बैठक में मौजूद लियाकत अपने सेलफोन में उस तस्वीर को बड़ी शिद्दत से निहार रहे थे, जिसे उन्होंने पिछले दिन फाह्याज़ के फोन से बरामद किया था। इस क्षण घर में उनसे इतर कोई नहीं था क्योंकि ग्यारह बजे तक मेड भी खाना बनाकर जा चुकी होती थी और इस प्रकार ये अकेलापन उन्हें तब तक झेलना होता था जब तक कि हसन स्कूल से लौट नहीं आता था।
इस क्षण उनकी तवज्जो का केंद्र वही तस्वीर बनी हुई थी, जिसे फाह्याज़ ने विनायक की लाश पर से क्लिक किया था। एक डेडबॉडी की छाती पर जख्मनुमा मुहर के रूप में बने उस रहस्यमयी चिह्न वाली तस्वीर में लियाकत की दिलचस्पी की वजह ये थी कि कल सुबह जब उन्होंने फाह्याज़ को जगाने के ध्येय से अलार्म सेट करने के लिए उसका सेलफोन उठाया था तो पाया था कि गैलरी में वही अजीब सी तस्वीर ओपन थी। जाहिर था कि नींद के हवाले होने से पहले के आख़िरी क्षणों तक फाह्याज़ उस छवि पर ही मनन कर रहा था। हालाँकि लियाकत को ये तो समझ आ गया था कि उस तस्वीर का ताल्लुक उनके बेटे के पुलिसिया जीवन की किसी वारदात से था लेकिन देर रात तक उसे देखते रहने के सदके फाह्याज़ को जो ख्वाब आया था, उसके मद्देनजर लियाकत को वह तस्वीर आम तस्वीर नहीं लगी थी लिहाजा उन्होंने वाट्सएप के जरिये उसे अपने सेलफोन में ट्रांसफर कर लिया था और आज मौक़ा हाथ लगते ही उसमें वह खूबी ढूँढने की कोशिश कर रहे थे, जिसके कारण वह एक लाश पर शोभायमान हुआ था।
उन्होंने तस्वीर को ज़ूम किया, उसकी हर बारीकियों पर गौर किया और अँधेरी दुनिया से ताल्लुक रखतीं जितनी भी बातें उनके अनुभव में दर्ज थीं, उन सभी की रोशनी में उस निशान का मतलब तलाशा मगर किसी संतोषप्रद नतीजे तक नहीं पहुँच सके।
“इस लड़के का भी कैसी अजीब-अजीब चीजों से वास्ता पड़ता है।” अंतत: लियाकत ने खीझकर सेलफोन को सोफे पर छोड़ दिया- “सोते समय ऐसी वाहियात चीजों का दीदार करेगा तो बुरे ख्वाब तो आयेंगे ही।”
उन्होंने सोफे की पुश्त की सिर टिका लिया और आँखें बंद करके तस्वीर का ख्याल दिमाग से बाहर निकालने लगे। काफी देर तक वे उसी अवस्था में रहे और शायद आगे भी रहते अगर बैठक में कोई आहट न हुई होती तो।
“क्या हुआ करीम?” उन्होंने आँखें खोली तो सामने गार्ड खड़ा था।
“कोई मिलने आया है साहब। मुर्दाघर का कर्मचारी है। इतना खौफ़जदा है कि थर-थर काँप रहा है।” करीम ने बताया।
“किससे मिलना है उसे?” लियाकत सीधा होकर बैठ गए, उनकी आँखों में
उत्सुकता झलकी।
“थानेदार साहब से मिलने का तमन्नाई है।”
“तो बोलो कि थाने जाए।”
“मेरे ऐसा कहने पर कहने लगा कि उसे जो भी गूफ्तगू करनी है, घर पर ही करेगा।”
“तो तुमने उसे बताया नहीं कि ये वक्त फाह्याज़ के घर पर होने का नहीं है?”
