राजनगर, वर्तमान।

हालाँकि वह औरत जवान और हसीन थी, लेकिन उसके सिर के बाल अस्सी साल की बुढ़िया की भांति सफ़ेद थे। न केवल सिर के बाल बल्कि उसकी भवें भी पूरी तरह श्वेत थीं। करीब तीस साल की नजर आती उस औरत का पहनावा भी साधारण नहीं था। उसके बदन पर सफ़ेद मखमली चोगा था, जो कमरे के फर्श आधा गज तक फैला हुआ था और ये इल्म करा रहा था कि उसे दोनों हाथों से ऊपर उठाये बगैर चल पाना मुमकिन नहीं था। परिधान पर की गयी कढ़ाई ऐसी थी कि उसे अलंकार कहने के बजाय किसी खो चुकी जुबान के अक्षर कहना ज्यादा सटीक था।

लंबे व सफ़ेद बाल कंधे और पीठ तक बिखराए हुए वह श्रृंगारदान के सामने बैठी अपनी सूरत का दीदार कर रही थी। हालाँकि वह तीखे नैन-नक्श वाली थी और ख़ूबसूरत मखलूक कहलाने के पूरी काबिल थी लेकिन उम्र के साथ सामंजस्य न बैठाने वाले उसके बालों और भौहों का रंग शायद ही किसी का ध्यान उसकी खूबसूरती की ओर आकर्षित करता रहा होगा इसके विपरीत समाज द्वारा उसके आसेब, जिन्न, डायन या गैरजहां का इंसान घोषित होने के खतरे ज्यादा थे।

कुछ देर तक वह आईने के सामने बैठी रही तत्पश्चात वालक्लॉक की ओर देखने के बाद इस नतीजे पर पहुँची कि तबस्सुम के स्कूल से आने का वक्त हो चुका था। वह श्रृंगारदान के सामने से उठकर ज्यों ही दरवाजे की ओर मुड़ी, त्यों ही उसके रंग-रूप में हैरतअंगेज परिवर्तन हुआ। पलक झपकने भर की दरकार थी कि सफ़ेद बालों वाली उस हसीना की जगह अब एक सामान्य औरत खड़ी थी, जिसकी उम्र और बालों के रंग में न केवल पूरी सामंजस्यता थी बल्कि मखमली चोगे की जगह भी अब सलवार-सूट ने ले ली थी। हालाँकि उसके नैन-नक्श में भी पूरी तरह बदलाव आ चुका था लेकिन इससे उसकी खूबसूरती पर कोई फर्क नहीं पड़ा था।

किसी करिश्माई ताकत की मालिक वह औरत ड्राइंग हॉल में पहुँची, जहाँ मेड के साथ अभी-अभी स्कूल से आयी तबस्सुम की बालसुलभ हरकतें चल रही थीं। वह बिदककर शूज इधर-उधर फेंक रही थी जबकि ब्लेजर पहले ही फर्श पर फेंका जा चुका था। मेड उसे संभालने की नाकाम कोशिश कर रही थी। औरत भाँप गयी कि नौकरानी को किस बात की सजा मिल रही थी।

“आज रास्ते में किस चीज की जिद की इसने?” उसने मेड को लक्ष्य करके पूछा।

“फन पार्क में जाने की, जबकि अभी परसों ही गयी थी।” मेड ने ड्राइंग हॉल के कोने में उछाले गए शूज को उठाते हुए, दयनीय भाव से औरत की ओर देखा।

“तुम चाय बना लाओ, मैं देखती हूँ इसे।”

उसे किचन का रास्ता दिखाने के बाद औरत, तबस्सुम से मुखातिब हुई, जो अब सोफे पर चित्त पसर गयी थी और शून्य को घूर रही थी। कंधे से स्कूल बैग भी नहीं उतारी थी। अनशन करने का ये उसका अपना मौलिक तरीका था, जो कि बहुत पहले ही चलन से बाहर हो चुका था लेकिन कभी-कभी कारगर भी हो जाता था।

“चलो अब ये शो ख़त्म करो। कितनी बार तुम्हें समझाया है कि मेड गरीब है, उसे सताया मत करो।”

औरत ने सोफे से तबस्सुम को उठाया और स्कूल बैग को उससे अलग करने के बाद उसके शॉक्स निकालने लगी।

“लेकिन तुम उन्हें हर महीने पैसे तो देती हो।”

“वो हमारे यहाँ काम करती है, इसलिए हम उसे पैसे देते हैं, ताकि उसका घर चल सके, न कि तुम्हें फन पार्क ले जा सके। जिद मुझसे किया करो, मेड से नहीं; ये पांचवीं बार समझा रही हूँ तुम्हें।”

तबस्सुम कोई प्रतिवाद किये बगैर मुँह फुलाकर टाई का नॉट ढीला करने लगी।

“स्कूल कैसा रहा आज?” औरत ने बैग में से टिफिन निकालते हुए पूछा।

नॉट खोलने में मशगूल होने के कारण तबस्सुम का ध्यान माँ के सवाल की ओर नहीं गया। इस बीच औरत उसका टिफिन निकालकर ये देख ली कि उसकी बेटी ने आज भी उसमें नहीं झाँका था।

“तुम स्कूल में करती क्या हो, जो तुम्हें लंच करने तक की फुरसत नहीं मिलती?” वह आग-बबूला हो उठी- “कल भी तुमने टिफिन नहीं छुआ था और आज भी?”

