इमरान चन्द लम्हे बैठा रहा। फिर उठ कर तेज़ी से बाहर निकल गया। उसने क्लब के बाहर एक कार के स्टार्ट होने की आवाज़ सुनी। वह फिर अन्दर वापस आ गया।
‘कहाँ भागते फिर रहे हो?’ लेडी जहाँगीर ने पूछा उसकी आँखें नशे से बोझल हो रही थीं।
‘ज़रा खाना हज़म कर रहा हूँ।’ इमरान ने अपनी कलाई पर बँधी हुई घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा। लेडी जहाँगीर आँखें बन्द करके हँसने लगी।
इमरान की नज़रें बदस्तूर घड़ी पर जमी रहीं। वह फिर उठा अब वह टेलीफ़ोन बूथ की तरफ़ जा रहा था। उसने रिसीवर उठा कर नम्बर डायल किये और माउथ पीस में बोला-
‘हैलो सुपर फ़ैयाज़...मैं इमरान बोल रहा हूँ...बस अब रवाना हो जाओ।’
रिसीवर रख कर वह फिर हॉल में चला आया, लेकिन वह इस बार लेडी जहाँगीर के पास नहीं बैठा। चन्द लम्हे खड़ा इधर-उधर देखता रहा। फिर एक ऐसी मेज़ पर जा बैठा जहाँ तीन आदमी पहले ही से बैठे हुए थे और यह तीनों उसके परिचित थे, इसलिए उन्होंने बुरा नहीं माना।
शायद पन्द्रह मिनट तक इमरान उनके साथ क़हक़हे लगाता रहा, लेकिन इस दौरान बार-बार उसकी नज़रें दरवाज़े की तरफ़ उठ जाती थीं।
अचानक उसे दरवाज़े में वह बूढ़ा दिखाई दिया जिससे उसने कुछ दिन पहले काग़ज़ात वाला हैंड बैग छीना था। इमरान और ज़्यादा डूब कर गुफ़्तगू करने लगा, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उसने अपने दाहिने कन्धे में किसी चीज़ की चुभन महसूस की। उसने कनखियों से दाहिनी तरफ़ देखा। बूढ़ा उससे लगा हुआ खड़ा था। उसका बायाँ हाथ कोट की जेब में था और उसी जेब में रखी हुई कोई सख़्त चीज़ इमरान के कन्धे में चुभ रही थी। इमरान को यह समझने में कठिनाई न हुई कि वह रिवॉल्वर की नली ही हो सकती है।
‘इमरान साहब!’ बूढ़ा बड़ी विनम्रता से बोला, ‘क्या आप चन्द मिनट के लिए बाहर तशरीफ़ ले चलेंगे।’
‘आहा! चचा जान!’ इमरान चहक कर बोला, ‘ज़रूर ज़रूर! मगर मुझे आपसे शिकायत है, इसलिए आपको भी कोई शिकायत न होनी चाहिए।’
‘आप चलिए तो,’ बूढ़े ने मुस्कुरा कर कहा, ‘मुझे उस गधे की हरकत पर अफ़सोस है।’
इमरान खड़ा हो गया, लेकिन अब रिवॉल्वर की नाल उसके पहलू में चुभ रही थी। वह दोनों बाहर आये। फिर जैसे ही वे पार्क में पहुँचे, बूढ़े के दोनों साथी भी पहुँच गये।
‘काग़ज़ात कहाँ हैं?’ बूढ़े ने इमरान का कॉलर पकड़ कर झिंझोड़ते हुए कहा। पार्क में सन्नाटा था। अचानक इमरान ने बूढ़े का बायाँ हाथ पकड़ कर ठोड़ी के नीचे एक ज़ोरदार घूँसा रसीद किया। बूढ़े का रिवॉल्वर इमरान के हाथ में था और बूढ़ा लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उसके साथियों ने उसे सँभाल लिया। ‘मैं कहता हूँ वे दस हज़ार कहाँ हैं?’ इमरान ने चीख़ कर कहा।
अचानक मेंहदी की बाढ़ के पीछे से आठ-दस आदमी उछल कर उन तीनों पर आ पड़े और फिर एक ख़तरनाक कशमकश शुरू हो गयी। वह तीनों बुरी तरह लड़ रहे थे।
‘फ़ैयाज़,’ इमरान ने चीख़ कर कहा, ‘दाढ़ी वाला।’
लेकिन दाढ़ी वाला उछल कर भागा। वह मेंहदी की बाढ़ फलाँगने ही वाला था कि इमरान के रिवॉल्वर से शोला निकला। गोली टाँग में लगी और बूढ़ा मेंहदी की बाढ़ में फँस कर रह गया।
‘अरे बाप रे बाप,’ इमरान रिवॉल्वर फेक कर अपना मुँह पीटने लगा।
वे दोनों पकड़े जा चुके थे! फ़ैयाज़ बूढ़े की तरफ़ झपटा जो अब भी भाग निकलने की कोशिश कर रहा था। फ़ैयाज़ ने टाँग पकड़ कर उसे मेंहदी की बाड़ से घसीट लिया।
‘ये कौन?’ फ़ैयाज़ ने उसके चेहरे पर रोशनी डाली। फ़ायर की आवाज़ सुन कर पार्क में बहुत से लोग इकठ्ठे हो गये थे।
बूढ़ा बेहोश नहीं हुआ था। वह किसी ज़ख़्मी साँप की तरह बल खा रहा था। इमरान ने झुक कर उसकी नक़ली दाढ़ी नोच डाली।
‘हाँय!’ फ़ैयाज़ तक़रीबन चीख़ पड़ा। ‘सर जहाँगीर!’
