मारियो गोवानी, मोहिते से बात करने के बाद एयरपोर्ट पर हक्का-बक्का खड़ा था । मोहिते से बात पूरी नहीं हो सकी थी और फोन बीच में ही कट गया था । परंतु उसके मस्तिष्क में तो बम घूम रहा था जो मोहन भौंसले ने बनाया था । सवाल ये था कि अब वो बम कहाँ था ?

क्या प्लेन में, मोहन भौंसले के पास है ?

मोहन भौंसले का इरादा सच में प्लेन को उड़ाने का है ?

मोहन भौंसले ऐसा क्यों करेगा ? इस डकैती में उसे दस करोड़ मिल रहा है । दस उसकी पत्नी को मिलेगा । दस उसके भाई को मिलेगा तो वो ऐसी हरकत क्यों करेगा ? परंतु बम तो उसने बनाया ही है । वो बम कहाँ है ? 

मारियो गोवानी के माथे पर पसीने की नन्ही बूँदें उभर आईं । व्याकुल हाव-भाव को वो संभाले हुए था ।

तभी पास में किसी के आ खड़े होने का आभास हुआ । मारियो गोवानी ने उसे देखा । वो कोई अंजान आदमी था ।

"क्या बात है मारियो ?" वो व्यक्ति धीमे स्वर में बोला ।

मारियो गोवानी चौंका ।

वो देवराज चौहान की आवाज थी ।

"तुम ?" मारियो गोवानी के होंठों से निकला, "मैं तुम्हें ही फोन करने जा रहा था । मोहिते ने मुझे ऐसी खबर दी है कि जिससे लगता है, बहुत भारी फसाद खड़ा होने वाला है । तब हममें से कोई भी नहीं बच पायेगा । तुम्हारा साथ देकर ग़लती की मैंने ।"

"बात क्या है ?" मेकअप से चेहरा बदले खड़े, देवराज चौहान की आँखें सिकुड़ीं ।

"व... वो मोहन भौंसले, क्या अपने साथ सच में बम लेकर प्लेन में गया है ?"

"पागल हो क्या ? तुम जानते ही हो कि एयरपोर्ट का सिस्टम हिलाने के लिए ये अफवाह फैलाई जा रही है कि सबका ध्यान इस तरफ हो जाये और हम कारगो के वाल्ट से सोना ले जाएँ ।" देवराज चौहान ने शांत और धीमे स्वर में कहा, "प्लेन में चढ़ने वाले यात्रियों की इतनी तगड़ी चेकिंग होती है कि बम तो क्या, प्लेन में कोई ग़लत चीज नहीं ले जाई जा सकती । तुम्हारा इस तरह सोचना भी... ।"

"मैं सोच नहीं रहा, बता रहा हूँ कि पिछले दिनों मोहन भौंसले ने बम बनाया था ।" मारियो हड़बड़ाकर बोला ।

"क्या ?"

"मोहिते उसके फ्लैट पर मौजूद है । वहाँ उसे बम बनाने का सामान मिला है । उसका कहना है कि इन दिनों मोहन भौंसले ने बम बनाया है । तुम ही सोचो कि वो तुम्हारे साथ इस डकैती की योजना में शामिल था । ऐसे मौके पर वो बम बनाता है तो क्यों बनाएगा ? कुछ करने का इरादा रखता होगा, तभी बनाएगा । वो बम बनाना जानता था क्या ?"

"जानता था ।" देवराज चौहान की आवाज में कठोरता आ गई ।

"तब तो मोहिते सही कहता है कि मोहन भौंसले प्लेन में बम ले गया है । वो सच में प्लेन उड़ाने का इरादा रखता है ।"

"नहीं !" देवराज चौहान के होंठों से निकला, "ये नहीं हो सकता ।"

"कैसे नहीं हो सकता ? यही हो रहा है । वो प्लेन को उड़ा देगा । उसमें यात्री भरे पड़े हैं। हम सब भी फँसेंगे । पुलिस जान लेगी कि असल मामला क्या है । ये तो बहुत ही बुरा होगा... ।"

"मोहन भौंसले ऐसा कदम क्यों उठाएगा ?" देवराज चौहान के होंठ भिंच गए ।

"ये तो वो जाने, उसकी पत्नी जाने या उसका भाई प्रताप जाने । क्योंकि वो घर में रहकर बम बना रहा था तो उनको भी ये जानकारी होगी । ये तो बहुत बुरा होने वाला है ।"

"कुछ नहीं होगा ।" देवराज चौहान कुछ परेशान दिखा, "मोहन भौंसले ऐसा कुछ नहीं करेगा ।"

"तो उसने बम क्यों बनाया ? अब वो बम कहाँ है ?" मारियो गोवानी, देवराज चौहान को देखने लगा ।

देवराज चौहान ने वहाँ से कुछ दूर बैठी सोनिया भौंसले को देखा । उसके पास वानखेड़े या अन्य लोग खड़े थे । वानखेड़े इस वक़्त मोबाइल से बातें करता नजर आ रहा था ।

"उसकी पत्नी जानती है कि मोहन भौंसले क्या करने वाला है ।" मारियो गोवानी ने चिंता भरी निगाह दूर सोनिया पर मारी, "इस वक़्त तो हम उससे इस बारे में बात भी नहीं कर सकते... ।"

"प्रताप, उसका भाई बता सकता है, अगर मोहन का इरादा कुछ और है तो ।" देवराज चौहान बोला, "पर ऐसा लगता नहीं कि ऐसा कुछ होगा । प्लेन में बम ले जाना असंभव बात है । वो कैसे... ।"

"तो वो बम कहाँ है, जो मोहन भौंसले ने बनाया है ?"

देवराज चौहान कुछ कहे बिना मारियो गोवानी के पास से हट गया ।

■■■

वानखेड़े ने फोन बंद किया और पास खड़े इंस्पेक्टर प्रकाश भेड़े को चार कदम की दूरी पर ले गया । वानखेड़े के चेहरे पर चिंता दिख रही थी । भेड़े उसके चेहरे पर निगाह मारकर बोला ।

"क्या बात है ?"

"भारी गड़बड़ होने वाली है ।" वानखेड़े गंभीर स्वर में बोला, "मुझे पहले महसूस हुआ था कि प्लेन में सवार मोहन भौंसले बम होने का सिर्फ ड्रामा कर रहा है । ऐसा करना उसके किसी योजना का हिस्सा है । लेकिन अब पता चला है कि वो सच में बम प्लेन के भीतर ले जाने में कामयाब हो गया है । वो बम बना रहा था, कुछ दिन पहले ।"

"ये पक्की खबर है ?" 

"अभी तक की तो पक्की खबर है ।"

"मतलब कि प्लेन में बम फटेगा ?"

"पता नहीं !" वानखेड़े की निगाह सोनिया भौंसले पर जा टिकीं, "मोहन भौंसले घर में रहकर बम बना रहा होगा तो उसकी पत्नी को भी पता होगा कि वो किस फेर में है । परंतु इस वक़्त सोनिया से हमें दूसरा काम लेना है ।"

"क्या ?"

"उसकी मोहन भौंसले से बात कराई जाएगी, ताकि वो मोहन भौंसले को विस्फोट करने से रोक सके । उसे समझा सके ।"

"हमें इस औरत से पूछताछ... ।"

"वक़्त बर्बाद मत करो । पूछताछ बाद में भी हो जाएगी । इस वक़्त हमें प्लेन को बचाने की कोशिश करनी है । सोनिया से अभी कुछ मत पूछो, उससे प्लेन को बचाने का काम लो।" वानखेड़े ने कहा, "एयरपोर्ट पर रेड अलर्ट घोषित करने की जरूरत पड़ सकती है । अगर मोहन भौंसले मान गया तो प्लेन को हम सीधा मुम्बई ही लाने को कहेंगे ।"

"लेकिन वानखेड़े... ।"

तभी डिप्टी कंट्रोलर तेजी से पास आता दिखा । वो घबराया हुआ दिख रहा था ।

"प्लेन पर बुरे हालात हैं । पायलट कहता है कि मोहन भौंसले विमान को उड़ा देने पर आमादा है । उस काले ब्रीफकेस का कुछ पता नहीं चल रहा । मोहन भौंसले स्पष्ट कहता है कि वो विमान को उड़ा देगा ।"

"उड़ा देगा ?" वानखेड़े के चेहरे पर गुस्सा उभरा ।

"हाँ ! वो कहता है कि उसकी पत्नी ने उससे दगाबाजी की है । इसी बात का बदला ले रहा है वो ।" डिप्टी कंट्रोलर ने थूक निगलकर कहा, "प्लेन में डेढ़ सौ यात्री हैं । आसमान में बम फट गया तो तबाही मचा जाएगी ।"

"पायलट से कहो कि उसे किसी तरह संभाले ।" प्रकाश भेड़े ने कहा ।

"पायलट ने बहुत कोशिश कर ली । परंतु कोई फायदा नहीं हो रहा । क्रू मेम्बरों ने प्लेन से काले ब्रीफकेस को ढूँढने की चेष्टा की, लेकिन वो नहीं मिला । वहाँ सबके हाथ-पाँव फूले पड़े हैं । मुसाफिर भी संशय में हैं कि विमान में भाग-दौड़ क्यों मची है । अगर यात्रियों को पता चल गया कि मामला क्या है तो विमान में तूफान उठ खड़ा होगा । तब यात्रियों को संभाल पाना कठिन हो जाएगा । वहाँ हालात और भी बिगड़ सकते हैं । मैंने पायलट से कह दिया है कि वो दिल्ली कंट्रोल से सम्पर्क करें और उन्हें बताये कि वो किन हालातों में वापस लौट रहा है ।"

"विमान वापस दिल्ली लौट रहा है ?" वानखेड़े के होंठ भिंच गए ।

"हाँ, मैंने उसे वापस आने का आदेश दिया है ! भगवान से यही प्रार्थना करो कि दिल्ली लैंड करने से पहले उसमें बम विस्फोट न हो जाये । ऐसा हुआ तो बहुत बुरा... ।"

"उसकी पत्नी की बात उससे करानी चाहिए ।" वानखेड़े बोला ।

"सोनिया भौंसले की ?" डिप्टी कंट्रोलर की निगाह सोफे पर बैठी सोनिया की तरफ उठी । उसके पास दोनों होस्टेस और इंस्पेक्टर सूरज के अलावा, एयरपोर्ट के दो-तीन अधिकारी खड़े दिख रहे थे ।

"सोनिया भौंसले का कहना है कि मोहन भौंसले जिद्दी किस्म का व्यक्ति है और उसे, वही सम्भाल सकती है । मेरे ख्याल में उसे, मोहन से बात करने का मौका देना चाहिए ।" वानखेड़े, सोनिया की तरफ बढ़ गया ।

प्रकाश भेड़े के चेहरे पर गंभीरता नाच रही थी । 

पास पहुँचकर वानखेड़े ने सोनिया से कहा ।

"तुम्हारा पति प्लेन को बम से उड़ा देना चाहता है ।"

"वो जिद्दी है । जो सोच लेता है, वो करके ही... ।" सोनिया ने दुखी स्वर में कहना चाहा ।

"तुमने कहा था कि तुम उसे समझाकर रास्ते में ला सकती हो ?" वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा ।

"शायद वो मेरी बात मान जाए । मेरी उससे बात करा दो ।" सोनिया ने जल्दी से वानखेड़े से कहा ।

"चलो, हम तुम्हारी बात उससे कराने जा रहे हैं । तुमने मोहन को हर हाल में समझाना है कि वो अपना इरादा छोड़ दे । बेगुनाह लोगों की जान मत ले । जैसे भी हो, उसे बम विस्फोट से रोकना है ।"

■■■

पायलट की आवाज विमान में गूँज रही थी । यात्रियों को बताया जा रहा था कि श्रीनगर में मौसम खराब होने की वजह से वहाँ लैंडिंग नहीं हो पाएगी । इसलिए प्लेन को वापस दिल्ली ले जाया जा रहा है ।

यात्रियों के चेहरे पर नाराजगी उभरी, कईयों ने एतराज उठाया । परंतु प्लेन ने तो वापस जाना ही था । यात्रियों को प्लेन के वापस मोड़े जाने का स्पष्ट अहसास हुआ । तभी सीनियर होस्टेस(आई०एफ०एम०) सीट पर बैठे मोहन भौंसले के पास पहुँची ।

"आपको कप्तान साहब बुला रहे हैं ।"

मोहन भौंसले ने मुस्कुराकर होस्टेस को देखा ।

होस्टेस के चेहरे पर घबराहट थी ।

"आइए सर, देर मत कीजिये !" होस्टेस व्यग्रता से कह उठी, "आपकी पत्नी आपसे बात करने के लिए लाइन पर हैं ।"

"मेरी पत्नी । वो कमीनी अब क्या कहना चाहती है ?" मोहन भौंसले एकाएक कड़वे स्वर में कह उठा ।

"वो आपसे बात करना चाहती है ।"

"जरूर बात करूँगा ।" मोहन भौंसले उठते हुए बोला, "आखिरी बार बेवफा औरत से जरूर बात करूँगा ।"

होस्टेस और मोहन भौंसले आगे बढ़कर विमान में लगे पर्दे के पीछे चले गए ।

होस्टेस उसे लेकर कॉकपिट में पहुँची जहाँ पायलट और सह-पायलट सीटों पर बैठे, विमान को हवा में भगा रहे थे । दोनों के चेहरे फक्क नजर आ रहे थे । उन्हें आया पाकर सह-पायलट ने तुरंत सिर से हेडफोन उतारा और खड़े होकर, मोहन भौंसले की तरफ हेडफोन बढ़ाता कह उठा ।

"ये लगा लीजिए । दूसरी तरफ आपकी पत्नी सोनिया भौंसले है । वो आपसे बात करना चाहती है । मेरी सीट पर बैठ जाइए । वो रो रही है और आप कहते हैं कि उसने दगाबाजी की है ।"

"औरतों के रंग तुमने देखे ही कहाँ हैं जो मुझे समझाने चले हो ।" मोहन भौंसले ने उससे हेडफोन लेकर सिर पर लगाया और सीट पर बैठते कह उठा, "पल-पल में ये मौसम से भी तेजी से रंग बदलती है औरतें ।"

"नहीं मोहन !" तभी हेडफोन के जरिये मोहन भौंसले के कानों में सोनिया की सुबकती आवाज पड़ी, "ऐसा मत कहो । मैंने हमेशा ही तुम्हें दिल से चाहा है । तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, बस एक ग़लती हो गई और तुम्हारी नजर मेरे लिए काली हो गई । कितनी बार तो तुमसे माफी माँग चुकी हूँ । एक बार मुझे माफ़ करके तो देखो कि भविष्य में मैं तुमसे कितना प्यार करूँगी । अपने प्यार से भर दूँगी तुम्हें कि तुम... ।"

"तुम घटिया औरत ।" मोहन भौंसले गुर्रा उठा, "तुम्हारे पास प्यार है ही नहीं । तुम तो गद्दार औरत हो । मैंने तुम्हें कितना प्यार किया । कितनी इज्जत दी । बियर बार से उठाकर, अपने घर में लाया । रानी बनाया परंतु तुम इस लायक ही नहीं थी । तुम सिर्फ बियर बार में ही सज सकती हो, घर पर नहीं ।"

"प्लीज मोहन ! भगवान के लिए होश में आओ । मैं तुम्हारी हूँ ।" उधर से सोनिया की रोती आवाज कानों में पड़ रही थी, "तुमने मुझे ग़लत समझा है । बस मेरी एक ग़लती को माफ कर... ।"

"कभी नहीं । तुम बेवफा हो, तुम गद्दार... ।"

