“मैं गाड़ी यहाँ लाता हूँ। तुम गाड़ी में से नोटों से भरे थैले निकाल लो। मैं गाड़ी ले जाऊँगा और इस गाड़ी को छोड़कर, दूसरी गाड़ी में आऊँगा। तुमने कमिश्नर से मिलने जाना है तो गाड़ी का बदला होना ही ठीक होगा।” देवराज चौहान ने कहा।
“ये बात तो ठीक कही देवराज चौहान।” मीणा कह उठा।
“लेकिन अभी तो सुबह के छ: बजे हैं। क्या तुम अभी चले जाओगे?” दामले ने कहा।
“हाँ। मैं जगमोहन से मिल आऊँगा। खाना, पानी और कपड़े लेकर ग्यारह बजे तक आ जाऊँगा।”
“जगमोहन को साथ मत ले आना...।” मीणा ने कहा- “उसकी नजर पैसे पर रहेगी।”
“उसका यहाँ कोई काम नहीं है।” देवराज चौहान ने कहा।
“क्या पता कि तुम वापस ही ना लौटो?” दामले ने शंका व्यक्त की।
“मैं आऊँगा।” देवराज चौहान बोला- “जब मुझे जाना होगा तो सीधे-सीधे कह कर जाऊँगा। मैं गाड़ी लेकर आता हूँ....”
देवराज चौहान पजेरो की तरफ बढ़ गया।
“मीणा!” दामले ने कहा- “देवराज चौहान हमसे कोई चालाकी तो नहीं कर रहा?”
“कैसी चालाकी?”
“पता नहीं। ये खतरनाक, चालाक डकैती मास्टर है, दौलत के चक्कर में ये कहीं मुझे ना मार दे।”
“तूने देखा नहीं पहले, कि ये कितनी शराफत से मेरे साथ रहा। इसके पास मौका था, परन्तु दौलत लेकर नहीं भागा।” मीणा बोला।
“कहीं अब इसकी नियत ना बदल गई हो?”
“शक मत कर दामले। देवराज चौहान सच में ईमानदार है।”
“यकीन नहीं आता कि दुनिया में ऐसे भी ईमानदार हैं, वो भी जो नम्बर वन डकैती मास्टर हो।”
“ये जुबान वाला है।” मीणा बोला।
“ऐसा तो नहीं कि हम दौलत को यहाँ गड्डे में छिपा दें और उसके बाद, ये मुझे मार कर, दौलत ले उड़े?”
“तू देवराज चौहान पर इतना शक क्यों करता है?”
“शक नहीं कर रहा, मैं सतर्कता बरत रहा हूँ...।”
“अभी हम यहाँ थे। इधर खुदाई कर रहे थे। देवराज चौहान चाहता तो दौलत से भरी गाड़ी लेकर भगा सकता था...।”
“हाँ।”
“लेकिन नहीं भागा वो। अब भी तो भाग सकता है। हम इधर हैं। वो गाड़ी में उधर...।”
तभी पजेरो का इंजन स्टार्ट होने की आवाज आई।
“वो भाग रहा है।” दामले के होंठों से निकला।
“नहीं, वो दौलत को इधर ला रहा है।”
“तुम देखना, वो भाग जायेगा...वो...।”
मीणा ने बुरा सा मुँह बनाया।
“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा। पर इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई।”
“क्या?”
“तू अब मुझे स्वीकार करने लगा है।” मीणा मुसकरा पड़ा।
“नहीं, मैं...”
“तू मुझे स्वीकार करने लगा है। मुझे अपने साथ रखने की सोच रहा है, तभी तो तुझे दौलत की चिन्ता हुई। वरना पहले तू परवाह ही कहाँ कर रहा था डेढ़ सौ करोड़ की?” मीणा ने कहा।
“नहीं, अभी मैंने तुझे अपने शरीर में स्वीकार नहीं किया।” दामले तेज स्वर में बोला।
“धीरे-धीरे कर लेगा।
“नहीं। पहले मैं कमिश्नर से बात करूँगा। अगर उसे मेरी बात समझ में आ गई, उसने मुझे बे-कसूर माना, तो मैं...।”
“तू अभी पुलिसवालों को जानता नहीं।” मीणा हंसा- “मैं खुद चाहता हूँ कि एक बार तू कमिश्नर से मिल ले। बात कर ले...”
दामले चुप रहा।
तभी देवराज चौहान पजेरो वहाँ ले आया। पास में रोका और बाहर निकल कर बोला- “भीतर पड़े थैलों को खींचकर यूँ ही बाहर गिरा लो...”
“तुम भी हाथ लगाओ...।” मीणा ने कहा और पजेरो की तरफ बढ़ गया।
देवराज चौहान भी पास पहुँच गया।
फिर देवराज चौहान और दामले ने मिल कर पाँचों थैले पजेरो से बाहर गिरा लिए
देवराज चौहान ने सारे दरवाजे बंद करके कहा- “मैं जाऊँगा अब...।”
“जल्दी आना।” दामले बोला- “मैं भूखा-प्यासा हूँ...।”
“ग्यारह बज जायेंगे आते-आते। तुम्हारे कपड़े भी लाने हैं। पजेरो को कहीं छोड़ कर दूसरी गाड़ी उठानी है।”
“पर आना जरूर...।”
“जरूर आऊँगा।” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने गाड़ी स्टार्ट की और घुमाकर हाईवे की तरफ लेता चला गया।
दामले और मीणा उसे जाते देखने लगे।
“मीणा, मुझे घबराहट हो रही है, अगर देवराज चौहान ना आया तो?”
“आयेगा। ना आया तो कोई बात नहीं...।” मीणा हंसा- “आखिर उसने जाना तो था ही।”
“मुझे उसका सहारा था।” दामले ने कहा- “उससे दो बातें कर लेता था।”
“ये सहारा तो मुझे भी था।”
दामले ने पाँचों थैलों को देखा, फिर कहा- “इसमें नोट भरे हैं?”
“हाँ। इन पाँचों थैलों में डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है। यानि कि एक में 30 करोड़ रुपये...।” मीणा ने हंस कर कहा- “सब तेरे है, मेरे हैं। तेरे परिवार के लिए हैं। तेरे बेटे के लिए हैं।”
“अ...अगर यहाँ कोई आ गया तो?” दामले आशंकित स्वर में बोला।
“कोई नहीं आयेगा।”
“पुलिस आ गई तो मैं पकड़ा जाऊँगा। तेरा क्या है, तू तो मेरे शरीर से निकल कर, कहीं और जगह बना लेगा।”
“तू वहम-शक बहुत करता है। घबरा बहुत जल्दी...।”
“मैंने ऐसे काम कभी नहीं किए ना....।”
“मैंने कौन सा किए हैं जो...।”
“पर तू पुलिस वाला है, हिम्मत वाला है, मैं तेरे जैसा तो नहीं...।”
“फिक्र क्यों करता है? मैं तेरे साथ हूँ। हम दोनों साथ हैं। जहाँ मैं गलती करूँ, तू बता देना, जहाँ तू गलती करेगा, मैं बताऊँगा। इसी तरह मिल-बाँट कर जिन्दगी का वक्त निकाल लेंगे।”
मीणा ने कहा।
“मतलब कि तू मुझे छोड़ कर नहीं जायेगा?” दामले बोला। “नहीं। बस तेरी ये बात ही नहीं मानूंगा। बाकी सब कुछ मानूंगा।”
“उधर छाया में चलते हैं।” दामले ने कह कर कदम बढ़ा दिए- “कुछ आराम करके, गड्डा गहरा शुरू करेंगे।”
“तेरे को मेरा सहारा है ना...कि इस मौके पर मैं तेरे साथ हूँ।”
“हाँ, सहारा तो है।” दामले ने सिर हिलाया। वो कॉटेज की छाया में पहुंच गया था।
“इसी तरह मुझे भी तेरा सहारा है। हम दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”
“भगवान ही जाने...।” सुधीर दामले बड़बड़ा उठा।
☐☐☐
देवराज चौहान बंगले पर पहुंचा तो सुबह के आठ बज रहे थे। वो जानता था कि जगमोहन इस वक्त नींद में होगा। उसने छिपी जगह से बंगले की दूसरी चाबी निकाल कर, दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश कर गया। सबसे पहले जगमोहन के बैडरूम में पहुँचा तो जगमोहन को गहरी नींद में पाया।
देवराज चौहान वहाँ से बाहर निकला और बाथरूम में जा पहुँचा।
आधे घंटे बाद ही नहा-धोकर उसने कपड़े बदले और किचन में पहुंच कर अपने लिए और जगमोहन के लिए कॉफी बनाने लगा। परन्तु इस दौरान उसका मस्तिष्क सुधीर दामले और मीणा के गिर्द ही घूमता रहा।
वो एक जिस्म दो जान थे।
कोई सुने तो विश्वास ना करे।
यकीन करने लायक बात भी तो नहीं थी
वो इन हालातों का गवाह न होता तो, इस बात पर जरा भी विश्वास ना करता।
कॉफी बनाकर दोनों प्याले थामे वो जगमोहन के बैडरूम में पहुँचा, उसे नींद से उठाया।
“आ गये तुम...।” जगमोहन उसे देखते ही कह उठा और उठ कर काफी का प्याला थाम लिया।
देवराज चौहान ने कुर्सी खींची और पास ही बैठ गया।
“मीणा गया दौलत लेकर?” कॉफी का घूँट भरते हुए जगमोहन ने पूछा।
देवराज चौहान मुसकराया, उसने भी घूँट भरा।
“कहाँ गया वो?”
“अभी कहीं पर टिका हुआ है...।” देवराज चौहान ने कहा।
“कहाँ?”
देवराज चौहान ने बताया।
“उसने तुम्हें डेढ़ सौ करोड़ की दौलत में से कुछ नहीं दिया?” जगमोहन बोला।
“देना चाहा, परन्तु मैंने नहीं लिया।”
जगमोहन मुँह बनाकर रह गया।
“वहाँ पर बहुत दिलचस्प हालात हैं। तुम सुनोगे तो यकीन नहीं करोगे।” देवराज चौहान ने कहा।
“कैसे हालात?”
“जिसने बैंक में डकैती की, वो सब-इंस्पेक्टर मीणा होते हुए भी, मीणा नहीं था।”
“क्या मतलब?” जगमोहन के माथे पर बल पड़े।
“वो शरीर सुधीर दामले नाम का आदमी का था। जिसकी पत्नी तारा है, तब जो बैंक के बाहर से बात कर रही थी।”
“तुम कह रहे हो कि शरीर सुधीर दामले का था, लेकिन बैंक डकैती सब-इंस्पेक्टर मीणा ने की?”
“हाँ...”
“ये बात मुझे कोई और कहता तो मैं उसे धक्के मार कर बाहर निकाल देता।” जगमोहन मुस्कराया।
“तुम्हें पूरी बात सुन लेनी चाहिये।”
“बताओ।”
देवराज चौहान ने सब कुछ जगमोहन को बताया।
जगमोहन हैरानी से देवराज चौहान को देखता सुनता रहा।
सब कुछ बता दिया देवराज चौहान ने।
“नहीं।” जगमोहन के होंठों से निकला- “ऐसा नहीं हो सकता। ये सब मैंने पहले कभी नहीं सुना।”
“ये ही रहा है, मैं वहाँ पर इन्हीं हालातों को छोड़कर आया हूँ...।” देवराज चौहान ने कहा।
जगमोहन हक्का-बक्का, देवराज चौहान को देखता रहा।
“यकीन आ गया होगा?” मुस्करा कर पूछा देवराज चौहान ने।
“न...हीं...”
“मैं कह रहा हूँ तो भरोसा कर लो। सब कुछ मेरे सामने हुआ।”
“ये कैसे हो सकता है कि मीणा की आत्मा मरने के बाद, दामले के शरीर में...।”
“ये हुआ पड़ा है और इससे वास्ता रखती सारी बातें तुम्हें बता दी हैं मैंने।”
“यकीन ना करने वाली बात है ये।” जगमोहन बेचैनी से कह उठा।
“हाँ। यकीन ना करने वाली बात है ये...।” देवराज चौहान ने कॉफी का प्याला खाली करके एक तरफ रखा।
“दामले, मीणा की आत्मा को अपने शरीर से बाहर नहीं निकाल सकता?”
“वो सच में बेबस हुआ पड़ा है।”
“तब तो दामले कानून की निगाहों में बुरी तरह फंस गया। वो मुजरिम माना जायेगा।”
“हाँ...। परन्तु वो पुलिस को समझा कर अपने बे-गुनाह होने की बात कहना चाहता है।”
“पुलिस उसकी बात पर यकीन नहीं करेगी...”
“मानता हूँ...।”
“तो दामले अब क्या करेगा? क्या मीणा की आत्मा को अपने शरीर में रखेगा?”
“मजबूरी है उसकी...।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “यूँ वो नहीं चाहता कि सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा उसके शरीर में रहे, परन्तु वो उसे निकाल भी नहीं सकता। शरीर तभी कोई काम कर सकता है, जब दोनों वो काम करने पर सहमत हों। ऐसे में दामले ये बात समझ चुका है कि उसे मीणा के साथ मिलकर ही रहना पड़ेगा। तभी कोई काम कर पायेगा। अब दामले धीरे-धीरे मीणा को स्वीकार करने लगा है। दोनों मिलकर डेढ़ सौ करोड़ की दौलत को जमीन में दबा रहे हैं। उसके बाद वे कमिश्नर पाटिल से मिलने की कोशिश...।”
“हाँ...।”
“क्यों?”
“ये आईडिया मीणा का था। जब तक उन दोनों की सोचें एक समान नहीं होती, तब तक दौलत को गाड़ी में रखने की अपेक्षा कहीं छिपा देना ही बेहतर है। ये सोच बुरी भी नहीं है।” देवराज चौहान ने कहा।
जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कहा- “तुम्हारे मुँह से मैं कितनी अजीब बातें सुन रहा हूँ! यकीन करने को दिल नहीं करता।”
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली।
“तुम अब उनके पास से आ गये?”
“जाना है अभी। दामले को खाने और पानी की जरूरत है। कपड़ों की जरूरत है। फिर मैं भी देखना चाहता हूँ, अब वो क्या करते हैं। क्योंकि दामले ने अभी तक, अपने शरीर में घुसी मीणा की आत्मा को पूरी तरह स्वीकारा नहीं है। दामले कभी भी पलट खा सकता है और इस जिद्द पर आ सकता है कि वो उसके शरीर से निकल जाये।”
“यानि कि दामले के हालात बुरे हैं।” जगमोहन बोला।
“बहुत बुरे। इस मामले में सबसे ज्यादा उसकी जिन्दगी प्रभावित हुई है। वो कानून की निगाहों में मुजरिम बन गया। अपने परिवार से दूर हो गया। उसकी अपनी जिन्दगी तो पूरी तरह खत्म हो गई।”
“और मीणा के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?”
