटर का अन्दाजा भी सही था कि तांब्रे उसका जीना हराम कर सकता है। तांब्रे ने देवा को उठवाने या उसके साथ मारपीट करने की कोशिश नहीं की थी। अलबत्ता, दूसरे तरीकों से उसको परेशान करके रख दिया था।
पुलिसवाले देवा को दिन में कम-से-कम छः बार विभिन्न जगहों पर रोक लेते थे। उसकी तलाशी ली जाती थी, उससे सवाल-जवाब किये जाते थे। सड़क पर उसका तमाशा बन जाता था। वो कहीं भी निश्चिंत होकर आ-जा नहीं सकता था। कभी पुलिसवाले अचानक ही पीटर के सैलून में भी आ धमकते थे और सिर्फ देवा की तलाशी ली जाती थी, सिर्फ देवा से पूछताछ की जाती थी। गनीमत थी कि यह सिलसिला शुरू होने से पहले ही देवा ने अपने पास गन रखनी छोड़ दी थी। अगर पुलिस वाले उसके पास से कोई हथियार बरामद करने में कामयाब हो जाते, तो फिर देवा की खैर नहीं थी।
लेकिन गन के बगैर रहना भी उसके लिये कम खतरनाक नहीं था। देवा को मालूम था कि अभी विनायक शेट्टी गैंग के लोग उसके खून के प्यासे थे और उसकी ताक में रहते थे। इसलिये बगैर हथियार घूमने का मतलब किसी भी वक्त बेमौत मारे जाना था। एक हफ्ता उसके लिये सख्त काजमाईश में गुजरा था। उस दौरान वो लगातार मानसिक तनाव का शिकार रहा था। तरह-तरह के अन्देशों के साथ-साथ अपनी बेइज्जती की वजह से उस पर झुंझलाहट सी सवार रहती थी।
एक दिन तो पुलिसवाले लीना के फ्लैट में भी घुस गए थे। देवा उस वक्त वहीं मौजूद था। पुलिसवालों ने बहाना बनाया था कि वहां चोरी का माल मौजूद है और यह सूचना उन्हें विश्वस्त सूत्रों द्वारा मिली है। इसलिये वो तलाशी लेने आए हैं। फिर उन्होंने लीना के पूरे घर को उलट-पुलटकर रख दिया था। जब वो पूरे फ्लैट को कबाड़खाना बनाकर फारिग हुए थे, तो एक पुलिसवाले ने नदीदे अंदाज में बांछें फैलाते हुए लीना की तरफ इशारा करते हुए कहा---
"अच्छा...! तो यह है वो लड़की, जिसका विनायक शेट्टी से अफेयर था ?" फिर वो जवाब का इन्तजार किये बगैर लीना की तरफ देखते हुए मुस्कराकर बोला--- "तुम वाकई जबर्दस्त हो, अगर यह लड़का तुम्हारा दीवाना हो गया, तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। लेकिन यह कोई अच्छी बात नहीं कि तुम सिर्फ इसी बेवकूफ के साथ रहो। कभी-कभी हम जैसों पर भी एक नजर डाल लिया करो। आज शाम के बारे में क्या ख्याल है ?"
देवा का खून खौल रहा था और उसकी कनपटियों में जैसे कोई चीज ठोकरें मारने लगी थी, उसका जी चाह रहा था कि सब पर टूट पड़े, चाहे उसका अपना कुछ भी हो। मगर उसने खुद पर काबू रखते हुए बड़ी मुश्किल से कहा---
“देखो....तुम लोग...!”
उसे अपनी बात पूरी करने का मौका नहीं मिल सका, क्योंकि लीना बीच में बोल उठी थी। वो नफरत भरी निगाहों से उन लोगों की तरफ देखकर बोली थी---
“मैं कभी भी किसी पुलिसवाले के साथ शाम गुजारने की अपेक्षा खुदकुशी कर लेना पसन्द करूँगी" उसने मुंह फेर लिया।
"अब इतना झूठ भी न बोलो।" वही पुलिसिया दांत निपोरता हुआ बोला--- “पता नहीं अब तक तुम्हारी कितनी शामें पुलिस वालों के साथ गुजरी होंगी ?"
