लकड़ी का करीब पचास साल पुराना दरवाजा था, परन्तु आज भी बेहद मजबूत था। पुराने शहरी इलाके की पतली गली के पुराने से मकान पर लगा था।


देवराज चौहान दरवाजे के सामने ठिठका। दरवाजे का एक पल्ला खुला ही हुआ था। उसने हाथ से दूसरा पल्ला खोला और भीतर प्रवेश कर गया। ये छोटा सा कमरा था और बैठने के लिये कुर्सियों जैसा जो सोफा नजर आया, वो भी तीस-चालीस साल पुराने मॉडल का ही था !


कमरा खाली था।


“बाबू भाई-।” देवराज चौहान ने पुकारा। 


“बैठ जाओ।" दूसरे कमरे से आवाज आई- “आता हूं--।” 


देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और आगे बढ़कर सोफे पर जा बैठा। चेहरा शांत, किन्तु सख्त सा था नजरों में ठहराव सा नजर आ रहा था ।


तीन-चार मिनट के पश्चात् दूसरे कमरे से निकलकर, पचपन वर्षीय व्यक्ति ने वहां कदम रखा। वो तहमद पहने था। इसके अलावा उसने कुछ नहीं पहन रखा था। साधारण कद का साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति था वो उसकी आंखें और होंठों के भाव बता रहे थे कि वो जिन्दगी के हर रंग से खेला-खाया हुआ है। 


दोनों की नजरें मिलीं।


“कौन हो तुम?” बाबू भाई ने गहरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा- "मैं तुमसे पहले कभी नहीं मिला।"




"ये हमारी पहली मुलाकात है।" कहते हुए देवराज चौहान ने कश लिया और सिग्रेट ऐशटे में डाल दी।


"हां"


“ये बात तुम न भी बताते तो मुझे मालूम थी।” बाबू भाई बैठता हुआ बोला- "कौन हो तुम?"


“अपने बारे में बताना जरूरी है।"


“कोई जरूरी नहीं।” बाबू भाई मुस्कराया - "ये तो बता सकते हो कि मेरा पता किसने दिया ?" 




“सोहन लाल ने बताया था कि तुम जानकारियां बेचते हो मैंने तुम्हारा पता याद रखा। अब जरूरत पड़ी तो आ गया।"


“सोहनलाल ?” बाबू भाई ने सिर हिलाया- “वो ही सोहनलाल तो नहीं जो गोली वाली सिग्रेट पीता है और ताले-तिजोरियां तोड़ने में उसे महारथ हांसिल है। "


“हां। मैं उसी की बात कर रहा हूं।" 


बाबू भाई के चेहरे पर एकाएक ही मुस्कान दिखाई देने लगी-  “मैं ये बहुत अच्छी तरह जानता हूं कि सोहनलाल पर देवरा चौहान की मेहरबानी रहती है।”


देवराज चौहान ने बाबू भाई की आंखों में झांका। 


“तुमने सोहनलाल का जिक्र किया तो मैं तुम्हें हाथो हाथ पहचान गया। वरना शायद तुम्हारे जाने के बाद ही याद आता है कि देवराज चौहान मेरे पास आया था। तुम्हारी अखबार में छपी तस्वीर को बहुत अच्छी तरह देख रखा है मैंने । यही सब कुछ याद रखना तो मेरा धंधा है।” बाबू भाई के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी- “अब तुम्हें सामने देख लिया तो, कभी नहीं भूल पाऊंगा तुम्हारे चेहरे को कभी मैंने तुम्ह ठिकाने के बारे में जानने की बहुत कोशिश की लेकिन मालूम नहीं कर पाया कि तुम कहां रहते हो ।”


उसे खामोश होता पाकर देवराज चौहान स्थिर लहजे में बोला-  “काम की बात करूं ?”


