“न...नहीं...आह...नहीं...अ...आह...मैं आशा नहीं हूं—मैं ब्यूटी हूं...ब...ब्यू...आह...आह!” उस छोटे-से, परन्तु पूरी तरह सुसज्जित टॉर्चर रूम में आशा की मर्मान्तक चीखें गूंज रही थीं—उसके चेहरे पर तेज वॉट तीन-चार बल्बों का प्रकाश पड़ रहा था—इस वक्त वह टॉर्चर चेयर पर बैठी थी।

बिजली के शॉक दिए जा रहे थे उसे, ठीक सामने जेम्स बॉण्ड खड़ा सिगरेट पी रहा था—टॉर्चर रूम का दरवाजा अन्दर से बन्द था—रूम में केवल तीन ही व्यक्ति थे—आशा, बॉण्ड और बिजली के शॉक देने वाला शक्ल से ही जल्लाद नजर आता व्यक्ति।
बॉण्ड ने हाथ उठाकर जल्लाद को रुक जाने का संकेत दिया तो उसने शॉक देने बन्द कर दिए—टॉर्चर चेयर पर बंधी आशा निढाल-सी बड़बड़ाए जा रही थी—“न...नहीं...मैं आशा नहीं हूं—मेरा नाम ब्यूटी है—मैं किसी आशा को नहीं जानती।”
बार-बार यही बड़बड़ाती हुई वह निढाल-सी हो गई।
यह क्रम पिछले एक घण्टे से चल रहा था—टॉर्चर के दौरान आशा दो बार बेहोश हो चुकी थी—दोनों ही बार उसे अप्राकृ-तिक रुप से होश में लाया गया और पुन: तड़पाने वाली यातनाओं का सिलसिला शुरू किया गया, सवाल एक ही था—तुम आशा हो, भारतीय जासूस हो। आशा का एक ही जवाब था—मेरा नाम ब्यूटी है, मैं जापानी हूं—किसी आशा को नहीं जानती।”
यदि सच कहा जाए तो यह कोई ऐसा सवाल नहीं था, जिसका जवाब बॉण्ड को मालूम न हो—वह आशा ही है—इस सच्चाई को वह उतनी ही अच्छी तरह जानता था जितनी अच्छी तरह ये जानता था कि वह बॉण्ड है—फिर भी यह बात कि वह आशा है, आशा के मुंह से ही स्वीकार करवाना उसके लिए निहायत जरूरी था—आशा के चेहरे पर मौजूद मेकअप और उसके बालों को बाण्ड कई प्रकार के कैमिकल्स से धो चुका था, परन्तु न चेहरे पर ही कोई फर्क पड़ा और न ही बालों पर।
यह समझने में बॉण्ड को देर नहीं लगी कि मेकअप उन पदार्थों से किया गया है, जिन पर कोई रसायन कान नहीं करेगा, एक महीने के बाद मेकअप स्वयं ही कमजोर पड़ना शुरू होगा और दो महीने पूरे होते-होते चेहरा पूरी तरह साफ हो जाएगा।
अब यह साबित करने का कि कोहिनूर को प्राप्त करने के लिए ब्रिटेन में भारतीय जासूस सक्रिय हैं, उसके पास एक ही रास्ता था— वह यह कि आशा के मुंह से कहलावाए कि वह आशा है।
इसी के लिए वह प्रयत्न भी कर रहा था।
एक कदम बढ़ाकर वह टॉर्चर चेयर के बिल्कुल करीब आ गया, दोनों होथों से आशा के गाल थपथपाता हुआ बोला—“आशा—आशा!”
“आं!” निढाल-सी आशा ने आंखें खोलने की कोशिश की। अधखुली आंखों से बाण्ड को देखती हुई वह बोली—“आशा—आशा!”
“तुम शायद यह सोच रही हो कि यदि तुमने अपना आशा होना स्वीकार कर लिया तो मैं बड़ी आसानी से विश्व के सामने यह सिद्ध कर दूंगा कि भारत के जासूस होने से विश्व स्तर पर भारत की गरिमा को आघात पहुंचेगा।”
“एक जापानी लड़की को जबरदस्ती भारतीय जासूस साबित करना चाहते हो मिस्टर बॉण्ड?”
“तुम न भी कहो, तब भी दुनिया के सामने हकीकत को साबित करने के लिए मेरे पास बहुत-से रास्ते हैं।”
“झूठ, झूठ ही रहता है।”
“मेरे पास भारतीय सीक्रेट सर्विस के सभी जासूसों की उंगलियों के निशान हैं, उस फाइल में तुम्हारी उंगलियों के निशान भी हैं, आशा, मैं तुम्हारे निशानों को उनसे मिलाकर साबित कर सकता हूं।”
“क्या सबूत है कि जिन निशानों से तुम मेरे निशानों को मिलाओगे वे भारतीय जासूस आशा के ही हैं?”
“त...तुम!” बेबसीवश तिलमिलाते हुए बॉण्ड ने दांत पीसे, दरअसल कुछ सूझ नहीं रहा था उसे—अजीब बात थी, उसके लिए आशा को आशा साबित करना एक समस्या बन गई थी—झुंझलाहट में उसने अपनी पूरी ताकत से एक जोरदार घूंसा आशा की नाक पर मारा।
आशा के कण्ठ से चीख निकल गई।
खून की धारा फूट पड़ी।
बॉण्ड ने बेरहमी से उसके बाल पकड़े, दांत भींचकर गुर्राया—“मैं सब जानता हूं कि ये मेकअप किन पदार्थों से किया गया है, अभी तक इन पदार्थों की रासायनिक काट नहीं बनी है—मगर दो महीने बाद ये मेकअप खुद तुम्हारा चेहरा छोड़ देगा आशा—तब खुद-ब-खुद ही साबित हो जाएगा कि तुम आशा हो—मैं तुम्हें छोङूंगा नहीं, दो महीने तक इसी टॉर्चर चेयर पर कैद रखूंगा—इस बीच ऐसी-ऐसी यातनाएं सहनी होंगी तुम्हें कि तुम्हारी रूह कांप जाएगी।”
“फिर भी ब्यूटी को आशा नहीं बना सकोगे बॉण्ड!”
“हुंह!” झुंझलाकर बॉण्ड ने जोरदार झटके के साथ उसके बाल छोड़ दिए, टॉर्चर चेयर की पुश्त से आशा के सिर का पिछला भाग टकराया, पुन: एक चीख निकल गई उसके मुंह से—मगर उस तरफ कोई ध्यान दिए बना बॉण्ड गुस्से की अधिकता में हलक फाड़कर चिल्लाय—“टॉर्चर करो इसे, जिस्म से सारा रक्त निचोड़ लो!” जल्लाद हरकत में आया—कक्ष में पुन: विजय-विकास को पुकारती हुई-सी आशा की चीखें गूंजने लगीं।
¶¶
चैम्बूर की लाश की तरफ देखते विक्रम ने पूछा—“इसे तुमने क्यों मार डाला विजय?”
“क्यों, अब क्या तुम्हें इसका अचार डालना था प्यारे?”
“न...नहीं—मेरा मतलब....!” विक्रम सकपका-सा गया।
विजय ने कहा—“तुम्हारा कोई मतलब नहीं है प्यारे, ये बात कान खोलकर सुन लो कि इस वक्त हम मुजरिम हैं और जो व्यक्ति मुजरिमों के काम का न रहे, उसे वे जिन्दा नहीं छोड़ते—ऐसे व्यक्ति को तो बिल्कुल भी नहीं, जो आगे चलकर किसी को उनका राज बता सके या अड़चन बन सके और प्यारे, उस आदमी को तो दुनिया में अपना खुद पहलवान भी नहीं छोड़ता, जिसका 'रोल' खत्म हो गया हो।”
“म....मगर अब हम इसकी लाश का क्या करेंगे?” अशरफ ने पूछा।
विजय ने एक पल भी चूके बिना कहा—“मुरब्बा बनाकर इसे एक कुल्हड़ में रखेंगे और सुबह उठते ही, चारों यार उंगली से मुरब्बे को चाटा करेंगे—कसम से, साली सेहत बन जाएगी और फिर हम सीधा चैलेंज मोहम्मद अली को देंगे।”
“तुम मौका मिलते ही बकवास शुरू मत कर दिया करो विजय!”
“अमां मियां झानझरोखे, जब तुम साली बात ही गधे की लात जैसी करते हो तो हम बकवास क्यों न करें—यह भी साला कोई सवाल हुआ—करना ही क्या है, लंदन की किसी सुनसान पड़ी सड़क को आबाद कर आएंगे।”
“अब, यानी दिन में?”
“ऐसे प्यार-मोहब्बत के काम हमेशा रात में होते हैं प्यारे!”
“इसका मतलब सारे दिन लाश यहीं रहेगी?”
“बिल्कुल रहेगी, आपको कोई एतराज?”
इस बार अशरफ तो बुरा-सा मुंह बनाकर चुप रह गया, लेकिन विक्रम बोल पड़ा—“यदि रात के वक्त किसी ने हमें इस लाश को ठिकाने लगाते देख लिया तो?”
“फिर वही साली गधे की लात जैसी बात—अमां प्यारे विक्रमादित्य, जरा सोचो—तुम्हें पैदा होते हुए तो कई व्यक्तियों ने देखा था, याद है—नर्स को देखते ही तुमने कहा था—“हैलो, हाऊ डू यू डू।” तभी क्या हुआ था जो अब होगा, यही न कि मुस्कराती हुई नर्स ने तुमसे हाथ मिला लिया था और तुमने उसकी अंगूठी साफ कर दी थी।”
“बात कुछ कहो, बकता कुछ है!” विक्रम बड़बड़ाकर रह गया।
काफी देर से चुप इस बार विकास विजय से पहले ही कह उठा—“ये लाश तो ठिकाने लग ही जाएगी गुरू, फिलहाल तो सोचने वाली बात ये है कि सूरज निकल चुका है, दिन चढ़ता जा रहा है—अब हमें समय बिल्कुल नहीं गंवाना चाहिए, क्योंकि अगर दिन ज्यादा चढ़ गया तो इस इमारत के इर्द-गिर्द चहल-पहल बढ़ जाएगी और फिर हम अपने स्पेशल मुख्य द्वार का प्रयोग करके बाहर नहीं निकल सकेंगे— सारे दिन के लिए यहीं कैद हो जाएंगे, न कुछ काम कर सकेंगे और न ही खाने-पीने को कुछ मिलेगा।”
“ये हुई एक सौ इक्यावन पाउण्ड की बात, चलो प्यारे झानझरोखे—जेब से निकालकर रकम दो दिलजले को।”
“मगर उससे पहले हमें अपनी आज दिन भर की गतिविधियां सेट करनी हैं।” विकास ने विजय की बात पर कोई ध्यान दिए बिना कहा—“काम बहुत-से हैं, किसे क्या करना है?”
