प्रथम विश्‍व युद्ध में हिटलर

प्रथम विश्‍व युद्ध की कीचड़ भरी, चीलर भरी, बदबूदार खाइयों में एडोल्फ हिटलर को जर्मन पितृभूमि की रक्षा में लड़ने के लिए एक नया घर मिल गया। वर्षों तक गरीबी, अकेलेपन और अनिश्‍चय के दौर से गुजरने के बाद अब उसे अपनेपन और जीवन की सार्थकता का बोध हुआ।

‘सारे युद्धों का अंत करने का युद्ध’ 28 जून, 1914 को आरंभ हुआ, जिस दिन एक युवा सर्बियाई आतंकवादी ने ऑस्ट्रियाई सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्क ड्यूक फ्रांज फर्डीनेंड की गोली माकर हत्या कर दी। घटनाक्रम ने उस समय तेजी पकड़ ली, जब जर्मनी के सम्राट् विलहैम ने ऑस्ट्रिया को सर्बिया पर हमला करने के लिए कहा। फिर रूस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ मोरचा बाँधना शुरू कर दिया। जर्मनी ने रूस के विरुद्ध मोरचा बाँधा। फ्रांस और ब्रिटेन ने मिलकर जर्मनी के खिलाफ लामबंदी का बिगुल बजा दिया।

समस्त यूरोप और इंग्लैंड में, एडोल्फ हिटलर समेत, जवान मर्दों ने आतुरतापूर्वक अपनी सेवाएँ युद्ध के लिए अर्पित कर दीं। उसने पहले भरती हुए अधिकतर फौजियों की तरह उन्होंने भी सोचा कि लड़ाई जल्दी खत्म हो जाएगी; लेकिन वे यह भी चाहते थे कि लड़ाई कुछ तो लंबी खिंचे, ताकि उन्हें युद्ध की काररवाई देखने और महान् साहसिक कार्य में भाग लेने का कुछ मौका मिले।

यह युद्ध लंबे समय तक चला, जिसमें लाखों योद्धा मारे गए। जवाँ मरदों की एक पूरी पीढ़ी का खात्मा हो गया। युद्ध के कारण बादशाहों और प्रभावशाली अमीरों की प्राचीन यूरोपीय संस्कृति एवं उनकी प्रचलित प्रथाओं का भी पतन हो गया।

सेनाओं ने एक-दूसरे के खिलाफ नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया, जैसे कि लड़ाकू विमान, टैंक, मशीनगन, दूर तक मार करनेवाली तोपें और घातक गैस। लेकिन फ्रांस होते हुए उत्तर सागर से जर्मनी की सार नदी तक की मोरचाबंदी के कारण जिच की स्थिति बन गई। उन दुर्गम खंदकों में रहकर एडोल्फ हिटलर ने युद्ध की सच्चाई को जाना।

हिटलर ने 25 साल की उम्र में बवेरियन रेजीमेंट में भरती होकर स्वेच्छा से सेना में सेवा करना स्वीकार किया। इस रेजीमेंट ने वाइप्रिस के निकट ब्रिटिश और बेल्जियन फौजों के विरुद्ध पहला युद्ध लड़ा, जिसमें हिटलर की रेजीमेंट के 3,000 में से 2,500 सिपाही मारे गए, जख्मी हो गए या लापता हो गए। लेकिन हिटलर को कुछ भी नहीं हुआ। अधिकतर लड़ाई के दौरान हिटलर भाग्यशाली रहा कि उसे ऐसी कोई चोट नहीं लगी कि उसका जीवन खतरे में पड़े। एकाधिक बार ऐसा हुआ कि किसी जगह से उसके चले जाने के कुछ पलों के बाद ही वहाँ कोई बम फटा और सारे लोग मारे गए या जख्मी हो गए।

कुछ भी हो, हिटलर एक असामान्य सिपाही था। उसका व्यवहार बेढंगा और सैनिक तौर-तरीकों के विपरीत था। लेकिन वह युद्ध में भाग लेने और खतरनाक कार्यों का बीड़ा उठाने के लिए हमेशा तैयार रहता था, कई बार मौत से बाल-बाल बच निकलने के बाद भी।

कॉरपोरल हिटलर डाक-वाहक था। वह पीछे कमान स्टाफ से संदेशों को लेकर युद्धक्षेत्र के निकट लड़ाई में संलग्न टुकड़ियों तक पहुँचाता था और कमान स्टाफ के लिए उनसे संदेश लेकर वापस आता था। लड़ाई में सन्नाटे के दौरान वह अपने वाटर कलर्स निकाल लेता और युद्ध के दृश्यों के चित्र बनाता रहता।