"ऐसा मत कहो । मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ ।" दूसरी तरफ सोनिया रो रही थी ।

"प्यार ? मैंने तो तुम्हारा प्यार कभी देखा ही नहीं । तुम तो... ।"

"एक बार मुझे माफ़ कर दो मोहन । सिर्फ एक बार की तो बात है । फिर कभी ग़लती हो तो... ।"

"तुम पर भरोसा करना तो... ।"

"मैंने आज तक तुम्हें जो प्यार किया है, उसे क्यों भूलते हो मोहन । वही सोनिया हूँ मैं जिसकी आँखों में तुम आँसू देखकर तड़प उठते थे और आज मुझे इस कदर रुला रहे... ।"

"तुमने मुझे धोखा दिया । किसी और के साथ... ।"

"अब ऐसा नहीं होगा । तुम्हारी कसम । पता नहीं कैसे मुझसे ये सब हो गया ।"

मोहन भौंसले के चेहरे पर तनाव था । गुस्सा था । वो चुप रहा ।

"और ये तुम क्या कर रहे हो ?" सोनिया की भर्राई आवाज पुनः कानों में पड़ी, "मैंने सुना है तुम प्लेन को बम से उड़ाने जा रहे हो जिसमें डेढ़ सौ यात्री मौजूद हैं । ऐसा पाप मत करो । उन लोगों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है । जान लेनी है तो मेरी लो । मैंने तुम्हारे दिल को तकलीफ पहुँचाई है । मासूम लोगों की जान क्यों ले रहे हो । कुछ भी ग़लत मत करो मेरी जान । वापस घर लौट आओ । मेरी बाँहों में आ जाओ मोहन ।"

"तुम... तुमने मुझे धोखा... ।"

"अपनी सोनिया को माफ नहीं करोगे । एक बार माफ करके तो देखो । मैं सब ठीक कर दूँगी । तुम नहीं जानते कि मेरी क्या हालत हो रही है । जो पत्र तुम मेरे लिए छोड़ आये थे, उसे पढ़ने के बाद तो मैं पागल हो गई हूँ । मेरा मोहन कितना अच्छा है और प्लेन को बम से उड़ा देगा । सैकड़ों मासूम लोगों की जान मेरा मोहन नहीं ले सकता । मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि तुम ऐसा कर सकते हो । लौट आओ मोहन । अपनी सोनिया के पास आ जाओ ।"

मोहन भौंसले ने आँखें बंद कर लीं ।

"मोहन !" हेडफोन से होकर सोनिया की आवाज उसके कानों में प्रवेश कर गई ।

मोहन ने आँखें नहीं खोली । बगल की सीट पर बैठा पायलट, सिर पर लगे हेडफोन के माध्यम से सारी बातचीत सुन रहा था । उसने गर्दन घुमाकर गंभीर निगाहों से मोहन को देखा। परंतु मोहन की आँखें बंद थीं । होंठ भिंचे हुए थे । सह-पायलट और होस्टेस घबराए-से खड़े मोहन को देख रहे थे ।

"मोहन, मेरे प्यारे मोहन !" सोनिया की आवाज पुनः मोहन के कानों में पड़ी ।

मोहन भौंसले ने आँखें खोलीं । होंठों में अभी कसाव था ।

"तुम बोलते क्यों नहीं मोहन ? मेरी बात का जवाब दो । अपनी सोनिया से बात करो मोहन... तुम्हारी आवाज नहीं सुनूँगी तो मर जाऊँगी मैं । मेरी जान अब तुम्हारे ही हाथ में...।"

"मैं... मैं तुमसे बहुत ज्यादा नाराज हूँ सोनिया ।" मोहन भौंसले की आवाज में जहान भर की थकान भर आई थी ।

"मैं तुम्हारी सारी नाराजगी दूर कर दूँगी ।" सोनिया की सुबकती आवाज कानों में पड़ी, "एक बार मेरी बाँहों में आ जाओ । अपनी सोनिया के पास आ जाओ । तुम्हें देखने को आँखें तरस रही हैं ।"

मोहन भौंसले की आँखों में आँसू चमक उठे ।

"मान भी जाओ मोहन । तुमने अपनी सोनिया की हर बात मानी है । एक बात और मान जाओ । लौट आओ मेरे पास । मैं तुम्हारी राह में पलकें बिछाए इंतजार कर रही हूँ । आ रहे हो न मोहन मेरे... ।"

"ह... हाँ सोनिया ! मैं... मैं आ रहा हूँ ।" मोहन भौंसले ने भर्राए स्वर में कहा, "मैं जरूर आऊँगा । ।सीधा तुम्हारे पास आऊँगा । अपने सोनिया के पास... परंतु... ।"

"अब क्या हो गया मोहन ?"

"ये प्लेन तो दिल्ली जा रहा... ।"

"वो तुम फिक्र मत करो । एक मिनट रुको । लाइन पर रहना, मैं अभी तुमसे बात करती हूँ ।" सोनिया के इन शब्दों के साथ ही लाइन पर खामोशी छा गई । मोहन भौंसले गंभीर अंदाज में बैठा रहा । आधा मिनट ही बीता होगा कि सोनिया की आवाज आई । वो कह रही थी, "मोहन ! मोहन, मैंने बात कर ली है । प्लेन सीधा मुम्बई ही आएगा । दिल्ली एयरपोर्ट पर नहीं उतरेगा । जब तुम प्लेन से निकलोगे तो अपने सामने मुझे पाओगे मोहन । आ जाओ मोहन, मैं बेसब्री से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ ।"

"मैं आ रहा हूँ सोनिया ।" मोहन भौंसले की आवाज में तड़प थी ।

"वो बम... वो... ।"

"अब प्लेन में बम नहीं फटेगा । मैं मरना नहीं चाहता । मैं... मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ।"

बातचीत खत्म हो गई ।

हेडफोन उतारकर मोहन भौंसले कुछ पलों तक सीट पर ही बैठा रहा । फिर उठा ।

"अब तो तुम प्लेन में विस्फोट नहीं करोगे न ?" पायलट सूखे स्वर में कह उठा ।

"नहीं, अब प्लेन में बम नहीं फटेगा ।" मोहन भौंसले ने भारी स्वर में कहा ।

"वो... वो बम... ।"

"उसे भूल जाओ । मैं भटक गया था । अब प्लेन सुरक्षित मुम्बई एयरपोर्ट पर लैंड करेगा ।" मोहन भौंसले ने कहा और कॉकपिट से बाहर निकल गया ।

वापस विमान के यात्रियों के पास पहुँचा । अपनी सीट पर बैठने लगा तो एक यात्री बोला ।

"क्या बात है मिस्टर, ये प्लेन वाले बार-बार तुम्हें क्यों बुला रहे हैं ? ये सब क्या हो रहा... ।"

"वो लोग सोचते हैं कि मैं प्लेन को बम से उड़ाने जा रहा हूँ ।" मोहन भौंसले ने गंभीर स्वर में कहा ।

मोहन भौंसले का इतना कहना था कि यात्रियों में हड़कंप मच गया ।

"बम... बम... ?"

"बम कहाँ है ?" स्वर उभरने लगा ।

"तुम वास्तव में ऐसा करने वाले हो ?"

"सोचा तो था, पर अब इरादा बदल गया है ।" मोहन भौंसले ने कहा और अपनी सीट पर बैठ गया ।

लेकिन विमान के भीतर का माहौल बदल गया । शोर-शराबा और घबराहट फैलती चली गई । क्रू मेंबर किसी तरह यात्रियों को शांत करने लगे । पायलट भी आ गया परंतु हंगामा मचा रहा ।

■■■

फ्लाइट नम्बर 317 अब सीधी मुम्बई एयरपोर्ट की तरफ आ रही थी । ऐसे में एयरपोर्ट पर खामोश हलचल-सी पैदा हो गई थी । हर कोई अपनी तैयारी में इधर-उधर भागता दिखाई दे रहा था । आने वाला वक़्त खतरनाक हो सकता था । प्लेन में बम था । लैंडिंग के वक़्त कुछ भी हो जाने की संभावना थी ।

एम्बुलेंस को बुलाने के लिए फोन बजने लगे ।

फायर ब्रिगेड को तुरंत एयरपोर्ट पहुँचने को कहा जाने लगा ।

पुलिस बल मँगाया जाने लगा ।

इस सारी भागदौड़ में वानखेड़े पूरी तरह शामिल हो चुका था । परंतु वो अजीब-सी चिंता में था । उसके दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था । एयरपोर्ट पर हलचल मच चुकी थी ।

■■■

देवराज चौहान ने एक तरफ हटकर जगमोहन को फोन किया । वो बार-बार मारियो गोवानी को देख रहा था जो कि कॉफ़ी काउंटर के पास खड़ा, कॉफ़ी के घूँट ले रहा था । जगमोहन से बात हो गई ।

"तुम कहाँ हो ?" देवराज चौहान का स्वर गंभीर था ।

"वहीं, एयरपोर्ट के बाहर, पास के जंगल में ।"

"प्रताप तुम्हारे पास है ?"

"हाँ, प्रताप भी है, काका मेहर भी, ललित कालिया, रवीना और जैकी । परंतु तुम प्रताप को क्यों पूछ... ।"

"मेरी बात सुनो ।" देवराज चौहान ने बेचैनी से कहा, "ये हमारी मात्र खाली-खाली बात थी कि मोहन भौंसले बम लेकर प्लेन में सवार हो गया है और प्लेन को उड़ा देना चाहता है लेकिन शायद ये सच हो जाए ।"

"क्या मतलब ?" उधर से जगमोहन चिहुँक उठा ।

"पिछले कुछ दिनों से मोहन भौंसले ने अपने फ्लैट में बम बनाया है ।"

"नहीं... ।"

"ये सच है । मोहिते, मोहन के फ्लैट में गया । वहाँ तलाशी ली तो ये बात सामने आई। मोहन भौंसले बम रहा था और शायद वो सच में प्लेन में, किसी प्रकार बम ले जाने में सफल हो गया था । जरूर वो सच में प्लेन में विस्फोट करना... ।"

"ये पागलपन है । मोहन भौंसले ऐसा क्यों करेगा ?"

"इस बात का जवाब तो सोनिया या प्रताप ही दे सकते हैं । क्योंकि मोहन भौंसले जहाँ बम बना रहा था, वहाँ ये दोनों भो मौजूद थे । तुम्हें ये बात प्रताप से पूछनी होगी कि मोहन क्या करने का इरादा रखता... ।"

"ये सम्भव ही नहीं ।" जगमोहन का तेज स्वर कानों में पड़ा, "प्रताप या सोनिया को ऐसा कुछ होने की जरा भी भनक होती तो वो फौरन इस काम से दूर हो जाते । लेकिन वो तो हमारे साथ काम कर रहे हैं ।"

"तुम प्रताप से बात करो ।"

"ठीक है, मैं... ।"

"अगर प्लेन में विस्फोट हो गया तो देर-सवेर में पुलिस आसानी से जान लेगी कि इस मामले में हम थे । इस तरह हवा में प्लेन को उड़ा देना बहुत ही संगीन जुर्म है और हम पर दाग लग जायेगा । तब कानून हमें नहीं छोड़ेगा । बहुत बुरी मौत मिलेगी हमें कि हमने प्लेन के बेगुनाह मुसाफिरों को दर्दनाक मौत... ।"

"पर हमें नहीं मालूम कि मोहन भौंसले का ऐसा कोई इरादा... ।"

"ये बात तुम कानून को नहीं समझा सकते कि ये काम हमारी जानकारी में आये बिना हुआ ।" देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा, "प्रताप से बात करके मुझे बताओ कि मामला क्या है ?"

"ये बात मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही है कि मोहन विमान को बम से उड़ा देगा । वो अपनी जान क्यों गँवायेगा । वो तो दस करोड़, बीस करोड़ कमाने का इरादा रखता है । वो भला क्यों... ।"

"प्रताप से बात करके मुझे फोन करो ।" कहकर देवराज चौहान ने फोन बंद कर दिया ।

■■■

सोनिया लाउन्ज में उसी सोफे पर बैठी थी । पास में इंस्पेक्टर सूरज और दोनों होस्टेस थीं । यदा-कदा डिप्टी कंट्रोलर वहाँ का चक्कर परेशानी भरे अंदाज में लगा जाता था । सोनिया के होंठ पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें मोतियों की तरह झिलमिला रही थीं । माथे पर भी हल्का पसीना था । अब उसकी आँखों की चमक वापस आ चुकी थी । मन-ही-मन में वो सोच रही थी कि सब कुछ प्लान के मुताबिक ही चल रहा है । देवराज चौहान डकैती कर ले जाएगा ।

तभी वानखेड़े वहाँ पहुँचा ।

सोनिया ने सिर उठाकर वानखेड़े को देखा । वानखेड़े की गंभीर निगाह सोनिया पर थी। वो पास ही सोफे पर बैठ गया । चेहरे पर परेशानी स्पष्ट झलक रही थी ।

"अपने पति से बात करके तुम्हें अच्छा लगा मैडम ?" वानखेड़े ने पूछा ।

"हाँ, वो मुझसे नाराज है । पर अब ठीक हो जाएगा ।"

"तुम्हें यकीन है कि अब वो प्लेन में विस्फोट नहीं करेगा ?"

"पूरा यकीन है कि अब वो ऐसा नहीं करेगा ।"

"उसका मन बदल गया तो ?"

"नहीं बदलेगा । अब वो मेरे पास आना चाहता है । ये बात उसने कही है । गुस्सा उसके सिर से उतर गया है ।" सोनिया ने गंभीर स्वर में कहा, "इंस्पेक्टर जब वो मुम्बई एयरपोर्ट पर आएगा तो तुम लोग उसे गिरफ्तार कर लोगे न ?"

वानखेड़े, सोनिया को देखता रहा फिर बोला ।

"मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ और मुझे आशा है कि तुम सच बोलोगी ।

"मैं अब तक सच ही बोल रही हूँ ।"

"बीते दिनों मोहन भौंसले कहाँ पर था ?" वानखेड़े ने पूछा ।

"अपने घर पर ।"

"तुम भी घर पर थी ?"

"हाँ ! क्यों पूछ रहे हो ?"

"घर पर रहकर वो क्या करता रहा ?"

"पता नहीं ।" सोनिया ने भोलेपन से कहा ।

"पता नहीं ?" वानखेड़े के होंठ भिंच गए ।

"नहीं ।"

"कितने कमरों का घर है तुम्हारा ?"

"दो कमरों का ।"

"दो कमरों का छोटा-सा घर है और तुम्हें ये पता नहीं कि मोहन भौंसले घर में रहकर क्या करता रहा ।" वानखेड़े धीमे स्वर में गुर्रा उठा ।

"नहीं पता ।" सोनिया ने शांत स्वर में कहा, "वो मेरे से नाराज होकर खुद को कमरे में बन्द रखता था ।"

"कमरे से बाहर भी तो आता होगा । घर से बाहर भी जाता होगा तो... ।"

"कमरे पर ताला लगा देता था । मुझे भीतर नहीं देखने देता था ।"

"तुमने पूछा नहीं कि ऐसा क्यों... ।"

"वो मेरे से नाराज था । मेरी किसी बात का जवाब नहीं देता था ।" सोनिया ने गंभीर स्वर में कहा, "उसकी नाराजगी की हद तो आप देख ही रहे हैं कि वो बम लेकर प्लेन में जा चढ़ा है ।"

"वो उस बन्द कमरे में बम बना रहा था मैडम ।"

"क्या ?" सोनिया की आँखें सिकुड़ीं ।

"वो कमरे में बम बना रहा था । अभी पुलिस ने उसके घर की तलाशी ली तो वहाँ बम तैयार करने का सामान मिला है ।"

"नहीं ।" सोनिया के होंठों से निकला ।

वानखेड़े ने गहरी निगाहों से सोनिया को देखा ।

"वो कितने दिन से कमरे में बन्द था ?"

