हर रात न जाने वो कितने मर्दों की निगाहों का केन्द्र बनती थी। न जाने कितने हाथ उसे पा लेने की चाह में उठते थे और न जाने कितने दिलों की धड़कनें उसके सामीप्य की कल्पना से ही अस्त-व्यस्त हो जाती थीं।
महज अट्ठारह साल की उम्र में देवा (देवराज चौहान) ने अपनी जिन्दगी में पहला संगीन जुर्म उसी के लिये कर डाला था।
कहा जाता है कि जर, जोरू और जमीन ही दुनिया के हर झगड़े की जड़ होते हैं। ज्यादातर जुर्मों की बुनियाद भी यही तीनों चीजें हैं। वो क्लब के थियेटर में काम करती थी, स्टेज पर डांस करती थी, हर रोज सैकड़ों लोग उसके उफनते यौवन और सौन्दर्य के जज्बों से लुत्फ उठाते थे। बहुत से मर्द उस पर आवाजें कसते थे, फिकरे उछालते थे, उसकी कई हरकतों और गतिविधियों पर हॉल में तालियां भी गूंजती थीं और सीटियां भी बजती थीं।
मगर देवा ने कभी इन सब बातों के बारे में सोचा तक नहीं था। वो तो कुछ इस तरह महसूस करता था जैसे वो औरत सिर्फ उसके लिये ही बनी हो और हकीकत में दो लोगों की भीड़ में हर रोज सिर्फ उसी की तलाश करने के लिये आया करती हो। उसकी बेचैन नजरें जब लोगों की भीड़ में भटक रही होती हैं, तो दरअसल वो भीड़ में अपने महबूब यानि देवा को ही ढूंढ रही होती है।
उस कलाकारा का नाम लीना था।
इसमें कोई शक नहीं था कि लीना अपने बदन की हर हलचल के साथ कयामत ढाती थी, उसके बदन के उतार-चढ़ाव गजब के थे। उसमें चुम्बकीय आकर्षण था और वो चलती थी तो समझो पीछे से देखने वालों के दिल उछल-उछल जाते थे। स्टेज पर उसके चेहरे पर गहरा मेकअप चढ़ा होता था और अपनी हरकतों तथा आंखों की चमक से वो एक पकी-पकाई तजुर्बेकार औरत दिखाई देती थी। वैसे वो देवा से उम्र में बड़ी थी, लेकिन उसका यह पक्कापन देवा को और ज्यादा अपनी तरफ खींचता था, वो महसूस करता था कि उसे न जाने कब से ऐसी ही औरत की तलाश थी। अपनी हमउम्र जवान और किशोरी लड़कियों में देवा को कोई आकर्षण ही नहीं महसूस होता था।
यह नागपाड़ा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत इलाका था, दुनिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी भी इसी क्षेत्र में पड़ता था। यहां हर तरह का मर्द और हर किस्म की औरत मिल जाया करते थे। अण्डरवर्ल्ड की शाखाएं भी इस इलाके में जमीन के नीचे दूर-दूर तक फैली हुई थीं। गुण्डों, बदमाशों की यहां भरमार थी और जुर्म की मार्किट बहुत चल रही थी। यहां जिन्दगी भी बहुत हंगामों के साथ गुजरती थी।
देवा उस रात भी उस पिछली गली में खड़ा हुआ था, जिसके एक सिरे पर उस क्लब का पिछला दरवाजा खुलता था, जहां लीना अपनी "कला" का प्रदर्शन किया करती थी। स्टेज का पिछला दरवाजा भी इसी तरफ खुलता था। हर रात लीना अपनी “परफारमेंस" के बाद यहीं से बाहर निकला करती थी।
यह कोई हाई स्टैंडर्ड क्लब नहीं था और खुद देवा कई बार ऑडियंस के बीच में बैठकर लीना की कला और डांस परफारमेंस के साथ एक्टिंग भी देख चुका था। लीना लाईव देखने के दौरान देवा को आसपास का कोई होश नहीं रहता था, वो बस एकटक लीना की तरफ देखता रहता था।