तबस्सुम ने टिफिन की ओर यूँ देखा, जैसे ये कोई साधारण घटना हो तत्पश्चात फिर से नॉट खोलने लगी।

“मैंने कुछ पूछा तुमसे?” इस दफा औरत दहाड़ उठी। उस दहाड़ से तबस्सुम सहम गयी। उसे मालूम था कि माँ का गुस्सा साधारण नहीं होता था।

“मैं...मैं कुछ और खा लेती हूँ, इसलिए मेरा पेट भर जाता है और लंच की जरूरत नहीं पड़ती।” तबस्सुम ने कातर भाव से औरत की ओर देखते हुए जवाब दिया।

“कुछ और खा लेती हो?” औरत ने उसे घूरा- “क्या खा लेती हो? मुझे तो तुम्हें पैसे दिए हुए कई दिन हो गए।”

“मैंने तुम्हें अपने एक फ्रेंड हसन के बारे में बताया था न?”

“बताया होगा, तो?”

“वह दो दिन से अपने घर से मेरे लिए पेस्ट्रीज चुराकर ला रहा है।”

“ओह! और फिर एक दिन हिसाब बराबर करने के लिए वह तुमसे भी यही काम करने के लिए कहेगा? तुम लोग ये शैतानियाँ लाते कहाँ से हो?”

तबस्सुम कुछ बोले बगैर मुँह फुलाकर माँ को देखती रही।             

“बोलो, यही डील हुई है न तुम दोनों के बीच?”

“नहीं, हमारे बीच एक ख़ास बात हुई है।” कहकर तबस्सुम खामोश हो गयी।

“अब बताओगी भी कि वह ख़ास बात क्या है?”

“एक्चुअली ही नीड्स माय हेल्प, इन फैक्ट योर हेल्प।”

महिला की भवें संकुचित हुईं। उसकी आँखों में हैरत नजर आयी।

“कैसी हेल्प?” उसने आशंकित लहजे में पूछा।

“वो अपनी अम्मी को बहुत मिस करता है, जैसे मैं पहले अब्बू को मिस करती थी।”

“तो?”

“तो वह मुझसे पूछ रहा है कि मैं कैसे अपने अब्बू को सपनों में बुलाकर उनसे बातें कर लेती हूँ।”

“बेवकूफ़ लड़की।” औरत के चेहरे पर क्रोध और चिंता का मिला-जुला रूप नजर आने लगा- “मैंने तुम्हें मना किया था न कि ये बातें किसी को बताई नहीं जातीं?”

“पर मैंने उसे इसलिए बताई थी क्योंकि वह मेरा बेस्ट फ्रेंड है। अब तो वह मेरे लिए पेस्ट्रीज भी लाता है, इसलिए मुझे उसे भी वह मेथड सिखाना होगा, जिसके जरिये मैं अब्बू से सपने में मिलती हूँ ताकि वह भी जब अपनी अम्मी को मिस करे तो उनसे सपने में बात कर सके।”

“और तुम्हें लगता है कि तुम उसे सिखा दोगी?” औरत ने तबस्सुम को अजीब सी निगाहों से घूरा। तबस्सुम उन निगाहों को पहचानती थी। माँ जब भी उसे ऐसी निगाहों से घूरती थी तो वह एक अनजाने भय से सिहर उठती थी। आज भी यही हुआ था। डर के मारे उसकी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई।

“गेट आउट ऑफ़ दिस वीयर्ड ड्रामा।” थोड़ी देर की खामोशी के बाद औरत ने कहा- “उससे कह दो कि तुम अपने अब्बू से सपनों में नहीं मिलती। तुमने ये बात झूठ कही थी उससे।”

“पर वो मेरा फ्रेंड है। तुम उसकी हेल्प कर दोगी तो क्या हो जाएगा?” तबस्सुम अड़ गयी।

“बहुत कुछ हो जाएगा।” औरत ने जबड़े भींचते हुए कहा और उठकर खड़ी हो गयी- “अब बिना कोई हंगामा किये यूनिफार्म उतारो। अगर भूख लगी हो तो डायनिंग टेबल पर आ जाओ।”

तबस्सुम कुछ देर तक अपनी गतिविधियों से दर्शाती रही कि वह नाराज़ है लेकिन जब माँ पर कोई असर नहीं हुआ तो वह पैर पटकते हुए ड्रेस चेंज करने चली गयी। उसे रूम की ओर जाते हुए देख रही उस औरत की आँखों में भय, चिंता और तनाव के साए मंडरा रहे थे।

N

हसीनाबाद, सन 1975।

जमुना जब पशुपति के कमरे की चौखट पर पहुँचकर थमा तो पाया कि वह एक तस्वीर को खूँटी पर टांग रहा था। काम पूरा करने के बाद जब वह वहाँ से हटा तो जमुना अपनी जगह पर जड़ होकर रह गया। उसकी आँखें भय और विस्मय से फ़ैल गयीं और बदन में भी सिहरन भर गयी क्योंकि तस्वीर शिकार के लिए आतुर एक नरभेड़िये की थी। जमुना की हालत देख पशुपति के होठों पर मंद-मंद मुस्कान आकर लुप्त हो गयी। उसने पहले तस्वीर पर एक नजर डाली, फिर जमुना से मुखातिब होकर बोला- “ये अच्छी लगी आपको?”