“वो मर चुका है। मरने के बाद उसका हमारी दुनिया से नाता खत्म हो चुका है। परन्तु वो अपने वक्त से बाईस साल पहले जान गवां बैठा है, इसलिए दूसरी दुनिया के नियम के मुताबिक बाईस साल के बाद ही उसे स्वर्ग या नर्क में जगह मिल पायेगी। वो कहता है कि ये बाईस साल वो, दामले के शरीर में ही रह कर बितायेगा। दामले के शरीर के सहारे ही वो दौलत का मजा लेगा। मीणा की आत्मा तो, दामले के शरीर को अपना घर माने बैठी है। वो बाहर निकलने को तैयार नहीं।”
“और दामले उसे बाहर नहीं निकाल सकता?”
“नहीं। ऐसा करना उसके बस से बाहर की बात है।”
“फिर तो दामले को मीणा के साथ मिलकर रहना पड़ेगा।” जगमोहन ने कहा।
“हाँ, अन्तिम रास्ता ये ही है।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
“दामले के साथ बुरा हो रहा है।”
“यकीनन। परन्तु मीणा के साथ भी अच्छा नहीं हो रहा। बेशक वो मर गया है, परन्तु दूसरी दुनियाँ ने उसे स्वीकारा नहीं। वो अपना शरीर खो चुका है। हम उसके बारे में इसलिये नहीं सोच रहे, क्योंकि अब वो सिर्फ आत्मा है। शरीर नहीं है।”
“ये सब बातें सुन कर बहुत अजीब सा लग रहा है मुझे...।” जगमोहन बोला।
“बात ही ऐसी है। खैर, तुम बाजार से इतना खाना पैक करा लो कि दामले आज का दिन निकाल सके। पानी की बीस लीटर वाली दो बड़ी बोतलें और एक पैंट-कमीज खरीद लो। ये सामान ले जाना है मुझे।”
“मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा। उन्हें देखूगा कि...।”
“तुम्हारे वहाँ जाना ठीक नहीं। वहाँ हालात इतने बेहतर नहीं हैं। पुलिस दौलत को और दामले को तलाश कर रही है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। तुम यहीं रहो, सामान लेकर सिर्फ मैं ही जाऊँगा।”
जगमोहन सिर हिलाकर रह गया। चेहरे पर सोचों के भाव थे।
“कुछ कहना चाहते हो?” देवराज चौहान ने पूछा।
“नहीं।” जगमोहन ने कहा- “मैं दामले और मीणा के बारे में सोच रहा हूँ...।”
“उनके बारे में जितना भी सोच लो, परन्तु कोई फायदा नहीं। स्थिति विचित्र है। हालात ना समझ में आने वाले। इस बारे में वो अपना फैसला स्वयं ही लेंगे। कोई भी उनकी सहायता नहीं कर सकता।”
“मान लो कि दामले को पुलिस पकड़ लेती है-तब मीणा की आत्मा क्या करेगी?” जगमोहन बोला।
“मजबूरी में मीणा की आत्मा, दामले के शरीर को छोड़ कर चली जायेगी।”
“यानि कि फंसा तो दामले ही फंसा? मीणा को कुछ नहीं होगा!”
“मीणा इन्सान नहीं है। वो सिर्फ आत्मा है। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
“हाँ, ये सच है।”
“हम दामले के लिये कुछ नहीं कर सकते?”
“कुछ नहीं कर सकते।” देवराज चौहान ने इन्कार में सिर हिलाया- “ना ही दामले अपने लिए कुछ कर सकता है।”
“मतलब कि दामले मजबूर है. मीणा की आत्मा से...” जगमोहन ने होंठ सिकोड़े।
देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिलाकर कहा- “तुम तैयार हो जाओ और जो सामान कहा है, वो ले आओ।
एक कार का भी इन्तजाम करना है।”
“कार का?”
“हाँ। पजेरो मैंने एक सड़क पर छोड़ दी। दामले ने कमिश्नर से मिलने जाना है तो पजेरो में जाना ठीक नहीं। हो सकता है कि पजेरो की बात पुलिस को पता लग गई हो। एक कार भी कहीं से उठा लाना।”
☐☐☐
दिन के बारह बज रहे थे।
सूर्य सिर पर चढ़ा, जमीन को तपा रहा था। गर्म हवा के थपेड़े शरीर से टकरा रहे थे।
सुधीर दामले का शरीर पसीने से भरा पड़ा था। कपड़े मिट्टी से मैले हो रहे थे। छः फीट गहरे गड्ढे में घुसा वो किसी तरह भीतर की मिट्टी फावड़े में उठाकर बाहर फेंक रहा था।
“बस कर।” दामले कह उठा- “मैं थक गया हूँ...।”
“मालूम है मुझे कि तेरा शरीर थक गया है...” मीणा बोला- “काम भी खत्म हो गया है। हमने काफी तेजी से काम किया। इतना गड्ढा काफी है वो पाँचों नोटों के थैले रखने के लिए।”
“यहाँ से बाहर निकलते हैं। प्यास से मेरा गला सूख रहा है।” दामले ने कहा।
उसके बाद दामले किसी तरह गड्ढे से बाहर निकला और कॉटेज की छाया की तरफ बढ़ता बोला- “कॉटेज में अगर पंखा लगा होता तो कितना अच्छा रहता!”
दामले बोला।
“बिजली-पानी नहीं है कॉटेज में...।” दामले छाया में जाकर बैठ गया। कलाई पर बंधी घड़ी पर नजर मार कर कह उठा- “बारह बज गये। देवराज चौहान नहीं आया?”
“आ जायेगा।” मीणा ने कहा।
“मेरी मान, वो नहीं आयेगा। भाग गया वो।”
“मेरा मन नहीं मानता कि इस तरह भाग जायेगा।” मीणा मुस्कराया- “वो आयेगा।”
“तेरे को उस पर इतना यकीन क्यों है?”
“मुझे वो ठीक बंदा लगा।”
“तो डकैती मास्टर है। माना हुआ खतरनाक बंदा....” दामले चिढ़कर बोला।
“दुनिया के लिए डकैती मास्टर होगा-हमारे लिए तो वो शरीफ इन्सान है।” मीणा पुनः मुस्कराया।
“मुझे उस पर भरोसा नहीं। ये ही सोचता हूँ कि दौलत पाने के लालच में, वो मुझे मारवा ना दे।”
“ऐसा नहीं होगा।”
“हुआ तो तू क्या कर लेगा?”
“रिवाल्वर है जेब में, उसने गड़बड़ की तो मैं उसे शूट कर दूंगा।”
“एक और खून करेगा?”
“करना पड़ा तो...।”
“इल्जाम मेरे सिर पर आयेगा। मैं तेरे को हत्या नहीं करने दूंगा।”
“बेवकूफ! वो डकैती मास्टर है। उसके मरने की खबर पाकर पुलिस खुश होगी।”
“मैं अगर उसे मार दूं तो क्या पुलिस मुझ पर लगे इल्जाम हटा लेगी?”
“कभी नहीं। परन्तु तेरे को थोड़ी बहुत रियायत जरूर मिल जायेगी। तू ये बेकार की बातें मत सोच...।”
“ठीक कहता है। वो अब नहीं आयेगा तो उसके बारे में हमें सोचना भी नहीं चाहिये...।”
“नोटों वाले थैलों को गड्ढे में लुढ़का दें?” मीणा बोला।
“मैं भी ये ही सोच रहा हूँ...।”
फिर दामले उठा और थैलों के पास पहुंचा।
परन्तु थैलों को सरका पाना भी आसान काम नहीं था। ऊपर से शरीर थका हुआ था।
“ये तो बहुत भारी हैं। सरक नहीं रहे...।” मीणा कह उठा।
“कमिश्नर पाटिल से भी मिलने जाना है।” दामले ने जैसे याद दिलाया।
“याद है। भूला नहीं हूँ...।”
“देवराज चौहान तो आने वाला नहीं। कार होती तो हमारे लिए जाना आसान हो जाता।”
“आना तो चाहिये उसे... ।”
तभी उसके कानों में कार के इंजन की मद्धम सी आवाज पड़ी।
“वो आ गया है।” मीणा बोला।
“कहीं पुलिस ना हो...।” दामले घबरा कर बोला।
“देवराज चौहान ही होगा।” मीणा ने कहा और कुछ आगे बढ़ा।
“रुक जा।” दामले ठिठक गया- “यहाँ छिप जाते हैं और आने वाले को देखते हैं।”
“इतना मत डर।” मीणा कह उठा- “अगर पुलिस आई है तो फिर बचा नहीं जा सकता।”
तभी कार के इंजन की आवाज पास आ गई थी।
दामले की निगाह कॉटेज के उस कोने की तरफ थी, जहाँ से आवाज आ रही थी।
उसी पल कार प्रकट हुई।
साधारण सी सेंट्रो कार थीं और उसमें बैठा देवराज चौहान दिखा।
“मैंने कहा था ना कि देवराज चौहान आयेगा...।” मीणा मुस्करा कर कह उठा।
“मुझे डर है कि कहीं दौलत के लालच में ये मुझे मार न दे।” दामले बोला।
“वहम मत किया कर।”
कार पास पहुँच कर रुक गई। देवराज चौहान बाहर निकलते कह उठा- “गड्ढा तैयार है तो थैलों को भीतर क्यों नहीं फैंका?”
“भारी हैं, सरक नहीं रहे...” मीणा बोला।
“चलो...मैं हाथ लगाता हूँ...।” फिर दामले और देवराज मिलकर एक-एक करके थैलों को गड्ढे तक ले आते और भीतर गिरा देते। जब पाँचवें थैले की बारी आई तो दामले कह उठा- “मीणा, कुछ पैसा निकाल लेते हैं-खर्चे के लिए भी तो कुछ चाहिये...”
“ठीक है। पाँच-दस लाख निकाल लेते हैं...।”
फिर उस मोटे थैले को फावड़े के सहारे थोड़ा सा काटा गया और भीतर से हजार-हजार के नोटों की दस गड्डियां निकाल कर, थैले को गड्ढे में सरका दिया गया।
“अब गड्ढे को मिट्टी से भर दो।” देवराज चौहान ने कहा।
“तुम खाना लाए हो?” दामले ने पूछा।
“हाँ। पानी भी है, कपड़े भी हैं।”
“मैं मिट्टी से भरा पड़ा हूँ। मुझे नहाना पड़ेगा।” दामले बोला।
“मैं पीने के लिए पानी लाया हूँ, नहाने के लिए नहीं।” देवराज
चौहान ने जवाब दिया।
“नहाने की फिक्र मत कर दामले।” मीणा बोला- “रेलवे स्टेशन जाकर नहा लेंगे।”
दामले गहरी सांस लेकर बोला- “मैं फंस जाऊँगा। मेरा चेहरा सब जानते हैं।”
“मैं तेरा चेहरा बदल दूंगा। इतना कि कोई तुझे आसानी से ना पहचान सके।” मीणा बोला।
“क्या दिन आ गये हैं अब मेरे...।” दामले ने उदास स्वर में कहा।
“तेरे दिन बहुत अच्छे हैं। अब तू और तेरा परिवार दौलत से ऐश...।”
“स्वतंत्रता सेनानी के बेटे को तू डकैती की दौलत से ऐश करायेगा?”
“बेवकूफ!” मीणा झल्ला कर बोला- “दौलत दौलत होती है। तेरे को पहले भी समझा चुका हूँ। जरूरत पड़ने पर हम बैंक से ही पैसा निकालते हैं...और ये पैसा भी तो हमने बैंक से लिया है।”
“डकैती करके...”
“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नोटों का रंग तो नहीं बदला? माया महान है। दौलत का निरादर मत कर ऐसा कह के...।”
“तुम पुलिस वाले के मुँह क्या लगना। वर्दी पहन कर तू तो हमेशा दूसरों को निचोड़ता रहा होगा।” दामले ने आगे बढ़कर फावड़ा उठा लिया- “पहले गड्ढे को मिट्टी से भर दें, उसके बाद खाना खाएंगे।”
आधे घंटे में गड्ढे को मिट्टी से भरकर समतल कर दिया गया।
उसके बाद दामले ने कार से सामान निकाला और छाया में रख दिया। देवराज चौहान ने पानी से उसका हाथ-मुँह धुलाया और फिर दामले खाना खोलकर खाने लगा। वो बहुत भूखा था। कल रात से ही कुछ नहीं खाया था।
आधा घंटा लगाकर उसने खाना खाया।
इस काम से फुर्सत पाकर वो देवराज चौहान से बोला- “तुमने आने में देर कर दी...तो मैंने सोचा तुम आओगे ही नहीं...”
“रास्ते में पहिया पंचर हो गया था...एक घंटा उसमें लग गया।” देवराज चौहान ने कहा। तभी मीणा बोला-
“चल, तेरे को कमिश्नर पाटिल से मिला हूँ। तू अपनी तसल्ली कर ले कि कानून तेरे को छोड़ेगा नहीं...।”
“चल...।” दामले उठ खड़ा हुआ- “लेकिन पहले मैं नहाऊँगा।’
“रेलवे स्टेशन पर नहा लेना।”
“देवराज चौहान यहीं रहेगा?”
“हाँ...ये...”
“मेरा यहाँ कोई काम नहीं । मैं तुम दोनों के साथ चलूंगा।”
देवराज चौहान कह उठा।
“दौलत के पास भी तो किसी को रहना चाहिये।” दामले व्याकुल स्वर में कह उठा।
“दौलत के प्रति तेरी चिन्ता देखकर मुझे खुशी होती है।” मीणा मुस्करा कर बोला- “परन्तु दौलत की तू फिक्र नहीं कर। इसे हमने जमीन में छिपा दिया है। ये सुरक्षित रहेगी।”
“तो देवराज चौहान हमारे साथ रहेगा?” दामले बोला। “क्या हर्ज है! तू स्टेशन पर नहायेगा तो ये तेरे लिए तब तक मेकअप का सामान ला देगा। जैसे दाढ़ी-मूंछ, सिर पर लगाने के लिए ‘विग’ या जो भी ये ठीक समझेगा। क्यों देवराज चौहान?’
जवाब में देवराज चौहान मुस्करा दिया।
“चलो चलते हैं।” मीणा ने कहा। देवराज चौहान, दामले के साथ कार की तरफ बढ़ गया।
☐☐☐
कमिश्नर पाटिल बहुत व्यस्त हुआ पड़ा था। कल रात से उसे फुर्सत लेने का वक्त नहीं मिला था। परन्तु उसे इस बात से राहत मिली कि कल शाम उसकी पुलिस पार्टी ने एक डकैत को खत्म कर दिया है।
अब सुधीर दामले उसके लिए सिरदर्द बना हुआ था।
डेढ़ सौ करोड़ की दौलत उसके पास थी।
उसे पकड़ना बहुत जरूरी था।
रात से ही सुधीर दामले की तलाश में, कई पुलिस पार्टियां दौड़ी फिर रही थीं। पूरे मुम्बई शहर में नाकेबंदी जगह-जगह थी। पुलिस पूरी तरह सतर्क थी, परन्तु दामले कहीं नहीं मिला था। कमिश्नर पाटिल रात आफिस में, कुर्सी पर ही सिर्फ दो घंटे सोया था।
ये पूरा मामला कमिश्नर पाटिल ने अपने हाथ में ले रखा था। पाटिल फोन पर लम्बी बात करके हटा ही था कि इंस्पेक्टर सावरकर ने भीतर प्रवेश किया।
“सर।” सावरकर ने सैल्यूट दिया।
“बैठगे। कोई खबर?”