“बताया लेकिन कह रहा है कि घर में जो कोई है, उसी से बात करा दो।”
“अजीब है।” लियाकत ने बड़बड़ाते हुए पहलू बदला।
“मेरी मानें तो एक बार मुलाक़ात कर लें जनाब। अजीबोगरीब हालत है उसकी। कई दिनों का बीमार लग रहा है।”
“भेजो उसे...नहीं, रुको...। मैं चलता हूँ।”
लियाकत ने पैरों में हवाई चप्पल डाला और गार्ड के साथ कंपाउंड में पहुँचे। उन्हें बाहर आया हुआ देख गेट पर खड़ा अभीष्ट आदमी अंदर दाखिल हुआ और बदहवास सा भागते हुए उनके पास पहुँचा।
“कुछ...कुछ अ...जी...ब सा...बहुत अ..अजीब सा हो रहा है साहब।” उसने टूटे-फूटे लहजे में कहा।
“घबराओ नहीं, आओ आराम से बैठकर बताओ।”
लियाकत ने गार्ड को पानी लाने का इशारा किया और आदमी की बाँह थामकर कंपाउंड में एक ओर लगे झूले की ओर बढ़ गए, जहाँ गुनगुनी धुप खिली हुई थी। उनके झूले तक पहुँचते-पहुँचते गार्ड भी अपने केबिन से पानी का जग और गिलास लेकर आ गया। पानी को गिलास में उड़ेलने भर की देर थी कि आदमी ने उसके हाथ से गिलास यूँ झपटा मानो कई दिनों का प्यासा हो। लगातार दो गिलास पानी हलक में उतारने के बाद वह लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा। गहन उत्कंठा में डूबे लियाकत और गार्ड आतुरता से उसके बोलने की प्रतीक्षा करने लगे।
“इत्मीनान से बताओ कि क्या कहना चाहते हो?” जब वह संयत हुआ तो लियाकत ने पूछा।
“बीते दिनों चेतना अपार्टमेंट में एक क़त्ल हुआ है, मालूम है आपको?” आदमी की जुबान पहली दफा ढंग से हरकत में आयी।
“हाँ, मालूम है।”
“वह मामूली क़त्ल नहीं है।” आदमी अपने लहजे पर जोर देकर बोला- “किसी आसमानी ताकत का दखल है उसमें।”
सुनते ही करीम की आँखें हैरत से फैलीं जबकि लियाकत ने सामान्य लहजे में
कहा- “अगर तुम्हें उस मामले में किसी भी किस्म की दखल का कोई अंदेशा है और तुम्हारे पास उस अंदेशे की वाजिब वजह है तो थाने जाओ, यहाँ क्यों आये हो?”
“नहीं..नहीं...।” आदमी ने व्यग्र भाव से पहलू बदला- “थाने नहीं जा सकता क्योंकि एक गलती तो मैंने भी की है।”
“तुमने गलती की है?” लियाकत की पेशानी पर बल पड़ गए उन्होंने करीम पर एक नजर डाली फिर आगे कहा- “लेकिन इस क़त्ल से तुम्हारा क्या वास्ता हो सकता है? जैसा कि तुमने गार्ड को बताया, तुम मुर्दाघर में काम करते हो न?”
“तभी तो मुझसे वह गलती हुई। मैंने....मैंने क़त्ल हुए आदमी की लाश उस रहस्यमयी मोमिन को दिखा दी।”
“किस मोमिन को दिखा दी?” लियाकत और गार्ड, दोनों के बदन में रोमांच का संचार होने लगा- “साफ़-साफ़ बताओ कि कहना क्या चाहते हो?” इस दफ़ा लियाकत के लहजे में सख्ती थी।
जवाब में आदमी ने जेब से मोबाइल निकाला और एक इमेज ओपन करके उसे लियाकत की ओर बढ़ा दिया। लियाकत ने सेलफोन थामा। तस्वीर करीब पचास के पेटे में पहुँचे शख्स की थी, जिसके सिर पर हरे रंग का साफा और जिस्म पर बेदाग़ कुर्ता था। उसकी मुद्रा से ये सहज जाहिर था कि तस्वीर उसके संज्ञान में नहीं ली गयी थी।
“यही है वो...।” जब लियाकत तस्वीर देख चुके तो आदमी ने कहा- “जो लाश देखने के लिए मुर्दाघर आया था। इसका मरने वाले से कोई वास्ता नहीं था फिर भी ये लाश को देखने की जिद कर रहा था। फोटो लेने की मुझे इसलिए सूझी ताकि जरूरत पड़ने पर पुलिस को मय सबूत इसके बारे में बता सकूँ।”
“इतने समझदार हो फिर भी एक अनऑथराइज्ड शख्सियत को वह लाश दिखाने को तैयार हो गए?”