“करो। चाय-पानी की इच्छा हो तो-।"


देवराज चौहान को जेब से सौ-सौ की गड्डियां निकालते पाकर वो चुप हो गया । 


देवराज चौहान ने सौ की गड्डी टेबल पर रखी और गंभीर स्वर में बोला।


"बंसीलाल का पता-ठिकाना और जानकारी चाहिये मुझे । 

पता चला है उस बंसीलाल की नेताओं तक पहुंच है। वो नेताओं के और नेता उसके काम आते रहते हैं। गैंगस्टर के तौर पर बंसीलाल का नाम जाना जाता है।”


बाबू भाई की आंखें सिकुड़ीं। वो देवराज चौहान को देखने लगा। देवराज चौहान ने सौ की एक और गड्डी टेबल पर रख दी। 


“क्या झगड़ा हो गया तुम्हारा बंसीलाल से ?” जवाब की अपेक्षा देवराज चौहान ने एक और गड्डी टेबल पर रखी दी।


बाबू भाई ने गहरी सांस लेकर कहा । “अब और गड्डी मत रखना। मेरे ख्याल से ये तीन गड्डियां भी तुमने खराब की हैं। दो-चार से पूछते तो बंसीलाल के बारे में तुम्हें आसानी से मालूम हो जाता। पैसे खराब करने के लिये तुम्हें सीधा मेरे पास नहीं आना चाहिये था। वैसे बंसीलाल के बारे में बताने को खास कुछ नहीं है। जो है वो सब ही जानते हैं।" देवराज चौहान ने हाथ में थाम रखी गड्डियां जेब में डालीं और बोला ।


“जो जानते हो, वो ही बता दो। और मेरे जाने के बाद बंसीलाल को ये खबर मत बेच देना कि मैं उसके बारे में पूछताछ कर रहा था। ऐसा किया तो ?”


“देवराज चौहान।" बाबू भाई गम्भीर स्वर में कह उठा- “मैं खबरें बेचता हूं। ईमान नहीं ।”


“बंसीलाल के बारे में सब कुछ बताओ।” 


बाबू भाई ने बताया।


ज़ब उसकी बात खत्म हुई तो देवराज चौहान बोला। “इस वक्त बंसीलाल कहां मिल सकता है?"


“मैं नहीं जानता। उसकी सब जगहें बता दी हैं। वो कहीं भी मिल सकता है।" कहते हुए वो गम्भीर था- “मुझे नहीं मालूम तुम्हारी बंसीलाल से क्या बात हो गई है। लेकिन इतना याद रखना कि बंसीलाल खतरनाक गैंगस्टर है। मरने-मारने की वो परवाह नहीं करता। हर तरह के आदमी उसके पास हैं। मेरे ख्याल में मैं यूं ही तुम्हें समझा रहा हूं। सब मालूम होगा तुम्हें ।" -


देवराज चौहान उठा। बाबू भाई को देखा फिर बाहर निकलता चला गया ।


***

दिन के ग्यारह बज रहे थे।

देवराज चौहान भरे-पूरे बाजार में शॉपिंग कॉम्पलैक्स में पहुंचा। लगभग सभी दुकानें खुल चुकी थीं। ग्राहक वहां न के बराबर ही थे। बाबू भाई ने बताया था कि यहां दुकान को ऑफिस बना रखा था बसीलाल ने और मटके का नम्बर लगाता था। फोन पर या वैसे ही लोग आकर शाम को खुलने वाले मटके का नम्बर लगा जाते थे। बंसीलाल को मटके से तगड़ी कमाई होती थी।

सीढ़ियां तय करके देवराज चौहान पहली मंजिल की गैलरी में आगे बढ़ने लगा। दुकानों के ऊपर लगे बोर्डों पर दुकानों का नम्बर लिखा था। उसे इक्कीस नम्बर की दुकान की तलाश थी। दो मोड़ काटने के बाद देवराज चौहान ठिठका। सामने ही इक्कीस नम्बर की दुकान थी।

एल्म्यूमीनियम के काले शीशे वाले डोर थे। बाहर स्टूल पर चपरासी बैठा था। बोर्ड नहीं लगा था किसी तरह का। सिर्फ नम्बर ही लिखा था इक्कीस।