“नहीं सर।” सावरकर कुर्सी पर बैठता कह उठा- “पुलिस सतर्क है, कभी भी खबर मिल सकती है।”
“क्या पता अब वो पजेरो गाड़ी में ना हों...।”
“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सर, पुलिस हर उस गाड़ी की तलाशी ले रही है जिसमें दौलत से भरे वो पाँच बड़े बैग रखे जा सकते हैं।” सावरकर ने कहा- “ये तो अच्छा हुआ कि हमें जल्दी
ही पता चल गया था कि बैंक डकैत पजेरो में थैले डालकर ले भागे हैं। दो लोगों ने वहाँ पार्किंग में ऐसे होते देखा और जब हम वहाँ उनकी तलाश में पहुंचे और हमें वैन खड़ी मिली तो पूछताछ में उनके द्वारा पजेरो को ले जाने की बात सामने आई...”
“सावरकर डकैत पजेरो के साथ किसी जगह पर छिप गये हो सकते हैं।”
“ये संभावना कम है।”
“क्यों?”
“अगर उन्होंने कहीं छिपना होता तो वो उस पार्किंग में गाड़ी ना बदलते।”
“वो जिसे बंधक बनाकर ले गया था, उसकी कोई खबर आई?”
“नहीं सर। मैसेज फ्लैश कर रखा है। ऐसा कोई आदमी किसी पुलिस स्टेशन पहुँचेगा तो हमें खबर कर दी जायेगी।”
कमिश्नर पाटिल ने होंठ भींचे सिर हिलाया और कहा-
“इस बात की भी संभावना है कि डकैत सुधीर दामले शहर से बाहर निकल गया हो...”
“ऐसा भी हो सकता है...।” सावरकर ने सोच भरे स्वर में कहा- “परन्तु लगता नहीं कि वो मुम्बई से बाहर निकला हो। हमने आसपास के शहरों में पजेरो के बारे में और डकैतों के बारे में खबर कर रखी है। वो बचने वाले नहीं।”
कमिश्नर पाटिल के चेहरे पर सोच के भाव नाचते रहे।
“सर, मैंने सुधीर दामले के बारे में पता किया है। वो सीधा-साधा आदमी था। वो इस तरह डकैती नहीं कर सकता।”
सावरकर बोला।
“परन्तु उसने डकैती की।”
“जी हाँ सर, की...।” सावरकर ने सिर हिलाया- “लेकिन वो खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा क्यों कहता...।”
“दामले बहुत चालाक है।” कमिश्नर पाटिल तीखे स्वर में कह उठा- “उसने पुलिस का दिमाग खराब करने के लिये ये ड्रामा रचा कि आसानी से कोई उसे पहचान ना सके। परन्तु जब वो बैंक से बाहर निकला, अपनी शिनाख्त करवाने के लिए, तो खबरी चैनल वालों ने अपने कैमरे ऑन कर दिए। इस तरह उसकी तस्वीर टी.वी. में उसकी पत्नी तारा ने देख ली। तारा के सामने आते ही, ये भेद खुल गया कि हकीकत में वो सुधीर दामले है। सब-इंस्पेक्टर मीणा तो वैसे भी वो नहीं हो सकता, क्योंकि वो कुछ दिन पहले ही मरा है। वो यूँ ही खुद को मीणा कहता रहा...।”
“कुछ अजीब ढंग से ही उसने बैंक डकैती की...। मैनेजर का ब्यान है कि उसने खुद ही खतरे का अलार्म बजाने को कहा। जबकि वो चाहता तो चुपचाप पैसे लेकर खिसक सकता था....”
सावरकर बोला।
“हर अपराधी का अपना दिमाग होता है। काम करने का अपना ढंग होता है। शायद दामले ने ये सोच रखा था कि बैंक के बाहर पुलिस को इकट्ठा करके, पुलिस के बीच में से पैसा लेकर निकलेगा। उसे यकीन होगा कि वो ऐसा कर लेगा। वो सबको दिखाना चाहता होगा कि वो कितना बहादुर है।” कमिश्नर पाटिल का स्वर कड़वा हो गया।
“सर, हम जो कोशिशें कर रहे हैं, उस हिसाब से उसे पकड़ा जाना चाहिये।”
कमिश्नर पाटिल के होंठ भिंचे रहे।
“आपको उसका फोन आया था...दामले का?”
“हाँ। कल रात को आया था। दामले के साथ कोई और भी है। वो अभी भी अपने को मीणा कह रहा है। पागल बना रहे थे मुझे। कभी फोन पर कोई बोलता तो कभी कोई बोलता। वो अभी भी इस बात पर जोर दे रहे थे कि मैं उसे मीणा मानूं। वो कह रहा था कि मेरे भीतर मीणा की आत्मा घुस गई है। जो किया, उसने किया। वो बेकसूर है।”
“लोग पुलिस को इतना पागल क्यों समझते हैं?” सावरकर ने गहरी सांस लेकर कहा।
“मैंने पता लगाया कि मुझे मोबाईल से फोन किया गया था। फोन कम्पनी से जब मैंने उस मोबाईल नम्बर की लोकेशन जानने की चेष्टा की तो मुझे कम्पनी ने बताया कि फोन ऑफ होने की वजह से लोकेशन पता नहीं चल रही। आज भी मैं कम्पनी को तीन बार फोन कर चुका हूँ इस बारे में। परन्तु वो ये ही कह रहे हैं कि अभी तक फोन बंद है।”
“सुधीर दामले ने ऐसा कोई रास्ता नहीं छोड़ा कि हम उस तक पहुंच सकें।”
“वो शातिरों की तरह सब काम कर रहा है...। वो सनकी या शौकिया अपराधी लगता है। वरना वो मुझे फोन करके आत्मा वाली बात ना कहता। पता नहीं उसके मन में क्या है और वो क्या करना चाहता है।” कमिश्नर पाटिल ने गुस्से से कहा- “मेरा दिल कहता है कि वो मुम्बई में ही कहीं छिपा है। ज्यादा देर बच नहीं सकेगा।”
“सर।” सावरकर ने कहा- “सुबह मैं दामले के घर गया। उसकी पत्नी तारा से मिला। रात तारा जब मुझसे मिली तो अपने पति के बारे में बहुत फिक्रमंद थी। परन्तु सुबह मुझे वो शांत और निश्चित लगी।”
कमिश्नर पाटिल की आंखें सिकुड़ीं।
“रात वाली व्याकुलता तारा के चेहरे पर से गायब हो चुकी थी। उसने दामले के बारे में जानने की कोई खास उत्सुकता नहीं दिखाई। उसका ये व्यवहार मुझे अजीब लगा।” इंस्पेक्टर सावरकर ने कहा।
“इसका मतलब दामले ने अपनी पत्नी तारा को फोन कर दिया होगा। दोनों की बात हो गई होगी।”
“ये ही लगता है।”
“पर फोन तो हमने टेप कर रखा...।”
“तारा के पास मोबाईल भी है...।”
“तो तुम्हारा ख्याल है कि मोबाईल पर ही, दामले का फोन आया होगा।”
“हाँ, सर। इसी शक के आधार पर मैंने बहाने से तारा का फोन लेकर चैक किया तो मुझे आने वाली फोन काल्स का कोई भी नम्बर फोन में नहीं मिला। तारा ने सावधानी के नाते अपने फोन के सारे नम्बर डिलीट कर दिए थे।”
“खूब...।” कमिश्नर पाटिल कड़वे स्वर में कह उठा- “फिर तो तारा पुलिस से खेल, खेल रही है। वो जानती है कि दामले कहाँ पर छिपा है, या फिर दामले का फोन उसे आया। लेकिन इस बारे में उसने पुलिस को कुछ नहीं बताया।”
“वो अपने पति को बचा लेना चाहती...”
तभी टेबल पर रखा फोन बज उठा।
“हैलो...” कमिश्नर पाटिल ने रिसीवर उठाकर बात की।
“सर।” दूसरी तरफ से आवाज आई- “मैं काँस्टेबल ओम प्रकाश बोल रहा हूँ। मलाड में सड़क के किनारे खड़ी पजेरो मुझे मिल गई है।”
“क्या?” कमिश्नर पाटिल चौंका- “वो ही पजेरो है?”
“नम्बर वो ही है सर।”
“गुड। तुम गाड़ी से छेड़छाड़ मत करना। किसी को पास मत आने देना। मैं वहीं पहुँच रहा हूँ...।”
“जी सर।”
कमिश्नर पाटिल रिसीवर रखते हुए सावरकर से कह उठा- पजेरो मलाड में सड़क के किनारे मिल गई है। यकीनन वो खाली होगी। बैंक से दौलत निकाल कर कहीं रख ली है। गाड़ी को सड़क पर छोड़ दिया। तुम फिंगर प्रिंट वालों को, फोटोग्राफर को और बाकी सब को मलॉड पहुँचने को कहो। लोकेशन को हमसे फोन पर पूछ लेंगे कि मलॉड में कहाँ पहुँचना है। आओ चलें...।”
कमिश्नर पाटिल उठ खड़ा हुआ।
सावरकर भी फौरन उठा और बोला-”मैं फिंगर प्रिंट वालों को कह कर आता...।”
“फोन पर कह दो। हमें फौरन वहाँ पहुँचना है।” कमिश्नर पाटिल दरवाजे की ओर बढ़ता कह उठा।
सावरकर साथ चल पड़ा और मोबाईल निकाल कर नम्बर मिलाने लगा।
जल्दी ही उसने फिंगर प्रिंट और फोटोग्राफर को फोन पर मलॉड पहँचने को कहा।
नीचे पार्किंग में पहुँचे। वहाँ पहले से तैयार एक पुलिस-कार को अपने पीछे आने को कहा और खुद दोनों एक अन्य पुलिस-कार में सवार होकर वहाँ से चल पड़े।
“पजेरो से निपट कर, मैं दामले की पत्नी तारा से मिलूंगा।” कमिश्नर पाटिल ने कहा- “मुझे पूरा विश्वास है कि फोन पर दामले से उसकी बात हो चुकी है और वो जानती है कि दामले कहाँ है।” “आपको क्या लगता है...कि वो बता देगी दामले का ठिकाना?” सावरकर ने कहा।
“उसे बताना ही पड़ेगा। हमें सख्ती से बात करनी होगी।”
सावरकर ने कुछ नहीं कहा। चेहरे पर सोचें नाचती रहीं।
“हमें दामले के बारे में अपने मुखबिरों को सतर्क करना होगा कि वो दामले की खबर तलाशें। दामले के पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है। वो ज्यादा देर छिपकर नहीं रहेगा। पैसा खर्च करने बाहर निकलेगा और पकड़ा जायेगा।”
“दामले इतना बेवकूफ नहीं होगा सर, कि पैसे के साथ मुम्बई में ही रहे।”
“तो?”
“वो पैसे के साथ मुम्बई से निकलने की कोशिश करेगा।”
“ऐसा भी हो सकता है।” कमिश्नर पाटिल ने सोच भरे स्वर में कहा- “हमें तारा पर कड़ी नजर रखनी होगी। दामले इस बात की पूरी कोशिश करेगा कि अपनी पत्नी को भी साथ ले जाये। ये भी हो सकता है कि दामले ने तारा के साथ मुम्बई से निकलने की प्लानिंग बना ली हो। तारा पर कितने पुलिस वाले नजर रख रहे हैं?”
“दो...”
“वहां पहरा बढ़ा दो और कह दो कि तारा घर से निकले तो वे हर हाल में उसके साथ रहें।”
“यस सर।” सावरकर ने कहा और मोबाईल निकाल कर नम्बर मिलाने लगा।
☐☐☐
पजेरो वो ही थी, जिसे डकैत सुधीर दामले पार्किंग से चोरी करके ले गया था। कमिश्नर और सावरकर ने पजेरो को पहचान लिया था। पजेरो में नोटों से भरे थैले नहीं मिले थे। परन्तु थैलों के साथ लगी, बैंक की दो स्लिपें गिरी मिलीं। पानी की खाली बोतलें मिलीं। सीट के नीचे खाना बिखरा मिला।
इसके अलावा और कुछ न मिला।
इस वक्त पजेरो के आस-पास पुलिस-ही-पुलिस नजर आ रही थी। वो सड़क बन्द कर दी गई थी। फिंगर प्रिंट वाले और फोटोग्राफर आ चुके थे। और उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया था।
“सुधीर दामले दौलत के साथ मुम्बई में ही कहीं छिपा है सर।” इंस्पेक्टर सावरकर बोला।
“मेरे ख्याल में उसे यहाँ से पाँच-सात किलोमीटर के घेरे में होना चाहिये...।” कमिश्नर ने सोच भरे स्वर में कहा।
“क्या वो अकेला है सर?”
“ये कहना कठिन है। वो अकेला भी हो सकता है और उसके साथी भी हो सकते हैं।
“अगर वो अकेला है तो जल्दी ही कोई गलती करेगा और पकड़ा जायेगा।” सावरकर ने कहा
“दो बातें हैं। या तो वो जहाँ भी है, दौलत के साथ वहीं छिपा रहेगा और मामला ठण्डा होने का इन्तजार करेगा या फिर वो कोई इन्तजाम करके तुरन्त ही मुम्बई से बाहर निकलने की चेष्टा करेगा।” कमिश्नर पाटिल ने सोच भरे स्वर में कहा।
“अगर वो मुम्बई से खिसक रहा होगा तो अपनी पत्नी तारा को भी साथ ले जाना चाहता होगा।”
“हाँ। वो ऐसा करने की कोशिश कर सकता है। हमारा यहाँ कोई काम नहीं, हमें तारा से जाकर बात करनी चाहिये। वो फोन पर अपने पति के काँटैक्ट में है। चलो, तारा के पास चलें...।”
कमिश्नर पाटिल और सावरकर कार में वहाँ से रवाना हो गये।
☐☐☐
तारा घर पर ही थी। यूँ चेहरे पर अब शान्ति थी, परन्तु मन से बेचैन थी कि अब क्या होगा? उसे दामले के फोन का इन्तजार था। कल रात के बाद अभी तक फोन नहीं आया था। उसने वादा किया था कि फोन करेगा। ज्यों-ज्यों वक्त बीतता जा रहा था, त्यों-त्यों मन में बुरी आशंकाएं घर बनाती जा रही थीं। मन में यही आ रहा था कि उसका पति ठीक हो।
खिड़की के पास पहुँचकर बाहर देखा।
दोनों पुलिस वाले दिखे, जो कि उसके घर पर पहरा दे रहे थे।
तारा खिड़की से हट गई।
यही वो वक्त था कि जब तारा का मोबाईल बज उठा।
“हैलो।” तारा ने फौरन फोन पर बात की।
“तारा।” दामले की आवाज कानों में पड़ी तो उसकी सारी बुरी आशंकाएं झाग की तरह बैठ गईं।
“आप...।” तारा ने गहरी सांस ली- “मैं आपके फोन का ही इन्तजार कर रही थी।”
“क्यों?”