"और....अगर इस लफंगे के साथ तुम्हारे सम्बन्ध जारी रहे।" दूसरा बोला--- “तो अभी न जाने तुम्हें कितनी शामें पुलिसवालों के साथ गुजारनी पड़ें। हमारी तरफ इतनी नफरत और हिमाकत से मत देखो। मालूम नहीं कब तुम्हें हमारी मदद की जरूरत पड़ जाए। फिर तुम हमारे सामने हाथ जोड़ोगी कि हम तुम्हारे साथ अच्छा सलूक करें।"
देवा और लीना, अपनी-अपनी जगह दोनों ही खून के घूंट पी रहे थे। फिर भी उन्होंने जुबान बंद ही रखी थी और यह उनके हक में अच्छा ही हुआ था। पुलिसवालों ने उनकी जान छोड़ दी थी और वहां से रुखसत हो गये थे।
शुक्रवार को पीटर ने देवा को अपने ऑफिस में बुलाया था।
वो छोटा-सा एक कमरा था जहां हर तरफ बेतरतीबी नजर आती थी । देवा जब वहां पहुंचा था तो पीटर कोट उतारकर बैठा हुआ था। उसका कोट और सोने की चेन वाली घड़ी एक कुर्सी की बैक पर लटके हुए थे। पीटर के चेहरे पर पसीने की बूँदें नजर आ रही थीं और होंठों में कीमती हवाना सिगार दबा हुआ था। उसे सुलगाया नहीं गया था।
“बैठो देवा ।" उसने हाथ लहराया।
देवा बैठ गया। उसके मन में विभिन्न आशंकाएं उठने लगी थीं क्योंकि काम की बातें आमतौर पर पीटर बार के काउंटर पर ही कर लिया करता था। कामों की रिपोर्ट भी वहीं ले लिया करता था। माल भी वहीं वसूल कर लेता था। पीटर यह काम उस वक्त किया करता था, जब बार में ग्राहक नहीं हुआ करते थे। वैसे इक्का-दुक्का ग्राहक होते भी थे, तो वो परवाह नहीं किया करता था। ऑफिस में पीटर अपने किसी कारिन्दे को उसी वक्त तलब किया करता था जब कोई बहुत ही खास बात होती थी।
“मेरा पिछला हफ्ता बड़ी परेशानी में गुजरा है, देवा!" पीटर ने बात शुरू की--- “पुलिस के डिटेक्टिव असल में सिर्फ तुम्हारे पीछे पड़े हुए हैं। लेकिन उन्होंने हमारे पूरे गैंग को परेशान करना शुरू कर दिया है। तांब्रे वाला मामला इतना संगीन है कि अब वो तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। जब तक तांब्रे को बदला लेने का मौका नहीं मिल जाता तब तक वो तुम्हारे पीछे लगा रहेगा। अगर तुम्हारे पास काफी रकम हो और तुम वो तांब्रे को भेंट कर सकते हो तो शायद उसका गुस्सा ठंडा पड़ जाए। लेकिन तुम फिलहाल ऐसा करने की पोजीशन में भी नहीं हो।"
उसने खामोश होकर देवा की तरफ देखा ।
देवा ने कोई जवाब नहीं दिया। वो कुछ बोलने से पहले पीटर की पूरी बात सुनना चाहता था। पीटर ने गहरी सांस लेकर उदास-से लहजे में बात आगे बढ़ाई---
"सिर्फ तुम्हारी वजह से पूरे गैंग को मुसीबत झेलनी पड़ रही है। तांब्रे हैडक्वार्टर में भी हमारे खिलाफ गवाह बना रहा है। आए दिन वो हमारे किसी-न-किसी आदमी को उठवा लेता है। हमारे धन्धों को खराब करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है। अगर हमने बहुत-से पुलिसवालों का हफ्ता नहीं बांध रखा होता तो हमारा कारोबार ही ठप्प हो जाता। हर रोज पुलिसवाले किसी-न-किसी बहाने यहां आ धमकते हैं। वो आते तो तुम्हारे चक्कर में हैं, लेकिन अगर वो इसी तरह आते रहे तो मुमकिन है कि हमारे धन्धों के बारे में कोई बड़ा सबूत उनके हाथ लग ही जाए। उसके बाद तांब्रे, पूरे गैंग को उथल-पुथल करने में कामयाब हो जाएगा। हम सब सिर्फ तुम्हारी वजह से मुसीबत में फंसे पड़े हैं। सिर्फ एक आदमी की वजह से मैं अपने पूरे गैंग को और अपने सारे धन्धों को खतरे में नहीं डाल सकता। इसलिये मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि जब तक मामला ठण्डा न पड़ जाए, तुम यहां आना छोड़ दो।"
“यानि तुम मुझे गैंग से निकाल रहे हो?" देवा ने उसकी आंखों में आंखें डालकर सर्द लहजे में पूछा था ।
"नहीं। ऐसी कोई बात नहीं है।" पीटर जल्दी से बोला था--- "मैं तुम्हें पसन्द करता हूं और चाहता हूं कि हमारे साथ हमेशा तुम्हारा सम्बन्ध बना रहे। जब तक हालात हमारे हक में नहीं जाएं तब तक सावधान रहना भी जरूरी है। इसलिये मैं चाहता हूं कि तब तुम दिखाने के लिये ही सही गैंग से और इस जगह से अलग हो जाओ। इसी में हम सबकी भलाई है।"
"हां, ठीक कहते हो, तुम।" देवा कड़वे लहजे में बोला--- "लेकिन मैंने जो प्लानिंग की थी और जिनकी वजह से बढ़िया और निरंतर आमदनी हो रही है। उनका क्या बनेगा ?"
