दूर, पारसनाथ ओट में, आंखों पर दूरबीन लगाए खड़ा जसबीर वालिया को देख रहा था। वो दूर होता जा रहा था। सामने की तरफ कॉटेज में जो कि खाली पड़ी थी। उसके भीतर मौजूद महाजन इधर नजर रख रहा था। उसने भी जसबीर वालिया को जाते देखा। महाजन ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और नम्बर मिलाने लगा।
देखता रहा।
रोकने की चेष्टा नहीं की।
उस रात, जब वो वालिया के रेस्टोरेंट ग्लौरी से, वालिया के पीछे भागे तो वालिया उनके हाथ से निकल गया था। अंधेरे का लाभ उठाकर उनकी नजरों से ओझल हो गया था। उसके बाद वे होटल पहुंचे कि आराम से बैठकर वालिया पर हाथ डालने की फिर कोई योजना बना सके कि तभी मोना चौधरी का फोन आ गया। उसके बाद तो सीधे वहां पहुंचे, जहां मोना चौधरी थी और तब से लेकर अब तक वो बेहद व्यस्त थे।
जसबीर वालिया के दूर चले जाने पर वो दोनों अपनी-अपनी जगह से निकले और कॉटेज की तरफ बढ़ने लगे। ढलते सूर्य की वजह से तपिश का तीव्र अहसास हो रहा था।
कॉटेज का किचन।
हर तरफ सुनसानी थी और किचन में भी कि एकाएक न समझ में आने वाली बेहद मध्यम सी मोबाइल फोन की बेल गूंजी। दूसरे ही पल बेल बंद हो गई और फुसफुसाहट सी गूंजी।
“हैलो।”
“वो कॉटेज से चला गया है बेबी।”
इसके साथ ही मोना चौधरी की आवाज स्पष्ट तौर पर सुनाई दी किचन में।
“पक्का महाजन?”
“यस बेबी। वो मुझे अभी भी दिखाई दे रहा है। बहुत दूर है वो। पैदल ही चला गया। मैं भीतर आ रहा हूं।” इसके साथ ही आवाजें बंद हो गई।
उसी वक्त शांत पड़े किचन में हलचल सी हुई।
किचन के एक तरफ लकड़ी की शेल्फ नजर आ रही थी। जो कि चार फीट चौड़ी और साढ़े छ: फीट लंबी थी। उस शेल्फ पर बर्तन और किचन का कुछ सामान रखा हुआ था। देखने में वो पूरी तरह किचन की शेल्फ ही नजर आती थी। धीरे-धीरे वो इस तरह आगे को हुई जैसे वो दरवाजा हो। दरवाजे की तरह वो खुली और सबसे पहले वहां मोना चौधरी बाहर आई। फिर मोनिका, बंटी के साथ और बाद में रोजी।
वो स्टोर रूम था और खाली था।
साल भर पहले बंटी खेलता हुआ उस स्टोर में चला गया था। दरवाजा भीतर से बंद कर लिया था। फिर उससे वो खुला नहीं। इधर जसबीर वालिया और मोनिका पागलों की तरह उसे तलाश करते रहे थे। आखिरकार किसी तरह पता चला कि बंटी स्टोर में है तो उसे स्टोर से बाहर निकाला। जसबीर ने तब उस स्टोर के दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया था कि दोबारा ऐसा हादसा न हो। उस पर कीले ठोंक कर फंसा दी थी। यही वजह थी कि जसबीर वालिया ने इन हालातों में भी, स्टोर की तरफ देखा नहीं था कि उसके दरवाजे को उसने कीलों से सीलबंद कर रखा है। उस स्टोर के बारे में मोनिका ने ही बताया था कि वहां छिपा जा सकता है। स्टोर बड़ा था और पांच व्यक्ति एक साथ आसानी से वहां लेट सकते थे।
तीनों के चेहरों पर थकान थी।
कल रात से वो यहां थे।
मोना चौधरी का चेहरा कठोर हुआ पड़ा था।
मोनिका के चेहरे पर गंभीरता के साथ उजड़ापन था। बाहर निकलते ही उसने बंटी को उठाकर गले से लगा लिया था। रोजी बहुत हद तक सामान्य और गंभीर थी।
“क्या बात है मम्मा?” बंटी ने भोलेपन से पूछा –“आपने वहां क्यों घर बना रखा था। मुझे क्यों कहती थी कि बोलना नहीं। चुप रहना। अब तो बोल सकता हूं ना?”
मोनिका ने बंटी को देखा फिर गले से लगा लिया। आंखों में आंसू चमक उठे।
“हां बेटे। बोल, मैं तुझे कभी चुप होने को नहीं कहूंगी।” कहने के पश्चात उसका माथा चूमा और उसे नीचे उतार दिया। वो किचन से कमरे में भागता चला गया।
तीनों कमरे में पहुंचे।
तब तक पारसनाथ और महाजन भी आ गए थे। वो गंभीर थे। सब बैठे, लेकिन मोनिका नहीं बैठी। वो बेचैनी से कमरे में टहलने लगी थी। जबकि बंटी एक अलमारी से खिलौने निकालकर उनसे खेलने लगा था। वहां छाई हुई चुप्पी को तोड़ा महाजन ने।
“क्यों बेबी-सब ठीक रहा?”
“हां।” मोना चौधरी ने सिर हिलाया –“सब ठीक रहा। जैसा हम करना चाहते थे। वैसा ही हुआ।” मोना चौधरी की निगाह मोनिका की तरफ उठी –“ये अपने पति को, जसबीर वालिया को देवता मान रही थी। इसकी आंखों पर पड़ा पर्दा हटाना था। इसने वैसा ही किया, जैसा हमने कहा और अब शायद आंखों से पर्दा हट गया होगा।”
मोनिका ठिठकी। उसने मोना चौधरी को देखा फिर पास ही आ बैठी।
“हां। मैं जसबीर की असलियत नहीं जानती थी। अब जान गई।” मोनिका का स्वर कांप उठा था।
“जब मैं तुम्हारे पास पहुंची थी कि जसबीर कहां है तो तुम जानकर रही कि मामला क्या है। मैं उसे खत्म करना चाहती हूं। लेकिन तुम भी तब गलत नहीं थी। क्योंकि जसबीर वालिया को असल जिन्दगी से तुम वाकिफ नहीं थी। उसने तुम्हें भी अंधेरे में रखा हुआ था। तुमने कहा कि मैं साबित करके दिखाऊं कि जसबीर सच में आतंकवादी है। तुम्हारी जिद और तुम्हारे सच को पहचान कर मैंने वादा किया था कि मेरा साथ दो तो मैं साबित कर दूंगी।” मोना चौधरी बोली।
मोनिका ने मोना चौधरी को देखा।
“मैंने तुम्हारा साथ दिया मोना चौधरी।”
“और मैंने भी साबित कर दिया कि जसबीर वालिया खतरनाक आतंकवादी है।” मोना चौधरी का स्वर धीमा था।
मोनिका ने आंखें बंद कर ली।
रोजी ने सिगरेट सुलगाई।
पारसनाथ खिड़की के पास पहुंचकर बाहर देखते हुए खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा था।
“तब तुम्हें और बंटी को नींद का इंजेक्शन अवश्य देना पड़ा। जब जसबीर वालिया की हिम्मत को तोड़ने के लिए तुम दोनों को लाशों के रूप में उसके सामने कमरों में रख दिया था। तब नींद का इंजेक्शन देना जरूरी था कि तुम दोनों में से कोई जरा भी न हिले। उस वक्त तुममें से कोई हिलाता तो उसे कमजोर करने की हमारी कोशिश बेकार हो जाती।”
मोनिका ने आंखें खोली। मोना चौधरी को देखने लगी।
तभी गंभीर स्वर में रोजी बोली।
“जसबीर वालिया की तुम जैसी दसियों बीवियां हैं मैडम मोनिका। सच बात तो ये है कि जसबीर वालिया के रूप में तुम मेरी जूठन खा रही हो। क्योंकि कभी वो मेरे साथ सोया करता था। मेरे जैसी कितनों के साथ सोया होगा। कईयों के पास उसका बच्चा भी है। तुम्हारी व्यक्तिगत प्रॉपर्टी नहीं है जसबीर। वो नम्बरी हरामजादा है। खूबसूरत चेहरा देखकर उसका दिमाग रेल बन जाता है कि इसके कपड़े उतारने हैं। वो निहायत ही कमीना और गिरा हुआ इंसान है और तुम उसे अच्छे पति के रूप में देखती रही।”
“जब तक उसके बारे में मुझे नहीं मालूम था तो नहीं मालूम था। अब मालूम हो गया।” परेशान सी मोनिका ने कहते हुए दूर खिलौनों के साथ खेलते बंटी पर नजर मारी।
“ये भी मालूम हो गया कि वो आतंकवादी है और जानलेवा हादसे करके वो सैकड़ों की जाने ले चुका है।”
“हां मोना चौधरी। विश्वास हो गया। विमान को उड़ाने की बात उसने मेरे सामने मानी।” स्वर भर्रा उठा मोनिका का।
“मैंने इन बातों का विश्वास तुम्हें इसलिए दिलाया कि तुम मुझे निहायत ही शरीफ औरत लगी। मैं नहीं चाहती थी कि जसबीर की मौत का गम करो तुम। मैं चाहती थी कि जब जसबीर मरे तो तुम्हें ज्यादा दु:ख न हो। परेशान न होवो कि...।”
“अब मैं परेशान नहीं होऊंगी। जसबीर का असली रूप देख लिया है मैंने।” मोनिका की आवाज में दु:ख परंतु शब्दों में दृढ़ता थी –“शायद उसकी मौत पर खुशी हो मुझे कि उसके हाथों मरने वाले बेगुनाह लोग बच गए। कई घर तबाह होने से बच गए।”
खिड़की के पास खड़ा पारसनाथ पलटा और कह उठा।
“हम जसबीर वालिया के पीछे नहीं गए। वो कहीं छिप भी सकता है। हमें उसके पीछे जाना चाहिए था।”
“वो कहीं नहीं छिप सकेगा पारसनाथ।” मोना चौधरी गुर्रा उठी –“वो हमारे हाथों में था और है भी। कहीं नहीं जा पाएगा वो। यहां उसके साथ जो हुआ, उससे उसकी आधी हिम्मत साथ छोड़ गई होगी। उसके आधे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया होगा। वो कुछ नहीं समझ पा रहा होगा कि उसके साथ क्या हुआ। वो यहां हुई हर बात पर यकीन कर रहा होगा और किसी भी बात पर उसे यकीन नहीं आ रहा...।”
“ठीक कहती हो।” रोजी ने गंभीर स्वर में टोका।
“ऐसे में वो जो भी करेगा।” महाजन बोला –“ठीक नहीं करेगा। गलत फैसले लेगा। मोना चौधरी का नाम तो वो भूल गया होगा। मोनिका-बंटी की लाशें ही उसे याद आती रहेगी।”
“हमारा निशाना उसे खत्म करने का है।” पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा।