सर जहाँगीर ने फिर उठ कर भागने की कोशिश की, लेकिन इमरान की ठोकर ने उसे उठने नहीं दिया।
‘हाँ, सर जहाँगीर!’ इमरान बड़बड़ाया। ‘एक ग़ैर मुल्क का जासूस...क़ौम फ़रोश, ग़द्दार...’
***
दूसरे दिन कैप्टन फ़ैयाज़ इमरान के कमरे में बैठा उसे ताज्जुब की नज़रों से घूर रहा था। इमरान बड़ी संजीदगी से कह रहा था–‘मुझे ख़ुशी है कि एक बड़ा ग़द्दार और वतन फ़रोश मेरे हाथों अपने अंजाम को पहुँचा। भला कौन सोच सकता था कि सर जहाँगीर जैसा इज़्ज़तदार और नेक नाम आदमी भी किसी ग़ैर मुल्क का जासूस हो सकता है।’
‘मगर वह क़ब्र का मुजाविर कौन था।’ फ़ैयाज़ ने बेसब्री से पूछा।
‘मैं बताता हूँ। लेकिन बीच में टोकना मत। वह बेचारा अकेले ही यह सब कुछ कर लेना चाहता था, लेकिन मैंने उसका खेल बिगाड़ दिया। पिछली रात वह मुझे मिला था। उसने पूरी दास्तान दुहरायी। अब शायद हमेशा के लिए छिप गया है। उसकी बड़ी ज़बरदस्त हार हुई है। अब वह किसी को मुँह नहीं दिखाना चाहता।’
‘मगर वह है कौन?’
‘अयाज़!...चौंको नहीं, मैं बताता हूँ!...यही अयाज़ वह आदमी था जो फ़ॉरेन ऑफ़िस के सेक्रेटरी के साथ काग़ज़ात समेत सफ़र कर रहा था। आधे काग़ज़ात उसके पास थे और आधे सेक्रेटरी के पास। उन पर डाका पड़ा। सेक्रेटरी मारा गया और अयाज़ किसी तरह बच गया। मुजरिमों के हाथ सिर्फ़ आधे काग़ज़ात लगे। अयाज़ फ़ॉरेन ऑफ़िस में सीक्रेट सर्विस का आदमी था। वह बच गया, लेकिन उसने ऑफ़िस को रिपोर्ट नहीं दी। वह दरअस्ल अपने ज़माने का माना हुआ आदमी था, इसलिए इस शिकस्त ने उसे मजबूर कर दिया कि वह मुजरिमों से आधे काग़ज़ात वसूल किये बग़ैर ऑफ़िस में न पेश हो। वह जानता था कि आधे काग़ज़ात मुजरिमों के किसी काम के नहीं। वह बाक़ी आधे काग़ज़ात के लिए उसे ज़रूर तलाश करेंगे। कुछ दिनों के बाद उसने मुजरिमों का पता लगा लिया। लेकिन उनके सरग़ना का सुराग़ न मिल सका। वह दरअस्ल सरग़ना ही को पकड़ना चाहता था। दिन गुज़रते गये, लेकिन अयाज़ को कामयाबी न हुई, फिर उसने एक नया जाल बिछाया। उसने वह इमारत ख़रीद ली और उसमें अपने एक वफ़ादार नौकर के साथ ज़िन्दगी बसर करने लगा। उस दौरान उसने अपनी स्कीम को अमली जामा पहनाने के लिए एक क़ब्र बनायी और वह सारा मैकेनिज़्म तरतीब दिया। अचानक उसी ज़माने में उसका नौकर बीमार हो कर मर गया। अयाज़ को एक दूसरी तरकीब सूझ गयी। उसने नौकर पर मेकअप करके उसे दफ़्न कर दिया और उसके भेस में रहने लगा। इस कार्रवाई से पहले उसने वह इमारत क़ानूनी तौर पर जज साहब के नाम कर दी और सिर्फ़ एक कमरा रहने दिया। उसके बाद ही उसने इस इमारत की तरफ़ मुजरिमों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया। कुछ ऐसे तरीक़े अपनाये कि मुजरिमों को य़कीन हो गया कि मरने वाला सीक्रेट सर्विस ही का आदमी था और बाक़ी काग़ज़ात वह उसी इमारत में कहीं छुपा कर रख गया है। अभी हाल ही में उन लोगों की पहुँच उस कमरे तक हुई जहाँ हमने लाशें