युद्ध समाप्त, जर्मनी की हार

ब्रिटेन द्वारा की गई घेराबंदी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी फौजों से कड़ा मुकाबला, अमेरिकी सेना का युद्ध में शामिल होना, अपने देश में राजनीतिक अशांति और भुखमरी, अर्थव्यवस्था की दुर्दशा, नौसेना में बगावत और युद्ध के मैदान में शिकस्त पर शिकस्त का बढ़ता सिलसिला—इन सब परिस्थितियों ने जर्मन सेनापतियों को नवंबर 1918 में मित्र राष्ट्रों के साथ युद्ध-विराम के लिए बातचीत करने पर मजबूर कर दिया।

युद्ध-विराम संधि की शर्तों के अंतर्गत जर्मन सेना को यथावत् बने रहने की अनुमति दे दी गई और उन्हें हथियार डालकर पराजय स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया गया। अमेरिकी जनरल जॉन जे. पार्शिंग को इसके बारे में संदेह था, अत: उसका सुझाव था कि जर्मन सेनापतियों को हार कबूल कर लेनी चाहिए, ताकि कोई शंका न रहे। फ्रांस और ब्रिटेन को यकीन हो गया था कि जर्मनी अब दुबारा सिर उठाने की हिम्मत नहीं करेगा।

जर्मन जनरल स्टाफ को पराजय स्वीकार करने के लिए विवश करने की विफलता का जर्मनी के भविष्य पर भारी असर पड़ा। हालाँकि सेना को बाद में बहुत घटा दिया गया था, फिर भी इसका परिणाम उस समय सामने आया, जब युद्ध के बाद सेना ने लोकतंत्र के बजाय जर्मन राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित एक राजनीतिक ताकत के रूप में अपना संकल्प व्यक्त किया।

जर्मन जनरल स्टॉफ ने भी इस गलत धारणा का समर्थन किया कि युद्धक्षेत्र में सेना की हार नहीं हुई थी, बल्कि यह जीत हासिल करने के लिए लड़ सकती थी, बशर्ते कि घर में विश्‍वासघात न किया गया होता, अर्थात् वही ‘पीठ में छुरा घोंपने’ का ढोल पीटनेवाली बात।

‘पीठ में छुरा घोंपने’ का यह किस्सा बहुत प्रचलित हुआ, विशेषकर उन जर्मन लोगों के बीच, जो हार की बात स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। युद्ध के दौरान एडोल्फ हिटलर के सिर पर इस बात का भूत सवार हो गया था और वह युद्ध के प्रयास की जड़ खोदने के लिए जर्मनी में विशेषकर यहूदियों और मार्क्सवादियों को जिम्मेदार मानता था। हिटलर तथा अन्य बहुत लोगों की दृष्टि में 11 नवंबर, 1918 को युद्ध-विराम संधि पर हस्ताक्षर करनेवाले जर्मन राजनीतिज्ञ ‘नवंबर अपराधी’ समझे जाने लगे थे।

युद्ध-विराम के बाद जर्मन सेना के बचे-खुचे सैनिक युद्ध के मोरचे से बिखरकर घर की ओर चल पड़े, जहाँ उनका भविष्य घोर अनिश्‍चितता में डूबा हुआ था।

जर्मनी एक गणतंत्र था, जो शासन का एक रूप है। जर्मन लोगों का इसमें न तो कोई ऐतिहासिक अनुभव था और न ही इसमें कोई दिलचस्पी उन्हें थी। सम्राट् विल्हैम के गद्दी छोड़ने और होहेनजोलर्न राजतंत्र के पतन के साथ ही 1871 में बिस्मार्क द्वारा स्थापित जर्मन साम्राज्य (द्वितीय जर्मन राज्य) का अंत हो गया था।

नवीन जर्मन रिपब्लिक का संविधान अत्यंत उदार था, जिसे देखकर कहा जा सकता था कि इतिहास में पहली बार किसी आदर्श लोकतंत्र की रूपरेखा कागज पर उतारी गई है। इस संविधान में इन आदर्शों को भी शामिल किया गया था—सबके लिए समानता, राजनीतिक सत्ता केवल जनता के हाथों में नई जर्मन लोकसभा (राइचस्टैग) में राजनीतिक अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, राइचस्टैग में बहुमत में निर्वाचित एक मंत्रिमंडल और चांसलर तथा लोगों द्वारा निर्वाचित एक राष्ट्राध्यक्ष।