"उसमें से तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मिलता रहेगा।" पीटर फौरन बोल पड़ा था--- "हर शनिवार की रात को जहां तुम कहो, तुम्हारा हिस्सा पहुंचा दिया जाएगा। तुम्हें इस सिलसिले में जरा भी जिक्र करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे साथ मैं हमेशा ईमानदारी से चलना चाहता हूँ। मैं चाहता हूं, तुम्हारा हक तुम्हें मिलता रहे। इससे मुझे इन्कार नहीं है। न ही मैं कभी इस मामले के प्रति हेरा-फेरी का ख्याल भी दिल में लाऊंगा। मैं बस पूरे गैंग को बचाने के लिये यह कदम उठा रहा हूँ, देवा ।"
"ठीक है। मैं भी पूरे गैंग के लिये मुसीबत नहीं बनना चाहता हूं।" देवा ने सपाट लहजे में कहा और पीटर से हाथ मिलाकर बाहर आ गया।
वो नीचे बार में आ बैठा। इस वक्त उसका दिल बुरी तरह दुखा हुआ था। लेकिन उसका सपाट चेहरा देखकर किसी को भी उसकी अन्दरूनी हालत का अन्दाजा नहीं हो सकता था। वो दिल ही दिल में खुद को समझा रहा था कि शरीफ कारोबार हो या गिरोहों के प्रबन्ध, सभी जगहों पर उसूल एक ही चलता था। जब बाजी हार जाने का खतरा महसूस होता था तो सबसे कमजोर मोहरे को पिटवा दिया जाता था। आड़े वक्त में उसके गैंग ने उसका साथ देने के बजाय उससे पल्ला झाड़ दिया था। उसने एक पैग लिया और उसे अपने जेहन से झटकने की कोशिश की। उसने अपने दिल को समझाया कि इसमें उदास होने की कोई जरूरत नहीं है। दुनिया इसी का नाम है--कभी धूप कभी छांव।
वो अपने ख्यालों से तब चौंका था जब काउंटर पर उसकी बगल में बैठे शख्स ने उसे हल्के-से कोहनी मारी थी, बहुत आहिस्ता से । यह भी गैंग का ही एक आदमी था और उसके बराबर ही स्टूल पर बैठा हुआ था, वो प्रत्यक्षतः देवा से असम्बन्धित-सा ही और होंठों को ज्यादा खोले बगैर ही सरगोशी में बोला था---
“शेट्टी गैंग के लोगों ने आज तुम सब पर निर्णायक हमला करने की योजना बनाई है। मुझे खबर मिली है कि आज रात वो हर हाल में तुम्हें ठिकाने लगा देना चाहते हैं। मैंने सोचा, तुम अपने आदमी हो, मैं तुम्हें खबरदार कर दूं।"
देवा ने खतरे की सूचना देने वाले की तरफ गौर से नहीं देखा था। सावधानी का तकाजा यहां था उसने भी होंठ हिलाये बगैर कहा---
"वो लोग पहले भी मुझे कत्ल करने की कोशिश कर चुके थे। मगर फिर भी मैं जिन्दा और सलामत यहां मौजूद हूँ।"
“मुझे मालूम है कि वो पहले भी कोशिश कर चुके हैं।" सूचना देने वाले ने कहा--- “लेकिन इस बार वो पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं। उनका कहना है कि इस बार उनकी नाकामी की कोई वजह नहीं होनी चाहिए थी। वो कामयाब रहेंगे।"
"खतरे से होशियार करने के लिये थैंक्यू!” देवा ने पूर्ववत् दबी आबाज में कहा--- “मेरा ख्याल है कि मुझे फौरन अपने पास गन रखने का इन्तजाम करना होगा। पुलिस से सामना होने का खतरा है तो हुआ करे, मुझे यह खतरा मोल लेना ही पड़ेगा।"
उस शख्स ने हल्के से सहमति में गर्दन हिला दी थी। देवा आगे बोला---
"मैं कोशिश करूंगा कि उनके हत्थे चढ़ने से पहले ही गन इधर-उधर कहीं फेंक दूं।" उसने हल्की-फुल्की गपशप करने के स्टाईल में कहा---जैसे कि आमतौर पर बार में दो अजनबी शुरू कर दिया करते हैं।