देवराज चौहान को पास आता देखकर चपरासी उठ खड़ा हुआ। "किससे मिलना है साब जी?” चपरासी ने पूछा। “किसी से नहीं।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा - "भीतर जाना है।"

“काम ?” चपरासी का स्वर धीमा था।

“तुम्हें बताना ठीक नहीं होगा।" देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान उभरी।

“बता दीजिये। मुझे सब मालूम है।"

“नम्बर लगाना है। अब ये मत पूछना कि कौन-सा नम्बर लगाना है। क्योंकि शाम को वो ही नम्बर खुलेगा।"

चपरासी ने बिना कुछ कहे दरवाजा खोल दिया।

देवराज चौहान भीतर प्रवेश कर गया। दरवाजा बन्द हो गया। भीतर एक तरफ डैस्क पर बैठी युवती दो रजिस्टर खोले हिसाब वगैरह कर रही थी। सामान्य-सी टेबल के पीछे कुर्सी पर चालीस वर्षीय व्यक्ति बैठा था। जो कि फोन पर किसी से बात कर रहा था। और दूसरे फोन की घंटी बज रही थी। दो अन्य फोनबल पर खामोशी के साथ मौजूद थे। तीन कदम दूर दीवार के साथ कुर्सी पर एक युवक मौजूद था। जिसने दूसरी कुर्सी पर टांगें रखी हुई थीं। और पसरा पड़ा था।

देवराज चौहान को देखते ही फोन पर बात करने वाले ने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

कुर्सी पर पसरे व्यक्ति ने और युवती ने एक निगाह उसे देखा फिर लापरवाह हो गये ।

फोन वाले ने अपनी वाल समाप्त करके, कागज पर कुछ लिखा। तब तक दूसरे फोन की बजने वाली वेल बंद हो चुकी थी ।

"नम्बर लगाना है।" उस व्यक्ति ने सीधे-सीधे देवराज चौहान से पूछा । 

“हां।”

देवराज चौहान शांत सा मुस्कराया- "मैंने तो सोचा था कि यहां बंसीलाल से मुलाकात होगी।" 

“बंसी भाई तो घंटा भर पहले ही यहां से गये हैं। आप बताइये कौन-सा नम्बर लगाना - ?” 

“बंसीलाल कहां गया है?” देवराज चौहान ने पहले वाले स्वर में पूछा !

“क्या मतलब?” उसकी निगाह देवराज चौहान पर अटक गई। 

“बंसीलाल कहां मिलेगा ?”

"जनाब का नाम ?" उसकी आवाज में इस बार हल्की-सी सख्ती आ गई थी। 

“सुरेन्द्र पाल - "

“बंसो भाई को क्यों पूछ रहे हो?”

"बकाया हिसाब है। बराबर करना है।" कहते हुए देवराज चौहान सिग्रेट सुलगा ली- "मैं जल्द से जल्द बंसीलाल से मिलना चाहता हूं। "

उस व्यक्ति ने कुर्सी पर पसरे युवक को देखा वो इधर ही देख रहा था।

“क्या काम है बंसी भाई से?” युवक ने उसी तरह पसरे देवराज चौहान को देखा । 

देवराज चौहान की गर्दन उस तरफ घूमी।

“तुम्हारे मतलब का काम नहीं है। ये मेरे और बंसीलाल के बीच की बात है।" देवराज चौहान ने कहा ।

“फोन पर बात निपट सकती है तो शायद बंसी भाई से फोन पर बात हो जाये।”

“फोन पर ही बात करा दो।" देवराज चौहान ने कश लिया। युवक ने उस व्यक्ति को इशारा किया तो वो रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगा।

लाईन मिलते ही उसने कहा । “बंसी भाई नमस्कार कोई तुमसे बात करना चाहता है।" 

“कौन है?” बंसीलाल का स्वर कानों में पड़ा। 

“सुरेन्द्र पाल नाम बताता है अपना। कहता है कोई हिसाब... ।”

“सुरेन्द्र पाल -।" बंसीलाल के स्वर में अजीब-से भाव आ गये।

"हां। वो -"

“सुनो। मुरली वहीं है अभी?"