“मैंने ही आप सबको रोक रखा था ये सोच कर कि आपको गलती हो रही है। जसबीर इस हद तक गलत काम नहीं कर सकता।” मोनिका बारी-बारी सबको देखती हुई बोली –“आप लोगों की बहुत मेहरबानी कि मेरे कहने पर आप लोग रुक गए और मुझे विश्वास दिलाया कि जसबीर सच में जिन्दा रहने के काबिल नहीं है। इसलिए उसकी मौत का मुझे जरा भी अफसोस नहीं होगा। मैं भूल जाऊंगी उसे। बंटी छोटा है। वो भी चंद महीनों में ये बात भूल जाएगा कि उसका बाप कौन है। बंटी को बाप देने के लिए मुझे दूसरी शादी अवश्य करनी पड़ेगी। ये सिर्फ मेरी समस्या है। मैं अपनी जिन्दगी ठीक कर लूंगी। जसबीर यहां से रेस्टोरेंट गया होगा या बंगले पर। तीसरी जगह उसके पास नहीं है। उसने अपने काम ऐसे फैला रखे हैं कि वो देर तक कहीं नहीं छिपा रह सकता।”
मोना चौधरी, महाजन, पारसनाथ की नजरें मिली।
खामोशी सी छा गई वहां।
“काम खत्म करें बेबी?” महाजन की आवाज में खतरनाक भाव आ गए।
मोना चौधरी उठ खड़ी हुई।
“आज की रात जसबीर वालिया की आखिरी रात होनी चाहिए।” मोना चौधरी की आवाज में दरिन्दगी के भाव आ गए थे।
मोनिका की नजरें, मोना चौधरी पर जा टिकी।
“मोनिका।” मोना चौधरी गंभीर स्वर में बोली –“तुम्हारे पास जसबीर की मौत के बाद जसबीर की काफी दौलत हाथ लगेगी। उस दौलत का तीसवां हिस्सा भी अगर रोजी को दे दो तो ये अपनी जिन्दगी कहीं टिका लेगी। इसकी ये हालत जसबीर वालिया ने ही की...।”
“मैं बहन बनकर इसके सारे काम करूंगी।” मोनिका ने गंभीर निगाहों से रोजी को देखा –“तुम फिक्र मत करो रोजी। मेरे साथ रहो। जैसी जिन्दगी चाहोगी, जो भी पैसा लगेगा। मैं तुम्हें सेट कर दूंगी।”
रोजी ने गहरी सांसें ली फिर चेहरे पर थकी सी मुस्कान आ ठहरी।
“आओ।” मोना चौधरी ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गई।
महाजन और पारसनाथ उसके पीछे हो गए।
☐☐☐
जसबीर वालिया वहां से निकल कर चलते-चलते कब मुख्य सड़क पर पहुंच गया। पता ही नहीं चला। एक कार पास से सर्र करके निकली तो उसके मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा। वो संभला। ठिठक कर अनजान सी नजरों से इधर-उधर देखने लगा। उसका दिमाग-उसकी सोचें इस वक्त बस में नहीं था। सुबह से उसके साथ जो हो रहा था, वो उसकी समझ से बाहर था। पागल-सा महसूस कर रहा था वो खुद को।
शाम थी। ढल रही थी कुछ ही देर में अंधेरा हो जाना था।
वो सड़क किनारे खड़ा खोई-खोई निगाहों से सड़क के दोनों तरफ देखने लगा कुछ ही देर में उसने फैसला किया कि वो बंगले पर जाएगा। उसे आराम की जरूरत है। एकान्त में वो बीते हालातों के बारे में सोचना चाहता है। ग्लौरी में जाना ठीक नहीं था। मोना चौधरी वहां पहुंच गई तो उससे मुकाबला करने को तैयार नहीं था। उधर की बात भास्कर संभाल लेगा।
जब अंधेरा बहुत हद तक करीब आ गया तो उसे टैक्सी मिली।
टैक्सी उसने बंगले के बाहर ही छोड़ दी।
अंधेरा घिर चुका था। वो थके-थके से अंदाज में भीतर पहुंचा। भीतर सब कुछ वैसा ही था, जैसा कल छोड़ गया था। पहले जब घर आता था तो मोनिका और बंटी उसके स्वागत में, खुशी भरे फूल बिछा देते थे। सारी थकान, सब कुछ भूल जाता था वो।
लेकिन आज सब कुछ बिखर गया था।
ड्राइंग रूम में पहुंच कर ठिठका। कल का ही जीरो वॉट का बल्ब जल रहा था। उसने बड़ी लाइटें रोशन कर दी। एक-एक चीज स्पष्ट नजर आने लगी। सब कुछ था, परंतु मोनिका और बंटी नहीं थे। वो मर चुके थे। उनकी आत्माएं भटक रही...।
नहीं। अपनी सोचों को उसने दूर फेंकने की चेष्टा की। आत्मा कोई चीज नहीं होती। लोगों का वहम है। वहम-वहम है तो वो कौन थी, जिसने उससे बात की। वो मोनिका की आत्मा ही तो थी,जो उससे बात करके गायब हो गई थी। क्या हो रहा है उसे? पागल हो जाएगा वो।
नीचे हॉल में खड़े-खड़े उसकी नजरें पहली मंजिल पर गई।
ऊपर बेडरूम था।
खून से सना हुआ बेडरूम। मोनिका और बंटी के कत्ल का गवाह था वो बेडरूम।
कई पलों तक वो ऊपर ही देखता रहा फिर जाने क्या सोच कर तेज-तेज कदमों से सीढ़ियों की तरफ बढ़ा और ऊपर चढ़ता चला गया। बेडरूम में पहुंच कर ही उसके कदम ठिठके।
भीतर रोशनी थी और वहां की हालत देखते ही वो ठगा सा खड़ा रह गया।
कल जैसी कोई बात नजर नहीं आई थी उसे । कहीं खून जैसी कोई चीज नहीं थी। सब कुछ साफ-सुथरा था। साफ चादर। तकिये साफ। टी.वी. भी सलामत। कल जैसा तो कुछ भी नहीं था।
ये कैसे हो सकता है?
कल तो यहां मोनिका और बंटी की हत्या हुई थी। उसने अपनी आंखों से देखा था।
जसबीर वालिया ठगा सा खड़ा देखता रहा। क्या हो रहा है ये सब। कॉटेज में भी ऐसा ही हो रहा था। जो नजर आता, वो बाद में गायब हो जाता। मोनिका और बंटी का लाशों के रूप में नजर आना। फिर गायब हो जाना। उसके बाद मोनिका की आत्मा से बात हुई। अब यहां कल जैसी कोई बात नहीं और...।
एकाएक बंगले में शोर पैदा हो गया।
उसके मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा। सोचों से निकला।
फोन की तेज बेल उसके कानों में पड़ी। इस कमरे वाला फोन नहीं। नीचे हॉल में रखा फोन बज रहा था। दो पल तो वो वैसे ही खड़ा रहा फिर बाहर निकला और तेजी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। चेहरे पर न समझ में आने वाले भाव टिके हुए थे। वो अब किसी उलझन में लग रहा था।
वो नीचे हॉल में पहुंचा।
फोन अभी तक बजे जा रहा था।
जसबीर वालिया ने होंठ भींच कर रिसीवर उठाया और कान से लगा लिया। बोला कुछ नहीं।
पलों की गहरी खामोशी रही, फोन पर।
“बोल क्यों नहीं रहा?”
इस आवाज को सुनते ही उसके मस्तिष्क में आंधियां चली।
बख्तावर सिंह की आवाज थी।
“तुम?” जसबीर वालिया के होंठों से निकला।
“क्या हो रहा है वालिया?”
जसबीर वालिया के होंठ भिंच गए। बोला कुछ नहीं।
“मैं जानता हूं क्या हो रहा है। यहां भी और तुम्हारी कॉटेज में भी, मैंने माइक्रोफोन लगा रखा है जब भी चाहूं बातें सुन सकूं।” बख्तावर सिंह के शब्द उसके कानों में पड़े।
“क्या?” जसबीर वालिया के होंठों से हैरानी भरा स्वर निकला।
“करना पड़ता है। जो अपने लिए काम करते हैं, उन पर नजर रखनी पड़ती है कि वो ठीक चल रहे हैं या नहीं। कहीं मेरे लिए ही कोई गड्ढा तो नहीं खोद रहे।” बख्तावर सिंह बेहद शांत स्वर में कह रहा था –“और माइक्रोफोन से, मेरे आदमियों ने सुना कि असल मामला क्या है। मोना चौधरी क्या गुल खिला रही है।”
“मोना चौधरी?” जसबीर वालिया के होंठों से खरखराता स्वर निकला।
“हां। मोना चौधरी, महाजन और पारसनाथ। इनके साथ ही डांसर रोजी और तुम्हारी पत्नी मोनिका।”
“मोनिका? वो तो मर...।”
“बकवास। तुम इतनी घटिया बातों में फंस गए बेवकूफ। मोनिका जिन्दा है। वो कोई आत्मा नहीं है। बंटी भी सलामत है। मोनिका की मोना चौधरी से बात हुई। मोना चौधरी ने मोनिका को बताया कि तुम क्या-क्या करते हो। मोनिका नहीं मानी कि तुम आतंकवादी हो सकते हो। उसने मोना चौधरी को ये बात साबित करने को कहा तो जाने क्या सोचकर साबित करने के लिए मोना चौधरी ने उनकी हत्या का ड्रामा किया। तुम फंस गए। तुमने खुद मोनिका के सामने स्वीकारा कि विमान में बम लगाकर तुमने खुद उड़ाया...।”
“ओह, बख्तावर ओह।” जसबीर वालिया दांत भींचकर कह उठा –“तुम सच कह रहे हो। मुझे खुद इन सब बातों पर विश्वास नहीं आ रहा था। मैं पागल सा हो गया था इन सब हालातों के बीच। मेरे पास कोई नहीं था कि किसी से बात कर सकूँ। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि ये इतना बड़ा ड्रामा हो रहा-एक मिनट-
वो लोग अगर कॉटेज में थे तो कहां थे? मैंने कई बार कॉटेज देखी परंतु...।”
“किचन वाले स्टोर में।”
दांत भिंच गए जसबीर वालिया के।
“वहां ही नहीं देखा मैंने।” गुर्राहट निकली उसके होंठों से –“क्योंकि स्टोर का दरवाजा मैंने-मैंने अपने अपने हाथों से कीलें ठोंक कर, उसे सील कर दिया था। इसलिए उस तरफ मेरा ध्यान ही नहीं गया कि वहां कोई हो सकता है।”
“इस दौरान महाजन और पारसनाथ बाहर रहे। महाजन ने कॉटेज के फोन की तार काटी।” बख्तावर सिंह का शांत स्वर उसके कानों में पिघले शीशे की तरह पड़ रहा था –“और जब तुमने बाहर निकलने की कोशिश की तो पारसनाथ ने तुम्हारे पांवों के पास गोली चलाई थी।”
क्रोध और कहर के कारण उसके चेहरे पर भयानक भाव नजर लगे थे।
“अब समझा, उन हरामजादों की चाल।”
“मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि मोना चौधरी को पार पाना आसान नहीं। वो...।”
“बख्तावर सिंह।” जसबीर वालिया गुर्रा उठा –“जब मैं कॉटेज में फंसा था तो तुम्हारे आदमी वहां थे?”