“मेरे पास गन भी नहीं है। मैं गन लेने अपने फ्लैट पर जा रहा हूं।" वो बार से बाहर निकल आया। फुथपाथ पर आकर उसने इशारे से अपने बॉडीगार्ड जगमोहन को बुलाया।
जगमोहन सड़क की दूसरी तरफ एक खम्भे के नीचे छुपा ड्यूटी दे रहा था। वो टहलता हुआ आया और देवा के सामने आकर यूं रुककर मुस्कराने लगा, जैसे दो जान-पहचान वाले सड़क पर इत्तेफाक से मिल गए हों। देवा भी उसकी तरफ देखकर मुस्कराया और हाथ मिलाते हुए बोला---
“मुझे खबर मिली है कि शेट्टी गैंग के आदमी आज मेरे ऊपर हमला करने वाले हैं, मेरे पास कार भी नहीं है। मैं कार लेने फ्लैट पर जा रहा हूं। अब जरा और भी ज्यादा होशियारी से मुझ पर निगाह रखना और अपने इर्द-गिर्द वालों पर भी होशियारी से खबरदार रहना।"
देवा ने इधर-उधर देखा और जगमोहन को विदा कर फुटपाथ पर आगे बढ़ गया। देखने में वो बड़ा लापरवाह दिखाई दे रहा था। लेकिन हकीकत में उसकी नजर चारों तरफ थी। जगमोहन मुनासिब फासला रखकर उसके पीछे चला आ रहा था। उसका हाथ अपने कोट की जेब में था । देवा घर पहुंचा था तो उसे लीना का मूड भी खराब नजर आया था। पुलिस लीना की मीटिंग कर रही थी। वो कई बहानों से फ्लैट पर आ धमकते थे और उससे उल्टे-सीधे सवाल करते थे। छुपे तौर पर धमकियां देते थे। और यह सब कुछ देवा की वजह से हो रहा था। लीना तनावग्रस्त रहने लगी थी और वो चिड़चिड़ी हो गयी थी। उन्होंने रात को खाना भी तनावभरे माहौल में ही खाया था। उसके बाद देवा का दिल वहां टिकने को नहीं चाहा था। दरअसल उसका दिल कहीं भी नहीं लग रहा था, वो अन्दर ही अन्दर बेचैन और आतंकित था । आखिर वो अकेला ही फिल्म देखने निकल पड़ा। उसने सोचा था कि शायद फिल्म देखने से ही उसका दिल बहल जाएगा और तनाव कुछ कम हो जाएगा। सिनेमाहॉल के अन्धेरे में बैठकर उसने अपने आपको कुछ सुरक्षित महसूस किया।
फिल्म खत्म हुई तो सिनेमाहॉल से निकल रहे दर्शकों का जायजा लिया कि कहीं उनमें कोई तांब्रे, विनायक शेट्टी का कोई कारिन्दा तो नहीं है। वो दोनों ही उसके दुश्मन थे। यह भी एक विडम्बना ही थी कि कानून तोड़क और कानून-रक्षक, वो दोनों की ही आंखों में खटकने लगा था।
भीड़ में उसे ऐसा कोई भी आदमी नहीं दिखाई दिया था जिस पर देवा को दुश्मन होने का सन्देह हो सकता। वो तेज-तेज कदमों से पैदल ही अपने घर की तरफ चल पड़ा। उसकी कार अभी तक गैरेज में थी। शनिवार रात उस पर जो फायरिंग हुई थी, उसमें कार को ही ज्यादा नुकसान पहुंचा था। देवा ने उसे रिपेयरिंग के लिये दे रखा था।
कारोबारी इलाके से निकलने के बाद देवा ने छोटी-छोटी नीम अन्धेरी गलियों से गुजरना शुरू कर दिया। एक गली में अचानक ही उसे अहसास हुआ था कि उसके पीछे से किसी और के कदमों की आवाज भी उभर रही थी।
उसने जरा-सी गर्दन घुमाकर पीछे देखने की कोशिश की।
तीन आदमी उससे जरा पीछे, गली की दूसरी तरफ चले आ रहे थे। देखने में वो उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं दे रहे थे, मगर देवा की छठी इन्द्री ने उसे खतरे का अहसास दिला दिया था। उसका हाथ फौरन ही जेब में रेंग गया था। जेब से उसका हाथ जब गन के ठंडे लोहे पर पड़ा तो उसे बड़ी तसल्ली मिली थी।
उसने पुष्टि कर लेनी चाही कि वो तीन तिलंगे उसके पीछे ही आ रहे थे या नहीं?