“हम जरा उस इमारत की भौगोलिक स्थिति को देखना चाहेंगे, जिसके माथे पर बैंक संस्थान लिखा है, क्योंकि कोहिनूर तक के लिए एकमात्र रास्ता वहीं से जाता है।”
“तब ठीक है गुरु, आप उसे देखिए—मैं आशा आण्टी को चैक करता हूं।”
विजय ने अशरफ से कहा—“तुम्हें दिलजले के साथ रहना है प्यारे, वहां किसी दृश्य विशेष को देखकर ये ज्यादा हाथ-पैर न चला सके—वहां अपने बॉण्ड प्यारे का जाल बिछा हो सकता है।”
अशरफ ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।
“मुझे क्या करना है?” विक्रम ने पूछा।
“तुम्हें लूमड़ प्यारे को वॉच करना है, देखना है कि उसकी जो स्कीम हमें चैम्बूर ने बताई है, उस पर काम करता हुआ फिलहाल वह स्कीम के कौन-से स्पॉट पर है?”
“ओ.के.!” विक्रम का इतना कहना था कि एक साथ वे सभी चौंककर उछल पड़े।
कमरे में रखे फोन की घण्टी अचानक ही घनघना उठी।
उन सभी को जैसे एकदम सांप सूंघ गया, हक्के-बक्के-से वे एक-दूसरे के चेहरे की तरफ देखते रह गए—फिर सभी की दृष्टि तिपाई पर रखे उस 'नेवी ब्लयू' कलर के फोन पर स्थिर हो गई।
लगातार बजती हुई घण्टी पीटर हाउस के सन्नाटे को झकझोर रही थी—बहुत ही रहस्यमयी लग रही थी यह आवाज—अशरफ और विक्रम की तो टांगें कांपने लगी थीं—विजय और विकास जैसे महारथियों के चेहरों का रंग उड़ गया—सबके दिमाग में एक ही सवाल कौंध रहा था—“किसका फोन हो सकता है ये?”
पीटर हाउस तो खाली पड़ा है, लगभग सभी की नजरों में अदालत की सील लगी है इस पर—फिर आखिर कौन यहां किस मकसद से फोन करेगा—या किसी को मालूम है कि इस वक्त वे यहां हैं? घण्टी लगातार बजे जा रही थी।
“पीटर हाऊस बिल्कुल खाली पड़ा है प्यारे, रिसीवर उठेगा ही नहीं।”
“म....मगर!” विकास ने वही प्रश्न कर दिया—“आखिर कोई यहां फोन क्यों कर रहा है?”
घण्टी बन्द हो गई—उन सभी ने संतोष की सांस ली—विक्रम ने कुछ कहा, विषय 'फोन' ही था—और इससे पहले की कोई अन्य कुछ और कह सके, फोन बैल पुन: घनघना उठी—आश्चर्य के सागर में गोते लगाते हुए वे सब पून: फोन को घूरने लगे—कुछ देर बजने के बाद बैल बंद हो गई—अभी उनके बीच मुश्किल से एक या दो वाक्य ही बोले जा सके थे कि बैल पुन: बजी और फिर यह सिलसिला कुछ इस तरह शुरू हुआ कि बन्द होने का नाम ही न ले रहा था—बीच-बीच में बन्द होकर बैल बजती रही—पन्द्रह मिनट गुजर गए—ये पन्द्रह मिनट उनके लिए बड़े तनावपूर्ण थे और अभी खत्म नहीं हुए थे, उस वक्त कम-से-कम दसवीं बार बैल बज रही थी जब विकास ने कहा—“कोई बार-बार कट करने के बाद यहीं का नम्बर मिला रहा है गुरु!”
“मुझे तो लगता है कि कोई हम ही से बात करना चाहता है।” अशरफ ने राय पेश की।
विक्रम बोला—“हमसे कौन बात करना चाह सकता है—और फिर किसी को क्या मालूम कि हम पीटर हाउस में हैं?”
“कोहिनूर  के मामले में मुझे बड़े-बड़े शातिर दिलचस्पी लेते नजर आ रहे हैं प्यारे, मुमकिन है कि किसी ने पीटर हाउस में हमारी मौजूदगी का पता लगा लिया हो।”
“किसने?” विकास ने पूछा।
“कोई भी हो सकता है, शायद अपना लूमड़!”
“फिर क्या आदेश है?”
विजय ने एक पल जाने क्या सोचा, फिर बोला—“जो होगा देखा जाएगा प्यारे, इस बार यदि बैल बजे तो तुम रिसीवर उठा लेना!” उनकी वार्ता के बीच बैल एक बार फिर बन्द हो चुकी थी, जो विजय का वाक्य खत्म होने के साथ ही पुन: बजनी शुरू हो गई, विकास लम्बे-लम्बे दो ही कदमों में फोन के नजदीक पहुंच गया, अशरफ और विक्रम के दिल धक्-धक् कर रहे थे, जबकि लम्बे लड़के ने झट से रिसीवर उठाकर कान से लगाया, बोला—“हैलो!”
“चलो, ये साबित तो हुआ कि बहुत-सी इमारतें ऐसी भी होती हैं जिनके मुख्य द्वार पर अदालत की सील लगी रहती है, लेकिन लोग उसमें फिर भी बड़े आराम से रहते हैं न...न...रिसीवर नहीं रखना मिस्टर विकास!”
अपना नाम सुनते ही विकास दहाड़ उठा—“क....कौन तो तुम?”
“ही....ही....ही!” किसी के बहुत ही व्यंग्य से हंसने की आवाज लाइन पर गूंज गई—क्रोध की अधिकता के कारण लड़के का चेहरा दहककर लाल-सुर्ख हुआ जा रहा था, दूसरी तरफ से बोलने वाली रहस्यमय आवाज ने कहा—“मैंने यह जानने के लिए फोन नहीं किया कि पीटर हाउस खाली पड़ा है या उसमें कोई है—आप लोगों की वहां मौजूदगी की जानकारी तो मुझे पहले से ही थी, तभी तो सोलह मिनट तक भी रिसीवर न उठाए जाने के बावजूद मैं बार-बार रिंग करता रहा—ही...ही...ही...समझ सकता था कि आप लोग रिसीवर क्यों नहीं उठा रहे हैं—सोचा कि कभी तो आप यह समझेंगे कि फोन आप ही के लिए है।”
“तुम कोई काम की बात करते हो या मैं रख दूं फोन?” विकास दहाड़ा।
“ही....ही....ही...ही!” उसी व्यंग्य भरी, डरावनी-सी हंसी के बाद कहा गया—“मैं जानता हूं कि अब आप मेरी पूरी बात सुने बिना फोन नहीं रख सकेंगे मिस्टर विकास!”
“ये बार-बार किसका नाम ले रहे हो तुम?”
“ही....ही....ही...लो कर लो बात, हुजूर, ये आप ही का तो नाम है।”
“बको मत!”
“अच्छा हुजूर, नहीं बकता—आपका ऐसा ही हुक्म है तो अब फरमाए देता हूं— वो बात ऐसी थी जनाब कि मैं सोच रहा था—भूत न सही, भागते भूत का लंगोटा ही सही।”
“क्या मतलब?”
“कोहिनूर का जिक्र है जनाब, ये तो बड़ी नाइंसाफी है कि आप पूरा कोहिनूर ही डकार जाएं और मुझ गरीब को कुछ भी न मिले— मैं ऐसा नहीं होने दूंगा—आधी रोटी न सही, एक टुकड़ा तो इस कुत्ते के सामने भी डालना ही होगा हुजूर, वरना ये भूखा कुत्ता आप पर झपट पड़ेगा, आपको भी खाने नहीं देगा—ही....ही....ही!”
इसमें शक नहीं कि विकास का सारा चेहरा पसीने से तर-ब-तर हो गया था—दूसरी तरफ से बोलने वाले के अन्दाज और उसकी जानकारियों ने विकास जैसे लड़के को भी हिलाकर रख दिया था—आतंकित-सा कर दिया था उसे, फिर भी गुर्राकर बोला—“पता नहीं तुम कौन हो और क्या बक रहे हो?”
“झूठ मत बोलिए बन्दापरवर, मैं जो फरमा रहा हूं उसे तो आप खूब जानते हैं—हां, इस नाचीज को नहीं जानते—आपके पैरों की धूल हूं हुजूर।”
“क्या चाहते हो?”
“वह भी फरमा चुका हूं—अब तो सिर्फ आपकी जर्रानवाजी की जरूरत है, वैसे खाकसार को जल्दी कुछ नहीं है—चाहें तो अपने साथियों से सलाह-मश्वरा कर लें—मैं हुजूर को फिर फोन कर लूंगा, वैसे चैम्बूर नाम के उस गधे का रेंकना तो आपने बन्द कर ही दिया होगा—ही...ही...ही!” रिसीवर रख दिया गया।
“हैलो....हैलो!” विकास चीखता ही रह गया।
वस्तुस्थिति को समझकर आगे बढ़ते हुए विजय ने पूछा—“कौन था प्यारे?”
“पता नहीं!” रिसीवर क्रेडिल पर पटकते हुए विकास ने कहा।
“क्या कह रहा था?”