“हां। मेरे दो आदमी दूर से वहां के हालातों पर नजर रख रहे थे और कॉटेज के भीतर जो भी बातचीत हो रही थी उसे मेरे आदमी माइक्रोफोन द्वारा, छोटे से स्पीकर से सुनकर, सारी बातों से वाकिफ हो रहे थे।”
“तब तुम्हें अपने आदमी भेजकर मेरी सहायता करनी...।”
“बच्चों जैसी बातें मत करो वालिया। मैं तुम्हारी सहायता लेता हूं। देता नहीं। तुम मेरा जो काम करते हो, उसके बदले तुम्हें भरपूर पैसा मिलता है। अगर तुम कमजोर हो और मुसीबत में तुम्हें मेरी सहायता की जरूरत है तो तुम मेरे काम के आदमी नहीं हो। मैं तुम्हारी इज्जत करता हूं कि तुम निडर और हिम्मत वाले हो। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। सारी बाजी तुम्हारे हाथ में ही है। वो लोग खुले में हैं। इस वक्त तुम भी आजाद हो। चाहो तो बहुत कुछ कर सकते हो। तुम ऐसे हालात पैदा कर सकते हो कि मैं सूटकेस-नोटों से भरा सूटकेस लेकर, तुम्हारे पास आऊं। एक साथ डिनर करेंगे।”
“जरूर करेंगे।” गुर्रा उठा जसबीर वालिया –“एक साथ डिनर करेंगे हम और...”
“हो सकता है हम डिनर न कर सकें।”
“क्यों बख्तावर?”
“मोना चौधरी, पारसनाथ और महाजन तुम्हारी तलाश में कॉटेज से कब के निकल चुके हैं। उनमें बात हो चुकी है। वो तुम्हें मारने के लिए निकले हैं और उनके इरादे बुलंद हैं।”
दांत किटकिटा उठा जसबीर वालिया।
“रिवॉल्वर की गोली बुलंद इरादों को नहीं पहचानती। वो सिर्फ अपना लक्ष्य देखती है बख्तावर सिंह। जसबीर की गोली को किसी से दोस्ती करना पसंद नहीं।”
“बातें ही करोगे। जबकि...एक मिनट।”
कुछ देर तक बख्तावर सिंह की आवाज नहीं आई।
जसबीर वालिया रिसीवर थामे, सुलगता सा खड़ा रहा।
फिर बख्तावर सिंह की आवाज सुनाई दी।
“जसबीर।”
“हां।”
“मेरे आदमी की तरफ से खबर आई है कि मोना चौधरी और उसके दोनों साथी तुम्हारे बंगले की तरफ आ रहे हैं। ज्यादा दूर नहीं हैं वो। कभी भी वहां आ सकते हैं।”
“मैं उन्हें...”
“मेरी सुनो-शायद तुम्हारे पास वक्त कम है।” बख्तावर सिंह का स्वर कानों में पड़ा –“अगर निशाना ले सको तो मोना चौधरी का लो। वो रास्ते से हट गई तो पारसनाथ और महाजन आधे कमजोर हो जाएंगे। वरना अकेली मोना चौधरी को संभालना भी तुम्हारे लिए कठिन हो जाएगा। वो है ही ऐसी।”
“समझ गया मैं-फोन बंद कर रहा हूं। तुम सूटकेस लेकर आना। एक साथ जल्दी ही डिनर करेंगे।” जसबीर वालिया के होंठों से मौत भरा स्वर निकला और उसने रिसीवर रख दिया।
बंगले में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। जसबीर वालिया की मौत से भरी निगाह धीरे-धीरे हर तरफ घूम रही थी। मोनिका का चेहरा भी उसे जैसे दिखाई दे रहा था। जो उसकी दुश्मन मोना चौधरी के साथ जा मिली थी। पहले मोना चौधरी से निपट ले फिर मोनिका को तड़पा-तड़पा कर मारेगा।
वो वहां से हटा और पहली मंजिल पर एक ऐसे कमरे में पहुंचा, जहां कुर्सियां-टेबल थे। बुक शेल्फ थी। स्टडी रूम जैसा लग रहा था वो कमरा। उसने छोटी सी टेबल के नीचे वाले ड्राज में हाथ डालकर रिवॉल्वर निकाली और उसकी मैग्जीन चैक की। वो फुल थी।
“ये रिवॉल्वर तेरी मौत की गवाह बनेगी मोना चौधरी।” वहशी स्वर में वो बड़बड़ा उठा फिर तेज-तेज कदमों से चलता हुआ कमरे से बाहर निकला और सीढ़ियां उतरने के पश्चात हॉल पार करके बाहर निकला। सामने अंधेरे से भरा लॉन था। जहां चार-पांच पेड़ और फूलों के पौधे भी थे। वो अंधेरे में एक पेड़ के पीछे उकड़ू बैठ गया। नजरें गेट और बंगले के प्रवेश द्वार की तरफ थी। उसको वहशी आंखों में दरिन्दगी से भरी चमक थी।
बख्तावर सिंह ने कहा था कि मोना चौधरी महाजन और पारसनाथ के साथ इधर ही आ रही है।
यानी की वो कभी भी आ सकते हैं।
ज्यादा इन्तजार नहीं करनी पड़ी जसबीर वालिया को।
गेट से भीतर प्रवेश करती कार की हेडलाइट पर उसकी खूनी निगाह टिकती चली गई।
☐☐☐
गेट से कार भीतर प्रवेश करके, उस छोटे से पोर्च में जा रुकी।
मोना चौधरी, महाजन, पारसनाथ बाहर निकले।
महाजन और मोना चौधरी के हाथ में रिवॉल्वरें दबी थी। पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई। सबकी नजरें बंगले के हर हिस्से की तरफ जा रही थी। पारसनाथ कश लेते हुए सख्त स्वर में कह उठा।
“हम बेडरूम की चादर ठीक करके गए थे कल आधी रात को। तब सब लाइटें बंद थीं। अब बंगले की लाइटें रोशन होने का मतलब है, भीतर कोई है और वो जसबीर वालिया ही हो सकता है।”
“पारसनाथ।” मोना चौधरी धीमे-खतरनाक स्वर में कह उठी –“भीतर जो भी है, वो इस तरह रोशनियां जलाकर दरवाजे खुले छोड़कर, किसी के इन्तजार में नहीं रहेगा।”
“क्या कहना चाहती हो?'' पारसनाथ का स्वर सुनाई दिया उन दोनों को।
“जसबीर वालिया इस वक्त कोई चाल चलता भी हो सकता है हमसे। वो जानता है कि हम उसकी तलाश में यहां पर अवश्य आएंगे। हमारी मौत का सामान तैयार किया हो सकता है कहीं पर।”
“मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं बेबी।” महाजन होंठ सिकोड़े निगाहें घुमाता हुआ बोला –“लेकिन क्या वो इतने कम समय में हमारे खिलाफ यहां कोई जाल बिछा सका होगा?”
“कुछ भी हो सकता है।” पारसनाथ ने सिगरेट फेंकी और रिवॉल्वर निकाल कर हाथ में ले ली –“हमें सावधानी से भीतर प्रवेश करना होगा। अगर उसने हमारी मौत के लिए कोई जाल बिछाया है तो उन हालातों से हमें खुद को बचाना है।”
“जो भी सामने आए, उसे भून दो। ये वक्त दोस्ती गांठने का नहीं है।” मोना चौधरी खतरनाक स्वर में कह उठी –“पहले मैं भीतर जा रही हूं। मुझे पारसनाथ कवर करेगा और पारसनाथ को महाजन कवर करेगा।” कहने के साथ ही मोना चौधरी रिवॉल्वर थामे बंगले के खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गई।
बाहर खड़े महाजन और पारसनाथ की नजर मिली।
फिर पारसनाथ ने भीतर प्रवेश किया।
उसके बाद महाजन ने।
जसबीर वालिया अंधेरे से भरे लॉन में, पेड़ की आड़ में खड़ा सुर्ख निगाहों से उन्हें भीतर जाते देख रहा था। तीनों ही उसके निशाने पर और रिवॉल्वर की रेंज में थे। परन्तु उसने मोना चौधरी का निशाना नहीं लिया। क्योंकि अंधेरा होने की वजह से पारसनाथ और महाजन बचकर, इधर-उधर हो जाते और फिर उसे न छोड़ते। अपनी जान की कीमत पर वो मोना चौधरी को खत्म नहीं कर सकता था।
वहीं खड़ा रहा।
नजरें मुख्य द्वार पर रही।
दस मिनट बाद उसे भीतर से बाहर की तरफ आती मोना चौधरी दिखाई दी। वो अकेली थी। इससे बढ़िया मौका उसे नहीं मिल सकता था। रिवॉल्वर वाला हाथ उसने सीधा कर लिया। मोना चौधरी निशाने पर थी। वो भीतर से मुख्य दरवाजे के पास आती जा रही थी। फिर वो दरवाजे से बाहर निकल कर ठिठकी। नजरें इधर-उधर जा रही थी। रिवॉल्वर हाथ में दबी थी। बंगले के भीतर उसे कुछ नहीं मिला था और यहां खड़ी सोच रही थी कि...।
जसबीर वालिया ने देर करना ठीक नहीं समझा। निशाने पर ले रखी मोना चौधरी की तरफ रिवॉल्वर किए ट्रिगर दबा दिया। उसे अपने निशाने पर पूरा भरोसा था कि, गोली ठिकाने पर लगेगी।
लेकिन ठीक इसी पल मोना चौधरी के कानों में महाजन की आवाज पड़ी।
“बेबी, इधर तो कुछ भी...।”
मोना चौधरी पीछे को पलटी।
उसका पीछे पलटना ही उसे बचा गया। उसके शरीर में धंसने वाली गोली, उसकी बांह को गर्म हवा देती हुई खुले दरवाजे से भीतर गई और उस तरफ से आ रहे महाजन के पेट में जा धंसी।
महाजन के हाथ से रिवॉल्वर छूट गई। दोनों हाथ पेट पर जा टिके। दांत पीड़ा से भिंच गए। हाथ खून से सुर्ख होने लगा। वो धीरे-धीरे नीचे झुकता चला गया।
“महाजन।” मोना चौधरी चीख कर उसकी तरफ दौड़ी।
“बेबी।” महाजन नीचे गिरने लगा कि मोना चौधरी ने फौरन उसे थाम लिया।
तभी भागता हुआ पारसनाथ भी वहां आ गया।
“गोली किसने चलाई?” पारसनाथ का स्वर ऐसा था कि जैसे कोई दरिन्दा बोला हो।
“बाहर से।” मोना चौधरी चीखी –“ठीक सामने से।”
पारसनाथ रिवॉल्वर थामे बाहर की तरफ दौड़ा।
उधर जसबीर वालिया समझ गया कि मामला गड़बड़ हो गया है। उसका निशाना तो ठीक था, लेकिन सामने वाला ही अपनी जगह छोड़ दे तो वो क्या करे। दूर से उसने, कमरे के भीतर महाजन को गिरते देख लिया था। बहरहाल हालातों को उसने फौरन समझा और यहां रुकना खतरे से भरा है अब। ये महसूस करते ही उसने चंद कदमों की दूरी पर मौजूद दीवार फलांगी और अंधेरे में फुटपाथ पर एक तरफ दौड़ता चला गया।