अचानक ही वो एक और गली में मुड़ गया और तेज-तेज चलने लगा।
तीनों तिलंगे भी उसी गली में आ गए थे और उन्होंने भी चलने की स्पीड बढ़ा दी थी। अब देवा को यकीन हो गया था कि वो लोग उसी का पीछा कर रहे हैं। उनका मकसद उसे खत्म कर देना है। शायद उन्हें इन्तजार था कि वो पहले से निश्चित किसी जगह पर पहुंच जाएं या फिर वो वैसे ही किसी मुनासिब मौके के इन्तजार में थे।
देवा अच्छी तरह समझ चुका था कि अब उनके साथ भिड़ने के सिवा कोई चारा नहीं है। अगर वो भागने की कोशिश करता तो शायद वो सब बेकार ही रहना था।
इस वक्त देवा को एक नई और अनोखी किस्म की दहशत महसूस हो रही थी, जो इससे पहले कभी नहीं महसूस हुई थी।
किसी तंग और अन्धेरी गली में अपने सम्भावित कातिलों के आगे-आगे चलना भी कुछ ऐसा ही था जैसे किसी को कानूनी तौर पर मौत की सज़ा सुनाई गई हो और जब वो शख्स फांसी के तख्ते की तरफ या बिजली की कुर्सी की तरफ जा रहा हो।
देवा के पीछे आने वाले धीरे-धीरे उसका पीछा करते बिल्कुल उसके पीछे पहुंच गए थे। देवा को अण्डरवर्ल्ड की जिन्दगी में एक अहम तजुर्बा हासिल हुआ था कि अचानक और अपेक्षित हमले की बड़ी अहमियत होती है। कई बार इससे बड़ा अनपेक्षित फायदा हो जाता है। उसने दहशत में हो जाने के बजाय यही दांव खेलने का फैसला कर लिया था। देवा बिजली की सी तेजी से एक इमारत की दीवार की ओट में आया और धुआंधार फायरिंग शुरू कर दी।
तीनों आदमियों ने फौरन जवाबी फायर किये थे। गोलियां देवा के आसपास दीवारों से टकराई थीं, प्लास्टर उधेड़ कर गिर गई थीं।
उसी क्षण जगमोहन ने भी गोलियां चलानी शुरू कर दी थीं।
अब देवा के दुश्मनों को अन्दाजा हुआ कि वो गली के बीचों-बीच दोनों तरफ से घिर गए हैं और उन्हें किसी किस्म की पनाह भी उपलब्ध नहीं है।
फायरिंग शुरू होने से पहले बेशक देवा आतंकित था, लेकिन गन हाथ में आते ही जैसे वो एकदम शांत हो गया था। शायद उसे यकीन हो गया था कि अब वो मुसीबत एकदम सिर पर आन पहुंची है और अब हर सूरत में उसका सामना करना ही है। इसलिये वो सुकून से निशाना लेकर फायरिंग कर रहा था, जबकि उसके तीनों दुश्मन दोनों तरफ से फायरिंग होती पाकर इतने बदहवास हो गए थे कि उन्हें कोई आड़ लेने का मौका भी नहीं मिल सका था।
फिर देवा ने उन तीनों में एक को चीखकर ढेर होते देखा था, वो उठ ही नहीं सका था। दूसरे भी गिरे थे, मगर वो उठ खड़े हुए थे और एक-दूसरे का सहारा लेकर एक तरफ को लँगड़ाते हुए भागने लगे थे। उन्हें भी यकीनन गोलियां लगी थीं। लेकिन फिलहाल वो जानलेवा साबित नहीं हुई थीं, जबकि देवा को कत्ल करने के इरादे धरे के धरे रह गए थे और उन्हें अपनी जान के लाले पड़ गए थे। कुछ ही पल में वो गायब हो गए थे
उसी समय फिर कहीं दूर पुलिस की एक कार ने तेज आवाज में सायरन बजा दिया था। देवा अपने निश्चल पड़े दुश्मन के पास से पैदल चलता हुआ जगमोहन की तरफ आया। उसे उस गिरे पड़े शख्स के पास रुके बगैर ही पता चल गया था कि वो मर चुका है।