"आठ-नौ दिन से ।" सोनिया बेचैन दिखी ।

"अब मैं तुमसे सीधी बात कर रहा हूँ कि वो बम बना रहा था परंतु प्लेन में वो बम लेकर नहीं गया ।"

"म... मैं समझी नहीं ।"

"प्लेन की अच्छी तरह तलाशी ली गई है, परंतु वहाँ बम नहीं है । सच बात तो ये है कि इतनी सिक्योरिटी और चेकिंग के बीच बम को प्लेन में ले जाना संभव ही नहीं हो सकता ।"

"व... वो प्लेन में बम लेकर गया है ।"

"ये झूठ है । मैं जानता हूँ कि तुम कोई खेल खेल रही हो । मैं खेल की वजह जानना चाहता हूँ ।"

"वजह ? खेल ?" सोनिया, वानखेड़े को देखने लगी ।

"मोहन भौंसले, यानी कि तुम्हारा पति प्लेन में बम लेकर नहीं गया । तुम्हें ये बात पहले से ही पता है । फिर तुमने एयरपोर्ट पर आकर बम की बात क्यों फैलाई ? ये सब क्यों किया जा रहा है ?"

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है इंस्पेक्टर । मैंने तुम्हें मोहन का लिखा वो पत्र भी दिखाया... ।"

"वो पत्र मोहन ने लिखकर तुम्हें दिया हो सकता है ।"

"तुम्हारा मतलब कि मैं जो कर रही हूँ, मोहन जो कर रहा है, वो सब ड्रामा है ।" सोनिया का स्वर तेज हो गया ।

"यही मेरा मतलब है ।"

"तुम बकवास कर रहे... ।"

"तुमने अपने पति से एक बार बात की और वो प्लेन में बम न फोड़ने की बात मान गया । जबकि वो तुमसे ही नाराज था । इतनी आसानी से वो अपनी नाराज बीवी की बात मान... ।"

"वो मेरा पति है । मैं जानती हूँ कि उसे कैसे संभाला जा सकता है ।" सोनिया कह उठी।

"जब तुम बाथरूम गई थी, मैं तुम्हारे पीछे था । मैंने तुम्हें बाथरूम न जाकर, आगे सीढ़ियों पर जाते देखा, जिसके सामने फोन बूथों की कतार है । तुम सीढ़ी पर खड़ी हो गई और फिर तुमने एक ऐसे बूथ की तरफ अंगड़ाई लेकर खास ढंग से इशारा किया, जिसमें कि पहले से ही एक आदमी मौजूद था । तुम्हारा इशारा पाकर वो आदमी कहीं फोन करने लगा था ।"

सोनिया के चेहरे के रंग बदले ।

वानखेड़े ने बदलते रंगों वालों चेहरे को स्पष्ट पहचाना ।

"म... मैंने ऐसा कुछ नहीं किया ।" सोनिया ने तुरंत खुद को संभाला ।

"तुमने किया था । मैंने देखा था ।" वानखेड़े ने अपने शब्दों पर जोर दिया, "बोलो, क्या चक्कर चल रहा है ?"

"तुम ।" सोनिया के आँखों में आँसू चमक उठे, "मुझ पर इल्जाम लगा रहे... ।"

"सच-सच मुझे बता दो कि... ।"

"इससे तो अच्छा होता कि मैं यहाँ आती ही नहीं । प्लेन में बम फटने देती ।" आँसू सोनिया के गालों पर आ गए ।

"एक बात और भी शक के दायरे में है मैडम ।" वानखेड़े कठोर स्वर में बोला, "उस प्लेन का मुम्बई एयरपोर्ट पर लाया जाना जबकि वो दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरने वाला था । खासतौर से ऐसे प्लेन को यहाँ क्यों... ।"

"तुम भी तो मेरी और मोहन की बातचीत सुन रहे थे । मोहन ने कहा था कि वो सीधा मेरे पास आना चाहता है । तब मैंने तुम सब लोगों से पूछा था कि उसे क्या कहूँ तो तुम लोगों ने कहा था कि उसे कह दूँ, प्लेन मुम्बई एयरपोर्ट पर ही उतारा जाएगा । इसमें कौन-सी ग़लत बात हो गई ?" सोनिया की आँखों में आँसू थे ।

"मेरी निगाहों में प्लेन को मुम्बई ले जाने की बात कहना ही ग़लत है ।"

"क्यों ?"

"ये मैं ही समझ सकता हूँ और शायद तुम भी समझ रही हो । मेरे ख्याल में तुम और मोहन भौंसले ड्रामा कर रहे हो । इस ड्रामे की आड़ में कोई खेल खेला जाएगा । तुम जानती हो कि वो क्या खेल... ।"

"तुम क्यों मुझे परेशान कर रहे हो । मैंने तो एयरपोर्ट पर आकर भला ही किया... ।"

"मोहिते कौन है ?" एकाएक वानखेड़े ने पूछा ।

"कौन मोहिते ?"

"जो इस वक़्त तुम्हारी योजना में शामिल है । जो तुम्हारे फ्लैट पर कुछ देर पहले पहुँचा और उसने वहाँ से मारियो को फोन करके बताया कि मोहन भौंसले ने फ्लैट में बम बनाया है । इस बात से वो भी अंजान था कि मोहन भौंसले बम बना रहा है । इस बात से वो भी परेशान हो गया था ।"

"मैं किसी मारियो को नहीं... ।"

"कहीं वो मारियो गोवानी तो नहीं ?" वानखेड़े के दाँत भिंच गए ।

"सच में तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ।" सोनिया गुस्से से उठ खड़ी हुई, "मैं यहाँ से जा रही... ।"

"तुम कहीं नहीं जा सकती ।" वानखेड़े मुस्कुरा पड़ा, "अपने पति से नहीं मिलोगी । वो आ रहा है प्लेन में । मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि प्लेन में बम नहीं है । वो कोई धमाका नहीं करने वाला था । तुम लोगों की योजना सिर्फ यहीं तक थी कि किसी तरह प्लेन को आपात स्थिति में मुम्बई एयरपोर्ट पर उतारा जाए और तुम लोग उसी शोर-शराबे के बीच अपना काम कर जाओ ।"

"कैसा काम ?" सोनिया का रंग फीका पड़ा ।

"तुम बेहतर जानती हो कि मैं क्या कह रहा... ।"

"इसका दिमाग खराब हो गया है ।" सोनिया ने तीखे स्वर में पास खड़े सूरज से कहा, "मैंने तो ये बताकर सबका भला किया है कि मेरा पति प्लेन में बम विस्फोट करने का इरादा रखता है और ये पता नहीं क्या बकवास कर रहा है । मुझे पता होता कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा तो मैं यहाँ कभी भी नहीं आती ।"

सूरज खामोश रहा ।

"एक बात तुम्हें जरूर सोचनी चाहिए कि मोहन भौंसले ने जो बम बनाया है, वो कहाँ है ? क्या तुम्हें पता है ?"

"मुझे कुछ नहीं पता ।" सोनिया ने तीखे स्वर में कहा ।

वानखेड़े ने सूरज से कहा ।

"तुमने सब बातें सुन ली हैं । ये बातें इससे पूछते रहना । समझाना कि सरकारी गवाह बनने में कितना फायदा है ।" उसके साथ ही वानखेड़े वहाँ से हटकर आगे गया कि सामने से प्रकाश भेड़े आता दिखा ।

वानखेड़े उसे देखते ही ठिठका ।

प्रकाश भेड़े व्यस्तता भरे अंदाज में पास आकर बोला ।

"एयरपोर्ट पर रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है । फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस और पुलिस या रही है । अगले एक घण्टे में उस प्लेन की लैंडिंग हो जाएगी एयरपोर्ट पर । भगवान करे सब ठीक रहे । मेरा तो दिल तेजी से धड़क रहा है ।"

"अपने दिल पर काबू रख । कुछ भी बुरा नहीं होगा प्लेन की लैंडिंग आराम से हो जाएगी ।" वानखड़े गम्भीर स्वर में बोला ।

"क्या मतलब ?" प्रकाश भेड़े की निगाह वानखेड़े के चेहरे पर जा टिकी ।

"सोनिया भौंसले कोई खेल खेल रही है । उस टेलीफोन बूथ की तरफ इशारा करना । एयरपोर्ट पर आकर अपनी बातों से तूफान खड़ा कर देना । एक ही बार कहने पर मोहन भौंसले का बम न फोड़ने को मान जाना । फिर मोहन भौंसले का ये कहना कि वो दिल्ली नहीं, मुम्बई एयरपोर्ट पर आना चाहता है कि सबसे पहले उसे देखे । ये सब ड्रामा है ।"

"तुम्हारा मतलब कि सोनिया झूठ कह रही है ?" भेड़े के होंठों से निकला ।

"यही ख्याल है मेरा ।" 

"मोहन भौंसले के पास प्लेन में बम नहीं है ?" 

"होता तो क्रू को मिल गया होता । है ही नहीं हो मिलेगा कैसे ?"

"तो फिर ये सब क्यों हो रहा है ?"

"ये अलार्म है । ऐसा अलार्म बज रहा है, परंतु किसी के कानों तक उसकी आवाज नहीं पहुँची लेकिन मुझे अलार्म बजने का अहसास होने लगा है । अलार्म की आवाज को मैं महसूस कर रहा हूँ ।"

"कैसा अलार्म वानखेड़े ?" भेड़े के चेहरे पर ढेर सारी उलझन दिखनी लगी ।

"डकैती का अलार्म ।"

"डकैती, लेकिन कहाँ ?" भेड़े हड़बड़ा-सा उठा ।

"कारगो के वाल्ट पर, जहाँ पाँच सौ करोड़ का सोना रखा है और मेरी वहीं पर ड्यूटी है । अब मुझे वहीं पर जाना होगा । यहाँ का मामला तुम सम्भालो ।" वानखेड़े ने भेड़े के कंधे पर हाथ रखा, "अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो इन सब बातों के पीछे बहुत ही शातिर दिमाग काम कर रहा है । पाँच सौ करोड़ के सोने को ले जाने की शानदार प्लानिंग बनाई गई है । एयरपोर्ट के सारे सिस्टम में घबराहट पैदा करके, सबका ध्यान उस प्लेन की तरफ लगाया जा रहा है कि कहीं उसमें विस्फोट न हो जाये । सबका ध्यान उस विमान की लैंडिंग की तरफ लगा दिया गया है । पाँच सौ करोड़ के गोल्ड की तो कोई सोच ही नहीं रहा जो बगल की बिल्डिंग के वाल्ट में रखा है । मेरे ख्याल में जब प्लेन लैंड करने वाला होगा या लैंड कर रहा होगा तब वाल्ट में डकैती हो रही होगी ।" वानखेड़े के होंठ भिंच गए ।

"ये तुम क्या कह रहे हो ?"

"एयरपोर्ट पर एकमात्र कीमती सामान वही है । पाँच सौ करोड़ का सोना । यही वजह है कि एयरपोर्ट पर ऐसे हालात बना दिये गए हैं कि सोने की तरफ किसी का ध्यान ही न जाये । हर कोई हवा में आते विमान को ही देखे तब ।"

"तुम... तुम जरूरत से ज्यादा तो नहीं सोच रहे वानखेड़े ?" भेड़े की आँखें सिकुड़ चुकी थीं ।

"मैं तो चाहता हूँ कि मेरे विचार ग़लत निकले । ऐसा कुछ हो ही नहीं और विमान वाली बात ही सही हो ।"

दोनों कई पलों तक एक-दूसरे को देखते रहे ।

"मेरी ड्यूटी गोल्ड पर है ।" वानखेड़े बोला, "मैं वहीं जा रहा हूँ ।"

"मेरे ख्याल में तुम नाहक ही जरूरत से ज्यादा सोच रहे हो ।" इंस्पेक्टर प्रकाश भेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा, "सीधी-सी बात है कि अपनी पत्नी से नाराज होकर मोहन भौंसले ने बम बनाया और अपनी पत्नी को पत्र लिखकर, बम के साथ विमान में जा चढ़ा कि वो प्लेन को उड़ाने जा रहा... ।"

"तुम्हारा क्या ख्याल है ? इतनी चेकिंग के बाद भी कोई बम जैसी चीज प्लेन में ले जाने में कामयाब हो सकता है ?"

"शायद नहीं !"

"अगर ऐसा हो भी गया होता तो बम प्लेन के केबिन क्रू मेंबर्स को मिल गया होता । परंतु उन्हें नहीं मिला क्योंकि बम प्लेन में है ही नहीं । ये सब एयरपोर्ट पर घबराहट पैदा करने के लिए किया जा रहा है ।"

"वानखेड़े, मोहन भौंसले ने जो बम बनाया है वो कहाँ है ?"

"मैं नहीं जानता ?"

"वो काला ब्रीफकेस कहाँ है जो एयरपोर्ट पर उसके हाथ में देखा गया था ?"

"वो ब्रीफकेस कम-से-कम प्लेन में नहीं है । उसे ढूँढ़ा गया था परंतु वो नहीं मिला ।"

"लेकिन बम कहीं तो है ।"

"हाँ, कहीं तो होना चाहिए ।"

"क्या पता वो प्लेन में ही हो ?"