“कोहिनूर में से हिस्सा चाहता है।”
“क...क्या?” विजय के अलावा विक्रम और अशरफ भी इस तरह उछल पड़े मानो अचानक  ही किसी बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया हो, विकास ने कहा, “मेरे बार-बार पूछने पर भी उसने अपना परिचय नहीं दिया, जबकि वह हमारे बारे में सब कुछ जानता है, यह भी कि हम विकास विजय, अशरफ और विक्रम हैं।”
विजय सहित तीनों के होश उड़ गए।
चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं—अशरफ, विक्रम की टांगों में तो ऐसा कम्पन हुआ था कि वे खड़े न रहे सके और लगभग लड़खड़ाकर धम्म् से सोफे पर गिर गए—विकास ने जेब से रूमाल निकालकर चेहरे से पसीना साफ किया, विजय जैसे व्यक्ति का दिमाग भी इस वक्त बुरी तरह झनझना रहा था, विकास ने फोन पर हुई सभी बातें उन्हें विस्तार से बता दीं।
“कौन हो सकता है ये?” विजय बड़बड़ाया।
मगर इस सवाल का जवाब कम-से-कम उनमें से किसी के पास नहीं था—फिर भी करीब तीस मिनट तक वे उसी के बारे में बात करते रहे, अंत में विजय ने कहा—“दिन काफी चढ़ गया है प्यारे—हमें यहां से निकल जाना चाहिए।”
“म....मगर इस फोन वाले का क्या होगा?”
“वह कोहिनूर में से हिस्सा मांग रहा है, इसका मतलब ये कि जब तक उसे यह विश्वास नहीं हो जाएगा कि हम उसे कुछ देने वाले नहीं हैं, तब तक हमें किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएगा—उसने फिर फोन करने के लिए कहा है, इस बार उससे हम बात करेंगे प्यारे।”
“ल...लेकिन यदि हमारे बाद सारे दिन में उसने फिर फोन किया तो?”
“जो यह बात जानता है प्यारे कि हमने चैम्बूर का क्रियाकर्म कर दिया है, वह ये भी जरूर खबर रखेगा कि हम कब कहां हैं, पीटर हाउस में वह तभी फोन करेगा जब हम यहां होंगे।”
विजय के आदेश पर चैम्बूर की लाश वहां से उठाकर एक अन्य कमरे में बन्द कर दी गई और फिर वहां से निकलने के लिए वे दूसरी मंजिल पर स्थित उस कमरे में पहुंच गए जिसमें वह खिड़की थी—जो दरअसल उनके लिए मुख्य द्वार का काम कर रही थी—सबसे पहले उन्होंने खिड़की से बाहर झांककर यह देखा कि आसपास कोई है तो नहीं—विजय ने काफी बारीकी से गली और आसपास का निरीक्षण किया।
फिलहाल कहीं कोई नहीं था, हर तरफ खामोशी—सन्नाटा!
“रास्ता साफ है दिलजले, लपक लो।” विजय के कहते ही विकास ने खिड़की की चौखट पर पैर रखकर हाथ बाहर निकाला और अगले ही पल रेनवाटर पाइप पर झूल गया और फिर बन्दर की तरह तेजी से नीचे उतरता चला गया—उसके बाद विक्रम और विक्रम के बाद विजय के हुक्म पर अशरफ!
विजय खिड़की के बीचोबीच खड़ा था और खिड़की पार करके अशरफ अभी पाइप पर झूला ही था कि गड़बड़ हो गई—सामने वाली इमारत की दूसरी मंजिल की बालकनी में एक बच्चा नजर आया—उसी तरफ देखता हुआ विजय बौखलाया-सा हड़बड़ाया—“जल्दी...जल्दी करो झानझरोखे।”
“क्या बात है?” पाइप पर झूल रहे अनजान अशरफ ने चकराकर पूछा।
बालकनी में खड़ा बच्चा इसी तरफ देख रहा था, दृष्टि उसी पर टिकाए विजय दांत भींचकर गुर्राया—“अबे जल्दी कर बेवकूफ, उतर जा, पीछे वह...।”
और विजय ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया।
बड़ी ही मोहक मुस्कान के साथ मुस्कराता हुआ बच्चा 'हैलो' के अन्दाज में विजय को हाथ हिला रहा था, विजय के तिरपन कांप गए—बौखलाकर उसने भी अटपटी-सी मुस्कान के साथ हाथ हिलाते हुए बहुत धीमे से कहा—“हैलो बेटे।”
पाइप पर झूल रहे अशरफ ने विजय को ऐसा करते देखा तो उसने भी गर्दन पर घुमाकर उस तरफ देखा और उस नौ-दस साल के बच्चे ने अशरफ को भी हाथ हिलाकर 'हैलो' किया।
अशरफ के हाथ से पाइप छूटते-छूटते बचा।
पाइप पर लटका सारा जिस्म सूखे पत्ते की तरह कांप गया, हाथ-पांव फूल गए उसके।
“अबे उतर जा बेवकूफ, अब क्या यहीं चिपका रहेगा?” अजीब-सी मुस्कराहट में विजय दांत भींचकर गुर्राया, मगर अगले ही पल होंठों पर मुस्कान बिखेरकर उसे हाथ हिलाना पड़ा, क्योंकि बच्चा उन्हें यहां देखकर बहुत खुश नजर आ रहा था और बार-बार हैलो के अन्दाज में हाथ हिला रहा था—बड़बड़ाया-सा अशरफ पाइप के सहारे नीचे उतरता ही चला गया।
विजय ने पाइप को पकड़ने के लिए अभी हाथ खिड़की के बाहर निकाला  ही था कि उसे बच्चे के पीछे हल्की-सी परछाईं का आभास हुआ—जबरदस्त फुर्ती के साथ विजय न केवल कमरे के अन्दर सरक गया, बल्कि खिड़की भी बंद कर दी उसने, शीशे में से झांककर उसने बालकनी की तरफ देखा।
नाइट गाउन पहने एक महिला बच्चे से कुछ बात कर रही थी— उस वक्त विजय के माथे पर पसीना उभर आया, जब उसने बच्चे को इस तरफ इशारा करके कुछ कहते देखा, बच्चे के होंठ हिल रहे थे—महिला ने खिड़की की तरफ देखा।
विजय को वह गुस्से में नजर आई—विजय का दिल इस वक्त बड़ी तेजी से धड़क रहा ता, अचानक ही महिला ने बच्चे के गाल पर एक जोर का चांटा मारा और जाने क्या-क्या बड़बड़ाने लगी।
बच्चा रोने लगा।
कलाई पकड़कर महिला उसे जबरदस्ती खींचकर अन्दर ले गई—अब बालकनी बिल्कुल खाली पड़ी थी—विजय फुर्ती से खिड़की खोलकर पाइप पर झूल गया, खिड़की को बन्द करके वह बन्दर की तरह उतरता चला गया—मगर वह दस वर्षीय बच्चा अभी भी उसकी आंखों के सामन चकरा रहा था।
गोरा रंग, सेब-से लाल गाल, भूरी आंखों और छोटे-छोटे सुनहरे बालों वाले उस बच्चे ने नीला नेकर और फुल बाजू वाला लाल रंग का स्वेटर पहन रखा था—बहुत खूबसूरत बच्चा था वह और इसी मोहक मुस्कान के साथ बालकनी में खड़ा विजय को अभी तक हैलो के अन्दाज में हाथ हिलाता हुआ महसूस हो रहा था।
पतली गली को तेजी के साथ पार करते विजय के माथे पर पसीना झिलमिला रहा था।
¶¶
“आप किस नतीजे पर पहुंचे अंकल?”
“मैं तो ये समझता हूं कि आशा के किसी भी तरफ अब कोई 'स्पाई' नहीं है।” अशरफ ने कहा—“उस पर किसी भी माध्यम से कोई नजर नहीं रखी जा रही है, शायद उसने अपने व्यवहार से म्यूजियम की सिक्योरिटी और बॉण्ड को आश्वस्त कर दिया है और उन लोगों ने इसे साधारण जापानी पर्यटक समझकर वॉच करना बंद कर दिया है।”
“सारे दिन की जांच-पड़ताल के बाद मेरा भी यही ख्याल है।” विकास ने कहा।
“इसका अर्थ यही निकलता है कि तुम्हारे द्वारा संगआर्ट के प्रदर्शन से जो अनुमान विजय ने लगाया था, वह सौ प्रतिशत सही नहीं है, बॉण्ड का ध्यान ब्यूटी के आशा होने पर नहीं गया है।”
“तो अब आपकी राय क्या है?”
“किस बारे में?”
“क्यो न आज आशा आण्टी को एलिजाबेथ से अपने साथ पीटर हाउस ले चलें?” विकास ने कहा—“फिलहाल तो बॉण्ड का ध्यान भी उनकी तरफ नहीं है, यदि कल चला गया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।”
“इस बारे में यदि हम विजय की राय के बाद कल ही कुछ करें तो ज्यादा अच्छा होगा।”
“जैसी अपनी मर्जी, वैसे मेरे ख्याल से तो ऐसी खतरे वाली कोई बात नहीं है।”
“आशा के आसपास तो खतरे जैसी कोई बात नजर नहीं आती।” अशरफ ने कहा—“मगर आज मुझे स्मिथ स्ट्रीट पर खतरा जरूर नजर आ रहा है, सोच रहा हूं कि पीटर हाउस जाएं या न जाएं।”
“ऐसा क्यों?”
“अरे, क्या तुम भूल गए—बताया तो था कि सुबह मुझे और विजय को अपनी बालकनी से एक बच्चे ने उस वक्त देख लिया था जब मैं पाइप के सहारे नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”
“छोड़िए भी अंकल, आप एक बच्चे से डर रहे हैं?”
“बात बच्चे की नहीं विकास, हालात की है। उस बच्चे को शायद मुझे पाइप पर लटका देखकर अच्छा लगा और इसीलिए उसने खुश होकर हैलो की—मगर सच तो ये है कि उस क्षण मेरे हाथ-पांव ठण्ठे और सुन्न पड़ गए थे, खुदा का ही शुक्र है कि मैं वहीं से नीचे नहीं गिर पड़ा और अब....!”
“अब?”