☐☐☐
रात के ग्यारह बज रहे थे।
महाजन एक नर्सिंग होम में था। खतरे से बाहर था। डॉक्टर ने ऑपरेशन करके गोली निकाल दी थी जो कि पेट को पार करके एक कोने में फंसी हुई थी। पहले तो मामला देखकर डॉक्टर ने हाथ लगाने से मना कर दिया। पुलिस को फोन करने की बात करने लगा। मोना चौधरी ने जब उसका मुंह नोटों से भर दिया तो सब बढ़िया हो गया।
डॉक्टर खुश हो गया। ऑपरेशन कर दिया। पूरी तसल्ली दी कि अब खतरे वाली कोई बात नहीं। पेशेंट को चलने-फिरने में चार-पांच दिन लग जाएंगे। पेट में गोली लगने की वजह से आराम को सख्त जरूरत है ।
मोना चौधरी और पारसनाथ ने चंद कदम दूर हटकर बात की।
महाजन इस वक्त नींद की दवा के असर में था।
दोनों की आंखें क्रोध से सुलग रही थी।
“तुम महाजन के पास रहो पारसनाथ।” मोना चौधरी दरिन्दगी भरे स्वर में कह उठी –“मैं सुबह तक वापस आ जाऊंगी।”
“जसबीर वालिया की तलाश में जा रही हो?” पारसनाथ सपाट कठोर स्वर में बोला।
“हां। वो ग्लौरी गया होगा। अपने रेस्टोरेंट में।” मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर वहशी स्वर में कह उठी –“इसके अलावा वो किसी जगह को सुरक्षित नहीं समझ सकता। अब उसके पास दूसरा रास्ता नहीं कि वो अपने आदमियों पर पूरा भरोसा करे।”
पारसनाथ के खुरदरे चेहरे पर, मौत झलक उठी।
“उसके आदमी उसे बचा लेंगे?” गुर्राहट जैसी आवाज थी पारसनाथ की।
मोना चौधरी के चेहरे पर जहरीली मुस्कान उभरी।
“वो तो यही सोचेगा कि अपने आदमियों के बीच वो सुरक्षित है। वो बच जाएगा। हर कमजोर और गलत कर्मों वाला इंसान जानता है कि वो नहीं बचेगा। लेकिन यहीं पर वो धोखा खा जाता...।”
“वो नहीं बचेगा...।” कहते हुए पारसनाथ ने दूर बेड पर पड़े महाजन पर निगाह मारी –“मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”
“तुम्हें महाजन के पास रहना...।”
“जरूरत नहीं मोना चौधरी। वो ठीक है। डॉक्टर ने कहा है कि...।”
तभी नर्स ने भीतर प्रवेश किया और महाजन की तरफ बढ़ी।
“सिस्टर।” पारसनाथ ने टोका।
नर्स ठिठकी। पलटकर पारसनाथ को देखा।
“डॉक्टर को बुलाओ।”
“लेकिन पेशेंट तो ठीक...।” नर्स ने कहना चाहा।
“दूसरी बात करनी है।”
“अभी देखती हूं।” नर्स पलटकर बाहर की तरफ बढ़ी –“डॉक्टर साहब घर जाने की तैयारी कर रहे थे।” वो बाहर निकल गई।
“मोना चौधरी।” पारसनाथ ने सख्त स्वर में कहा –“जसबीर वालिया को कॉटेज पर ही शूट कर देना चाहिए था।”
“वो अब भी हमारे हाथों से दूर नहीं है पारसनाथ।” मोना चौधरी कह उठी –“अब वो जब तक जिन्दा रहेगा। चैन से बैठ-उठ नहीं सकेगा। हर समय उसे डर लगा रहेगा कि हमारी चलाई गोली कभी भी उसकी जान ले सकती है।”
“अब उसका ज्यादा देर जिन्दा रहना ठीक नहीं। वो कॉटेज पर पहुंचकर मोनिका, बंटी और रोजी को मार सकता है। इस वक्त उसकी हालत उन लोगों जैसी है, जिसकी दुनिया हर तरफ से उजड़ चुकी हो। सब कुछ बरबाद हो गया हो।”
“मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं। लेकिन अभी वो कॉटेज पर जाकर वार करने की स्थिति में नहीं है। अब तो उसके सामने एक ही बात है कि खुद को बचाया जाए। जब उसे इस बात का एहसास हो जाएगा कि वो सुरक्षित हो चुका है तो तब वो सोचेगा कि उसे निशाना लेना है। लेकिन, वो वक्त अब उसकी जिन्दगी में नहीं आएगा। वो मरेगा।”
पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा।
तभी डॉक्टर ने भीतर प्रवेश किया और उनके पास आ गया।
“आपने मुझे...।”
“पेशेंट की हालत कैसी है?” पारसनाथ ने पूछा।
“ठीक है, अब तो।” डॉक्टर ने दोनों पर निगाह मारी।
“इसके पास रहने की जरूरत है?” पारसनाथ ने पूछा।
“ऐसी कोई बात नहीं-क्यों?”
“हमें कुछ घंटों के लिए काम है।” पारसनाथ ने बेड पर लेटे महाजन पर निगाह मारी –“नर्स को रात भर के लिए इसके पास बिठा दो। होश आने पर, इसे कोई जरूरत पड़े तो पूरी देखभाल हो इसकी।”
“मैं समझ गया। आप फिक्र न करें-मैं अभी सब इन्तजाम कर देता हूं।”
“अभी करो।”
डॉक्टर फौरन बाहर निकल गया।
पारसनाथ ने मोना चौधरी की आंखों में झांका।
दोनों कई पलों तक, एक-दूसरे को देखते रहे।
“चलें मोना चौधरी।” पारसनाथ का मौत से भरा सर्द स्वर था।
दांत भींचे मोना चौधरी ने सिर हिला दिया।
☐☐☐
रात का एक बज रहा था।
ग्लौरी रेस्टोरेंट की शाम अभी तक जवान थी। रोजमर्रा की तरह रेस्टोरेंट भरा हुआ था। अब सिर्फ वो ही शौकीन ज्यादातर बचे थे, जो डांस का आखिरी वाला दिल धड़का देने वाला राउंड देखना चाहते थे। कुछ वो थे जो सिर्फ पीने और वक्त बिताने के लिए वहां घंटों से जमे थे।
रोजी का कुछ पता न चलने पर, भास्कर ने डांस फ्लोर पर नई लड़की का इन्तजाम कर लिया था कि डांस देखने के लिए आने वालों को उनकी दिलचस्पी का सामान मिल सके। एक-दो दिन और डांस के लिए, ग्राहकों को लड़की न नजर आती तो, उन्होंने कहीं और जाना शुरू कर देना था।
यूं तो रेस्टोरेंट में देखने को सब कुछ सामान्य था रोज की तरह। परन्तु रेस्टोरेंट के लोग ही जानते थे कि, यहां कई लोग रिवॉल्वरें जेब में डाले इन खतरनाक इरादों के साथ घूम रहे थे कि मोना चौधरी, महाजन, पारसनाथ या दूसरा कोई भी यहां हंगामा करने आए तो उसे फौरन शूट करके, लाश को गायब किया जा सके। ऐसे लोगों की पैनी निगाह हर तरफ घूम रही थी। आने-जाने वालों पर वो जबरदस्त नजरें टिका रहे थे।
जसबीर वालिया रेस्टोरेंट के भीतर ही था।
सिर्फ बीस मिनट पहले वो यहां पहुंचा था। आते ही उसने सब इन्तजाम करा दिए थे कि कोई भी बाहरी परिन्दा अपनी मर्जी से रेस्टोरेंट में आकर अपने ‘पर’ न मार सके।
जसबीर वालिया रेस्टोरेंट में ऐसे गुप्त कमरे में था कि, जिसके बारे में रेस्टोरेंट के चंद विश्वसनीय कर्मचारियों के अलावा, किसी को पता नहीं था। इस वक्त उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने वाले भाव थे। वो बौखलाया-घबराया हुआ था। डर और गुस्सा उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। कॉटेज में उसके साथ जो हुआ, वो सब याद आ रहा था। मोना चौधरी अब उसे प्रेतनी के साये जैसी लग रही थी। साथ में याद आ रहे थे, बख्तावर सिंह के शब्द। बार-बार सुलग उठता था जसबीर वालिया।
मोना चौधरी ने इतना कुछ कर दिया था। बरबाद कर दिया था। उसका परिवार तबाह कर दिया था। और अब उसके पीछे थी। अगर उस वक्त मोना चौधरी अपनी जगह न छोड़ती तो, उसके द्वारा चलाई गोली ने उसे खत्म कर देना था। लेकिन वो गोली से बच गई। महाजन को जा लगी थी।
महाजन की मौत से जसबीर वालिया को खास सरोकार नहीं था।
मोना चौधरी मरती तो फिर वो सब संभाल सकता था। वो जानता था कि मोना चौधरी पीछे नहीं हटेगी। वो उसकी तलाश में यहां तक आएगी।
तभी कमरे के दरवाजे पर आहट हुई।
जसबीर वालिया चौंका। उसी पल उसके हाथ में रिवॉल्वर नजर आने लगी। उसके चेहरे पर गुस्सा और आंखों में भय के साये स्पष्ट चमक रहे थे। तभी भास्कर को भीतर पाकर, उसका तनाव कम होने लगा।
भीतर प्रवेश करके भास्कर ने दरवाजा बंद किया और उसके चेहरे के भाव देखकर बोला।
“आप किसी बात की फिक्र न करें वालिया साहब। मोना चौधरी यहां आई तो मिनटों में उसकी लाश पड़ी होगी।”
जसबीर वालिया हाथ में पकड़ी रिवॉल्वर की नाल थपथपा कर बोला।
“भास्कर।” स्वर धीमा था –“अब मुझे एहसास होने लगा है कि मोना चौधरी सच में खतरनाक शह है। उसका काम करने का ढंग योजनाबद्ध तरीके से और तेजी से होता है। मुझे आज तक कोई भी नहीं नचा पाया। लेकिन मोना चौधरी ने नचा दिया। दौड़ लगवा दो मेरी।” गुर्रा उठा वो –“बख्तावर सिंह ठीक कहता है कि उसे पार पाना आसान नहीं, लेकिन मैं उसे पार पाऊंगा भास्कर।”
“क्यों नहीं वालिया साहब।” भास्कर फौरन बोला –“हम मोना चौधरी को मसल देंगे। ठीक है कि एक बार उसका तीर चल गया। दोबारा थोड़े न ऐसा होगा। अब वार करने की हमारी बारी है। तब आप अकेले थे। उसने अपने साथियों के साथ आपको अकेले में घेर लिया। ऐसे में आपकी जगह कोई दूसरा होता तो वो जिन्दा ही न बचता। आपकी हिम्मत थी कि आप बच गए। अब मोना चौधरी की बारी है मरने की।” दांत भिंच गए भास्कर के –“वो जब भी यहां आएगी, जिन्दा वापस नहीं जा सकेगी।”
जसबीर वालिया ने उसे देखा।
“क्या इन्तजाम किए हैं, अगर मोना चौधरी यहां आ जाए तो?”
