पव्वे और शेख की कार बैंक वैन के पीछे, कुछ पीछे थी। शेख कार ड्राइव कर रहा था। दोनों की निगाह काफी आगे जाती D•C•M•B की बैंक-वैन पर थी।

"अब आगे का सूनसान रास्ता आने वाला है।" शेख बोला।
तभी पव्वे का फोन बजने लगा।
"हैलो।" उसने बात की।
"काम करने का वक्त आ गया है।" देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी।
"हम तैयार हैं।" पव्वा सतर्क स्वर में बोला।
"कार की रफ्तार बढ़ाओ। मुझे तुम लोगों की कार नजर नहीं आ रही।"
"वैन के पास चल शेख...।" पव्वे ने शेख से कहा।
शेख ने कार आगे बढ़ा दी।
पव्वा फिर फोन पर बोला---
"हम वैन के प पीछे हैं और आधे मिनट बाद, वैन के ठीक पास में होंगे।" पव्वा बोला।
"वैन के आगे जाती मेरी कार तुम्हें नजर आ रही है?" उधर से देवराज चौहान ने कहा।
पव्वे ने सामने देखा।
परन्तु आगे दौड़ती वैन की वजह से, वो स्पष्ट न देख पाया।
"देवराज चौहान की कार नजर आ रही है वैन के आगे?" पव्वे ने शेख से पूछा।
"अब नजर आने लगी है।" शेख ने कहा।
"नजर आ रही है।" पव्वा फोन पर बोला।
उनकी कार वैन के पास पहुँचती जा रही थी।
"सूनसान सड़क आ चुकी है।" देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी--- "यहाँ इक्का-दुक्का ही ट्रैफिक है।"
"काम शुरू कर दें?" पव्वे ने कहा।
"हाँ, अब हमें शुरू कर देना चाहिए।"
"दूसरी पार्टी नजर आ रही...।"
"उसे भूल जाओ। इस वक्त सिर्फ अपने काम की सोचो।"
शेख के होंठ भिंच गये। रफ्तार और बढ़ गई।
"अब सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि वैन के भीतर बैठा वो हरामी वैन के लॉक को हटा पाता है या नहीं...।" शेख बोला।
"देवराज चौहान ने उसे सैट कर रखा है।" पव्वे ने विश्वास भरे स्वर में कहा--- "वो काम करेगा।"
शेख ने वैन के आगे देखा। देवराज चौहान की कार की रफ्तार कम हो चुकी थी और वो ठीक वैन के आगे आ गई थी। उसे हटाने के लिए वैन से हॉर्न भी बज रहा था।
"अपने को संभालना पव्वे।"
पव्वे ने दोनों हाथ डैशबोर्ड पर रख लिए।
उसी पल शेख ने एक्सीलेटर पूरा दबा दिया।
कार को झटका लगा और वो गोली की तरह आगे बढ़ी और धाड़ से पीछे से वैन को टक्कर मारी।
यही वो वक्त था कि वैन के आगे मौजूद देवराज चौहान ने कार के ब्रेक फुर्ती से दबा दिए। यही वजह रही कि उसी पल वैन, देवराज चौहान की कार की डिग्गी तक घुस गई।
वैन के पीछे शेख वाली कार घुसी पड़ी थी।
तीनों वाहन रुक चुके थे।
तगड़ा एक्सीडेंट हो चुका था।
शेख की कार वैन में और वैन देवराज चौहान की कार में घुसी पड़ी थी।
◆◆◆
लालसिंह पहले ही सतर्क हो गया था, जब उसने आगे वाली कार को धीमे होते पाकर, ठीक वैन के आगे आता महसूस किया। बलराम गोरे ने वैन की रफ्तार कुछ कम कर दी और दो बार हॉर्न बजाया। परन्तु वो कार धीमी गति से वैन के आगे ही रही।
लालसिंह पूरी तरह सतर्क हो चुका था।
"क्या हो गया इसे?" बलराम गोरे ने मुँह बनाकर कहा।
लालसिंह ने चोर निगाहों से स्टेयरिंग के नीचे लगे स्विच को देखा।
बलराम गोरे ने पुनः हॉर्न बजाया।
"पागल हो गया लगता है कार का ड्राइवर...।" लालसिंह ने कहा।
बलराम गोरे ने पीछे देखने के लिए साइड मिरर पर नजर मारी।
इसके साथ ही बलराम गोरे की आँखें सिकुड़ी।