लेकिन जर्मनी एक ऐसा राष्ट्र भी था, जो राजनीतिक एवं सामाजिक अराजकता में सराबोर था। बर्लिन और म्यूनिख में वामपंथी मार्क्सवादी गुट रूस जैसी क्रांति लाने का शोर मचा रहे थे तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी फ्रोकोर (भाड़े पर भूतपूर्व सैनिकों की छोटी-छोटी टोलियाँ) नियमित सेना के साथ उनको मुँहतोड़ जवाब देने की तैयारी में थे।

जनवरी 1919 में बर्लिन में और मई में म्यूनिख में साम्यवादियों, समाजवादियों और उनके साथ-साथ बेगुनाह तमाशबीनों को भी गिरफ्तार करके मौत के घाट उतार दिया गया।

जर्मनी में नए लोकतंत्र के नेताओं ने जर्मन जनरल स्टाफ के साथ एक सौदा किया, जिसके अंतर्गत सेनापतियों को इस शर्त पर अपने पद अर्थात् ओहदे एवं विशेषाधिकार बनाए रखने की इजाजत दी गई कि सेना नए गणतंत्र का समर्थन करेगी और मार्क्सवाद का खात्मा करने तथा व्यवस्था बहाल कराने में मदद करेगी।

सन् 1919 की ग्रीष्म ऋतु में एडोल्फ हिटलर अभी तक सेना में था और म्यूनिख में तैनात था, जहाँ वह एक मुखबिर बन गया था। कॉरपोरल हिटलर ने अपनी बैरकों के उन सिपाहियों के नाम बता दिए, जिन्होंने म्यूनिख में मार्क्सवादी आंदोलन का समर्थन किया था और इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें गिरफ्तार करके सूली पर चढ़ा दिया गया।

इसके बाद हिटलर जर्मन सेना में उन गुप्त एजेंटों के दल का सदस्य बन गया, जिनका काम सेना के अंदर मार्क्सवादी समर्थकों की छँटनी करना और विद्रोही राजनीतिक संगठनों की छानबीन करना था।

सेना ने उसे म्यूनिख विश्‍वविद्यालय में आयोजित एक राजनीतिक सिद्धांत-शिक्षण पाठ्यक्रम में भाग लेने के लिए भेज दिया, जहाँ वह जल्दी ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों की नजर में चढ़ गया।

हिटलर के सामी-विरोधी उद्गारों से उसके वरिष्ठ अधिकारी प्रभावित हो गए, जिनमें उसका गुरु कप्तान कार्ल मेयर भी था (जिसकी बाद में बुचेनवाल्ड में मृत्यु हो गई)। अगस्त 1919 में हिटलर को वापस आनेवाले युद्धबंदियों को साम्यवाद और शांतिवाद तथा लोकतंत्र एवं अवज्ञा के खतरों पर व्याख्यान देने का काम सौंपा गया। उसने यहूदियों के खिलाफ भी लंबे-लंबे निंदापूर्ण भाषण दिए, जिनका थके-हारे सैनिकों ने स्वागत किया; क्योंकि वे भी अपने दुर्भाग्य का दोष किसी के सिर मढ़ने की खोज में थे।

सेना की एक रिपोर्ट में हिटलर को ‘एक जन्मजात वक्ता’ बताया गया।

हिटलर को यह जानकर बहुत खुशी हुई कि वह अजनबी श्रोताओं के समक्ष बोलने की क्षमता रखता है, उनका ध्यान बाँधे रख सकता है और उन्हें अपने दृष्टिकोण के अनुरूप मोड़ सकता है।

हिटलर को अगली बार सितंबर 1919 में म्यूनिख में जर्मन वर्कर्स पार्टी के नाम से ज्ञात एक छोटे से गुट की जाँच-पड़ताल का काम सौंपा गया।