जमुना की तंद्रा भंग हुई। उसने उस इंसान की ओर देखा, जो हर पल उसे अपने रहस्यमयी होने का एहसास कराता रहता था।

“क..कुछ...कुछ कहा आपने?” उसके लब थरथराये।

“मैंने पूछा कि तस्वीर अच्छी लगी क्या आपको? इसे मेरी माँ ने भेजा है। उस ख़त के जवाब में, जिसे आप पोस्ट करने गए थे। जवाबी ख़त भी तो आप ही लेकर आये थे, भूल गए?”

जमुना की निगाहें जब दोबारा तस्वीर पर गयीं तो एक बार फिर उसके हैरत का कोई इंतहा न रही। जिस तस्वीर में उसे कुछ देर पहले नरभेड़िया नजर आया था, उसी तस्वीर में अब संहार की मुद्रा में भगवान् नृसिंह नजर आ रहे थे। उनकी जाँघों पर टिका हिरण्यकश्यप भय और पीड़ा से आर्तनाद कर रहा था, जबकि उनके नुकीले नाखून उसकी छाती में गहराई तक धँसे हुए थे। पापियों के प्रति ईश्वर के हिंसक स्वरूप को प्रकट कर रही उस तस्वीर का दृश्य वीभत्स और रक्तरंजित था फिर भी भक्ति और श्रद्धा के भाव ने जमुना के भय को हर लिया। उसने सिर झुकाकर नारायण के उस अवतार को प्रणाम किया और कुछ देर पहले उसी तस्वीर में नरभेड़िया दिखाई देने की घटना को वहम करार देते हुए वह काफी हद तक सामान्य मुद्रा में आ गया। हालाँकि इस ओर उसका ध्यान नहीं जा सका था कि जब वह भक्ति-रस में डूबकर नृसिंह को प्रणाम कर रहा था, तब पशुपति के चेहरे पर घृणा के बड़े ही वीभत्स भाव उत्पन्न हुए थे, मानो जमुना का ऐसा करना उसे जरा भी रास नहीं आया हो।

“आप पहचानते हैं इस तस्वीर को?”

“आप नहीं पहचानते?” पशुपति के सवाल पर जमुना ने विस्मय से उसकी ओर देखा। जब पशुपति मौन रहा तो उसने आगे कहा- “ये तो नृसिंह भगवान् हैं, विष्णु के चौथे अवतार।”

“तो फिर पहली बार आप इन्हें देखकर सहम क्यों गए थे?”

जमुना को तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा। उसने तस्वीर की ओर देखा, जिसमें अब भी नृसिंह ही दिखाई दे रहे थे।

“पता नहीं कैसे साहब...।” उसने कहा- “मुझे ये भ्रम हो गया था कि फोटो में नरभेड़िया था।”

“तो भी डरने जैसी कोई बात नहीं थी क्योंकि दोनों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। मूलरूप से दोनों ही आधा पशु और आधा मानव हैं।”

“एक पिशाच है और दूसरा ईश्वर है।” जमुना के मुँह से यकायक निकल पड़ा।

उसका कथन सुनकर पशुपति कई क्षणों तक उसे घूरता रहा, मानो उसकी ओर से ऐसे किसी प्रतिवाद की उसे उम्मीद न रही हो, फिर उसे बैठने का संकेत करने के बाद खुद भी एक कुर्सी पर काबिज हो गया।

“आपने मुझे बुलाया क्यों साहब जी?” जमुना ने बात का रुख दूसरी दिशा में मोड़ने के ध्येय से पूछा क्योंकि पशुपति की भाव-भंगिमाओं से उसे भी ये एहसास हो गया था कि उसका जवाब उस रहस्यमयी इंसान को चुभ गया था।

“मुझे जंगल में रहने वाले कबीले के बारे में पूछताछ करनी है।” पशुपति ने सपाट लहजे में कहा।

“कैसी पूछताछ साहब?” जमुना की पेशानी पर बल पड़े।

“उन्हें जंगल में घूमने वाले साए से डर नहीं लगता?”

“कह नहीं सकता। जाने कब से वे कबाइली उस जंगल में आबाद हैं। महल से या उसमें रहने वाले साए से उन्हें कोई खतरा होता तो वे इतने दिनों से वहाँ रहते ही क्यों?”

“हम्म।” पशुपति ने शाल को इर्द-गिर्द लपेटते हुए गहरी गहरी साँस ली। बाहर धुंध काबिज थी।

“कबीले वाले हर पूर्णमासी को नाच-गाना क्यों करते हैं?” थोड़ी देर बाद उसने पूछा।

एक सर्द एहसास जमुना को कंपा गया। उसके होंठ काँपे मगर शब्द नहीं निकले।

“कबीले वाले हर पूर्णमासी को नाच-गाना क्यों करते हैं?” पशुपति ने अपना सवाल दोहराया।