पीछे उसने कार देखी। जो कि रफ्तार पर थी और वैन के करीब आ चुकी थी।
"ये क्या?" बलराम गोरे के होंठों से निकला।
"क्या हुआ?" लालसिंह ने बलराम गोरे को देखा।
"पीछे कार---"
बलराम गोरे अपने शब्द पूरे न कर सका।
तभी धड़ाम से पीछे वाली कार ने वैन को जबर्दस्त टक्कर मारी।
इसी पल आगे वाली कार ने ब्रेक लगा दिए।
बलराम गोरे को संभलने का वक्त ही नहीं मिला। वैन आगे वाली कार में जा घुसी। फिर भी उसने फुर्ती से वैन के ब्रेक लगा दिए थे। परन्तु उसकी वैन दो कारों के बीच बुरी तरह फंस चुकी थी।
ये सब होने पर वैन को बेहद तीव्र झटका लगा था।
लालसिंह इसी ताक में था।उसने आगे की तरफ झटके से गिरना था, परन्तु वो अपनी योजना के दम पर बलराम गोरे की टांगों पर लुढ़क गया। ऊपर स्टेयरिंग, नीचे बलराम गोरे की टांगें और बेहद तेजी से वहाँ मौजूद वैन के लॉक वाले स्विच को ऊपर कर दिया। ये सब करते हुए उसका दिल धाड़-धाड़ बज रहा था।
बलराम गोरे की छाती स्टेयरिंग से टकराते-टकराते बची थी। कुछ पलों तक बलराम गोरे हक्का-बक्का रह गया था। उसकी कुछ न समझ आया कि ये क्या हुआ।
बलराम गोरे ने फुर्ती से खुद को संभाला।
लालसिंह भी उसकी टांगों से उठ बैठा। सीधा हुआ। अपना काम कर चुका था वो।
"तुमने एक्सीडेंट कर दिया बलराम...।" लालसिंह बोला।
बलराम गोरे के होंठ भिंच गए। उसने लालसिंह को देखा।
"क्या हुआ?" लालसिंह ने भोलेपन से पूछा।
"मैंने किया है एक्सीडेंट?" बलराम गोरे में भिंचे स्वर में कहा।
"तुम्हीं तो वैन...।"
"पीछे वाले ने मेरी वैन को टक्कर मारी। आगे वाली कार जानबूझकर धीमी हो गई थी। ये सब सोची-समझी योजना है।" बलराम गोरे ने दृढ स्वर में कहा--- "हम खतरे में हैं। सतर्क रहो।"
"खतरे में?"
"ये लोग पैसा लूटना चाहते हैं।"
"पागलों वाली बात मत करो। ये एक्सीडेंट है।" लालसिंह ने तेज स्वर में कहा।
"ये एक्सीडेंट पैसा लूटने के लिए ही है...।"
"तुम पागल हो।"
बलराम गोरे की निगाह आगे वाली कार पर जा रही थी, तो वो कभी शीशे में पीछे का दृश्य देखने लगता।
"मैं बाहर निकल के देखता हूँ। पेशाब भी कर...।"
"हिलना मत।" बलराम गोरे ने उसे कठोर निगाहों से देखा--- "बाहर निकलने की सोचना भी मत।"
"कमाल है। आगे-पीछे दो कारों में हमारी वैन फंसी पड़ी है और तुम कहते हो कि...।"
"वो लोग यही तो चाहते हैं कि हम वैन का लॉक खोलें और बाहर निकलें। ये एक्सीडेंट इसी वास्ते किया गया है। लेकिन हम बाहर नहीं निकलेंगे। इस वैन में सुरक्षित रहेंगे।" बलराम गोरे ने होंठ भींचे कहा।
तभी पीछे वाले हिस्से से, छोटी खिड़की को खटखटाया गया।
बलराम गोरे ने तुरन्त हाथ पीछे करके छोटी सी खिड़की को खोला।
"तुमने एक्सीडेंट कर दिया बलराम...।" पीछे से जवाहर की आवाज आई।
"कुछ लोगों ने वैन को घेरा है।" बलराम गोरे ने कहा।
"ओह...।"
"तुम ठीक हो?"
"रोमी को माथे पर चोट आई है। वो कह रहा है कि माथे से खून बह रहा है। अँधेरे में कुछ नजर नहीं आ रहा।"
बलराम गोरे के होंठ भिंचे रहे।
"अब क्या पोजीशन है?" छोटी खिड़की से जवाहर की आवाज आई।
"अभी कुछ पता नहीं...।"
"बाहर कितने लोग हैं?" जवाहर ने पूछा।
"पता नहीं। वे कारों से बाहर नहीं निकले।"
"हम अब क्या करें?"