“यूँ ही, आपसे बात करने का दिल कर रहा था। मैं खुद को बहुत अकेली महसूस कर रही हूँ...।”
“अपने पर काबू रखो। हम जल्दी ही मिलेंगे। हम...।”
“अब आप कर क्या रहे हैं?” तारा ने व्याकुलता से पूछा।
“मैं अपने को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर रहा हूँ।” उधर से दामले ने गहरी सांस ली
“कैसे?”
“कमिश्नर से बात करके मैं उसे समझाऊँगा कि जो कुछ भी हुआ, उसमें मेरा कसूर नहीं था। मेरे सिर में चोट लगी और जाने मुझे क्या हुआ कि मैं खुद को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा समझने लगा। उसके बाद जो किया, मीणा ने किया, मैंने नहीं किया...”
“कमिश्नर आपकी बात पर यकीन कर लेगा?” तारा की आवाज कांपी।
“पता नहीं...पर मैं कोशिश तो करूँगा, उसे यकीन दिलाने की।” दामले की आवाज कानों में पड़ी।
“मेरा दिल घबरा रहा है। ये हम पर क्या मुसीबत आन पड़ी है। कितनी अच्छी हमारी जिन्दगी बीत रही थी।” तारा बोली।
“सब ठीक हो जायेगा। मैं सब कुछ ठीक करने की तो कोशिश कर रहा हूँ...।” दामले की आवाज कानों में पड़ी- “इस वक्त मैं कमिश्नर का पीछा कर रहा हूँ और उससे बात करने के लिए सही मौके की तलाश में हूँ। मुझे लगता है कि कमिश्नर तुम्हारी तरफ ही आ रहा है। उसने जो रास्ता पकड़ रखा है, वो हमारे घर को ही जाता है।”
“मेरे पास आ रहा है?”
“लगता तो ऐसा ही है।”
“सुबह इंस्पेक्टर सावरकर आया था...और बहाने से मेरा मोबाईल लेकर उसके भीतर के नम्बरों को चैक करने लगा।”
“ओह...फिर?”
“मैंने सावधानी के नाते फोन के सारे नम्बर मिटा दिए थे। ये मैंने आपका फोन आने के बाद किया था।”
“ठीक किया...। कमिश्नर तुम्हारे पास ही आ रहा है तारा। अभी-अभी उसने जो सड़क बदली है, वो हमारे घर की तरफ ही जाती है। तुम सावधान रहना और उसे मत बताना कि हम फोन पर बात करते हैं।”
“नहीं बताऊँगी...। आपने बताया कि आप कमिश्नर के पीछे हैं?”
“हाँ...”
“तो आप घर के पास ही होंगे कहीं...।” तारा की आँखें भर आईं- “आपसे मिलने को बहुत दिल कर रहा है...।”
“मैं भी तुमसे मिलने को मरा जा रहा हूँ, परन्तु ये वक्त सब्र के साथ चलने का है। हमारी एक गलती, मुझे जीवन भर के लिए जेल में ढूंस देगी। ये हमारा खराब वक्त चल रहा है।” दामले ने व्याकुल स्वर में कहा- “इस वक्त हमें समझदारी से काम लेना है।”
“आखिर ये सब कब तक चलेगा?”
“वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। जल्दी ही सब ठीक हो जायेगा। कमिश्नर की कार घर के पास पहुंच चुकी है। अब तुम फोन बंद करो और मेरा नम्बर वहाँ से मिटा दो।” उधर से इतना कहकर, सुधीर दामले ने फोन बंद कर दिया था।
तारा ने सबसे पहला काम इस नये नम्बर को साफ किया और फोन को चार्ज होने के लिए लगा दिया। फिर खुद आराम से सोफे पर बैठ गई। चेहरे पर गम्भीरता नजर आ रही थी।
दो मिनट ही बीते होंगे कि बाहर कार रुकने की आवाज आई। तारा समझ गई कि कमिश्नर पाटिल आ गया है।
ये सोच कर उसका मन तड़प उठा कि उसका पति भी पास ही कहीं है, परन्तु उसे मिल नहीं सकती।
चंद पल बीते कि बाहर खुले दरवाजे पर आहट उभरी, फिर सावरकर की आवाज आई- “मिसेज दामले...”
“आ जाइये...।” तारा ने बेचैनी भरे स्वर में कहा।
कमिश्नर और इंस्पेक्टर सावरकर ने भीतर प्रवेश किया
तारा उठ खड़ी हुई, चेहरा परेशान और गम्भीर था।
“मेरे पति का कुछ पता चला?” तारा ने पूछा।
“सुधीर दामले के बारे में ही आपको बताने आये हैं...”
कमिश्नर पाटिल आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठता कह उठा- “दो घंटे पहले हमने उसे पकड़ लिया है। वो कानून की पकड़ में है अब।”
झूठ! तारा मन ही मन कह उठी, पाँच मिनट पहले तो मेरी बात हुई है उससे।
“पकड़ लिया...।” तारा के होंठों से निकला। दिल काँप उठा उसका- “लेकिन मेरा पति निर्दोष है, वो...”
“सुधीर दामले ने एक खून किया है और डकैती की है।”
कमिश्नर पाटिल की नजर तारा के चेहरे पर थी- “वो किसी भी सूरत में बेकसूर नहीं है। हमारे पास उसके खिलाफ ठोस सबूत और गवाह हैं।
“नहीं...उन्होंने कुछ नहीं किया।” तारा कह उठी- “उनके सिर में चोट लगी, उसके बाद से ही वो बदल गये। उन्होंने जो किया, अपने होशोहवास में नहीं किया। वो तो इतने शरीफ हैं कि...।”
“मिसेज दामले!” कमिश्नर पाटिल कठोर स्वर में बोला- “आपने हमसे सहयोग नहीं किया...।”
“सहयोग? कैसा सहयोग?” बैठ गई तारा।
‘दामले से हमें पता चला कि उसने आपको फोन किया था। आपकी और दामले की बात हुई। परन्तु ये बात आपने पुलिस को नहीं बताई। छिपा के रखी। इस वजह से आप भी कसूरवार बन गई हैं।”
ओह, तो ये बात है। ये पुलिस मेरे मुँह से निकलवाना चाहती है कि दामले का फोन मुझे आता रहता है।
“ये बात झूठी है।” तारा ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
“तो दामले झूठ कहता है कि वो तुमसे फोन पर बात करता रहा डकैती के बाद?”
“पूरी तरह झूठ कहता है।” तारा कह उठी- “बल्कि इस बात के तो आप ही गवाह हैं कि वो मुझे अपनी पत्नी मानने को भी तैयार नहीं था। ऐसे में भला वो मुझे फोन क्यों करेगा? मुझे मेरे पति का कोई फोन नहीं आया।”
“झूठ आपको फंसा सकता है मिसेज दामले...।” कमिश्नर पाटिल ने कठोर स्वर में कहा।
“झूठ आप बोल रहे हैं कि मेरे पति ने मुझे फोन किया। जबकि मुझे उनका कोई फोन आया ही नहीं।” तारा ने दृढ़ स्वर में कहा- “झूठ मेरे पति बोल रहे हैं कि उन्होंने मुझे कोई फोन किया। हो सकता है उन्होंने सावी को फोन किया हो, क्योंकि वो सावी को ही अपनी पत्नी मानते हैं। मैं नहीं जानती कि ये सावी कौन है। उसे ढूंढिये और उससे पूछिये...।”
“आपका मोबाईल कहाँ है?”
“वो रखा है। चार्ज हो रहा है।” तारा ने टेबल की तरफ इशारा किया।
पाटिल का इशारा पाकर सावरकर मोबाईल की तरफ बढ़ गया।
“मैं अपने पति से मिलना चाहती हूँ कमिश्नर साहब...।”
तारा कह उठी।
कमिश्नर पाटिल खामोश रहा।
सावरकर ने फोन चैक किया, फिर कमिश्नर को देखकर कह उठा-
“फोन में सब नम्बर साफ हैं। एक भी नम्बर नहीं है।”
“मिसेज दामले! आपने फोन के नम्बरों को क्यों डिलीट कर रखा है?” कमिश्नर ने पूछा।
“मेरी पुरानी आदत है। मैं अपने फोन के भीतर आये नम्बरों को हमेशा डिलीट कर देती हूं...।” तारा ने कहा।
“बहुत अजीब आदत है।” कमिश्नर पाटिल ने चुभते स्वर में कहा।
“मैं अपने पति से मिलना चाहती हूँ। मुझे उनके पास ले चलिये...।” तारा बोली।
“अभी पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पाई...।” कमिश्नर पाटिल ने उठते हुए कहा।
“पर अभी तो आपने कहा कि पुलिस ने उन्हें पकड़...”
“वो झूठ बोला। हम ये जानना चाहते थे कि दामले आपसे फोन पर बातें कर रहा है या नहीं?”
तारा ने गहरी सांस ली।
“अगर दामले का कोई फोन आये तो इस बात की खबर फौरन पुलिस को देना।”
तारा सहमति से सिर हिलाकर बोली- “क्या आपको लगता है कि मेरे पति कसूरवार हैं?”
“पूरी तरह। और वो ज्यादा देर आजाद नहीं रह सकता। जल्दी पकड़ा जायेगा।” कमिश्नर पाटिल ने विश्वास भरे स्वर में कहा- “ये बात मानने को मेरा दिल नहीं करता कि इस जुर्म से पहले वो शरीफ इन्सान रहा होगा।”
“वो शरीफ है कमिश्नर...वो...।”
“मुझे पूरा यकीन है कि उसने पहले भी जुर्म किए होंगे, परन्तु वो कानून से बचा रहा। बैंक डकैती के काम को उसने बहुत मंजे अन्दाज में पूरा किया और अब भी वो किसी खिलाड़ी की तरह पुलिस के हाथों से दूर है। अगर ये उसका पहला जुर्म होता तो पुलिस ने उसे बैंक में ही पकड़ लेना था। मुझे तो वो पुराना मुजरिम लगता है।”
“ओह...।” तारा ने अपना माथा पकड़ लिया- “ये आप क्या कह रहे हैं...”
“मैं फिर कहता हूँ कि अगर दामले का फोन आपको आये तो तुरन्त पुलिस को खबर करें।”
तारा ने सहमति से सिर हिला दिया।
“पुलिस से बचता भागता फिर रहा है वो। ऐसा करके, गलती कर रहा है। अगर आप उसे पकड़वा देती हैं तो कानून उसके साथ नर्मी का व्यवहार करेगा। चलो सावरकर...।”
कमिश्नर और सावरकर, तारा के घर से बाहर आये।
नीचे खड़े पुलिस वालों के पास पहुंचे। सावरकर बोला- “इस औरत पर सख्त नजर रखो। कहीं जाती है तो इसके साथ जाना। इसे अकेला मत छोड़ना। यहाँ और पुलिस वाले भी पहुँचने वाले हैं। पक्की नजर रखनी है इस औरत पर।”
“यस सर।”
कमिश्नर पाटिल और सावरकर कार में बैठे। सावरकर ड्राईविंग सीट पर था। उसने कार आगे बढ़ा कर पूछा- “आपका क्या ख्याल है सर कि दामले, अपनी पत्नी को फोन करता है?”
“पक्का करता है।” कमिश्नर पाटिल ने कहा।
“किस बात से लगा कि वो फोन करता है?”
“तारा ने अपने फोन में आये सब नम्बरों को साफ कर रखा है, जबकि ऐसा कोई नहीं करता। ये उसने इसलिये किया है कि पुलिस अगर उसके फोन को चैक करे तो पता न चले कि दामले किस नम्बर से फोन कर रहा है।”
“तो तारा हमें बता क्यों नहीं रही कि...।”
“मेरे ख्याल में तारा और दामले, दौलत के साथ कहीं भाग जाने की फिराक में हैं। आपस में बातें करके वो प्लानिंग बना रहे हैं भाग जाने की।” कमिश्नर पाटिल ने गम्भीर स्वर में कहा।
“पुलिस की तारा पर कड़ी नजर है, सर...।”
“दामले और तारा का बेटा पूना में पढ़ रहा है, क्या नाम है उसका?”
“राहुल...”
“उस पर भी पुलिस वाले नजर रखे रहे हैं ना?”
“हाँ सर। इस बारे में हमने पूना पुलिस से कह रखा है। दामले ने अपने बेटे से सम्पर्क करने की कोशिश की तो पकड़ा जायेगा।”
“दामले बहुत चालाक है, आसानी से हाथ नहीं लगेगा।”
कमिश्नर पाटिल ने होंठ भींच कर कहा।
“कभी तो गलती करेगा और पकड़ा जायेगा...।”
“तारा पर नजर रख कर ही हम दामले की गर्दन पकड़ सकते हैं। दामले अभी दौलत के साथ मुम्बई में ही है। पजेरो का मलॉड में मिलना ये ही जाहिर करता...।”
कमिश्नर के शब्द मुँह में ही रह गये।
एक अन्य कार ओवरटेक करके उनकी कार के सामने आ गई थी।
सावरकर ने फौरन कार को संभाला, वरना टक्कर हो जाती थी।
“ये कौन बेवकूफ...।” कमिश्नर पाटिल ने कहना चाहा।
“सर, कार हमें रोक रही है।” सावरकर ने सतर्क स्वर में कहा।
आगे वाली कार सड़क के किनारे रुक गई थी। सावरकर की कार ठीक उसके पीछे थी। वो भी रुकी।
“मैं देखता हूँ ...।” कहकर सावरकर ने दरवाजा खोला।
“ठहरो, उस कार से कोई बाहर निकल रहा है।” कमिश्नर पाटिल बोला। हाथ होलेस्टर में पड़ी रिवाल्वर पर जा पहुंचा था। सावरकर ने ठिठक कर सामने देखा।
उस कार का आगे का दरवाजा खुला और हिप्पी जैसा व्यक्ति बाहर निकला और इनकी कार के पास आ गया। उसके चेहरे पर दाढ़ी थी। बाल गर्दन तक लम्बे थे। पैंट-कमीज पहन रखी थी।
आँखों पर काला चश्मा था।
कमिश्नर पाटिल ने कार का शीशा नीचे किया और उसे देखकर बोला-
“क्या बात है, तुमने हमारी कार क्यों रुकवाई?”