“यदि उसने अपने मम्मी-डैडी या अन्य किसी बड़े से कह दिया होगा कि उसने वहां दो आदमियों को देखा है तो जरा सोचो—क्या मुसीबत नहीं आ सकती—सारी स्मिथ स्ट्रीट को मालूम है कि पीटर हाउस बिल्कुल खाली पड़ा है—उसकी खिड़की या पाइप पर किन्हीं व्यक्तियों की मौजूदगी का क्या अर्थ है?”
“आपके ख्याल से क्या हो सकता है?”
“स्मिथ स्ट्रीट के लोग इकट्टे होकर उस बच्चे के बयान पर थाने में रिपोर्ट लिखवा सकते हैं, ऐसी स्थिति में सम्भव है कि आज रात पीटर हाउस की निगरानी पुलिस करे या....!”
“या?”
“सम्भव है कि उस बच्चे के मां-बाप बच्चे द्वारा देखा गया दृश्य पीटर के किसी लड़के को बता दें, अगर ऐसा हो गया तो बखेड़ा ही खड़ा हो सकता है—वे एक-दूसरे पर उस खिड़की को 'मुख्य द्वार' बनाकर पीटर हाउस को इस्तेमाल करने का आरोप लगा सकते हैं—उनके आरोपों की जांच के लिए अदालत चाबी पुलिस को सौंपकर पीटर हाउस की भीतरी स्थिति की रिपोर्ट मांग सकती है।”
“और पीटर हाउस के एक कमरे में चैम्बूर की लाश है!”
“उसी की वजह से तो मैं ज्यादा चिंतित हूं और उसी की वजह से आज की रात पीटर हाउस जाना भी बहुत जरूरी है, यदि आज रात लाश ठिकाने न लगाई गई तो कल से उसमें बदबू उठने लगेगी और फिर वह बदबू हमारे लिए मुसीबत बन जाएगी, पीटर हाउस के पड़ोसियों के नथुनों तक बदबू पहुंच गई तो समझ लो कि हम सब बेभाव में ही लद जाएंगे।”
“इन सब बातों का तो एकमात्र यही हल है अंकल कि आज हम बहुत ज्यादा सावधानी के साथ पीटर हाउस में दाखिल हों, पहले अच्छी तरह वॉच करें कि कहीं कोई असाधारण बात तो नहीं है।”             
“मजबूरी है, जानना तो होगा ही।” अशरफ ने बड़बड़ाकर मानो स्वयं ही से कहा।
¶¶
उस वक्त वातावरण में छाई रात की नीरवता को दूर बज रहे किसी चर्च के घण्टे भंग कर रहे थे, जब बिस्तर पर लेटे अलफांसे ने धीरे-से अपनी कलाई में बंधी रिस्टवॉच में समय देखा।
पूरे बारह बज रहे थे।
शानदार कमरे में  नाइट बल्ब का भरपूर प्रकाश बिखरा हुआ था—अलफांसे ने एक नजर बगल में लेटी इर्विन पर डाली—वह सो रही थी—फूल-सा कोमल और खूबसूरत मुखड़ा इस वक्त उसके जागे रहने की अवस्था से कहीं ज्यादा मासूम लग रहा था—सुनहरे और लम्बे बाल डनलप के कोमल तकिए पर बिखरे पड़े थे।
एक ही लिहाफ के अन्दर थे, शनील के कवर वाला खूबसूरत लिहाफ—लिहाफ से बाहर सिर्फ दोनों का चेहरा ही था।
अलफांसे ने ध्यान से इर्विन की तरफ देखा।
शायद इस नजरिए से कि यदि इस वक्त वह उठे तो इर्विन की नींद टूटेगी तो नहीं?
वैसे पत्नी होने का पूर्ण सुख प्राप्त करने के बाद वह मीठी-मीठी नींद सो रही थी—उसके नथुनों से निकली गर्म सांसें अलफांसे के चेहरे से टकरा रही थीं।
उधर, चर्च ने बारह बार टनटनाकर अपनी ड्यूटी पूरी की—इधर, अलफांसे ने बहुत ही आहिस्ता से इर्विन की कलाई अपने सीने से हटाई और धीरे-धीरे सरककर लिहाफ से निकलने लगा।
बिस्तर चूंकि ज्यादा ही गद्देदार था इसलिए इर्विन झूलती-सी महसूस हुई—उसने कुम्हलाकर करवट ली—जब वह ऐसा कर रही थी तब अलफांसे ने सांस रोककर आंखें बन्द कर लीं।
फिर, दस मिनट बाद वह पलंग से उतरकर फर्श पर खड़ा होने में कामयाब हो गया—उसके जिस्म पर इस वक्त केवल एक लुंगी और बनियान था—उसने जल्दी-से कपड़े पहने।
पैरों में जूते डालकर वह दबे पांव दरवाजे की तरफ बढ़ा, अपनी तरफ से उसने बहुत ही आहिस्ता से चिटकनी खोली किन्तु फिर भी हल्की-सी 'कट' की जो आवाज हुई तो इर्विन की आंख खुल गई, अलफांसे को दरवाजे पर देखकर वह चौंक पड़ी—अभी उसे पुकारने ही जा रही थी कि रुक गई, पुकारने के लिए खुला मुंह उसने बिना कुछ कहे ही बन्द कर लिया और ऐसा शायद उसने अपने पति की अवस्था देखकर किया, इस वक्त अलफांसे उसे एक रहस्यमय चोर-सा नजर आया—सचमुच, उसका प्रत्येक एक्शन और हाव-भाव चोर जैसा ही था।
चिटकनी खुलने पर उसने चोर दृष्टि से बेड की तरफ देखा, इस क्षण इर्विन ने आंखें बन्द कर लीं—और यहां अन्तर्राष्ट्रीय मुजरिम सचमुच धोखा खा गया—उसे बिल्कुल इल्म नहीं हो सका था कि इर्विन चिटकनी की आवाज से जाग चुकी है, उसे सोती ही समझकर वह दरवाजा पार कर गया।
दरवाजा बन्द होते ही उसने पुन: आंखें खोल दीं।
अभी लिहाफ से बाहर निकलने के लिए उसने कोहनियां गद्दे पर टेकी ही थीं कि दरवाजे की बाहर वाली सांकल बन्द होने की धीमी-सी सरसराहट की आवाज आई।
इर्विन लिहाफ के अन्दर ही ठिठककर रह गई।
¶¶
उस वक्त करीब साढ़े बारह बज रहे थे, जब अशरफ और विकास पीटर हाउस के उस हॉल  में पहुंचे, विजय और विक्रम वहां पहले ही से मौजूद थे, उन्हें देखते ही सोफे से उठकर खड़े होते हुए विजय ने कहा—“आओ, प्यारे, लेकिन तुम्हें तो बारह बजे आना था—तीस मिनट लेट कैसे?”
“पीटर हाउस के बाहर तो हम पौने बारह बजे ही पहुंच गए थे लेकिन दाखिल अब हुए हैं।”
“किस खुशी में?”
“चैक करते रहे कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है, सुबह उस बच्चे ने हमें देख लिया था न!”
“हां प्यारे, देख तो लिया था और सबसे ज्यादा बेवकूफी तो तुमने दिखाई थी, तुम्हें बन्दर की तरह पाइप पर लटका देखकर ही उसे ज्यादा मजा आया था और वह 'हैलो' करने लगा।”
“उसने किसी से कुछ कहा तो नहीं?”
“उसी वक्त एक महिला से कहा तो था, शायद वह उसकी मां थी, लेकिन उसकी बात को शायद उसने बचकानी बात ही समझा—किसी वजह से उस वक्त वह क्रुद्ध थी, बच्चे को मारती हुई बालकनी से ले गई।”
“शुक्र है।” एक ठण्डी सांस लेता हुआ अशरफ सोफे पर बैठ गया।
“तुम्हारे अभियान का क्या रहा यानी अपनी गोगियापाशा कैसी है?”
“बिल्कुल ठीक और सुरक्षित है।” अशरफ ने कहा—“अभी तक वह एलिबेथ होटल के कमरे में ही ठहरी हुई है और हम दोनों की राय में अब उसे कोई जासूस वॉच नहीं कर रहा है।”
“गुड!”
उत्साहित-से विकास ने पूछा—“तो क्या हम आशा आण्टी को यहां ले आएं गुरु?”
“कल रात तक और वॉच करना, यदि स्थिति में कोई परिवर्तन न देखो तो ले आना।”
“ओ.के. गुरू!” विकास को जैसे मनचाही मुराद मिल गई, फिर उसने विजय से पूछा—“आपके अभियान का क्या रहा गुरु?”
“बस इतना ही समझ लो प्यारे कि सारी स्थिति चैम्बूर के बताए मुताबिक ही है।”
“और आप विक्रम अंकल, क्या आप पता लगा सके कि अलफांसे गुरु अपनी योजना के कौन-से स्पॉट पर हैं?”
“नहीं। मैं सारे दिन उसे वॉच करता रहा, लेकिन उसने कहीं भी एक क्षण के लिए भी कोई ऐसी हरकत नहीं की, जिससे यह लगे कि वह कोहिनूर के चक्कर में है या उस स्कीम पर काम कर रहा है जो चैम्बूर ने बताई थी—मुझे लगता है कि....!” वह कहता कहता रुक गया।
“बोलो प्यारे, रुक क्यों गए—कैसा लगता है तुम्हें?”
“यह कि इस बार वह किसी स्कीम पर काम नहीं कर रहा है—वह अपनी शादी और इर्विन के प्रति गम्भीर है। मेरे ख्याल से तो नए सिरे से सोचने की जरूरत है—जरा सोचो विजय, ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अलफांसे सचमुच अपनी आपराधिक जिन्दगी से ऊब चुका हो?”
“लो प्यारे, अपने लूमड़ ने तो विक्रमादित्य की खोपड़ी पर भी घुमा दिया जादू का डंडा—खैर, फिलहाल लूमड़ की तारीफ में गंवाने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है, बहुत-से काम करने हैं।”
“जैसे?”
“सबसे पहले तो उस साले चैम्बूर की लाश को ही यहां से निकालना है, उसके बाद आराम से बैठकर आइस्क्रीम बनानी है कि लूमड़ को हमें किस स्पॉट पर दबोचना है?”