"पहले तो मैं अपनी तसल्ली कर लूँ। उसके बाद हेड ऑफिस खबर दूँगा।" बलराम गोरे ने कहा।
"आगे-पीछे की कारों में से कोई भी नहीं निकला।" लालसिंह ने कहा--- "वो कहीं मर न गए हों। हमें देखना चाहिए।"
बलराम गोरे ने लालसिंह को कठोर नजरों से घूरा।
"मैंने क्या गलत कह दिया जो...।"
"तुम्हें उन लोगों की बहुत चिन्ता है?"
"क्यों ना हो, वो मर भी सकते हैं...।"
"वो नहीं मरेंगे। वो चालाक लगते हैं मुझे। अभी तक कारों से बाहर नहीं निकले। वो चाहते हैं कि हम वैन से बाहर निकलें और वो हरकत में आयें। लेकिन हम वैन से नहीं निकलेंगे।"
"बलराम, ये भी तो हो सकता है कि ये असली एक्सीडेंट हो।"
"देखते हैं...।"
"तब तक वो मर गए तो पुलिस तुम्हें गिरफ्तार करेगी।"
"तुम इतने उतावले क्यों हो रहे हो?" बलराम गोरे ने कठोर निगाहों से उसे देखा।
"उतावला--- नहीं तो। एक्सीडेंट हो गया और मैं परेशान हूँ कि कार वाले बाहर क्यों नहीं...।"
"चुप रहो। पैसे की सुरक्षा मुझ पर है। ये बैंक के भीतर का नहीं, बाहर सड़क का मामला है!"
बलराम गोरे की सतर्क निगाह हर तरफ घूम रही थी।
अब तक पाँच-छः कारें पास से निकली थीं। परन्तु कोई भी रुकी नहीं वहाँ ।
"बाहर मत निकलना बलराम।" पीछे से जवाहर ने कहा।
"कभी नहीं...।" बलराम के चेहरे पर कठोर मुस्कान उभरी--- "ये हमारा कुछ नहीं कर सकते। पैसे को छू भी नहीं सकेंगे।"
लालसिंह ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। वो अपना काम कर चुका था। वैन के लॉक का स्विच ऑफ कर चुका था। मन ही मन घबराया हुआ था। वो सोच रहा था कि बलराम गोरे निश्चित था कि वैन का हर हिस्सा लॉक है। उसे नहीं पता था कि वो वैन का लॉक खोल चुका है। अगर पता होता तो बलराम गोरे कब का स्विच को पुनः ऑन कर देता। स्विच की तरफ से तो बलराम गोरे निश्चिंत था कि वो ऑन है और सब ठीक है।
लालसिंह को इस बात का चैन था कि बलराम गोरे उसकी हरकत न देख पाया था।
"कब तक इस तरह बैठे रहोगे?" लालसिंह बोला।
"तब तक, जब तक मैं इन लोगों को देख नहीं लेता कि ये कौन लोग हैं।" बलराम गोरे ने कहा।
"तुम वैन को निकाल ले जाओ।"
"ये सम्भव नहीं। आगे-पीछे कारें फंसी हैं। वे लोग शातिर लगते हैं।"
"बलराम, तुम हेड ऑफिस फोन करके, इस सारे हालात की जानकारी दो।"
"जल्दी क्या है। हम सुरक्षित हैं। पहले जरा उन लोगों को देख तो लूँ।"
"रोमी के माथे पर चोट लगी है।" जवाहर की आवाज कानों में पड़ी।
"खून बहना रुका या नहीं?"
फौरन जवाहर की आवाज नहीं आई। वो शायद रोमी से बात कर रहा था।
"खून बहना रुक गया है।" जवाहर की आवाज आई।
"फिर ठीक है।"
तभी पीछे से एक कार आई और वैन को पार करके, सड़क किनारे जा रुकी।
उसमें से प्रतापी और टिड्डा बाहर निकले। इस तरह जैसे रास्ते में एक्सीडेंट देखकर रुक गए हों। वो दोनों देवराज चौहान की कार के पास पहुँचे और भीतर झाँका। फिर वो पलटकर वैन के पास आये।
वैन का शीशा बंद था।
भीतर स्टेयरिंग सीट पर मौजूद बलराम गोरे से उनकी नजरें मिलीं।
"आगे की कार में एक आदमी मरा पड़ा है।" प्रतापी ऊँचे स्वर में बोला--- "तुमने उसे मार दिया...।"
शीशा बंद होने की वजह से मध्यम सा स्वर भीतर आया।
बलराम गोरे प्रतापी को देखता रहा।
"वो कह रहा है कि आगे की कार वाला मर गया है।" लालसिंह हड़बड़ाकर बोला।
"बाहर निकल के देखो।" प्रतापी की आवाज पुनः कानों में पड़ी।
टिड्डा पीछे की तरफ बढ़ गया था।
"तुम्हें बाहर निकल के देखना चाहिए बलराम...।" लालसिंह बोला।
"मुझे तो ये दोनों भी इस काम में शामिल लगते हैं।" बलराम गोरे ने कहा।
"तुम पागल हो गए हो, जो हर बात को शक भरी निगाहों से देख रहे हो।" लालसिंह ने तीखे स्वर में कहा।
बलराम गोरे ने लालसिंह को देखा, फिर कड़वे अंदाज में मुस्कुरा पड़ा।
"सारे पैसे की जिम्मेवारी तुम पर होती तो, तब मैं तुम्हारी हालत देखता, ये सब होने पर।"
"वो, आगे की कार वाला सच में मर गया हो तो...?"