"बहुत खूब। तुमने आज बहुत बढ़िया काम किया है।" देवा जगमोहन का कन्धा थपथपाकर बोला---फिर उसका हाथ पकड़कर एक अन्धेरी गली की तरफ भागते हुए उसने कहा--- "आओ, इधर से निकलो।"
अन्धेरी गली में पहुंचकर उसने जगमोहन से कहा---
"अपनी गन फेंक दो।"
देवा ने अपनी गन भी फेंक दी। जगमोहन ने भी अपनी गन उसी मकान के पास एक गली में फेंक दी थी, जिसमें देवा ने अपनी गन फेंकी थी।
"अब अगर हम पकड़े भी गए तो कम-से-कम हमारे पास से कोई हथियार बरामद नहीं होगा।" देवा ने गहरी सांस लेकर कहा था। वो दोनों दौड़ रहे थे।
"यहां से हमारे रास्ते अलग हो रहे हैं। जितनी दूर हो सके, निकलने की कोशिश करना। अगर कोई नजर आए, तो किसी आम राहगीर की तरह आराम से चलने लगना। अगर तुम पकड़े भी जाओ, तो यह हरगिज न कहना कि आज शाम हम मिले थे।
उसने 'हां' में सिर हिलाया और दोनों अलग-अलग दिशाओं में रवाना हो गए।
जिस्म के साथ-साथ देवा का जेहन भी तेजी से चल रहा था। उसे मालूम था कि जल्दी ही पुलिस को वो लाश मिल जाएगी और उसे फौरन ही यह भी पता चल जाएगा कि वो विनायक शेट्टी का आदमी था, उसके बाद उन्हें यह अन्दाजा लगाना मुश्किल नहीं होगा कि उसे किसने मौत के घाट उतारा होगा। उसे यकीन हो गया कि पुलिस जल्दी ही उसकी तलाश शुरू कर देगी। अब पुलिस और शेट्टी के आदमी पहले से भी तेजी से उसके खून के प्यासे हो जाएंगे। अब इस शहर में रहना लगभग उसके लिये नामुमकिन हो गया था। उसके लिये कम-से-कम कुछ महीनों के लिये यहां से दूर हो जाना जरूरी हो गया था। लेकिन वो कुछ महीनों के लिये कहां गायब हो सकता था और उस दौरान कैसे गुजर-बसर कर सकता था। वो इन्हीं ख्यालों में गुम चला जा रहा था।
अचानक उसे पिक्चर में ब्रेक के साथ कई बार दिखाया गया, फौज में भर्ती होने की अपील वाला विज्ञापन याद आ गया, उसके दिमाग में धमाका-सा हुआ। उसने उस विज्ञापन पर उस वक्त कोई ध्यान नहीं दिया था। लेकिन अब उसने इस बारे में सोचा तो उसे फौज में भर्ती होने के कई फायदे नजर आए। कोई उसे तलाश करने के लिये फौज में नहीं जा सकता था। किसी के दिमाग में नहीं आ सकता था कि वो फौज में भी भर्ती हो सकता है। फौज में भर्ती होकर न सिर्फ वो लोगों से छुपा रह सकता था बल्कि गुजारे की फिक्र से भी मुक्त हो सकता था। उसे नई-नई जगहें देखने का मौका मिल जाता। नए-नए लोगों से मुलाकातें होती रहतीं उसकी। न जाने कौन-कौन से हथियार इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग भी उसे मुफ्त में मिल जाती। यह भी उसकी पसन्द का मैदान था। उसे यह भी उम्मीद थी कि वो ज्यादा लम्बे अर्से तक फौज में नहीं फंसा रहेगा। उसे इस बात की प्रबल संभावना दिखाई देती थी कि जंग का फैसला जल्द ही हो जाएगा क्योंकि पाकिस्तानी फौजों का रिकॉर्ड ही ऐसा था कि वो ज्यादा दिनों तक न पैंसठ की जंग में भारतीयों फौजों के सामने टिक पाई थी, 71 के युद्ध में आखिरकार उन्हें बेईज्जत होकर पराजय स्वीकार करनी पड़ी थी।
देवा की नजर में यह तजुर्बा कुछ ऐसा ही था जैसे वो कुछ हफ्तों के लिये छुट्टियां बिताने कहीं चला जाए। मैदान-ए-जंग की भयंकरता की अभी उसे कोई कल्पना नहीं थी।