“वे नरभेड़ियों के अस्तित्व में बहुत यकीन करते हैं। उनका मानना है कि पूर्णमासी की रात इंसान की खाल में छिपे भेड़ियों की दरिंदगी जाग जाती है और वे अपनी पहचान छुपाने के लिए वीरान इलाके की ओर भागते हैं। शिकार की चाह में वे जंगल या सुनसान रास्तों पर घात लगाकर भी बैठते हैं। चूँकि कबीला जंगल में काफी गहराई में बसा हुआ है, इसलिए वहाँ भेड़िया-मानव के घात लगाने की संभावना वैसे भी ज्यादा होती है। यही वजह है कि वे कबाइली लोग पूर्णमासी की रात जागरण करते हुए अपने इलाके की रखवाली करते हैं। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कबाइलियों के वे गीत नरभेड़िये की स्तुति-गान हैं। अगर दरिंदा उनके आस-पास होता हैं तो उन गीतों से खुश होकर उन्हें कोई हानि पहुँचाये बिना चला जाता है। गाँव के कई लोग ऐसे भी हैं, जो नरभेड़ियों में भी उतना ही यकीन करते हैं, जितना भगवान् में और मजे की बात ये है कि कबाइलियों से उनसे बचने का नुस्खा लेने के लिए जंगल में भी जाते हैं।”

“ये कबाइली नरभेड़िये में इतना यकीन क्यों करते हैं?” पशुपति ने अर्थपूर्ण लहजे में पूछा, मानो जवाब उसे पहले से ही मालूम हो।

“पता नहीं। उनकी अपनी कई लोककथाएँ भी हैं, जिनके केंद्र में नरभेड़िया है। वे लोककथाएं और किंवदँतियाँ ही शायद उनके विश्वास का आधार हैं। या फिर....।” जमुना ने अपना कथन अधूरा छोड़ दिया।

“या फिर?” पशुपति के नेत्र संकुचित हुए।

“हो सकता है उन्होंने वास्तव में कभी नरभेड़िये को देखा हो।”

जवाब सुनकर पशुपति की मुस्कान गहरी और भेदपूर्ण हो गयी, जिसने न जाने क्यों जमुना को भीतर तक दहला दिया।

“अगर...अगर आपको...बुरा न लगे तो एक बात पूछूं साहब जी?” वह हकलाया।

“एक ही नहीं कई बातें पूछ सकते हैं।” पशुपति मुदित भाव से बोला। थोड़ी देर पहले जमुना के ‘पिशाच और ईश्वर’ वाले जवाब से उस पर जो तनाव तारी

हुआ था, वह भी अब छंट चला था।

“आप...आप...नरभेड़िया को लेकर इतना गंभीर क्यों हैं? बहुत यकीन करते हैं क्या इन पर?”

“समय आने पर बता दूँगा।” पशुपति ने कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं- “मेरा एक काम करेंगे?”

“जी बताइए।”

“कबीले के किसी आदमी से मेरी भेंट करवा दीजिए। मैं उन कबाइलियों पर कुछ रिसर्च करना चाहता हूँ।”

“कोशिश करूँगा साहब। कबीले का एक लड़का हमारे कस्बे में जंगली जड़ी-बूटियाँ बेचने आता है। मैं उसे आपके पास भेज दूंगा।”

“कोशिश कीजिएगा कि ये बात कम से कम लोगों तक ही रहे।”

“जी बिल्कुल।” जमुना ने सहमति में सिर हिलाया।

“अब जाइए।”

वह खड़ा हो गया। इस मुलाक़ात के दौरान वह इस यकीन के एक कदम और नजदीक पहुँच गया था कि पशुपति न तो साधारण प्राणी था और न ही वह हसीनाबाद में साधारण मंसूबे के तहत आया था। कमरे से बाहर निकलने से पहले अगर उसने दीवार पर टंगी तस्वीर पर नजर डाली होती तो ये भी देखा होता कि तस्वीर में एक बार फिर नरभेड़िया था, भगवान् नृसिंह नहीं।

N

राजनगर, वर्तमान।

“डॉ. अंशुमान से मुलाक़ात कैसी रही?” मोबाइल के डिस्प्ले पर निगाहें गड़ाए हुए फाह्याज़ ने सुबोध से पूछा, जिसका पूरा ध्यान ड्राइविंग पर था। दोनों कामरान से सवाल-जवाब करने के लिए साकेतनगर जा रहे थे।

“बहुत ही दिलचस्प।” सुबोध ने फाह्याज़ पर क्षणिक दृष्टिपात किया, तत्पश्चात विंडस्क्रीन की ओर उन्मुख होकर आगे कहा- “विनायक के साथ जो भी वाकयात हो रहे थे, उनके आधार पर डॉक्साब का एज युजुअल यही कहना कि वह एक गंभीर मानसिक बीमारी की ओर अग्रसर था। पिछले दस दिन में उसकी बीमारी इस कदर बढ़ गयी थी कि डॉक्टर भी भौचक्का थे। उन्होंने विनायक के बारे में ऐसी-ऐसी बतायीं, जिन्हें सुनने के बाद इसमें कोई दो राय नहीं रह जाता कि उसने खुद से ही खुद पर हमला किया था यानी कि उसकी बीमारी ने ही उससे वो सब करवाया। उसी ने उसकी जान ली।”

“उसी ने, मतलब उसकी बीमारी ने?”