“तुमसे बात करनी है कमिश्नर।” हिप्पी के होंठों से दामले की आवाज निकली- “मैं कब से मौका ढूंढता तुम्हारे पीछे...।”
कमिश्नर पाटिल उसकी आवाज पहचान कर चौंका।
रात फोन पर दामले की ये ही आवाज तो सुनी थी उसने।
“दामले...सुधीर दामले हो तुम?” कमिश्नर के होंठों से निकला और उसी पल रिवाल्वर निकाल ली।
इंस्पेक्टर सावरकर ने भी फुर्ती से रिवाल्वर निकालकर हाथ में ले ली।
दामले ने होंठ सिकोड़ कर दोनों के हाथों में दबी रिवाल्वरों को देखा।
“तुम-तुम ने वेष बदला हुआ है?” कमिश्नर होंठ भींच कर
बोला- “अब तुम बच नहीं...।”
“कमिश्नर!” दामले के होंठों से मीणा कास्वर निकला- “बच्चों की तरह बातें मत...।”
“तुम?” कमिश्नर चौंका- “तुम-तुम्हारी आवाज वो है, जो खुद को मीणा कहती...।”
“दिमाग ठीक काम करता है तेरा।” मीणा बोला- “अब अच्छे बच्चों की तरह रिवाल्वरें वापस रखो। दामले शराफत से तुमसे बात करना चाहता है। मैं चाहता हूँ, तुम उसकी बात गम्भीरता से सुनो।”
“ये तुम क्या कह रहे हो, तुम दामले ही हो...।”
“कार से बाहर निकलो और...।”
“तुम अपने को गिरफ्तार समझो।” कमिश्नर ने कठोर स्वर में कहा-और दरवाजा खोल कर सावधानी से बाहर निकला- “बहुत अच्छा हुआ कि तुम खुद ही सामने आ गये और...।”
“तुमने मुझे पागल समझ रखा है कि जो मैं तुम्हारे पास आया?” मीणा का कड़वा स्वर, दामले के होंठों से निकला- “सब इन्तजाम करके तुम्हारे पास आया हूँ। मेरे कई आदमी यहाँ मौजूद हैं जो मेरे एक इशारे पर तुम्हें गोलियों से भून देंगे। कार में भी गन पकड़े मेरा आदमी तैयार बैठा है।”
पीछे के शीशे से भीतर कोई बैठा दिखा।
“मुझे बेवकूफ मत समझो कि मैं तुम्हारे पास आया। शराफत इस्तेमाल करो और रिवाल्वर वापस रख कर, हमसे आराम से बात करो। मुझे गिरफ्तार करने की कोशिश की तो यहाँ बहुत गोलियाँ चलेंगी और तुम दोनों मारे जाओगे।”
कमिश्नर पाटिल ने होंठ भींच लिए।
“मैं पुलिस वाला हूँ और जानता हूँ कि पुलिस कब-क्या सोचती है। मेरी धमकी के बाद तुम मुझे गिरफ्तार करने की सोचने की भी गलती नहीं कर सकते। कहो तो इशारा करके, दो-चार गोलियाँ यूं ही चलवा के दिखा दूँ...।”
कमिश्नर पाटिल ने फैसला किया और रिवाल्वर होलेस्टर में डालकर बोला- “कहो, क्या बात करना चाहते हो तुम?”
“इस तरह नहीं। अपनी रिवाल्वर इस इंस्पेक्टर को दो और सामने फुटपाथ पर छाया में आकर मेरे से बात करो।”
कमिश्नर ने रिवाल्वर निकाल कर सावरकर को दी।
“मैं आप के साथ रहूँ सर...।” भीतर से सावरकर ने पूछा।
“जरूरत नहीं। हम युद्ध नहीं करने वाले और तुम कार के भीतर ही रहना। बाहर मत निकलना।” मीणा ने कहा। कमिश्नर पाटिल सुधीर दामले को घूर रहा था।
“उधर आओ, छाया में....” मीणा बोला। उस तरफ चल पड़ा।
“तुम बच नहीं सकते...।” कमिश्नर पाटिल उसके साथ चल पड़ा।
“ये बातें कहना बंद करो। मत भूलो कि मैं भी पुलिस वाला हूँ। सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।”
“बकवास मत करो।” कमिश्नर पाटिल ने कठोर स्वर में कहा- “वो मर चुका
मीणा हंस पड़ा।
“ऐसा कहकर मेरा दिल मत दुखाओ। अभी बाईस साल मुझे इसी दुनिया में रहना...”
“तुम ज्यादा देर कानून से बचे नहीं रह सकते दामले...”
“मैं दामले नहीं, मीणा हूँ, सब-इंस्पेक्टर मीणा।”
“ये बकवास बार-बार मुझे मत सुनाओ कि तुम...।”
“ये ही तो बात करनी है तुमसे...।”
दोनों छाया में पहुँच कर ठिठक गये।
कमिश्नर पाटिल ने सेंट्रो की तरफ देखा तो पीछे सीट पर कोई बैठा दिखा। परन्तु उसे स्पष्ट तौर पर नहीं देख पाया। जबकि वो देवराज चौहान ही था।
कमिश्नर ने कार में बैठे सावरकर को देखा, फिर आसपास नजर मारी।
“मेरे आदमी तुम्हें इस तरह नहीं दिखेंगे कमिश्नर।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।
कमिश्नर की कठोर निगाह दामले पर जा टिकी
“अपना मेकअप उतारो...।” कमिश्नर ने कहा।
“तुमने क्या फोटू खींचनी है...।” मीणा ने व्यंग से कहा- “दामले तुमसे बात करना चाहता है।”
“तुम ही तो हो दामले जो...।”
“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ। ये ही तो दामले तुम्हें समझाना चाहता है। वैसे मैंने दामले को बहुत समझाया कि कोई फायदा है नहीं, परन्तु...।”
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो?” कमिश्नर ने कड़वे स्वर में कहा।
“हाँ...”
“और सुधीर दामले कहाँ है?” कमिश्नर का स्वर पहले जैसा ही रहा।
“वो भी इसी शरीर में है। ये सुधीर दामले का ही शरीर है।”
“खूब! तो तुम ये कहना चाहते हो कि एक ही शरीर में दामले और सब-इंस्पेक्टर मीणा मौजूद हैं?”
“तुम तो बहुत जल्दी समझ गये...।”
“रात भी फोन पर तुम ऐसी ही बकवास कर रहे...।”
“वो बकवास नहीं, सच था।”
“और ये भी सच है कि सब-इंस्पेक्टर मीणा और दामले, दोनों ही इसी शरीर में मौजूद हैं?” कमिश्नर पाटिल ने कड़वे स्वर में कहा।
दो पलों की खामोशी के बाद मीणा की आवाज निकली- “बेहतर होगा कि तुम सुधीर दामले से बात कर लो..।”
“वो कहाँ है?” जहरीले स्वर में कहा कमिश्नर ने।
“मैं यहीं हूँ कमिश्नर...।” अब होंठों से सुधीर दामले का स्वर निकला।
“खूब...। कमिश्नर पाटिल ने कड़वे स्वर में कहा- “तुम तो बहुत बढ़िया कलाकार हो। आवाज बदल कर बोलने में माहिर हो।”
“त-तुम गलत समझ रहे हो।” दामले ने कहा- “ये बात नहीं है।”
“अच्छा, तो फिर क्या बात है?” कमिश्नर पाटिल पूर्ववतः स्वर में कह उठा।
“सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा मेरे शरीर में घुस आई है। वो...।”
“सुधीर दामले!” कमिश्नर पाटिल ने कठोर स्वर में कहा- “ये ड्रामा नहीं चलने वाला। इतना याद रख कि तू कानून का मुजरिम है। तूने एक कत्ल और डकैती की है। तू बच नहीं सकता। अपने को कानून के हवाले...।”
“मैंने कुछ नहीं किया कमिश्नर।” दामले अपने शब्दों पर जोर देकर बोला- “मैंने कुछ नहीं किया। जो किया है, मीणा ने किया है। मीणा की आत्मा मेरे शरीर में घुस कर, शरीर पर पूरा कब्जा उसने कर लिया। मीणा ने ही सब-इंस्पेक्टर रंजीत को मारा।
मीणा ने ही बैंक में डकैती की। किसी भी बात में मेरी रजामंदी शामिल नहीं थी। मैंने कुछ नहीं किया। सारा जुर्म मीणा का है। ये ही बात समझाने के लिए मैं इस वक्त तुमसे मिल रहा हूँ...।”
कमिश्नर पाटिल दामले को घूरने लगा।
“मैं सच कह रहा हूँ कमिश्नर। मेरी बात का यकीन करो...।”
“या तो तुम बहुत ही बड़े शातिर हो या फिर पागल हो चुके हो। दोनों में एक बात तो है ही...।” कमिश्नर कठोर स्वर में बोला।
“दोनों में से कोई भी बात सच नहीं है।” दामले बोला- “मैं बहुत शरीफ इन्सान...”
“बकवास मत करो।’ कमिश्नर चिल्ला उठा- “तुम शातिर मुजरिम हो, तभी...”
“मैं, सुधीर दामले मुजरिम नहीं हूँ। तुम मेरा विश्वास क्यों नहीं करते?” दामले गुस्से से बोला- “सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा...”
“तुम्हारे भीतर आ गई है।”
“हाँ...”
“हत्या और बैंक डकैती मीणा की आत्मा ने की है। तुमने कुछ नहीं किया।”
“ये ही बात है।”
“तुम अपने गुनाहगार नहीं होने की बात कह रहे हो?”
“मैं बे-गुनाह हूँ। मीणा दोषी है।”
“अब तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारी बात को मान लूं?” कमिश्नर ने तीखे स्वर में कहा।
सुधीर दामले ने सहमति से सिर हिलाया।
“अब मैं तुम्हारी बात को तुम्हारी तरह से लेता हूँ।” कमिश्नर ने तीखे स्वर में कहा।
“हाँ...”
“तो मीणा की आत्मा ने तुम्हारे शरीर का इस्तेमाल करके अपराध किए...।”
“हाँ।”
“तो किसका शरीर इस्तेमाल हुआ, अपराध करने में?”
“म...मेरा...।”
“और कानून शरीर को पहचानता है। शरीर को सजा देता है। आत्मा को तो कानून ने कभी देखा ही नहीं है। सच बात तो ये है कि कानून आत्मा नाम की किसी चीज को नहीं जानता।”
“ये कैसे हो सकता है?” दामले के होंठों से निकला।
“ये ही होता है। ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करो। पहले तुमने जोश में आकर जुर्म कर दिया और अब कानून के डर से नई कहानी खड़ी कर रहे हो। जबकि तुम्हारी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। या तुम ऐसी बातें कहकर खुद को पागल साबित करना चाहते हो, ताकि सजा से खुद को बचा सको। परन्तु मैं तुम्हारी कोई भी चालाकी नहीं चलने दूंगा। तुम कानून के मुजरिम हो और कानून तुम्हें सजा देकर ही रहेगा। अच्छा यही होगा कि खुद को...”
“कमिश्नर, तुम मेरी बात का यकीन क्यों नहीं...।”
“आत्मा वाली बात”
“हाँ, मेरे भीतर मीणा की आत्मा है। तुमने अभी उससे बात भी की है।”
“तुम बढ़िया तरह आवाज बदल कर बोल लेते हो। इसमें कोई शक नहीं...”
“कसम से कमिश्नर, मैंने कोई आवाज नहीं बदली। मेरे भीतर मीणा की आत्मा बस चुकी है। आधे शरीर पर इसका कब्जा है और आधे पर मेरा। हम एक-दूसरे की सहमति के बिना कोई काम नहीं कर सकते। क्योंकि किसी भी काम को करने के लिए पूरे शरीर की जरूरत पड़ती है। मैं बुरी तरह फंस चुका हूँ। मीणा की आत्मा को अपने शरीर से बाहर निकालने की ताकत मुझमें नहीं है, ये कहता है कि अभी 22 वर्ष ये मेरे शरीर में रहेगा। मैंने कोई जुर्म नहीं किया। सब कुछ मीणा ने ही...।”
“सच में, मैंने तुम जैसा शातिर नहीं देखा।” कमिश्नर पाटिल ने गहरी सांस ली।
“मैं शातिर नहीं, शरीफ इन्सान हूँ। मैं...।”
“डेढ़ सौ करोड़ की दौलत कहां रखी है तुमने?”
सुधीर दामले चुप कर गया।
“साँप सूंघ गया मेरी बात सुनकर?” कमिश्नर ने व्यंग से कहा।
“नहीं, ये बात नहीं। मैं सारी दौलत वापस देने को तैयार हूँ अगर तुम तुझे निर्दोष मानते हो।”
“तुम्हारे सारे जुर्म मीणा की आत्मा पर लगा हूँ...।”
“हाँ। मुझे बेगुनाह करार दे दो।”
“जुर्म का नशा उतर गया लगता है।” कमिश्नर ने व्यंग से कहा- “डकैती के दौरान तो बहुत बढ़-चढ़ कर बातें कर रहे थे।”
“वो मैं नहीं, मीणा था। तुम मानते क्यों नहीं?”
“मेरे मानने या ना मानने से कुछ नहीं होगा। तुमने मुझे बेवकूफ बनाते हुए बहुत देर से बातों में उलझा के रखा है। परन्तु ये बात जान लो कि तुम कानून से बच नहीं सकते...।”
“मैंने जुर्म नहीं छिपाया।
“तुम्हारे हिसाब से तुम्हारे शरीर द्वारा जुर्म किया गया है, यही कहना चाहते हो ना तुम?”
“हाँ...”
“और कानून शरीर को मुजरिम मानता है। शरीरों को सजा देता है। शरीरों के नाम हमने ही रखे हुए हैं। कोई दामले के नाम से पुकारा जाता है तो कोई कमिश्नर पाटिल के नाम से। ये ही इन्सानों की निशानियाँ होती हैं। तुम जो मुझसे कहना चाहते हो, वो कहा और मैंने तुम्हारी पागलों वाली बातें सुनीं। हो सकता है तुम सच में ही पागल हो, परन्तु ये बात तो डाक्टर ही बतायेगा। डाक्टर ने अगर तुम्हें पागल बता दिया तो तुम सजा से बच जाओगे, ठीक होने तक पागलखाने में...।”
“बस कमिश्नर...।” दामले दाँत भींचकर कह उठा- “बहुत हो गया।”
कमिश्नर ने दामले को देखा।
“तुम्हें कुछ भी कहने का कोई फायदा नहीं। मेरी बात को तुमने समझने की कोशिश ही नहीं की।”
“और ये तुम्हें पागल कह रहा है दामले।” मीणा बोला।
“पागल तो ये खुद है।” दामले पुनः गुर्राया।
“मैंने तुम्हें कहा था ना कि कोई भी तुम्हारी बात पर यकीन नहीं करेगा। हकीकत में गलत तुम हो, जो आत्मा वाली बात पुलिस को बता कर खुद को निर्दोष बता रहे हो। पुलिस ये सब नहीं मानती।”
“मैंने कोई जुर्म नहीं किया।” दामले ने गुस्से से कहा।
“ये तो तू जानता है, या मैं जानता हूँ। परन्तु कानून नहीं मानता। देख लो, तेरे सामने कानून का ओहदेदार खड़ा है। तेरा सच सुनकर तुझे पागल कह रहा है। वैसे ये ठीक कहता है कि जुर्मी, इन्सान का शरीर होता है। क्योंकि वो नजर आता है। आत्मा को कानून ना तो देख सकता है, ना ही आत्मा को अपराधी मान कर शरीर को सजा दे सकता है। शरीर ही अपराधी होता है, कानून की नजरों में, क्यों कि कानून शरीर को सजा देने का दम रखता है।”
“कानून अंधा है।”
“अंधा कहो या एक आँख वाला कहो, परन्तु कानून ऐसा ही है।” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा - “मैंने तो तेरे को पहले ही कहा था कि कोई फायदा ना होगा, परन्तु तू ही कहने लगा कि एक बार कमिश्नर को यकीन दिलाने की कोशिश करके देखूगा। देख लिया नतीजा...”
“मानना पड़ेगा!” कमिश्नर पाटिल कह उठा- “तुम दो तरह की आवाजें निकालने में माहिर हो। उस्ताद हो।”
“सुन ली अपनी तारीफ...।” मीणा व्यंग से बोला।
“ये कमिश्नर पागल है।” दामले ने गुस्से से कहा- “हमें यहाँ से चलना चाहिये।”
“चलो...”