"तो कानून अपना काम करेगा।"
"यानि कि तुम वैन से बाहर निकलकर हालातों का जायजा नहीं लोगे?"
"कभी नहीं...।"
छोटी खिड़की से जवाहर की आवाज आई---
"तुम हेड ऑफिस खबर क्यों नहीं करते?"
"जल्दी क्या है। देखूँ तो ये लोग आखिर कैसे कोशिश करते हैं।"
"तुम्हें पक्का पता है कि बाहर वाले गड़बड़ लोग हैं?" जवाहर ने पूछा।
"हाँ। ये एक्सीडेंट जानबूझकर किया गया है।" बलराम गोरे ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
तभी लालसिंह ने फोन निकाला।
"क्या कर रहे हो तुम?" बलराम गोरे ने उसे देखा।
"मैनेजर साहब को यहाँ की खबर दे रहा है।"
"अभी रुको और बाहर देखो...।"
"उससे क्या होगा?"
"शायद हमें यहाँ से निकलने का रास्ता मिल जाये...।"
"कैसे?" लालसिंह ने उसे देखा।
बलराम गोरे बाहर खड़े प्रतापी से ऊँचे स्वर में बोला---
"तुम एक कार को हटा दो।"
"इस तरह तुम भाग नहीं सकते।" बाहर ने प्रतापी से कहा।
"ये बैंक-वैन है। तुम वैन का नम्बर नोट कर सकते हो।"
"तुम बाहर क्यों नहीं निकलते?"
"मुझे किसी भी हाल में वैन से बाहर निकलने का ऑर्डर नहीं है। वैन में पैसा है।"
"यहाँ बैंक के पैसे को कौन ले जायेगा?" प्रतापी ने खिड़की की जाली पर हाथ मारकर कहा।
तभी टिड्डा पीछे से वहाँ पहुँचा और बोला---
"पीछे वाली कार में दो लोग हैं। बुरी तरह घायल हैं वो...।"
"बाहर निकल...।" प्रतापी ने कहा।
बलराम गोरे मुस्कुरा पड़ा।
"ये दोनों चाहते हैं कि मैं बाहर निकलूँ--- जबकि इन हालात में इन्हें पुलिस को बुलाना चाहिए।"
"क्या कहना चाहते हो?" लालसिंह बोला।
"ये चाल है। ये लोग वैन पर कब्जा करना चाहते हैं। बेवकूफ हैं।"
"तुम पुलिस को फोन क्यों नहीं करते?"पीछे से जवाहर ने कहा।
"करने जा रहा हूँ।"
"मैं मैनेजर साहब को फोन करता हूँ। वो पुलिस को यहाँ भेज देंगे।" लालसिंह ने कहा।
तभी आगे वाली कार का दरवाजा खुला और देवराज चौहान बाहर निकला।
उसे देखते ही लालसिंह का दिल धक्क से रह गया। वो पहचान गया था कि इसी ने उसे पाँच लाख दिया था। उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर बलराम गोरे को देखा।
बलराम गोरे के चेहरे पर कड़वी मुस्कान थी, वो कह उठा---
"देखा लालसिंह! बाहर वाले दोनों कह रहे थे कि ये मर गया है। और अब जिन्दा हो गया। मैंने पहले ही कहा था कि ये दोनों भी एक्सीडेंट करने वालों से मिले हुए हैं। अब देखना! पीछे वाली कार के लोग भी सामने आयेंगे।"
"पुलिस को फोन करो बलराम।" जवाहर की आवाज कानों में पड़ी।
बलराम गोरे की निगाह करीब आते देवराज चौहान पर थी।
"ये इनका सरदार लगता है...।" बलराम गोरे बोला।
"कैसे जाना?" लालसिंह के होंठों से निकला।
"पूछ मत ये बात। जो मुझे महसूस हुआ, कह दिया।"
लालसिंह का दिल धड़क रहा था।