“चलो—पहले लाश का ही इन्तजाम करते हैं।” कहने के साथ ही विकास उस कमरे की तरफ बढ़ गया, जहां चैम्बूर की लाश थी—विजय, अशरफ और विक्रम भी उसके साथ ही थे।             
दरवाजा खोलते ही वे सब उछल पड़े।
“ह...हैं...लाश कहां गई?” विक्रम के कंठ से चीख-सी निकली थी।
कमरे में सचमुच कोई लाश नहीं थी— सभी अवाक्-से स्टैचुओं की तरह उस स्थान को देखते रह गए, जहां वे लाश छोड़ गए थे—विजय मूर्खों की तरह पलकें झपका रहा था।
विकास सहित तीनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी।
“लाश चली कहां गई?” अशरफ बड़बड़ाया।
विजय बोला—“लाश चलकर नहीं प्यारे, उड़कर गई है।”
“क्या बकते हो?” अशरफ झुंझला-सा गया।
¶¶
अलफांसे हॉल के दरवाजे पर ही ठिठक गया।
वे चारों उसे एक कमरे के दरवाजे पर बातें करते नजर आ रहे थे, वहीं ठिठककर उसने उनकी बातें सुनीं और उन्हें सुनकर इस नतीजे पर पहुंचा कि उस कमरे में से कोई लाश गायब हो गई है—उसी ने इन सबको हैरान-परेशान कर रखा है।
अलफांसे ने अनुमान लगा लिया कि वह लाश चैम्बूर की रही होगी—उनकी तरफ बढ़ने के लिए अभी अलफांसे ने पहला कदम हॉल में रखा ही था कि फोन की घण्टी बज उठी।
बिजली की-सी फुर्ती के साथ अलफांसे ने खुद को दरवाजे के पीछे सरका लिया—इस बात ने उसे भी हैरान कर दिया था कि इन चारों को किसी ने यहां फोन किया है।
फोन पर होने वाली बातें अलफांसे सुनना चाहता था, इसीलिए सांस रोककर दरवाजे के पीछे वाली दीवार से चिपक गया, यहां से वह उन चारों को स्पष्ट देख सकता था।
और उन चारों की स्थिति तो आप न ही पूछें तो बेहतर है।
टेलीफन के घनघनाने की आवाज सुनते ही वे चारों फिरकनी की-सी तेजी के साथ एक ही धागे से बंधी चार कठपुतलियों की तरह पलट गए, वहीं—जड़वत-से होकर वे हक्के-बक्के-से फोन को घूरने लगे—इसमें शक नहीं कि उन चारों की शक्ल इस वक्त देखने लायक थी। टेलीफोन की घण्टी बन्द होने का नाम ही न ले रही थी।
अचानक आगे बढ़ते हुए विजय ने कहा—“इस बार हम बात करते हैं प्यारे!” वे तीनों भी उसके पीछे लपक-से पड़े थे।
“हैलो!” विजय ने रिसीवर उठाते ही कहा।
“ही....ही....ही!” वही व्यंग्य में डूबी डरावनी हंसी—“तो इस बार बड़े साहब बोल रहे हैं विजय बाबू।”
“हां प्यारे, हम ही बोल रहे हैं।”
“ही...ही....ही...बोलिए हुजूर, जरूर बोलिए—बन्दे की क्या बिसात है जो आपके बोलने पर पाबन्दी लगाए, वैसे मेरा ख्याल ये है कि जनाब कि आप इस वक्त चैम्बूर की लाश के लिए परेशान होंगे।”
“ओह, तो लाश तुमने गायब की है, प्यारे?”
“बन्दे की क्या बिसात है सरकार, बस आपकी जर्रानवाजी है—वैसे इस खाकसार ने लाश केवल उस कमरे से हटाई है, जहां आप लोगों ने रखी थी—पीटर हाउस से नहीं।”
“इस हरकत का मतलब?”
“मेरी हर हरकत का एक ही मतलब है जनाब, आपके दिमाग में यह जंचा देना कि ये नाचीज भी अगर पूरी रोटी का नहीं तो एक टुकड़े का हकदार जरूर है—मैं बहुत सब्र वाला जीव हूं सरकार—सिर्फ एक परसेंट पर ही खुश हो लूंगा।”
“क्या तुम जानते हो कि कोहिनूर की पूरी कीमत की एक परसेंट रकम ही कितनी बैठेगी?”
“मैं क्या जानूं साहब, आप बड़े आदमी हैं—आप ही को मालूम होगा, ईमानदारी से आप खुद ही कोहिनूर की कीमत आंक लीजिए और फिर उसका एक परसेंट मुजे दे दीजिए।”
“अगर हम तुम्हारी इस ऑफऱ को ठुकरा दें?”
“ठुकरा दीजिए साहब, यो कोई नई बात नहीं होगी—आप जैसे बड़े लोग, हम जैसे गरीबों के पेट पर तो सदियों से लात मारते आए हैं—लेकिन भले ही लात मारना न सीखा हो, चिल्लाना हमने भी सीख लिया है हुजूर—लाश पीटर हाउस में ही कहीं है, जी तोड़ कोशिश के बावजूद तलाश करने पर आपको मिलेगी नहीं और सूरज निकलते-निकलते उसमें से बदबू उठने लगेगी।”
“तुम हमें धमकी दे रहे हो?”
“धमकी देने जैसी हमारी औकात ही कहां है, सरकार?”
“अच्छा ठीक है, तुम्हें जो सौदा करना है—सामने आकर करो।”
“ही...ही...ही..शुक्रिया हुजूर, मैं आपकी हुकमउदूली नहीं कर सकता—कल रात मैं पीटर हाउस में ही आपके दर्शन करने हाजिर हो रहा हूं।”
“अब बताओ, लाश कहां है?”
“ही...ही...ही...माफ करना साहब, सौदा होने से पहले तो मैं इस मसले में आपकी कोई खिदमत नहीं कर सकूंगा, मगर डरिए नहीं—मैंने लाश को ऐसे इन्तजाम से रखा है कि अगले छत्तीस घण्टे तक उसमें से न कोई बदबू उठेगी, न खुशबू—ही...ही...ही!” रिसीवर रख दिया गया।
विजय ने बिना उनमें से किसी के पूछे ही टेलीफोन पर हुई सारी वार्ता उन्हें समझा दी, बोला—“ये जो भी कोई है प्यारे, पहुंची हुई चीज है—हम सबकी आवाज तक पहचानता है।”
“इसका मतबल ये हुआ जासूस प्यारे कि मेरे अलावा भी ऐसा कोई है, जो ये जानता है कि तुम यहां बशीर, मार्गरेट, डिसूजा, चक्रम और ब्यूटी बनकर कोहिनूर के चक्कर मे आए हो और यह भी कि इस वक्त पीटर हाउस पर लगी अदालती सील का भरपूर फायदा उठा रहे हो।” कहता हुआ अलफांसे हॉल में दाखिल हुआ तो वे चारों ही इस तरह उछल पड़े जैसे अचानक ही कमरे का फर्श गर्म तवे में बदल गया हो।
सन्नाटे की अवस्था में रह गए वे—गुमसुम, जड़वत-से।
ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई।
कई क्षण तक उनमें से किसी के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली थी—अलफांसे की शक्ल यहां देखने की कल्पना तो शायद विजय ने भी नहीं की थी, इसीलिए उसके दिमाग की समस्त नसें बुरी तरह झनझना गईं और वह अवाक्-सा अलफांसे को देखता रह गया। अपनी सदाबहार, चिर-परिचित मुस्कान के साथ अलफांसे उनकी तरफ बढ़ रहा था और एक ही क्षण में विजय ने यह निर्णय ले लिया कि अब अलफांसे से अपनी हकीकत छुपाने का कोई औचित्य नहीं है, इसलिए बोला—“तुम जिन्न की तरह यहां कहां से प्रकट हो गए लूमड़ प्यारे?”
“तुम शायद भूल गए कि कहीं भी पहुंच जाना अलफांसे की खूबी है।”
अब, विकास ने आगे बढ़कर पूरी श्रद्धा के साथ अलफांसे के चरण स्पर्श कर लिए—जब वह झुका हुआ था, तब अलफांसे ने उसका कान पकड़ा और उमेंठकर उसे ऊपर उठाता हुआ बोला—“बहुत शैतान हो गया है बेटे, सामने पड़ने पर पैर छूता है और बाद में गुरु के खिलाफ योजना बनाता है।”
“जब आप क्राइम करेंगे गुरु, तब मैं आपको बख्शूंगा नहीं।”
अलफांसे ने बड़ी ही गहरी मुस्कान के साथ कहा—“कम-से-कम इस बार क्राइम हम नहीं बेटे तुम कर रहे हो।”
“मुझे सब मालूम है गुरु कि कौन क्या कर रहा है!”
“तुम्हें कुछ मालूम नहीं है बेटे, सिवाय उसके जो इस झकझकिए ने तुम्हारे दिमाग में भरा है।”
आगे बढ़कर विजय ने कहा—“ये कौन-सा पैंतरा है लूमड़ मियां?”
“मुसीबत की जड़ तो यही है कि तुम मेरी हर बात, हर एक्टिविटी में कोई-न-कोई पैंतरा ढूंढने लगते हो और इस बार सच ये है कि तुम ज्यादा चतुर होने की वजह से धोखा खा रहे हो।”
“क्या मतलब?”
“एक पुरानी कहावत है विजय, यह कि 'बद अच्छा, बदनाम बुरा'—मुकद्दर से इस वक्त मैं इसी कहावत में कसा हुआ हूं—बदनाम न होता तो तुम शायद मेरी बात का यकीन कर लेते—मगर, दरअसल गलती तुम्हारी भी नहीं है—मेरा पिछला कैरेक्टर ही ऐसा रहा है कि कम-से-कम तुम चाहकर भी विश्वास नहीं कर सकते कि अलफांसे इस बार कोई चाल नहीं चल रहा है, उसका कोई पैंतरा नहीं है।”
“तुम ये बकरे की तीन टांग वाला राग अलापना बन्द करोगे या नहीं?”