“ऑफकोर्स। इट मे बी, ही वाज हैलुसिनेटिंग।”

“पूरी बात बताइए।” फाह्याज़ का लहजा संजीदा हो गया।

“वह मेंटली डिस्टर्ब्ड तो शुरू से ही था सर लेकिन पिछले हफ्ते-दस दिन से वह अजीब-अजीब सी बातें करने लगा था। कहता था कि उसे अँधेरे से डर लगता है, रात में अजीब से सपने आते हैं, डरावनी आवाजें सुनाई देती हैं और कभी-कभी एक काली परछाईं आस-पास घूमती हुई दिखाई देती है।”

“उसे अँधेरे से डर लगता था?” फाह्याज़ की आँखें गोल हुईं।

“जी हाँ।”

“और उसका क़त्ल भी अँधेरे में ही हुआ।” कहने के बाद फाह्याज़ ने इस अपेक्षा के साथ सुबोध की ओर देखा कि वह इस बाबत कोई विचार प्रकट करेगा।

“जी बिल्कुल।” उसका आशय भांपकर सुबोध ने कहा- “कोई हैरानी नहीं कि अँधेरे में वह अपनी आहट को भी दुश्मन की आहट समझ बैठा हो, अपनी साँसों की आवाज़ से ये मुगालता पाल बैठा हो कि उसके बदन से साँप लिपटा हुआ फुंफकार रहा है और उसे मारने के लिए जिस्म पर बेतहाशा चाकू चलाने लगा हो। सिजोफ्रेनिक तो वह था ही।”

“आजकल आपकी थिंकिंग बड़ी क्रिएटिव होती जा रही है।” फाह्याज़ हँस पड़ा। हालाँकि उसके मन में एक ख्याल आया था, उसने उस पर थोड़ी देर तक मनन भी किया लेकिन फिर ये सोचकर कि उसका इस केस से कोई लिंक होना संभव नहीं है, उसे नजरअंदाज कर दिया।

“कोई आश्चर्य नहीं, अगर ऐसा हुआ होगा तो।” सुबोध ने कहा- “आप सोचकर देखिए कि जिन मरीजों को सामान्य परिस्थितियों में भी अजीबोगरीब अनुभाव होते हैं, उनके साथ देर रात के अँधेरे में वाकई ऐसा कुछ हुआ होगा तो क्या हैरानी है?”

“और उस निशान का क्या, जिसको लेकर अब तक हमारा कॉमन गेस यही है कि वह किसी कल्ट का सिगिल है?”

“इस बाबत तो डॉक्टर ने बड़ी ही हैरतअंगेज बात बताई है सर।” सुबोध का एक हाथ स्टीयरिंग पर से हटकर शर्ट की जेब में चला गया और अगले ही पल उसके हाथ में सेलफोन था, जिसे उसने फाह्याज़ की ओर बढ़ाते हुए कहा- “गैलरी ओपन कीजिए और रीसेंट की इमेजेज को देखिए।”

फाह्याज़ ने तत्काल उस काम को अंजाम दिया। सुबोध की बताई हुई उन छवियों में एक इंसानी छाती थी, जिस पर विनायक की लाश पर से बरामद निशान बना हुआ था। निशान उसी अंदाज में छाती पर गुदा हुआ था, जैसे लोग अक्सर अपने पार्टनर का नाम या अपनी धार्मिक आस्था का प्रतीक चिह्न गुदवाते हैं।

“ये किसका चेस्ट है?”

“विनायक का है और उसके मरने से पहले का है।”

“यानी कि यह निशान उसकी छाती पर पहले से ही था?”

“केवल दस दिन पहले से।”

“मतलब?” फाह्याज़ की भृकुटियों पर बल पड़े और उसने सवालिया निगाहों से सुबोध की ओर देखा।

“तस्वीरों को ध्यान से देखिए सर, फिर मतलब मुझे बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

फाह्याज़ ने हर एक तस्वीर के निशान को गौर से देखा, कई बार ज़ूम करके देखा और फिर उसे जो ख़ास बात नजर आयी, वो ये थी कि पहली तस्वीर में निशान हल्का था, जैसे किसी सूखी स्याही वाली स्केच से बनाया गया हो, दूसरे में थोड़ा गहरा हुआ था, तीसरे में उससे गहरा और फिर आख़िरी तस्वीर में जाकर इस हद तक गहरा हो गया था कि उसे टैटू कहा जा सकता था।

“ये क्या माजरा है यार?” फाह्याज़ ने बुरा सा मुँह बनाया- “तो क्या ये निशान उसके बदन पर धीरे-धीरे कुदरती तरीके से वजूद में आया है।”

“यूँ तो विनायक, डॉक्टर अंशुमान का पेशेंट बहुत पहले से था लेकिन पिछले दस दिन से वह एक नयी समस्या के साथ डॉक्टर के पास आ रहा था। वे वही समस्याएं थीं, जिनके बारे में मैंने आपको कुछ देर पहले बताया यानी कि सिजोफ्रेनिया के सिम्टम्स।”

“तो उसका सिजोफ्रेनिया भी महज़ दस दिन ही पुराना था?”