“जी - "

"मैं सुरेन्द्र पाल से बात करता हूं। तुम इस बीच मुरली को इशारा कर देना कि इसे खत्म करना है। समझ गये?"

“ठीक है बंसी भाई-।” वो व्यक्ति पहले जैसे स्वर में कह उठा- "सुरेन्द्र पाल से आपकी बात करा देता हूं।”

“लाश ठिकाने लगाने से पहले एक बार मुझे इसका चेहरा अवश्य दिखा देना- "

“ऐसा ही होगा।” कहने के साथ ही उसने देवराज चौहान की तरफ रिसीवर बढ़ाया- "लो बात करो।"

देवराज चौहान ने रिसीवर थामा।

“बंसीलाल - ।” देवराज चौहान के चेहरे पर कठोरता की परत आ गई थी।

“तो तुम हो सुरेन्द्र पाल - ।" बंसीलाल का कड़वा स्वर कानों में पड़ा ।

"क्या मतलब?” उसके लहजे पर देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ीं।

“थापर ने तुम्हारे बारे में बताया था कि तुम मुझे खत्म करने आ रहे हो ।”

“थापर?” देवराज चौहान की आंखें और सिकुड़ गईं- “थापर कब मिला ? "

तुमसे “रात से वो मेरे पास ही है।" बंसीलाल की आवाज में क्रूरता आ गई थी- “मुम्बई में प्रवेश करते ही मेरे आदमियों ने उसे पकड़ कर मेरे पास पहुंचा दिया।"

देवराज चौहान का चेहरा कठोर हो गया।

तब तक वो व्यक्ति कुर्सी पर पसरे युवक यानि कि मुरली को इशारा दे चुका था कि इस सुरेन्द्र पाल को खत्म करना है। इशारा पाते ही मुरली ने सावधानी से अपनी तैयारी शुरू कर दी। 

"वैसे तो मैं थापर को रात को ही खत्म कर देता। अब तक तो कहीं से पुलिस को उसकी लाश मिल गई होती। लेकिन थापर का विश्वास तोड़ने के लिये मैंने कुछ देर के लिये उसे जिन्दा रख लिया।" 

“कैसा विश्वास ?” देवराज चौहान के होंठ भिंचने लगे।

“थापर कहता है कि तुम मुझे हर हाल में खत्म कर दोगे।” शब्दों के साथ ही बंसीलाल की मौत से भरी हंसी कानों में पड़ी-"मैंने उसे समझाया कि मुझे खत्म करना एक-दो आदमियों के बस का नहीं है । लेकिन थापर को तुम पर इतना विश्वास है कि मैंने सोचा थापर को मौत देने से पहले उसका विश्वास भी तोड़ दूं, तुम्हारी लाश दिखाकर। मेरे लिये ये सब मामूली खेल से ज्यादा अहमियत नहीं रखता।"

"ज्यादा खेल खेलने की आदत नहीं डालनी चाहिये।" देवराज चौहान की आवाज में खतरनाक भाव थे।

"पुरानी आदत है मेरी । पक्की हो चुकी है। जाने से रही।" “थापर को कहां रखा है?”

"क्या फायदा जानने का। मालूम हो भी गया तो वहां नहीं आ सकोगे।" बंसीलाल का मौत से भरा स्वर कानों में पड़ा। 

“मैं आ जाऊंगा। तुम बताओ।”

बंसीलाल की क्रूरता भरी हंसी, देवराज चौहान के कानों में पड़ी। "मुम्बई में मेरा एक ही रैस्टोरैंट एण्ड बार है। उसी के तहखाने जैसे कैमरे में थापर मौजूद है।"

“बहुत आसानी से बता दिया ।”

“क्योंकि मुझे विश्वास है कि तुम इस वक्त जहां मौजूद हो, वहां से जिन्दा नहीं निकल सकोगे।”