पायीं। दीवार वाले ख़ुफ़िया ख़ाने में सचमुच काग़ज़ात थे। उसका इशारा भी उन्हें अयाज़ की तरफ़ से मिला था। जैसे ही कोई आदमी ख़ाने वाली दीवार के नज़दीक पहुँचता था। अयाज़ क़ब्र के पत्थर के नीचे से डरावनी आवाज़ें निकालने लगता था और दीवार के क़रीब पहुँचा हुआ आदमी सहम कर दीवार से चिपक जाता। उधर अयाज़ क़ब्र के अन्दर से मैकेनिज़्म को हरकत में लाता और दीवार से तीन छुरियाँ निकल कर उसकी कमर में धँस जातीं। यह सब उसने सिर्फ़ सरग़ना को पकड़ने के लिए किया था। लेकिन सरग़ना मेरे हाथ लगा। अब अयाज़ शायद ज़िन्दगी भर अपने बारे में किसी को बता न सके! और कैप्टन फ़ैयाज़...मैंने उससे वादा किया है कि उसका नाम केस के दौरान कहीं न आने पायेगा। समझे! और तुम्हें मेरे वादे का ख़याल करना पड़ेगा।। तुम अपनी रिपोर्ट इस तरह बनाओ कि इसमें कहीं एक आँख वाली महबूबा भी न आने पाये।’
‘वह तो ठीक है।’ फ़ैयाज़ जल्दी से बोला, ‘वो दस हज़ार रुपये कहाँ हैं जो तुमने सर जहाँगीर से वसूल किये थे।’
‘हाँ ठीक है।’ इमरान अपनी आँखें फिरा कर बोला। ‘आधा-आधा बाँट लें, क्यों?’
‘बकवास है, उसे मैं सरकारी तहवील में दे दूँगा।’ फ़ैयाज़ ने कहा।
‘हरगिज़ नहीं!’ इमरान ने झपट कर चमड़े का वह हैंड बैग मेज़ से उठा लिया जो उसे पिछली रात सर जहाँगीर के एक आदमी से मिला था।
फ़ैयाज़ ने उस से हैंड बैग छीन लिया....और फिर उसे खोलने लगा।
‘ख़बरदार होशियार...’ इमरान ने चौकीदारों की तरह हाँक लगाई लेकिन फ़ैयाज़ हैंड बैग खोल चुका था और फिर जो उसने ‘अरे बाप’ कह कर छलाँग लगाई है तो एक सोफ़े पर जा कर पनाह ली। हैंड बैग से एक सियाह रंग का साँप निकल कर फ़र्श पर रेंग रहा था।
‘अरे, ख़ुदा तुझे ग़ारत करे, इमरान के बच्चे...कमीने!’ फ़ैयाज़ सोफ़े पर खड़ा हो कर दहाड़ा।
साँप फन काढ़ कर सोफ़े की तरफ़ लपका। फ़ैयाज़ ने चीख़ मार कर दूसरी कुर्सी पर छलाँग लगायी। कुर्सी उलट गयी और वह मुँह के बल फ़र्श पर गिरा। इस बार अगर इमरान ने फ्रुर्ती से अपने जूते की ऐड़ी साँप के सर पर न रख दी होती तो उसने फ़ैयाज़ को डस ही लिया होता। साँप का बाक़ी जिस्म इमरान की पिंडली से लिपट गया और उसे महसूस होने लगा जैसे पिंडली की हड्डी टूट जायेगी। ऊपर से फ़ैयाज़ उस पर घूँसों और थप्पड़ों की बारिश कर रहा था। बड़ी मुश्किल से उसने दोनों से अपना पीछा छुड़ाया।
‘तुम बिलकुल पागल हो, दीवाने...वहशी।’ फ़ैयाज़ हाँफ़ता हुआ बोला।
‘मैं क्या करूँ जाने मन, ख़ैर अब तुम इसे सरकारी तहवील में दे दो, अगर कहीं मैं रात को ज़रा-सा भी चूक गया होता तो उसने मुझे अल्लाह मियाँ की तहवील में पहुँचा दिया था।’
‘क्या सर जहाँगीर...?’
‘हाँ!...हम दोनों में मेंढकों और साँपों का तबादला हुआ था!’ इमरान ने कहा और अपने ख़ास अन्दाज़ में च्यूइंगम चबाने लगा। उसके चेहरे पर फिर वही पुरानी हिमाक़त दिखाई देने लगी।
समाप्त
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