“बहुत तगड़े इंतजाम हैं वालिया साहब। ऐसे तगड़े कि मोना चौधरी और उसके साथी सोच भी नहीं सकते।” भास्कर ने दोनों हाथ मलते हुए दरिन्दगी से कहा –“रेस्टोरेंट के हर हिस्से के जर्रे-जर्रे में हमारे आदमी हथियारों के साथ फैले हैं कि कोई भी गड़बड़ आदमी दिखे तो उसे फौरन पकड़कर पूछताछ की जाए। गड़बड़ का यकीन हो जाए तो उसे चुपके से शूट करके लाश गायब कर दी जाए। अगर ऐसे किसी बंदे को खुल्लम खुल्लाह गोली मारनी पड़े तो भी हर्ज नहीं।”
“सब समझा रखा है अपने आदमियों को। वीडियो कैमरे चल रहे हैं। स्क्रीनों पर यहां के जर्रे-जर्रे का नजारा दिखाई दे रहा है। हमारे आदमी सतर्क हैं। स्क्रीन के जरिये और वैसे भी, हर तरह से, हर तरफ नजर रख रहे हैं। अगर मोना चौधरी और उसके आदमियों को इन इन्तजामों का एहसास भी हो गया तो वो सौ बार सोचेंगे, तब इधर का रुख करने का ख्याल छोड़ देंगे। अगर आए तो मरेंगे।”
जसबीर वालिया ने कठोर निगाहों से उसे देखा।
“मोना चौधरी ऐसी नहीं है कि इन बातों को देखकर आने का ख्याल छोड़ दे। मैं उसे बहुत अच्छी तरह जान चुका हूं कि वो जिस काम के पीछे पड़ जाती है। वो काम करके ही रहती है।” गुर्रा उठा वो।
“आप ठीक कह रहे होंगे।” भास्कर तुरन्त कह उठा –“लेकिन मेरा कहना भी गलत नहीं है कि अगर मोना चौधरी ने इधर पांव रखा तो वो किसी भी हाल में जिन्दा नहीं बचेगी।”
“उसे जिन्दा नहीं बचना चाहिए। उसने मेरा बहुत कुछ तबाह कर दिया है।” जसबीर वालिया पागल हो रहा था –“और मैं नहीं चाहता कि वो मेरा और कुछ तबाह करे। उसके हाथ मेरे गले तक...।”
“कैसी बातें कर रहे हैं वालिया साहब। क्या आपको भास्कर पर विश्वास नहीं।”
जसबीर वालिया कई पलों तक कठोर निगाहों से भास्कर को देखता रहा।
“किस-किसको मालूम है कि मैं यहां हूं।”
“मैं जानता हूं और बाकी दो और हैं। जो कि हमारे खास हैं। बाकी सबसे कह दिया है कि आप पांच मिनट के लिए ही आए थे और चले गए। यहां तक कि बाहर से मैंने आपकी कार भी हटा दी है।”
“कार...कार की तो मुझे कभी भी जरूरत पड़ सकती है।” जसबीर वालिया के होंठों से निकला –“इस मामले में मोना चौधरी है और वो बला की खतरनाक है। मैं उससे हर बात की आशा कर सकता हूं कि वो यहां भी पहुंच सकती है। बेशक मैं इस गुप्त कमरे में हूं लेकिन वो हरामजादी मुझे यहां भी ढूंढ़ सकती है।”
भास्कर के चेहरे पर गम्भीरता के भाव उभरे।
“मेरे ख्याल में, आपके सिर पर मोना चौधरी का डर चढ़ गया है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।” भास्कर की आवाज में गम्भीर भाव थे –“फिर भी आपको कार की जरूरत पड़े तो, कार ज्यादा दूर नहीं है। गली के बाहर, कोने पर लाले का जो शॉपिंग सेन्टर बना हुआ है, उसके पार्किंग में कार खड़ी है। वहां तीन कारें हैं। अपनी कार को आप फौरन पहचान लेंगे।” भास्कर ने जेब से कार की चाबियां निकाल जसबीर वालिया को थमा दी –“ये लीजिए, कार की चाबियां। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि बेशक मोना चौधरी आ जाए। वो यहां तक नहीं पहुंच पाएगी। उसकी लाश ही आपको देखने को मिलेगी। मैं बाहर नजर रखता हूं वालिया साहब। इस वक्त मेरा बाहर रहना, ज्यादा जरूरी है।”
जसबीर वालिया ने भिंचे दांतों से गर्दन हिला दी।
भास्कर बाहर निकल गया।
☐☐☐
मोना चौधरी और पारसनाथ रेस्टोरेंट की गली के दोनों किनारे पर छिपे हुए वहां की हरकतों पर नजर रख रहे थे। जब भी मौका लगता, वो एक-एक करके सामान्य ढंग से गली के भीतर रेस्टोरेंट का फेरा भी लगा लेते थे। आधी रात हो चुकी थी। अब लोगों का आना-जाना कम होता जा रहा था।
कुछ देर पहले ही गली में एक कार स्टार्ट हुई तो पारसनाथ एक तरफ छिप गया। कार की हेडलाइट इसी तरफ रोशन थी। वो कार गली से बाहर निकली और पास ही किनारे पर बनी बिल्डिंग के पार्किंग में वो कार पार्क कर दी गई। उस कार से भास्कर को बाहर निकल कर गली के भीतर, वापस जाते देखा।
पारसनाथ अंधेरे में भी स्पष्ट तौर पर भास्कर को पहचान गया था। लेकिन वो अपनी जगह से निकला नहीं। भास्कर को जाते देखता रहा। वो रेस्टोरेंट के भीतर प्रवेश कर गया। पारसनाथ ने एक निगाह पार्क की गई कार पर मारी। वो नहीं समझ पाया कि यहां पर भास्कर द्वारा कार पार्क करने का क्या मतलब है, जबकि गली में कार को पार्क करने की पर्याप्त जगह थी।
पारसनाथ अपनी जगह से निकलने की सोच ही रहा था कि उसे वहां पहुंची मोना चौधरी नजर आई। जो कि अपनी जगह पर ठिठकी, शायद उसकी तलाश में ही नजरें दौड़ा रही थी।
“मोना चौधरी।” अपनी जगह से उठते पारसनाथ ने धीमे स्वर में पुकारा।
मोना चौधरी की निगाह अंधेरे में खड़े पारसनाथ पर गई और वो पास आ पहुंची।
“जसबीर वालिया का खास आदमी भास्कर, वो कार, उधर पार्क करके गया है।” पारसनाथ बोला।
मोना चौधरी ने अंधेरे में उस तरफ नजर मारी।
“क्यों?”
“कोई तो बात होगी ही। गली में आराम से खड़ी कार को निकालकर उसने यूं ही पार्क नहीं किया होगा।” पारसनाथ ने कहा और हर तरफ निगाह घुमाई –“बीते पन्द्रह मिनट से हम यहां हैं, कुछ देखा तुमने?”
“जसबीर वालिया रेस्टोरेंट के भीतर ही है।” मोना चौधरी ने शब्दों को चबाकर विश्वास भरे स्वर में कहा।
“कैसे कहती हो, पक्के तौर पर इस बात को?”
“तीन आदमी गली में बहुत सख्त ढंग से पहरा दे रहे हैं। रेस्टोरेंट के आसपास ही बिखरे हैं वो। एक तो देर से पार्क की कार के भीतर बैठा है। बाकी के दो इधर-उधर खड़े हैं और कभी-कभार, उस कार में बैठे व्यक्ति के पास चले जाते हैं। उनके इस तरह पहरा देने का एक ही मतलब है कि जसबीर वालिया भीतर है।”
“ठीक कहती हो। इस तरह सोचा जाए तो वो भीतर ही है। दो को तो मैं देख चुका हूं, लेकिन ये नहीं जान पाया कि तीसरा कार के भीतर है। वो दोनों बारी-बारी एक ही कार के पास अवश्य जाते हैं। कार का सहारा लेकर खड़े होते हैं। परन्तु अंधेरे की वजह से मैं नहीं जान पाया कि उस कार में तीसरा भी है।”
“तीसरा है। वो बाहर नजर रखने का मामला संभाले हुए है। उनके पास रिवॉल्वरें भी होंगी। हो सकता है कार के भीतर मौजूद व्यक्ति ने पास में गन भी रखी हो।” मोना चौधरी ने सख्त स्वर में कहा।
“ये भी हो सकता है।”
“और रेस्टोरेंट के भीतर भी हमारे इन्तजार में सख्त पहरा होगा।” मोना चौधरी ने पूर्ववत: लहजे में कहा –“वक्त बरबाद न करके हमें सबसे पहले बाहर वाले पर काबू पाना है, तभी भीतर कुछ किया जा सकता है।”
“ठीक कहती हो। पहले बाहर वाले, फिर भीतर वाले।” स्वर सर्द हो गया पारसनाथ का।
मोना चौधरी ने अंधेरे से भरी गली के भीतर निगाह मारी। यहां रेस्टोरेंट का प्रवेश द्वार था। वहां ‘ग्लौरी’ शब्द का नियोन साइन चमक रहा था। जिसकी रोशनी दाएं-बाएं जरा-सी दूर जाकर खत्म हो रही थी। उस रोशनी में एक आदमी दीवार के साथ लापरवाही से सटा खड़ा सिगरेट के कश ले रहा था।
“पारसनाथ।” मोना चौधरी की निगाह गली में ही थी –“दुश्मन नजरों के सामने हो तो खतरा कम होता है। अगर दुश्मन छिपा हुआ हो तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है। छिपा हुआ दुश्मन जरा-सी ताकत से ही बहुत कुछ कर सकता है।”
“तुम कहना क्या चाहती हो मोना चौधरी?”