वैन का लॉक सिस्टम हटा हुआ था। ये बात लालसिंह जानता था, देवराज चौहान जानता था, परन्तु बलराम गोरे नहीं जानता था। लालसिंह सोच रहा था कि कभी भी बलराम गोरे के हाथों के तोते उड़ सकते थे। देवराज चौहान वैन का दरवाजा खोल सकता था और बलराम गोरे के हाथ में रिवाल्वर भी नहीं थी।
बलराम गोरे ने एक बार भी वैन के लॉक स्विच को नहीं देखा था। क्योंकि उसने चलने से पहले अपने हाथों से वैन स्विच को ऑन किया था, तो वो अब भला खोले कैसे खुल सकता था? ये बात तो वो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि पाँच लाख में बिका लालसिंह अपना कमाल दिखा चुका है।
बलराम गोरे की निगाह एकटक देवराज चौहान पर थी।
देवराज चौहान पास पहुँचा और बाहर दरवाजे का हैंडिल दबाकर दरवाजा खोला।
दरवाजा खुलता चला गया।
बलराम गोरे को काटो तो खून नहीं।
वो सकते की हालत में सीट पर बैठा, देवराज चौहान को देखता रहा।
बलराम गोरे सपने में भी नहीं सोच सकता था कि दरवाजा खुल सकता है।
अगले ही पल बलराम गोरे का हाथ कमर पर बंधी रिवाल्वर पर पहुँचा।
परन्तु तब तक देर हो चुकी थी।
प्रतापी और टिड्डा उसकी बाँह पकड़कर उसे बाहर को खींच चुके थे।
बलराम गोरे वैन की सीट से सीधा सड़क पर आ गिरा।
कंधा सड़क से टकराया तो होंठों से चीख निकल गई। रिवाल्वर छूटकर दूर जा गिरी। उसी पल पीछे से शेख और पव्वा भी आ गए।
"इसे हम संभाल लेंगे। तुम लोग वैन ले जाओ।" देवराज चौहान ने कहा।
प्रतापी ने रिवाल्वर हाथ में पकड़ी और उछलकर वैन की ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।
पव्वा देवराज चौहान वाली कार की तरफ दौड़ा कि उसे आगे से हटा सके।
बलराम गोरे को पकड़कर शेख ने उठाया और सड़क किनारे ले गया।
प्रतापी ने रिवाल्वर लालसिंह की तरफ करके कहा---
"उतर नीचे...।"
घबराया सा लालसिंह, जल्दी से दरवाजा खोलकर वैन से नीचे उतर गया।
ऊपर पहुँच चुके टिड्डे ने लालसिंह को एक तरफ धकेला और वैन के भीतर बैठकर दरवाजा बंद कर लिया। प्रतापी ने तब तक वैन स्टार्ट कर ली थी।
तभी आगे खड़ी देवराज चौहान वाली कार आगे से हटी और एक तरफ हो गई।
प्रतापी ने वैन आगे बढ़ाते ऊँचे स्वर में देवराज चौहान से कहा---
"तुम कब तक वहाँ पहुँच रहे हो?"
"आधे घण्टे में।" देवराज चौहान ने कहा।
अगले ही पल वैन वहाँ से दौड़ती चली गई।
अब सड़क के किनारे बीचो-बीच शेख और टिड्डे वाली कार खड़ी थी। जिसका बोनट पिचककर ऊपर को उठ गया था। बम्पर और आगे का हिस्सा पूरी तरह पिचक चुका था। वो कार सुबह ही सड़क किनारे से उठाई गई थी।लालसिंह हक्का-बक्का सा सड़क के किनारे खड़ा था।
"इन्हें यहीं छोड़ो।" देवराज चौहान ने शेख से कहा--- "और निकलो यहाँ से।"
"तुम लोग...।"बलराम गोरे पीड़ा से अपना कंधा पकड़े चीखा--- "बच नहीं सकोगे...।"
परन्तु किसी ने उसकी बात की परवाह नहीं की।
देवराज चौहान, शेख और पव्वा,देवराज चौहान वाली कार की तरफ लपके।
देखते-ही-देखते वे कार में बैठे और कार आगे बढ़ गई।
इस बात से वे अब तक अंजान थे कि वैन में दो गनमैन रोमी और जवाहर मौजूद थे।
◆◆◆