“जी हाँ। एक दो दिन बाद उसने डॉक्टर से ये शिकायत भी करनी शुरू कर दी थी कि वह बहुत ज्यादा नर्वस रहने लगा है, सेंसेटिव एनिमल उससे दूरी बनाने लगे हैं और हर कोई उसे घूरता हुआ सा लगने लगा है। फिर एक दिन उसने डॉक्टर को अपनी छाती खोलकर दिखाई और बताया कि नहाते वक्त जब उसकी निगाह छाती पर गयी थी तो पाया था कि उक्त निशान वहाँ पर खुद ब खुद बन गया था। डॉक्साब पहले तो बौखला गए फिर उनके मन में पहला ख्याल यही आया कि ये डर्मैटोग्राफिया जैसी स्किन से जुड़ी कोई बीमारी है, जिसमें त्वचा पर रैंडमली कुछ पैटर्न उभरने लगते हैं।”

फाह्याज़ ने निशान को एक बार फिर गौर से देखा। कुछ याद करने की कोशिश में उसकी पेशानी पर लकीरें उभरीं।

“कुछ याद आ रहा है क्या सर?” सुबोध ने पूछा।

“जब विनायक की बॉडी पर इसे खून से लिथड़ा हुआ देखा था तो पता नहीं चला लेकिन अब, जब इसे साफ़-सुथरी हालत में देख रहा हूँ तो न जाने क्यों ऐसा लग रहा है, जैसे ये निशान पहले भी आँखों के सामने से गुजरा है।”

“मे बी हॉलीवुड की किसी हॉरर फिल्म में देखा हो आपने इसे।”

“नहीं, शबनम के जाने के बाद दुनिया की रंगीनियाँ अब मुझे ज्यादा नहीं भातीं। फिल्में देखे हुए तो काफी अरसा हो गया लेकिन आपने ये अंदाजा कैसे लगा लिया कि ये निशान किसी फिल्म में इस्तेमाल किया गया हो सकता है?”

“मेरे सेलफोन का ब्राउज़र ओपन कीजिए। उसमें मैंने एक वेबपेज का यूआरएल बुकमार्क किया हुआ है। प्लीज उस पर मौजूद आर्टिकल को पढ़िए।”

फाह्याज़, सुबोध के बताये हुए पेज पर पहुँचा।

“नेक्रोमेंसी।” उसने आर्टिकल के शीर्षक पर नजर डालते हुए कहा- “ये किस चिड़िया का नाम है?”

“वह पूरा आर्टिकल उस चिड़िया के बारे में ही है। उस सिगिल को जब मैंने गूगल लेंस के जरिये इंटरनेट पर ढूंढा तो कई वेबपेज मिले, जिन पर इसे लेकर तरह-तरह के फोकटेल्स और लीजेंड मौजूद थे। जितने मुँह-उतनी बातें कहावत को चरितार्थ करने वाली उन सभी वेबसाइट्स का सिरा घूम-फिरकर एक ही शब्द से जुड़ रहा था और वो शब्द था- नेक्रोमेंसी। जिस साईट को मैंने बुकमार्क किया हुआ है, उस पर दर्ज जानकरी मुझे ज्यादा ऑथेंटिक लगी, सो उसे आपकी खिदमत में पेश कर दिया।”

सुबोध द्वारा उपर्युक्त सूचना दिए जाने तक फाह्याज़ उस आर्टिकल के दो पैराग्राफ निपटा चुका था। करीब दस मिनट में पूरे आर्टिकल को पढ़ने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और विनायक की निशान वाली तस्वीरें अपने व्हाट्सएप पर सेंड करने के बाद सेलफोन सुबोध की ओर बढ़ा दिया।

“इस आर्टिकल के मुताबिक़ नेक्रोमेंसी एक कला है, जिसके जरिये लोग आत्माओं और भूतों को बुलाते हैं, उनसे भविष्य पूछते हैं या अपना कोई काम करवाते हैं। इस कला को अंजाम देने वाले कलाकार को नेक्रोमेंसर कहते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे हमारे यहाँ ऐसे काम करने वालों को साधक, अघोरी, तांत्रिक, पीर, फ़कीर, बेताल और भी न जाने क्या-क्या कहते हैं।” फाह्याज़ थोड़ा रुका फिर ठहाका लगाते हुए बोला- “मनोरंजन के लिए बड़ा सस्ता आर्टिकल पढ़ा दिया आपने। इससे बेहतर होता कि मैं चुड़ैलों की कहानियाँ पढ़ लेता, वो इससे ज्यादा दिलचस्प होती हैं।”

“आपने इस निशान की बाबत गूगल लेंस करने के लिए कहा था, मैंने किया। बदले में एक सस्ती सी कहानी हासिल हुई तो इसमें मेरा क्या दोष है। इसीलिए तो

मैंने कुछ देर पहले कहा कि ये निशान आपने हॉलीवुड की किसी फिल्म में देखा होगा क्योंकि वही लोग लीजेंड्स और फोकटेल्स को अच्छे से भुनाते हैं, उन्हें पॉपुलर करते हैं।”

“लेकिन विनायक की छाती पर किसी लीजेंड से जुड़ा सिंबल अपने आप कैसे बन गया?” फाह्याज़ ने खुद से सवाल किया। उसका दिमाग चकरा गया मगर कोई जवाब हासिल नहीं हुआ। अंतत: उसने सुबोध से पूछा- “डॉक्टर ने इस अजीबोगरीब गुत्थी को लेकर कोई राय कायम की?”

“बस यही कि ये स्किन से जुड़ी कोई बीमारी हो सकती है।”

“आपने किसी टैटू बनाने वाले से भी कांटेक्ट किया था?”