क्षणिक खामोशी के बाद मोना चौधरी बोली।
“तुम उन दो आदमियों पर काबू पाओगे जो खुले में घूम रहे हैं और मैं उस पर जो कार में बैठा है। इस काम से निपट कर ही हम तसल्ली से रेस्टोरेंट के भीतर प्रवेश करके, वहां का मामला संभाल सकते हैं। जसबीर वालिया तक पहुंचने की चेष्टा कर सकते हैं। वैसे, भीतर भी तगड़ा इन्तजाम होगा।”
“जो होगा देख लेंगे।” पारसनाथ के स्वर में दरिन्दगी भर आई थी।
“महाजन ने मेरे हिस्से की गोली खाई है।” मोना चौधरी का स्वर मौत में डूबा था –“वो मुझे न पुकारता। मैं अपनी जगह से न हिलती तो वो गोली मुझे लगनी थी। मैं जरा-सी हिली तो मेरे करीब से निकलकर, पीछे आ रहे, महाजन के पेट में वो गोली जा धंसी। इसमें कोई शक नहीं कि जसबीर वालिया अच्छा निशानेबाज है।”
“जरूर होगा। लेकिन अब उसे निशाना लगाने का मौका नहीं मिलेगा।”
दोनों की नजरें मिली। जेबों में पड़ी रिवॉल्वरें थपथपाई और गली में प्रवेश कर गए। इस तरह कि जैसे थकान से भरे टहल रहे हो और कहीं बैठकर, आराम करने का उनका इरादा हो।
☐☐☐
मोना चौधरी और पारसनाथ नियोन साइन की रोशनी के दायरे में पहुंच गए।
उनके चेहरे चमक उठे।
दीवार के पास खड़ा व्यक्ति उन्हें देखते ही सतर्क हुआ। दूसरा भी चार कदम की दूरी पर था। मोना चौधरी की छिपी निगाह दस कदमों के फासले पर गई, जहां वो कार खड़ी थी और एक आदमी भीतर था।
पारसनाथ सिगरेट निकालते हुए दीवार के पास खड़े आदमी के पास पहुंचा।
मोना चौधरी दो कदम कार की तरफ बढ़कर ठिठक गई थी और पारसनाथ को देख रही थी।
“माचिस देना।” पारसनाथ बोला –“एक आदमी अभी गली के किनारे बने पार्किंग में कार खड़ी करके इधर आया था। वो कार खुली रह गई शायद। दो आदमी उस कार को खोल कर देख रहे हैं।”
“क्या?” उस व्यक्ति ने माचिस देते हुए कहा।
“हो सकता है, उनका कार चोरी करने का इरादा हो।” पारसनाथ सिगरेट सुलगाने लगा।
“तुम सच कह रहे हो?”
“मेरी बला से।” पारसनाथ ने माचिस उसे वापस थमाई और कश लिया –“ये बात बताना मैंने अपना फर्ज समझा, क्योंकि कोई उस कार को पार्क करके अभी-अभी गली में आया था। वो...।”
“भास्कर साहब एक कार को बाहर लगाकर आए हैं।” वो व्यक्ति अपने साथी से बोला –“हो सकता है, वो ही कार हो। जल्दी से जाकर देखो। कोई कार को उड़ाकर न ले...।”
“अभी देखता हूं।” कहकर वो तेज-तेज कदमों से गली के किनारे की तरफ बढ़ा।
तभी उस कार के भीतर से आवाज आई।
“क्या मामला है?”
इससे पहले वो आदमी कुछ कहता, पारसनाथ ने मोना चौधरी से कहा।
“तुम उसे बताओ कि क्या बात है?”
मोना चौधरी फौरन कार के पास पहुंची। अंधेरे का फायदा उठाकर फुर्ती से उसने रिवॉल्वर निकाल ली और उस कार से बाहर झांकते चेहरे के माथे पर नाल लगाकर गुर्राई।
“हिलना मत। ऐसे ही रहो।”
तब तक पारसनाथ के हाथ में भी रिवॉल्वर आ गई थी और फुर्ती से दीवार के पास खड़े व्यक्ति के पेट से रिवॉल्वर को नाल लगा कर गुर्राया।
“मरना हो तो हिलना।”
वो ठगा-सा खड़ा रह गया।
अगले ही पल पारसनाथ ने मुट्ठी में उसके सिर के बाल पकड़ लिए।
“कौन हो तुम?”
“जिसका तुम इन्तजार कर रहे थे। वो ही हैं हम।” इसके साथ ही उसका सिर उसने जोर से दीवार से मारा।
उसके होंठों से कराह निकली।
दूसरी बार दीवार से सिर टकराते ही तीव्र कराह के साथ वो बेहोश होता हुआ नीचे लुढ़क गया।
तभी कार की तरफ से कुछ आवाजें आई।
पारसनाथ ने उधर देखा। मोना चौधरी का आधा शरीर खुली खिड़की के भीतर गया हुआ था। पारसनाथ फुर्ती से पास पहुंचा। परन्तु तब तक मोना चौधरी ने अपना सिर खिड़की से बाहर निकाला और गहरी-गहरी सांसें लेने लगी। पारसनाथ समझ गया कि सब ठीक है।
तभी उसकी निगाह उस आदमी पर पड़ी, जो गली के किनारे की तरफ गया था। वो आ रहा था।
मोना चौधरी फुर्ती से सामान्य ढंग से उसकी तरफ बढ़ गई।
उसे आता पाकर वो आदमी ऊंचे स्वर में बोला।
“वहां तो कुछ भी नहीं है।”
“तुमने ध्यान से देखा है या...।” मोना चौधरी उसकी तरफ बढ़ रही थी।
“बहुत ध्यान से देखा।”
“चलो मैं तुम्हें दिखाती हूं।”
वो करीब आ गए थे।
तभी नाल से पकड़ रखी रिवॉल्वर वाला हाथ, मोना चौधरी ने ऊपर उठाया उसका दस्ता उसके सिर पर वेग से मारा । वो ठीक से कराह भी न सका। दोनों हाथ सिर पर रखे और घुटने मुड़ते चले गए। वो बेहोश होकर नीचे जा गिरा। मोना चौधरी ने उसके कमीज के कॉलर से उसे पकड़ा और घसीट कर गली में दीवार के किनारे लगा दिया। इस सारे काम के दौरान कोई भी वहां नहीं आया था।
तभी रेस्टोरेंट के भीतर से एक आदमी बाहर आता हुआ कह उठा।
“क्यों जवानों, सब ठीक तो...।”
तभी पारसनाथ ने उसकी कनपटी पर रिवॉल्वर की नाल मारी फिर उसे धकेल दिया दीवार के पास ले गया और सिर दीवार से मारा। वो बेहोश होकर नीचे गिर गया।
मोना चौधरी पास आ पहुंची थी।
दोनों के चेहरे पर खतरनाक भाव थे। उन्होंने अपनी-अपनी रिवॉल्वरें जेब में डाली। फिर रेस्टोरेंट के भीतर प्रवेश कर गए। दोनों के हाथ जेबों में पड़ी रिवॉल्वरों पर ही टिके थे।
☐☐☐
भास्कर कंट्रोल रूम में ही था। अभी वहां पहुंचा था कि एक आदमी तेज स्वर में बोला।
“ये देखिए भास्कर साहब। अभी-अभी एक आदमी ने और युवती ने भीतर प्रवेश किया है। वो आदमी उस जैसा ही लग रहा है जो परसों यहां से भागा था। हुलिया वैसा ही लगता...।”
भास्कर की निगाह स्क्रीन पर नजर आ रहे, उनके चेहरों पर पड़ चुकी थी।
पारसनाथ को उसने तुरन्त पहचाना। चेहरे पर खतरनाक भाव आ गए।
“हां, वो पारसनाथ है। साथ में वो युवती मोना चौधरी ही हो सकती है। ये अब यहां से बचकर नहीं जा सकते। इन पर अब तक अपने आदमियों की भी नजर पड़ चुकी होगी।”
“इनकी जेबों में रिवॉल्वर हैं। हाथ भी जेबों में रिवॉल्वरों पर टिके।”
“परवाह मत करो। देखो अब मैं इनका क्या हाल करता हूं।” भास्कर ने खतरनाक स्वर में कहा और दरवाजा खोलकर बाहर निकला। वो जानता था उसके आदमियों के घेरे में से ये दोनों बचकर नहीं जाने वाले। वालिया की सारी परेशानी अभी इनकी मौत के साथ ही समाप्त हो जाएगी।
बाहर निकलते ही वो उन दोनों के सामने था।
दोनों ने उसे देखा।
भास्कर से नजरें मिलते ही पारसनाथ मुस्कराया।
“मैं जानता था तुम फिर आओगे।” भास्कर शब्दों को चबाकर बोला –“ये मोना चौधरी है?”
“हां।” पारसनाथ ने उसी मुस्कान के साथ कहा –“अपने मन में वहम मत पालो। हम यहां दुश्मनी करने नहीं आए। जसबीर वालिया से दोस्ती करने आए हैं। तुम्हें हमारी बात का विश्वास करना चाहिए।”
“दोस्ती करने।” भास्कर कड़वे स्वर में बोला –“जेबों में रिवॉल्वरें डालकर। खूब। बाहर मेरे तीन आदमी थे, उनके साथ क्या किया?”
“बेहोश किया है। उनसे हम बात नहीं कर सकते थे। वो हमारी बात समझते भी नहीं। इसलिए उन्हें बेहोश करके एक तरफ डाला और भीतर आ गए। रिवॉल्वरें साथ रखनी जरूरी थी। अगर तुम या तुम्हारे आदमी हमें देखते ही गोलियां चलाना शुरू कर देते तो, रिवॉल्वरों का इस्तेमाल करके अपनी जान तो बचाने की कोशिश करते। लेकिन ये अच्छा रहा कि तुमसे मुलाकात हो गई।” कहने के साथ ही पारसनाथ ने जेब से रिवॉल्वर निकाली और भास्कर की तरफ बढ़ाई –“लो, ये तुम रख लो। जब हम जाएं, तब हमें वापस कर देना।”
आंखों में शक समाए भास्कर ने रिवॉल्वर ली।
“ये तुम्हारी कोई नई चाल है?”