देवा के ख्याल में उसके अपने गली-कूचे उसके लिये ज्यादा भयंकर और खतरनाक जंग के मैदान थे। जहां बात लगाकर और छुपकर दुश्मन को मारा जाता था । मैदान-ए-जंग इस लिहाज से बेहतर था कि वहां आमने-सामने की लड़ाई होती थी। लड़ने वाले को यह मालूम होता था कि उसका दुश्मन कौन था और कहां था? इन तमाम पहलुओं पर गौर करने के बाद देवा ने फौज में भर्ती होने का फैसला कर लिया था। देवा को पूरी उम्मीद थी कि जितना अर्सा वो फौज में गुजारेगा, उतने अर्से में यहां उसकी तलाश का मामला ठण्डा पड़ जाएगा।
फिलहाल वो लीना के घर, पीटर के अड्डे पर या अपने घर, कहीं भी नहीं जा सकता था। उसे मालूम था कि उसकी तलाश में पुलिस इन तमाम जगहों को खंगाल डालेगी। उसने पीटर को फोन किया और नीची आवाज में बोला---
"देवा बोल रहा हूं। थोड़ी देर पहले मेरी शेट्टी गैंग के तीन आदमियों से भिड़न्त हो गई थी। उनमें से एक मारा गया है। दो जख्मी हो गए हैं। मेरा ख्याल है कि पुलिस जल्दी हो मेरी तलाश सरगर्मी से शुरू कर देगी। मैंने कुछ अर्से के लिये यह शहर छोड़ देने का फैसला किया है। लेकिन जाने से पहले मैं तुमसे और लीना से मिलना चाहता हूं।"
दूसरी तरफ खामोशी रही।
देवा ने भी ठहरकर सावधानी से इधर-उधर देखा और फिर धीमें स्वर में बोला--
"मगर न तो मैं लीना के घर जा सकता हूं और न ही तुम्हारे ठिकाने पर आना चाहता हूं। इसी में हम सबकी भलाई है।"
“मुझसे क्या चाहते तुम?" पीटर ने कहा।
"मुझे लीना से मिलना है।"
पीटर ने सिर्फ एक क्षण सोचा। फिर बोला---"मेरा ख्याल है कि मेरी जानने वाली औरतों में से किसी के घर मुलाकात कर ली जाए तो बेहतर रहेगा।" उसने देवा को एक औरत का नाम और एड्रेस बताकर कहा--- "यह जगह सुरक्षित है। मैं अभी वहां के लिये रवाना हो जाता हूँ, तुम भी वहां पहुंचो।"
उसके बाद देवा ने लीना को फोन करके वो एड्रेस समझाया और उसको वहां पहुंचने के लिये कहा। फोन बन्द करके उसने एक टैक्सी रोकी और उस एड्रेस पर जा पहुंचा।
उस औरत का अपार्टमेंट तलाश करने में उसे कठिनाई नहीं हुई थी। जो शहर में एक पॉश इलाके में इमारत थी, जिसके अपार्टमेंट बड़े-बड़े थे।
पीटर की जानने वाली औरत का नाम सपना था और उसका अपार्टमेंट तीसरी मंजिल पर था। सपना ने सावधानी से दरवाजे की झिरी से देवा का जायजा लेने के बाद ही देवा के लिये दरवाजा खोला था। वो एक भारी-भरकम-सी औरत थी, जिसने बाल गोल्डन कलर में डाई किये हुए थे। अपार्टमेंट खूब अच्छी तरह शालीन ढंग से सजा हुआ था। पीटर वहां मौजूद था।
सपना ने ड्रिंक्स से उनका सत्कार शुरू कर दिया। देवा ने पीटर को अपनी योजना के बारे में बताया। पीटर ने कुछ क्षण सोचा, फिर समर्थन में सिर हिलाकर बोला---
"मेरा ख्याल है, यह एक उम्दा तरीका है ।"
उसके समर्थन से देवा को हौसला मिला और वो अपने फैसले पर अटल हो गया। पीटर बहरहाल उसके मुकाबले में बहुत ज्यादा तजुर्बेकार था ।
कुछ देर बाद लीना भी आ पहुंची थी। वो इस तरह अजनबी जगह बुलाने पर कुछ खौफजदा और परेशान-सी नजर आ रही थी।