"इस मामले में मैं अलग ढंग से सोच रहा हूँ । मैं ये नहीं भूलता कि कारगो के छोटे-से वाल्ट में पाँच सौ करोड़ का सोना भी पड़ा है । ऐसे में मैं इस मामले को सोने के साथ जोड़कर भी देख रहा हूँ, क्योंकि सोने पर मेरी ड्यूटी है । मुझे सोनिया में कुछ ऐसा महसूस हुआ है कि जिससे लगा कि वो ये सब नाटक कर रही है । अगर नाटक है तो उसकी एकमात्र वजह पास की इमारत के वाल्ट में रखा पाँच सौ करोड़ का सोना ही है । मैंने पहले ही कहा है कि ये सब हरकतें डकैती के अलार्म की तरह लग रही हैं मुझे । हो सकता है कि कुछ भी न हो । मेरा वहम हो । लेकिन जब ये बात मेरे दिमाग में आई है तो मेरा सतर्क रहना जरूर हो जाता है ।"

"मैं बम की बात कर रहा हूँ कि वो प्लेन में भी हो सकता है ।"

"तुम अपनी ड्यूटी के हिसाब से सोचो ।" वानखेड़े मुस्कुराया, "मैं अपनी ड्यूटी के हिसाब से सोचूँगा । सोनिया के रंग-ढंग अटपटे से हैं । ये तुम्हें नहीं समझा सकता । मैं ही समझ सकता हूँ । उसी ने ये पेशकश रखी थी कि वो अपने पति को संभाल सकती है । उसे बात करने दी जाए । मुझे तो ये सब बातें नाटक जैसी लग रही है ।"

प्रकाश भेड़े, वानखेड़े को देखता रहा ।

"तुम अपना काम करो भेड़े । मुझे अपनी ड्यूटी देखनी है । शाहिद खान कब से वहीं बैठा मेरा इंतजार कर रहा होगा ।" कहने के साथ ही वानखेड़े आगे बढ़ता चला गया । वो एयरपोर्ट के इमारत से बाहर निकला तो ठिठक गया । बाहर मूसलाधार बरसात हो रही थी । आकाश में बिजली चमक रही थी । वानखेड़े ने सोचा कि अगर कोई सोने की डकैती करना चाहता है तो ये बुरा मौसम भी उन लोगों की सहायता करेगा । उसने कारगो की इमारत की तरफ देखा, जो बरसात की वजह से धुँधली नजर आ रही थी । उस इमारत की मद्धम-सी लाइट चमक रही थी । अंधेरा फैलना शुरू हो चुका था । एयरपोर्ट की इमारत की लाइटें भी ऑन हो चुकी थी । एम्बुलेंस की आवाजें और फायरब्रिगेड की टन-टन कानों में पड़ रही थी । प्लेन लैंडिंग के वक़्त कुछ बुरा न हो जाये, उसके लिए पहले ही पूरी तैयारियाँ की जा रही थीं । इस बरसात में भी हर कोई अपने कामों को पूरा करने में लगा हुआ था । वानखेड़े पक्का इरादा कर चुका था कि अगर कोई सोने पर डकैती करना चाहता है तो वो नहीं होने देगा ।

तभी वानखेड़े ने पास में खड़े एक कांस्टेबल से छाता लिया और उसे बता दिया कि कारगो के वाल्ट के पास बाद में आकर अपना छाता ले जाये । छाता खोले तेज-तेज कदम उठाते वानखेड़े कारगो के इमारत के पास का पहुँचा । सामने ही वाल्ट का बन्द दरवाजा नजर आ रहा था । वाल्ट को बाहर की तरफ इसलिए रखा गया था कि उसमें सामान रखने और निकालने में आसानी हो । तेज बरसात में कोई गनमैन पहरे पर नहीं दिखा ।

इंस्पेक्टर शाहिद खान भी नहीं ।

वो वाल्ट के पास ही नजर आ रहे दरवाजे के पास पहुँचा तो वहाँ भीतर गनमैन खड़े दिखे । जो कि तेज बरसात की वजह से भीतर आ गए थे । इंस्पेक्टर शाहिद खान भी कुछ दूर कुर्सी पर बैठा दिखा । जो कि उसे देखते ही पास आ गया ।

"आपने बहुत देर लगा दी सर ।" शाहिद खान ने कहा ।

वानखेड़े ने शांत स्वर में गनमैनों से कहा ।

"बेशक तेज बरसात हो रही है, परंतु जिसकी ड्यूटी जहाँ है, वहीं खड़ा हो जाये । भीगने से डरो मत । काम पहले ।"

न चाहते हुए भी सब गनमैन बाहर निकल गये ।

"ऐसी भी क्या बात सर कि आपने उन्हें बरसात में... ।"

"आने वाले वक़्त में शायद कुछ गड़बड़ हो जाये ।" वानखेड़े ने गंभीर स्वर में कहा ।

"मैं समझा नहीं ।"

वानखेड़े ने शहीद खान को एयरपोर्ट के हालात बताये । सोनिया, मोहन भौंसले और मोहन के घर बम बनाये जाने के अलावा हर बात बताई और अपना अंदेशा बताया ।

"आपका मतलब कि ये सब यहाँ पड़े पाँच सौ करोड़ के गोल्ड की डकैती करने के लियी किया जा रहा है ?"

"ऐसा सम्भव हो सकता है ।"

शाहिद खान ने फौरन कुछ नहीं कहा । कुछ रुककर बोला ।

"सर ! आपका ख्याल ठीक भी हो सकता है और नहीं भी । अगर सही है तो डकैती करने वाले बहुत दिमाग लगाकर ये काम कर रहे हैं । वो खतरनाक भी... ।"

"शाहिद ! मैंने इस सारे मामले में यही महसूस किया है कि एयरपोर्ट पर हड़कंप पैदा किया जा रहा है । वो औरत नाटक कर रही है । ये बात मैंने कई बार स्पष्ट महसूस की । प्लेन को बम से उड़ाए जाने वाली बात फैली, परंतु प्लेन में बम नहीं है । ये सब करने के पीछे, एयरपोर्ट का ध्यान भंग करने के लिए ही ये किया जा रहा है कि सबका ध्यान उस विमान की तरफ लग जाये और वो लोग गोल्ड की डकैती करके बाहर निकल जायें । मैं तो चाहता हूँ कि मेरा ख्याल ग़लत हो । ऐसा कुछ भी न हो परंतु हमें सतर्क रहना होगा कि ऐसा भी हो सकता है । अगर ऐसा होता है तो हमें उन लोगों को सफल नहीं होने देना है । सब गनमैनों पर नजर रखो कि वो अपनी ड्यूटी पर जमे रहें । मैं वाल्ट के भीतर देखना चाहता हूँ सिक्योरिटी इंचार्ज कौन है ?"

"मिस्टर रमेश गोरे है । वो उस कमरे में बैठा है । मैं अभी उसे बुलाकर लाता हूँ ।" कहकर शाहिद खान चला गया ।

दो मिनट में ही शाहिद खान, रमेश गोरे के साथ वापस लौटा ।

"कहिए सर !" गोरे बोला ।

"तुम यहाँ के सिक्योरिटी ऑफिसर हो ?"

"जी हाँ !"

"मैं वाल्ट को भीतर से देखना चाहता हूँ ।"

"इसके लिए तो मुझे वाल्ट का दरवाजा खोलना पड़ेगा । भीतर कीमती सामान है, मुझे भीतर से इजाजत लेनी होगी ।" गोरे ने कहा ।

"तो इजाजत ले लो । शाहिद, तुम इसके साथ जाओ ।"

दोनों चले गए ।

बरसात पर निगाह मारते वानखेड़े वहीं खड़ा रहा । दूर रनवे की रोशनी चमक रही थी । वानखेड़े के चेहरे पर गंभीरता थी । वो सोचों में डूबा लग रहा था । दस मिनट बाद रमेश गोरे और शाहिद खान एक अन्य आदमी के साथ आ गए ।

वो आदमी कारगो में रमेश गोरे का ऑफिसर था ।

"आप वाल्ट के कमरे में क्या देखना चाहते हैं इंस्पेक्टर साहब ?" वो पूछने लगा ।

"मैं बस भीतर नजर मारना चाहता हूँ ।"

"चलिए, मैं भी साथ चलता हूँ । कुछ देर इंतजार कर लें, बरसात आ रही है ।"

"मैं रुक नहीं सकता ।" वानखेड़े ने कहा ।

चारों भीगते हुए दीवार के साथ घूमकर वाल्ट के दरवाजे के पास जा पहुँचे । वहाँ गनमैन फैले भीगते हुए अपनी ड्यूटी दे रहे थे । ऑफिसर ने उन्हें देखकर कहा ।

"ये सब पहरेदार तो भीग गए ।"

"वाल्ट खोलो ।"

रमेश गोरे आगे बढ़ा और वाल्ट के स्टील के दरवाजे के पास जा पहुँचा । ऊपर लाइट ऑन थी और वहाँ छोटा-सा शेड भी था, जिसकी वजह से बरसात में बचा जा सकता था । रमेश गोरे ने सबकी नजरों से बचाकर, दरवाजे पर लगी छोटी-सी चक्री को घुमाकर कॉम्बिनेशन नम्बर मिलाया फिर हैंडल को दबाते हुए दरवाजा खोल दिया । स्ट्रांग रूम में रोशनी ऑन थी ।

वे सब भीतर आ गए ।

भीतर लकड़ी की पचास पेटियाँ दो हिस्सों में करीने से लगा रखी थीं ।

"इन पेटियों में गोल्ड है ?" वानखेड़े ने पूछा ।

"हाँ !" रमेश गोरे ने कहा ।

दो-तीन मिनट वानखेड़े उसी कमरे में रहा और नजरें दौड़ाता रहा । वो पंद्रह बाई पंद्रह का कमरा था । कोई खिड़की, रोशनदान नहीं था । वानखेड़े ने वहाँ की अच्छी जाँच की ।

"भीतर आने का यही एक रास्ता है ?" वानखेड़े ने पूछा ।

"एक ही रास्ता है ।" उस ऑफिसर ने कहा ।

"कोई खिड़की, रोशनदान नहीं है ?"

"बिल्कुल भी नहीं । परंतु मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप भीतर से क्या देखना चाहते हैं ?"

"जो पूछ रहा हूँ, वही देखना चाहता था ।"

"वैसे हमें वाल्ट को खोलने की इजाजत नहीं थी । परंतु आपके कहने पर खोल दिया।"

"आप न खोलते तो इजाजत मिल जाती आपको ।"

"सर !" शाहिद खान बोला, "मेरे ख्याल में गोल्ड को ले जाना संभव ही नहीं है । कमरें की दीवारें बम लगाकर ही उड़ाई जा सकती हैं । भीतर आने के लिए दरवाजे के कॉम्बिनेशन नम्बर मिलाना पड़ता है । बाहर गनमैन फैले हुए हैं । मुझे तो नहीं लगता कि कोई कोशिश करने पर सफल हो सकता है ।"

वानखेड़े सिर हिलाकर रह गया ।

"क्या कोई वाल्ट लूटने वाला है ?" ऑफिसर ने अजीब-से स्वर में सवाल पूछा ।

"शायद !" वानखेड़े ने उसे देखा, "कुछ खबर तो ऐसी ही मिली है ।"

"वो सफल नहीं हो सकेगा । वैसे भी किसकी हिम्मत जो एयरपोर्ट जैसी संवेदनशील जगह ऐसा करने की हिम्मत कर सके ।"

पास खड़ा रमेश गोरे एकाएक सतर्क हो उठा ।

"आप लोगों ने ये बात किसी से कहनी नहीं है । जरूरी नहीं कि मुझे मिली खबर सही हो ।" वानखेड़े ने कहा ।

"तभी आपने गनमैनों को बरसात में खड़ा कर रखा है ।" ऑफिसर ने सिर हिलाया, "लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसा कुछ नहीं होगा । एयरपोर्ट पर तगड़ी सिक्योरिटी है । ऐसा हुआ तो कोई सफल नहीं हो सकेगा ।"

वानखेड़े ने रमेश से पूछा ।

"वाल्ट के दरवाजे के कॉम्बिनेशन नम्बर किस-किस के पास है ?"

"ये सिर्फ मेरे ही पास है या ऑफिस में रखे रजिस्टर में दर्ज है ।" रमेश गोरे ने कहा ।

"मतलब कि हर किसी को नम्बर पता नहीं होगा ?"

"सही कहा आपने ।"

वे चारों बाहर निकले ।

रमेश गोरे ने दरवाजा बंद कर दिया ।

वानखेड़े और शाहिद शेड के नीचे खड़े रहे । रमेश गोरे और वो ऑफिसर चले गए । ऑफिस के भीतर जाकर रमेश गोरे ने खुद को व्यस्त दर्शाया और पाँच मिनट बाद मौका मिलते ही कमरे से बाहर निकलकर एकांत में पहुँचा और देवराज चौहान को फोन किया । फौरन ही बात हो गई ।

"इंस्पेक्टर वानखेड़े के पास इस बात की खबर है कि कोई वाल्ट में रखा सोना लूटने वाला है ।" रमेश गोरे ने धीमे-से कहा ।

चंद पलों की खामोशी के बाद देवराज चौहान की आवाज आई ।

"वानखेड़े बहुत तेज दिमाग रखता है । किसी बात से वो भाँप गया होगा कि चक्कर क्या है ।"

"अब क्या होगा ?"

"सब कुछ वैसे ही चलेगा, जैसे चल रहा है ।"

"और वानखेड़े ? वो बहुत सतर्क है । गनमैनों को उसने बरसात में खड़ा कर दिया है ।" गोरे बेचैन था ।

"तुम इन बातों की तरफ मत सोचो । कॉम्बिनेशन नम्बर वही है जो तुम बता चुके हो।"

"हाँ ! पर वाल्ट का दरवाजा खोलने से पहले, ऑफिस के कमरे में रखा वो रजिस्टर जरूर उठा लेना, जो हर रंग की जिल्द वाला है और तुम्हें बता दिया है कि वो किस टेबल पर रखा होता है । नहीं तो मैं फँस जाऊँगा कि कॉम्बिनेशन नम्बर सोना ले जाने वालों को कैसे पता चला ।"

"मुझे सब याद है ।"

"तुम्हें क्या लगता है कि तुम काम कर लोगे ?" गोरे के स्वर में चिंता थी ।

"पूरी कोशिश की जा रही है कि काम हो जाये ।" इसके साथ ही देवराज चौहान ने उधर से फोन बंद कर दिया ।

■■■

देवराज चौहान ने फोन बंद करके जेब में रखा कि तभी मारियो गोवानी पर नजर पड़ी जो उसी की तरफ बढ़ा आ रहा था । देवराज चौहान ने दूर सोफे पर बैठी सोनिया को देखा । वो दो होस्टेस और एक पुलिस वाले (सूरज) के करीब बैठी थी । मोरियो गोवानी पास आकर धीमे स्वर में बोला ।

"तुम्हारी योजना ठीक से काम कर रही है देवराज चौहान ।"

देवराज चौहान एयरपोर्ट पर आते-जाते लोगों की भागदौड़ देखता बोला ।

"अब नया क्या हो गया ?"

"वो प्लेन वापस आ रहा है । सीधा मुम्बई ।" मारियो गोवानी बोला ।

देवराज चौहान की निगाह मारियो गोवानी के चेहरे पर जा टिकी ।

"मुम्बई ?"

"यही तो तुम्हारी योजना थी कि प्लेन वापस आकर मुम्बई एयरपोर्ट पर उतरे । ऐसा ही हो रहा है ।"

"तुम्हारा मतलब की सोनिया की बात, मोहन भौंसले से कराई एयरपोर्ट वालों ने ?"

"हाँ ! ये अंदेशा ग़लत था कि मोहन भौंसले वास्तव में प्लेन में बम ले गया है ।

"प्लेन कब तक मुम्बई पहुँचेगा ?"

"अगले चालीस मिनट में मुम्बई एयरपोर्ट पर लैंड करेगा । एम्बुलेंस, फायरब्रिगेड और पुलिस से एयरपोर्ट भरता जा रहा है । तुम्हारे पास अब वक्त कम है । तुम्हें अब अपना काम शुरू कर देना चाहिए ।" मारियो ने कहा, "अगर तुम कामयाब रहे तो मैं पंद्रह करोड़ लेने उसी जगह पर पहुँच जाऊँगा जहाँ तुमने सोना लेकर पहुँचना है ।"

"मोहिते कहाँ है ?" देवराज चौहान का चेहरा शांत था ।

"मोहिते का कुछ समझ नहीं आ रहा । वो मोहन भौंसले के फ्लैट से मुझे फोन पर मोहन के द्वारा बम बनाये जाने के बारे में बता रहा था कि अचानक बातचीत बन्द हो गई । उसके बाद कई बार ट्री करा, पर फोन नहीं लगा । उसका भी नहीं आया ।" मारियो गोवानी उलझन भरे स्वर में कह उठा, "अभी तक तो मोहिते का फोन आ जाना चाहिए था ।"

"मारियो ।" देवराज चौहान ने कहा, "तुम उस बम की कोई बात नहीं कर रहे ।"

"जो मोहन भौंसले ने बनाया है ?"

"हाँ !"

"मेरे ख्याल में ऐसा कुछ नहीं है । मोहिते को ग़लती से लगा होगा कि मोहन भौंसले बम बना रहा... ।"

"वो सही कह रहा था ।"

"मतलब कि मोहन भौंसले बम बना रहा था ?" मारियो की आँखें सिकुड़ीं ।

"हाँ ! प्रताप कहता है कि कई दिन से मोहन भौंसले ने अपने कमरे को बन्द कर रखा था । वो कमरे के भीतर किसी को भी नहीं आने देता था । बाहर जाता था तो कमरे पर ताला लगा जाता था । इसी से स्पष्ट है कि कमरे में रहकर वो बम बना रहा था । मोहिते का ख्याल बिल्कुल ठीक है ।" देवराज चौहान गंभीर दिखा, "अब सवाल ये पैदा होता है कि अगर मेरे प्लान ठीक चल रहा है, सब ठीक है तो इस मौके पर मोहन भौंसले ने बम क्यों बनाया है और वो बम कहाँ है ?"