लीना के बदन की हर हरकत के साथ देवा का दिल उथल-पुथल होता रहता था। लीना के बाल रेशमी और सुनहरे थे, होंठ माणिक्य और टांगें बेहद सुडौल थीं जो डांस के दौरान म्यूजिक की लय पर इस तरह थिरकती थीं कि लोगों की सांसें सीने में अटकने लगती थीं। वो घर पहुंचने के बाद भी देर तक जागती आंखों से लीना के ख्वाब देखता रहता था और उसकी नसों में एक अजीब-सी सनसनी दौड़ती रहती थी। डांस करते-करते लीना नागिन की तरह बलखाती, लहराती दर्शकों के बीच भी आ जाया करती थी, दर्शकों की हाथापाई से बचती-बचाती वो मेजों के दरम्यान से गुजरती जाती थी। जब वो देवा के करीब से गुजरती थी तो देवा की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे ही रह जाया करती थी।
इस वक्त नीम अंधेरी पिछली गली में देवा अकेला नहीं था। करीब से लीना के दर्शन पाने के कई और भी इच्छुक श्रद्धालु वहां मौजूद थे। वे वो लोग थे जिनके पास टिकट खरीदकर क्लब में लीना का आर्ट देखने के पैसे कभी नहीं होते थे।
आखिरकार क्लब का पिछला दरवाजा खुला और गली में थोड़ी दूर तक जर्द रोशनी फैल गई। प्रतीक्षारत खड़े लोगों में जैसे जिन्दगी की लहर दौड़ गई। उनकी आंखों में कुछ ऐसी चमक उभर आई जैसे शिकार को देखकर भेड़ियों की आंखों में उभरती है।
दरवाजे ने जैसे लीना के मोहक वजूद को बाहर उगल दिया था। उसके पीछे दरवाजा एक बार फिर बंद हो गया था।
लीना ने लोहे के दरवाजे के सामने खड़े होकर गहरी सांस ली थी। वो जैसे इतने भेड़ियों के दरम्यान में आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा रही थी। क्लब के किसी आदमी ने उसे बाहर तक छोड़ आने की जहमत तक गंवारा नहीं की थी। लीना हांलाकि हर रोज इस माहौल से गुजरने की आदी हो चुकी थी, लेकिन फिर भी हर रोज वो जरा ठिठक जाती थी।
उसने किसी मल्लिका के से अंदाज में गर्व से सिर ऊंचा कर लिया था और लम्बे-लम्बे कदम उठाती हुई आगे बढ़ी। वो उसी ड्रेस में थी जिसमें डांस परफारमेंस की थी। इस डांस ड्रेस में उसके भरपूर उत्तेजक अंग कुछ और स्पष्ट हो जाया करते थे।
गली में प्रतीक्षक खड़े लोग बांहें फैलाए उसे घूर रहे थे। उनकी आंखें फैली हुई थीं और लार जैसे टपक पड़ने को तैयार थी।
उनमें से कइयों ने हाथ बढ़ाकर लीना को छूने की कोशिश की थी, लेकिन वो किसी चिकनी मछली की तरह लहराकर आगे निकल गई थी। वो इस तरह अपनी तरफ बढ़ते हाथों से खुद को बचाने में माहिर हो चुकी थी।
बाकी लोग तो हमेशा की तरह वहीं खड़े रह गए थे। लेकिन देवा लीना के पीछे-पीछे गली के सिरे की तरफ चल दिया था। लीना के बदन से परफ्यूम की तेज महक उठ रही थी। यह खुशबू देवा के जेहन पर छा जाया करती थी । शायद उसमें लीना के बदन की अपनी खूशबू भी शामिल होती थी। कम-से-कम देवा को तो यही महसूस हुआ करता था।