“जरूरत नहीं समझी सर। जब ये निशान कुदरती है तो टैटू वाला हमारी क्या मदद कर पाता।”

दोनों के बीच खामोशी छा गयी। जीप साकेतनगर में दाखिल हो चुकी थी और अब कामरान के पते की ओर अग्रसर थी। फाह्याज़ ने अपना सेलफोन निकाला और विनायक के चेस्ट की तस्वीर, जिसे उसने अभी-अभी सुबोध के मोबाइल से लिया था, वाट्सएप से डाउनलोड करके एक बार फिर उस निशान का मुआयना करने लगा।

“कहाँ देखा था इसे?” दोनों भौहों के बीच अँगूठे से ठकठकाते हुए उसने निशान के बारे में याद करने की एक कोशिश और की मगर फिर से नाकामयाब रहा।

“कभी-कभी चीजें राह चलते याद आ जाती हैं तो कभी-कभी लाख कोशिशों के बाद भी याद नहीं आ पातीं।” सुबोध ने कहा- “बाद में ट्राई कीजिएगा।”

“विनायक को सपने भी आते थे न?” फाह्याज़ ने पूछा।

“डॉक्टर ने तो यही बताया।”

“सपने में क्या दिखता था उसे?”

“रहने दीजिये सर।” सुबोध हँसा- “वरना फिर से आप कहेंगे कि कोई सस्ती सी कहानी सुना दी मैंने।”

“मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ आचार्य जी।” फाह्याज़ ने गंभीर लहजे में कहा।

“सॉरी सर, लेकिन उसका सपना वाकई बहुत वाहियात था। वह सपने में खुद को देखता था। उसके हाथ में खून से भरा कटोरा होता था, जिसे वह एक नरभेड़िये पर उड़ेल रहा होता था। अब बताइए, भला कोई मतलब हो सकता है इस सपने का?”

कहने के बाद सुबोध ने जोर का ठहाका लगाते हुए फाह्याज़ की ओर देखा

लेकिन उस क्षण उसका मुँह हैरत से खुला रह गया जब उसने पाया कि फाह्याज़ जड़ होकर रह गया था। मोबाइल उसके हाथ से छूटकर पहले गोद में गिरा, फिर वहाँ से फिसलकर नीचे जा गिरा।

“स...सर..आप...आप ठीक तो हैं?” सुबोध ने घबराकर ब्रेक पर अपने पाँव जमाये और एक हाथ से फाह्याज़ का कंधा झकझोरा।

“न...नहीं....नहीं...विनायक पागल नहीं हो रहा था....।” फाह्याज़ के होंठ काँपे- “वह...वह सिजोफ्रेनिक नहीं था। उसके साथ...उसके साथ जो कुछ हो रहा था, वह रियल रहा होगा। उसे आवाजें वास्तव में आती रही होंगी, उसे वह काली परछाईं हकीकत में दिखती रही होगी।”

सुबोध को फाह्याज़ की बातों का कोई मतलब समझ में नहीं आया लिहाजा उसने जीप को किनारे लगाकर इंजन बंद किया और पानी की बोतल उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा- “आप पानी पी लीजिए सर।”

ठण्ड के बावजूद फाह्याज़ ने आधा बोतल खाली कर दिया और लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए सामान्य अवस्था में आने की कोशिश करने लगा। इस बीच सुबोध ने नीचे से उसका सेलफोन उठाकर डैशबोर्ड पर रख दिया।

“विनायक के साथ वाकई कुछ घटित हो रहा था सुबोध।” खुद को संभालने में करीब दो मिनट खर्च करने के बाद फाह्याज़ उससे मुखातिब हुआ। बेहद गंभीर होने पर ही वह अपने मातहत को नाम से या ‘तुम’ संबोधन से संबोधित करता था।

“पर अचानक आपको हो क्या गया था?” सुबोध अब भी हैरतजदा था।

“पता नहीं।” फाह्याज़ रुमाल निकालकर चेहरे का पसीना पोंछते हुए बोला- “आपने अचानक इतना बड़ा धमाका कर दिया कि शायद मेरी बॉडी को समझ में ही नहीं आया कि कैसे रियेक्ट करे।”

“अगर अब आपकी बॉडी रियेक्ट करने के लायक हो गयी हो तो मुझे भी बताएं कि मेरी इनफार्मेशन में कैसा धमाका छिपा हुआ था।” सुबोध ने दोबारा गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

“विनायक को जैसा सपना आया, वैसा ही सपना एक रात मुझे भी आया था। फर्क बस इतना था कि विनायक अपने सपने में खुद वेयरवुल्फ को खून से नहला रहा था जबकि मेरे सपने में मेरी बीवी।”

“त....तो....तो इसका किसी सिनिस्टर से क्या लेना-देना हो सकता है सर?” सुबोध ने आशंकित भाव से फाह्याज़ की ओर देखा- “कभी-कभी तो सपने इससे भी ज्यादा वीयर्ड होते हैं।”

“हाँ, लेकिन दो लोगों को मामूली अंतर के साथ एक ही सपना दिखना पहले

कभी नहीं सुना मैंने।” सुबोध कुछ नहीं बोला तो फाह्याज़ ने आगे कहा- “ये सपना साधारण नहीं है सुबोध। कोई मेसेज छिपा हुआ है इसमें।”

सुबोध एक बार फिर खामोश रहा। हकीकत ये थी कि वह फाह्याज़ के विचार से लेशमात्र भी मुतमईन नहीं था। उसे तो हैरानी हो रही थी कि कुछ देर पहले ही नेक्रोमेंसी के आर्टिकल को बकवास कहकर खारिज करने वाला उसका सीनियर अब खुद एक बकवास की पैरवी कर रहा था।

“आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन मैंने वो सपना जागती आँखों से देखा था।” फाह्याज़ ने कहा- “मैं इतना डर गया था कि किसी छोटे बच्चे की तरह अब्बू के कमरे का दरवाजा पीटने लगा था। मुझे ये परवाह भी नहीं रही थी कि मेरा बेटा मुझे डरा हुआ देखेगा तो क्या सोचेगा मेरे बारे में।”

सुबोध एक बार फिर खामोश रहा।

“तुम...तुम यकीन नहीं कर रहे हो न मेरी बातों पर?”