मारियो, देवराज चौहान को देखता रहा ।

"अहम सवाल ये है कि वो बम कहाँ है ?" देवराज चौहान पुनः बोला ।

"तुम्हें लगता है कि मोहन भौंसले के पास है बम और प्लेन उड़ाने वाला है ?"

"मैं ये नहीं कह रहा । मैं तो तुमसे पूछ रहा हूँ कि बम कहाँ हो सकता है ? मोहन भौंसले ने बम बनाया ही क्यों जबकि वो मेरे साथ डकैती में शामिल हो चुका था और उसे दस करोड़ मिलने जा रहे थे । दस करोड़ उसकी पत्नी को मिलने थे तो इस मौके पर बम बनाने की तुक ही क्या थी ?"

"क्या पता उसने क्या सोचा हो ।" मारियो गोवानी ने सोच भरे स्वर में कहा ।

"यहीं पर समस्या आ रही है कि उसने क्या सोचकर बम बनाया ।"

मारियो गोवानी चुप रहा ।

"तो प्लेन अगले चालीस मिनटों में मुम्बई एयरपोर्ट पर पहुँच रहा है ?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"हाँ ! अब तुम्हारा क्या करने का इरादा है ?"

"मैं गोल्ड की डकैती जारी रखूँगा । मैं अपने प्लान पर ही काम करूँगा और अब यहाँ से जा रहा हूँ । मोहिते तुम्हारे पास है नहीं । अगर हम पर कोई मुसीबत आ गई तो तुम अकेले कैसे सम्भाल सकोगे ?"

"चिंता न करो । मैं सब देख लूँगा ।" मारियो गोवानी ने विश्वास भरे स्वर में कहा ।

"ऐसा तो नहीं कि मोहिते किसी के हाथ लग गया हो और वो मुँह खोल दे कि... ।"

"बकवास । तुम मोहिते को नहीं जानते । वो मुँह खोलने वालों में से नहीं है । उसके बारे में निश्चिंत रहो ।"

देवराज चौहान पलटकर बाहरी दरवाजे की तरफ बढ़ गया । उसके हिसाब से पूरे मामले में दो गड़बड़ हो चुकी थी । एक तो मोहन भौंसले द्वारा बम बनाना और पता नहीं चल रहा था कि उसने किस मकसद से बम बनाया है । दूसरी गड़बड़ थी मोहिते से, मारियो गोवानी का सम्पर्क न हो पाना ।

देवराज चौहान ये नहीं देख पाया कि जिस सोफे पर सोनिया बैठी थी, होस्टेस उसके पास खड़ी थी । सूरज भी पास ही था । वहाँ के सोफे पर मोना चौधरी, मेकअप से चेहरा बदले मौजूद थी और सब कुछ देख-सुन और समझ रही थी । मोना चौधरी उसे भी देख चुकी थी । मारियो गोवानी को भी देख लेती थी ।

देवराज चौहान दरवाजे से बाहर निकल आया । तेज बरसात होने लगी थी । परंतु रुकने का मतलब नहीं था । सिर्फ चालीस मिनट बाकी थे प्लेन के आने में । तभी देवराज चौहान की निगाह पास ही नीचे रखे छाते पर पड़ी । कोई छाता लेकर यहाँ तक आया होगा लेकिन गीला छाता भीतर नहीं ले जा सकता था तो उसने छाता वहीं रख दिया होगा । देवराज चौहान ने वो छाता लिया और तेजी से एयरपोर्ट के बाहर की तरफ बढ़ता चला गया । बारिश की टप-टप छाते पर होने लगी । घुटनों तक पैंट बरसात से गीली होने लगी । फिर पार्किंग में खड़ी कार के पास पहुँचा और भीतर बैठकर कार आगे बढ़ा दी । पंद्रह मिनट की ड्राइव के बाद वो एक जंगल जैसी जगह पर पहुँचा । तेज बरसात की वजह से वहाँ कोई नजर नहीं आ रहा था । वैसे भी इस तरफ शायद ही कोई आता हो । जंगल के कुछ और भीतर पहुँचकर उसने कार रोक दी । सामने ही तीन बड़ी एम्बुलेंस और एक छोटी एम्बुलेंस खड़ी थी । बाहर कोई भी नजर नहीं आ रहा था । देवराज चौहान छाता लेकर बाहर निकला और छोटी एम्बुलेंस के पास पहुँचकर दरवाजा थपथपाया ।

बहते पानी की वजह से शीशों के भीतर देख पाना सम्भव नहीं हो पा रहा था । तभी थोड़ा-सा शीशा नीचे हुआ फिर शीशा ऊपर चढ़ा और दरवाजा खोला गया ।

छाता बाहर फेंककर देवराज चौहान ने एम्बुलेंस के भीतर प्रवेश किया और दरवाजा बंद किया ।

"सब ठीक है ?" जगमोहन ने पूछा ।

"हाँ !" देवराज चौहान सीट पर बैठ चुका था, "प्लेन वापस मुम्बई पहुँच रहा है । पच्चीस मिनट में वो लैंड कर जाएगा ।"

"ओह, फिर तो हमें फौरन चलना होगा । हमारे पास वक़्त कम है ।" जगमोहन बोला ।

"वाल्ट के पास वानखेड़े मौजूद था । वानखेड़े का ख्याल है कि प्लेन में बम की बात कहकर खामखाह ही एयरपोर्ट पर हंगामा पैदा किया जा रहा है । सोचता है कि इस आड़ में कोई सोने पर डकैती करना चाहता है ।"

"तो वो भाँप गया कि ऐसा भी हो सकता है ।" जगमोहन ने गहरी साँस ली ।

"ये बात गोरे ने बताई ।"

वैन में उनके अलावा रवीना मौजूद थी । वो नर्स की यूनिफार्म पहने थी ।

"वानखेड़े पर भी काबू पाना होगा । वो कहीं गड़बड़ न कर दे ।" जगमोहन बोला ।

"अब चलने का वक़्त आ गया है । बाकी एम्बुलेंस में कौन-कौन हैं ?"

"प्रताप, काका मेहर और जैकी, तीनों एम्बुलेंस की ड्राइविंग सीट पर मौजूद हैं । ललित कालिया डॉक्टरों वाला सफेद कोट और स्टेथोस्कोप गले में डाले आगे वाली सीट पर बैठा है ।" जगमोहन ने कहा ।

"ठीक है ! सबसे आगे ये छोटी एम्बुलेंस होगी । उसके पीछे प्रताप वाली एम्बुलेंस । फोन करके उन्हें ये बता दो और कहो कि हम यहाँ से रवाना हो रहे हैं ।"

जगमोहन ने तीनों से फोन पर बात की ।

जब जगमोहन ने अपना फोन बन्द किया तो देवराज चौहान बोला ।

"तुमने अपना काम ठीक से पूरा करना है । तुम्हारे भीतर जाने के पाँच मिनट बाद हम भीतर आ जायेंगे । वो डंगरी कहाँ है जो मैकेनिक पहनते हैं और मिठाई का डिब्बा... ।"

"इधर रखा है ।" पीछे मौजूद रवीना कह उठी ।

देवराज चौहान ने अपनी कमीज-पैंट उतारी और सर्विस यूनिफार्म पहनकर, सिर पर सफेद टोपी लगा ली । वो पूरी तरह एम्बुलेंस का ड्राइवर लगने लगा । ।

"बाकी तीनों एम्बुलेंस चलाने वालों ने सर्विस यूनिफार्म पहनी हुई है ?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"हाँ !"

"इतनी तेज बरसात हमारा काम न बिगाड़ दे ।" रवीना कह उठी ।

"ये हमें फायदा पहुँचाएगी ।" देवराज चौहान ने कहा और ड्राइविंग सीट पर बैठकर एम्बुलेंस स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी ।

जगमोहन पीछे वाले हिस्से में गया और डंगरी (मैकेनिकों की ड्रेस) पहनने लगा । पीछे बाकी तीनों एम्बुलेंस आने लगी थी । 

वो एम्बुलेंस जिसे प्रताप ड्राइव कर रहा था और ललित कालिया बगल में बैठा था ।

"ललित, मेरे यार !" प्रताप कह उठा, "ऐसा मौका हमें जिंदगी में दोबारा नहीं मिलने वाला ।"

"जानता हूँ ।" ललित कालिया के होंठ भिंच गए ।

"इरादा पक्का है न ?"

"बिल्कुल पक्का है । अगर देवराज चौहान कामयाब हुआ तो फिर हम सारा गोल्ड ले उड़ेंगे । थोड़ी देर पहले ही तो जगमोहन ने बताया कि हम क्या करने जा रहे हैं । कैसे सारा काम होना है । अब सब कुछ हमारे सामने साफ है ।"

"लेकिन जल्दबाजी कहीं नहीं करनी है । जब तक सोना आँखों के सामने न हो, तब तक कुछ नहीं करना है । अभी तो देवराज चौहान को ठीक से अपना काम कर लेने दे, उसके बाद हम दोनों मैदान में आ जायेंगे । वो जगह भी हमें बता दी गई है, जहाँ सोने से भरी एम्बुलेंस लेकर पहुँचना है । वो जगह सुनसान है । वहाँ हम सबको शूट कर देंगे । साले देवराज चौहान को भी और उस जगमोहन को भी ।" प्रताप ठहाका लगा उठा ।

"सारा गोल्ड हमारा । कितने का होगा वो गोल्ड ?"

"दो-तीन सौ करोड़ का तो होगा ही । तभी तो सौ करोड़ देवराज चौहान दूसरों को बाँट रहा है ।" प्रताप ने कहा ।

■■■

वानखेड़े और शाहिद खान अभी तक वाल्ट के दरवाजे के आगे शेड के नीचे खड़े थे । शेड के नीचे ही तेज रोशनी वाला बल्ब लगा था, जिसकी लाइट आस-पास फैल रही थी । गनमैन वाल्ट के हर तरफ गश्त लेते दिख रहे थे । यहाँ से रनवे की लाइटें और कई प्लेन चढ़ते-उतरते दिख रहे थे । प्लेन के इंजन को तेज आवाजें कानों में पड़ रही थी । कभी-कभार एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड की आवाजें भी कानों में पड़ जातीं । आधा घण्टा बीत चुका था । अब मात्र दस मिनट ही बचे थे उस प्लेन की लैंडिंग में ।

"मुझे नहीं लगता वानखेड़े साहब कि कोई ग़लती होगी ।"

वानखेड़े चुप रहा ।

"दस मिनट बचे हैं प्लेन आने में ।"

तभी रमेश गोरे दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा और शेड के नीचे पहुँच गया ।

"सब ठीक है ?" गोरे ने बेचैनी से पूछा । नजरें वानखेड़े पर थीं ।

वानखेड़े ने हाँ में सिर हिला दिया ।

"मैं तो तब से ही परेशान हुआ पड़ा हूँ जब से आपने कहा है कि सोने पर डकैती हो सकती है । पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा क्योंकि वाल्ट का दरवाजा बंद है और कॉम्बिनेशन किसी को पता नहीं होता । बिना नम्बर के दरवाजा नहीं खुल सकता ।"

रात के आठ-बीस हो रहे थे । हर तरफ काला अंधेरा, बरसात और चमकती लाइटें दिख रही थीं । प्लेन के इंजनों की कर्कश आवाजें ही सुनाई दे रही... । तभी छाता लिए कोई एयरपोर्ट की इमारत से इस तरफ आता दिखा । वानखेड़े और शाहिद खान सावधान हो गए । गोरे भी उसे देखने लगा ।

गश्त करते गनमैन सतर्क मुद्रा में अपनी जगह ठिठक गए ।

"मैं हूँ । इंस्पेक्टर भेड़े ।" तभी उनके कानों में भेड़े की बरसात के शोर में दबी-सी आवाज सुनाई दी ।

वानखेड़े ने चैन की साँस ली और ऊँचे स्वर में बोला ।

"सब ठीक है ।"

गनमैन हरकत में आकर पुनः गश्त करने लगे ।

एक गनमैन ने टॉर्च निकालकर करीब आते भेड़े पर टॉर्च की रोशनी फेंकी ।

भेड़े का चेहरा रोशनी में चमका ।

"बन्द करो । बन्द करो ।" प्रकाश भेड़े लाइट की तरफ हाथ हिलाकर बोला ।

टॉर्च का प्रकाश गायब हो गया ।

प्रकाश भेड़े छाता थामे शेड के नीचे आया और बोला ।

"सब ठीक है न यहाँ ?"

"हाँ !" वानखेड़े बोला, "उस प्लेन पर क्या हो रहा है ?"

"प्लेन में बम नहीं मिला । काला ब्रीफकेस भी नहीं मिला । दोबारा-तिबारा प्लेन को भीतर से चेक कर लिया गया है । मोहन भौंसले अब प्लेन में शांत है परंतु प्लेन में पैसेंजर को मामला पता चल गया है । वो प्लेन में हो-हल्ला मचाये हुए हैं और काबू से बाहर हुए पड़े हैं । अगले दस मिनट में प्लेन लैंड कर जाएगा यहाँ ।" इंस्पेक्टर प्रकाश भेड़े ने गंभीर स्वर में कहा, "मेरे ख्याल में सब ठीक रहेगा । तुम्हारा अंदेशा ग़लत है कि ये सब इसलिए किया जा रहा है कि गोल्ड लुटा जा सके ।"

"मुझे खुशी होगी भेड़े, अगर मेरा अंदाजा ग़लत निकले ।" वानखेड़े ने कहा ।

भेड़े वापस चला गया । बरसात अपना काम कर रही थी ।

दो मिनट ही बीते कि मैकेनिकों वाली डंगरी पहने, छाता लिए सामने से कोई आता दिखा । अंधेरे में वो साये की तरह ही दिख रहा था ।

तभी एक गनमैन की टॉर्च की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी ।

वो जगमोहन था परंतु चेहरे पर हल्की दाढ़ी-मूँछ थी । सिर पर कैप पड़ी थी, जिसका माथा पीछे की तरफ पड़ा था । गाल पर काले मस्से जैसा दाग नजर आ रहा था ।

"क्या करते हो ?" जगमोहन ऊँचे स्वर में बोला, "मैं हूँ लक्ष्मण ।"

टॉर्च बन्द हो गई ।

जगमोहन करीब आकर एक गनमैन के पास पहुँचकर बोला ।

"लो मुँह मीठा करो । आज खुशी का दिन है ।" जगमोहन की बदली आवाज ऊँची थी कि बाकी सब भी सुन सकें, "शादी के पाँच साल बाद एक साथ जुड़वा बच्चे हुए हैं । दोनों लड़के हैं । इसलिए दो डिब्बे लाया हूँ कि सबका मुँह मीठा करा दूँगा । जल्दी लो, जल्दी लो, एक लड्डू उठा लो ।"

"बधाई हो !" गनमैन ने कहा और एक लड्डू उठाकर खाने लगा ।

जगमोहन दूसरे के पास पहुँचा । फिर तीसरे के... ।

इसी प्रकार सबको लड्डू खिलाता चला गया ।

फिर वानखेड़े और शाहिद खान के पास, शेड के नीचे जा पहुँचा ।

"आप भी मुँह मीठा कीजिये साहब जी ! जुड़वा हुए हैं पाँच साल बाद । मेरी बीवी कहा करती थी कि मुझमें कमी है, तभी बच्चा नहीं हो रहा । अब तो उसे पता चल गया होगा कि मैं कितने कमाल का हूँ ।"