बाकी लोग इस हद तक बेवकूफ लगते थे कि वो उससे कुछ हासिल न होने वाले इन्तजार में बेकार खड़े रहते थे। लेकिन उसके बाद शायद उन्हें अक्ल आ जाती थी और वो लीना के पीछे ज्यादा आगे नहीं जाते थे। शायद वो समझ जाते थे कि इसका कोई फायदा नहीं है। लेकिन देवा इस पहलू पर गौर करने की जहमत नहीं करता था या फिर उसने सोच लिया था कि उसका इन्तजार हमेशा व्यर्थ नहीं जाने वाला है।
लीना के पीछे-पीछे चलते हुए उसके नितम्बों की हलचल देखकर देवा की सांस उसके सीने में अटकने लगी थी। लेकिन वो बड़ी मजबूरी में कदम उठाता चला जा रहा था। उसके दोनों हाथ जैकेट की जेबों में थे। गले में मफलर डाल रखा था। होंठों में पक्के लोफर स्टाईल में सिगरेट फंसी हुई थी। दुनिया के तजुर्बे रखने वाले लोग तो लीना को देखते ही जान जाते थे कि वो किस कैटेगरी की औरत है, लेकिन देवा के लिये वो किसी देवी, किसी महारानी से कम नहीं थी। जिसे अपना और सिर्फ अपना बनाने की बेपनाह ख्वाईश उसके दिल में पनप रही थी।
गली से निकलकर लीना सड़क पर पहुंची थी, जहां रोशनी थी। वो फुटपाथ पर एक तरफ यूं खड़ी हो गई थी जैसे किसी के इन्तजार में हो।
देवा उसके करीब जा खड़ा हुआ था और शायद उसने आदर जताने के लिये अपने सिर पर रखी उसकी कैप उतार ली थी। यह तरीका उसने इंगलिश फिल्मों से सीखा था। जिन्दगी के ज्यादातर मामलों में उसकी उस्ताद फिल्में ही थीं।
"गुड इवनिंग मिस लीना !” उसने अपने लहजे को शालीन बनाने की कोशिश करते हुए कहा था।
लीना ने अपनी सुराहीदार गर्दन घुमाकर देवा की तरफ देखा और उसके हुस्न की दमक से जैसे देवा की आंखें चुधियां गई थीं।
मेकअप की मोटी तह के बावजूद देवा की निगाह में वो हुस्न बिल्कुल खालिस था। उसमें किसी किस्म की मिलावट नहीं थी। उसे तो लीना की आर्टिफिशियल ज्वैलरी भी नकली नहीं लग रही थी। मेकअप की पर्तों के नीचे उसे आंखों के कोनों पर सलवटें और स्याही भी उसे नजर नहीं आ रही थी। सुर्ख-सुर्ख होंठों के पीछे से झांकते दांत उसे एक खामोश क्रूरता का अहसास नहीं दिलाते थे। उसे लीना की बड़ी-बड़ी आंखों में लाल चमकीली सी चमक भी दिखाई नहीं दे रही थी। उसका लीना को देखने का दृष्टिकोण ही कुछ और था।
वो आवारा, और बदमाश था। उसका उठना-बैठना भी बदमाशों में ही रहता था, पढ़ाई-लिखाई उसकी नाममात्र ही थी। वो धारावी के गरीब इलाके की बेरहम गलियों में पलकर बड़ा हुआ था और उसे कभी अच्छे लोगों की संगत हासिल नहीं हुई थी। उसे अपने इर्दगिर्द के माहौल में शालीनता और अतिरिक्त सम्पन्नता कम ही देखने को मिली थी।
लेकिन.... बहरहाल, वो अट्ठारह साल का था।
इस उम्र में बात-बेबात ही रंगों-पुट्ठों में सनसनी दौड़ती रहती है । इश्क, मोहब्बत अजीब-अजीब तरीकों से दिल में घुसपैठ करते हैं। माहौल की तमाम असुविधाओं और खराबियों के बावजूद इन्सान के मन में एक अनोखी-सी मासूमियत बाकी बची रह जाती है। जो इन्सान की आत्मा में बसी रहती है। एक अधूरापन बाकी रहता है।