“विश्वास करो। हम सच कह रहे हैं। हम अकेले दो, भला क्या चाल चलेंगे।” पारसनाथ कहकर हौले से हंसा –फिर उसने मोना चौधरी से कहा –“इसे रिवॉल्वर दे दो मोना चौधरी।”
“तुम्हें इस पर भरोसा है?” मोना चौधरी ने भास्कर को घूरा।
“हां। ये ठीक आदमी लगा था मुझे। परसों ही मैं समझ गया था कि ये...।”
“तुम दोनों ने वालिया साहब का क्या भला किया है, जो तुम्हारी बात को सच मानूं?” भास्कर ने पारसनाथ की दी रिवॉल्वर जेब में डालते हुए कहा –“तुम तो उनकी जान के पीछे...।”
“पागलों वाली बातें कर रहा है ये।” मोना चौधरी ने तीखी निगाहों से भास्कर को देखते हुए पारसनाथ से कहा –“इसे ये नहीं मालूम कि कल दिन भर जसबीर वालिया, हमारे निशाने पर रहा, परन्तु हमने उसकी जान नहीं ली। इसे ये नहीं मालूम कि मोनिका और बंटी हमारे पास हैं, जिन्हें कि हम वापस करना चाहते हैं। क्योंकि वालिया हमें काम का आदमी लगा है। ड्रग्स और डायमंड के बिजनेस से हम जुड़े हुए हैं। वालिया भी ये काम करता है। हम इकट्ठे हो जाएं तो इस बिजनेस को फैला सकते हैं। रही बात दुश्मनी की तो उसने मुझे विमान विस्फोट में उड़ाने की चेष्टा की और मैंने बीते दो दिनों में वालिया को समझा दिया कि मैं भी कम नहीं। हिसाब बराबर। अगर अब वो हमसे दोस्ती की बात करना चाहता है तो ठीक, नहीं तो हम वापस चले जाते हैं।”
भास्कर बारी-बारी दोनों को घूरने लगा।
“अपनी रिवॉल्वर दो इसे।”
मोना चौधरी ने रिवॉल्वर निकालकर भास्कर को थमा दी।
उलझन और परेशानी में फंसे भास्कर ने मोना चौधरी की रिवॉल्वर भी अपनी जेब में रख ली।
“हम यहीं खड़े हैं। जाकर जसबीर वालिया से बात करो, जो हमने कहा है। अगर वो हमसे मिलने, हमसे बात करने को तैयार तो ठीक है। नहीं तो हम अपने रास्ते पर और वो अपने रास्ते पर। हमारे पास भी अब ज्यादा वक्त नहीं है। दिल्ली लौटना है हमें। पचास करोड़ के हीरे कल शाम को हमने लेने हैं। जिनकी बाजार में कीमत पांच अरब से भी ज्यादा है। चोरी का माल है वो हीरे। जसबीर वालिया हमारे साथ मिलकर काम करेगा तो दो साल में ही, उतना कमा लेगा, जितना उसने जिन्दगी में अब तक कमाया है।”
अनिश्चित सा खड़ा भास्कर उन्हें देखे जा रहा था।
“पारसनाथ।” मोना चौधरी ने पारसनाथ के चेहरे पर निगाह मारी –“मेरे ख्याल में हमने आधी रात को यहां आकर अपनी नींद खराब को। जसबीर वालिया अगर हमसे दोस्ती नहीं करना चाहता तो हमें भी जरूरत नहीं। इसे मोनिका और बंटी का पता बता दो। वालिया, उन्हें वहां जाकर मिल लेगा।”
“जैसा तुम ठीक समझो।” पारसनाथ ने कहा और भास्कर को देखा –“जसबीर की पत्नी और बच्चा कहां है, वो जगह मैं तुम्हें बता देता हूं। जब भी वो चाहे खुद जाकर उन्हें ले आए किसी को भिजवाकर...।”
“एक मिनट।” भास्कर उलझन और सोचों में डूबा कह उठा –“तुम दोनों यहीं ठहरो। मैं वालिया साहब से बात करता हूं। इस बारे में जो फैसला करना है, वालिया साहब ने करना है। अभी तक तो वालिया साहब का यही आदेश था कि तुम लोग आओ तो, खत्म कर दिया जाए।”
“पागल है वालिया भी।” पारसनाथ गहरी सांस लेकर कह उठा।
“जो करना है जल्दी करो।” मोना चौधरी ने लापरवाही से कहा –“हमारी रात खराब हो रही है।”
“मैं वालिया साहब से बात करके आता हूं।” भास्कर ने दोनों की आंखों में झांका –“तुम लोग यहां से इधर-उधर जाने की कोशिश मत करना। वरना, जो होगा उसके जिम्मेवार तुम ही होगे।”
भास्कर चला गया।
पारसनाथ ने कश लिया।
चंद पलों में ही उन्हें कुछ व्यक्ति नजर आ गए, जिनकी लाल सुर्ख आंखें उन्हें घूर रही थी। यानी कि उन्हें पहचान लिया गया था। वो दिखाने को लापरवाह, परन्तु सतर्क खड़े थे।
☐☐☐
दस मिनट बाद ही मोना चौधरी और पारसनाथ, केबिन जैसे ऑफिस में बैठे थे। टेबल पार कुर्सी पर शांत-सा जसबीर वालिया बैठा था। दस मिनट से उनके बीच बातचीत चल रही थी। पीछे चार आदमी हथियारों के साथ सतर्क खड़े थे। एक तरफ भास्कर मौजूद था।
“हमारी कोई दुश्मनी नहीं थी। देखा जाए तो अब भी नहीं है।” मोना चौधरी ने मुस्कराकर, लापरवाही भरे स्वर में कहा –“तुम बख्तावर सिंह के कहने पर मेरे पीछे लगे। विमान विस्फोट में तुमने मुझे खत्म करना चाहा। मैं बच गई। उसके बाद तुम्हें ये समझाना बहुत जरूरी था कि तुम मेरे हाथों से दूर नहीं हो। तभी तो मैं तुम्हारी तलाश करके यहां पहुंची और तुम्हें सबक सिखाने के लिए, मैंने जो किया, वो तुम्हारे सामने ही है।”
जसबीर वालिया ने गहरी सांस ली। सिगरेट सुलगाई।
“सारा दिन कॉटेज पर तुम मेरे और मेरे साथियों के निशाने पर थे। मैंने तुम्हें मारा? नहीं मारा। क्योंकि मैं तुम्हें मारना नहीं चाहती थी। समझाना चाहती थी कि मेरे से मत टकराओ। मैं मजाक वाली चीज नहीं हूं। बख्तावर सिंह ने तुम्हें बलि का बकरा बनाया है। वरना वो जानता है कि मुझ पर हाथ डालना आसान नहीं। हाथ डालना आसान होता तो बख्तावर सिंह कब का मुझे खत्म कर चुका होता।”
“मैंने तुम्हारी जान लेने की कोशिश की। तुम्हें गोली मारी। वो महाजन को लगी।” जसबीर वालिया बोला।
“ये तो होना ही था। हम तुम्हें घेरकर तुम्हें सबक सिखा रहे हैं। ऐसे में तुम हम पर वार करते हो तो, वो तुम्हारा हक है। वैसे महाजन बिल्कुल ठीक है, पेट में गोली अवश्य लगी, लेकिन कोई खतरा नहीं। अगर सच में हम तुमसे दुश्मनी निकाल रहे होते तो सबसे पहले तुम्हारी पत्नी और बच्चे को मारते। तुम्हें भी मार चुके होते। तुम्हें खत्म करने का तो हमारे पास मौका भी था और वक्त भी। अभी हम इस खेल को और लम्बा करते, परन्तु दिल्ली से मैसेज आ गया कि कल हमारा माल आ रहा है। चोरी के हीरों का सौदा करना है। तुम हमें काम के बंदे लगे। बख्तावर सिंह यूं ही तुम्हारे पीछे नहीं लगा रहता। मैं चाहती हूं कि तुम हमारे साथ काम करो। दो साल में तुम इतना कमा लोगे, जितना कि तुमने आज तक जिन्दगी में इकट्ठा किया है। बख्तावर सिंह तुम्हें क्या देता होगा। उससे तो तुम कभी-कभार ही कमाते होगे। यहां तो करोड़ों के सौदे हर दूसरे दिन होते हैं और अरबों का फायदा होता है। अगर आज हमारी बात नहीं पसन्द तो जब कभी मन करे, हमसे हाथ मिलाने दिल्ली आ...।”
जसबीर वालिया मुस्करा पड़ा।
“मैं तो तुम लोगों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान बैठा था।”
“उसमें तुम्हारा कसूर नहीं। हालात ही ऐसे थे कि तुम्हारी जगह कोई दूसरा होता तो वो भी ये ही सोचता। खैर, जब भी चाहो, दिल्ली आकर मिल लेना। जब तुम्हें विश्वास हो जाए कि हम सच में दोस्त हैं।” मोना चौधरी के स्वर में कूट-कूटकर लापरवाही भरी हुई थी –“टाइम बम होगा तुम्हारे पास?”
“टाइम बम?” जसबीर वालिया के होंठों से निकला।
“हां। हमें दिल्ली पहुंचना है। सुबह तक हमने इन्दौर छोड़ देना है वालिया। इधर एक आदमी ने पच्चीस लाख की हमारी पेमेंट देनी थी।” पारसनाथ बोला –“साल भर हो गया इस बात को। अब वो पेमेंट नहीं दे रहा। दिन निकलने से पहले ही उसकी जगह को बम से उड़ाना है, ताकि वो हमेशा याद रखे कि मेरा पैसा मारकर वो आसानी से नहीं बैठ सकता।”
जसबीर वालिया और भास्कर की नजरें मिली।
“भास्कर।” जसबीर वालिया ने कहा –“बढ़िया-सा टाइम बम दे दो इन्हें।”
“लाल वाला दे दूं।”
जसबीर वालिया ने सहमति से सिर हिलाया।
“महंगा है वो बहुत।” भास्कर ने मुस्कराकर कहा।
“हमसे टाइम बम की पेमेंट ले...।” पारसनाथ ने कहना चाहा।
“कैसी बातें कर रहे हो।” जसबीर वालिया ने मुस्करा कर टोका –“बम लेकर आओ भास्कर।”
भास्कर बाहर निकल गया।
“अब तुम्हें कैसा लग रहा है वालिया?” पारसनाथ ने मुस्करा कर कहा –“दोस्ती कैसी लग रही है?”
“बहुत बढ़िया। तुम बता रहे थे कि कल दिल्ली में अस्सी करोड़ के हीरे खरीदने हैं?” वो बोला।
“हां। माल तो अरबों का है। चोरी के हीरे हैं। इसलिए सस्ते मिल रहे हैं। उधर दूसरी पार्टी तैयार खड़ी है उससे ढाई-तीन अरब में सौदा हो जाएगा।'' पारसनाथ ने कश लेकर लापरवाही से कहा –“यूं तो ये सारा सौदा हमारा है। फिर भी तुम चाहो तो तुम्हारी शुरुआत इसी ‘डील’ के साथ कर देते हैं। ताकि हमारी दोस्ती का तुम्हें पक्का सबूत मिल जाए। लेकिन अस्सी करोड़ का तीसरा हिस्सा तुम्हें डालना होगा। छत्तीस-सैंतीस करोड़। जब दूसरी पार्टी हीरे लेगी तो अपने हिस्से का प्रॉफिट भी साथ ले लेना। मर्जी तुम्हारी। जो बताना-समझाना था, वो बता...।”
तभी भास्कर ने भीतर प्रवेश किया।
उसके हाथ में टिफिन टाइप का छोटा-सा डिब्बा था। पास आकर मोना चौधरी को उसने वो डिब्बा थमा दिया। मोना चौधरी ने वो डिब्बा खोला तो भीतर थर्मोकोल की पैकिंग में छोटा-सा लाल-सुर्ख रंग का बम नजर आया। जिसके साथ छोटी-सी घड़ी जैसा यंत्र भी था।
“ये बम जितना छोटा है। उतना ही खोटा है।” भास्कर हंसकर बोला –“ये इतना पावर फुल है कि ढाई मंजिला बिल्डिंग के चीथड़े-चीथड़े उड़ा सकता है।”
“गुड।” मोना चौधरी ने डिब्बा बंद करके पारसनाथ को थमाया और खड़ी हो गई –“हम चलते हैं। बम वाला काम निपटा कर सुबह ही दिल्ली निकलना है। शाम को दिल्ली में हीरों का सौदा...।”
“जहां तुमने बम लगाना है, उस काम के लिए मैं तुम्हारे साथ चलूं।” एकाएक जसबीर वालिया बोला।
“बेशक चलो। हमारा काम आसान हो जाएगा।” पारसनाथ ने कहा।
“भास्कर भी चले?”