"क्या नाम है तुम्हारा ?" वानखेड़े ने डिब्बे में से लड्डू उठाते हुए पूछा ।

"लक्ष्मण हूँ साहब जी । प्लेन का मैकेनिक हूँ ।"

"कौन-सी एयरलाइन्स में काम करते हो ?" वानखेड़े ने लड्डू मुँह में डाल लिया ।

"इंडियन एयरवेज में साहब जी ।" फिर जगमोहन शाहिद खान से बोला, "आप भी लीजिए साहब जी । ये खुशी का मौका है ।"

"मैं मीठा नहीं खाता, आदत नहीं है ।"

"साहब जी, ऐसा कहकर आप मेरा दिल तोड़ रहे हैं । आज तो खा लीजिए । मेरी खुशी में शामिल हो जाइए ।"

न चाहते हुए भी शहीद खान ने लड्डू उठा लिया ।

"मैं जरा भीतर ऑफिस में भी मुँह मीठा करा आऊँ ।" कहते हुए जगमोहन ऑफिस की तरफ बढ़ गया । भीतर प्रवेश करने वाले गेट के पास ही छाता रखा और भीतर प्रवेश कर गया ।

भीतर कमरे में, राहदारी में तीव्र रोशनी फैली थी । लोग आ-जा रहे थे ।

जगमोहन आगे बढ़ा और कई कमरे पार करके एक कमरे में प्रवेश कर गया । हाथ में लड्डू का खुला डिब्बा था । उस बड़े कमरे में छः टेबल-कुर्सी लगे थे । परंतु इस वक़्त दो टेबलों पर ही दो व्यक्ति बैठे काम में व्यस्त थे । उन्होंने सिर उठाकर जगमोहन जो देखा फिर अपने काम में व्यस्त हो गए । जगमोहन डागरी पहने था तो वो समझ गए कि ये प्लेन का मैकेनिक ही होगा ।

जगमोहन की निगाह बाईं तरफ वाले टेबल पर गई । वहाँ कोई नहीं बैठा था और उसकी निगाह टेबल पर रखे हरी जिल्द वाली मोटे-से रजिस्टर पर जा टिकी । इसके साथ ही जगमोहन आगे बढ़ा और उसी टेबल के पास पड़ी कुर्सी पर इस तरह बैठ गया कि जैसे टेबल के उस पार कुर्सी पर बैठने वाले के आने का इंतजार कर रहा हो । लेकिन नजरें हरी जिल्द वाले रजिस्टर पर टिक चुकी थीं । आधा मिनट ही हुआ था कि उसके कानों में आवाज पड़ी ।

"पुष्कर साहब से मिलना है ?"

जगमोहन साहब से गर्दन घुमाकर देखा ।पीछे टेबल पर बैठा व्यक्ति उसे देख रहा था ।

"जी, जी हाँ !" जगमोहन सामान्य स्वर में बोला ।

"वो साहब से मिलने गए हैं । आने में वक़्त लगेगा ।" कहकर वो अपने काम में लग गया ।

जगमोहन ने उसी पल हरी जिल्द वाला रजिस्टर उठाया और खड़ा होते हुए बाहर निकल गया । रजिस्टर छाती से सटा रखा था कि पीछे से कोई उसे रजिस्टर ले जाते न देख सके ।

जगमोहन रजिस्टर के साथ कमरे से बाहर आ गया और राहदारी पार करता तेजी से गेट की तरफ बढ़ गया । गेट से बाहर निकला तो तुरंत छाता उठा लिया । तेज बरसात लगी हुई थी । सामने ही रनवे की लाइटें चमक रही थीं । प्लेनों के इंजन की तेज-तीखी आवाजें कानों में पड़ रही थी ।

जगमोहन दीवार के साथ घूमकर वाल्ट वाले हिस्से में पहुँचा ।

वहाँ कोई भी गनमैन नहीं दिखा ।

देखने पर गनमैन नीचे लुढ़के पड़े दिखे । वे बरसात में भीग रहे थे । जगमोहन सतर्क अंदाज में वाल्ट के दरवाजे के बाहर लगे शेड के पास पहुँचा ।

वहीं नीचे वानखेड़े और शाहिद खान को भी लुढ़के पाया ।

जगमोहन के चेहरे पर चैन के भाव उभरे । लड्डुओं में तेज बेहोशी की दवा थी, जो कि फौरन अपना असर दिखा देती थी और आधे घंटे तक गहरी बेहोशी में रखती थी । इन्हें बेहोश हुए सात-आठ मिनट हो चुके थे । वक़्त तेजी से भाग रहा था और उसे देवराज चौहान और अन्यों के आने का इंतजार था । तेज बरसात की वजह से कोई इधर नहीं आ रहा था । अगर आ गया और गनमैनों को बेहोश देखा तो मामला बिगड़ भी सकता था ।

■■■

फ्लाइट नम्बर 317 के लैंड करने का वक़्त आ गया था । एयरपोर्ट पर हलचल मची थी । रनवे के आस-पास फायरब्रिगेड और एम्बुलेंस खड़ी थीं । रनवे की तेज लाइटें जल रहीं थीं । तेज बरसात में भी लाइटों से भरपूर रोशनी हो रही थी । आसमान में दूर से आता विमान भी दिखने लगा था । वहाँ ढेरों पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं । सबके दिल तेजी से धड़क रहे थे कि कहीं भीतर बैठा मोहन भौंसले बम विस्फोट न कर दे । पूरे एयरपोर्ट का ध्यान इसी विमान पर टिक चुका था । एयरपोर्ट पर हर बड़ा-छोटा अधिकारी वहाँ मौजूद था । कोई छाता लिए हुए था तो कोई बरसात में भीग रहा था ।

दैत्याकार हवाई जहाज आसमान से जमीन की तरफ बढ़ता दिखाई देने लगा ।

ठीक इसी समय एयरपोर्ट के प्रवेश गेट पर एक एम्बुलेंस के ब्रेक जोरों से लगे और सायरन और भी जोरों से चिल्लाने लगा । उसके पीछे तीन बड़ी एम्बुलेंस थीं । उनके सायरन भी बज रहे थे । सबके ऊपर लगीं लाल लाइटें घूमते हुए जल रही थीं, बुझ रही थीं । गेट पर खड़े गार्डों ने इस स्थिति वाली एम्बुलेंस को देखा तो तुरंत उन्हें भीतर जाने की इजाजत दे दी गई । गेट खोल दिये गए । देखते-ही-देखते वो चारों एम्बुलेंस भीतर आ गईं और तेजी से आगे जाते दाईं तरफ मुड़कर नजरों से ओझल हो गईं । वहाँ से ठीक सामने फ्लाइट नम्बर 317, अपने दैत्याकार रूप में नीचे आती नजर आ रही थी ।

उन चारों एम्बुलेंस में देवराज चौहान और उसकी पार्टी के लोग थे ।

एकाएक एम्बुलेंस के बजते सायरन बन्द हो गए । उनकी लाइटें बुझा दी गईं । तेज बरसात में जैसे वो चारों एम्बुलेंस दबे पाँव वाल्ट के दरवाजे के पास आ पहुँची हों ।

फुर्ती से एम्बुलेंसों के दरवाजे खुले और देवराज चौहान, रवीना, जैकी, ललित कालिया, प्रताप और काका मेहर बाहर निकले । जगमोहन तेजी से उनके पास पहुँचा ।

"सब बेहोश गनमैनों को उठाकर दीवार के पास एक तरफ डाल दो ।" जगमोहन चीखा, "वरना ये ग़लती से टायरों के नीचे आ सकते हैं ।" वो सब भी बरसात में भीगने लगे थे । बरसात उनकी खूब सहायता कर रही थी । तेज बरसात की वजह से ही कारगो ऑफिस से कोई बाहर नहीं आ रहा था ।

सब तेजी से अपने काम में लग गए ।

देवराज चौहान वाल्ट के दरवाजे के पास पहुँचा और उन पर लगी छोटी-सी चक्री को सेट करके कॉम्बिनेशन नम्बर मिलाने लगा । रमेश गोरे उसे पहले ही नम्बरों के बारे में बता चुका था । हरा रजिस्टर नीचे गिरा पड़ा था, जिसकी वजह से बाद में पुलिस यही सोचेगी कि सोना ले जाने वालों ने हरे रजिस्टर में दर्ज वाल्ट का कॉम्बिनेशन नम्बर देखा और वाल्ट खोल दिया ।

डेढ़ मिनट में देवराज चौहान ने वाल्ट का दरवाजा खोल लिया । पल्ले को भीतर धकेला तो दरवाजा खुलने के बाद भीतर तेज रोशनी में रखी पेटियाँ नजर आने लगीं ।

तभी सब पास पहुँच गए ।

"इन पेटियों में सोना है ?" प्रताप चमक भरे स्वर में कह उठा ।

"एम्बुलेंसों को इस दरवाजे के पास लगाओ और जल्दी से पेटियाँ भीतर रखो ।" देवराज चौहान बोला ।

"ऐसा ही किया जा रहा है ।" प्रताप बोला ।

देवराज चौहान ने एम्बुलेंसों को बैक होकर गेट की तरफ आते देखा ।

रवीना भी वहाँ आ पहुँची थी ।

"जल्दी-से-जल्दी पेटियाँ एम्बुलेंसों में भरनी है ।" देवराज चौहान ने कहा और उनकी निगाह काफी दूर हवा में चमकते प्लेन पर जा टिकी, जिसकी लाइटें जलबुझ रही थीं और वो रनवे को छूने जा रहा था ।

देवराज चौहान जानता था कि उसी प्लेन में मोहन भौंसले मौजूद है ।

एम्बुलेंस बैक करके लगा दी गई । पिछले दरवाजे खोल दिये गए । तीनों बड़ी एम्बुलेंस भीतर से पूरी तरह खाली थी । यानी कि उसके भीतर ज्यादा-से-ज्यादा सामान रखा जा सकता था ।

उसके बाद गोल्ड को भीतर रखने का काम तेजी से शुरू हो गया ।

जगमोहन, रवीना, प्रताप, ललित कालिया, काका मेहर, जैकी, पेटियों को उठा-उठाकर लाते और एम्बुलेंस के भीतर रख देते । पेटियाँ भारी थीं । एक पेटी को दो लोग उठा रहे थे । सब बड़ी फुर्ती दिखा रहे थे । पाँच सौ करोड़ के गोल्ड की डकैती की जा रही थी ।

इस वक़्त सबका ध्यान फ्लाइट नम्बर 317 पर था, जो कि लैंड हो चुकी थी ।

देवराज चौहान आस-पास नजर रखे था ।

एक एम्बुलेंस भर गई तो उसे वहाँ से हटाकर कुछ आगे खड़ा कर दिया देवराज चौहान ने । पिछला दरवाजा बंद कर दिया सोने की पेटियाँ तेजी से उन बड़ी एम्बुलेंस में रखी जा रही थीं ।

■■■

फ्लाइट नम्बर 317 के रनवे पर ठहरते ही पुलिस ने विमान को अपने घेरे में ले लिया । एम्बुलेंस और फायरब्रिगेड कुछ करीब आ पहुँची थीं । हर तरफ हलचल मची थी । प्रकाश भेड़े, इंस्पेक्टर सूरज और डिप्टी कंट्रोलर के साथ और भी कई बड़े अधिकारी मौजूद थे । लगभग सब ही बरसात में भीग रहे थे । प्रकाश भेड़े का सबसे पहला महत्वपूर्ण काम था मोहन भौंसले को गिरफ्तार करना । उससे बहुत कुछ जानना था । उससे बम के बारे में पूछना था कि वो कहाँ पर है । भागदौड़ जारी थी सबकि । सब भय और उत्सुकता से विमान को देख रहे थे । उन्हें डर था कि बम अभी भी फट सकता है । बम स्क्वाड दल एक तरफ तैयार खड़ा था । अफरा-तफरी का आलम था ।

तभी एक तरफ से प्लेन को लगाने वाली सीढ़ी वहाँ आ पहुँची ।

सीढ़ी प्लेन के साथ सट गई ।

प्रकाश भेड़े, सूरज के साथ सीढ़ियाँ चढ़ने लगा ।

प्लेन का दरवाजा अभी बन्द था ।

■■■

रनवे पर प्लेन के रुकते ही मोहन भौंसले जल्दी-से उठ खड़ा हुआ । यात्री तो पहले से ही दहशत में थे और बार-बार मोहन भौंसले को देख लेते थे । मोहन भौंसले जानता था कि ये उसके लिए खतरनाक वक़्त है । उसे यहाँ से बचकर निकलना है जबकि प्लेन के बाहर उसे पकड़ने के लिए, पुलिस का जबर्दस्त इंतजाम हो रखा था । अब आगे वही करना था जैसा करने को जगमोहन ने कहा था । बच निकलने का वही एक रास्ता था ।

घबराए-से यात्री अपनी सीटों से उठ खड़े हुए थे ।

सीनियर एयर होस्टेस (आई०एफ०एम०) विमान का दरवाजा खोल रही थी ।

"मैं नहीं चाहता कि तुम लोगों की जान जाए ।" मोहन भौंसले ऊँचे स्वर में कह उठा, "इसलिए बता रहा हूँ कि जो अपनी जान बचा सकता है, बचा ले । बम फटने में सिर्फ एक मिनट बाकी है ।"

मोहन भौंसले के शब्द किसी बम विस्फोट से कम नहीं थे ।

विमान में चीखोपुकार मच गई । यात्री भीड़ के रेले कि तरह विमान के दरवाजे की तरफ भागने लगे, जो कि खुल चुका था । ऐसा लगा जैसे मानो विमान में तबाही आ गई हो । मोहन भौंसले यही हालात बनाना चाहता था और वो भी उस चीखती भीड़ का हिस्सा बन गया । छोटा कद बहुत काम भीड़ में छुपने के लिए ।

प्रकाश भेड़े और सूरज दरवाजा खुलते ही विमान के भीतर आ गए । परंतु विमान के भीतर का दृश्य देखकर वो हड़बड़ाया गए । भीड़ का रेला चीखते-चिल्लाते दरवाजे की तरफ झपट रहा था । भेड़े ने उसे रोकने की चेष्टा की परंतु भीड़ उसे अपने साथ बाहर लेकर चली गई । भेड़े प्लेन की सीढ़ियों से नीचे लुढ़कता चला गया ।

सूरज विमान के भीतर ही कहीं गुम हो गया था ।

विमान की चौड़ी सीढ़ियों से चीखते-चिल्लाते लोग बुरी अवस्था में, भागने के अंदाज में नीचे उतरने लगे । दो-तीन लोग गीली सीढ़ी होने की वजह से नीचे लुढ़क गए । उनका क्या हाल हुआ, कुछ पता नहीं । लोग गला फाड़-फाड़कर कह रहे थे कि बम फटने वाला है प्लेन में ।

ये सुनकर विमान को घेरे खड़े पुलिस वाले और अधिकारी सतर्क हो गए । उनका ध्यान विमान पर लग गया और वो पीछे हटने लगे । सीढ़ियों से उतरने वाले लोग, बदहवास से एयरपोर्ट की इमारत की तरफ भागने लगे ।

मोहन भौंसले उसी भीड़ का हिस्सा बना विमान से कुछ दूर आ पहुँचा था । जगमोहन की बताई योजना शानदार ढंग से कामयाब रही थी । उसने भीड़ का साथ छोड़ा और तेजी से अन्य दिशा की तरफ भाग निकला । वो जानता था कि इस वक़्त देवराज चौहान और जगमोहन कहाँ पर होंगे ।