“यदि सच पूछो विजय तो वो ये है कि बकरे की तीन टांग मैं नहीं, तुम साबित करना चाहते हो।”
“मतलब ये कि तुम कोहिनूर के चक्कर में नहीं हो?”
अलफांसे ने वजनदार स्वर में कहा—“बिल्कुल नहीं हूं।”
“और तुम ये भी चाहते हो कि हम तुम्हारी इस बकवास पर यकीन कर लें?”
“बेशक यही चाहता हूं।”
“क्यों—मेरा मतलब यदि तुम सचमुच दूध में धुल चुके हो तो हमारे सक्रिय रहने से तुम्हारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है? हम शक कर रहे हैं तो करने दो—जब तुम किसी चक्कर में हो ही नहीं तो तुम्हारा बिगाड़ क्या लेंगे, क्यों तुम्हें बार-बार हमें सन्तुष्ट करने की आवश्यकता पड़ती है?”
“दुख की बात है कि तुम मेरी हर बात का अर्थ उल्टा ही निकाल रहे हो—मगर फिर जब मैं गहराई से सोचता हूं तो इस नतीजे पर पहुंचता हूं कि तुम गलत नहीं हो—गलत था मेरा अतीत—अपने विगत में अलफांसे कभी एक सरल रेखा में नहीं चला, हमेशा आड़ा-तिरछा ही रहा—अलफांसे की हर बात में चाल, हर एक्टिविटी में साजिश होती थी—और अब यदि वही अलफांसे सरल रेखा में चले तो तुम यकीन करो भी तो क्यों—मगर सच मानो दोस्त—आज से साढ़े तीन महीन पहले वह अलफांसे इर्विन की झील-सी नीली गहरी आंखों में डूब चुका है—मैं रैना बहन की कसम खाकर कहता हूं कि मैं अब वो अलफांसे नहीं हूं....व....विकास, हां—शायद तुम मेरे द्वारा खाई गई इसकी कसम पर विश्वास कर सको—इधर देखो दोस्त, ये विकास है, तुम जानते हो कि अपराधी जीवन में मैंने यदि किसी से प्यार किया है तो वह ये है, विकास—मेरा बच्चा—मैं इसके सिर पर हाथ रखकर कसम खाता हूं कि इर्विन से शादी मैंने कोहिनूर के चक्कर में नहीं की है।”
यह सब कुछ अलफांसे ने कुछ ऐसे सशक्त ढंग से कहा था कि एक बार को तो विजय जैसे व्यक्ति का विश्वास भी डगमगा गया—अशरफ, विक्रम और विकास, विजय की तरफ देखने लगे थे—विकास के सिर पर अलफांसे ने अभी भी हाथ रखा था, स्वयं को संभालकर विजय ने कहा—“तुम कब चाहते हो प्यारे कि हममें से कोई या दिलजला जिन्दा रहे—मगर किसी की झूठी कसम खाकर उसे मार देने का यह भारतीय शस्त्र, दरअसल अब खट्टल हो चुका है, अपने दिलजले को बुखार भी नहीं चढ़ेगा।”
बड़े दुखी भाव से अलफांसे ने विकास के सिर से हाथ हटा लिया, बोला—“किसी ने सच कहा है कि वेश्या यदि सचमुच जोगन बनकर मन्दिर में बैठ जाए—भगवान की भक्ति में लीन हो जाए तो उसे जोगन वे तो मान सकते हैं, जो उसके अतीत को नहीं जानते—जो अतीत को जानते हैं यानी अपनी समझ में बहुत ज्यादा बुद्धिमान होते हैं, वे उस बेचारी को उसी दृष्टि से देखेंगे—वेश्या की दृष्टि से।”
“लगता है लूमड़ मियां कि तुम डायलॉग अच्छी तरह रटकर आए हो।”
“कोई भी वस्तु या व्यक्ति हमें ठीक वैसी ही नजर आती है जैसा उसे देखते वक्त हमारा दृष्टिकोण है, यदि पीतल के भाव में सोना बिक रहा हो तो, भले ही आप सोने के चाहे जितने बड़े पारखी हों—उस वक्त उस सोने को पीतल ही समझेंगे—यदि कोई वस्तु मैं तुम्हें अभी जेब से निकालकर दूं और कहूं कि वह विदेशी है, कीमत है दस हजार डॉलर—तो तुम्हें उस साधारण-सी चीज में अपनी दृष्टि द्वारा पैदा किए गए गुण नजर आने लगेंगे—उसी चीज को यदि में तुम्हें यह कहकर दूं कि वह फुटपाथ से एक डालर में खरीदी गई है तो तुम्हें उसमें अपनी दृष्टि के पैदा किए हुए अवगुण नजर आएंगे—एक सुन्दर लड़की सामने खड़ी है, तुम उस पर आसक्त हो—तभी तुम्हारा कोई विश्वसनीय बताता है कि वह दरअसल वेश्या है—उसी क्षण से वह तुम्हें गन्दी और बदसूरत नजर आने लगेगी—यह सब क्या है? दृष्टि भ्रम ही न—सब कुछ वैसा नजर आता है जैसे नजरिए से आप देख रहे हैं—तुम भी इस वक्त उसी दृष्टि-भ्रम के शिकार हो विजय, मेरे अतीत को पचा नहीं पा रहे हो तुम—उससे उभरकर मेरी तरफ देख ही नहीं रहे हो क्योंकि—इसके तीन कारण हैं, मेरा अतीत—तुम्हारा दृष्टि-भ्रम और सबसे बढ़कर तुम्हारे अन्तर में कहीं छुपा ये डर या तर्क कि—कहीं कल को लोग ये न कहें कि विजय, तुम भी धोखा खा गए—तुम तो अलफांसे को सबसे ज्यादा समझने का दावा किया करते थे?”
विजय से पहले इस बार विकास बोला—“मेरे कुछ सवालों का जवाब देंगे क्राइमर अंकल?”
“जरूर दूंगा।”
“क्या आप चैम्बूर को जानते हैं?”
“जानता हूं नहीं, जानता था—अब ये भी जानता हूं कि उसे तुमने मार दिया है।”
“तब तो आप यह भी सोच सकते हैं कि सब कुछ उगलवाने के बाद ही हमने उसे मारा होगा।”
“बेशक!”
“फिर भी आप हमें वही पढ़ा रहे हैं, यह जानने के बावजूद कि उसने हमें आपकी योजना भी बता दी है।”
अलफांसे ने एक कदम आगे बढ़कर कहा—“मैं वह एक-एक लफ्ज जानता हूं, जो उसने कहा होगा, लेकिन...।”
“लेकिन क्या?”
“चैम्बूर सिर्फ वही कह सकता था जिस भ्रम में मैंने उसे रखा था।”
“मतलब?”
“उसने झूठ नहीं बोला, फिर भी उसकी बात में झूठ का अंश था—वह मुझसे स्वयं मिला और वहां से लेकर मेरी और इर्विन की लंदन में हुई भेंट का वह सारा किस्सा सच है, जो उसने कहा—मैं कोहिनूर के चक्कर में ही यहां आया था—इर्विन से भेंट सचमुच एक संयोग थी—जिस क्षण मुझे ये पता लगा कि वह गार्डनर की लड़की है—ये सच है कि उस क्षण मैंने उस पर आसक्त होने का नाटक कोहिनूर के लिए किया था—परन्तु उससे भी बड़ा सच ये है विकास कि उससे होने वाली मुलाकातें, उसके व्यवहार—प्यार और मेरे प्रति उसके विश्वास और श्रद्धा ने मुझे तोड़ दिया—मेरे दिमाग से कोहिनूर की बात बिल्कुल ही निकल गई, अपने और इर्विन के सम्बन्धों को मैं एक नए और अनूठे ही रूप में देखने लगा।”
“तुम ये लैला-मजनूं की कहानी बन्द करते हो या नहीं?”
अलफांसे ने बड़े ही असहाय भाव से विजय की तरफ देखा।
“एक मिनट अंकल, प्लीज—गुरु को कहने दीजिए।” विकास ने कहा—“हां तो मतलब ये हुआ गुरु कि आप सचमुच ही इर्विन से मोहब्बत करने लगे, फिर?”
“उन चन्द ही दिनों में मैं और इर्विन काफी आगे बढ़े चुके थे कि उस दिन गार्डन की कोठी पर अचानक चैम्बूर से मुलाकात हो गई, फिर मेरे और उसके बीच होटल के कमरे में जो बाते हुईं, वे सब तो उसने बता ही दी होंगी।”
“उनके बारे में आपका क्या कहना है?”
“सिर्फ ये कि जरा सोचो, जो बातें मैंने उससे कीं—उनके अलावा मैं और कर भी क्या सकता था—मैं जानता था कि यदि गर्म तवे पर बैठकर चैम्बूर से ये कहूं कि मैं अब कोहिनूर के चक्कर में नहीं हूं, बल्कि सचमुच इर्विन से प्यार करता हूं तो वह यकीन नहीं करेगा, बोलो—क्या तुम्हारे ख्याल से वह यकीन करता?”
“नहीं।”
“इसलिए मैंने उसका ये आरोप स्वीकार किया कि मैं कोहिनूर के चक्कर में हूं क्योंकि स्वीकार न करने का अर्थ था, उसका यह समझना कि मैं उससे चार सौ बीसी कर रहा हूं और उसके यह समझने का अर्थ था, उसके द्वारा मेरा भंडा फूट जाना—उसकी बात में वजन था, सब उसी का यकीन करते—मुझे कोहिनूर के चक्कर में मान लिया जाता और ऐसा होते ही इर्विन मुझसे नफरत करने लगती—वह मुझसे बहुत दूर हो जाती विकास और सच, तब तक तेरे में उसे खो देने की हिम्मत बाकी नहीं रह गई थी—अत: चैम्बूर की जुबान बन्द करने के लिए मैंने उसके सामने स्वीकार कर लिया कि मैं कोहिनूर के चक्कर में हूं—उसे पार्टनर भी बना लिया—यकीन दिलाने के लिए एक उल्टी-सीधी योजना भी सुना दी उसे—योजना तुमने भी सुनी होगी—वह सुलझी हुई सशक्त और सुदृढ़ नहीं है, केवल इसलिए कि मैं इस पर कार्य करने वाला नहीं था, केवल उसे सन्तुष्ट करना ही मेरा एकमात्र मकसद था और वह योजना सुनाकर मैंने उसका मुंह बन्द कर दिया।”
“अब यानी शादी के बाद आप कितने दिन तक चैम्बूर को इस तरह संतुष्ट रख सकते थे?”