“तुम खुद को कानून के हवाले कर दो।” कमिश्नर पाटिल ने सख्त स्वर में कहा।
“कुछ भी करने की कोशिश मत करना।” मीणा ने सख्त स्वर में कहा- “कुछ किया तो हमारे आदमी तुम्हें और कार में बैठे इंस्पेक्टर को गोलियों से भून दंग। चल दामले...।”
सुधीर दामले कार की तरफ बढ़ गया।
कमिश्नर पाटिल वहीं खड़ा उसे देखता रहा फिर चिल्ला कर बोला- “तुम बच नहीं सकते सुधीर दामले...।”
दामले कार में आ बैठा स्टेयरिंग सीट पर। स्टार्ट की और कार दौड़ा दी।
पीछे वाली सीट पर देवराज चौहान बैठा था। वो बोला- “ये कार हमें फौरन ही छोड़ देनी होगी। कमिश्नर ने कार का नम्बर देख लिया होगा। कुछ ही देर में मुम्बई की हर सड़क पर, इसी कार की तलाश शुरू हो जायेगी।”
“मैं भी ये ही बात सोच रहा था।” मीणा ने कहा।
“कमिश्नर से क्या बात हुई?” पूछा देवराज चौहान ने।
“वो पागल है साला!” दामले गुस्से से कह उठा।
मीणा हंस पड़ा।
“मैंने तो तेरे से पहले ही कहा था कि कोई फायदा नहीं होगा। पर तू एक कोशिश करना चाहता था। ले लिया, अब मजा।”
“मैं अपने को कानून की निगाहों से कभी भी बे-गुनाह साबित नहीं कर सकता...”
“ये तो मेरे को पहले ही पता है।” मीणा बोला।
“वो मेरे को पागल कहता है। साला खुद पागल है।” दामले दाँत भींच कर कह उठा।
“तूने गलत सोचा कि पुलिस आत्मा वाली बात मान जायेगी। भला पुलिस को आत्मा से क्या मतलब?”
दामले चुप रहा।
“अब क्या करेगा?”
“पुलिस तारा पर पहरा बिठाये हुए है। मेरी तलाश में है। मैं तो पूरी तरह बरबाद हो गया...।” दामले गुर्राया। तभी देवराज चौहान ने कहा- “अच्छा ये ही होगा कि इन बातों को आगे जाकर सोचो। ये बात भूल जाओ कि पुलिस तुम्हें बे-गुनाह मानेगी। वो तुम्हें कम से कम उम्र कैद की सजा दिलवा के ही रहेगी। अच्छा यही होगा कि तुम पुलिस के साथ मत लगो। वरना तुम्हें वो सजा भुगतनी पड़ेगी, जिसके जुर्म तुमने किए ही नहीं हैं। सारी उम्र जेल में बीत जायेगी।”
“तो मैं क्या करूँ?”
“अपनी नई जिन्दगी की शुरूआत करो, कहीं दूर जाकर। दौलत तुम्हारे पास है ही।”
“तुम्हारा मतलब कि मीणा मेरे साथ रहेगा?”
“ये तुम्हारी मजबूरी है। अगर सुख से जिन्दगी बिताना चाहते हो तो इसे मजबूरी न समझकर, भाई और दोस्त समझो। अपनी पत्नी को साथ लो और कहीं दूर चले जाओ मुम्बई से...।”
“इसे स्वीकार कर पाना कठिन है।”
“ये तो तुम्हें सहना पड़ेगा।”
“दामले!” मीणा बोला-- “मेरी वजह से तुम्हें असुविधा नहीं होगी।”
“वो तो मुझे होगी। तुझे क्यों होगी? जब मैं तारा के पास जाऊँगा, तो तू सब देखेगा-सुनेगा, महसूस करेगा।”
“तू बेवकूफ है।” मीणा झल्लाया।
“फंसा पड़ा हूँ...।”
“तेरी पत्नी, तेरी है। तेरा शरीर तेरा है। मैं तो मेहमान हूँ बाईस बरस का, तेरे शरीर में। तेरे शरीर से बाहर तो मैं जाने वाला नहीं। मेरे से मिल कर रहेगा तो तुझे फायदा होगा। मैं तेरे को पुलिस से बचा कर रखूगा।” मीणा ने समझाने वाले ढंग से कहा- “और डेढ़ सौ करोड़ को मत भूल। ये बहुत बड़ी दौलत है। इसे तू अकेला संभाल नहीं सकेगा। शरीफ आदमी है तू। तेरे को हर कदम पर मेरी सलाह की जरूरत पड़ेगी। वरना कहीं भी गलती की तो पुलिस के हाथों में फंस जायेगा। मैं तेरे भले के लिए तेरे साथ रहूँगा। तेरी पत्नी तो तेरी है। मुझे उससे क्या लेना-देना। दो-चार बार में तेरे को, मेरी आदत पड़ जायेगी। फिर सब ठीक लगेगा तेरे को।”
दामले ने गहरी सांस ली।
“इन हालातों में तेरे को मीणा की बात मान लेनी चाहिये।” देवराज चौहान ने कहा।
दामले कुछ नहीं बोला।
तभी मीणा ने सड़क के किनारे कार रोकते हुए कहा- “यहाँ पर हम कार छोड़ कर, दूसरी कार लेंगे।”
दोनों कार से बाहर निकले और आगे बढ़ गये, पैदल ही- “अब तेरे को कोई और काम भी है दामले?” देवराज चौहान ने पूछा।
“तारा से मिलने का मन बनाए हुए था, परन्तु उस पर पुलिस नजर रख रही है।” दामले ने कहा।
“अभी तारा से मत मिल। खतरा है।”
“जानता हूँ...”
“मेरे ख्याल में हमें वापस चलना चाहिये।” देवराज चौहान बोला।
“दौलत के पास?” दामले ने उसे देखा।
“हाँ...। इस तरह खुले में रहना, तेरे लिए खतरे से खाली नहीं।” देवराज चौहान ने कहा।
“एक बात तो बता।” दामले बोला- “मेरे नाम पर, एक डकैती मीणा ने की और मेरा ये हाल हो गया, जबकि तू तो माना हुआ डकैती मास्टर है। पुलिस तेरी तलाश में रहती है...और तू खुला घूमता है। तुझे डर नहीं लगता?”
“क्यों पूछ रहा है, डकैती मास्टर बनना है तेरे को?”
“नहीं, उत्सुकता के नाते पूछ रहा था।”
“जो बात तेरे काम की ना हो, वो बात मत कर। एक बात जान ले कि कुछ भी पाना हो तो उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। मैंने दौलत पाई तो कीमत भी चुकाई। कीमत किस रूप में है, ये मैं नहीं बताऊँगा।”
“मैं तो अपने हालातों से परेशान हो गया हूँ...।” दामले ने गहरी सांस ली।
“दिल-छोटा क्यों करता है।” मीणा कह उठा- “मैं तेरे साथ हूँ...।”
“ये ही तो मुसीबत है कि तू मेरे साथ है।”
“देवराज चौहान, तू यहीं रुक। मैं कार लेकर आया...।”
मीणा ने कहा और आगे बढ़ गया।
देवराज चौहान वहीं ठिठका और सिग्रेट सुलगा ली।
मीणा आगे जाकर गली में मुड़ गया था।
वहीं खड़ा देवराज चौहान नजरें दौड़ाता रहा। दस मिनट बाद ही सुधीर दामले एक वैगन-आर के साथ लौटा। देवराज चौहान ने अगला दरवाजा खोला और भीतर बैठ गया। वैगन-आर आगे बढ़ गई।
“वापस चलें देवराज चौहान?” मीणा ने पूछा।
“हाँ, वहीं जाना ठीक होगा। परन्तु मैं अब जाना चाहता।”
“जब तक हमारा मामला नहीं सुलझता तुम नहीं जाओगे...।” दामले कह उठा।
“तुम्हारा मामला एक महीना लम्बा भी चल सकता है। इतना वक़्त नहीं है मेरे पास।” देवराज चौहान ने कहा।
दामले ने कुछ नहीं कहा।
“ये सब तेरे ऊपर है दामले कि तू मामला कितनी जल्दी निपटा लेता है।” मीणा ने कहा।
“मेरे ऊपर?” दामले बोला।
“हाँ। तू मुझे स्वीकार कर अपने शरीर में और दौलत लेकर फुर्र हो जाते हैं दिल्ली...”
“मेरी पत्नी तारा को तुम भूल गये?”
“वो भी तेरे साथ होगी। तेरे परिवार का ध्यान रखना अब मेरी भी जिम्मेवारी है। तो तू मुझे स्वीकार करता है?”
“इस बारे में मैंने सोचा नहीं...”
“सोच लो। अब तो देवराज चौहान भी हमारे साथ रहकर परेशान होने लगा है।”
वैगन-आर तेजी से दौड़ी जा रही थी।
☐☐☐
कमिश्नर पाटिल कार में वापस बैठा तो इंस्पेक्टर सावरकर ने कहा- “क्या हुआ सर?”
“मेरा ख्याल है कि सुधीर दामले की दिमागी हालत ठीक नहीं है।
“वो कैसे सर?”
“कहता है सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा उसके शरीर में आ गई है। वो ही सब कुछ कर रही है। उसने सब-इंस्पेक्टर रंजीत की हत्या नहीं की, बैंक डकैती नहीं की। ये सब उसके शरीर में, मीणा की आत्मा रह कर कर रही है।”
“क्या पता वो डर गया हो जुर्म करके, अब बचने के लिए ऐसा कह रहा हो?”
“हाँ...”
“लेकिन सर, बाकी सारे काम तो वो सोच-समझ कर कर रहा है। अभी तक पुलिस से बचा हुआ है।”
“मुझे लगता है दामले पुराना अपराधी है। अभी तक छिपा बैठा था, वेष बदल कर।”
“ये आप कैसे कह सकते हैं?”
“दामले के सारे काम देखकर। जिस तरह उसने मुझे रास्ते में रोका, बात की, अपने आदमी फैले होने की धमकी दी, ये काम आम इन्सान नहीं कर सकता।” कमिश्नर ने गम्भीर स्वर में कहा।
“मुझे तो यहाँ कहीं भी उसके आदमी फैले नहीं दिखे।”
“मुझे भी नहीं दिखे। सिर्फ एक ही, कार के भीतर बैठा था। मुझे पहले ही महसूस हो गया था कि वो खोखली धमकी दे रहा है, परन्तु उसे पकड़ने की कोशिश करके मैं, रिस्क नहीं लेना चाहता था।”
“मैंने उनकी कार का नम्बर नोट कर लिया है, वो....”
“नम्बर फ्लैश करा दो। जहाँ भी कार दिखाई दे, उन्हें मार दो या पकड़ ली। बता देना कि उस कार में डकैत हैं।”
सावरकर की उंगलियां मोबाईल पर चलने लगीं।
कमिश्नर की नजरें कार के बाहर जा रही थीं दो मिनट में ही सावरकर ने बात करके, फोन बंद कर दिया। कुछ अजीब सा
“चलें सर?” सावरकर ने पूछा।
“मैं दामले के बारे में सोच रहा हूँ...। वो लगा मुझे। आखिर वो चाहता क्या है?”
“आप को सच में उसकी दिमागी हालत खराब लगी?”
“हाँ...”
“फिर तो उसे भी नहीं पता होगा कि वो क्या चाहता है! मेरा ख्याल है कि वो जल्दी ही कोई गलती करेगा और पकड़ा जायेगा। उसके पास डेढ़ सौ करोड़ जैसी बड़ी रकम है। उसे संभाल पाना आसान काम नहीं।”
“वो पैसा खर्च करेगा और पकड़ा जायेगा। यही ना?”
“जी सर।”
“क्या पता वो मुम्बई से ही निकल जाये?”
“उसमें इतनी समझ होगी कि वो...।”
“जो मुझे इस तरह रोककर, बात करके जा सकता है, उसमें समझ की कमी नहीं। परन्तु जिस तरह वो कहता है कि उसमें मीणा की आत्मा घुस आई है, उससे लगता है कि उसके दिमाग में कुछ खराबी है।”
सावरकर चुप रहा।
“यहाँ से चलो। हम सुधीर दामले को पकड़ लेंगे। वो ज्यादा देर बचा नहीं रह सकता।”
सावरकर ने कार स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी।
☐☐☐
वैगन-आर में वे दोनों वापस कॉटेज पर पहुंचे।
वैगन-आर के रुकते ही, दामले जल्दी से निकल कर आगे बढ़ा।
“कहाँ भागा जा रहा है?” मीणा कह उठा।
“दौलत ठीक तो है?” दामले उस जगह पर पहुँचकर ठिठका, जहाँ दौलत छिपाई थी।
“ठीक है, ठीक है। यहाँ से दौलत को निकालना आसान नहीं है।” मीणा ने हंस कर कहा।
“जगह वैसी ही है, जैसी हम छोड़ के गये थे।” दामले बोला।
“तू शक-वहम बहुत करता है।”
“ये ही आदत है मेरी...”
“तेरे साथ रहूँगा तो तेरी आदतें भी ठीक कर दूंगा।” मीणा बोला।
“तू मेरी आदतें ठीक करेगा?” दामले उखड़ा- “क्या खराबी है मेरी आदतों में?”
“नाराज मत हुआ कर।” मीणा मुस्कराया- “बात को हल्के से लिया कर।”
तभी देवराज चौहान पास आ पहुँचा।
“सिग्रेट देना...।” मीणा ने देवराज चौहान से कहा।
देवराज चौहान ने पैकिट निकाला तो सुधीर दामले कह उठा- “तू सिग्रेट नहीं पिएगा मीणा।”
“क्यों?”
“मत भूल कि ये मेरा शरीर है। मैं सिग्रेट नहीं पीता। तू सिग्रेट पिएगा तो मेरे फेफड़े खराब हो जायेंगे।”
“तो ना पिऊँ?”
“नहीं...।”
“मानी तेरी बात। तेरे साथ रहना है तो तेरी बात माननी भी पड़ेगी। सिग्रेट छोड़ दी आज से।”
देवराज चौहान मुस्कराया। दामले को देखता रहा।
दामले ने देवराज चौहान को देखा और कह उठा- “देवराज चौहान! मैंने फैसला कर लिया है।”
“क्या?”
“मैं मीणा से दोस्ती कर लूंगा। ये मेरे शरीर से जाने वाला नहीं तो, झगड़ा क्यों करूँ?” दामले गम्भीर था।
“खुश कर दिया तूने ये कह कर दामले।” मीणा हंस कर कह उठा।
“तुमने ठीक फैसला लिया इन हालातों में।” देवराज चौहान ने कहा।
“लेना पड़ा। फंसा पड़ा हूँ। करूँ तो क्या करूँ!” दामले ने गहरी सांस ली।
“ऐसा मत कह...” मीणा बोल पड़ा।
“चुप रह। मेरी बातों में ज्यादा दखल मत दिया कर।” मीणा उखड़ा।
“तू नाराज बहुत जल्दी हो जाता है।”
दामले सोच भरे गम्भीर स्वर में कह उठा- “मुझे तेरी सहायता की जरूरत है।”
“बता...”