“मैं तो आपको जानता हूँ सर, मैं तो किसी तरह यकीन कर ही लूँगा।” लम्बे समय बाद सुबोध ने गंभीर स्वर में मौन भंग किया- “लेकिन बाकियों का क्या? किस-किस को यकीन दिलाएंगे हम कि विनायक मानसिक रोगी नहीं था, बल्कि उसके मामले में कोई सुपरनेचुरल इंटरफेयरेन्स था? क्या अब ये केस सुलझाने के लिए हमें एक सपने को डिकोड करना होगा? ओझा और तांत्रिक की मदद लेनी होगी?”

फाह्याज़ ने कोई जवाब देने के बजाय डैश बोर्ड पर पड़ा मोबाइल उठाया और विनायक की छाती पर एक बार फिर नजर फिराने लगा।

“शायद मुझे ये याद आ गया कि इस निशान को मैंने कहाँ देखा है।” थोड़ी देर बाद उसने कहा- “अब बस एक बार कन्फर्म करने की जरूरत है।”

“आपके मैडम की डेथ हुए तो एक साल हो गए हैं न सर?” सुबोध ने फाह्याज़ के कथन को नजरअंदाज करके पूछा।

“हम्म।” फाह्याज़ ने मोबाइल जेब के हवाले करते हुए जवाब दिया।

“जहाँ तक मुझे याद है, उनके मौत की वजह तो एनाफिलैक्टिक शॉक था?”

इस बार फाह्याज़ ने जवाब नहीं दिया। पत्नी के जिक्र मात्र से उसके चेहरे पर उदासी नजर आने लगी थी।

“आयम रियली सॉरी सर।”

“अँधेरा बहुत बेदर्द होता है आचार्य जी।” फाह्याज़ ने गहरी साँस लेकर खोये-खोये लहजे में कहा- “इतना बेदर्द कि किसी की जान लेने से भी नहीं हिचकता है।” उसने आँखें बंद करके सिर हेडरेस्ट पर टिका लिया- “पता नहीं वह रात का कौन सा वक्त था, जब शबनम की नींद खुली थी। रूम में बस नाईट बल्ब की मद्धिम रोशनी थी। मैं देर रात पेट्रोलिंग से लौटा था और कुछ देर पहले ही नींद के हवाले हुआ था इसलिए मुझे जगाना ठीक न समझकर वह अकेली ही वाशरूम जा रही थी कि अँधेरे में सोफे से टकरा कर पेट के बल गिर पड़ी।” फाह्याज़ ने नीचले होंठ को दांतों तले दबाकर गहरी सांस ली और रुंधे गले से आगे कहा- “शी वाज नाइन मंथ प्रेग्नेंट और गिरी भी थी तो ऐसे क्रिटिकल पोज में कि सीवीयर वजायनल ब्लीडिंग स्टार्ट हो गयी थी। हम उसे हॉस्पिटल ले गये, जहाँ डॉक्टर ने ब्लड लॉस बहुत ज्यादा हो जाने के कारण ट्रांसफ्यूजन सजेस्ट किया।” फाह्याज़ के आँखों की कोरों से आँसू की लकीरें बह निकलीं- “ट्रांसफ्यूजन कम्पलीट होने के दो घंटे के अंदर उसकी मौत हो गयी। डॉक्टर ने अनुमान लगाया कि मेडिसिनल रिएक्शन की वजह से उसे सीवीयर एनाफिलैक्टिक शॉक आया, जो उसके सडन डेथ की वजह बन गया।”

सुबोध को सांत्वना के लिए तुरंत कोई शब्द नहीं सूझा।

“अँधेरा मेरे शबनम को निगल गया। न कमरे में अँधेरा होता, न वह गिरती और न ही....।” फाह्याज़ ने गला अवरुद्ध हो जाने के कारण वह कथन अधूरा छोड़ दिया और फिर कुछ पलों बाद लहजा सामान्य हो जाने के बाद बोला- “हो न हो, इसी अँधेरे ने विनायक की भी जिन्दगी निगली है। अँधेरा ही उसकी मौत की वजह बना है क्योंकि ये अँधेरा बेदर्द होता है।”

“पेशेंस रखिए सर।” सुबोध ने फाह्याज़ के चेहरे पर नजर डाली, जो आंसुओं से गीला हो रहा था- “मुझे ये बात शुरू ही नहीं करनी चाहिए थी, आयम रियली सॉरी।”

“कोई नहीं। महीने-दो महीने में एक बार उसके नाम पर आंसू बह निकलते हैं तो दिल को काफी सुकून मिलता है।” फाह्याज़ ने वर्तमान में वापसी की और रुमाल से चेहरा साफ़ करते हुए बोला- “कामरान मियाँ का दौलतखाना अभी कितना दूर है?”

“बस पहुँच गए।” कहने के साथ ही सुबोध के पैर ब्रेक पर जम गए।