“सोचा था कि महीने-दो-महीने में इर्विन और गार्डनर को विश्वास में लेकर मैं किसी दिन शांति से बैठकर उससे ये सब बातें सच-सच बता देता जो इस वक्त यहां कह रहा हूं।”
विजय ने व्यंग्य किया—“यानी अपना काम तुम चैम्बूर को मैदान से साफ करके करने वाले थे?”
“लगता है मैं जिन्दगी में तुम्हारा नजरिया कभी भी नहीं बदल सकूंगा विजय!”
“एक तरफ तुम कहते हो कि तुम दूध में धुल चुके हो प्यारे, दूसरी तरफ तुम्हारी हरकतें अब भी वही हैं।”
“ऐसा क्या किया मैंने?”
“जो कुछ हमने जेम्स ऐलिन और हैमेस्टेड बनकर किया, तुम वह सब कुछ जान गए—तुमने यह भी पता लगा लिया कि इस वक्त हम यहां हैं, ये सारी हरकतें दूध से धुले लूमड़ की हैं या पुराने लूमड़ की?”
“तुम्हारे ऐलिन और हैमेस्टेड वाले रोल की जानकारी प्राप्त करने से सम्बन्धित स्पष्टीकरण तो मैं दे ही चुका हूं—अब रही यहां पहुंचने की बात—इसका जवाब केवल ये है विजय कि इंसान का चरित्र बदलवाने से वे योग्यताएं तो खत्म नहीं हो जाती जो उसमें हैं—ग्राडवे की लाश देखकर ही मैं समझ गया था कि तुम किस लाइन पर चल रहे हो, उसके बाद तुम पांचों इस मेकअप में एलिजाबेथ आए—शायद भूल गए कि अलफांसे मेकअप के धोखे में नहीं आता—उस दिन, एलिजाबेथ में आशा ने सिक्योरिटी के जासूस को फंसाने के लिए जो ड्रामा किया, उसने मुझ पर बहुत-सी हरकतें खोल दीं—मैं बड़ी आसानी से समझ सकता था कि ऐसी सुन्दर चाल तुम्हारे ही दिमाग की देन हो सकती है, मैं जानता था कि मुझे वॉच किया जा रहा है, इस मन से कि कहीं तुम मुझे कोई नुकसान न पहुंचा दो, मैंने अपने एक शार्गिद को विक्रम के पीछे लगा दिया—जिससे मुझे यहां का पता मिल गया।”
“यानी अपने पुराने साथियों से सम्पर्क बनाए हुए हो?”
“सिर्फ तब तक जब तक कि तुम यहां सक्रिय हो, अपनी सुरक्षा हेतु!” अलफांसे ने पूछा—“आज दिन में मुझे पता लगा कि तुमने चैम्बूर को किडनैप कर लिया है, मैं समझ गया कि अपनी समझ में तुम बिल्कुल सही लाइन पर चल रहे हो और यदि इसी तरह चलते रहे तो तुम मेरी फैमिली लाइफ बिखेर दोगे।”
“क्या मतलब?”
“प्लीज विजय, मुझे सुधरने दो—यहां से चले जाओ दोस्त, वैसा कोई चक्कर नहीं है, जैसा तुम सोच रहे हो—मैं कोहिनूर को नहीं चुराऊंगा, इसलिए कोहिनूर तो तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा, लेकिन इस चक्कर में मेरी फैमिली लाइफ जरूर बिखर जाएग।”
“वह कैसे प्यारे?”
“यदि तुम्हारी एक्टिविटीज यूं ही जारी रहीं तो दूसरे लोग भी मेरे बारे में वही सोचने लगेंगे जो तुम सोच रहे हो, इर्विन भी यही सोचने लगेगी—मैं इस वक्त भी पूरा रिस्क लेकर आया हूं—यदि इर्विन जाग गई तो कमरे से मुझ चोरों की तरह गायब देखकर जाने क्या सोचने लगेगी—मेरे प्रति शंकित हो उठेगी वह, लेकिन यहां आना भी मेरे लिए जरूरी हो गया था—प....प्लीज लौट जाओ विजय, व्यर्थ का बखेड़ा मत खड़ा करो—यदि तुम सक्रिय रहे तो बॉण्ड भी सक्रिय रहेगा—कांटे की तरह मेरे दिमाग में वह भी चुभने लगा है, जिसने तुम्हें फोन किया—पता नहीं वह कौन है—इस सारे झमेले में मेरी इर्विन दूर हो जाएगी मुझसे।”
“इसमें मैं क्या कर सकता हूं?”
“तुम यहां से चले जाओ, सारे बखेड़े अपने आप बन्द हो जाएंगे।”
व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ विजय ने कहा—“और मैदान साफ होते ही तुम्हारा बखेड़ा शुरू?”
“उफ्फ!” इस बार अलफांसे झुंझलाकर चीख पड़ा—“तु...म मेरा यकीन क्यों नहीं करते—मैं कोहिनूर के चक्कर में नहीं हूं विजय—“मैं एक छोटे-से घर, एक शान्त जिंदगी के चक्कर में हूं—म...मैं....अपने होने वाले बच्चे की कसम खाकर कहता हूं कि मैं कोहिनूर के चक्कर में नहीं हूं।”
“ब....बच्चा?” विकास चौंका—“क्या इर्विन आण्टी मां बनने वाली हैं अंकल?”
“हां!” दांत भींचकर क्रोधित स्वर में कहते वक्त अलफांसे की आंखों में आंसू और लहू का मिश्रण डबडबा रहा था, गुर्राहटदार स्वर में वह कहता ही चला गया—“इर्विन मां बनने वाली है, उसकी कोख में मेरा बच्चा है—मैं बदल गया हूं—अगर तुमने यकीन नहीं किया और अपने दिमाग में फितूर की वजह से यहां सक्रिय रहे तो मेरा बनाया हुआ आशियां तिनके-तिनके करके बिखर जाएगा और यदि ऐसा हो गया विजय तो कसम से, बोटी नोच डालूंगा मैं तुम्हारी—हिन्दुस्तान में खून के दरिया बहा दूंगा—यदि मेरा बसाया हुआ ये घर उजड़ गया तो फिर—फिर अलफांसे अतीत के अलफांसे से कई गुना ज्यादा खतरनाक होगा, ये तुम याद रखना विजय!” पागलों की-सी अवस्था में कहने के बाद वह घूमा और बड़ी तेजी से हॉल से बाहर निकल गया।
“अंकल—रुकिए अंकल!” विकास ने उसे पुकारा।
मगर अलफांसे रुका नहीं—आवाज देते हुए विकास ने उसके पीछे दौड़ना चाहा, परन्तु आगे बढ़कर विजय ने उसकी कलाई पकड़ ली और बोला—“लूमड़ को जाने दो प्यारे!”
विकास अवाक्-सा विजय के चेहरे को देखता रह गया।
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टॉर्चर चेयर पर बैठी आशा को अपना सिर बुरी तरह से भभकता हुआ महसूस हो रहा था, हजार वॉट वाले बल्ब की तीखी रोशनी उसकी आंखों में सुई के समान चुभ रही थी— सारे बल्बों के फोकस आशा के चेहरे और सिर पर फिक्स थे—उसे नींद आ रही थी—टॉर्चर चेयर पर बैठे-बैठे उसे चालीस घणटे के करीब हो गए थे।
इस बीच एक मिनट के लिए भी उसे सोने नहीं दिया गया था।
आंखें जलती हुई-सी महसूस हो रही थीं।
न चाहते हुए भी उसकी आंखें बन्द होती चली गईं और अभी पूरी तरह बन्द हुई भी नहीं थीं कि ठीक सामने खड़े जेम्स बॉण्ड ने एक गिलास पानी झटके से उसके चेहरे पर फेंका।
'छपाक्' की आवाज के साथ ही आशा चौंक-सी पड़ी, एक कराह निकली उसके होंठों से—विनती करती हुई-सी बोली—“मुझे सोने दो—प्लीज....मुझे नींद आ रही है।”
“कहो कि तुम आशा हो।” बॉण्ड गुर्राया।
“न...नहीं।”
“मैं तुम्हें नहीं सोने दूंगा, नींद से बहुत प्यार है न तुम्हें—सोना चाहती हो तो एक ही रास्ता है—बोलो कि तुम आशा हो—तुम आशा....।” बॉण्ड का वाक्य बीच में ही रह गया।
उसकी तर्जनी में पड़ी चौड़े नगवाली अंगूठी स्पार्क कर रही थी—बॉण्ड बड़ी तेजी से गिलास एक तरफ फेंककर पीछे हटा, अगले ही पल उसने अंगूठी में मौजूद ट्रांसमीटर ऑन कर दिया—दूसरी तरफ से आवाज आई, “एजेण्ट डबल एन नाइन स्पीकिंग ओवर!”
“हां रिपोर्ट दो—ओवर!”
“ये लोग मुझे आशा समझकर अपने साथ ले आए हैं ओवर!”
“वैरी गुड!” जेम्स बॉण्ड की आंखें हीरों की तरह चमक उठीं—“इस वक्त तुम कहां से बोल रही हो ओवर?”