पीटर और सपना उठकर दूसरे कमरे में चले गए थे ताकि देवा और लीना एकांत में खुलकर बात कर सकें। देवा ने लीना को भी अपने फैसले से अवगत करा दिया। पीटर के विपरीत लीना ने उसकी योजना का जरा भी समर्थन नहीं किया था। वो देवा के सीने से लगकर रोते हुए बोली---
"जंग के मोर्च पर जाना कोई मामूली बात नहीं है। मैं अपशगुन नहीं करना चाहती। लेकिन मुझे डर है कि लड़ाई में तुम मारे जाओगे।"
"मारा तो मैं यहां भी जाऊंगा, डार्लिंग!" देवा बोला--- "और अगर पकड़ा गया तो जाने कितने सालों के लिये मुझे जेल में ठूंस दिया जाएगा, वो सज़ा मौत से भी बदतर होगी।"
"लेकिन देवा...! मैं तुम्हारे बगैर कैसे रहूंगी ?" लीना सिसकते हुए बोली--- "मेरी अकेले में गुजर-बसर कैसे होगी?”
"मैंने पीटर से बात कर ली है। वो हर हफ्ते तुम्हें पैसे भिजवाता रहेगा। तुम्हारी गुजर-बसर होती रहेगी। तुम्हें इस बारे में बिल्कुल परेशान होने की जरूरत नहीं है।" देवा उसे थपकते हुए बोला--- “बेक्रिक रहो। मैं कुछ महीने बाद ही फौज़ से जिन्दा सलामत वापस आ कुछ जाऊंगा।” फिर वो लीना की आंसुओं से भीगी आंखों में झांकता हुआ निहायत ही ठहरे हुए लहजे में शब्दों पर जोर देकर बोला--- “और मैं चाहता हूं कि जब मैं वापस आऊं तो तुम्हें अपने इन्तजार में पाऊँ ।”
“जरूर... जरूर।” उसने भावावेश में देवा को बांहों में भींच लिया--- “तुम मुझे इन्तजार में पाओगे। मैं... मैं तो जिन्दगी-भर तुम्हारा इन्तजार कर लूंगी। तुम्हें शायद अब भी अन्दाजा न हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूं। तुम्हें वापस आना होगा...मेरे लिये...आना ही होगा। आओगे न...?” लीना ने आंसू भरी निगाहों से देवा की तरफ देखा।
आंसुओं की नमी उसके होंठों पर भी थी और होंठ धीरे-धीरे लरज रहे थे।
“हां। मैं वापस आऊंगा...जरूर आऊंगा।” देवा ने कहा। फिर अपने प्यार के साथ उससे विदा लेकर कमरे से निकल गया।
लीना की सिसकियां तब तक भी नहीं थमी थीं।
देवा अपने ऊपर भावनाओं को कभी हावी नहीं होने देता था, लेकिन इस वक्त भावावेश में उसका दिल भी हौले-हौले थरथरा रहा था। जब वो उस अपार्टमेंट से निकला तब भी उसके कानों में लीना की सिसकियां गूंज रही थीं। वो उनकी तरफ से ध्यान हटाने की भरपूर कोशिश कर रहा था। पीटर ने अपनी कार में उसे दादर रेलवे स्टेशन तक पहुंचा दिया। देवा ने यह सफर भी पिछली सीट के फर्श पर लेटकर किया था। दादर से रात के एक बजे एक ट्रेन दिल्ली के लिये रवाना होती थी। देवा वो ट्रेन पकड़ने में कामयाब हो गया। अपने कागजात वगैरहा उसने लीना से फोन पर कहकर मंगवा लिये थे। अब वो कहीं भी जाने के लिये पूरी तरह तैयार था।
दस दिन बाद देवा फौज में भर्ती हो चुका था। तगड़े जिस्म और निशानेबाजी की प्रेक्टिस की वजह से उसे चुन लिया गया था। मूलतः भारतीय होने के अलावा भी उसके सारे कानूनी कागजात कम्पलीट थे ही इसलिये उससे ज्यादा पूछताछ भी नहीं की गई थी।
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