“मैं मुम्बई से बाहर जाकर रहूँगा तो...।”
“दिल्ली में...।” मीणा तुरन्त कह उठा।
“तो मैं अपनी पत्नी तारा को भी साथ ले जाना चाहता हूँ। उसके बिना मैं नहीं रह पाऊँगा।”
“उस पर पुलिस की नजरें हैं।” देवराज चौहान ने कहा।
“हाँ। मैं चाहता हूँ कि तुम किसी तरह तारा को ले आओ।”
देवराज चौहान ने शांत भाव से सिर हिलाया।
“तारा को ले आओगे ना?” दामले बेचैन हुआ।
“हाँ। किसी तरह तो उसे पुलिस के हाथों से निकाल ही लूंगा।” देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और बोला- “तुम तारा को फोन करो। उसे बताओ कि तुम्हारा भेजा सुरेन्द्र पाल, रिश्ते में देवर बनकर आ रहा ...।”
“सुरेन्द्र पाल कौन?” दामले कह उठा।
“मैं।”
“तुम वहाँ जाओगे तो पुलिस तुम्हें पहचान लेगी कि तुम देवराज चौहान, डकैती मास्टर हो।”
“मैं चेहरा बदल कर जाऊँगा।”
“समझा...।” दामले ने कहा और अपने पर चढ़ा रखा मेकअप, जैसे कि विग, दाढ़ी, मूंछ उतारने लगा।”
“मैं तुम्हारी पत्नी के पास पहुँच कर देखूगा कि वहाँ से उसे कैसे निकाल लाना है।”
“वैसे काम तो हो जायेगा ना?” बुरी शंका से घिरा दामले बोला।
“हाँ, जरूर होगा।”
“अपना फोन दो।”
देवराज चौहान ने दामले को फोन दिया तो दामले नम्बर मिलाने लगा।
“मैं तेरे को कभी तंग नहीं करूँगा। हर कदम पर तेरा साथ दूंगा।” मीणा बोला- “पुलिस से बचाकर. ...।”
“चुप रह, मैं जानता हूँ कि तू मेरा कितना वफादार है।” सुधीर दामले बुरा सा मुँह बनाकर कह उठा।
“मैं तेरा पक्का यार हूँ...”
“ऐसा है तो मेरे शरीर से बाहर निकल जा।”
“ये ही बात नहीं मान सकता...।”
नम्बर मिलाकर दामले ने मोबाईल कानों से लगा लिया।
“हैलो...।” तारा की आवाज कानों में पड़ी।
“तारा।” दामले कह उठा- “तेरे पास तो कोई नहीं?”
“नहीं। मैं घर पर अकेली हूँ। आपकी बात हुई कमिश्नर से?” उधर से तारा ने पूछा।
“हुई, परन्तु वो मुझे निर्दोष मानने को तैयार नहीं है।” दामले ने गहरी सांस ली।
“आपने उसे समझाया नहीं कि सिर पर चोट लगने की वजह से आप, अपने आप को सब-इंस्पेक्टर मीणा समझने...।”
“बताया, सब कहा कमिश्नर को। उसका दिमाग खराब है। वो मुझे मुजरिम मानता है।”
“ये तो मुश्किल हो गई...।” उधर से तारा ने चिन्तित स्वर में कहा।
“मुझे तो लगता है कि मुझे अपनी बाकी की जिन्दगी कहीं छिपकर निकालनी पड़ेगी...।”
“मैं आपके साथ हूँ।”
“जानता हूँ कि तू मेरे साथ ही रहेगी। मैंने कुछ सोचा है तारा। मैं किसी को तेरे पास भेज रहा हूँ। सुरेन्द्र पाल नाम है उसका। वो तेरे को पुलिस की नजरों से बचाकर मुझ तक ले आयेगा।”
“लेकिन बाहर पुलिस है। पहले दो पुलिस वाले थे, अब छ: हो गये हैं...।” तारा का परेशानी भरा. स्वर कानों में पड़ा।
“इसका मतलब पुलिस को शक है कि तू मुझसे मिल सकती है।”
“मुझे क्या पता...”
“वो सुरेन्द्र पाल देखेगा कि तुझे कैसे वहाँ से निकालना है। वो तेरा देवर बनकर आयेगा।”
“समझ गई...। कब आयेगा?”
“आज ही...।” दामले ने कहते हुए देवराज चौहान को देखा तो देवराज चौहान ने सिर हिला दिया।”
“ठीक है। साथ में क्या सामान लेकर आऊँ?”
“कुछ भी नहीं। हमारे पास बहुत पैसा है। हम सब कुछ खरीद लेंगे। तुम सुरेन्द्र पाल के साथ आ जाना।”
“ठीक है। लेकिन सुरेन्द्र पाल है कौन?”
“मेरी खास पहचान वाला है। ज्यादा सवाल मत पूछो। मैं अब बंद करता हूँ फोन।”
दामले ने मोबाईल बंद करके देवराज चौहान को दिया और बोला।
“एक कार चाहिये और मैं नहीं चाहता कि वो चोरी की हो...”
“इसे पैसे दे दे। कहीं से पुरानी कार खरीद...।” मीणा ने कहना चाहा।
“कहाँ से दूँ पैसे?”
“दस लाख निकाला तो था...।”
“हाँ...।” दामले को जैसे याद आया और कपड़ों में हाथ में डाल कर हजार-हजार की गड्डियां निकालीं- “कितने दूं?”
“चार लाख दे दे। ठीक गाड़ी मिल जायेगी।” मीणा बोला। दामले ने देवराज चौहान को चार गड्डियां दे दी।
“देवराज चौहान, तू तारा को ठीक से ले आयेगा ना?” दामले ने पूछा।
“कोशिश तो पूरी...”
“कोशिश नहीं, तूने तारा को लेकर आना है।” दामले जोर देकर बोला- “अगर तारा मेरे पास नहीं आई तो मैं पुलिस के पास चला जाऊँगा।”
“पुलिस के पास?” मीणा कह उठा- “उल्टी बात क्यों कहता है?”
“तू चुप रह। मैं तेरे से बात नहीं कर रहा। बीच में मत बोला कर।” दामले भड़क कर बोला।
“तू तो मुझ पर रौब मारने लगा है।” मीणा ने गहरी सांस ली।
“देवराज चौहान, तू तारा को लेकर आ। इसकी बात की परवाह मत कर। मैं शरीर का मालिक हूँ, मेरी ही मानी जायेगी।”
“इसका तो अब सुर ही बदलने लगा है।” मीणा बड़बड़ा उठा।
“तू कब जायेगा देवराज चौहान?” सुधीर दामले ने देवराज चौहान को देखा।
“अभी। मैं भी ये काम खत्म कर देना चाहता हूँ। कार छोड़े जा रहा हूँ। जब आऊँगा तो नई कार लेता आऊँगा।”
“कार खरीद के लाना। चोरी की नहीं...।”
“खरीद के ही लाऊँगा।” देवराज चौहान ने कहा और पलट कर जाने लगा।
“वापस कब आयेगा?”
“कह नहीं सकता। कोशिश तो करूँगा कि तेरी पत्नी को लेकर जल्दी आ जाऊँ।”
देवराज चौहान चला गया।
“दामले।” मीणा बोला।
“हाँ...।”
“तू सयाना बनता है, पर इतना समझदार तू है नहीं...।”
“अब क्या कर दिया मैंने...?”
“तू देवराज चौहान को समझा के भेजता कि ऐसी कार लाए कि पांचों थैले उसमें आ जायें।”
“पांचों को ले-ले के कहाँ भागते रहेंगे?” दामले ने मुँह बनाया- “एक-दो, जितने भी कार में आ जायेंगे, ले चलेंगे। हम से वो ही खत्म नहीं होंगे।”
“और बाकी?”
“बाकी यहीं दबे रहेंगे। फिर कभी जरूरत पड़ी तो आकर ले जोयेंगे।
“तब तक किसी और ने यहाँ से दौलत निकाल ली, तो?” मीणा बोला।
“किसी को कैसे पता चलेगा कि यहाँ दौलत पड़ी है?
एक-आध बरसात हो गई तो ये खुदी जमीन सैट हो जायेगी।”
“वाह दामले, अब तो तू बहुत समझदारी की बातें कर रहा है।”
“मैं समझदार ही हूँ, तूने मेरे शरीर में आकर मेरा दिमाग खराब कर रखा है।”
“देवराज चौहान को तो पता है कि यहाँ हमने दौलत दबा रखी है?” मीणा बोला।
“तो?”
“अगर उसने ही बाकी के थैले निकाल लिए, तो?”
“तो हम समझेंगे कि उसने हमारा साथ देने के बदले अपना मेहनताना ले लिया। इस वक्त देवराज चौहान हमारे काम आ रहा है। सगा भाई भी होता तो वो भी हमें इन हालातों में छोड़ कर भाग जाता।”
“कहता तो तू ठीक है।” मीणा ने सिर हिलाया।
“वैसे मुझे लगता नहीं कि देवराज चौहान यहाँ से पैसा निकालेगा। वो मूंछों वाला बंदा है।”
“मूंछ तो नहीं है उसकी...”
“मेरा मतलब है अकड़ वाला। इज्जत वाला। हमारा पैसा चोरी करने जैसा घटिया काम नहीं करेगा। अगर ऐसा करना होता तो सारा पैसा ले जाने के चक्कर में मुझे कब का मार चुका होता।”
देवराज चौहान सच में ईमानदार है।’
“पहले तो तू उस पर शक करता...।” मीणा मुस्कुराया।
“किसी के साथ रहने पर, धीरे-धीरे ही उसके बारे में समझ आती है।”
“मतलब कि तूने देवराज चौहान को पूरी तरह समझ लिया कि वो शरीफ है?”
“शरीफ तो नहीं है, परन्तु हमसे गड़बड़ करने का उसका इरादा नहीं है।” दामले ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
“अब तू बुजुर्गों की तरह बातें कर रहा है। समझदार हो गया है मेरा पुत्तर...।”
“पुत्तर ?” दामले भड़का- “तू मेरे को पुत्तर कहता...।”
“नाराज मत हो। बेशक तू मेरा बाप बन जा। मुझे पुत्तर कह दे। पर तू नाराज मत हो।”
☐☐☐
देवराज चौहान होंठों पर लम्बी मूंछे लगाए, आँखों पर प्लेन ग्लास का चश्मा लगाए, काली एस्टीम पर तारा के घर पर पहुँचा तो शाम के पाँच बज रहे थे। घर के बाहर छः पुलिस वाले ड्यूटी दे रहे थे। देवराज चौहान एक तरफ कार खड़ी करके ऊपर वाले फ्लैट में जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ गया। पुलिस वालों की नजरें उस पर टिकी थीं।
वो तारा के फ्लैट पर पहुंचा।
दरवाजा खुला था, वो भीतर प्रवेश कर गया।
सामने ही मेहता साहब और तारा बैठे बातें कर रहे थे।
“भाभी!” देवराज चौहान फौरन कह उठा- “ये क्या हो गया, दामले भैया कैसी मुसीबत में पड़ गये?”
तारा समझ गई कि वो ही दामले का भेजा आदमी है।
“देवर जी, मेरी तो समझ में ही कुछ नहीं आ रहा... । पागल हो गई हूँ मैं...।” उठते हुए तारा कह उठी।
देवराज चौहान ने मेहता को देखकर नमस्ते की।
मेहता ने नमस्ते का जवाब दिया और तारा को देखा
“ये मेरे दूर के रिश्ते में देवर जी लगते हैं।” तारा ने बताया।
“ओह, पहले कभी नहीं देखा इन्हें...।” मेहता बोला।
तभी दरवाजे पर एक पुलिस वाला दिखा। वो एक कदम भीतर आकर बोला-
“ये साहब कौन हैं?”
“कौन है क्या, रिश्तेदार हैं।” तारा कह उठी- “क्या मुझसे कोई मिलने भी नहीं आ सकता?’
“क्या रिश्ता है इनके साथ आपका?”
“लो जी, अब ये भी पुलिस वालों को बताना पड़ेगा? सुन लिया मेहता साहब...।”
“ये तारा जी के देवर हैं।” मेहता ने पुलिस वाले से कहा।
“कहाँ रहते हैं?”
“कोलाबा में...।” देवराज चौहान ने पुलिस वाले को जवाब दिया- “पता चला कि दामले भाई साहब बहुत बड़ी मुसीबत में हैं तो हाल पूछने आ गया। क्या मुझे यहाँ नहीं आना चाहिये था?”
“क्यों नहीं आना चाहिये?” तारा कह उठी- “पुलिस मेरे यहाँ किसी को आने-जाने से कैसे रोक...।”
“मैं रोक नहीं रहा।” पुलिस वाला बोला- “सिर्फ पूछताछ कर रहा हूँ...”
पुलिस वाला वहाँ से चला गया।
“ये पुलिस वाले तो बाहर खड़े, एक-एक बात का हिसाब रख रहे हैं।” तारा मुँह फुला कर बोली।
“तारा बहन, बुरा वक्त सब पर आता है...। ठीक भी हो जायेगा। मैं चलता है, तेरी भाभी के हाथ रात को खाना भिजवा हूँ दूंगा। अपने को अकेला मत समझना, हम तुम्हारे साथ हैं।”
मेहता चला गया।
देवराज चौहान और तारा की नजरें मिलीं।
“मेरे पति कैसे हैं?” तारा धीमें स्वर में बोली।
“दामले ठीक है। उसकी चिन्ता मत करो।” देवराज चौहान ने भी धीमें स्वर में कहा।
“पुलिस उन्हें अपराधी मान रही है?”
“मैं... । वो मुम्बई से बाहर जा रहा है...और तुम्हें साथ ले जाना चाहता है।”
“ओह...।” तारा ने लम्बी सांस ली- “तुम मुझे मेरे पति तक पहुँचाओगे?”
“हाँ...।”
“तुम हो कौन?”
“मैं इस वक्त तुम्हारे पति की सहायता कर रहा हूँ। मेरा नाम सुरेन्द्र पाल है।”
“बाहर पुलिस वाले हैं। मुझे यहाँ से बाहर कैसे निकालोगे? मैं जहाँ भी जाऊँगी, पुलिस मुझ पर नजर रखेगी।”
“सोच लेते हैं। कोई ना कोई रास्ता निकल आयेगा।” देवराज चौहान ने कहा।
☐☐☐
शाम हो चुकी थी। छः बज रहे थे, जब देवराज चौहान और तारा बाहर निकले।
पुलिस वाले उन्हें बाहर आया पाकर सतर्क हो गये।
“घर का दरवाजा खुला है।” तारा पुलिस वालों के पास ठिठक कर कह उठी- “जरा ध्यान रखना। बाजार जा रही हूँ, अभी आ जाऊँगी।”
“बाजार कहाँ?” एक हैड काँस्टेबल ने तारा से पूछा।
“यहीं पास की मार्किट में। देवर जी मुझे वहीं छोड़ कर चले जायेंगे...और मैं सामान लेकर घर आ जाऊँगी।”
“साहब का आर्डर है कि हम आप पर पूरी तरह नजर रखे। मैं आपके पीछे आऊँगा।”
“आ जाओ भैया, मेरे कहने पर तुम रुक थोड़े ना जाओगे।” देवराज चौहान और तारा काली एस्टीम में जा बैठे। कार आगे बढ़ गई।
पीछे हैड कांस्टेबल मोटर साईकिल पर आने लगा। उसके पीछे एक और पुलिस वाला बैठा था।
“ये पुलिस जाने क्या सोच कर मुझ पर नजर रख रही है।”
तारा ने कहा।
“पुलिस का ख्याल है कि दामले तुमसे मिलने की कोशिश कर सकता है।” देवराज चौहान बोला।
पांच-सात मिनट में ही कार पास की मार्किट में पहुंची। तारा के कहने पर देवराज चौहान ने कार को एक दुकान के सामने रोका।
पीछे पुलिस वालों की मोटर साईकिल भी आ रुकी।
देवराज चौहान शीशे के पीछे मौजूद पुलिस वालों को देख रहा था।
“मैं जाऊं?” तारा ने देवराज चौहान से पूछा।
“हाँ। जैसा समझाया है, वैसा ही करना।”
तारा कार से बाहर निकली। दरवाजा बंद किया, फिर हाथ हिलाकर देवराज चौहान से बोली- “बाय-बाय देवर जी...”