“उसकी बातें ही ऐसी थीं साहब कि मैं मना नहीं कर पाया, आप होते तो आप भी नहीं कर पाते। और फिर उसने लाश को बस एक नजर देखने भर की बात की थी, वाकई में उसने बस इतना ही किया था।”
“यानी की वह लाश में कोई ख़ास निशान ढूंढ रहा था।” लियाकत के मुँह से खुद ब खुद निकला और इसी के साथ उन्हें फाह्याज़ के सेलफोन की तस्वीर याद गयी।
“निशान...?” सहसा आदमी को कुछ याद आया- “हाँ...हाँ साहब..वह निशान ही देखने आया था।”
“सोफे से मेरा सेलफोन लाओ।” लियाकत ने करीम को लक्ष्य करके कहा।
शायद वे भाँप गये थे कि आदमी किस निशान की बात कर रहा था।
“वह निशान..वह निशान...लाश के सीने पर बना हुआ था। बहुत अजीब सा था। एक गोल घेरा और फिर उस घेरे पर चार छोटे-छोटे घेरे। हकीकत तो ये है साहब जी कि उस आदमी ने पूरी लाश देखी ही नहीं थी। उसे तो बस उस निशान को ही देखकर कोई तसल्ली करनी थी क्योंकि निशान देखने के बाद वह होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदाया था।”
“क्या बुदबुदाया था?”
“शायद कोई दुआ थी, जिसे बोलने के बाद उसने मेरी ओर देखकर कहा था कि जो हुआ है, नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हुआ है। अँधेरी दुनिया में एक नापाक शख्स रहता है, जो लगातार इंसानों पर हमला कर रहा है।”
रोमांच से लियाकत के रोंगटे खड़े हो गए। वे कुछ कहे बगैर आदमी के हाव-भाव से इसकी तस्दीक करने लगे कि वह सच कह रहा है या झूठ? जब करीम उनका सेलफोन लेकर आ गया तो उन्होंने निशान वाली तस्वीर उसे दिखाई। वही जवाब मिला, जिसकी उन्हें शत-प्रतिशत उम्मीद थी।
“बिल्कुल यही निशान है साहब। इसी निशान को देखकर उस मोमिन ने ये सब डरावनी बातें कहीं थीं।”
लियाकत के चेहरे पर उलझन और चिंता का मिला-जुला रूप नजर आने लगा। माहौल में तनावपूर्ण सन्नाटा छा गया।
“तुम क्या सोचकर ये सब मुझे बताने आये?” उन्होंने लम्बे अंतराल के बाद पूछा- “थाने क्यों नहीं गए?”
प्रत्युत्तर में आदमी के चेहरे पर एक बार फिर वही डर नजर आने लगा, जो तब नजर आया था, जब वह यहाँ आया था।
“मेरे साथ कुछ और भी हुआ साहब।” उसने भयजदा लहजे में कहा- “उस वाकये के बाद मैं चैन से सो नहीं पा रहा हूँ, सोता हूँ तो अजीब से सपने मुझे जगा देते हैं। मैं पंद्रह सालों से मुर्दाघर की पहरेदारी कर रहा हूँ लेकिन कभी मुझे डर नहीं लगा; न दिन में और न ही रात को, पर उस मोमिन से मुलाक़ात के बाद मेरा मुर्दाघर में टिकना मुहाल हो गया है। कभी मुझे वहम होता है कि लाशें मुझे बुला रही हैं तो कभी वहम होता है कि कोई मुर्दा अपने पैरों पर चल रहा है।”
“कैसे सपने आते हैं तुम्हें?” लियाकत ने पूछा।
“बस एक ही आता है और जागती आँखों से नजर आता है। मैं देखता हूँ कि वही मरा हुआ आदमी, जिसके सीने पर अजीब सा ठप्पा था, बड़े से कटोरे में भरे खून से एक नरभेड़िये को नहला रहा है।”
“या अल्लाह!” लियाकत के होठों से अस्फुट स्वर में निकला। इस बार उनके
मनोभाव मुर्दाघर के आदमी से छुपे न रह सके और न ही वे उसकी बातों को खारिज कर पाये। चाहते भी तो कैसे कर पाते; खुद उनके बेटे ने भी तो जागती आँखों से वही ख्वाब देखा था, फर्क बस इतना था कि फाह्याज़ के ख्वाब में नरभेड़िये को रक्त-स्नान कराने वाली उसकी बीवी शबनम थी।
“क्या ये सब बातें थाने में की जाने लायक हैं साहब?”