देवराज चौहान की निगाह टेबल पर मौजूद व्यक्ति पर गई। वो कुर्सी पर बैठा था। हाथ में फाईल थमी थी। लेकिन उसे ही "देख रहा था। फिर उस युवती को देखा। वो अपने काम में व्यस्त थी। कुर्सी पर पसरे युवक पर नजर गई तो निगाह वहीं रुक गई।

वो वैसे ही कुर्सी पर पड़ा था। लेकिन हाथ में रिवॉल्चर थी। जिस पर साईलैंसर फिट था ।

उसे देखते हुए वो साईलैंसर पर उंगलियां थपथपा रहा था। आंखों में क्रूरता के भाव थे।

“तुम्हारे आदमी ने साईलैंसर लगी रिवॉल्चर पकड़ रखी है। " देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

“उसका निशाना भी बहुत अच्छा है।" बंसीलाल के स्वर में तीखे भाव थे। रिसीवर रखते ही वो तुम्हें शूट कर देगा। उसे इतनी तमीज है कि जब दो आदमी बातें कर रहे हो तो बीच में दखल नहीं देना चाहिये ।”

“मैं शाम को मिलूंगा तुमसे। तुम्हारे उसी रेस्टोरेंट में ।" देवराज चौहान का स्वर सपाट था। 

“बच गये तो जरूर आना।" बंसीलाल की खतरनाक हंसी 
कानों में पड़ी - "मैं इन्तजार करूंगा। लेकिन एक बात मैं अवश्य पूछना चाहूंगा कि तुम हो कौन? कम से कम सुरेन्द्र पाल तुम्हारा असली नाम नहीं हो सकता।”

" इस बात का जवाब तुम्हें शाम को दूंगा। तुम्हारे ही रेस्टोरेंट में--।"

“बेकार है। तुम अभी मर जाओगे। मैं फोन बंद कर रहा हूं-1" इसके साथ ही लाईन कट गई।

देवराज चौहान ने रिसीवर इस तरह कान से लगाये रखा जैसे उधर से बंसीलाल की बात को सुन रहा हो। गुरली रिवाल्वर थामे तैयार था कि उसकी बात खत्म हो और वो उसे शूट करे।

उसी पल पलक झपकते ही देवराज चौहान ने फुर्ती से रिवॉल्वर निकाली। वहां मौजूद कोई भी कुछ भी नहीं समझा पाया। मात्र तीन-चार सैकिण्डों का खेल रहा। देवराज चौहान ने हाथ में दबी रिवॉल्वर से गोली निकाली और मुरली का नाक तोड़ती हुई सिर के पीछे वाले हिस्से से बाहर निकल गई ।

साईलैंसर तगी रिवाल्वर उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गई थी। मुरली का सिर एक तरफ लुढ़क गया था। धार की तरह खून बह कर नीचे फर्श पर गिरने लगा।

फायर का तेज धमाका वहां हुआ था।

यो व्यक्ति और युवती हक्की-बक्की सी रह गई। मुरली को मारता पाकर उनके होंठों से कोई शब्द नहीं निकला। चेहरे फक्क और उनके गले डर से सूख रहे थे।

उसकी तरफ से कोई खतरा न पाकर देवराज चौहान ने रिसीवर वापस रखने के पश्चात् रिवॉल्वर जेब में डाली और कठोर चेहरे के साथ पलट कर दरवाजे की तरफ बढ़ा। तभी चपरासी ने दरवाजा खोलकर भीतर झांका देवराज चौहान को करीब पाकर सामने से हट गया। देवराज चौहान बाहर निकलता चला गया । 

भीतर प्रवेश करते ही बांकेलाल राठौर ठिठका। चेहरे पर अजीब से भाव आ गये। कभी वो नगीना को देखता तो कभी जगमोहन को। फिर उसका हाथ मूंछ पर पहुंचा और कोने के बालों को बल देने लगा। 

“रुक क्यों गये बांके।" जगमोहन बांकेलाल के ठिठकने की वजह जान चुका था।

बांकेलाल राठौर आगे बढ़ा। नजरें नगीना पर थीं।

“यो छोरी तो मन्ने पैले न देखो हो ।” बांकेलाल राठौर संभले स्वर में कह उठा- “इसो बंगले में कोई छोरी तो हौवे ही न । लगो तो भलो घरो की । पण यो जगमोहन के पास का करो हो ।” 