“जरूर। लेकिन और नहीं।” मोना चौधरी बोली –“जरा से काम के लिए हमें भीड़ पसन्द नहीं।”
चंद क्षण की सोच के बाद जसबीर वालिया मुस्करा कर उठा।
“चलो। मैं तुम्हारे साथ शायद दिल्ली चलकर, हीरों के सौदे में भी शामिल हो जाऊं।”
“जल्दबाजी मत करो। सोच लो। बख्तावर सिंह कभी भी पसन्द नहीं करेगा कि तुम मेरे साथ काम...।”
“मैं बख्तावर सिंह की नौकरी नहीं करता मोना चौधरी।” जसबीर वालिया ने मुंह बनाकर कहा –““मेरा जो मन करेगा, मैं वो ही करूंगा। उसे भविष्य में मुझसे कोई काम कराना है तो बेशक कराए। ये बम वाला काम निपटा कर मोनिका और बंटी के पास चलेंगे। उनसे भी मिलना चाहता हूं। तब तक सुबह हो जाएगी। फिर तुम्हारे साथ दिल्ली...।”
“बातों में वक्त खराब मत करो।” मोना चौधरी बोली –“चलो, वक्त बीतता जा रहा है।”
भास्कर ने वहां खड़े अपने आदमियों को देखा।
“हमें लौटने में शायद देरी हो जाए। रेस्टारेंट बंद कर देना वक्त पर।”
☐☐☐
पारसनाथ ने सड़क के किनारे कार रोकी और इंजन बंद करता हुआ बोला।
“सिगरेट लेकर आता हूं।” कहकर दरवाजा खोला।
“मैं ला देता हूं।” दोनों ही बाहर आ गए।
पारसनाथ ने भास्कर को देखा।
हर तरफ गहरा अंधेरा और दौड़ती रात का वक्त था। शायद ही कभी-कभार कोई वाहन निकलता दिखाई दे जाता था। मध्यम-सी ठण्डी हवा चल रही थी।
“तुम्हारे पास हमारे रिवॉल्वर हैं। तुमने अभी वो वापस नहीं किए।” पारसनाथ बोला।
“ओह।” भास्कर ने जेबों में हाथ डाले –“मैं भूल ही गया था।” कहकर उसने दो रिवॉल्वर निकाले और पारसनाथ को थमा दिए। पारसनाथ ने एक रिवॉल्वर कार में बैठी मोना चौधरी की तरफ बढ़ाया –“रिवॉल्वर लो।”
मोना चौधरी ने रिवॉल्वर थामी।
पारसनाथ ने अपने हाथ में दबी रिवॉल्वर, भास्कर के दिल वाले हिस्से पर लगा दी।
भास्कर चौंका।
“ये...ये क्या कर रहे हो?” उसके होंठों से हड़बड़ाया-सा स्वर निकला।
“डर गये।” पारसनाथ ने सर्द स्वर में कहा –“मैं तो मजाक कर रहा हूं।”
“ये कोई मजाक होता है। हटाओ इसे।”
“हटा लूं।”
तभी कानों को फाड़ देने वाला धमाका हुआ।
पारसनाथ ने उसकी छाती पर से रिवॉल्वर की नाल हटा ली। नाल से निकली गोली भास्कर के दिल को चीरती निकल गई थी। भास्कर को सांस लेने का भी मौका नहीं मिला। वो कटे पेड़ की तरह पीठ के बल नीचे जा गिरा।
ये देखकर भीतर बैठा जसबीर वालिया चिहुंक उठा। खतरे का एहसास हुआ उसे। परन्तु कुछ कर न सका। मोना चौधरी ने पलट कर रिवॉल्वर उसकी छाती से लगा दी।
“हिलना मत।” मोना चौधरी गुर्राई।
जसबीर वालिया के होंठ हिले। परन्तु कोई शब्द न निकला।
उसकी आंखें अंधेरे में भी डर और हैरानी से फैली स्पष्ट नजर आ रही थी।
“तुम...तुमने तो दोस्ती...।”
“तेरे जैसे इंसान के साथ मैं दोस्ती की सोच भी नहीं सकती, गंदे आतंकवादी।” मोना चौधरी दांत भींचकर गुर्राई और रिवॉल्वर की भारी नाल का वार उसके माथे पर किया।
जसबीर वालिया के होंठों से मध्यम-सी कराह निकली और सीट पर ही बेहोश होकर लुढ़क गया।
बाहर खड़े पारसनाथ की निगाह हर तरफ जा रही थी।
दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था, रात के इस अंधेरे में।
☐☐☐
जसबीर वालिया को होश आया।
खुद को कार की पीछे वाली सीट पर ही बैठे पाया। परन्तु अपने हाथ-पांव उसने टेप से बंधे हुए पाए। भास्कर की मौत। फिर उस पर रिवॉल्वर लगाना और उसे बेहोश कर देना। धोखा? मोना चौधरी ने दोस्ती का हाथ बढ़ाकर धोखा किया है। जसबीर वालिया के दांत भिंच गए।
तभी उसकी निगाह कार की दाएं-बाएं की खिड़कियों पर गई।
एक खिड़की पर मोना चौधरी का चेहरा नजर आया। दूसरी पर पारसनाथ का।
दोनों के चेहरों पर खतरनाक मुस्कान थी।
जसबीर वालिया दांत भींचकर कुछ कहने लगा कि ठिठक गया। उसकी आंखें सिकुड़ी। उसके कानों में रात के सन्नाटे में बेहद मध्यम-सी टिक-टिक घड़ी की आवाज पड़ रही थी। ये क्या...ये...तभी उसकी निगाह अपनी छाती पर पड़ी। रात के अंधेरे में भी उसने स्पष्ट पहचाना।
ये लाल रंग का वो ही शक्तिशाली टाइम बम था, जो भास्कर ने दिया था। वो टेप से उसकी छाती पर फंसा दिया था। वो चालू था। टिक-टिक की आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।
आतंक से नहा उठा जसबीर वालिया।
“ये...ये क्या कर रहे हो?” उसके होंठों से खरखराता स्वर निकला –“ये बम...।”
“भास्कर ने दिया था। वो ही लाल रंग का टाइम बम।” पारसनाथ ने सर्द स्वर में कहा।
जसबीर वालिया ने घबराकर मोना चौधरी को देखा।
“सिर्फ पौने दो मिनट जसबीर वालिया। सिर्फ पौने दो मिनट बचे हैं बम फटने में। तुम लोगों ने ही बताया था कि ये टाइम बम इतना पॉवरफुल है कि ढाई मंजिला इमारत को उड़ा सकता...।”
“प्लीज मोना चौधरी। ये सब न करो। मैं...।” जसबीर वालिया का चेहरा पीला होकर लटक गया था –“मैं...”
“तुमने मुझे ‘आतंक का चेहरा’ दिखाया था विमान में। और तुमने कहा था कि आखिरी मिनट में मुझे आतंक का असली चेहरा नजर आएगा। याद है ना तुम्हें। लेकिन मैं किस्मत वाली रही कि आखिरी मिनट में आतंक के चेहरे को देख नहीं पाई। बच निकल आई विमान से।”
जसबीर वालिया की आंखों में आंसू दिखाई दिए।
“प्लीज। मुझे माफ कर दो मोना चौधरी। मैं मरना नहीं चाहता। मैं...।”
“कोई भी मरना नहीं चाहता। वो भी मरना नहीं चाहते थे जो तब उस विमान में सवार थे और...।”
“मुझे माफ कर दो, मैं तुम्हारे पांवों में पड़ता हूं। मुझे मत मारो।”
मोना चौधरी मुस्करा कर जहरीली मुस्कान से जसबीर वालिया को देखती रही।
जसबीर वालिया ने गिड़गिड़ाने वाले ढंग में पारसनाथ को देखा।
“तुम समझाओ मोना चौधरी को। मैं करोड़ों रुपया तुम्हें दे दूंगा। मैं...मैं...।”
पारसनाथ ने खिड़की से उसे झांकते सिगरेट सुलगाई। कश लिया।
खतरनाक मुस्कान खुरदरे चेहरे पर दिखी।
“सवा मिनट।” मोना चौधरी एकाएक हंसी।
“नहीं...ऽ...ऽ...ऽ...” जसबीर वालिया चीखा –“मुझे मत मारो मैं...मैं...।”
“बाय जसबीर वालिया।” मोना चौधरी ने हाथ भीतर लाकर जसबीर वालिया का गाल थपथपाया –“अब आखिरी एक मिनट में तुम्हें अहसास होगा कि आतंक किसे कहते हैं। आतंक का चेहरा क्या होता है। गुड बाय।”
“नहीं...ऽ...ऽ...ऽ मोना चौधरी...तुम...।”
तब तक मोना चौधरी कार की खिड़की से हट चुकी थी।
पारसनाथ भी हट गया था।
दहशत में सुन्न हुआ जसबीर वालिया कार की पीछे वाली सीट पर बैठा, टाइम बम की घड़ी की टिक-टिक सुन रहा था। सामने शीशे से उसे मोना चौधरी और पारसनाथ दूर जाते नजर आ रहे थे। उसने तड़पकर खुद को आजाद करवाने की चेष्टा की। परन्तु न तो खुद को आजाद करवा सका टेपों के बंधनों से और न ही छाती पर टेप से चिपका रखे टाइम बम को, जो उसे इस दुनिया से ले जा रहा था।
एकाएक वो मौत के आतंक से गला फाड़कर चीखा।
“मोना चौधरी...ऽ...ऽ...ऽ...”
लेकिन मोना चौधरी और पारसनाथ कार से काफी दूर जा चुके थे।
तभी कानों को फाड़ देने वाला धमाका हुआ। कार में उसी पल आग लगी और उसके जलते हुए टुकड़े दूर-दूर तक फैलते चले गए। कुछ आसमान की तरफ भी गए।
विस्फोट की आवाज सुनकर मोना चौधरी और पारसनाथ ठिठके। पीछे देखा। जहां सिर्फ आग की लपटें और बिखरे हुए, कार के जलते टुकड़े ही नजर आ रहे थे। दोनों की नजरें मिली। वो जानते थे कि जसबीर वालिया के शरीर का छोटा टुकड़ा मिलना भी अब संभव नहीं था।
जहां कार खड़ी थी, वहां सड़क पर गहरा गड्ढा हो गया था।
खत्म हो गया था वो, जो मासूमों को आतंक दिखाकर उनकी जान ले लेता था। उसने खुद भी आतंक का सुखद या दुखद एहसास किया होगा, परन्तु उस आतंक का अनुभव बताने को अब वो जिन्दा नहीं रहा था।
मोना चौधरी और पारसनाथ की नजरें मिली।
“बख्तावर सिंह बहुत फैल रहा है।” पारसनाथ का हाथ अपने खुरदरे चेहरे पर जा टिका।
“उसकी बारी भी इसी तरह कभी, जल्दी ही आएगी।” मोना चौधरी का स्वर सख्त था –“आओ महाजन के पास पहुंचना है हमें। उसे होश आ गया होगा। वो हमारा इन्तजार कर रहा होगा।”
समाप्त
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