देवा को लीना सिर से पैर तक हर जगह से अच्छी ही लगती थी। शायद यह देवा की उसी छुपी हुई मासूमियत की वजह से था, वो उसमें कोई नकारात्मक बात नहीं देख सकता था, उसके बारे में कोई नाकारात्मक बात सोच भी नहीं सकता था।
"अरे... तुम फिर आ गए?" लीना के लहजे में हैरत भी थी और नागवारी भी।
"मैं गया ही कब था?" देवा ने अपनी तरफ से बड़ी प्रफुल्लता से कहा और हँस पड़ा वो--- “मैं तब तक हर रात आपको यहीं खड़ा मिलूंगा जब तक आप एक शाम मेरे साथ गुजारने की हामी नहीं भर लेतीं ।"
लीना अनायास हँस दी थी। उसकी हँसी में आमतौर पर आत्मा नहीं होती थी। खाली-खाली सी बेजान हँसी हँसती थी वो।
"जरा इस लफंगे की जुर्रत तो देखो।" वो इस तरह बोलो जैसे किसी सभा को मुखातिब कर रही हो, आखिर वो स्टेज की औरत थी, भीड़ को मुखातिब करना उसकी आदत थी, स्टाईल था। उसकी नीली आंखें सर्द थीं। वो पलकें झपकाए बगैर देवा की काली आंखों में देख रही थी । देवा भी पलकें झपकाये बगैर एकटक उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर गजब की गंभीरता थी।
कुछ क्षण बाद लीना रुखाई से बोली---
"अभी तुम बच्चे हो...और ऊपर से कड़के भी। कार तक तो है नहीं तुम्हारे पास और लीना से दोस्ती करने चले हो? तुम्हें मालूम है मेरा बॉयफ्रैंड कौन है?"
इस बार देवा बोला तो उसका लहजा बिल्कुल बदला हुआ था। उसके स्वर में बेपनाह आत्मविश्वास और बेबाकी आ गई थी---
"नहीं, मुझे नहीं मालूम।” उसने जवाब दिया था--- "और मुझे इसकी परवाह भी नहीं है। मुझे तो बस यह मालूम है कि अब मैं तुम्हारा बॉयफ्रेंड बनने वाला हूं।"
"विनायक शेट्टी है मेरा बॉयफ्रैंड।" लीना ने इस अंदाज में कहा जैसे विनायक शेट्टी का नाम सुनते ही देवा पट से गिर पड़ेगा और बेहोश हो जाएगा।
इसमें कोई शक नहीं था कि वो नाम सुनकर देवा की नसों में एक सर्द लहर दौड़ गई थी। लेकिन उसने अपने चेहरे के भावों से यह बात प्रकट नहीं होने दी।
विनायक शेट्टी शहर के खतरनाक गिरोहों में से एक का बॉस था। वो एक बेरहम और जालिम आदमी था, नाजायज धन्धों से कमाई हुई काफी दौलत थी उसके पास। उसके एक हल्के से इशारे पर कुछ भी कर गुजरने वाले बहुत-से प्यादे थे उसके गैंग में। विनायक शेट्टी के गैंग के लोग उससे डरते भी थे और उसके वफादार भी थे, क्योंकि शेट्टी उन्हें भरपूर पैसा देता था। वो खुद भी जबर्दस्त निशानेबाज था और जरा-सी बात पर बेधड़क गोली चला दिया करता था।
देवा की तो कोई हैसियत ही नहीं थी, अच्छे-अच्छे कुख्यात बदमाश विनायक शेट्टी का नाम सुनकर कांपते थे। यह सबकुछ जानने के बावजूद देवा ने कहा---
"अगर विनायक शेट्टी तुम्हारा बॉयफ्रेंड है, तो यह बड़े अफसोस की बात है। क्या बॉयफ्रैंड बनाने के लिये तुम्हें मुझ जैसा कोई नौजवान नहीं मिला था? वो थकी उम्र का अधेड़ आदमी है। भला उसके पास मेरे जैसे जज्बात कहां होंगे ?"