नगीना दोनों हाथ जोड़कर, खड़े होते हुए बोली ।

“नमस्कार भैया- ।”

“नमस्कारो। नमस्कारो । तन्ने तो म्हारे को भैय्यो भी बना लयो।” कहते हुए बांकेलाल राठौर ने जगमोहन को देखा- "देवराज चौहान तो घरों में न हौवे?"

“नहीं।” जगमोहन के होंठों पर मुस्कान उभरी ।

“तो तम छोरी के साथ यहां का करो हो?” बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर पहुंच गया। 

“ये मेरी भाभी है।”

“भाभी?” बांकेलाल राठौर की आंखें सिकुड़ीं- “भाभी तो तबो हौवे, जब थारा कोई भायो हौवे ।”

जगमोहन के चेहरे पर छाई मुस्कान गहरी हो गई । “अगर तुम्हारी पत्नी होती तो मैं उसे क्या कहता ?”

“भाभी ही बोलो और का बोलो हो। पण वो तो गुरदासपुर में किसी औरों को हुओ पड़ो हो ।” बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस ली- "ईब ये बोलो कि ये किसो की पत्नी हौवो ?” -

“देवराज चौहान की - "

बांकेलाल राठौर ने खा जाने वाली निगाहों से जगमोहन को घूरा। "तू म्हारे को बेवकूफ बनायो हो।" स्वर में तीखापन आ गया। 

"मैं सच कह रहा हूं। देवराज चौहान के नाम पर मैं कोई मजाक नहीं कर सकता। ये बात तुम भी अच्छी तरह जानते हो। नगीना भाभी के बारे में थापर अच्छी तरह जानता है।"

“थारी बात सचो हौवें। पण म्हारे को विश्वासो न आये। कबो किया देवराज चौहान ने ब्याह । म्हारे को तो कारड-वारड नेई भेजो हो । ब्याह की हवा तो कानों से भी न गुजरो हो ।”

बांकेलाल राठौर की बात पर नगीना खुलकर मुस्करा पड़ी।

“भाभी !” जगमोहन उठता हुआ बोला- “मैं जरा बांके को समझा कर आता हूं।"

जगमोहन, बांकेलाल राठौर की बांह पकड़कर कुछ दूर ले गया। 

"खास बात बतायो हो का हमको?”

जगमोहन ने कम शब्दों में बांकेलाल राठौर को नगीना के बारे में बताया।

बांकेलाल राठौर ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया और नगीना के पास जा पहुंचा।

“तन्ने म्हारे को पहली मुलाकात में भाई बोलो हो तो अंम भी थारे को आज से बहनो मानो हो। अंम थारे से बड़ा हो। इसो वास्ते थारे को नगीना कहो। थारे को नामो से बुलाने का हक हौवे मारे को ।” बांकेलाल राठौर मुस्करा कर बोला ।

"बड़े-छोटों को नाम से ही बुलायेंगे बांके भैया।" नगीना ने कहा। 

“यो हुओ न बात।" बांकेलाल राठौर खुशी से हंस पड़ा-“म्हारी बहना न हौवे । भगवानो ने वो भी कसर पूरी कर दयो । यो ऊपर वाला भी झटको दयो दयो कर मारो हो। ”

पास आता जगमोहन कह उठा । "बैठ जाओ बांके - " 

बांकेलाल राठौर बैठता हुआ कह उठा। “म्हारो मन तो करो सारो दिन अपणे बहनो से बातें करो हो । पण उधर तो गड़बड़ हुओ पड़ो हो ।” 

“क्या मतलब?" जगमोहन की निगाह बांकेलाल राठौर पर जा टिकी ।

“ थापर साहब कल रात गोवा से लौटो हो । थारे को तो पता ही हौवो । रात को मुम्बई पहुंचो हो कि बंसीलाल के आदमी थापर साहब को उठा लयो। कार का ड्राईवर म्हारे को बतायो हो ।” 