“पीटर हाउस से, इन लोगों ने यहीं डेरा जमा रखा है—इस वक्त वे चारों यहीं हैं और कम-से-कम तीन घण्टे तक यहीं रहेंगे, बड़ा अच्छा मौका है, पीटर हाउस को सशस्त्र फोर्स से घिरवा दो।”
“ओ.के.—मैं ऐसा ही करता हूं, तुम सतर्क रहना—ओवर एण्ड ऑल!” कहने के तुरन्त बाद बॉण्ड ने जल्दी से ट्रांसमीटर ऑफ किया और टॉर्चर रूम से बाहर निकलने के लिए दरवाजे की तरफ लपका।
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मेरे प्रेरक पाठको—बहुत पहले आपको मुझसे यह शिकायत थी कि मैं प्रत्येक कथानक 'पार्ट' में लिखता हूं और आपको 'पार्ट' न मिलने की वजह से दिक्कत होती है, आपकी राय को मानते हुए मैंने पिछले दो साल से कोई कथानक पार्ट में नहीं लिखा—मगर आज, यह कथानक बहुत लम्बा होने की वजह से पुन: ये धृष्टता कर रहा हूं, उम्मीद है कि आप लोग मुझे क्षमा कर देंगे।
क्या आप अलफांसे के बारे में किसी निर्णय पर पहुंच सके—यानी विजय के मुताबिक वह सचमुच कोहिनूर के चक्कर में है या ये सच है कि वह इर्विन से प्यार करता है, छोटा-सा घर बसाना चाहता है? अपनी राय मुझे पत्र में लिख भेजें, फिर अपनी राय को 'कफन तेरे बेटे का' से मिलाएं—जी हां, अलफांसे की शादी से जो कथानक शुरू हुआ है, उसका अंत 'कफन तेरे बेटे का' में ही होगा।
“इर्विन ने अलफांसे को चोरों की तरह जाते देखकर क्या सोचा—क्या उनके सम्बन्ध बिखर गए—अलफांसे सचमुच किस चक्कर में है—अलफांसे के होने वाले बेटे का नाम क्या रखा गया—वह कौन था, जिसे चैम्बूर ने बॉण्ड के चले जाते ही फोन किया—चैम्बूर को कौन-सा रहस्य विजय-विकास को न बताने की चेतावनी दी थी, सुरक्षा-व्यवस्था आप सुन ही चुके हैं, क्या कोहिनूर की सफल चोरी हो सकेगी, यदि हां तो चोरी कौन करेगा और सबसे बड़ा सवाल है, ये चोरी कैसे होगी—क्या आप कोई स्कीम बनाकर हमें भेज सकते हैं—यदि नहीं तो 'कफन तेरे बेटे का' पढ़ें—और यदि हां तो लिख भेजें और फिर अपनी स्कीम को 'कफन तेरे बेटे का' की स्कीम के तराजू में तोलें।
विजय के ग्रुप पर छाए संकट के बादलों का क्या हुआ, फोन करके हिस्सा मांगने वाला कौन है—उस दस वर्षीय छोटे-से बच्चे ने क्या कमाल दिखाया—चैम्बूर की लाश कहां है—आशा पर क्या गुजरी—क्या अपने बीच रह रह आशा के रूप में बॉण्ड की जासूस को विजय ग्रुप पहचान सका—जब बॉण्ड ने पीटर हाउस को घेर लिया तो ये लोग कैसे बचे—क्या बाण्ड ने अपने मुल्क का गौरव जाने दिया? उपरोक्त और ऐसे ही ढेर सारे सवालों का पिटारा है—'कफन तेरे बेटे का'—शतरंज बिछ चुकी है, चालें चली जा रही हैं—मोहरे आपके सामने हैं—आप यह भी जानते हैं कि मात देने तक अपने कितने मोहरे गंवाने होंगे—यह सब जानने के लिए 'कफन तेरे बेटे का' पढ़ें।
'कफन तेरे बेटे का' में केवल उपरोक्त सवालों के जवाब ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ है—जो है, उसे यहां छोटी-सी 'झलक' के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं—'कफन तेरे बेटे का' की चंद झलकियां।
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“नहीं गुरु, नहीं।” लड़का भड़क उठा—“अब आपकी इन ढुल-मुल स्कीमों से कुछ होने वाला नहीं है—अब मुझे अपने ढंग से काम करना होगा।”
“होश की दवा करो प्यारे दिलजले!”
“होश की दवा आप कीजिए गुरु—विकास को हारने की आदत नहीं है—आप सभी बहुत पीछे हैं, क्राइम अंकल बहुत आगे निकल गए हैं—अगर एक बार कोहिनूर उनके हाथ आ गया तो दुनिया की कोई ताकत हमें उस तक नहीं पहुंचा सकती।”
“ये सुरंग...!”
“हुंह—सुरंग—ये सुरंग बना रहे हैं आप?” विकास बिफर पड़ा—“ये सुरंग कभी पूरी नहीं होगी—हमसे बहुत पहले क्राइमर अंकल कोहिनूर ले उड़ेंगे।”
“इसमें हम कर भी क्या सकते हैं?”
“भले ही आप न कर सकें। आपके ढंग से कुछ न हो सके—मगर मैं सब कुछ कर सकता हूं—पाँसे अब भी पलट सकते हैं, मेरे ढंग से अब भी बहुत कुछ हो सकता है।”
“क्या करोगो तुम?”
“इर्विन का मर्डर!”
विजय हलक फाड़कर चिल्ला उठा—“व...विकास!”
“हां गुरु—हां, क्राइमर अंकल का सम्बन्ध गार्डनर के घर से तोड़ देना जरूरी है और जब इर्विन ही न रहेगी तो उस घर से खुद-ब-खुद ही क्राइमर अंकल के सम्बन्ध खत्म!”
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विकास दहाड़ उठा—“तुम बहुत बड़े भ्रम में हो इर्विन—अलफांसे गुरु तुमसे बिल्कुल प्यार नहीं करते—केवल कोहिनूर को हासिल करने के लिए उन्होंने तुमसे शादी की है।”
“ये झूठ है—मैं उनके बच्चे की मां बनने वाली हूं।”
“इसका मतलब तुम नहीं मानोगी, अलफांसे गुरु से सम्बन्ध-विच्छेद करके कभी इस कोठी में न आने के लिए नहीं कहोगी?” विकास ने भभकते स्वर में पूछा।
“मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं, वो मेरे पति हैं।”
“तो फिर ये लो—इस सारे किस्से को मैं खत्म किए देता हूं।” गुर्राने के साथ ही विकास ने एक लम्बा चाकू खोल लिया।
“न...नहीं...मुझे मत मारो!” चीखती हुई इर्विन पीछ हटी। विकास बाज की तरह झपटा, चाकू 'खच्च्' से इर्विन के गर्भ में धंस गया—इर्विन के कंठ से निकलने वाली चीख ने गार्डनर की समूची कोठी को झनझनाकर रख दिया और इर्विन के खून से विकास का चेहरा रंगता ही चला गया—जरा भी तो रहम नहीं किया था जालिम ने।
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दहकता चेहरा लिए अलफांसे ने खून में सना नाइट गाउन रैना की तरफ बढ़ा दिया, बोला—“ये ली।”
“ये क्या है अलफांसे भइया?” रैना ने कम्पित स्वर में पूछा।
“कफन तेरे बेटे का!”
“भ...भइया!” रैना चीखकर पीछ हटी, नाइट गाउन फर्श पर गिर गया।
दांत पीसते हुए अलफांसे ने गाउन पर अपना जूता रखा, उसे कुचलता हुआ गुर्राया—“ये मेरी इर्विन का नाइट गाउन है, देख—इस पर मेरी इर्विन के खून के धब्बे हैं—जिस वक्त तेरे लाडले ने उसे मारा था, तब इर्विन यही पहने थी—मैं बख्शूंगा नहीं रैना—खून का बदला खून है—तेरे लाल के परखच्चे न उड़ा दिए तो मेरा नाम भी अलफांसे नहीं।”
“ये तुम क्या कह रहे हो भइया, तुम विकास को मारोगे?”
“उस कुत्ते को मारकर कलेजा ठण्डा नहीं होगा मेरा, बोटी-बोटी काटकर फेंक दूंगा।”
“ऐसा मत कहो भइया—ऐसा मत कहो—देखो, मैं अपना आंचल फैला रही हूं—भीख मांग रही हूं तुमसे—मेरे बेटे को बख्श दो—तुम्हें मेरी राखी की कसम!”
“थू!” अलफांसे ने रैना के फैले हुए आंचल में थूक दिया।
“भ...भइया!” रैना दहाड़े मार-मारकर रो पड़ी।
“उस वक्त कहां था तेरा ये आंचल, जब वह दरिन्दा मेरी इर्विन पर वार कर रहा था—तब कहां थी तेरी राखी की सौगन्ध जब उसने मेरा घर उजाड़ दिया—अलफांसे को प्यार करना नहीं आता था रैना—उस अभागी इर्विन ने मुझे प्यार करना सिखा दिया—अलफांसे ने जिसे जान से बढ़कर चाहा उसी को तेरे बेटे ने खत्म कर दिया—यूं, जैसे वह गाजर-मूली हो—धिक्कार है उस अलफांसे पर जो इर्विन की मौत का बदला न ले।”
“क्या विकास को मारकर तुम बच सकोगे भइया?”
“क्यों, मुझे कौन मारेगा?”
“विजय भइया, ठाकुर साहब, ब्लैक ब्वॉय भइया और दुनिया के वे सारे जासूस जो उसकी मदद कर रहे हैं, क्या वे तुम्हें छोड़ देंगे—तुम अकेले हो, उधर वे सब हैं—सिंगही और जैक्सन भी।”
“तू भूल गई रैना, अलफांसे एक शेर का नाम है, शेर जंगल का राजा होता है, जंगल का हर जानवर शेर के इशारे पर नाचता है, किसी के इशारे पर शेर नहीं।”
“शेर भी नाचता है लूमड़ मियां, शेर भी नाचता है।” विजय की आवाज ने उन दोनों को चौंका दिया, अलफांसे फिरकनी की तरह घूमा—चीखती हुई रैना दौड़कर विजय से लिपट गई।
“तुम?” अलफांसे का चेहरा कनपटियों तक सुर्ख हो गया।
“हमें रिंग मास्टर कहते हैं प्यारे!” विजय ने अपने हाथ में दबे हंटर को फटकारा—“जरा सोचकर बताओ, रिंग मास्टर के कोड़े पर आदमखोर शेर को भी नाचना पड़ता है कि नहीं?”
—समाप्त—