■■■

सोनिया इस वक़्त भी उसी सोफे पर मौजूद थी । उसके पास कोई पुलिस वाला नहीं था । वही दो होस्टेस उसका ध्यान रख रही थी, या उस पर नजर रखे हुए थीं । सोनिया जानती थी कि उसके यहाँ से निकल जाने का वक़्त आ गया है । अगर इस वक़्त न निकल सकी तो फिर नहीं निकल सकेगी ।

जल्दी ही सबको पता चल जाना है कि कारगो वाल्ट में गोल्ड की डकैती हो गई है । तब पुलिस को ये समझते देर नहीं लगेगी कि ये सब तमाशा डकैती को सफल बनाने के लिए ही किया गया था ।

एकाएक सोनिया उठते हुए बोली ।

"अब तक तो प्लेन लैंड कर गया होगा ।"

"तुम यहीं रहो । जल्दी ही तुम्हारे पति से तुम्हारी मुलाकात हो जाएगी ।" एक होस्टेस ने कहा ।

"मैं प्लेन के बारे में जानना चाहती हूँ कि वो लैंड हुआ है या नहीं ?" सोनिया ने परेशान स्वर में कहा ।

"पता चल जाएगा । तुम... ।"

"मैं अभी जानना चाहती हूँ ।" सोनिया दूसरी होस्टेस से बोली, "प्लीज, ये बात तुम मुझे पता करके बता दो ।"

"बताती हूँ ।" कहकर वो एक तरफ चली गई ।

सोनिया ने आस-पास आते-जाते लोगों को देखा ।

हर कोई अपने में व्यस्त था । लोगों को नहीं पता था कि वहाँ क्या हो रहा है ।

"मैंने बाथरूम जाना है ।" सोनिया ने पास खड़ी होस्टेस से कहा ।

"चलो ।"

दोनों बाथरूम जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ गईं ।

"मुझे बहुत घबराहट हो रही है ।" सोनिया ने साथ चलती होस्टेस से कहा ।

"अब तो सब ठीक होने वाला है ।" होस्टेस ने उसे तसल्ली दी, "तुम क्यों घबरा रही...।"

"पता नहीं । पर मुझे घबराहट... ।"

"मैं तुम्हारे साथ हूँ । बाथरूम से फारिग हो लो । मैं तुम्हें कॉफ़ी पिलाऊँगी ।"

"मुझे भूख भी लग रही है ।" सोनिया बोली ।

"खाने का इंतजाम भी हो जाएगा ।" होस्टेस ने मुस्कुराकर सोनिया को देखा ।

वो बाथरूम के दरवाजे पर पहुँची । सोनिया ने दरवाजा धकेलकर होस्टेस से कहा ।

"तुम भी भीतर आ जाओ । अकेले में मेरा दिल ज्यादा घबराता है । मेरी टाँगें भी काँप रही हैं ।"

होस्टेस भी सोनिया के साथ भीतर प्रवेश कर गई ।

बाथरूम में एक युवती दिखी जो कि शीशे के सामने खड़ी अपना मेकअप दुरुस्त कर रही थी । बाथरूम शीशे की तरह चमकता हुआ, साफ था । होस्टेस का हाथ पकड़कर सोनिया बोली ।

"तुम यहीं रहना । जाना नहीं ।"

होस्टेस ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया । सोनिया आगे बढ़ी और एक दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गई । दरवाजा बंद किया और वहीं खड़ी रहकर बाहर की आवाजें सुनने लगी । दो मिनट बीते कि दरवाजा खोले जाने और बन्द होने की आवाज कानों में पड़ी । वो समझ गई कि मेकअप करने वाली युवती चली गई है । कोई और भी आ सकता था । उसने जो करना था, वो जल्दी करना होगा । सोनिया ने दरवाजा खोला और बाहर निकल आई । उसने देखा होस्टेस शीशे में खुद को देख रही है । उसे बाहर आते पाकर वो पलटी और मुस्कुराकर बोली ।

"अब तुम खुद को ठीक महसूस कर रही हो मैडम ?"

"नहीं ! मेरी तबीयत ठीक नहीं है । मैं आराम करना चाहती... ।"

"हम दोनों वापस चलकर कॉफ़ी पीती हैं ।"

सोनिया वॉशबेसिन के पास आई और खुद को शीशे में देखा । अपने चेहरे पर उसने व्याकुलता की छाप देखी । वो जानती थी कि ये व्याकुलता अब यहाँ से निकल जाने की थी । शीशे में उसने अपने पीछे खड़ी होस्टेस को देखा और फुर्ती से पलटकर होस्टेस पर झपट पड़ी ।

"ये क्या कर... ।" होस्टेस ने घबराकर कहना चाहा ।

लेकिन तब तक सोनिया उसे पीछे दीवार तक ले गई थी जो पास ही थी । इससे पहले होस्टेस कुछ समझ पाती, सोनिया ने उसका सिर जोरों से दीवार से टकरा दिया ।

होस्टेस के होंठों से पीड़ा भरी चीख निकली ।

सोनिया ने दोबारा ऐसा किया ।

होस्टेस पुनः कराह उठी । तीसरी बार जब सिर दीवार से टकराया तो होस्टेस के होंठों से कोई आवाज नहीं निकली और दीवार के साथ-साथ लगी-लगी, उसके घुटने मुड़े और नीचे फर्श पर जा लुढ़की । दीवार पर हल्का-सा खून दिखा जहाँ तीन बार उसका सिर टकराया था । होस्टेस बेहोश हो चुकी थी ।

सोनिया के चेहरे पर सख्ती भी थी और घबराहट भी थी । उसने जल्दी से अपने चेहरे के भावों पर काबू पाया और दरवाजा खोलकर बाहर निकल आई । बाहर सब कुछ सामान्य था । सोनिया तेज-तेज कदमों से बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ती चली गई । वो जानती थी कि तब तक वो खतरे में है जब तक कि एयरपोर्ट से दूर नहीं हो जाती । उसके बाद पकड़े जाने का खतरा कम हो जाएगा । वो प्रताप के साथ शहर से दूर निकल जाएगी । करोड़ों रुपया उसके पास होगा । एकाएक सोनिया की सोचें थम गईं ।

दिमाग देवराज चौहान की तरफ गया कि क्या वो डकैती करने में सफल हो गया होगा ? या सारी मेहनत यूँ ही चली गई । ये विचार सोनिया को सिर से पाँव तक बेचैन कर गया । अगर देवराज चौहान सफल नहीं हुआ तो उसे जिंदगी भर अफसोस रहेगा कि करोड़ों की दौलत नहीं मिल सकी ।

तेज कदमों से चलती सोनिया शीशे के दरवाजे के बाहर निकली और पार्किंग की तरफ बढ़ गई । दरवाजे पर दो पुलिस वाले खड़े थे परंतु उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया । पार्किंग कुछ दूर थी परंतु वो चलती रही । सात-आठ मिनट बाद वो पार्किंग में पहुँचकर सामने वाले रास्ते की तरफ चल पड़ी । उसी रास्ते पर उसे खड़ा होना था । वो सब लोग एम्बुलेंस के साथ वहीं से निकलने वाले थे और उसे साथ ले लेना था । यही तय था । सोनिया ने कलाई पर बंधी घड़ी देखी और सोचा कि वो ठीक वक़्त पर आ पहुँची है । मोहन का प्लेन लैंड कर चुका होगा । वे सब इधर से निकलने ही वाले होंगे । परंतु वो खतरे में थी कि अभी पहचानी जा सकती है । इस पार्किंग की तरफ उसे कम खतरा महसूस हो रहा था । फिर वो पार्किंग से निकलकर, उस सड़क पर गई और किनारे पर खड़ी हो गई । कारगो की तरफ से सामान लाने और ले जाने के लिए यही सड़क इस्तेमाल की जाती थी । मन-ही-मन उसने सोचा कि आधा घण्टा वो यहाँ पर उन लोगों के आने का इंतजार करेगी । इससे ज्यादा देर यहाँ खड़ा होना फँसने जैसा था ।

सोनिया ने मोहन के बारे में सोचा और मुस्कुरा पड़ी ।

वो जानती थी कि प्लेन के लैंड होते ही मोहन को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया होगा । वैसे उसे भी यहाँ पर आ पहुँचने के लिए कहा गया था, परंतु वो बच न सका होगा । मन-ही-मन सोचा सोनिया ने कि जान छूटी मोहन से । प्रताप बहुत बढ़िया मर्द है । उसके साथ वो खुश रहेगी । मोहन उसकी देखभाल ज्यादा अच्छी तरह नहीं कर रहा था ।

उसके साथ रहकर वो अक्सर बोरियत महसूस करने लगती थी । उसका और मोहन का बीस करोड़ और दस प्रताप का । तीस करोड़ रुपया उनके पास होगा जो कि नई जिंदगी शुरू करने के लिए काफी है । प्रताप समझदार है । बहादुर है । उससे ज्यादा लम्बा है, जबकि मोहन तो कद में उससे छोटा था । ये बात उसे कभी पसंद नहीं आई ।

"सोनिया !"

जानी-पहचानी आवाज सुनकर सोनिया उसी पल पीछे को पलटी ।

मोहन को देखा जो आँखों में विजयी चमक लिए, उसे ही देख रहा था ।

"त... तुम ।" सोनिया के मस्तिष्क में तीव्र झटका लगा ।

"हैरान क्यों हो रही हो सोनिया । मैंने यहीं पर तो आना था प्लेन से निकलकर ।" मोहन ने कहा ।

"तुम... तुम बच आये उन लोगों से ?" सोनिया के स्वर में आश्चर्य था ।

"आसानी से । मैंने जगमोहन की बताई योजना पर अमल किया और यहाँ आ गया ।" मोहन भौंसले के स्वर में व्यंग भर उठा, "लेकिन लगता है तुम्हें मेरे बच आने के खुशी नहीं हुई ?"

"नहीं, ये... ये बात... ।"

"शायद तुमने सोचा होगा कि मैं मारा जाऊँगा या पकड़ा जाऊँगा । मेरे से तुम्हारा पीछा छूट जाएगा ।"

"नहीं मोहन... मैं... ।"

"साली कुतिया ! मैं तेरा सारा खेल समझ रहा हूँ । तू प्रताप पर मर-मिटी है । मैंने तेरी आँखों में पढ़ी है ये बात । मैंने प्रताप की आँखों में तुम्हारे लिए प्यार देखा है । मैंने अक्सर तुम दोनों को आँखों ही आँखों में बात करते देखा है । तुम्हारी वो बात मुझे अभी तक याद है कि तुमने जगमोहन से पूछा था कि अगर हम में से एक मर जाता है तो क्या उसका हिस्सा भी दूसरे को मिलेगा ? मैं तभी समझ गया था कि तुम मुझे रास्ते से हटाकर, मेरे वाले भी दस करोड़ लेकर तुम प्रताप की गोद में बैठ जाना चाहती हो । लेकिन मैं ऐसा खेल, खेल चुका हूँ कि तुम सब बर्बाद हो जाओगे । मोहन भौंसले कच्चा खिलाड़ी नहीं है कि तुम और प्रताप उसे नाच नचा दो । मैं... ।"

कहते-कहते मोहन भौंसले ठिठका ।

एक तरफ से हेडलाइट दिखाई दी । फिर दूसरी, तीसरी, चौथी हेडलाइट । साफ महसूस हो रहा था कि वो चारों एम्बुलेंस हैं । इस वक़्त उनकी ऊपर की लाल बत्ती बन्द थी ।

"आ गया तेरा हरामी आशिक और मेरा कुत्ता भाई ।" मोहन भौंसले जहर से बुझे स्वर में कह उठा ।

देखते-ही-देखते वे चारों एम्बुलेंस उनके पास आ रुकी ।

"जल्दी-से भीतर बैठो ।" काका मेहर की आवाज दोनों के कानों में पड़ी ।

एक एम्बुलेंस का दरवाजा खुला । सीट पर प्रताप बैठा, मोहन को घूरने लगा ।

मोहन जहरीले अंदाज में मुस्कुराया ।

"बच आया तू ।" प्रताप के स्वर में कड़वाहट थी ।

"जल्दी भीतर बैठो ।" काका मेहर का स्वर पुनः गूँजा ।

"अंदर आ ।" प्रताप ने मौत भरी निगाहों से मोहन भौंसले को देखा ।

मोहन भौंसले ने सोनिया पर निगाह मारी और होंठ भींचकर प्रताप से बोला ।

"मैं जानता हूँ कि तू और सोनिया किस चक्कर में है । सब पता है मुझे ।"

"बकवास न कर । भीतर आ ।" प्रताप गुर्राया ।

"तुम लोग पहुँचो । मैं बाद में आऊँगा ।" मोहन भौंसले ने जहरीले स्वर में कहा, "प्लेन के लगेज में मेरा काला ब्रीफकेस रखा हुआ है, जिसमें तुम सब लोगों का कच्चा चिट्ठा विस्तार से लिख रखा है । पूरी डकैती का हाल लिखा है । सबके नाम लिखे हैं । तुम और सोनिया मुझे रास्ते से हटा देना चाहते थे । लेकिन मैंने तुम लोगों का बिस्तरा गोल कर दिया। अब बच नहीं सकोगे ।" मोहन ने सोनिया पर कड़वी निगाह मारी, "तुम बहुत बड़ी हरामजादी हो । तुमने... ।"

प्रताप ने उसी पल रिवॉल्वर निकाली और गोली चला दी ।

मोहन भौंसले सीने पर हाथ रखे दोहरा होता नीचे जा गिरा ।

काका मेहर ने एम्बुलेंस आगे बढ़ाते हुए कहा ।

"तुमने उसे गोली मार दी ।" उसने परेशान स्वर में पूछा ।

"वो इसी लायक था ।" प्रताप कड़वे स्वर में बोला ।

"देवराज चौहान ने कहा था कि कोई हथियार नहीं रखेगा । किसी की जान नहीं... ।"

"चुप कर... ।" प्रताप गुर्रा उठा ।

काका मेहर ने फिर कुछ नहीं कहा ।

अब सब एम्बुलेंस के ऊपर की लाइट जलने लगी थी । सायरन बजने लगे थे ।

"वो हरामी क्या कह रहा था सोनिया ?" प्रताप ने गुस्से से पूछा ।

"तुमने सुना नहीं ?"

"सुना । तुम्हारे मुँह से बात दोबारा सुनना चाहता हूँ ।"

"बहुत भयानक बात कही उसने ।" सोनिया ने सूखे स्वर में कहा, "उसने कहा कि उसने काले ब्रीफकेस में डकैती का कम्पलीट ब्लू प्रिंट रखा हुआ है और वो ब्रीफकेस हवाई जहाज के लगेज(सामान) में रखा हुआ है । इस तरह तो हम सब बुरी तरह फँस जायेंगे । वो ब्रीफकेस जल्दी ही पुलिस के हाथों में लग जायेगा, जब उसका कोई मालिक नहीं मिलेगा ।"

"साले को तेरा-मेरा प्यार पसंद नहीं आया ।" कहर से बोला प्रताप ।

"उसे गोली मारकर तुमने अच्छा किया ।" सोनिया ने गहरी साँस ली, "मैं उससे परेशान रहने लगी थी ।"

"मेरे होते तू कभी परेशान नहीं होगी ।"

आगे गेट था जहाँ सिक्योरिटी वाले छः-सात लोग खड़े थे । चार-चार एम्बुलेंस को आते देखकर उन्होंने गेट खोल दिया । आगे वाली एम्बुलेंस को जगमोहन चला रहा था । तभी एक सिक्योरिटी वाले ने ऊँचे स्वर में पूछा ।

"गोली कहाँ चली ?"