हिटलर अपने साथी सैनिकों के विपरीत कभी ऐसी शिकायतें नहीं करता था कि खाना ठीक नहीं है और उन्हें बड़े खराब हालात में रहना पड़ रहा है। वह स्त्रियों के बारे में भी कभी बात नहीं करता था। उसे कला या इतिहास पर चर्चा करना अधिक पसंद था। उसे घर से कुछेक खत मिले, लेकिन कभी उसका पार्सल वगैरह नहीं आया और उसने कभी छुट्टी भी नहीं माँगी। उसके साथी यह मानते थे कि हिटलर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने के लिए बहुत उत्सुक रहता है, लेकिन सामान्यत: वह एकाकी प्रवृत्ति का लुभावना व्यक्ति था और संयोगवश चोट खाने से बच जाता था। निस्संदेह वह एक साहसी युवक था।

7 अक्तूबर, 1916 को हिटलर अपने भाग्य से उस समय चूक गया, जब सोगे की लड़ाई के दौरान फटे किसी गोले का टुकड़ा लगने से उसका पाँव जख्मी हो गया। जर्मनी में उसे अस्पताल में भरती कराया गया। लड़ाई के दो साल बाद वह पहली बार युद्ध के मोरचे से दूर रहा। स्वस्थ हो जाने पर वह बर्लिन में दर्शनीय स्थलों के भ्रमण पर निकल गया और फिर उसे म्यूनिख में हलकी-फुलकी जिम्मेदारी सौंप दी गई। वह जर्मन असैनिक पदाधिकारियों में उदासीनता और युद्ध-विरोधी भावना देखकर हताश था। इसके लिए वह बहुत हद तक यहूदियों को दोषी मानता था और उसकी दृष्टि में वे अशांति फैलाने की साजिश रचने तथा जर्मनी के युद्ध प्रयास को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार थे।

युद्ध-विरोधी षड्यंत्र में यहूदियों का हाथ है, यह उसकी पक्की सोच बन गई थी और उस सोच के चलते वियना में उसके द्वारा ग्रहण किए गए अन्य सामी-विरोधी विचारों को मजबूती मिली, जिसके परिणामस्वरूप यहूदियों के प्रति नफरत बढ़ती चली गई।

निरुत्साह असैनिक पदाधिकारियों से पीछा छुड़ाने की खातिर हिटलर ने मोरचे पर वापस जाने की इच्छा जताई और मार्च 1917 में उसे वापस भेज दिया गया।

अगस्त 1918 में उसने प्रथम श्रेणी का आयरन क्रॉस प्राप्त किया, जिसे हासिल करना पैदल सैनिकों के लिए चमत्कार से कम नहीं समझा जाता था। दिलचस्प बात यह है कि जिस लेफ्टिनेंट ने उस पदक के लिए उसकी सिफारिश की थी, वह एक यहूदी था। हिटलर इस सच्चाई को बाद में छिपा गया। अपने अच्छे रिकॉर्ड एवं कुल पाँच पदकों के बावजूद वह एक कॉरपोरल ही बना रहा। वह देखने में सैनिक जैसा नहीं लगता था और उसका व्यक्तित्व विचित्र-सा था। इस वजह से उसके वरिष्ठ अधिकारियों का मानना था कि उसमें नेतृत्व के गुणों का अभाव है और एक सारजेंट के रूप में उसे पर्याप्त आदर नहीं मिल सकेगा।

युद्ध के ज्वार ने जैसे ही जर्मन लोगों के खिलाफ पलटा खाया और युद्ध के मोरचे पर मनोबल में गिरावट आई, हिटलर उदास हो गया। वह अकसर तंबू के अंदर कोने में बैठा घंटों सोच में डूबा रहता और फिर अचानक उछलकर खड़ा हो जाता और ‘जर्मन लोगों के अदृश्य शत्रु’, अर्थात् यहूदियों एवं मार्क्सवादियों के खिलाफ जोर-जोर से चिल्लाने लगता।

अक्तूबर 1918 में वाइप्रेस के निकट ब्रिटेन की फौज द्वारा किए गए क्लोरीन गैस के आक्रमण में वह कुछ समय के लिए अंधा हो गया था। उसे ऐसे समय घर वापस भेज दिया गया, जब देश भूख एवं युद्ध से पीड़ित था और हर जगह अशांति का माहौल था। वह एक अस्पताल के पलंग पर पड़ा हुआ आसन्न महा-विपत्ति की भयावह अफवाहों के बीच समय काटता रहा।

10 नवंबर, 1918 को एक वयोवृद्ध पादरी अस्पताल में आया और उसने उसे यह खबर सुनाई कि सम्राट् और हालेंजोलर्न वंश का पतन हो गया है तथा उनका प्यारा पितृदेश अब एक गणतंत्र बन गया है। युद्ध समाप्त हो गया है।