“एक काम करोगे?” थोड़ी देर की खामोशी के बाद लियाकत ने पूछा।
“फरमाएं।”
“फाह्याज़ तक ये बातें मत पहुँचाना।” लियाकत ने एक नजर करीम पर डाली, ये जताने के लिए कि उक्त हिदायत उसके लिए भी है, तदुपरांत आगे कहा- “मेरा नम्बर नोट करो और उस मोमिन की तस्वीर वाट्सएप करो।”
उन्होंने नंबर बोला और मुर्दाघर के आदमी ने अगले दो मिनट में उक्त कार्य को अंजाम दे दिया।
“जिस भी खुदा में यकीन रखते हो, उसकी इबादत करो, महफूज़ रहोगे। तब तक मैं भी देखता हूँ कि क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए।”
आदमी ने सहमे हुए भाव से गर्दन हिलाई।
एक नए किस्म का भय तो लियाकत भी महसूस कर रहे थे लेकिन प्रत्यक्ष में उन्होंने आदमी को प्रस्थान का संकेत किया और जब करीम उसके साथ गेट की ओर बढ़ गया तो वे कांटेक्ट लिस्ट में मौलाना साहब का नंबर ढूँढने लगे क्योंकि अब उनसे एक मुलाक़ात जरूरी हो गयी थी।
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हसीनाबाद, सन 1975।
पशुपति ने कमरे के खिड़की-दरवाजे इस कदर बंद कर लिए कि पूरे कमरे में काजल सा स्याह अंधकार छा गया। रोशनदान की गैरमौजूदगी उसके ध्येय में अतिरिक्त सहायक हुई और हाथ को हाथ तक दिखाई देना बंद हो गया। प्रकाश की कोई पतली किरण भी वहाँ शेष न रही। सब कुछ अँधेरे में जर्फ़ करने के बाद वह मेज के पास पहुँचा और वहाँ पड़ा एक लिफ़ाफ़ा उठाकर खोलने लगा। उसकी चाल और गतिविधियाँ ऐसी थीं, जैसे वह उस गहन अँधकार में भी स्पष्ट देख रहा हो।
कमरे में अँधेरा हो जाने के बाद एक उल्लेखनीय घटना ये भी हुई थी कि पशुपति की आँखें निशाचरी जीवों की आँखों के समान चमकने लगी थीं और साथ ही जमुना की इस आशंका को बल प्रदान करने लगी थीं कि वह इंसान वाकई कोई आम मखलूक नहीं था। लिफ़ाफ़ा खोलने के बाद उसने ख़त बाहर निकाला, जो महीने भर पहले जुमना के हाथों पोस्ट कराये हुए ख़त के जवाब में आया था। ख़त लिखने के लिए इस्तेमाल की गयी स्याही ऐसी थी कि उसके हर्फ़ स्फुरदिप्ती उत्पन्न कर रहे थे। संभव था कि रोशनी में उसके हर्फ़ दिखते ही न रहे हो। पशुपति ने अपनी दृष्टि ख़त के चमकते मजमून पर फिराई और एक ही साँस में उसे पूरा पढ़ गया। खत उर्दू में था, जिसके आख़िरी पैराग्राफ का तर्जुमा ये था:
‘साथ में तुम्हारी तस्वीर भेज रही हूँ। उम्मीद है तुम्हें पसंद आयेगी इसलिए भी पसंद आयेगी क्योंकि ये पहली दफ़ा है जब एक मुसव्विर की कूची के सदके तुम्हारी शक्ल कागज़ पर नुमाया हुई है।
तुम्हारी अम्मी’
उपर्युक्त लाइनें पढ़ने के बाद पशुपति की पहले से ही चमक रही आँखों की चमक और बढ़ गयी।
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