“हो सकता है कि तुम्हारी बात सही हो। यह भी मुमकिन है कि तुम्हें अपने बारे में खामखाह की खुशहफमी ही हो।" लीना शातिर अन्दाज में मुस्कराई--- “बहरहाल, मुझे इस बहस में पड़ने की जरूरत नहीं है। मेरे लिये यही बहुत है कि शेट्टी मेरी तमाम जरूरतें और फरमाईशें पूरी कर सकता है। तुम्हारी जेब में जब कुछ माल आ जाए और तुम्हारे पास एक कार हो तब मुझसे बात करना तब मैं शायद तुम्हारे बारे में कुछ सोचूं और तुमसे बात करना पसन्द करूं। समझे?” वो व्यंग्य से हँस पड़ी।
उसी वक्त लम्बी-सी एक खूबसूरत कार फुटपाथ के पास आकर रुकी। कार बेहद तेज रफ्तार से वहां तक पहुंची थी और जब रुकी थी तो उसके टायर जोर से चरमर्राये थे।
लीना बड़े नाजो अन्दाज से कार की तरफ बढ़ी थी ।
देवा जब उसकी तरफ लपकने लगा था तो उसकी नजर कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे आदमी पर पड़ी थी।
वो गैंगस्टर विनायक शेट्टी था ।
उसे देखकर देवा ठिठक गया था। विनायक शेट्टी एक भारी-भरकम और कुख्यात चेहरे वाला आदमी था, उसका चेहरा देखकर ही उसके मिजाज और हैसियत का अन्दाजा लगाया जा सकता था। उसकी आंखें छोटी थीं, लेकिन सुर्ख-सुर्ख और सूजी-सूजी-सी नजर आती थीं, उन आंखों में कमीनगी और क्रूरता की झलक स्पष्ट नजर आती थी। उसके होंठ मोटे-मोटे थे और चेहरा खुरदरा था।
लेकिन विनायक शेट्टी का सूट बढ़िया सिला हुआ था और टाई जिसमें बेशकीमती हीरा लगा था। उस पर पहली नजर पड़ते ही महसूस होता था कि वो एक घटिया, लेकिन निहायत खतरनाक आदमी है, जिसने बढ़िया कपड़े पहनकर अपनी असलियत ढांपने की कोशिश कर रखी है। इस लिबास में विनायक शेट्टी की सबसे अहम चीज छुपी रहती थी। वो उसकी कमर से लिपटी बेल्ट में लगे होलस्टर का रिवाल्वर था। वक्त पर, जरूरत पर रिवाल्वर निकालने में विनायक शेट्टी को पलक झपकने जितनी भी देर नहीं लगानी थी।
देवा को अहसास था कि अगर इस वक्त उसने लीना को रोकने की या ज्यादा बातें करने की कोशिश की, तो इसका मतलब उसकी मौत होगा। उसे यह भी मालूम था कि शेट्टी उसे यहां तो नहीं मार सकता क्योंकि यहां अभी काफी लोग आ-जा रहे थे, जो चश्मदीद गवाह साबित हो सकते थे। वो चाहे खुद सामने आने की जुर्रत न करे, लेकिन बात हो जाती। होना यह था कि कुछ दिन बाद देवा की लाश शहर के किसी दूरदराज वीरान इलाके में पाई जाती, जिसके बारे में पुलिस यकीनन इस नतीजे पर पहुंचती कि कोई अज्ञात कातिल उसे वहां फेंककर फरार हो गया है।
लीना जब कार में बैठ रही थी, तो विनायक शेट्टी की नजरें देवा पर थीं, वो सन्देह से देवा को घूर रहा था।
देवा कुछ बेचैन-सा हो गया और उसने अपने जिस्म में एक हल्की-सी सर्द लहर दौड़ती महसूस की। लेकिन उसने अपनी हालत जाहिर नहीं होने दी थी। वो दिखावे की लापरवाही से अपनी जगह खड़ा रहा था।
कार तेज रफ्तार से आगे बढ़ गई थी।
देवा कुछ देर वहीं खड़ा कार को नजरों से ओझल होते देखता रहा था। फिर उसने अपनी कैप सिर पर जमाकर एक नई सिगरेट सुलगाई थी, विचारपूर्ण मुद्रा में छोटे-छोटे कश लेता वो करीबी गेम-रूम (सार्वजनिक छत के नीचे रखे जाने वाले खेलों की जगह) की तरफ चल पड़ा था। देवा ज्यादातर उसी गेम्स जाने वाली जगह पर ही पाया जाता था, वो उसका खास ठिकाना था।