“क्या ?" जगमोहन चौंका।

नगीना कुछ पल तो ठगी सी रह गई।

"मैंने तो पहले ही कहा था जगमोहन कि बंसीलाल बहुत खतरनाक इन्सान है।” नगीना के होंठों से निकला।

"जबो ड्राईवर म्हारे को बतायो तो अंम छोरे (रुस्तम राव) के साथो थापर साहब को रातों से ही ढूंढो। म्हारे बोत आदमी भी इसो ही कामों पर हौवो । थारा तो म्हारे को पतो हौवे कि तम गोवा में हौवे । फिरो भी एक बारो देखने आ गयो कि यहां पहुंचो या गोवा में ही हौवो ।”

जगमोहन के होंठ भिंच चुके थे।

"देवराज चौहान कां हौवे ?”

"वो मुम्बई में है। हमसे पहले वो यहां आ गया था और अब बंसीलाल को खत्म करने ही गया है।"

"पण थापर साहब तो बंसीलाल की कैद में हौवो पता ही नेई लगो कि थापर साहब को किधर कैद - "

“ मैं तुम्हारे साथ चलता हूं बांके ।” जगमोहन का स्वर सख्त था- “थापर को ढूंढते हैं। भाभी तुम बंगले पर ही रहना । "

"देवराज चौहान का फोन आये तो उसे बता देना कि थापर बंसीलाल की कैद में है। मैं फोन करके पूछ लूंगा कि देवराज चौहान ने मेरे लिये कोई मैसेज छोड़ा कि नहीं - थापर को-।”

तभी फोन की बेल बज उठी ।

"हैलो ।” जगमोहन ने तुरन्त आगे बढ़कर रिसीवर उठाया। 

“सलाम बाप ।” रुस्तम राव की आवाज आई- “आपुन होएला। गोवा से कब वापस आएला ?” "

“आज सुबह ही- ।" जगमोहन के होंठों से गम्भीर स्वर निकला। “बांके इधर होएला क्या?"

“हां - ।” कहने के साथ जगमोहन ने रिसीवर बांकेलाल राठौर की तरफ बढ़ाया- “देवराज चौहान किधर होएला । वाँ भी बंसीलाल की कैद में पौंचेला बाप ?”

“वो ठीक हौवे छोरे । बंसीलाल को 'वडने' गयो हो । थापर साहब की खबर हौवे का?”

“हां। आपुन को मालूम होएला कि थापर साहब किधर कैद है। वो-।"

“तो अभ्भी तक हाथों पर हाथ रखे बैठे हो क्या। थापर साहब को वां से आजाद करो हो ।”

“इत्ता आसान नेई होएला बाप । वां बंसीलाल के आदमी-।” 

“आदमी है तो का हुआ छोरे। सबको 'वड' दे और - ।”

"आपुन बंगले पे आएला अभ्भी। वो पै बात करेला ।” 

“आ जा छोरे । थारे को अपनी बहना से मिलाएयो।" 

“बहना? ये कौन होएला बाप ?"

“जगमोहन की भाभी।" बांकेलाल राठौर के होंठों से छोटी सी मुस्कान उभरी ।

“आपुन नेई समझो ये कौन होएला ?”

“थारे को सबो कुछ फोन पे बता दयो। तो यां आके तम झाड़ उखाड़ो का।" कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर ने रिसीवर रखा और दोनों को देखते हुए गम्भीर स्वर में बोला- “छोरे को मालूम हो गयो कि थापर साहब का पै कैद हौवे ।”

“कहां कैद है थापर ?” जगमोहन का चेहरा सख्त सा हो उठा। “अभ्भी छोरा आकर बतायो । मन्ने न पूछो हो, यो बात ।” कहते हुए बांकेलाल राठौर का स्वर कठोर हो गया और हाथ मूंछ पर पहुंच गया - "सबो को 'वड' कर अम, थापर साहब को वां से ले आयो ।”

***