"मैंने तो गोली की आवाज नहीं सुनी ।" जगमोहन ने एम्बुलेंस आगे बढ़ाते हुए कहा ।

"धमाका हुआ था अभी... ।"

"अच्छा, वो गोली की आवाज थी । मुझे नहीं पता ।"

चारों एम्बुलेंस वहाँ से निकल गई ।

कुछ आगे जाने पर देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा ।

"सड़क के किनारे रोको । पता करना है कि गोली किसने और किस पर चलाई ।"

जगमोहन ने सड़क के किनारे एम्बुलेंस रोक दी ।

पीछे की तीनों एम्बुलेंस इसी प्रकार सड़क के किनारे रुक गईं ।

देवराज चौहान पीछे के एम्बुलेंस के पास पहुँचा । उसमें ललित कालिया था । पत चला कि पीछे वाली एम्बुलेंस में प्रताप है, उसी ने गोली चलाई थी । तो देवराज चौहान, प्रताप के पास पहुँचा ।

"गोली तुमने चलाई ?" देवराज चौहान कठोर स्वर में बोला, "मैंने हथियार साथ लाने को मना किया था ।"

"मेरा इरादा हथियार इस्तेमाल करने का नहीं था ।" प्रताप बोला, "सोनिया से पूछ लो। गोली चलाते मुझे बहुत दुख हुआ था क्योंकि मैंने मोहन पर गोली चलाई । वो मेरा भाई था । वो गद्दारी कर गया कमीना । उसने अपने ब्रीफकेस में हमारे और डकैती के बारे में सारी बातें लिखकर, ब्रीफकेस को प्लेन के सामान में छोड़ दिया है । अब पुलिस को सब कुछ पता चल जाएगा कि हमने कैसे काम किया और कौन-कौन लोग शामिल हैं इसमें । गुस्सा आ गया तो मैंने मोहन को शूट कर दिया । और करता भी क्या ?"

देवराज चौहान कुछ पल प्रताप को देखता रहा फिर बोला ।

"उसने ऐसा क्यों किया ?" 

"वो पागल था ।" प्रताप गुर्रा उठा ।

देवराज चौहान ने सोनिया पर निगाह मारी और प्रताप को देखा ।

स्टेयरिंग पर बैठा काका मेहर बोला ।

"उस ब्रीफकेस से पुलिस मेरे बारे में जान लेगी । जैसे भी हो, वो वापस लाना होगा ।"

"जरूर लायेंगे । हममें कोई जाकर वो ब्रीफकेस लेकर आएगा ।"

"मैं जाऊँ ?" सोनिया तुरंत बोली, "मैंने उस काले ब्रीफकेस को देख रखा है ।"

"तुम नहीं । तुम्हें एयरपोर्ट के कई लोग पहचान चुके हैं । फँस जाओगी ।" देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा, "ये काम जैकी करेगा । प्रताप, तुम जैकी वाली एम्बुलेंस चलाओ । बाहर आ जाओ ।"

देवराज चौहान, जैकी के पास पहुँचा । उसे सारी बात समझाई और ब्रीफकेस का हुलिए बताकर बोला ।

"जल्दी जाओ । प्लेन में रखा लगेज जल्दी ही बेल्ट पर आने वाला होगा । वहाँ से इस ब्रीफकेस को उठाकर ले आओ । ये भी सुन लो कि ब्रीफकेस लेकर तुमने कहाँ पहुँचना है ।"

"पर मोहन भौंसले ने ऐसा क्यों किया ?" जैकी व्याकुलता से कह उठा ।

"ये बात बाद में होगी । अभी वक़्त खराब मत करो ।" देवराज चौहान ने कहते हुए पास आ चुके प्रताप पर नजर मारी ।

जैकी तेज-तेज कदमों से वापस एयरपोर्ट की तरफ बढ़ता चला गया ।

■■■

इंस्पेक्टर प्रकाश भेड़े और उसके साथ कई बड़े चेहरे एयरपोर्ट पर परेशान, बौखलाए से फिर रहे थे । वजह थी कि मोहन भौंसले का नहीं मिलना । प्लेन से यात्रियों की भीड़ सीढ़ियों से उतरकर इस तरह नीचे आई थी कि कुछ देर के लिए घेराव टूट गया था परंतु जल्दी ही यात्रियों को एयरपोर्ट की इमारत तक जाने से पहले ही रोककर एक जगह उन्हें इकट्ठा किया गया था । तेज बरसात में पुलिस को काम करने में परेशानी आ रही थी । उन्हें मोहन भौंसले की तलाश थी परंतु वो न तो यात्रियों में मिला, न प्लेन में । पुलिस, मोहन भौंसले की तलाश में एयरपोर्ट पर दौड़ती फिर रही थी कि भेड़े को खबर मिली कि लाउन्ज से सोनिया भी गायब हो गई है ।

प्रकाश भेड़े को समझते देर न लगी कि वो गहरी चाल के शिकार हो चुके हैं ।

मोहन भौंसले का इस तरह गायब होना और उसी वक़्त में सोनिया का निकल जाना किसी साजिश की तरफ इशारा कर रहा था । एकाएक भेड़े को वानखेड़े का ध्यान आ गया । वानखेड़े ने गोल्ड की डकैती हो जाने की तरफ इशारा किया था । तो क्या उसका ख्याल सही था ।

पूरे एयरपोर्ट पर मोहन भौंसले और सोनिया की तलाश की जा रही थी । दोनों के बारे में हर बाहर निकलने वाले रास्ते को सतर्क कर दिया गया था । उनका हुलिया बता दिया गया था ।

"सर !" इंस्पेक्टर सूरज, भेड़े से बोला, "मोहन भौंसले हमारे हाथ से नहीं जाना चाहिए।"

"मुझे डर है कि कहीं वो हाथ से निकल न गया हो ।" प्रकाश भेड़े बोला, "सम्भव है कि पार्किंग में उसके लिए कोई कार खड़ी हो । हमें पार्किंग में जाकर चेक करना होगा । कुछ और पुलिस वालों को साथ में लो और पार्किंग में चलो ।"

आठ पुलिस वालों के साथ भेड़े और सूरज पार्किंग में खड़ी कारों को चेक कर रहे थे । पार्किंग अटेंडेंट भी मिल गया । मोहन भौंसले का हुलिया बताकर उससे पूछा तो उसने बताया कि ऐसा कोई आदमी कार लेने नहीं आया । वो फिर भी पार्किंग में छानबीन करते रहे । यहाँ कम रोशनी का फायदा उठाकर भौंसले छिप सकता था ।

दस मिनट ही बीते होंगे कि एक पुलिस वाले की ऊँची आवाज आई ।

"सर, यहाँ आइए सर ! वो यहाँ है ।"

सब तेजी से आवाज की तरफ दौड़े ।

पार्किंग के एक किनारे पर पौधों की बाड़ लगी थी ऊँची-सी । उसके पार गाड़ियाँ जाने का रास्ता था । वो उस बाड़ को पार करके उस रास्ते पर पहुँचे कि सामने का नजारा देखते ही ठिठक गए । मोहन भौंसले की लाश पास की रोशनी में उस रास्ते पर पड़ी चमक रही थी। उसकी छाती में गोली लगी थी । मुँह खुला हुआ था । खून से छाती लाल पड़ी हुई थी ।

"इसे किसने मारा ?" सूरज के होंठों से निकला ।

"सूरज !" भेड़े ने होंठ भींचकर कहा, "एयरपोर्ट पर बहुत बड़ी साजिश को अंजाम दिया गया है । वानखेड़े को उस साजिश का संदेह पहले ही हो गया था । उसने सोनिया की हरकतों में ऐसा कुछ भाँप लिया था कि वो इन बातों को डकैती का अलार्म कहने लगा । एयरपोर्ट के कारगो में रखे सोने पर डकैती के लिए एयरपोर्ट पर घबराहट का माहौल बनाया जा रहा था । परंतु मैंने तब उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया ।"

"पर इसे किसने मारा ?"

"इसके ही किसी साथी ने ।"

"साथी ?"

"हाँ ! सोनिया एयरपोर्ट पर अकेले नहीं थी । उसके कुछ लोग और भी मौजूद थे । उन्हीं में से किसी ने मोहन भौंसले को शूट कर दिया है । ये रास्ता बाहर की तरफ जाता है । किसी को भेजकर पता करो कि कौन-सी गाड़ी बाहर गई है । मेरे ख्याल में वो लोग अपना काम करके निकल गए हैं ।" भेड़े ने सख्त स्वर में कहा ।

सूरज ने एक पुलिस वालों को इस रास्ते के गेट की तरफ भेजा ।

"इसकी तलाशी लो ।"

सूरज ने मोहन भौंसले की तलाशी ली ।

परंतु तलाशी में ऐसा कुछ नहीं मिला कि जिससे कोई बात पता चलती ।

दस मिनट में ही वो पुलिस वाला लौट आया ।

"जनाब ! थोड़ी देर पहले चार एम्बुलेंस गई हैं बाहर । सिक्योरिटी वालों ने बताया कि एम्बुलेंस के जाने से पहले उन्होंने फायर की आवाज भी सुनी थी ।" पुलिस वाले ने बताया ।

"वो लोग निकल चुके हैं । सूरज हमें कारगो के वाल्ट तक पहुँचकर देखना है कि वहाँ सब ठीक है कि नहीं ।"

पुलिस वालों को लाश के पास छोड़कर, भेड़े और सूरज तेजी से एक तरफ बढ़ गए ।

बरसात हल्की हो चुकी थी । बूंदाबांदी ही हो रही थी ।

■■■

कारगो के वाल्ट के बाहर बरसात में भी भीड़ लगी थी । वहाँ के गनमैनों को बेहोश पाया गया था । वानखेड़े और शाहिद खान भी बेहोश थे । कारगो के कर्मचारी की निगाह उन पर पड़ गई थी । वाल्ट का दरवाजा खुला हुआ था और भीतर कोई सामान नहीं था । हरी जिल्द वाला रजिस्टर बरसात में भीगता पड़ा था ।

उन सब लोगों को होश में लाने का प्रयत्न किया जाने लगा । जल्दी ही वो होश में आने लगे ।

वानखेड़े जो जब होश आया तो वो उछलकर खड़ा हो गया । फौरन उसने वाल्ट को देखा जो खाली था । वानखेड़े के होंठों से गुर्राहट निकली । वो समझ गया कि डांगरी पहने, लड्डू वाला वो व्यक्ति डकैतों का साथी था । उन्हें बेहोश करके वो सोना ले गए । तो उसका ख्याल सही था कि सोनिया की हरकतें महज इसलिए थीं कि एयरपोर्ट पर ध्यान बँटाकर, उसके साथी पाँच सौ करोड़ के गोल्ड की डकैती कर सकें ।

मोहन भौंसले भी सोनिया का भरपूर साथ दे रहा था ।

कारगो के लोगों को पाँच सौ करोड़ के सोने की डकैती हो जाने के बारे में पता चला तो वो सन्न रह गए । उन्हें यकीन नहीं आ रहा था कि एयरपोर्ट पर डकैती की जा सकती है ।

होश आने पर शहीद खान के भी तोते उड़े हुए थे ।

"आपका ख्याल ठीक निकला सर । वो लोग पाँच सौ करोड़ के सोने की डकैती करके निकल गए ।" शाहिद खान बोला ।

"मेरा ख्याल था कि ऐसा हुआ तो हम उन्हें रोक लेंगे परंतु... ।"

"वो अपना काम कर गए ।"

"डकैती करने वालों ने बहुत चालाकी से काम लिया शाहिद ।" वानखेड़े कठोर स्वर में बोला, "पहले उन्होंने एयरपोर्ट पर हंगामा खड़ा कर दिया कि प्लेन में बम फटेगा । सबका ध्यान उधर लगा दिया और वो डांगरी पहने जो लड्डू खिलाने हमें आया, वो भी डकैतों का साथी था । लड्डुओं में तेज बेहोशी की दवा मिली थी और हमने बेवकूफों की तरह उसके दिए लड्डू खा लिए । सोना ले जाने वाले बहुत तेज निकले ।"

"अब क्या होगा सर ? हमें जल्दी-से कुछ करना चाहिए । क्या पता सोना ले जाने वाले अभी यहीं... ।"

"वो निकल चुके हैं । तब वो पाँच मिनट में ही निकल गए होंगे । रुकने की बेवकूफी नहीं करेंगे । लेकिन हमारे पास उन लोगों के दो मोहरे हैं । सोनिया और मोहन भौंसले । हम उन्हें ढूँढ लेंगे और... ।"

"सर, उस प्लेन का क्या हुआ ? मोहन भौंसले को तो पकड़... ।"

तभी इंस्पेक्टर प्रकाश और भेड़े वहाँ पहुँचे ।

वाल्ट को खाली पाकर हालात समझते देर नहीं लगी उन्हें ।

"सोना गया ?" इंस्पेक्टर प्रकाश भेड़े हड़बड़ाकर बोला ।

"मुझे सही अहसास हुआ था कि ये सब सोने की डकैती करने के लिए किया गया है।" वानखेड़े बोला ।

"ओह, तब मैंने तुम्हारी बात को गंभीरता से नहीं लिया । तब... ।"

"लेकिन इतना सारा सोना वो ले कैसे गए ?" सूरज के होंठों से निकला ।

"एम्बुलेंस पर रखकर... ।"

"एम्बुलेंस ।"

"मेरे ख्याल में उनके पास चार एम्बुलेंस थीं । जिनमें वो सोना भरकर ले गए... ।"

"वो लोग जो भी हैं, बच नहीं सकेंगे ।" वानखेड़े कह उठा, "सोनिया और मोहन भौंसले, उनके बारे में हमें... ।"

"कोई फायदा नहीं ।" भेड़े गंभीर स्वर में कह उठा ।

"सोनिया लाउन्ज से गायब हो गई । तब हम उस प्लेन पर ध्यान दे रहे... ।"

"ओह... !" वानखेड़े के होंठ भिंच गए, "लेकिन मोहन भौंसले हमारे काम... ।"

"वो भी हमारे हाथ से निकल गया । उसे उसके साथियों ने ही मार दिया । पार्किंग के पास उसकी लाश पड़ी है ।"

"नहीं !" शाहिद खान के होंठों से निकला ।

"ये बुरी बात कही ।" वानखेड़े ने सिर हिलाया, "अब हमारा काम और बढ़ जाएगा । डकैती करने वालों तक पहुँचने में हमें ज्यादा मेहनत करनी होगी । वो बच नहीं सकते । पाँच सौ करोड़ का सोना उनके पास है । वो उसे बेचने के लिये बाजार में जायेंगे । पकड़े जायेंगे । हमें तेजी से काम करना होगा । मुखबिर दौड़ाने होंगे ।"

"डकैती करने वाले बहुत शातिर है वानखेड़े ।" भेड़े ने गंभीर स्वर में कहा, "तुमने देखा ही है कि उन लोगों ने अपना काम कैसे निपटाया है । ऐसे लोगों तक पहुँच पाना इतना आसान नहीं होगा ।"

"गैरकानूनी काम करने वाला अंत तक बचा नहीं रह सकता । एक दिन वो पकड़ा ही जाता है ।" वानखेड़े कह उठा ।

"अब इन लोगों को पकड़ने की चुनौती हमारे सामने खड़ी है ।" शाहिद खान ने कहा, "डकैती करने वाले बहुत चालाक लोग हैं । जिस ढंग से इन लोगों ने डकैती की है, उससे लगता है कि ये लोग पहुँचे हुए लोग हैं ।"

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