गेम हॉल में पहुंचकर वो लकड़ी की एक अलग-थलग सी ऊंची कुर्सी पर बैठ गया था। वो सोच में डूबा हुआ था।
कम शिक्षित होने के बावजूद देवा का जेहन तेजी से काम करता था, अपनी समस्याओं का विश्लेषण करने या उनका हल तलाश करने में उसके जेहन के कल-पुर्जे तेजी से चलने लगते थे। लेकिन इस वक्त जैसे उसका दिमाग सुस्त पड़ गया था। उस पर एक अजीब-सा पराजय मात्र छाया हुआ था।
यह नौजवानी के इश्क में पहली ठोकर लगने की पराजय थी। लीना दूसरों की नजरों में कुछ भी रही हो, लेकिन देवा के लिये पहला इश्क थी... लड़कपन का इश्क हो, जिसकी शिद्दत खुद आशिक के लिये भी कभी-कभी असहनीय और तनाव भरी साबित होती है। वैसे तो देवा के सम्बन्ध इलाके की कई लड़कियों से थे, लेकिन किसी से भी उसे वो अपनापन या खुशी न मिल सकती थी, जिसकी उसे तलाश थी। लेकिन लीना की तो बात ही अलग थी। देवा को जैसे कोई आसमानी शक्ति बताती थी कि वो औरत उसकी आत्मा तक की प्यास बुझा सकती है। लीना का पुख्तापन देवा को बहुत ज्यादा भाता था, अपनी हमउम्र लड़कियां उसे बहुत जल्द सयानी और छिछोरी लगने लगती थीं। उसे लगता था कि दिल, बदन और आत्मा की सन्तुष्टि के सभी रास्ते लीना की तरफ ही जाते थे।
दरअसल, देवा का जेहन उसकी उम्र से बहुत आगे था। जिस इलाके में उसने परवरिश पाई थी वहां ज्यादातर लड़कों के साथ यही होता था, जिन्दगी की नंगी सच्चाइयां बहुत जल्द उनके सामने आ जाती थीं। माहौल की असमानता और मुश्किलें उन्हें काफी तजुर्बेकार बना देती थीं।
देवा के साथ तो यह मामला कुछ ज्यादा ही हो गया था। अट्ठारह साल की उम्र में वो पच्चीस साल का नजर आता था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में बला की गम्भीरता और अजीब-सा बोझिलमय दिखाई देता था। जैसे वो दिल में कोई अनजाना-सा सदमा छुपाए घूम रहा हो। देवा के हाथ-पांव मजबूत और डील-डोल अच्छा था। आमतौर पर उसकी शेव बढ़ी हुई और होंठों पर एक तल्ख सी मुस्कराहट फैली रहती थी।
हकीकत यह थी कि जिन गली-कूचों में वो जिन्दगी गुजार रहा था, उनमें उसको हर दिन नए तजुर्बे हासिल होते थे। उसने वाकई अपनी उम्र से कहीं ज्यादा जिन्दगी गुजार ली थी। अट्ठारह साल की उम्र में ही उसने जो कुछ देख लिया था, उसे देखना कई लोगों को जिन्दगी-भर मौका नहीं मिलता। यही वजह थी कि उसमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा हुआ था।
देवा को अगर दुनिया के किसी भी देश के किसी भी शहर में खाली हाथ और खाली जेब भी छोड़ दिया जाता तो वो भूखा नहीं रह सकता था। उसे चोरी करने की भी जरूरत न पड़ती। चोरी करना उसे सख्त नापसन्द था । देवा की नजर में चोर उचक्के, उठाईगीरे निहायत मामूली लोग हुआ करते हैं। उसके ख्याल में चोरी-चकारी का रास्ता वो लोग अपनाते हैं जिनमें दिमाग नाम की कोई चीज नहीं होती। खासतौर पर छोटी-मोटी चोरियां करने वालों को वो बड़ी हिकारत की नजर से देखा करता था।
गेम हॉल में लकड़ी की ऊंची कुर्सी पर बैठा वो अपने ख्यालों में डूबा गोते खा रहा था कि उसके करीब ही एक नीची-नीची और बैठी-बैठी-सी आवाज उभरी---
"हैलो...।"
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