देवराज चौहान ने कार आगे बढ़ा दी।
तारा ने गर्दन घुमा कर पुलिस वालों की तरफ देखा। तब तक हैड काँस्टेबल पास आ पहुंचा था।
“कौन सी दुकान में जाना है आपने?”
“सामने वाले जनरल स्टोर में...।” कह कर तारा दुकान की तरफ बढ़ गई।
हैड कांस्टेबल साथ चल पड़ा।
तारा फौरन ठिठक कह कह उठी-
“तुम क्यों साथ चल रहे हो मेरे?”
“मुझे आर्डर है कि आपके साथ...।”
“कुछ तो शर्म करो भैया...” तारा मुँह बनाकर कह उठी- “वो औरतों की दुकान है। मैंने बनियानें खरीदनी हैं। वो लेकर बाहर आ जाऊँगी। दुकान के पीछे तो कोई रास्ता है नहीं कि मैं भाग जाऊँगी। मैं भाग भी गई तो घर पर ही मिलूंगी। तुमने मुझ पर नजर रखनी है तो बाहर से ही रखो। एक बात तो बताओ।”
“क्या?”
“मैं चोर हूँ...।”
“न...हीं...।” हैड कॉस्टेबल हड़बड़ाया।
“मैंने कोई जुर्म किया है?”
“नहीं...।”
“तो इस तरह मुझ पर नजर रखने का क्या मतलब है?” तारा का स्वर तीखा हुआ–”मैं कल पुलिस में रिपोर्ट करूँगी कि इस तरह मुझ पर नजर रखकर मेरी आजादी में खलल डाला जा रहा है।”
“कर देना रिपोर्ट। मुझे तो जैसा हुकम मिला है, वो ही कर रहा हूँ...”
“अब तुम बाहर रहोगे या मेरे साथ भीतर चलोगे?”
“बाहर ही रहूंगा।”
“शुक्र है कि औरत की मजबूरी समझ में आ गई। भले खानदान के लगते हो तुम।” कहने के साथ ही तारा दुकान की तरफ बढ़ती चली गई, फिर देखते ही देखते शीशे का दरवाजा धकेल कर भीतर प्रवेश कर गई।
हैड कांस्टेबल, मोटर साईकिल के पास मौजूद वाले के करीब पहुँचा और बातें करने लगा। परन्तु उसकी नजर दुकान पर ही थी। तारा ने दुकान में प्रवेश किया। वो औरतों के सामानों की ही दुकान थी। तीन लड़कियां वहाँ
सामान बेचने के लिए मौजूद थीं। तारा यहाँ अकसर आया करती. थी और वो तारा को जानती थीं। एक लड़की उसे देखते ही कह उठी- “आईये मैडम। वो आपके पति ही हैं ना, जिन्होंने बैंक में डकैती डाली है?”
“डकैती डालना क्या आसान काम होता है...।” तारा ने मुस्काकर शांत स्वर में कहा- “लेकिन सच बात तो ये है कि डकैती मेरे पति ने नहीं की, सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ने की है। वो तो बेचारे यँ ही फंस गये।”
“सब-इंसपेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा-ये कौन है?”
“अभी बताती हूँ। अभी आई...।” कह कर तारा दुकान के पीछे की तरफ बढ़ गई। तारा जानती थी कि वहाँ बाथरूम है और उसके साथ लगता एक दरवाजा है, जो पीछे गली में खुलता है। तारा पीछे के दरवाजे को खोलकर, गली में आ पहुंची। सामने ही काली एस्टीम खड़ी थी। ड्राईविंग सीट पर देवराज चौहान बैठा था। तारा तेजी से आगे बढ़ी और दरवाजा खोल कर आगे वाली सीट पर जा बैठी। उसके दरवाजा बंद करने की देर थी कि देवराज चौहान ने कार को दौड़ा दिया
☐☐☐
शाम के आठ के ऊपर का वक्त हो गया था। अंधेरा घिर चुका था। सुधीर दामले बेचैनी से कमर पर हाथ बांधे देर से टहल रहा था। जबकि मीणा उसे रह-रह कर समझा रहा था।
“इतनी बेचैनी अच्छी नहीं होती। तेरे को हार्टअटैक हो गया तो मेरे लिए भी परेशानी खड़ी हो जायेगी। मस्त हो जा। देवराज चौहान बच्चा नहीं है। वो माना हुआ डकैती मास्टर और चालू है, तेरी पत्नी को ठीक-ठाक ले आयेगा यहाँ।”
“तू चुप रह। तेरी बातें मुझे अच्छी नहीं लग रहीं।” दामले झल्ला कर बोला।
“क्यों, मैंने क्या गलत कह दिया जो...।”
“मुझे चिन्ता क्यों ना होगी? वो मेरी पत्नी है। ये मेरी जिन्दगी है, मैं तो...”
“तेरी जिन्दगी ही अब मेरी...।”
तभी उनके कानों में इंजन की आवाज पड़ी।
“वो आ गया।” दामले के होंठों से निकला।
“लगता तो है।” मीणा बुदबुदा उठा।
इंजन की आवाज पास आ गई थी। हैडलाईट बंद थी, तभी तो उसकी रोशनी नहीं आ रही थी।
“कहीं पुलिस तो नहीं?” दामले शंका भरे स्वर में कह उठा।
“शक-वहम वाली बातें ही किया कर हमेशा...।” तभी कॉटेज के एक तरफ से काली एस्टीम निकल कर उनके पास आ पहुँची।
“आ गया देवराज चौहान।” मीणा हंस कर कह उठा- “कार भी ले आया है और तेरी पत्नी को भी लाया होगा।”
एस्टीम पास आकर रुकी। फौरन ही तारा दरवाजा खोल कर बाहर निकली सुधीर दामले के बदन में खुशी की लहर दौड़ गई, तारा को
देखकर।
“ये आप हैं?” तारा गहरे अंधेरे में उसे देखकर कह उठी।
“हाँ तारा, मैं हूँ...।”
तारा दौड़ी आई और दामले की बाँहों में समा गई।
दामले ने उसे भींच लिया। आँखों में आंसू आ गये।
“आप ठीक तो हैं।” तारा भीगे स्वर में कह उठी- “कुछ हुआ तो नहीं आपको?”
“मैं ठीक हूँ तारा। बिल्कुल ठीक हूँ...।”
“हमारी जिन्दगी को किसकी नजर लग गई...जो आप अपराधी ठहरा दिए...।”
“सब-इंस्पेक्टर मीणा की नजर लगी है।” दामले बोला।
“ये है कौन?”
“पागल है कोई। मेरा जीना हराम हो गया...”
‘गाली मत दे...।” मीणा की आवाज निकली होंठों से। तारा चौंकी।
“ये आपके मुँह से कैसी आवाज निकल...।”
“जब से मेरे सिर में चोट लगी है, तब से मैं इस तरह की आवाज में भी कभी-कभी बोल देता हूँ...।” दामले ने बात संभाली- “फिक्र नहीं कर। सब ठीक है। मैं जरा देवराज चौहान से बात करके आता हूँ...।”
“देवराज चौहान ?”
“वो ही, जो तेरे को लाया है। उसका नाम सुरेन्द्र पाल नहीं, देवराज चौहान है...”
“यहाँ तो बहुत अंधेरा है।” तारा बोली- “क्या हमें यहीं रहना होगा?”
“नहीं। हम यहाँ से दिल्ली के लिए चलेंगे। अभी सब ठीक हो जायेगा।” दामले देवराज चौहान की तरफ बढ़ गया, जो कार के पास खड़ा था। कुछ आगे आते ही दामले कह उठा-
“तू मेरी पत्नी के सामने क्यों बोला?”
“तूने मुझे गाली दी...।” मीणा ने कहा।
“तूने वादा किया था कि तू मेरी पत्नी के सामने नहीं बोलेगा। उसे कुछ पता नहीं चलेगा कि...”
“तूने मजबूर किया मुझे बोलने को। आगे से मुझे गाली मत देना।” मीणा बोला।
दामले देवराज चौहान के पास पहुँच कर ठिठका और कह उठा।
“मुझे तेरी सहायता की जरूरत है देवराज चौहान।”
“बोल...।”
“इस कार में नोटों वाले कितने थैले आ जायेंगे?”
“आराम से दो, जबर्दस्ती की जाये तो तीन...।” देवराज चौहान ने कहा।
“दो ही ठीक हैं। तू मेरी सहायता कर...गड्ढे से दो थैले निकलवा कर कार में रखवा दे।”
“अभी निकालेगा?”
“हाँ। यहाँ खतरे में रहने से क्या फायदा! क्यों मीणा, कहाँ जाना है हमने?” दामले ने पूछा।
“दिल्ली। वो शहर ठीक रहेगा। वहाँ हम आसानी से सैट हो जायेंगे।” मीणा ने कहा।
“आज रात ही हम कार पर दिल्ली के लिए निकल चलते हैं। पर दिल्ली शहर मेरा देखा हुआ नहीं है।’
“परवाह मत कर। मैं दिल्ली का कोना-कोना जानता हूँ।”
मीणा ने कहा- “वहाँ तेरे को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा।”
“ठीक है।” दामले ने कहा। फिर देवराज चौहान से बोला- “चल देवराज चौहान, दो थैले बाहर निकालें।”
“तीन थैले ले चल...” मीणा बोला।
“दो ही ठीक हैं। जरूरत पड़ी तो फिर आकर ले लेंगे।”
☐☐☐
एक थैला एस्टीम की डिग्गी में ढूंस-ठांस कर रख दिया गया था। दूसरा पीछे वाली सीट पर दवा के रख दिया गया था। रात के बारह बज रहे थे। ये सारा काम देवराज चौहान और दामले ने किया था। तारा एक तरफ खड़ी व्याकुल निगाहों से, ये सब होता देख रही थी।
गड्ढे में वापस मिट्टी भर दी गई थी। उसके बाद दामले बोला- “देवराज चौहान, तीन थैले अभी यहीं दबे हैं। यानि कि नब्बे करोड़ की दौलत यहाँ है। तेरे को जरूरत पड़े तो ले लेना...।”
“इस दौलत की मुझे कभी जरूरत नहीं पड़ेगी।” देवराज चौहान ने मुस्करा कर कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि ये तुम्हारी है। मीणा की है। इसमें मेरी कोई मेहनत नहीं है।” देवराज चौहान बोला।
“तुम्हारी मर्जी। फिर भी कभी जरूरत पड़े तो बेहिचक ले लेना।” सुधीर दामले गम्भीर स्वर में कह उठा- “तूने मेरी बहुत सहायता की। सच बात तो ये है कि ऐसे मौके पर मेरा सगा भाई भी होता, तो वो भी मेरा साथ छोड़ देता। परन्तु तुमने मेरी सहायता करने से मुँह नहीं मोड़ा।” दामले की आँखें भर आई- “मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊँगा...।”
“आगे की सोचो। मुझे खुशी होगी कि दिल्ली में तुम अपने परिवार के साथ सैट हो जाते हो तो...।”
“चिन्ता मत करो सैट हो जायेंगे।” मीणा कह उठा- “मेरी गारंटी।”
“तुम दामले को तंग मत करना। दोनों मिलकर रहो। तभी एक अच्छी जिन्दगी बिता सकोगे।” देवराज चौहान बोला।
“मैं इसे तंग क्यों करूँगा? ये तो मेरा भाई है।” मीणा ने हंस कर कहा।
“पर मैं तेरे को मुसीबत ही मानता हूँ...।” दामले कह उठा।
“कह ले। अब तेरी बात का क्या बुरा मानना।” मीणा ने हंस कर कहा- “तू मुझे अपने शरीर में रहने दे रहा है, ये ही तेरी बहुत मेहरबानी। मैं तेरे को हमेशा खुश रखूंगा।”
“हम चले देवराज चौहान।” दामले ने कहा।
देवराज चौहान ने दामले को गले से लगा लिया। उसके बाद दामले ने आवाज लगा कर तारा को पास बुलाया।
“भाई साहब को नमस्कार कर। अब हम कार में दिल्ली के लिए रवाना हो रहे हैं।”
तारा ने हाथ जोड़कर देवराज चौहान को नमस्ते की।
फिर दामले और तारा कार में जा बैठे।
“हमारा बेटा राहुल...।” तारा कह उठी- “जो पूना में...।”
“पहले हम सैट होलें, दिल्ली जाकर । फिर उसे भी बुला लेंगे। तब तक पुलिस का ध्यान भी हम पर से हट जायेगा।” कहकर दामले ने कार स्टार्ट की- “स्वतंत्रता सेनानी का बेटा अब डकैती की दौलत पर ऐश करेगा। क्या किस्मत हो गई है मेरी। कहाँ से कहाँ पहुँच गया...”
“दौलत दौलत होती है। ऐश कर, मजा ले। आज तक तू अपने बाप की शिक्षा पर चलता रहा, अब मेरी शिक्षा पर चल के देख, कितना मजा आयेगा। मैं तेरे को इंग्लैंड, अमरीका, कनाडा, पूरा योरोप घुमाऊँगा और।”
“ये आप किस आवाज में बात कर रहे हैं?” तारा कह उठी।
मीणा फौरन चुप कर गया था।
“यूँ ही कभी-कभी मैं इस आवाज में भी बात करता हूँ।” दामले ने गहरी सांस ली- “फिक्र की कोई बात नहीं, धीरे-धीरे तेरे को भी आदत पड़ जायेगी।” फिर कार के बाहर खड़े देवराज चौहान से बोला- “मेहरबानी दोस्त, अब चलता।”
देवराज चौहान ने मुस्करा कर हाथ हिला दिया। दामले ने कार आगे बढ़ाई और हाईवे की तरफ लेता चला गया।
देवराज चौहान वहीं खड़ा कार को तब तक देखता रहा, जब तक कि वो नजर आती रही, फिर गहरी सांस लेकर वैगन-आर की तरफ बढ़ गया। अब बंगले पर जाना था उसे। जगमोहन उसकी वापसी का इन्तजार कर रहा होगा।
समाप्त
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